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Thursday, June 18, 2026

 எனது மனைவியின் இறுதிச்சடங்கு 

ஞாயிறு 21-6-26.


Body will be in the house from Saturday 9 pm to Sunday 

7- 9.30 AM.



A3, Archana Usha square Kubernagar4th cross street Extension Madippakkam Velachery.

 Map. 

Mention Sarvasiddeesvar temple.

Rahmania mosque.

 Puzithivakkam crematorium.

मेरे प्राण

  कहाँ है? कैसे हैं?

दुख के समय मेरी याद।

यही सच्ची दोस्ती। 


आदरणीय,

आपकी पीड़ा शब्दों में स्पष्ट झलक रही है। 51 वर्षों का साथ केवल वैवाहिक संबंध नहीं होता, वह जीवन की पूरी यात्रा होती है। जो अर्धांगिनी माता, सेविका, सखी, चिकित्सक और सच्चे प्रेम की मूर्ति बनकर जीवन भर साथ रही हो, उसके वियोग का दुःख अत्यंत गहरा होता है।

आपकी भावनाओं को सम्मान देते हुए इन्हें काव्य रूप में इस प्रकार संजोया जा सकता है—

मेरे प्राण के प्राण

एस. अनंतकृष्णन

खेल की बात नहीं है,

मेरी जान थी वह।

इक्यावन वर्षों तक

अर्धांगिनी बनकर,

माता के रूप में,

पत्नी के रूप में,

रोगी की सेविका,

जीवन की चिकित्सक बनकर

साथ निभाती रही।

सहनशील, गुणवान,

त्याग और प्रेम की प्रतिमूर्ति।

पति की सेवा और स्नेह के सिवा

और कोई चाह न रखने वाली,

एक आदर्श नारी।

यथार्थ प्रेम क्या होता है,

उसने अपने जीवन से सिखाया।

आज मेरे प्राणों के प्राण,

पंख लगाकर उड़ गए।

क्या करूँ?

आज ज्ञात हुआ—

दूसरों को दिलासा देना

कितना सरल है,

पर अपने ही हृदय को समझाना

अत्यंत कठिन।

आपके शोक में मैं सहभागी हूँ। अभी दुःख का गहरा होना स्वाभाविक है। 51 वर्षों का प्रेम समाप्त नहीं हुआ है; उसकी स्मृतियाँ, संस्कार और स्नेह आपके जीवन का हिस्सा बने रहेंगे।

ईश्वर आपकी धर्मपत्नी की पुण्य आत्मा को शांति प्रदान करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏🌹

[18/06, 3:52 pm] sanantha.50@gmail.com: नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना "बेनकाब चेहरे" मानव मनोविज्ञान और चेहरे के भावों के माध्यम से अंतर्मन की अभिव्यक्ति को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है। तमिल लोकोक्ति का समावेश रचना को विशेष प्रभाव देता है।

कुछ पंक्तियों को काव्यात्मक प्रवाह के लिए इस प्रकार सँवारा जा सकता है:

बेनकाब चेहरे

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

18-6-26

Face is the index of the mind।

"अगत्तिन अऴगु मुखत्तिल तेरियुम्" — तमिल लोकोक्ति।

अंतर्मन की बातें,

चेहरे पर झलक जाती हैं।

हर्ष हो या विषाद,

प्यार हो या नफ़रत,

ईर्ष्या हो या भय,

आँखों की एक झलक में

सब कुछ प्रकट हो जाता है।

बेनकाब चेहरे-मोहरे,

कुदरत की अनमोल देन हैं।

रोगी का चेहरा,

स्वस्थ जन का चेहरा,

चोर की निगाहें,

सज्जन की आँखें।

पहचान का आधार भी

चेहरा और आँखें ही हैं।

धनवान हो या निर्धन,

साहसी हो या कायर,

मन के अनेक रहस्य

ये चेहरे खोल देते हैं।

भावार्थ:

मनुष्य चाहे शब्दों से कुछ भी छिपाने का प्रयास करे, किंतु उसके चेहरे और आँखों के भाव अक्सर उसके मन की वास्तविक स्थिति को प्रकट कर देते हैं।

बहुत सुंदर एवं चिंतनशील रचना। आपकी लेखनी इसी प्रकार हिंदी सेवा और काव्य साधना को समृद्ध करती रहे।

सादर शुभकामनाएँ। 🙏🌹

Tuesday, June 16, 2026

रक्त दान दिवस

 




दैनिक चुनौती।

विश्व रक्तदान दिवस 

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै 

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

17-6-26.

+++++++++++

 भारत भूमि पुण्य भूमि।

 सनातन दान  है

 अन्न दान, भू दान, रक्तदान, स्वर्ण दान, चाँदी दान, कन्यादान,

राष्ट्र को बचाने प्राण दान।

समय की माँग,

 वैज्ञानिक युग में 

 चिकित्सा क्षेत्र में 

 अंगों  के दान, 

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय, अग्न्याशय और छोटी आंत। जीवित रहते हुए भी एक किडनी या लिवर का एक हिस्सा दान किया जा सकता है।


हृदय दान, नेत्रदान  मृत्यु के बाद।


 रक्त दान  

बार बार दे सकते हैं।

 एक व्यक्ति   हर तीन महीने  अर्थात साल में चार बार दे सकते हैं।

दानी की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

दानी का वजन कम से कम 45 किलो होना चाहिए।

रक्तदान के समय दानी  पूरी तरह से स्वस्थ और ऊर्जावान  होना चाहिए।

 पियक्कड़ और रुग्णावस्था में दान नहीं दे सकते।

 रक्त दान  शल्य चिकित्सा के समय,

दुर्घटना में ब्लड की कमी होने पर रक्त की जरूरत है।

  रक्त दान देने 

रक्तदान केंद्र है।

 रक्त दान पाने ,

रक्त दान महत्व समझाने

 शिविर भी चलाते हैं।

सरकार दानियों को पैसे भी देती है।

सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ दान रक्तदान।

 रक्त दान के महत्व समझाने 

 रक्त दान दिवस मनाते हैं।


आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना का भाव अत्यंत प्रेरणादायक है। विषय की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे थोड़ा साहित्यिक एवं प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व रक्तदान दिवस

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

17-06-2026

भारत भूमि पुण्य भूमि है,

दान की महान परंपरा यहाँ की शान है।

अन्नदान, भूदान, रक्तदान,

स्वर्णदान, रजतदान, कन्यादान,

और राष्ट्र रक्षा हेतु प्राणदान।

समय की माँग है कि

वैज्ञानिक युग में चिकित्सा क्षेत्र को

दान की महिमा से सशक्त बनाया जाए।

अंगदान के माध्यम से

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय,

अग्न्याशय तथा छोटी आंत का दान

अनेक जीवनों में नव आशा जगाता है।

जीवित रहते हुए

एक किडनी अथवा लिवर का एक भाग

दान किया जा सकता है।

नेत्रदान और हृदयदान

मृत्यु के पश्चात भी

मानवता की सेवा का माध्यम बनते हैं।

रक्तदान ऐसा महादान है

जो बार-बार किया जा सकता है।

स्वस्थ व्यक्ति प्रत्येक तीन माह में

रक्तदान कर सकता है।

दानी की आयु 18 से 65 वर्ष के बीच

और वजन कम से कम 45 किलोग्राम होना चाहिए।

रक्तदान के समय

दानी पूर्णतः स्वस्थ एवं ऊर्जावान हो।

मद्यपान करने वाले तथा रोगग्रस्त व्यक्ति

रक्तदान नहीं कर सकते।

शल्य चिकित्सा, दुर्घटनाओं तथा

रक्त की कमी से जूझ रहे रोगियों के लिए

रक्त अमूल्य जीवनदाता बनता है।

रक्तदान केंद्र तथा शिविर

जन-जन को इसके महत्व से परिचित कराते हैं।

मानवता की सेवा का यह श्रेष्ठ माध्यम

असंख्य प्राणों की रक्षा करता है।

आइए, हम सब संकल्प लें—

रक्तदान करें, जीवन बचाएँ।

सभी दानों में श्रेष्ठ है रक्तदान,

मानव सेवा का यह महान अभियान।

विश्व रक्तदान दिवस

हमें रक्तदान के महत्व का संदेश देता है

और मानवता के प्रति

अपने कर्तव्य का स्मरण कराता है।

"रक्तदान – महादान,

जीवन रक्षा का महान अभियान।"

सादर। 🙏🩸🌹

माता का ममत्व

 माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।




माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।

नमस्ते वणक्कम्, आदरणीय अनन्तकृष्णन जी।

आपकी रचना में माँ के निस्वार्थ प्रेम, त्याग, ममता, मातृभाषा और मातृभूमि के महत्व का सुंदर चित्रण है। भाव बहुत अच्छे हैं। मैंने आपकी रचना को थोड़ा सुव्यवस्थित और काव्यात्मक रूप देने का प्रयास किया है।

माता का महत्व

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

स्वरचित भावाभिव्यक्ति

+++++++++++++

माँ हमको गर्भकाल में

जीवन का रूप देती है,

अपने आँचल की छाया में

पलने-बढ़ने की सुविधा देती है।

जन्म लेते ही शिशु को

स्तनपान का अमृत मिलता,

पहला शब्द जो मुख से निकले,

वह "माँ" का स्वर ही होता।

माँ के दुलार भरे शब्दों से

मातृभाषा का ज्ञान मिलता,

निस्वार्थ प्रेम और त्याग से

जीवन का सम्मान मिलता।

तन से, मन से, धन से

माँ करती सतत उपकार,

ममता की शीतल छाया में

खिलता जीवन का संसार।

माँ के संस्कारों से ही

वीर और महापुरुष बनते हैं,

जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज को

माता के आदर्श प्रेरित करते हैं।

तमिल की एक सुंदर कहावत है—

"माता जैसी संतान, धागे जैसा कपड़ा",

सुशिक्षित और संस्कारवान माँ से

निखरता शिशु का व्यक्तित्व सारा।





माँ से ही बंधुत्व के रिश्ते,

माँ से ही परिवार की शान,

माँ न हो तो मानव जीवन में

न रहे ममता का सम्मान।

मातृभाषा, मातृभूमि और माता,

जीवन के तीन अनमोल राग,

इनके प्रति श्रद्धा और समर्पण

बनें मानव जीवन का सुहाग।

+++++++++++++

भावार्थ:

माता केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन को संस्कार, भाषा, प्रेम, त्याग और व्यक्तित्व प्रदान करने वाली प्रथम गुरु है। माता, मातृभाषा और मातृभूमि का सम्मान मानव जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य है।

सादर प्रणाम। 🙏

जय माता। जय मातृभूमि। जय मातृभाषा।

Sunday, June 14, 2026

समय यात्रा

 


समय का मुसाफिर 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

15.6.26

**************

मानव समय का मुसाफिर।

मोसम समय का मुसाफिर।

 बचपन एक मुसाफिर 

 लड़कपन एक मुसाफ़िर।

जवानी एक मुसाफिर 

 बुढ़ापा यात्रा का विश्राम 

 मौसमी फूल फल

सूर्य चन्द्र चौबीस घंटों के मुसाफिर।।

 पृथ्वी के सब जीव-जंतु जीवन काल निर्णय।

 अतः भूलोक समय का मुसाफिर।

नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

आपकी रचनाओं में जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन और अनुभूति की गहराई दिखाई देती है। "समय का मुसाफिर" हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन की प्रत्येक अवस्था एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं।

समय चलता रहता है,

जीवन बदलता रहता है।

जो समय का महत्व समझ ले,

उसका जीवन सँवरता रहता है।

आप इसी प्रकार हिंदी सेवा, साहित्य-साधना और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से अपने विचारों का प्रकाश फैलाते रहें।

ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और सृजन की निरंतर प्रेरणा प्रदान करें। आपकी धर्मपत्नी को भी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ मिले, यही मंगलकामना है।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री गणेशाय नमः।

जय श्री राम।

जय हनुमान।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

सादर प्रणाम एवं शुभकामनाएँ।

प्रार्थना

 


नमस्ते वणक्कम्।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ
‌मेरी प्यारी अर्द्धांगिनी मेरी जान
जल्दी स्वस्थ हो जाएँ।
मेरी जाने अनजाने गलतियों को
माफ़ कर दीजिए।
हे भगवान मेरे प्राण उनकी प्रार्थना से बची।
उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।
‌विनम्र निवेदन करता हूँ।
ॐ गणेशाय नमः
ॐ कार्तिकेयाय नमः
ॐ नमः शिवाय
ऊँ दुर्गा मैं नमः।
सत् चित् आनन्द स्वामिये नमः।
सच्चिदानंद स्वामिये नमः
अगस्त्याय नमः
भोगरे नमः
कडुवॆळि सिद्ध पुरुषाय नमः
इडैक्काडरे नमः
पुलिप्पाणिये नमः
अऴुकिनी सिद्ध पुरुषाय नमः
ॐशीरडी साईं नमः
ॐ पुट्टभर्ति स्वामिये नमः
जय जय शंकर हर हर शंकर।
ॐ रमण महर्षिये नमः
ॐ राघवेंद्राय नमः
ॐ शेषाद्रि स्वामिये नमः
ॐ गोरख सिद्ध पुरुषायै नमः
ॐ चिदंबरम स्वामिये नमः
ओम् रेड्डी पट्टी स्वामिये नमः
ॐ बड़े भाई साहब नमः।
ॐ पांबन स्वामिये नमः
ओम् पूंडीमहाने नमः
ओं भृगु मुनि ये नमः
ओं भ्रुंगी मुनिये नमः
ओं ईश्वरभट्टाय नमः
ओं कणक्कण पट्टी स्वामिये नमः
ओं माधूरी स्वामिये नमः
ओं चाक्कडै सिद्धपुरुषाय नमः
अरुट पेरुंज्योति अरुट् पॆरुँज्योति
तनिप्पेरुम् करुणै अरुट् पेरुमल ज्योति ।
ओम् भैरवाय नमः
ओं जय हनुमान।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
ॐॐ ॐॐ ॐॐ ॐॐ



नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपकी प्रार्थना में प्रेम, समर्पण, करुणा और जीवनसाथी के प्रति अटूट निष्ठा झलक रही है। अपनी अर्द्धांगिनी के स्वास्थ्य के लिए आपका हृदय जिस वेदना और श्रद्धा से भगवान के चरणों में झुक रहा है, वह स्वयं एक महान तपस्या है।

ईश्वर से मेरी भी यही प्रार्थना है—

हे गणपति, हे शिवशंकर, हे माता दुर्गा, हे मुरुगन, हे साईंनाथ, हे हनुमान, हे सभी सिद्ध पुरुषों और महापुरुषों!

आपकी कृपा से AK जी की धर्मपत्नी को शक्ति, शांति और स्वास्थ्य प्रदान करें।

उनकी पीड़ा कम हो, श्वास सहज हो, मन में साहस बना रहे और उपचार सफल हो।

परिवार को धैर्य, विश्वास और मानसिक बल दें।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।"

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

आपने लिखा — "उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।"

यह एक पति के प्रेम और कर्तव्य का अत्यंत मार्मिक भाव है। वर्षों तक जो साथ निभाता है, उसकी पीड़ा अपनी पीड़ा बन जाती है। आपकी सेवा, जागरण, चिंता और प्रार्थना भी ईश्वर की दृष्टि में एक पुण्य यज्ञ के समान हैं।

विश्वास बनाए रखिए। चिकित्सा और प्रार्थना दोनों साथ-साथ चलें।

ईश्वर आपकी अर्द्धांगिनी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री सुब्रह्मण्याय नमः।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

हार्दिक शुभकामनाएँ एवं प्रार्थनाएँ।

Saturday, June 13, 2026

पुण्य कलश

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏


पुण्य कलश

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

14-6-26

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मानव तो

सर्वगुण संपन्न 

 ज्ञानी, ब्रह्म सम।

पर  महामायादेवी

ईश्वर का एक अंग,

संसार को माया छाया जगत के रूप में 

बनाते रखने में समर्थ।

अचूक, सद्यःफल दाता।

परिणाम स्वरूप वह

 स्वार्थ निस्वार्थ 

बन जाता है।

 अन्याय का साथ देता है।

दशरथ की भूल,

शब्द भेदी बाण का प्रयोग 

शिशु हत्या पाप।

 राम का दुख

 रावण का बुद्धि भ्रष्ट 

 ये सब  न होने

 आदि काल में वेद उपनिषद और अनेक पुराण, प्रासांगिक कथाएँ।

पापों से मुक्ति पाने 

 हवन होम पुण्य कलश का महत्व।

 पुण्य कलश  सकारात्मक ऊर्जा,

 कलश में त्रिदेव और देवियों की उपस्थिति 

 सद्विचारों का स्रोत।

 दान धर्म का महत्व।

 परोपकार्थ

 इदम् शरीरम् की सीख।

 पापों की मुक्ति के लिए 

भूदान स्वर्ण दान चाँदीदान।

  जगत मिथ्या

 ब्रह्म सत्यं।

नश्वर दुनिया 

 अनश्वर सत्य प्रभाव।

 अनश्वर सूक्ष्म शक्ति

 परिणाम 

 अखिलेश्वर की अनंत शक्ति।

 पुण्य कर्म का फल,

 पाप कर्म का दंड।

 मानव  लौकिक 

 बंधन से छूटता नहीँ।

अतः जन्म पुनर्जन्म 

 सुखी दुखी का अनुभव।।

इन सब से छूटकर 

 दिव्य शक्ति सद्बुद्धि 

 आत्मसंतोष, 

आत्मज्ञान पाने,

पुण्य कलश की स्थापना

 फिर भी ज्ञान चक्षु प्राप्त मानव अपने अस्थाई जीवन को स्थाई मानकर 

 नकारात्मक विचार में।

 यही संसार है के दुःखों का मूल।

 पुण्य कलश की स्थापना 

आदर्श परोपकार जीवन कै लिए।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई


आपकी रचना में आध्यात्मिक चिंतन, कर्मफल, माया, दान, परोपकार तथा पुण्य कलश के प्रतीकात्मक महत्व का सुंदर समावेश है। भाव अत्यंत गहन हैं। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहमय रूप देने का एक विनम्र प्रयास प्रस्तुत है।

पुण्य कलश

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

14-6-2026

मानव तो

सर्वगुण-संपन्न,

ज्ञानी, ब्रह्म के समान है।

पर महामायादेवी,

ईश्वर की ही एक शक्ति,

इस संसार को

माया-छाया जगत के रूप में

संचालित करने में समर्थ है।

वह अचूक,

सद्यःफलदायिनी है।

उसके प्रभाव से मानव

स्वार्थी भी बन जाता है,

तो कभी निस्वार्थ भी।

कभी अन्याय का साथ देता है,

कभी धर्म के पथ पर चलता है।

दशरथ की भूल,

शब्दभेदी बाण का प्रयोग,

श्रवण कुमार के वध का पाप;

राम का दुःख,

रावण की बुद्धि का भ्रष्ट होना—

इन सब घटनाओं में

कर्मफल का संदेश छिपा है।

इसीलिए आदि काल से

वेद, उपनिषद, पुराण

और अनेक प्रेरक कथाएँ

मानव को सत्कर्म का मार्ग दिखाती हैं।

पापों से मुक्ति हेतु

हवन, होम और पुण्य कलश का

विशेष महत्व बताया गया है।

पुण्य कलश

सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

मान्यता है कि उसमें

त्रिदेव तथा देवियों का वास होता है।

वह सद्विचारों का स्रोत है,

दान और धर्म का प्रेरक है,

और सिखाता है—

"परोपकारार्थम् इदं शरीरम्"

अर्थात यह शरीर

परोपकार के लिए है।

भूदान, स्वर्णदान, चाँदीदान

और सेवा के विविध रूप

मानव को पुण्य के मार्ग पर ले जाते हैं।

जगत मिथ्या है,

ब्रह्म ही सत्य है।

यह संसार नश्वर है,

पर सत्य और दिव्य शक्ति अमर हैं।

पुण्य कर्म का फल मिलता है,

पाप कर्म का दंड भी।

फिर भी मानव

लौकिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता।

अतः जन्म-पुनर्जन्म के चक्र में

सुख-दुःख का अनुभव करता रहता है।

इन बंधनों से ऊपर उठकर,

सद्बुद्धि, आत्मसंतोष

और आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु

पुण्य कलश की स्थापना

एक शुभ प्रेरणा है।

किन्तु ज्ञान-चक्षु प्राप्त मानव भी

अपने अस्थायी जीवन को स्थायी मानकर

नकारात्मक विचारों में उलझ जाता है।

यही संसार के दुःखों का मूल है।

अतः पुण्य कलश की स्थापना

केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,

अपितु आदर्श, परोपकारी

और सदाचारी जीवन का संकल्प है।

— एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 🙏

रचना का मूल संदेश अत्यंत सुंदर है— सत्कर्म, परोपकार, आत्मज्ञान और सकारात्मक चिंतन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।