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Sunday, November 1, 2026

समय

 

आज की चुनौती : समय का मुसाफिर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
2-11-2026

समय तो निरंतर चलता रहता है।

जो समय की परवाह नहीं करता,
समय भी उसकी परवाह नहीं करता।

कबीर ने कहा है—

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

समय बीत जाने के बाद
पछताने से क्या लाभ?
तब तो भगवान भी
बीते हुए समय को लौटा नहीं सकता।

समय की गति निराली है।

बैठे-बैठे भविष्य की कल्पना करें,
तो कल्पनाओं में भविष्य
तेजी से सामने आ जाता है।

भूतकाल की स्मृतियों में जाएँ,
तो बीते हुए वर्षों की यात्रा
पलभर में पूरी हो जाती है।

हम सभी समय के मुसाफिर हैं।

शैशव की यात्रा,
बचपन की यात्रा,
युवावस्था की यात्रा,
प्रौढ़ावस्था की यात्रा
और अंत में वृद्धावस्था की यात्रा।

जीवन की यह यात्रा
समय के साथ निरंतर चलती रहती है।

अतः हम समय के मुसाफिर हैं।

समय अनमोल है।
इसका सदुपयोग करें।
बीते समय पर पछताने के बजाय
वर्तमान को सार्थक बनाएँ।

यही जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है।

मन मान और

 मन, मान और धन


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु


मन में उच्च विचार हों,

सोच ऊँची हो,

तो सभी उसका सम्मान करते हैं।


परंतु वास्तविकता यह भी है कि

धनियों के दरबार में

मान मिले या न मिले,

धन का अपना प्रभाव रहता है।


फिर भी उच्च विचार,

अथक परिश्रम,

समाज-कल्याण की भावना,

निष्काम एवं निस्वार्थ सेवा

मनुष्य को महान बनाती है।


लालबहादुर शास्त्री जी

अपने निरंतर परिश्रम,

सादगी और देशसेवा के बल पर

प्रधानमंत्री बने।


देश ही उनके लिए सर्वस्व था।


स्वच्छ भारत की घोषणा के साथ

चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी जी

भी देश के प्रधानमंत्री बने।


इससे एक संदेश मिलता है—

मनुष्य की पहचान

उसके धन से नहीं,

उसके कर्म और विचारों से होती है।


मन प्रधान है, धन नहीं।


मन में उच्च विचार रखो,

निष्काम एवं निस्वार्थ सेवा करो।

धन को ही सर्वस्व मत समझो।


मन की आवाज सुनो,

सत्य के पथ पर चलते रहो।

भले ही अकेले चलना पड़े,

ईश्वर के प्रतिनिधियों के माध्यम से

एक दिन तुम्हें सम्मान अवश्य मिलेगा।


औवैयार की कविता और धन का प्रभाव


तमिल की प्रसिद्ध कवयित्री औवैयार ने

धनी कवियों को मिलने वाले सम्मान

और उनकी कविताओं की प्रशंसा के विषय में

एक व्यंग्यपूर्ण कविता कही है।


விரகர் இருவர் புகழ்ந்திட வேண்டும்


प्रशंसा करने वाले दो चतुर खुशामदी लोग चाहिए।


விரல்நிறைய மோதிரங்கள் வேண்டும்


उँगलियों में अनेक बहुमूल्य अंगूठियाँ होनी चाहिए।


அரையதனில் பஞ்சேனும் பட்டேனும் வேண்டும்


कमर पर मुलायम सूती या रेशमी वस्त्र होना चाहिए।


அவர்வித்தை நஞ்சேனும் வேம்பேனும் நன்று


उनकी विद्या अथवा कविता भले ही विष के समान हो या नीम की तरह कड़वी, फिर भी उसे अच्छी ही कहा जाएगा!


कितना तीखा व्यंग्य है!


एक कवि समाज को बिगाड़ने वाली,

विषैली और बुरी कविता भी लिखे,

फिर भी उसे सम्मान मिल सकता है।


क्यों?


क्योंकि उसके चारों ओर

खुशामद करने वाले लोग हैं।

हर कविता के बाद

'वाह! वाह!' कहने वाले लोग हैं।


उँगलियों में रत्नजड़ित अंगूठियाँ पहनने वाले

धनी कवि की कविता अच्छी हो या बुरी,

मधुर हो या कड़वी,

उसकी प्रशंसा करने वाले

हमेशा मिल ही जाएँगे।


औवैयार ने धनी कवियों को मिलने वाले

ऐसे सम्मान पर व्यंग्य करते हुए

कवि कंबन के सामने

राजदरबार में यह कविता सुनाई थी।


साहित्य और अमरत्व


आजकल काम-वासना से भरे

चलचित्रों के गीत

मौसमी हवा की तरह आते-जाते रहते हैं।


लेकिन सच्चे साहित्यकारों की

अमर कृतियाँ,

उनके उच्च विचार और जीवन-दर्शन

युगों-युगों तक स्मरणीय

और अनुकरणीय बने रहते हैं।


धन से प्रशंसा खरीदी जा सकती है,

लेकिन सच्चा सम्मान

उच्च विचारों और श्रेष्ठ कर्मों से ही मिलता है।


मन को ऊँचा रखो,

मान अपने आप मिलेगा।

धन को प्रधान मत समझो,

मानवता को प्रधान समझो।


---


एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक


स्वरचित भावाभिव्यक्ति — अपने विचार, अपनी हिंदी, अपनी शैली।

Saturday, October 31, 2026

संकल्प

 

संकल्प और ऊँचाइयाँ

हर मानव को चाहिए
एक दृढ़ संकल्प!

ज्ञानवृद्धि का संकल्प,
उच्च शिक्षा पाने का संकल्प,
उच्चतम पद प्राप्त करने का संकल्प।

सुशील एवं सुसंस्कृत परिवार के
पुत्र या पुत्री से
विवाह करने का संकल्प।

सुपुत्र-सुपुत्री के
लालन-पालन,
शिक्षा-दीक्षा और
चरित्र-निर्माण का संकल्प।

समाज और देश की सेवा का संकल्प,
बड़े-बड़े अनुसंधान करने का संकल्प,
समाज-कल्याण का संकल्प।

जलाशयों, नदियों, नालों और समुद्रों को,
सड़कों एवं सार्वजनिक स्थलों को
स्वच्छ रखने का संकल्प।

प्रदूषणमुक्त धरती,
स्वच्छ पर्यावरण बनाने का संकल्प।

दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों में
नई खोज करने का संकल्प।

संकल्प के बिना किए गए कार्यों में
लक्ष्य से भटकने का,
पीछे हटने का
अवसर अवश्य रहेगा।

ऊँचाइयों पर चढ़ना है तो
संकल्प ही साथ देगा।

हर कार्य को उसकी मंज़िल तक पहुँचाने की
मन में ठान लेना,
अपने लक्ष्य पर दृढ़ रहना,
सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने का
सार्थक मार्ग है।

संकल्प मनसा, वाचा, कर्मणा लेना चाहिए।

कर्तव्य-पालन,
वचन-पालन,
सत्य का पालन,
ईमानदारी से जीवन-यापन,
और अपने कदम निरंतर
आगे बढ़ाते रहना—

यह सब
दृढ़ संकल्प से ही संभव है!

संकल्प और ऊँचाइयाँ

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

1-11-26.


 हर मानव को चाहिए 

 संकल्प ।

 ज्ञानवृद्धि का संकल्प।

 उच्चतम शिक्षा पाने का संकल्प।

 उच्चतम पद पाने का संकल्प। 

 भद्र कुल के माता-पिता के

 पुत्र /पुत्री  से शादी कर लेने का संकल्प।

 सुपुत्र सुपुत्री के 

लालन पालन

 शिक्षा दीक्षा,

 चरित्र गठन का संकल्प।

 समाज,देश की सेवा करने का संकल्प।

 बड़े बड़े अनुसंधान करने का संकल्प।

 समाज कल्याण का संकल्प।

 जलाशय, नदी नाले 

समुद्र , 

सड़क आदि को 

साफ़ साफ़ रखने का संकल्प।

प्रदूषण रहित धर्ती 

 स्वच्छ रखने का संकल्प।

 दुर्गम पहाड, जंगल आदि की खोज का संकल्प।

संकल्प रहित 

 कार्य में उपलक्ष्य का,

 लक्ष्य से पीछे हटने का

अवसर अवश्य होगा।

 ऊँचाई पर चढ़ना है तो

 संकल्प साथ देगा ही।

 हर कार्य के मंजिल तक पहुँचने

 कसम  खाना,

 अपने लक्ष्य पर 

दृढ़‌ रहने बनने  में 

 सार्थक होने की सीढ़ी है।

संकल्प मनसा वाचा कर्मणा लेना चाहिए।

 कर्तव्य पालन,

 वचन पालन, 

सत्यपालन,

 ईमानदारी,

 अपने कदम 

आगे ही रखना,

 संकल्प से ही है संभव।


Friday, October 30, 2026

सरदार पटेल

 

सरदार वल्लभभाई पटेल : अखंड भारत के शिल्पकार

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
31-10-2026

++++++++++++

सरदार वल्लभभाई पटेल स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं प्रथम गृहमंत्री थे।

विभाजन के बाद अनेक रियासतों में बँटे भारत को एकजुट करके सशक्त एवं अखंड भारत के निर्माण में उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। हैदराबाद के निजाम की रियासत को भी भारतीय संघ में सम्मिलित कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

उनके दृढ़ संकल्प, साहस और निर्णय लेने की क्षमता के कारण ही उन्हें 'लौह पुरुष' कहा जाता है।

भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। खेड़ा सत्याग्रह, बारडोली सत्याग्रह, नमक सत्याग्रह तथा भारत छोड़ो आंदोलन जैसे आंदोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें अनेक बार कारावास जाना पड़ा और वर्षों तक जेल में रहना पड़ा।

उस महान नेता की देशभक्ति, त्याग और राष्ट्रसेवा अतुलनीय थी।

स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री एवं उपप्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश की एकता, अखंडता और प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महान योगदान दिया।

उनके नाम से प्रचलित निम्नलिखित प्रेरणादायक विचार आज भी हमारे लिए अनुकरणीय एवं स्मरणीय हैं। उनके विचारों को अपने जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

उनके प्रेरणादायक विचार

  1. काम ही पूजा है।
    कर्मशीलता और स्वावलंबन का मंत्र।

  2. शक्ति के अभाव में विश्वास किसी काम का नहीं है।
    आत्मबल, साहस और राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता का संदेश।

  3. आज से हमें ऊँच-नीच और जाति-पंथ का भेद समाप्त करना होगा।
    सामाजिक समरसता और समानता का संदेश।

  4. अनुशासन और विनम्रता के बिना स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है।
    स्वतंत्रता के साथ कर्तव्य और मर्यादा का बोध।

  5. जुर्म करो मत, जुर्म सहो मत। जीना है तो मरना सीखो।
    अन्याय के विरुद्ध साहसपूर्वक खड़े होने की प्रेरणा।

हमारी सच्ची श्रद्धांजलि

महापुरुषों की जयंती मनाना ही पर्याप्त नहीं है। उनके आदर्शों, विचारों और जीवन मूल्यों को अपने आचरण में अपनाना आवश्यक है।

राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, अनुशासन, साहस और निस्वार्थ देशसेवा के मार्ग पर चलना ही सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

जय हिंद!
वंदे मातरम्!

Wednesday, October 28, 2026

संयम

  संयम का मीठा फल।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

29-10-26.

संयम मानव को चाहिए 

 न तो परिणाम होगी 

 बेइज्जती।

   पंचेंद्रिय काबू में न होता तो

 क्या होता ।

 मन अपने वश में 

 न होता तो  

मनमाना करें तो

 मान मर्यादा नष्ट हो जाता।

 इंद्र को हुआ,

 अपमान अहिल्या के कारण।

 हजारों मोनी का शाप मिला।। 

 आँखें  लड़की को देखकर मारा,तो

 उसका जूता मारा सिर पर।

 जिह्वा बावरी अपने वश में न रहकर,

 बकता तो  पागल का नाम मिलता।।  

संत तिरुवल्लुवर ने कहा --

ऒरुमैयुळ्

आमैपोल ऐंतडक्कल आट्ऱिन ऍऴुमैयुम एमाप्पुडैत्तु।(तमिऴ)

कछुए जैसै  विपत्ति के समय अपने पैर,अपने पंचेंद्रिय कान,आँखेँ, नाक,मुख, शरीर को अपने कवच में छिपा लेता है,  वैसे मानवभी अपने पंचेंद्रियों को बुरे मार्ग पर चलने न देकर काबू में रख लेना चाहिए। 

इस जन्म में मनुष्य

 संयम के साथ रहेगा तो

 अपने आनेवाले सात जन्मों में सुखी रहेगा।

संयम के कारण 

ऋषि-मुनियों को

 आत्मज्ञान मिलता है।

तुलसीदास संयम बना,

 पत्नी के मोह छोड़ा तो

 हिंदी साहित्य का शशी बना।

कबीर ने कहा 

 कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥

   अर्थात 

हाथी धीरज धरकर अपने स्थान से न हटकर रहने से  पेट भर खाया है।

 कुत्ता टूटे रोटी के टुकड़े के लिए घर घर फिरता है।

 धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय।

 माली सींचै सौ घडा,

ऋतु आए फल होय।

  संयम और सब्रता का फल  मीठा ही होता है।

 संयम का मीठा फल


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

29-10-2026


संयम मानव को चाहिए,

अन्यथा परिणाम होगा

अपमान और बेइज्जती!


पंचेंद्रियों पर नियंत्रण

यदि न होता,

तो मानव का जीवन

कैसा होता?


मन अपने वश में

यदि न होता,

मनमानी करने से

मान-मर्यादा का नाश होता।


इंद्र को भी अहंकार और वासना के कारण

अपमान का सामना करना पड़ा।

अहिल्या प्रसंग से जुड़ी कथा

हमें यही सीख देती है

कि अनियंत्रित इच्छाएँ

पतन का कारण बनती हैं।


आँखें यदि मर्यादा भूल जाएँ,

पराई स्त्री को बुरी दृष्टि से देखें,

तो सम्मान के बदले

अपमान ही मिलता है।


जिह्वा यदि अपने वश में न रहे,

बिना सोचे-समझे कुछ भी बकती रहे,

तो व्यक्ति विवेकहीन कहलाता है

और उपहास का पात्र बन जाता है।


संत तिरुवल्लुवर का अमूल्य संदेश


संत तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा है—

ऒरुमैयुळ्

आमैपोल ऐंतडक्कल आट्ऱिन ऍऴुमैयुम एमाप्पुडैत्तु।

“ஒருமையுள் ஆமைபோல் ஐந்தடக்கல் ஆற்றின்

எழுமையும் ஏமாப்புடைத்து.”


हिंदी भावार्थ:


कछुआ जिस प्रकार संकट के समय

अपने अंगों को कवच के भीतर समेट लेता है,

उसी प्रकार मनुष्य यदि अपनी पाँचों इंद्रियों

पर नियंत्रण रखना सीख ले,

तो उसका संयम

सात जन्मों तक उसके लिए

सुरक्षा और कल्याण का आधार बनता है।


इस जन्म में जो मनुष्य

संयम का मार्ग अपनाता है,

वह अपने भावी जीवन को भी

सुखमय बनाने की नींव रखता है।


संयम के कारण ही

ऋषि-मुनियों ने तपस्या की,

मन को वश में किया

और आत्मज्ञान प्राप्त किया।


तुलसीदास का जीवन-परिवर्तन


तुलसीदास पत्नी के मोह में

अत्यधिक आसक्त थे।

पत्नी के उपदेश ने

उनके जीवन की दिशा बदल दी।


सांसारिक मोह से विरक्त होकर

उन्होंने भक्ति का मार्ग अपनाया

और रामचरितमानस की रचना करके

हिंदी साहित्य के आकाश में

चंद्रमा की भाँति चमक उठे।


कबीर का धैर्य-संदेश


संत कबीर कहते हैं—


“कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥”


भावार्थ:


हाथी धैर्यपूर्वक अपने स्थान पर रहकर

अपना पेट भरने योग्य भोजन पाता है,

जबकि कुत्ता रोटी के एक टुकड़े के लिए

घर-घर भटकता फिरता है।


यह दोहा हमें धैर्य, संतोष

और आत्मसम्मान का महत्त्व समझाता है।


कबीर का एक और प्रसिद्ध दोहा है—


“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥”


भावार्थ:


हे मन! धैर्य रख।

हर काम अपने उचित समय पर होता है।

माली चाहे सौ घड़े पानी सींच दे,

फिर भी फल ऋतु आने पर ही लगता है।


निष्कर्ष


संयम हमें मर्यादा सिखाता है,

धैर्य हमें प्रतीक्षा करना सिखाता है,

और विवेक हमें सही मार्ग दिखाता है।


इंद्रियों पर नियंत्रण हो,

वाणी में मधुरता हो,

मन में धैर्य हो

और आचरण में मर्यादा हो,

तो जीवन सुंदर बन जाता है।


संयम और धैर्य का फल

सदैव मीठा होता है।


आज कष्ट सहकर भी

जो मर्यादा का मार्ग अपनाता है,

वही कल सम्मान, शांति

और संतोष का फल पाता है।

Tuesday, October 27, 2026

माँ

 [28/10, 1:48 am] sanantha.50@gmail.com: एक अक्षर मा़ँ के नाम पर 

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

281026

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 माँ ममता  का प्रतिबिम्ब।

 माँ -पिता  के प्रेम मिलन का परिणाम ।

 जगत में मानव जन्म।

माँ के गर्भ में ही शिशु का आकार।

 जन्म लेते ही प्रथम चुंबन माँ का।

 प्रथम शब्द माँ के 

मुख ध्वनि।

 अतः भाषा बनी मातृभाषा।

 माँ के स्तन पान 

 प्रथम आहार।

 माँ के गोद प्रथम पलना।

माँ के साथ पकड़कर 

 प्रथम चलना।

 माँ ममतामयी।

निस्वार्थ प्रेम दिखानेवाली।

त्याग की जीवित मूर्ति।

खुद भूखी, 

खिलाती खाना।

 नहलाती

 वस्त्र पहनाती।

पल पल के विकास में 

 ध्यान रखती।

 विविध कष्ट सहकर,

 संतानों को सुखी रखने में तत्पर।

 पन्ना जैसे देश की रक्षा के लिए,

अपने पुत्र की हत्या सहनेवाली।

 कुंती जैसे निर्दयी माँ।

माँ अमूल्य सिक्का।

 अक्षर अमर अक्षय है माँ का प्यार।।

[28/10, 2:00 am] sanantha.50@gmail.com: एक अक्षर माँ के नाम पर


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

28-10-2026


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माँ की ममता का प्रतिबिंब,

माँ-पिता के प्रेम-मिलन का परिणाम,

इस जगत में मानव का जन्म।


माँ के गर्भ में ही

शिशु का आकार बनता है।

जन्म लेते ही

माँ का प्रथम चुंबन मिलता है।


माँ के मुख से निकली ध्वनि

शिशु के कानों में पड़ती है,

इसीलिए तो उस भाषा को

मातृभाषा कहते हैं।


माँ का स्तनपान

शिशु का प्रथम आहार,

माँ की गोद

उसका प्रथम पालना।


माँ की उँगली पकड़कर

प्रथम कदम बढ़ाना,

माँ की ममता में पलना,

जीवन का प्रथम पाठ सीखना।


माँ ममतामयी,

निस्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति,

त्याग और तपस्या की

जीवंत मूर्ति।


खुद भूखी रहकर भी

संतान को भोजन खिलाती,

नहलाती, वस्त्र पहनाती,

पल-पल उसका ध्यान रखती।


विविध कष्ट सहकर भी

संतानों को सुखी रखने में

सदैव तत्पर रहती।


पन्ना धाय जैसी माँ,

देश की रक्षा के लिए

अपने पुत्र का बलिदान देकर भी

कर्तव्य-पथ से नहीं डिगती।


कुंती जैसी माँ,

जीवन की कठिनाइयों में भी

अपने पुत्रों को

धर्म-पथ पर चलना सिखाती।


माँ अनमोल रत्न है,

उसके प्रेम का कोई मोल नहीं।


माँ शब्द का एक-एक अक्षर

अमर है, अक्षय है।

माँ का प्यार

अनंत है, अविनाशी है!

 : आज की चुनौती 

 हर एक को  

हर पल एक चुनौती कब,क्या होगा,

पता नहीं।

नेपाल यात्रा गये,

 बाढ की चुनौती।

 अमेरिका जाने निकलें तो    ईरान उग्रैन की चुनौती।

 महँगाई की चुनौती 

 भ्रष्टाचार और रिश्वत की चुनौती।

  इन सबके बीच 

 Daily challenge 

रचना की है चुनौती।

  सोच विचार परिवर्तन का समय।

 अब विषय और चुनौती चार पाँच दिन से न तो

 सोच-विचार न करने की चुनौती।

 समय काटने की चुनौती।

 कहते हैं मानव जन्म दुर्लभ।

 यह दुर्लभ जन्म न होने में भला ही भला।

 अन्य जीव जन्म में

 न भविष्य की चिन्ता।

 न पढ़ाई की चिंता।

 न परीक्षा कीचिंता।

न नौकरी की चिंता 

 न शादी की चिंता।

 न संतान की चिंता।

 न संतान होने की चिंता।

राम भी रोया।

कृष्ण भी रोया।

 हर मानव 

 रंक हो या राजा

 चिंता ही चिंता।।

आज की चुनौती


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु


हर एक के जीवन में

हर पल एक चुनौती है।

कब, क्या हो जाएगा,

किसे पता है?


नेपाल की यात्रा पर जाएँ,

तो बाढ़ की चुनौती।

अमेरिका जाने निकलें,

तो ईरान-यूक्रेन युद्ध की चुनौती।


महँगाई की चुनौती,

भ्रष्टाचार और रिश्वत की चुनौती,

इन सबके बीच

हर दिन एक नई चुनौती।


प्रतिदिन नई रचना करना,

वह भी अपने आप में एक चुनौती।

सोच-विचार करना,

नए विषय खोजना,

समय के साथ बदलना—

यह भी एक चुनौती।


अब चार-पाँच दिनों से

न विषय सूझता है,

न विचार आते हैं,

न कुछ लिखने का मन होता है।

यह भी एक चुनौती है—

समय काटने की चुनौती!


कहते हैं,

मानव-जन्म दुर्लभ है।

कभी-कभी मन सोचता है—

यह दुर्लभ जन्म न मिला होता,

तो शायद चिंताएँ भी न होतीं!


अन्य जीवों के जीवन में

न भविष्य की चिंता,

न पढ़ाई की चिंता,

न परीक्षा की चिंता,

न नौकरी की चिंता,

न शादी की चिंता,

न संतान की चिंता,

न संतान होने की चिंता।


राम भी रोए,

कृष्ण भी रोए।

जब अवतारों के जीवन में भी

दुःख और संघर्ष आए,

तो सामान्य मानव की क्या बिसात!


रंक हो या राजा,

हर मानव के जीवन में

चिंता ही चिंता!


यही है आज की चुनौती—

चिंताओं के बीच जीना

और फिर भी जीवन से

हार न मानना।