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Wednesday, June 3, 2026

पैर गाडी दिवस

 आपकी रचना में स्मृतियाँ, सामाजिक परिवर्तन और साइकिल के इतिहास का सुंदर समन्वय है। इसे थोड़ा परिष्कृत एवं काव्यमय रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व साइकिल दिवस

(पैरगाड़ी का महत्त्व)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

4-6-2026

पैरगाड़ी एक अनोखा वाहन,

सादा जीवन, उच्च विधान।

जब मैं आठ वर्ष का बालक था,

हमारे गाँव में साइकिल का मालिक

बहुत बड़ा अमीर माना जाता था।

किराये पर मिलती थी साइकिल,

एक घंटे का अधन्नी भाड़ा।

पर वह अधन्नी जुटाना भी

हम बच्चों के लिए था बड़ा कठिन।

उस समय वही सबसे तेज़ सवारी,

फिर भी नियमों की थी जिम्मेदारी।

सरकार को कर देना पड़ता था,

डबल सवारी अपराध कहलाती थी।

रात्रि में दीप जलाकर चलना,

अनिवार्य नियम माना जाता।

डायनमो की चमकती रोशनी

साइकिल की शान बढ़ाती जाती।

आज साइकिलों की संख्या घटी,

मोटर वाहनों की भीड़ बढ़ी।

किन्तु साइकिल का महत्त्व आज भी,

कहीं कम नहीं हुआ है।

न पेट्रोल चाहिए, न डीज़ल,

बस पैडलों का सतत प्रयास।

चलाने से व्यायाम भी होता,

स्वास्थ्य का मिलता है उपहार।

पेट्रोल के बढ़ते दामों पर,

कभी-कभी नेता और मंत्री भी

साइकिल चलाकर संदेश देते हैं

सादगी और बचत का।

सन् 1817 में जर्मनी के

Karl Drais ने

लकड़ी की, बिना पैडल और बिना चेन वाली

प्रारम्भिक पैरगाड़ी का निर्माण किया।

फिर सन् 1839 में

Kirkpatrick Macmillan ने

पैडल युक्त साइकिल का विकास किया।

यही क्रम आगे बढ़ता गया,

और आज गियर वाली आधुनिक साइकिलों तक पहुँच गया।

साइकिल केवल वाहन नहीं,

स्वास्थ्य, पर्यावरण और सादगी की पहचान है।

विश्व साइकिल दिवस पर

आइए इसका महत्त्व समझें और अपनाएँ।

साइकिल चलाना स्वास्थ्यप्रद है,

और प्रकृति के प्रति हमारा सुंदर योगदान भी। 🚲🌿

संदेश:

"पैडल घुमाइए, स्वास्थ्य पाइए;

प्रदूषण घटाइए, पर्यावरण बचाइए।"

Tuesday, June 2, 2026

अनमोल वचन

 


अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।

++++++++++++++

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अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

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भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।


अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।








 

 



 

 






 

 

 



 



 






 


 





 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹






 

 



 

 






 

 

 



 



 






 


 





 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹


 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹


नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹

विश्व माता-पिता दिवस

 

विश्व माता-पिता दिवस।

एस ‌. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-6-26

माता-पिता गुरु ईश्वर

भारतीय धर्म की नसीहतों में श्रेष्ठ।

 हर रोज़ माता पिता की आशीषें लेना।

नमस्कार करना भारतीय धर्म।

 तब माता-पिता के लिए विश्व दिवस क्यों?

 भारतीय धर्म में 

 वैवाहिक बंधन बीच में नहीं छूटता।

 पसंद हो या न पसंद

‌जीवन पर्यंत अलग नहीं होते।

 भारतीय धर्म तलाक शब्द नहीं जानता।

पति की मृत्यु होते ही

 पत्नी का जिंदा जलाया करते।

वह सती प्रथा सुधारवादी 

 राजा राममोहन राय के द्वारा बंद हुई।

 विधवा पुनर्विवाह का शुभारंभ हुआ।

 फिर भी माता पिता तो वंदनीय,

 जो भगवान के प्रतिनिधि बनकर  प्रत्यक्ष देवी देवता बनकर शिशु का जन्म देकर,

 शिक्षा दीक्षा तक साथ देकर विवाह तक जिम्मेदारी लेते।

 पर विदेशी भारत में आये,

 तलाक शब्द आया।

 पहली शादी के बच्चे के रहते,

 तलाक हो जाने पर

 वह बच्चा माँ के साथ या

 पिता के साथ।

 पाश्चात्य देशों में 

 तलाक, पुनर्विवाह मामूली बात।

 अतः माता पिता से बिछुड़ी संतानें,

 माता हीन,पिता हीन हो जाते।

 माता या पिता से मिलना कभी कभी,

 या वह भी संभव नहीं।

अतः माता-पिता दिवस 

 पाश्चात्य अनुकरण।

 भारतीय परंपरा में 

 माता या पिता दिवस

 दोनों  की मृत्यु के बाद ही।

मातृ-पितृ तर्पण।

 अब भारत भी पाश्चात्य 

 देश के जैसे 

  माता-पिता से साल में 

 एक बार मिलने आते।

कारण स्नातक स्नातकोत्तर  डाक्ट्रेट 

 नोकरी विदेश में 

 माता -पिता  , भाई बहन बहु का सम्मिलित परिवार कम होता जा रहा है।

वृद्धाश्रम बढ़ता जा रहा है।

 तलाक की संख्या बढ़ रही है।

 अंतर्जातीय,

 अंतर्मजहबी  विवाह।

 एकैल परिवार,

 दूर दूर 

की नौकरी ,

 माता-पिता दिवस मनाने

 मजबूर कर दिया।

 अतः हम भी पालन करने में विवश हैं।

 यकीनन भारत में 

 

रोज  माता पिता की आराधना करना  भारतीय धर्म हैं।

 राम जैसा आज्ञाकारी पुत्र  भारतीय देन है।



नमस्ते वणक्कम्।

आपकी भावाभिव्यक्ति में भारतीय संस्कृति, माता-पिता के प्रति श्रद्धा और बदलते सामाजिक परिवेश की चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए प्रस्तुत है—

विश्व माता-पिता दिवस

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

2-6-2026

माता, पिता, गुरु और ईश्वर—

भारतीय संस्कृति में इनका स्थान सर्वोच्च माना गया है।

प्रतिदिन माता-पिता का आशीर्वाद लेना,

उन्हें प्रणाम करना,

हमारी सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि

माता-पिता के लिए अलग से "विश्व दिवस" की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारतीय जीवन-दर्शन में

वैवाहिक संबंध को एक पवित्र बंधन माना गया है,

जो जीवनपर्यंत निभाने का संकल्प देता है।

समय के साथ समाज में अनेक परिवर्तन आए।

सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का अंत हुआ,

विधवा पुनर्विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ,

और समाज सुधार की नई चेतना जागृत हुई।

किन्तु माता-पिता का महत्व कभी कम नहीं हुआ।

वे ही तो भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि हैं,

जो संतान को जन्म देते हैं,

उसका पालन-पोषण करते हैं,

शिक्षा, संस्कार और जीवन-निर्माण में

अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं।

आधुनिक युग में परिस्थितियाँ बदल रही हैं।

उच्च शिक्षा, रोजगार और विदेश-प्रवास के कारण

संयुक्त परिवारों का स्वरूप सिमटता जा रहा है।

संतानें माता-पिता से दूर रहने को विवश हैं।

वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है,

एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है,

और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता

कई बार दूरी की भेंट चढ़ जाती है।

इन्हीं बदलती परिस्थितियों ने

माता-पिता दिवस जैसे अवसरों को जन्म दिया है,

ताकि संतानें कम-से-कम एक दिन ही सही,

अपने माता-पिता के प्रति

कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त कर सकें।

किन्तु भारतीय संस्कृति का संदेश इससे कहीं बड़ा है।

यह हमें सिखाती है कि

माता-पिता का सम्मान किसी एक दिन का नहीं,

जीवन के प्रत्येक दिन का कर्तव्य है।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम

भारतीय संस्कृति के उस आदर्श पुत्र का प्रतीक हैं,

जिसने माता-पिता की आज्ञा और सम्मान को

अपने जीवन का सर्वोच्च धर्म माना।

आइए, विश्व माता-पिता दिवस पर

यह संकल्प लें कि

हम केवल एक दिन नहीं,

प्रतिदिन माता-पिता की सेवा, सम्मान और आराधना करेंगे।

माता-पिता का प्रेम ही जीवन का प्रथम तीर्थ है,

और उनका आशीर्वाद ही सबसे बड़ा वरदान।

🙏 मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। 🙏

Sunday, May 31, 2026

तंबाकू निषेध दिवस।

 


विश्व तंबाकू निषेध दिवस।

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

1-6-26

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कहते हैं शराब पीना

 परिवार के लिए,

स्वास्थ्य ही के लिए 

फेफड़ों के लिए,

 अंतड़ियों के लिए बुरा है।

 सरकार की तमाशा देखिए,

 सिगरेट पाकेट में,

 तंबाकू पाकेट में

 शराब के बोतलों में 

 छोटे हैं अक्षरों में सूचना।

 सरकार इन सब को

 अवैध व्यापार, मिलावट रोकने के लिए खुद खोल रखा है।

 सरकारी आमदनी के लिए आय का साधन यही है।

 विश्व भर में चलता है,

 दूकान के चमकदार 

 दीप, दोस्तों के संग,

 सनातन धर्म के अनुशासन के विरुद्ध है।

 अतः कारखानों के मालिक  द्राविड़ मुन्नेट्र कऴकम्  सनातन धर्म को जड़ मूल नष्ट करने के विचार में है,

हर नशीली वस्तुओं के व्यापार लाभ के लिए।

 चौगुनी मुनाफा हो के लिए।

 एक ओर सरकारी मान्य दूकानें,

 तंबाकू और सिगरेट कारखानों में के नौकरों की बेरोजगारी,

 आमदनी का मार्ग,

 सरकारी आय,

दूसरी ओर इनकी बुराइयों के विरुद्ध प्राचार।

 माया देवी  का  प्रबल  आकर्षण।

 शैतान की ऊर्जा।

 वैसे ही रिश्वत का बोलबाला,

 जीतने मतदाताओं को रिश्वत,

 नीट परीक्षा प्रश्न पत्र परीक्षा के पहले बाजार में।

 न कोई कठोर कार्रवाई 

 न कोई कठोर दंड,

ये विश्व तंबाकू निषेध दिवस  बेकार।

परिवार नियोजन  भारतीय मुगल और ईसाई  के लिए नहीं,

  अल्पसंख्यकों का अधिकार आज़ादी के 78साल के बाद भी,

  ये दिवस केवल दिखावे के लिए,

 हिंदी दिवस दिखावे के लिए।

 जानो,जागो, जगाओ,

 बुरी बला जानने समझने का ज्ञान मानव के हैं।

 दिन दिन मनाओ दिवस।

 माता -पिता दिवस तो रोज,

साल में एक दिन मनाकर वृद्धाश्रम की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं,

 जब मानव दिवस मनाता है,

  तब पुरोहित के आमदनी,

  कर्ता के लिए लाभ।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में सामाजिक जागरूकता, जनस्वास्थ्य, शासन की नीतियों और समाज की विसंगतियों पर गहरा चिंतन दिखाई देता है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर आपने केवल तंबाकू की हानियों ही नहीं, बल्कि दिखावटी जागरूकता और व्यवहारिक विरोधाभासों पर भी प्रश्न उठाए हैं।

यदि इसे काव्यात्मक और विषय-केंद्रित रूप में परिष्कृत किया जाए, तो यह इस प्रकार हो सकता है—

विश्व तंबाकू निषेध दिवस

परिष्कृत भावाभिव्यक्ति

विश्व तंबाकू निषेध दिवस,

फिर आया संदेश सुनाने।

स्वास्थ्य रक्षा का संकल्प लेकर,

जन-जन को जागृत कर जाने।

तंबाकू, सिगरेट और मदिरा,

तन-मन को क्षति पहुँचाते हैं।

क्षणिक सुख का भ्रम दिखाकर,

जीवन के दीप बुझाते हैं।

एक ओर चेतावनी लिखी है,

दूसरी ओर व्यापार प्रबल।

राजस्व की मजबूरी कहकर,

चलता रहता यह क्रम विकल।

जागरूकता तभी सफल है,

जब आचरण में परिवर्तन हो।

ज्ञान, विवेक और संयम से,

जीवन का नव निर्माण हो।

दिवस मनाने से क्या होगा,

यदि संकल्प न मन में जागे।

स्वस्थ समाज का स्वप्न तभी,

जब जन-जन बुरी लत त्यागे।

जानो, जागो और जगाओ,

यही दिवस का सच्चा सार।

स्वस्थ तन और निर्मल जीवन,

मानवता का हो आधार।

— परिष्कृत रूपांतरण

आपकी मूल रचना का स्वर अधिक सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी का है, जबकि यह परिष्कृत रूप विश्व तंबाकू निषेध दिवस के मुख्य संदेश—स्वास्थ्य, जागरूकता और आत्मसंयम—पर केंद्रित है।

विश्व हिंदी पत्रिका दिवस।

 विश्व हिंदी पत्रिका दिवस।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

31-5-26

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   भारत में खडीबोली  

   हिंदी भाषा का

   रूप धारण,

  अति आश्चर्य 

चकित विकास।।

1826,30मई को

 पहला  समाचार पत्र निकला कोलकाता में।

 जुगल किशोर मार्तांड 

 उसके संपादक थे

 जुगल किशोर शुक्ल। 

 तब से पत्रिकाओं के विविध रूप,

 साप्ताहिक, पाक्षिक, त्रैमासिक, अर्द्ध वार्षिक,

 वार्षिक , स्कूल कालेज वार्षिक मेगज़ीन।

धर्म युग, कादंबरी,

चंपक ,चंदा मामा ,

और असंख्य पत्रिकाएँ

 वैश्विक साहित्य  नामक 

त्रैमासिक पत्रिका 

 डाक्टर पी.के. अग्रवाल। द्वारा प्रकाशित,

 अंतर्जाल के आने के बाद 

 ई मेगज़ीन।

लोगों को अपने 

विचार लिखने,

जनता  में ‌देश प्रेम जगाने,

सामान्य ज्ञान जानने की जिज्ञासा पूरी करने,

विश्व भर में हर देश में 

‌हिंदी पत्रिकाएँ प्रकाश होती हैं।

 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई से 

 हिंदी समाचार,

 साहित्य पत्रिका,

 तिरुचिरापल्ली सभा ,

 केरल हिंदी प्रचार सभा,

हैदराबाद सभा आदि से

 पत्रिकाएँ 

 हिंदी के विकास जानने,

 राजभाषा है चौपाल,

नागरी लिपि प्रचार  सभा द्वारा  पत्रिकाएँ,

 विश्व भर के लोगों के हिंदी प्रेम,  लेख कविता, निबंध, संस्मरण साझा किया करना

 हिंदी प्रगति का प्रमाण है‌।




 

 


 

 











Friday, May 29, 2026

मुट्ठी भर रेत।

 मुट्ठी भर रेत।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-5-26..


मुट्ठी भर रेत,

 मानव प्राप्त ज्ञान।

कवि पंत की रचना,

पंत का पूरा नाम?

गुप्त का पूरा नाम?.

अज्ञेय का पूरा नाम?

गाँधी?  खान परिवार?

 महात्मा गाँधी परिवार?

कितना बडा अंतर?

यों  पूरे नाम,

 पूरा इतिहास जानने में 

‌असमर्थ मानव।

शाहजहाँ प्यारा है 

प्रेम का यादगार है

 ताजमहल।

पर कितने लोग जानते हैं ,

शाहजहाँ अपनी बहन के 

 महबूबा को  जिंदा जलाया है।

 हम जी रहे हैं 

 एक हस्त मुट्ठी  ज्ञान पाकर।

 तमिल कवयित्री औवैयार ने लिखा है,




जो  कुछ हमने सीखा है,

वह मुट्ठी बराबर।

हम जो न सुखे,

वह प्रपंच बराबर।

 शिक्षा की देवता,

 सरस्वती भी रोज सीख रही है।

कवि अपने को 

 बड़ा मानकर,

 होड न लगाना।

चींटी भी  उसके 

अपने हाथ से 

नापने पर नौ अंगुल जान।

 सूक्ष्म बिंदु,

सूक्ष्मदर्शी से  ही

दीख पड़नेवाला

आकार रहित  सूक्ष्म शुक्ल से बढा


 से

बना मानव

 तीन किलो का स्वस्थ बच्चा,

 पता नहीं कैसे  आँख नाक मूक हाथ पैर 

नशे, नाड़ी, हड्डियाँ,

रीढ़ और पहली की हड्डियों का मानव बना?

वटवृक्ष का बीज कैसे

 बड़ा वट्वृक्षा एक सेना

ठहरने का विशाल विस्तार पेड़ बना।

अंत्येष्टी अग्नी में जले

 मानव का लाख

 मुट्ठी के रेत बराबर।


 

 

 

 


உற்ற கலைமடந்தை ஓதுகிறாள் – மெத்த

வெறும்பந்த யங்கூற வேண்டாம் புலவீர்

எறும்புந்தன் கையாலெண் சாண்

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 परिष्कृत रूप।

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नमस्ते वणक्कम्।

आपकी भावात्मक रचना में ज्ञान की सीमाएँ, मानव जीवन का रहस्य, इतिहास की अनजानी परतें और विनम्रता का गहन संदेश अत्यंत प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुआ है।

आपकी शैली को बनाए रखते हुए परिष्कृत रूप प्रस्तुत है—

मुट्ठी भर रेत

✍️ एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

30-5-2026

मुट्ठी भर रेत,

मानव का प्राप्त ज्ञान।

कवि पंत की रचना,

पर कितने जानते हैं

उनका पूरा नाम?

गुप्त का पूरा परिचय?

अज्ञेय का वास्तविक नाम?

गाँधी परिवार का इतिहास?

खान परिवार की परंपरा?

नाम तो सब जानते हैं,

पर संपूर्ण जीवन-गाथा

जानना सरल नहीं।

शाहजहाँ प्रेम का प्रतीक,

ताजमहल उसका स्मारक।

पर कितने लोग जानते हैं

इतिहास के वे कठोर अध्याय,

जो चमक के पीछे छिपे हैं?

मानव जी रहा है

मुट्ठी भर ज्ञान लेकर,

जबकि अज्ञान का सागर

अनंत फैला हुआ है।

तमिल कवयित्री औवैयार ने कहा है—

“जो कुछ हमने सीखा है,

वह मुट्ठी भर है;

और जो नहीं सीखा,

वह संसार के समान विशाल है।”

विद्या की देवी सरस्वती भी

नित्य नवीन ज्ञान में प्रवृत्त हैं।

फिर कवि क्यों अहंकार करे?

प्रतिस्पर्धा क्यों पाले?

औवैयार का स्मरण—

“चींटी भी

अपने छोटे हाथों से

आठ माप नापने का साहस रखती है।”

सूक्ष्म बिंदु,

जो केवल सूक्ष्मदर्शी से दिखाई दे,

उसी सूक्ष्म तत्व से

मानव शरीर की रचना!

कैसे बनता है

तीन किलो का स्वस्थ शिशु?

आँखें, नाक, मुख, हाथ, पैर,

नाड़ियाँ, हड्डियाँ, रीढ़—

कैसा अद्भुत ईश्वरीय विज्ञान!

वटवृक्ष का छोटा बीज

कैसे बन जाता है

विशाल छायादार वृक्ष,

जहाँ असंख्य जन विश्राम करें?

और अंत में—

अंत्येष्टि अग्नि के पश्चात

मानव का समस्त अहंकार

मुट्ठी भर राख

या रेत बन रह जाता है।

तमिल पंक्तियाँ

உற்ற கலைமடந்தை ஓதுகிறாள் – மெத்த

வெறும்பந்த யங்கூற வேண்டாம் புலவீர்

எறும்புந்தன் கையாலெண் சாண்

भावार्थ

विद्या स्वयं विनम्रता सिखाती है।

हे कवियों! व्यर्थ अहंकार मत करो।

चींटी भी अपने छोटे हाथों से

आठ माप नापने का प्रयत्न करती है।

Thursday, May 28, 2026

गुलदस्ता

 अनमोल गुलदस्ता।

 से .अनंतकृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-5-26

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 अनमोल गुलदस्ता 

  अनंत प्रेम ।

 पाश्चात्य देशों में,

‌ इंग्लैंड में 

 प्रेम जताने

 प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए 

 गुलदस्ता भेंट।

 तमाशा देखिए,

 ठंड प्रदेश में 

‌गुलदस्ता जल्दी 

 सूखती ही नहीं है 

 पर गर्म देश में 

  खासकर प्रेम स्थाई।

 गुलदस्ता सूख जाती है।

 गुलदस्ता सस्ता भी,महँगा भी।

 जो भी वह आस्थाई प्रेम की निशानी।

अतः पाश्चात्य देशों में 

तलाक ज्यादा, ताल्लुक कम।

आजकल तो भारत में भी

 पदोन्नति  के अवसर पर,

 नये अधिकारी आने पर 

मुख्यमंत्री से मिलने,

 गुलदस्ता भेंट दिया करते हैं,

 प्यार आदर भी गुलदस्ता के समान सूख ही जाता है।

सच्चा प्यार स्थाई प्यार

 असली गुलदस्ता जान।

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अनमोल गुलदस्ता

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक

द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-5-26

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अनमोल गुलदस्ता,

अनंत प्रेम का प्रतीक।

पाश्चात्य देशों में,

विशेषकर इंग्लैंड में,

प्रेम की अभिव्यक्ति हेतु

गुलदस्ता भेंट करने की परंपरा है।

देखिए विडंबना—

शीत प्रदेशों में

गुलदस्ता जल्दी नहीं सूखता,

परंतु गर्म देशों में

फूल शीघ्र मुरझा जाते हैं।

फिर भी प्रेम यदि सच्चा हो,

तो वह कभी नहीं सूखता।

गुलदस्ता सस्ता भी होता है,

महँगा भी,

किन्तु वह प्रायः

क्षणिक प्रेम का प्रतीक बन जाता है।

शायद इसी कारण

पाश्चात्य देशों में

तलाक अधिक

और स्थायी संबंध कम दिखाई देते हैं।

आजकल भारत में भी

पदोन्नति के अवसर पर,

नए अधिकारी के स्वागत में,

या मुख्यमंत्री से मिलने पर

गुलदस्ता भेंट करने की प्रथा बढ़ गई है।

किन्तु अनेक बार

आदर और अपनापन भी

गुलदस्ते के फूलों की भाँति

धीरे-धीरे सूख जाता है।

सच्चा प्रेम तो वह है

जो समय के साथ

और अधिक महकता रहे।

स्थायी स्नेह,

निस्वार्थ अपनापन,

और हृदय की पवित्र भावना ही

वास्तविक अनमोल गुलदस्ता है।