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Tuesday, October 6, 2026

शहरी भाग दौड़

 शहर की भाग दौड़ में।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक।

7-10-26.++++++

++++++++


शहरी जीवन 

तनाव से पूर्ण।

घर एक जगह,

 कार्यालय एक जगह।

 अधिक दूरी।

  समय पर जाना आना

 कभी कभी रेल से थोड़ी दूर,

उतरकर बस से थोडी दूर।

पैदल थोड़ी दूर।

शहरी भाग दौड़ में 

 यात्रा में ही अधिक समय।

 सुबह घर से निकला तो रेल में ही नाश्ता।

  कर्मचारियों के लिए ।

 घर की तलाश में,

 घर के मालिक की शर्तें मानने में,

अपार्टमेंट में ही अड़ोस पड़ोस वालों के व्यवहार में 

वाहन पार्किंग में 

शहरी भाग दौड़।

 जो वहाँ के 

रहन- सहन के आदी हो जाते हैं,

सब्र कर लेते हैं।

गाँव से जो शहर आते हैं,

उनके लिए तनिक भी

 शहरी तडक भटक पसंद नहीं होते।

द्वि चक्र गाड़ी हो या 

पैर गाड़ी भी हो

बाज़ार   में  स्टैंड  मिलना मुश्किल।

 भूल से छोड़ने पर पुलिस की परेशानियां।

 चोरों का भय, जेबकतरे का भय।

 थोड़े में कहना है तो

 शहर के भागदौड़ में 

 सब्रता की जरूरत है।

शहर की भाग-दौड़ में


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक

7-10-2026


शहरी जीवन

तनाव से पूर्ण।

घर एक जगह,

कार्यालय दूसरी जगह—

दोनों के बीच

लंबी दूरी।


समय पर जाना,

समय पर लौटना—

कभी रेल से थोड़ी दूर,

उतरकर बस से थोड़ी दूर,

फिर पैदल भी थोड़ी दूर।


शहरी भाग-दौड़ में

यात्रा में ही

बीत जाता है

अधिक समय।


सुबह घर से निकले,

तो कभी-कभी

रेल में ही नाश्ता।


कर्मचारियों के लिए

घर की तलाश,

मकान मालिक की शर्तें,

अपार्टमेंट में

अड़ोस-पड़ोस वालों का व्यवहार,

वाहन की पार्किंग—

हर जगह

शहरी भाग-दौड़।


जो लोग

इस जीवन के

रहन-सहन के आदी हो जाते हैं,

वे धीरे-धीरे

सब्र करना सीख लेते हैं।


लेकिन गाँव से

जब कोई शहर आता है,

तो उसे यह

शहरी तड़क-भड़क

तनिक भी पसंद नहीं आती।


द्विचक्र वाहन हो

या पैदल चलना हो,

बाज़ार में भी

जगह मिलना मुश्किल।


भूल से वाहन छोड़ दिया,

तो पुलिस की परेशानी;

चोरों का भय,

जेबकतरों का भय—

हर कदम पर

सावधानी जरूरी।


थोड़े में कहना हो तो—

शहर की भाग-दौड़ में

सुविधाओं से अधिक

सब्र की जरूरत है।


शहरी जीवन

सिर्फ इमारतों का नाम नहीं;

यह तो

समय से संघर्ष करते हुए

जीने की एक कला है।

Monday, October 5, 2026

काव्य मराथान

 काव्य मराथन में   पहले औरआज दूसरा दिन।

 चेन्नई के सुप्रसिद्ध कवि श्री ईश्वर करुण जी ने मुझे नामित किया और इसी कड़ी में मैं आज  कविताएं  लिख रहा हूँ।


कविता २.


मैं कविता के देश में भटक रहा हूं। --शीर्षक।


 नमस्ते! वणक्कम!

 मैं हूं हिंदीतर भाषी।।

 भटक रहा हूं   शैली के लिए।

छंदों की गिनती में,

अलंकारों के शब्दों में

नव रसों के चिंतन में।

रूढी बद्ध लिखने में

ईश्वर का अनुग्रह न मिला

जैसे मिला कालीदास को।

आदी कवि वाल्मीकि को।

तुलसी को,सूर को।

कबीर जैसा मानसिक गुरु

अंधेरे में पैर दबकर "राम,राम"मंत्र।।

सब के मिश्रण में ,उनके रसास्वादन में

भटकता भटकता कुछ भीनहीं लिख पाया।।

आधुनिक खड़ी बोली की

मुक्त शैली ,नव कविता,है कू

उनको भी नियम बनाते तो

सोचा लिखना है जरूर।।

अपने सोच विचार की 

अभिव्यक्ति करना है जरूर।

लिखना शुरु किया

अपनी भाषा,अपने विचार ,

अपनी शैली।।

यही ईश्वरानुग्रह।।

यही ईश्वरानुभूति की प्रेरणा।

परिणाम भी अच्छा निकला।

मुख पुस्तिका के दलों ने

 मेरी कविता मान ली।।

एकाध ने" वाह"वाह",सुंदर,

रायें लिखी तो प्रेरित मैं

साहस होकर कुछ लिख रहा हूं।

कवि कुटुंब भी अपने कवि सूची में

मेरा नाम भी जोड़ दिया।

ऐसे ही दस से ज्यादा दलों ने

मुझे स्वीकारा।

 सब के प्रति आभारी हूं।।

मैं कविता के देश में

 भटक रहा हूं आज।।

स्वरचित कविता

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै।

७-१०-२०२०


पहला दिन।


कविता-1.-- अपने विचार अपनी शैली। 

शीर्षक = इंसानियत।

श्रीगणेश करता हूं, श्री गणेश जी की कृपा मिलें।

श्री नहीं तो श्रीहीन मनुष्य जंग में जीना दुश्वार।

लक्ष्मी है कायर है तो न निर्भर जीवन।

शक्ति है, लक्ष्मी है  , बुद्धि  है  

तीनों है चरित्र नहीं तो 

नर जीवन अपमानित नारकीय।।

सातों जनमों में अपमानित रावण जीवन।

सुयोधन बन गया दुर्योधन। 

मजहब अनेक मनुष्यता नहीं तो

मजहब महत्वहीन हो जाते।।

वल्लुवर की बात--

कछुए समान पंचेंद्रिय को काबू में रखें तो

सातों जनमों में सम्मान जान!!

अनुशासन श्रेष्ठता देने से

अनुशासन जान से श्रेष्ठ जान।

चाल-चलन अच्छी तो अगजग में 

सिर ऊंचा जान।।


स्वरचित स्वचिंतक अनंत कृष्णन  चेन्नै।

शिक्षक दिवस

 माता-पिता और गुरु—तीनों


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

6-10-2026


मानव में मानवता भरना,

जीविकोपार्जन के योग्य बनाना,

सत्य-असत्य का विवेक समझाना,

विनम्रता और अनुशासन सिखाना,

अच्छे चाल-चलन का मार्ग दिखाना,

भरी सभा में निर्भय होकर

अपने विचार व्यक्त करने का साहस देना—


इन सबका मार्गदर्शक है शिक्षक।


अज्ञान के अंधकार को मिटाकर

ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाला,

जीवन का सही मार्ग दिखाने वाला,

आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाला

गुरु ही सच्चा देवस्वरूप है।


आधुनिक युग में

अध्यापक वह सीढ़ी है,

जिसके सहारे विद्यार्थी

अपने जीवन की ऊँचाइयों तक पहुँचता है।


इसीलिए शिक्षकों के प्रति

कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने के लिए

विश्व शिक्षक दिवस मनाया जाता है।


माता-पिता और गुरु—

तीनों ही हमारे जीवन के प्रथम देव हैं।


माता-पिता हमें जन्म देते हैं,

पालन-पोषण करते हैं

और जीवन के संस्कार प्रदान करते हैं।

गुरु हमें ज्ञान, विवेक और

सही दिशा का मार्गदर्शन देते हैं।


कबीरदास जी कहते हैं—


“गुरु और गोविंद दोनों

खड़े हों मेरे सामने,

तो पहले गुरु के चरणों में नमन करूँ;

क्योंकि गुरु ने ही

गोविंद तक पहुँचने का मार्ग दिखाया है।”


हम जीवन में कुछ बनते हैं,

हमारी उन्नति होती है,

हमारे भीतर संस्कार और विवेक जागते हैं—

तो उसके मूल में

माता-पिता, शिक्षा और शिक्षक का अमूल्य योगदान होता है।


इसलिए आज के दिन

अपने माता-पिता और सभी शिक्षकों को

हृदय से स्मरण करते हुए

उनके चरणों में सादर प्रणाम।


माता-पिता का सम्मान—

संस्कारों का सम्मान है।

शिक्षक का सम्मान—

ज्ञान का सम्मान है।

ज्ञान और संस्कारों का सम्मान—

मानवता का सम्मान है।


सादर प्रणाम।

शिक्षक दिवस

 विश्व शिक्षक दिवस 


एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

6-10-26.

मानव में मानवता भरने,

जीविकोपार्जन के लायक बनने 

सत्य असत्य समझाकर

विनम्रता सिखाने 

 अनुशासन सिखाने 

 अच्छी चाल चलन सिखाने,

भरी सभा में अपने विचार निर्भय प्रकट करने,

 एक मार्ग दर्शक 

अज्ञान अंधकार मिटाने वाले,

आत्मज्ञानी गुरु देव

 आधुनिक काल में 

 अध्यापक

‌वे सीढी है

 उनके सम्मान करने

विश्व शिक्षक दिवस 

मनाया जाता है।

माता-पिता गुरु देव हैं।

 कबीर तो कहते हैं 

 ईश्वर और गुरु दोनों एक साथ आएँगे तो

मैं गुरु के चरणों में नमस्कार करूंगा क्योंकि उन्होंने ही

ईश्वर के दर्शन का मार्ग दिखाया।

 हम कुछ बनते हैं 

 हमारी तरक्की हुई हैं तो मूल में है शिक्षा और शिक्षक।

सादर प्रणाम।

Saturday, October 3, 2026

शास्त्री और गाँधीजीज्ञ

 [02/10, 8:16 am] sanantha.50@gmail.com: जय जवान, जय किसान

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु।


लालबहादुर शास्त्री जी—

भारत के इतिहास में

एक सरल, सादगीपूर्ण

और दूरदर्शी नेता।


उनका दिया नारा—

“जय जवान, जय किसान”

केवल दो शब्द नहीं,

राष्ट्र-जीवन के

दो मजबूत स्तंभ हैं।


जवान देश की सीमा पर

जागकर पहरा देता है,

तभी देश का नागरिक

चैन और निश्चिंतता से सोता है।


किसान धरती पर पसीना बहाकर

अन्न उपजाता है,

तभी हर जीव की

प्राकृतिक आवश्यकता—

भोजन—पूरी होती है।


धन आवश्यक है,

पर धन से जीवन नहीं चलता;

अन्न के बिना

जीना ही दुश्वार है।


भारत के इतिहास में

न जाने कितने आक्रमण हुए—

मंगोल, मुगल, पुर्तगाली, डच,

फ्रांसीसी और अंग्रेज़ आए;

पड़ोसी देशों से भी

संघर्ष होते रहे।


ऐसी परिस्थितियों में

देश की सीमाओं की सुरक्षा

और देशवासियों के लिए अन्न—

दोनों समान रूप से प्रधान हैं।


एक देता है सुरक्षा,

दूसरा देता है जीवन।


इसी सत्य को पहचानकर

लालबहादुर शास्त्री जी ने कहा—


**जय जवान!


जय किसान!**


कितनी सरल वाणी,

कितनी गहरी सोच,

कितनी दूरदर्शिता!


धन्य हैं लालबहादुर शास्त्री जी।

धन्य है उनका राष्ट्र-चिंतन।

[02/10, 8:43 am] sanantha.50@gmail.com: धन्य महात्मा गांधी


राष्ट्रपिता महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी जी—

यही है उनका व्यक्तिवाचक नाम।


उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को

जन-जन का आंदोलन बना दिया।

नरम दल के प्रमुख नेताओं में

उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


सत्य और अहिंसा,

सत्याग्रह और उपवास—

यही उनके प्रमुख अस्त्र-शस्त्र थे।


उनकी प्रेरणा से

स्वतंत्रता संग्राम को

एक नई दिशा और

जनसामान्य की व्यापक भागीदारी मिली।


धन्य हैं महात्मा गांधी!


उनकी दूरदर्शिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष

हिंदी के प्रचार और प्रसार से भी जुड़ा था।


भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में

एक ऐसी संपर्क भाषा की आवश्यकता को

उन्होंने अनुभव किया,

जो विभिन्न प्रदेशों के लोगों को

आपस में जोड़ सके।


इसी भावना से

सन् 1918 में मद्रास में

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा

की स्थापना उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से हुई।


दक्षिण भारत में हिंदी सीखने और

हिंदी प्रचार के लिए इस संस्था ने

लंबे समय तक महत्वपूर्ण कार्य किया।


गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों में

हिंदी-प्रचार भी प्रमुख रहा।


उनकी कल्पना में

भाषा केवल भाषा नहीं थी—

वह जन-जन को जोड़ने का माध्यम थी।


एक संपर्क भाषा,

राष्ट्र की एकता की भावना,

और भारत की अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान—

इन सबको साथ लेकर चलना

उनकी दूरदर्शी सोच का हिस्सा था।


आज भी उनके हिंदी संबंधी विचारों पर

विचार करना प्रासंगिक है।


धन्य मोहनदास करमचंद गांधी जी!


धन्य महात्मा गांधी जी!

प्रार्थना

 प्रार्थना।


प्रार्थना ही शेष है


मैं नहीं जानता

प्यार करना और पाना,

पर मैं करता हूँ

प्रार्थना।


मैंने निभाया

अपना कर्तव्य,

पर मन में एक टीस है—

पत्नी की देखभाल में

शायद उतना ध्यान न दे सका,

जितना देना चाहिए था।


न जाने उस समय

मेरी तबीयत भी ठीक नहीं थी,

पर यह दुःख

मेरे अंतर्मन में

शायद अंत तक रहेगा।


अब भी मैं

किनारे पर खड़े

एक वृक्ष की तरह हूँ—

बहुत कुछ देखता हूँ,

बहुत कुछ सोचता हूँ,

पर कर सकता हूँ

बहुत थोड़ा ही।


अब मेरे पास

एक ही सहारा है—


भगवान से प्रार्थना।


हे भगवान!

सबको स्वस्थ रखो,

सबको आनंद से जीने दो।


सबको

उच्च पद दो,

धन दो,

सुख दो,

शांति दो।


जिन्हें मैं प्यार करता हूँ,

उनके जीवन में

कभी अभाव न हो।


मेरी भूलों को

क्षमा करना।


मैंने जो नहीं कर सका,

उसे लेकर

अब पछतावे में नहीं,

तुम्हारी शरण में

जीना चाहता हूँ।


मेरे लिए अब

प्रार्थना ही प्रेम है,

प्रार्थना ही सेवा है,

प्रार्थना ही जीवन है।


भगवान से यही प्रार्थना—

सब सुखी रहें,

सब स्वस्थ रहें,

सब आनंद से रहें।

Friday, October 2, 2026

भीतर ख़ालीपन

 [02/10, 5:53 pm] sanantha.50@gmail.com: भीतर का खालीपन।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु।

3-10-26.

++++++++

भीतर का खालीपन,

 अल्पसंख्यकों का अधिकार।

 आरक्षण नीति।

  मंदिरों में वी.ऐ .पी दर्शन।

 शिक्षा निजी स्कूलों में 

 धन के आधार पर।

 सरकार स्कूल में 

 पानी नहीं, शौचालय नहीं प्रयोगशाला नहीं।

 अच्छी चिकित्सा प्लैनेट  अस्पतालों में।

 सरकारी अस्पतालों में 

 न दवा, न  एम.आर.ऐ.स्केन।

चुनाव में गरीबों का उद्धार।

 गरीबों की बस्ती में पानी नहीं,

सड़क नहीं, गंदे पानी बहने का नारा नहीं,

 कच्ची छोटे मोटे गड्ढे दार  सडकेँ।

पुलिस फुटपाथ  व्यापारियों से डरा धमकाकर रिश्वत।

 बाहर वाग्वीर

 भीतर खालीपन।

 नदी तो देवियां हैं,

 पर गंदगी करना खालीपन भक्ति का।

[02/10, 5:53 pm] sanantha.50@gmail.com: भीतर का खालीपन


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

3-10-2026


भीतर का खालीपन—

बाहर अधिकारों की बातें,

अल्पसंख्यकों के अधिकार,

आरक्षण की नीतियाँ,

समानता के नारे।


मंदिरों में भी

वी.आई.पी. दर्शन—

धनवानों के लिए शीघ्र दर्शन,

साधारण भक्त

लंबी कतार में भगवान की प्रतीक्षा।


निजी विद्यालयों में

धन के आधार पर शिक्षा,

सरकारी विद्यालयों में

कहीं पानी नहीं,

कहीं शौचालय नहीं,

कहीं प्रयोगशाला नहीं।


बड़े अस्पतालों में

अच्छी चिकित्सा की सुविधा,

गरीब के सरकारी अस्पताल में

दवा का अभाव,

जाँच की सुविधा का अभाव—

फिर भी स्वास्थ्य सबका अधिकार!


चुनाव आते ही

गरीबों के उद्धार के वादे,

गरीब बस्तियों में

आज भी पानी की कमी,

पक्की सड़क का अभाव,

गंदे पानी की निकासी नहीं,

गड्ढों से भरी राहें।


फुटपाथ पर

छोटा-सा व्यापार करने वाला गरीब—

कभी डराया जाता है,

कभी धमकाया जाता है,

कभी रिश्वत के बोझ तले दबाया जाता है।


बाहर वाग्वीर—

भीतर खालीपन!


नदियों को

हम देवियाँ कहते हैं,

उन्हें पवित्र मानकर

आरती उतारते हैं;

फिर उन्हीं नदियों में

गंदगी बहाते हैं।


यह कैसी भक्ति?

यह कैसा धर्म?

यह कैसी संस्कृति?


मंदिर में दीप जलाने से पहले

मन में दीप जलाना होगा।

नदी को देवी कहने से पहले

उसकी निर्मलता बचानी होगी।


अधिकार केवल भाषण में नहीं,

शिक्षा केवल धनवानों के लिए नहीं,

चिकित्सा केवल संपन्नों के लिए नहीं,

विकास केवल घोषणाओं में नहीं।


जब तक

बाहर शब्दों की सजावट

और भीतर संवेदना का अभाव है—

तब तक

समाज कितना भी आगे बढ़े,

मनुष्य भीतर से खाली ही रहेगा।


सच्चा विकास वही,

जहाँ बाहर व्यवस्था सुंदर हो

और भीतर इंसानियत जीवित हो।


बाहर नहीं—

पहले भीतर का खालीपन भरें।