अपनी सोच बदलो
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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
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5-2-26
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मानव जीवन में
सभ्यता के विकास के
मुख्य कारण सोच बदलना।
सोच विचार करके
नये सिद्धांत,
नयी क्रांति
नये नये विकास।
ईश्वर के ध्यान में में
कितनी सोच बदलते
रहते हैं।
कितने मत संप्रदाय
कितनी मूर्तियाँ
कितने नाम।
कितनी कल्पनाएँ
कितने अंधविश्वास।
विसर्जन के नाम से
करोड़ों की सुंदर
गणेश की मूर्तियाँ
कितनी काली की मूर्तियां
हर साल हिंदु ओं के द्वारा
छिन्न-भिन्न करके
अपमानित किए जा रहे हैं।
यह किस वेद में
किस उपनिषद शास्त्रों में है ,
पता नहीं,
सोच बदलो
करोड़ों की मूर्तियां
बेकार होने के खर्च में
सनातन धर्म के प्रचार में
हिंदू धर्म के
प्रचार में,
हिंदू धर्य के ग्रंथों
जन जन में पहुँचाना।
प्रायश्चित के नाम से
धोखा खाना छोड़ दो।
मन चंगा तो कठौती में गंगा,
याद रखो।
दान धर्म देकर
देवालय के बाहर
भिखारियों की संख्या
बढ़ाने में साथ न दो।
कितनी असली अपाहिज
कितने नकली भिखारी
पता नहीं।
सोचो,
समझो
विचारों।
चुनाव में
धनी भ्रष्टाचारियों को
वोट मत दो।
गीताचार्य के अनुसार
अपने कर्तव्य ईमानदारी और तटस्थता से निभाओ।
धन प्रधान मानकर
गलत मार्ग पर
कमाने पर तत्कालीन आनंद।
शाश्वत आनंद, शांती संतोष
तटस्थता में, सत्यता में
ईमानदारी में है।
तन स्वास्थ्य पर ध्यान दो।
धन कमाने में
सोच सोच कर,
स्वास्थ्य नष्ट करके,
चिकित्सालय में
खर्च न करो।
एकता के लिए
मजहब,
मानव समाज में
जाति संप्रदाय मजहब के नाम टुकड़े टुकड़े करने कराने करवाने के
सोच बदलो।।
मंदिरों की संख्या जितनी बढ़ती है, उतनी ही अनाचार बाह्याडंबर।
भक्ति नहीं मंदिर प्रदर्शनी
बन रहै हैं।
सोच बदलो
दैश और विश्व कल्याण के विचार करो।
मजहबी लडाइयाँ
मानव में भेद राग-द्वेष बढ़ा रहे हैं।
अपनी सोच बदलो।
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