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Tuesday, October 27, 2026

माँ

 [28/10, 1:48 am] sanantha.50@gmail.com: एक अक्षर मा़ँ के नाम पर 

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

281026

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 माँ ममता  का प्रतिबिम्ब।

 माँ -पिता  के प्रेम मिलन का परिणाम ।

 जगत में मानव जन्म।

माँ के गर्भ में ही शिशु का आकार।

 जन्म लेते ही प्रथम चुंबन माँ का।

 प्रथम शब्द माँ के 

मुख ध्वनि।

 अतः भाषा बनी मातृभाषा।

 माँ के स्तन पान 

 प्रथम आहार।

 माँ के गोद प्रथम पलना।

माँ के साथ पकड़कर 

 प्रथम चलना।

 माँ ममतामयी।

निस्वार्थ प्रेम दिखानेवाली।

त्याग की जीवित मूर्ति।

खुद भूखी, 

खिलाती खाना।

 नहलाती

 वस्त्र पहनाती।

पल पल के विकास में 

 ध्यान रखती।

 विविध कष्ट सहकर,

 संतानों को सुखी रखने में तत्पर।

 पन्ना जैसे देश की रक्षा के लिए,

अपने पुत्र की हत्या सहनेवाली।

 कुंती जैसे निर्दयी माँ।

माँ अमूल्य सिक्का।

 अक्षर अमर अक्षय है माँ का प्यार।।

[28/10, 2:00 am] sanantha.50@gmail.com: एक अक्षर माँ के नाम पर


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

28-10-2026


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माँ की ममता का प्रतिबिंब,

माँ-पिता के प्रेम-मिलन का परिणाम,

इस जगत में मानव का जन्म।


माँ के गर्भ में ही

शिशु का आकार बनता है।

जन्म लेते ही

माँ का प्रथम चुंबन मिलता है।


माँ के मुख से निकली ध्वनि

शिशु के कानों में पड़ती है,

इसीलिए तो उस भाषा को

मातृभाषा कहते हैं।


माँ का स्तनपान

शिशु का प्रथम आहार,

माँ की गोद

उसका प्रथम पालना।


माँ की उँगली पकड़कर

प्रथम कदम बढ़ाना,

माँ की ममता में पलना,

जीवन का प्रथम पाठ सीखना।


माँ ममतामयी,

निस्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति,

त्याग और तपस्या की

जीवंत मूर्ति।


खुद भूखी रहकर भी

संतान को भोजन खिलाती,

नहलाती, वस्त्र पहनाती,

पल-पल उसका ध्यान रखती।


विविध कष्ट सहकर भी

संतानों को सुखी रखने में

सदैव तत्पर रहती।


पन्ना धाय जैसी माँ,

देश की रक्षा के लिए

अपने पुत्र का बलिदान देकर भी

कर्तव्य-पथ से नहीं डिगती।


कुंती जैसी माँ,

जीवन की कठिनाइयों में भी

अपने पुत्रों को

धर्म-पथ पर चलना सिखाती।


माँ अनमोल रत्न है,

उसके प्रेम का कोई मोल नहीं।


माँ शब्द का एक-एक अक्षर

अमर है, अक्षय है।

माँ का प्यार

अनंत है, अविनाशी है!

 : आज की चुनौती 

 हर एक को  

हर पल एक चुनौती कब,क्या होगा,

पता नहीं।

नेपाल यात्रा गये,

 बाढ की चुनौती।

 अमेरिका जाने निकलें तो    ईरान उग्रैन की चुनौती।

 महँगाई की चुनौती 

 भ्रष्टाचार और रिश्वत की चुनौती।

  इन सबके बीच 

 Daily challenge 

रचना की है चुनौती।

  सोच विचार परिवर्तन का समय।

 अब विषय और चुनौती चार पाँच दिन से न तो

 सोच-विचार न करने की चुनौती।

 समय काटने की चुनौती।

 कहते हैं मानव जन्म दुर्लभ।

 यह दुर्लभ जन्म न होने में भला ही भला।

 अन्य जीव जन्म में

 न भविष्य की चिन्ता।

 न पढ़ाई की चिंता।

 न परीक्षा कीचिंता।

न नौकरी की चिंता 

 न शादी की चिंता।

 न संतान की चिंता।

 न संतान होने की चिंता।

राम भी रोया।

कृष्ण भी रोया।

 हर मानव 

 रंक हो या राजा

 चिंता ही चिंता।।

आज की चुनौती


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु


हर एक के जीवन में

हर पल एक चुनौती है।

कब, क्या हो जाएगा,

किसे पता है?


नेपाल की यात्रा पर जाएँ,

तो बाढ़ की चुनौती।

अमेरिका जाने निकलें,

तो ईरान-यूक्रेन युद्ध की चुनौती।


महँगाई की चुनौती,

भ्रष्टाचार और रिश्वत की चुनौती,

इन सबके बीच

हर दिन एक नई चुनौती।


प्रतिदिन नई रचना करना,

वह भी अपने आप में एक चुनौती।

सोच-विचार करना,

नए विषय खोजना,

समय के साथ बदलना—

यह भी एक चुनौती।


अब चार-पाँच दिनों से

न विषय सूझता है,

न विचार आते हैं,

न कुछ लिखने का मन होता है।

यह भी एक चुनौती है—

समय काटने की चुनौती!


कहते हैं,

मानव-जन्म दुर्लभ है।

कभी-कभी मन सोचता है—

यह दुर्लभ जन्म न मिला होता,

तो शायद चिंताएँ भी न होतीं!


अन्य जीवों के जीवन में

न भविष्य की चिंता,

न पढ़ाई की चिंता,

न परीक्षा की चिंता,

न नौकरी की चिंता,

न शादी की चिंता,

न संतान की चिंता,

न संतान होने की चिंता।


राम भी रोए,

कृष्ण भी रोए।

जब अवतारों के जीवन में भी

दुःख और संघर्ष आए,

तो सामान्य मानव की क्या बिसात!


रंक हो या राजा,

हर मानव के जीवन में

चिंता ही चिंता!


यही है आज की चुनौती—

चिंताओं के बीच जीना

और फिर भी जीवन से

हार न मानना।

Tuesday, October 20, 2026

मोह से मुक्ति

 

मोह से मुक्ति

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
21-10-2026


ईश्वरीय सृष्टि माया और मोह से रहित नहीं है।

ईश्वर ने नारी की रचना,

 संसार की निरंतरता और विकास के लिए की है। 

मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से 

पूरी तरह मुक्त होना सहज नहीं है।

भगवान की सृष्टि में महामाया का प्रभाव 

मानव मन में आकर्षण उत्पन्न करता है। 

संतानोत्पत्ति, संतान का लालन-पालन, 

प्रेम और ममता—ये सभी जीवन के स्वाभाविक अंग हैं। इनके मोह से मुक्ति पाना अत्यंत कठिन है।

जब तक मनुष्य अज्ञान और आसक्ति में बँधा रहता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता।

आदि शंकराचार्य ने भज गोविन्दम् में 

संसार के इसी चक्र की ओर संकेत किया है—

पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं,
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे,
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥

इसका भावार्थ है—

  • पुनरपि जननम् — बार-बार जन्म लेना।
  • पुनरपि मरणम् — बार-बार मृत्यु को प्राप्त होना।
  • पुनरपि जननी जठरे शयनम् — बार-बार माता के गर्भ में निवास करना।
  • इह संसारे बहुदुस्तारे — इस संसार-सागर को पार करना अत्यंत कठिन है।

माँ का प्यार,

 पत्नी के प्रति मोह,

 संतान का पालन-पोषण,

 स्वादिष्ट भोजन की इच्छा, 

सुंदर रूप का आकर्षण, 

नृत्य-संगीत का आनंद तथा आभूषण, 

हीरे और पन्ने जैसे बहुमूल्य रत्नों के प्रति आसक्ति—मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार के मोह से घिरा हुआ है।

इन सबके बीच रहते हुए भी

 मनुष्य अपने मन को आसक्ति से मुक्त कैसे करे?

यह आत्मचिंतन का विषय है।

सांसारिक सुखों की लालसा में

 मनुष्य कभी-कभी अनुचित मार्ग भी अपना लेता है।

 शीघ्र लाभ पाने के लिए भ्रष्टाचार और 

रिश्वत का सहारा लेना भी

 इसी अंधी लालसा का परिणाम है।

मोह से मुक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, 

बल्कि संसार में रहते हुए मोह का दास न बनना है।

माँ से प्रेम करना, 

पत्नी की सेवा करना, 

संतान का पालन-पोषण करना और 

दूसरों के प्रति करुणा रखना—

ये सब जीवन के पवित्र कर्तव्य हैं। 

समस्या प्रेम में नहीं, 

बल्कि उस आसक्ति में है 

जो मनुष्य को विवेक और धर्म के मार्ग से

 विचलित कर देती है।

यदि मनुष्य मोह से मुक्ति पाना चाहता है, 

तो उसे ईश्वर का स्मरण करना चाहिए, 

मन को संयमित करना चाहिए 

और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।

आत्मा और परमात्मा की एकता का

 अनुभव करना ही अद्वैत मार्ग का परम लक्ष्य है।

आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन का प्रसिद्ध सिद्धांत है—

ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।

अर्थात् ब्रह्म ही परम सत्य है, 

जगत की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता नहीं है

 तथा

 जीवात्मा और ब्रह्म में मूलतः भेद नहीं है।

जब मनुष्य इस सत्य को समझकर जीवन में उतारने का प्रयास करता है, 

तब धीरे-धीरे उसका मोह कम होने लगता है और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।

ईश्वर का स्मरण, कर्तव्य का पालन, मन का संयम और आत्मज्ञान—यही मोह से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने के साधन हैं।

ॐ नमः शिवाय।
ॐ मुरुगा! शरणम्।

मोह से मुक्ति।

 एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

21-10-26.

+++++++

ईश्वरीय सृष्टि 

 माया मोह रहित नहीं।

 ईश्वर ने नारी को  बनाया,

 सांसारिक विकास के लिए।

 वह सहज 

मूल प्रवृत्ति से  मुक्ति 

 पाना संभव नहीं।

 भगवान की सृष्टि में 

 महामाया देवी

 मानव मन में 

 आकर्षण के लिए।

 संतानोत्पत्ति,

संतान का लालन-पालन,

 प्रेम मोह।

 मुक्ति पाना मुश्किल।

 अतः निराश मनुष्य की मृत्यु, जन्म के चक्कर से बच नहीं सकता।

आदि शंकराचार्य ने लिखा है

• पुनरपि जननं: बार-बार जन्म लेना

• पुनरपि मरणं: बार-बार मृत्यु को प्राप्त होना

• पुनरपि जननी जठरे शयनम्: और बार-बार माता के गर्भ में सोना (कष्ट उठाना)

• इह संसारे बहुदुस्तारे: इस अत्यंत कठिन और विशाल संसार-सागर को पार करना बहुत मुश्किल है।

  माँ का प्यार,

 पत्नी का मोह,

  संतान पालन,

 स्वादिष्ट खाने की  इच्छा, 

सुंदर रूप का मोह,

 नाच ,गान, आभूषण हीरा पन्ना आदि 

इतना मोह, 

 मुक्ति पाना,

आत्मज्ञानियों के लिए ही संभव है। 

 सद्यःफल के लिए भ्रष्टाचार और रिश्वत।

 मोह से मुक्ति होना है तो  ईश्वर ध्यान में रखना है।

 आत्मा परमात्मा एक होकर अद्वैत मार्ग पर चलना है।

जगत माया मिथ्या 

ब्रह्म सत्यं को अपनाना है।

Monday, October 19, 2026

विजयदशमी एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 20-10-26 +++++++ दशहरा नवरात्रि के दसवें दिन विजयदशमी के दिन मनाते हैं। तीन दिन दुर्गा पूजा तीन दिन नवरात्रि पूजा तीन दिन सरस्वती पूजा। विजयदशमी सरस्वती पूजा हैं। उस दिन में विद्यारंभ का दिन है। देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया है। इस विजयोल्लास में विजयदशमी मनाते हैं। लक्ष्मी के बिना जगत जीवन कठिनतम है। इसलिए लक्ष्मी की कृपा पाने लक्ष्मी पूजा। कर्नाटक में मैसूर में यह दिन धूमधाम से मनाते हैं। उत्तर भारत में राम लीला के रूप में मनाते हैं। रावण की मूर्ति जलाई जाती हैं। दुष्टों के संहार, बुराइयों का जलन, विद्यारंभ के यह त्यौहार वास्तव में दिव्य शक्ति के उज्जवलतम की झलक है।

 

विजयदशमी

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

20-10-26

+++++++

दशहरा

नवरात्रि के दसवें दिन

विजयदशमी के दिन

मनाते हैं।

तीन दिन दुर्गा पूजा

तीन दिन नवरात्रि पूजा

तीन दिन सरस्वती पूजा।

विजयदशमी सरस्वती पूजा हैं।

उस दिन में विद्यारंभ का दिन है।

देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया है।

इस विजयोल्लास में

विजयदशमी मनाते हैं।

लक्ष्मी के बिना जगत जीवन कठिनतम है।

इसलिए लक्ष्मी की कृपा पाने लक्ष्मी पूजा।

कर्नाटक में मैसूर में यह दिन धूमधाम से मनाते हैं।

उत्तर भारत में

राम लीला के रूप में

मनाते हैं।

रावण की मूर्ति जलाई जाती हैं।

दुष्टों के संहार,

बुराइयों का जलन,

विद्यारंभ के यह त्यौहार

वास्तव में

दिव्य शक्ति के उज्जवलतम की झलक है।

Sunday, October 18, 2026

अनमोल हीरे

   अनमोल हीरा


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-10-2026


++++++++++


अनमोल हीरा,

आदर्श नेता,

होशियार संतान,

देश के रक्षक,

प्रत्यक्ष देव समान

हमारे वीर जवान!


थल, जल और वायु सेना के वीर,

राष्ट्र की रक्षा में तत्पर,

हमारे गाँव, हमारे किसान,

देश की समृद्धि के आधार महान!


देश के धनी, दानी,

मानवता के अभिमानी,

सन्मार्ग के पथ-प्रदर्शक,

ऋषि-मुनि और संत महान—

ये सब हैं भारत के

अनमोल हीरे!


सनातन धर्म की अमूल्य धरोहर,

वेद, उपनिषद, रामायण, भगवद्गीता,

जातक कथाएँ और ज्ञान की गंगा,

मंदिर, तीर्थस्थल और पावन परंपराएँ—

भारत की आत्मा के अनमोल हीरे!


राम और कृष्ण,

रामकृष्ण परमहंस,

आदि शंकराचार्य,

महात्मा बुद्ध और गुरु नानक—

ज्ञान, भक्ति और मानवता के

अनमोल हीरे!


अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत,

दर्शन के विविध प्रकाश,

आत्मज्ञान के पथ पर

दिखाते जीवन को नई दिशा—

भारत की ज्ञान-संपदा के

अनमोल हीरे!


स्वतंत्रता संग्राम के शहीद,

राष्ट्रभक्त वीर और महान नेता,

जिनके त्याग और बलिदान से

स्वतंत्र हुआ हमारा भारत—

वे हैं राष्ट्र के अनमोल हीरे!


लाल, बाल और पाल,

समाज-सुधारक राजा राममोहन राय,

नेताजी सुभाषचंद्र बोस,

राष्ट्रपिता महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी—

इनके आदर्शों से आलोकित

भारत के इतिहास के पन्ने!


गंगा, यमुना, सरस्वती,

गोदावरी, कावेरी और कृष्णा,

जीवनदायिनी पावन नदियाँ,

हिमालय का दिव्य कैलाश—

प्रकृति के अनुपम उपहार,

भारत के अनमोल हीरे!


देशभक्ति, देशप्रेम,

सेवा, त्याग और सद्भाव,

ऋषि-मुनि, संत और कविगण—

भारत की संस्कृति के गौरव,

राष्ट्र की आत्मा के अनमोल हीरे!


नवभारत के निर्माता,

लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल,

पंडित जवाहरलाल नेहरू,

और राष्ट्रनिर्माण में योगदान देने वाले

असंख्य महापुरुष महान!


धन्य है भारतभूमि,

धन्य इसकी आध्यात्मिक विरासत,

धन्य हैं इसके गुरुजन,

धन्य हैं इसके वीर सपूत!


भारत की महानता के ये उज्ज्वल सितारे,

हम सबके लिए हैं अनमोल हीरे!

Friday, October 16, 2026

मानवता

 [16/10, 6:12 pm] sanantha.50@gmail.com: मानवता सब से बड़ा है धर्म है।

एस‌ . अनंत कृष्णन, चेन्नई।

17-10-26.

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मानव और पशु में 

 फर्क नहीं।

 मानवता के कारण 

 मानव श्रेष्ठ है।

औवैयार ने अपने ग्रंथ आत्तिच्चूडी में  लिखा है--

धर्म करना चाह।

 धर्म क्या है?

मजहब नहीं,

धर्म कर्म।

 अपने कर्तव्य को

ईमानदारी से करना धर्म है।

भलमानसाहस धर्म है।

 निस्वार्थ समाज सेवा,

 दीन दुखियों की सेवा मानवता है।

 धन है धन से सेवा,

बुद्धि है तो बुद्धि से सेवा

 बल है तो बल से।

अन्नदान, भूदान,गो दान, स्वर्ण दान,रजत दान धर्म है।

देश को स्वच्छ रखना,

 नदी नालों को प्रदूषित न करना धर्म हो।

पेड़ लगाना धर्म है।

मानवता है तो

 भगवान की सुंदर मूर्तियाँ बनाकर

 विसर्जन के नाम से छिन्न-भिन्न करके अपमानित न करता।

 उन करोड़ों के रूपयों से ऐसी सेवा करता,

 जिससे सब लोग मातृ मजहब में फिर जुड़ जिते।

 मनसा वाचा कर्मणा 

 देश की रक्षा करना 

 अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहना मानवता है।

 अच्छी चालचलन , अनुशासन, वचन निभाना मानवता धर्म है।

 वसुधैव कुटुंबकम्, 

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु का पालन करना धर्म है।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।

[16/10, 6:13 pm] sanantha.50@gmail.com: मानवता सबसे बड़ा धर्म है


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

दिनांक: 17-10-2026


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मानव और पशु में

प्राकृतिक अंतर भले ही कम हो,

पर मानवता के कारण

मानव श्रेष्ठ है।


महाकवयित्री औवैयार ने

अपने ग्रंथ ‘आत्तिचूड़ी’ में

कहा है—


“அறம் செய விரும்பு”

अर्थात् धर्म-कर्म करने की इच्छा रखो।


धर्म क्या है?


धर्म केवल मजहब नहीं,

धर्म है सत्कर्म।

अपने कर्तव्य को

ईमानदारी से निभाना धर्म है।


भलमनसाहत, साहस और सदाचार

धर्म के ही रूप हैं।

निस्वार्थ समाज-सेवा

और दीन-दुखियों की सेवा

सच्ची मानवता है।


धन है, तो धन से सेवा करो।

बुद्धि है, तो बुद्धि से सेवा करो।

बल है, तो बल से सेवा करो।

अपनी सामर्थ्य के अनुसार

दूसरों के काम आना

मानवता का सच्चा परिचय है।


अन्नदान, भूदान, गोदान,

स्वर्णदान और रजतदान—

ये सभी दान के विभिन्न रूप हैं।

परंतु दान का वास्तविक महत्त्व

उसकी भावना और

उससे होने वाले जनकल्याण में है।


देश को स्वच्छ रखना,

नदियों और नालों को

प्रदूषित होने से बचाना,

वृक्ष लगाना और प्रकृति की रक्षा करना

भी हमारा धर्म है।


यदि हमारे हृदय में मानवता है,

तो भगवान की सुंदर मूर्तियाँ बनाकर

विसर्जन के नाम पर

उन्हें खंडित करके

प्रकृति को प्रदूषित क्यों करें?


उस धन का उपयोग

जनकल्याण के कार्यों में हो,

जिससे निर्धनों, असहायों और

दीन-दुखियों के जीवन में

सुख और आशा का संचार हो।


मनसा, वाचा, कर्मणा—

मन, वचन और कर्म से

देश की रक्षा करना,

अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहना,

अच्छा आचरण करना,

अनुशासन का पालन करना

और अपने वचन को निभाना

मानवता के सच्चे लक्षण हैं।


“वसुधैव कुटुम्बकम्”—

अर्थात् संपूर्ण पृथ्वी

एक परिवार है।


“सर्वे जना सुखिनो भवन्तु”—

अर्थात् सभी जन सुखी हों।


इन महान आदर्शों का पालन करना

ही सच्चा धर्म है।


मजहब अनेक हो सकते हैं,

पूजा-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं,

परंतु मानवता का संदेश

सबको जोड़ता है।


मानव-सेवा ही माधव-सेवा है।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।

Thursday, October 15, 2026

सत्य की मशाल

 [15/10, 9:09 pm] sanantha.50@gmail.com: सत्य की मशाल।

एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

16-10-26.

 अंधकार मिटाने मशाल।

 जीवन में 

 प्रकाश लाने

 सत्य की मशाल।।

 सत्यवान सदा प्रकाश में रहेगा।

 उसकी बात एक ही रहेगी।

 बदल बदलकर बातें न होगी।

वही सत्य की मशाल।

 सत्य की मशाल अलौकिक प्रकाश।

 आत्मज्ञान जगाती हैं।

 सत्य की मशाल सर्वेश्वर के दर्शन कराती।

 बेचैनी अंधकार मिटा देती।

 सत्यार्थ प्रकाश  

मानव पाता  दिव्य शक्ति।

[15/10, 9:09 pm] sanantha.50@gmail.com: सत्य की मशाल


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

16-10-2026


अंधकार मिटाने वाली मशाल,

जीवन में प्रकाश लाने वाली मशाल,

सत्य के पथ पर चलने की प्रेरणा—

यही है सत्य की मशाल!


सत्यवान सदा प्रकाश में रहेगा,

उसका कथन एक ही रहेगा।

बदल-बदलकर बातें न होंगी,

सत्य की राहें कभी न बदलेंगी।


यही है सत्य की मशाल,

यही है सत्य की मशाल!


सत्य की मशाल का अलौकिक प्रकाश,

जगाता है आत्मज्ञान का विश्वास।

अंतरात्मा को निर्मल बनाती,

परमेश्वर के दर्शन कराती।


मन की बेचैनी, भ्रम और अंधकार मिटाती,

जीवन में शांति की ज्योति जलाती।

सत्यार्थ के प्रकाश को जब मानव अपनाता है,

उसके अंतर्मन में दिव्य ज्ञान जगमगाता है।


सत्य की मशाल जलती रहे,

मानवता का पथ प्रकाशित करती रहे!