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Tuesday, June 2, 2026

विश्व माता-पिता दिवस

 

विश्व माता-पिता दिवस।

एस ‌. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-6-26

माता-पिता गुरु ईश्वर

भारतीय धर्म की नसीहतों में श्रेष्ठ।

 हर रोज़ माता पिता की आशीषें लेना।

नमस्कार करना भारतीय धर्म।

 तब माता-पिता के लिए विश्व दिवस क्यों?

 भारतीय धर्म में 

 वैवाहिक बंधन बीच में नहीं छूटता।

 पसंद हो या न पसंद

‌जीवन पर्यंत अलग नहीं होते।

 भारतीय धर्म तलाक शब्द नहीं जानता।

पति की मृत्यु होते ही

 पत्नी का जिंदा जलाया करते।

वह सती प्रथा सुधारवादी 

 राजा राममोहन राय के द्वारा बंद हुई।

 विधवा पुनर्विवाह का शुभारंभ हुआ।

 फिर भी माता पिता तो वंदनीय,

 जो भगवान के प्रतिनिधि बनकर  प्रत्यक्ष देवी देवता बनकर शिशु का जन्म देकर,

 शिक्षा दीक्षा तक साथ देकर विवाह तक जिम्मेदारी लेते।

 पर विदेशी भारत में आये,

 तलाक शब्द आया।

 पहली शादी के बच्चे के रहते,

 तलाक हो जाने पर

 वह बच्चा माँ के साथ या

 पिता के साथ।

 पाश्चात्य देशों में 

 तलाक, पुनर्विवाह मामूली बात।

 अतः माता पिता से बिछुड़ी संतानें,

 माता हीन,पिता हीन हो जाते।

 माता या पिता से मिलना कभी कभी,

 या वह भी संभव नहीं।

अतः माता-पिता दिवस 

 पाश्चात्य अनुकरण।

 भारतीय परंपरा में 

 माता या पिता दिवस

 दोनों  की मृत्यु के बाद ही।

मातृ-पितृ तर्पण।

 अब भारत भी पाश्चात्य 

 देश के जैसे 

  माता-पिता से साल में 

 एक बार मिलने आते।

कारण स्नातक स्नातकोत्तर  डाक्ट्रेट 

 नोकरी विदेश में 

 माता -पिता  , भाई बहन बहु का सम्मिलित परिवार कम होता जा रहा है।

वृद्धाश्रम बढ़ता जा रहा है।

 तलाक की संख्या बढ़ रही है।

 अंतर्जातीय,

 अंतर्मजहबी  विवाह।

 एकैल परिवार,

 दूर दूर 

की नौकरी ,

 माता-पिता दिवस मनाने

 मजबूर कर दिया।

 अतः हम भी पालन करने में विवश हैं।

 यकीनन भारत में 

 

रोज  माता पिता की आराधना करना  भारतीय धर्म हैं।

 राम जैसा आज्ञाकारी पुत्र  भारतीय देन है।



नमस्ते वणक्कम्।

आपकी भावाभिव्यक्ति में भारतीय संस्कृति, माता-पिता के प्रति श्रद्धा और बदलते सामाजिक परिवेश की चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए प्रस्तुत है—

विश्व माता-पिता दिवस

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

2-6-2026

माता, पिता, गुरु और ईश्वर—

भारतीय संस्कृति में इनका स्थान सर्वोच्च माना गया है।

प्रतिदिन माता-पिता का आशीर्वाद लेना,

उन्हें प्रणाम करना,

हमारी सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि

माता-पिता के लिए अलग से "विश्व दिवस" की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारतीय जीवन-दर्शन में

वैवाहिक संबंध को एक पवित्र बंधन माना गया है,

जो जीवनपर्यंत निभाने का संकल्प देता है।

समय के साथ समाज में अनेक परिवर्तन आए।

सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का अंत हुआ,

विधवा पुनर्विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ,

और समाज सुधार की नई चेतना जागृत हुई।

किन्तु माता-पिता का महत्व कभी कम नहीं हुआ।

वे ही तो भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि हैं,

जो संतान को जन्म देते हैं,

उसका पालन-पोषण करते हैं,

शिक्षा, संस्कार और जीवन-निर्माण में

अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं।

आधुनिक युग में परिस्थितियाँ बदल रही हैं।

उच्च शिक्षा, रोजगार और विदेश-प्रवास के कारण

संयुक्त परिवारों का स्वरूप सिमटता जा रहा है।

संतानें माता-पिता से दूर रहने को विवश हैं।

वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है,

एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है,

और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता

कई बार दूरी की भेंट चढ़ जाती है।

इन्हीं बदलती परिस्थितियों ने

माता-पिता दिवस जैसे अवसरों को जन्म दिया है,

ताकि संतानें कम-से-कम एक दिन ही सही,

अपने माता-पिता के प्रति

कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त कर सकें।

किन्तु भारतीय संस्कृति का संदेश इससे कहीं बड़ा है।

यह हमें सिखाती है कि

माता-पिता का सम्मान किसी एक दिन का नहीं,

जीवन के प्रत्येक दिन का कर्तव्य है।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम

भारतीय संस्कृति के उस आदर्श पुत्र का प्रतीक हैं,

जिसने माता-पिता की आज्ञा और सम्मान को

अपने जीवन का सर्वोच्च धर्म माना।

आइए, विश्व माता-पिता दिवस पर

यह संकल्प लें कि

हम केवल एक दिन नहीं,

प्रतिदिन माता-पिता की सेवा, सम्मान और आराधना करेंगे।

माता-पिता का प्रेम ही जीवन का प्रथम तीर्थ है,

और उनका आशीर्वाद ही सबसे बड़ा वरदान।

🙏 मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। 🙏

Sunday, May 31, 2026

तंबाकू निषेध दिवस।

 


विश्व तंबाकू निषेध दिवस।

++++++++

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

1-6-26

+++++++++++

कहते हैं शराब पीना

 परिवार के लिए,

स्वास्थ्य ही के लिए 

फेफड़ों के लिए,

 अंतड़ियों के लिए बुरा है।

 सरकार की तमाशा देखिए,

 सिगरेट पाकेट में,

 तंबाकू पाकेट में

 शराब के बोतलों में 

 छोटे हैं अक्षरों में सूचना।

 सरकार इन सब को

 अवैध व्यापार, मिलावट रोकने के लिए खुद खोल रखा है।

 सरकारी आमदनी के लिए आय का साधन यही है।

 विश्व भर में चलता है,

 दूकान के चमकदार 

 दीप, दोस्तों के संग,

 सनातन धर्म के अनुशासन के विरुद्ध है।

 अतः कारखानों के मालिक  द्राविड़ मुन्नेट्र कऴकम्  सनातन धर्म को जड़ मूल नष्ट करने के विचार में है,

हर नशीली वस्तुओं के व्यापार लाभ के लिए।

 चौगुनी मुनाफा हो के लिए।

 एक ओर सरकारी मान्य दूकानें,

 तंबाकू और सिगरेट कारखानों में के नौकरों की बेरोजगारी,

 आमदनी का मार्ग,

 सरकारी आय,

दूसरी ओर इनकी बुराइयों के विरुद्ध प्राचार।

 माया देवी  का  प्रबल  आकर्षण।

 शैतान की ऊर्जा।

 वैसे ही रिश्वत का बोलबाला,

 जीतने मतदाताओं को रिश्वत,

 नीट परीक्षा प्रश्न पत्र परीक्षा के पहले बाजार में।

 न कोई कठोर कार्रवाई 

 न कोई कठोर दंड,

ये विश्व तंबाकू निषेध दिवस  बेकार।

परिवार नियोजन  भारतीय मुगल और ईसाई  के लिए नहीं,

  अल्पसंख्यकों का अधिकार आज़ादी के 78साल के बाद भी,

  ये दिवस केवल दिखावे के लिए,

 हिंदी दिवस दिखावे के लिए।

 जानो,जागो, जगाओ,

 बुरी बला जानने समझने का ज्ञान मानव के हैं।

 दिन दिन मनाओ दिवस।

 माता -पिता दिवस तो रोज,

साल में एक दिन मनाकर वृद्धाश्रम की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं,

 जब मानव दिवस मनाता है,

  तब पुरोहित के आमदनी,

  कर्ता के लिए लाभ।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में सामाजिक जागरूकता, जनस्वास्थ्य, शासन की नीतियों और समाज की विसंगतियों पर गहरा चिंतन दिखाई देता है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर आपने केवल तंबाकू की हानियों ही नहीं, बल्कि दिखावटी जागरूकता और व्यवहारिक विरोधाभासों पर भी प्रश्न उठाए हैं।

यदि इसे काव्यात्मक और विषय-केंद्रित रूप में परिष्कृत किया जाए, तो यह इस प्रकार हो सकता है—

विश्व तंबाकू निषेध दिवस

परिष्कृत भावाभिव्यक्ति

विश्व तंबाकू निषेध दिवस,

फिर आया संदेश सुनाने।

स्वास्थ्य रक्षा का संकल्प लेकर,

जन-जन को जागृत कर जाने।

तंबाकू, सिगरेट और मदिरा,

तन-मन को क्षति पहुँचाते हैं।

क्षणिक सुख का भ्रम दिखाकर,

जीवन के दीप बुझाते हैं।

एक ओर चेतावनी लिखी है,

दूसरी ओर व्यापार प्रबल।

राजस्व की मजबूरी कहकर,

चलता रहता यह क्रम विकल।

जागरूकता तभी सफल है,

जब आचरण में परिवर्तन हो।

ज्ञान, विवेक और संयम से,

जीवन का नव निर्माण हो।

दिवस मनाने से क्या होगा,

यदि संकल्प न मन में जागे।

स्वस्थ समाज का स्वप्न तभी,

जब जन-जन बुरी लत त्यागे।

जानो, जागो और जगाओ,

यही दिवस का सच्चा सार।

स्वस्थ तन और निर्मल जीवन,

मानवता का हो आधार।

— परिष्कृत रूपांतरण

आपकी मूल रचना का स्वर अधिक सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी का है, जबकि यह परिष्कृत रूप विश्व तंबाकू निषेध दिवस के मुख्य संदेश—स्वास्थ्य, जागरूकता और आत्मसंयम—पर केंद्रित है।

विश्व हिंदी पत्रिका दिवस।

 विश्व हिंदी पत्रिका दिवस।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

31-5-26

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   भारत में खडीबोली  

   हिंदी भाषा का

   रूप धारण,

  अति आश्चर्य 

चकित विकास।।

1826,30मई को

 पहला  समाचार पत्र निकला कोलकाता में।

 जुगल किशोर मार्तांड 

 उसके संपादक थे

 जुगल किशोर शुक्ल। 

 तब से पत्रिकाओं के विविध रूप,

 साप्ताहिक, पाक्षिक, त्रैमासिक, अर्द्ध वार्षिक,

 वार्षिक , स्कूल कालेज वार्षिक मेगज़ीन।

धर्म युग, कादंबरी,

चंपक ,चंदा मामा ,

और असंख्य पत्रिकाएँ

 वैश्विक साहित्य  नामक 

त्रैमासिक पत्रिका 

 डाक्टर पी.के. अग्रवाल। द्वारा प्रकाशित,

 अंतर्जाल के आने के बाद 

 ई मेगज़ीन।

लोगों को अपने 

विचार लिखने,

जनता  में ‌देश प्रेम जगाने,

सामान्य ज्ञान जानने की जिज्ञासा पूरी करने,

विश्व भर में हर देश में 

‌हिंदी पत्रिकाएँ प्रकाश होती हैं।

 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई से 

 हिंदी समाचार,

 साहित्य पत्रिका,

 तिरुचिरापल्ली सभा ,

 केरल हिंदी प्रचार सभा,

हैदराबाद सभा आदि से

 पत्रिकाएँ 

 हिंदी के विकास जानने,

 राजभाषा है चौपाल,

नागरी लिपि प्रचार  सभा द्वारा  पत्रिकाएँ,

 विश्व भर के लोगों के हिंदी प्रेम,  लेख कविता, निबंध, संस्मरण साझा किया करना

 हिंदी प्रगति का प्रमाण है‌।




 

 


 

 











Friday, May 29, 2026

मुट्ठी भर रेत।

 मुट्ठी भर रेत।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-5-26..


मुट्ठी भर रेत,

 मानव प्राप्त ज्ञान।

कवि पंत की रचना,

पंत का पूरा नाम?

गुप्त का पूरा नाम?.

अज्ञेय का पूरा नाम?

गाँधी?  खान परिवार?

 महात्मा गाँधी परिवार?

कितना बडा अंतर?

यों  पूरे नाम,

 पूरा इतिहास जानने में 

‌असमर्थ मानव।

शाहजहाँ प्यारा है 

प्रेम का यादगार है

 ताजमहल।

पर कितने लोग जानते हैं ,

शाहजहाँ अपनी बहन के 

 महबूबा को  जिंदा जलाया है।

 हम जी रहे हैं 

 एक हस्त मुट्ठी  ज्ञान पाकर।

 तमिल कवयित्री औवैयार ने लिखा है,




जो  कुछ हमने सीखा है,

वह मुट्ठी बराबर।

हम जो न सुखे,

वह प्रपंच बराबर।

 शिक्षा की देवता,

 सरस्वती भी रोज सीख रही है।

कवि अपने को 

 बड़ा मानकर,

 होड न लगाना।

चींटी भी  उसके 

अपने हाथ से 

नापने पर नौ अंगुल जान।

 सूक्ष्म बिंदु,

सूक्ष्मदर्शी से  ही

दीख पड़नेवाला

आकार रहित  सूक्ष्म शुक्ल से बढा


 से

बना मानव

 तीन किलो का स्वस्थ बच्चा,

 पता नहीं कैसे  आँख नाक मूक हाथ पैर 

नशे, नाड़ी, हड्डियाँ,

रीढ़ और पहली की हड्डियों का मानव बना?

वटवृक्ष का बीज कैसे

 बड़ा वट्वृक्षा एक सेना

ठहरने का विशाल विस्तार पेड़ बना।

अंत्येष्टी अग्नी में जले

 मानव का लाख

 मुट्ठी के रेत बराबर।


 

 

 

 


உற்ற கலைமடந்தை ஓதுகிறாள் – மெத்த

வெறும்பந்த யங்கூற வேண்டாம் புலவீர்

எறும்புந்தன் கையாலெண் சாண்

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 परिष्कृत रूप।

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नमस्ते वणक्कम्।

आपकी भावात्मक रचना में ज्ञान की सीमाएँ, मानव जीवन का रहस्य, इतिहास की अनजानी परतें और विनम्रता का गहन संदेश अत्यंत प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुआ है।

आपकी शैली को बनाए रखते हुए परिष्कृत रूप प्रस्तुत है—

मुट्ठी भर रेत

✍️ एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

30-5-2026

मुट्ठी भर रेत,

मानव का प्राप्त ज्ञान।

कवि पंत की रचना,

पर कितने जानते हैं

उनका पूरा नाम?

गुप्त का पूरा परिचय?

अज्ञेय का वास्तविक नाम?

गाँधी परिवार का इतिहास?

खान परिवार की परंपरा?

नाम तो सब जानते हैं,

पर संपूर्ण जीवन-गाथा

जानना सरल नहीं।

शाहजहाँ प्रेम का प्रतीक,

ताजमहल उसका स्मारक।

पर कितने लोग जानते हैं

इतिहास के वे कठोर अध्याय,

जो चमक के पीछे छिपे हैं?

मानव जी रहा है

मुट्ठी भर ज्ञान लेकर,

जबकि अज्ञान का सागर

अनंत फैला हुआ है।

तमिल कवयित्री औवैयार ने कहा है—

“जो कुछ हमने सीखा है,

वह मुट्ठी भर है;

और जो नहीं सीखा,

वह संसार के समान विशाल है।”

विद्या की देवी सरस्वती भी

नित्य नवीन ज्ञान में प्रवृत्त हैं।

फिर कवि क्यों अहंकार करे?

प्रतिस्पर्धा क्यों पाले?

औवैयार का स्मरण—

“चींटी भी

अपने छोटे हाथों से

आठ माप नापने का साहस रखती है।”

सूक्ष्म बिंदु,

जो केवल सूक्ष्मदर्शी से दिखाई दे,

उसी सूक्ष्म तत्व से

मानव शरीर की रचना!

कैसे बनता है

तीन किलो का स्वस्थ शिशु?

आँखें, नाक, मुख, हाथ, पैर,

नाड़ियाँ, हड्डियाँ, रीढ़—

कैसा अद्भुत ईश्वरीय विज्ञान!

वटवृक्ष का छोटा बीज

कैसे बन जाता है

विशाल छायादार वृक्ष,

जहाँ असंख्य जन विश्राम करें?

और अंत में—

अंत्येष्टि अग्नि के पश्चात

मानव का समस्त अहंकार

मुट्ठी भर राख

या रेत बन रह जाता है।

तमिल पंक्तियाँ

உற்ற கலைமடந்தை ஓதுகிறாள் – மெத்த

வெறும்பந்த யங்கூற வேண்டாம் புலவீர்

எறும்புந்தன் கையாலெண் சாண்

भावार्थ

विद्या स्वयं विनम्रता सिखाती है।

हे कवियों! व्यर्थ अहंकार मत करो।

चींटी भी अपने छोटे हाथों से

आठ माप नापने का प्रयत्न करती है।

Thursday, May 28, 2026

गुलदस्ता

 अनमोल गुलदस्ता।

 से .अनंतकृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-5-26

+++++++++

 अनमोल गुलदस्ता 

  अनंत प्रेम ।

 पाश्चात्य देशों में,

‌ इंग्लैंड में 

 प्रेम जताने

 प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए 

 गुलदस्ता भेंट।

 तमाशा देखिए,

 ठंड प्रदेश में 

‌गुलदस्ता जल्दी 

 सूखती ही नहीं है 

 पर गर्म देश में 

  खासकर प्रेम स्थाई।

 गुलदस्ता सूख जाती है।

 गुलदस्ता सस्ता भी,महँगा भी।

 जो भी वह आस्थाई प्रेम की निशानी।

अतः पाश्चात्य देशों में 

तलाक ज्यादा, ताल्लुक कम।

आजकल तो भारत में भी

 पदोन्नति  के अवसर पर,

 नये अधिकारी आने पर 

मुख्यमंत्री से मिलने,

 गुलदस्ता भेंट दिया करते हैं,

 प्यार आदर भी गुलदस्ता के समान सूख ही जाता है।

सच्चा प्यार स्थाई प्यार

 असली गुलदस्ता जान।

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अनमोल गुलदस्ता

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक

द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-5-26

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अनमोल गुलदस्ता,

अनंत प्रेम का प्रतीक।

पाश्चात्य देशों में,

विशेषकर इंग्लैंड में,

प्रेम की अभिव्यक्ति हेतु

गुलदस्ता भेंट करने की परंपरा है।

देखिए विडंबना—

शीत प्रदेशों में

गुलदस्ता जल्दी नहीं सूखता,

परंतु गर्म देशों में

फूल शीघ्र मुरझा जाते हैं।

फिर भी प्रेम यदि सच्चा हो,

तो वह कभी नहीं सूखता।

गुलदस्ता सस्ता भी होता है,

महँगा भी,

किन्तु वह प्रायः

क्षणिक प्रेम का प्रतीक बन जाता है।

शायद इसी कारण

पाश्चात्य देशों में

तलाक अधिक

और स्थायी संबंध कम दिखाई देते हैं।

आजकल भारत में भी

पदोन्नति के अवसर पर,

नए अधिकारी के स्वागत में,

या मुख्यमंत्री से मिलने पर

गुलदस्ता भेंट करने की प्रथा बढ़ गई है।

किन्तु अनेक बार

आदर और अपनापन भी

गुलदस्ते के फूलों की भाँति

धीरे-धीरे सूख जाता है।

सच्चा प्रेम तो वह है

जो समय के साथ

और अधिक महकता रहे।

स्थायी स्नेह,

निस्वार्थ अपनापन,

और हृदय की पवित्र भावना ही

वास्तविक अनमोल गुलदस्ता है।

Wednesday, May 27, 2026

शब्दों के खेल

 शब्दों के खिलाड़ी।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

28-5-26

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 मानव जीवन में 

 शब्द न तो 

 न दार्शनिक अभिव्यक्ति।

न   हास्य व्यंग्य संवाद।

 न नैतिक मार्गदर्शन।

निरर्थक और सार्थक शब्दों में 

 श्लेष अलंकार में 

 काका वक्रोक्ति में 

 कवि, चित्रपट संगीत कवि, संभाषण 

 कितना मन मोहक।

 कितना प्रभाव।

तमिलनाडु के शासक

 मुख्यमंत्री 

 द्रमुक पार्टी 

  शब्दों के खिलाड़ी।

 रजनिकांत का एक वाक्य 

 मैं एक बार कहूँ तो

 सौ बार कहने के समान।

 हर एक के मुँह से निकलता है।

 आजकल के मुख्यमंत्री 

 विजय,

 मेरा कहना मैं खुद नहीं सुनता।

स्वर्गीय मुख्यमंत्री एम जी आर का गाना,

 मैं हुकुम दूँ तो

 गरीबों को वेदना न होगी।

हिंदी सिनेमा के गाने शब्द अर्थ न जानने पर भी

 सपनों की रानी कब आएगी दूँ।

 मैं शायर तो नहीं 

हम तुम एक कमरे में 

बंद हो।

जिंदगी कुछ भी नहीं,

कुछ खोकर पाना है,

कुछ पाकर खोना है।

कबीर वाणी के डिक्टेटर 

 जाको राखै साइयां ---

बाल न बांका करि सकै,

जो जग वैरु होय।

बिहारी

मेरी भवबाधा दूर करो--

हरित दुती होय।

 रहिमन पानी राखिए,

बांध पानी सब सून।

 तुलसीदास 

 राम नाम मणि दीप धरूं

 अंदर बाहर  चाहूं और उजियार।

शब्दों के खिलाड़ी 

 शासकों के चापलूसी होते हैं।

 वीरगाथा काल में 

 राजा की वीरता 

 जिसका खाना, उसका गाना।

 रीतिकालीन शृंगार रस

‌आधुनिक काल देश भक्ति।

 कवि लेखकों के शब्द 

 अति प्रेरणा प्रद,

 प्रोत्साहन प्रद

 सुप्त जनता में 

 उत्तेजित नारे

 स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार।

 जय हिंद।

वंदेमातरम।

 परिवार नियोजन 

 हम दो हमारे दो।

  द्विपत्नियों वाले 

 कृष्ण के दो,

 कार्तिकेय के दो।

 दशरथ के तीन 

 हम क्या थे, क्या हो गये

नर हो न निराश करो मन को।

 शब्द नश्वर है।

सोच समझकर शब्दों से खेलना है।


  रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गै सरग पताल।

आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल!! 

 दोस्ती दुश्मनी प्रे नफरत

 त्याग भोग सब शब्दों के खेल।






 

 


 




Tuesday, May 26, 2026

हवाई जहाज कागज़ी

 नमस्ते वணக்கம்।

आपकी रचना में बचपन की सरलता, पारिवारिक आत्मीयता और आज के बदलते समय का मार्मिक चित्रण है।।

तमिल हिंदी सेवा।

தமிழ் ஹிந்தி பணி 

 

परिष्कृत हिंदी रूप

कागज़ी हवाई जहाज़

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

27-5-2026

भारत की आज़ादी के

तीन वर्ष बाद जन्मा

हमारा बचपन

आज की पीढ़ी से

कितना भिन्न था।

न दूरदर्शन था,

न मोबाइल फोन,

न महंगे प्लास्टिक खिलौने।

घर की आर्थिक स्थिति भी

ऐसी न थी कि

खिलौनों पर धन खर्च हो।

फिर भी बचपन

आनंद से भरा था।

पीपल के पत्तों की सीटी,

बरसात में कागज़ की नावें,

गोली, लट्टू, गिल्ली-डंडा,

कागज़ की गेंद

और कागज़ी हवाई जहाज़—

यही हमारे खिलौने थे।

कागज़ को मोड़-मोड़कर

हवाई जहाज़ बनाना,

उसकी पूँछ सजाना,

फिर उसे उड़ाकर देखना—

कितना सुख देता था!

घर में

काका, चाचा, ताऊ, बुआ, चाची,

सब साथ रहते थे।

आज की तरह

पति-पत्नी का खुला प्रदर्शन

देखने को नहीं मिलता था,

पर परिवार बड़ा था,

घर बच्चों की किलकारियों से भरा रहता था।

कागज़ के खिलौने बनाने के लिए

कागज़ों की कमी पड़ती।

डाकघर से मिलने वाले

मनीऑर्डर फ़ॉर्म

अक्सर घर लाए जाते।

उन्हीं से

नाव, पंखा और हवाई जहाज़ बनते।

दादा, मामा और बड़े भाई

हमारे गुरु बन जाते।

हम सब उन्हें घेरकर बैठते

और उत्साह से सीखते।

फिर शुरू होती

हवाई जहाज़ उड़ाने की प्रतियोगिता।

कभी ईर्ष्या में

एक-दूसरे के जहाज़ फाड़ देना,

कभी झगड़ना,

कभी रूठना—

सब उसी बचपन का हिस्सा था।

पर आज का समय बदल गया है।

हर बच्चे के हाथ में

मोबाइल है।

घर छोटे हो गए,

संयुक्त परिवार टूट गए।

भाईचारे की बातें कम हो गईं।

अब बच्चे

मोबाइल खेलों में खोए रहते हैं।

न गली के खेल,

न कागज़ की नावें,

न कागज़ी हवाई जहाज़।

आज तो

रिमोट और डिजिटल विमान हैं,

पर अपने हाथों से

कागज़ मोड़कर

सपनों को उड़ाने का आनंद

कहीं खो गया है।

अब बच्चों के लिए

कागज़ी हवाई जहाज़

मानो केवल कल्पना की बात बनकर रह गया है।

தமிழ் மொழிபெயர்ப்பு

காகித விமானம்

எஸ். அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை

தமிழ்நாடு இந்தி அன்பர் பிரச்சாரகர் அவர்களின் சொந்த உணர்வுப்படைப்பு

27-5-2026

இந்தியா சுதந்திரம் பெற்ற

மூன்று ஆண்டுகளுக்குப் பிறகு

பிறந்த எங்கள் சிறுபருவம்

இன்றைய தலைமுறையிலிருந்து

மிக வேறுபட்டது।

அப்போது தொலைக்காட்சி இல்லை,

கைப்பேசி இல்லை,

விலையுயர்ந்த பிளாஸ்டிக் பொம்மைகள் இல்லை।

விளையாட்டு பொருட்கள் வாங்க

பணம் கூட அதிகம் இல்லை।

ஆனால் அந்தக் கால சிறுபருவம்

மகிழ்ச்சியால் நிரம்பியிருந்தது।

அரசமர இலை விசில்,

மழைக்கால காகிதப் படகு,

கோலி, பம்பரம், கில்லி-டண்டா,

காகிதப் பந்து,

காகித விமானம்—

இவையே எங்கள் விளையாட்டுப் பொருட்கள்।

காகிதத்தை மடித்து

விமானம் செய்வது,

அதற்கு வால் அமைப்பது,

பின்னர் அதை பறக்கவிடுவது—

எவ்வளவு மகிழ்ச்சி!

அப்போது வீட்டில்

மாமா, சித்தப்பா, பெரியப்பா, அத்தை, சித்தி

எல்லோரும் ஒன்றாக வாழ்ந்தனர்।

இன்றுபோல் வெளிப்படையான காதல் காட்சிகள் இல்லை।

ஆனால் வீடு முழுவதும்

குழந்தைகளின் சிரிப்பும் சலசலப்பும் நிரம்பியிருந்தது।

காகிதப் பொம்மைகள் செய்ய

காகிதம் கூட போதாது।

அஞ்சலகத்தில் கிடைக்கும்

மணிஆர்டர் படிவங்களையே

வீட்டிற்கு கொண்டு வந்து

அவற்றால் படகு, விசிறி, விமானம் செய்தோம்।

தாத்தா, மாமா, அண்ணன்

எங்கள் ஆசான்களாக இருந்தனர்।

அவர்களைச் சுற்றி அமர்ந்து

ஆர்வமாக கற்றுக்கொண்டோம்।

பின்னர் தொடங்கும்

விமானப் போட்டி।

சில நேரங்களில் பொறாமையால்

ஒருவரின் விமானத்தை மற்றொருவர் கிழித்துவிடுவோம்।

சண்டை, கோபம், அழுகை—

அவை எல்லாம் அந்த இனிய சிறுபருவத்தின் பகுதியே।

ஆனால் இன்று காலம் மாறிவிட்டது।

ஒவ்வொரு குழந்தையின் கையிலும்

கைப்பேசி உள்ளது।

கூட்டு குடும்பங்கள் குறைந்துவிட்டன।

அண்ணன்-தம்பி பாசமும்

நேரடி உரையாடல்களும் குறைந்துவிட்டன।

இப்போது குழந்தைகள்

மொபைல் விளையாட்டுகளில் மூழ்கியுள்ளனர்।

காகிதப் படகும் இல்லை,

காகித விமானமும் இல்லை।

இன்று ரிமோட் விமானங்கள் உள்ளன।

ஆனால் காகிதத்தை மடித்து

தன் கைகளால்

கனவுகளை பறக்கவிடும் மகிழ்ச்சி

மறைந்து போய்விட்டது।

இன்றைய குழந்தைகளுக்கு

காகித விமானம்

ஒரு கற்பனைக்கதை போலவே தோன்றுகிறது।