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Saturday, August 8, 2026

स्वार्थ के कांटे


 स्वार्थ के काँटे

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।

 8-8-26

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स्वार्थ

 मानव के लिए

 कलंक।

 स्वार्थ व्यक्ति 

लोभी होता है।

अपने लिए जीता है।

कंजूसी होता है।

स्वार्थ मनुष्य 

 अपने हित के लिए 

 अन्याय करता है।

भ्रष्टाचार और रिश्वत 

 लेकर धन जोड़ता है।

 विभीषण अपने भाई तजकर  राम से मिल गया। 

कुल द्रोही बन गया।

  वीर और देश भक्त पुरुषोत्तम महाराज का भाई सिकंदर से मिल गया।

 पद , नौकरी, सुखी जीवन के लिए 

 भारतीय प्रतिभाशाली लोग अपनी भाषा,

 अपने मजहब

 अपनी पोशाक तक बदलकर अंग्रेज़ी के पिछलग्गू बन गये।

 ताजमहल को सराहा।

 भारतीय अपूर्व मंदिर 

 जो ताज़महल से श्रेष्ठ है, उनको चमकने न दिया।

  कबीर ने स्वार्थ के गुण पर अपने दोहे लिखे:--

सुख के संगी स्वार्थी, दुख मे रहते दूर।कहे कबीर परमारथी, दुख सुख सदा हजूर॥

 स्वार्थी सुख के समय साथ रहता है,

 दुख के समय तजकर चला जाता है।

परमार्थी सुख दुख में 

साथ रहता है।


कबीर कहते हैं --


तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ।मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ।

तुलसीदास ने लिखा है


स्वार्थ लागी करै सब प्रीति।

सुर नर मुनि सब की यह रीति॥

 रहीम के दोहे


धन दारा अरु सुतन सों, लग्यों रहै नित चित्त।

नहि रहीम कोऊ लख्यो, गाढ़े दिन को मित्त॥

 राम भी स्वार्थ के लिए 

 छिपकर वाली को मारा।

 वाली से युद्ध के पहले

 बातें नहीं की।

 अतः स्वार्थ प्रधान लोग जग में अधिक।।

निस्वार्थ है

 नदी,पेड़।

वृक्ष कबहु फल न भखै,

नदी न संचै नीर।

 परमार्थ के कारणे साधुने धरा शरीर।

++++++++++


सही सुधारा रूप


आज की चुनौती : स्वार्थ के काँटे


स्वार्थ के काँटेएस. अनंतकृष्णन, चेन्नई8-8-2026


स्वार्थमानव के लिएएक कलंक है।


स्वार्थी व्यक्तिलोभी होता है,अपने लिए ही जीता है,कंजूस प्रवृत्ति का होता है।


अपने हित के लिएअन्याय करता है,भ्रष्टाचार और रिश्वत सेधन का अंबार लगाता है।


इतिहास में भीस्वार्थ के अनेक उदाहरण मिलते हैं।पद, नौकरी और सुख-सुविधाओं के लिएकई लोगअपनी भाषा,अपनी संस्कृति,अपनी वेशभूषा तक छोड़करपरायी संस्कृति के अनुयायी बन जाते हैं।


कबीर ने कहा है—


"सुख के संगी स्वार्थी, दुख में रहते दूर।कहे कबीर परमारथी, दुख-सुख सदा हजूर॥"


अर्थात् स्वार्थी व्यक्तिसुख में साथ रहता है,पर दुःख आते हीसाथ छोड़ देता है।


कबीर का एक और दोहा—


"तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ।मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ॥"


तुलसीदास ने भी लिखा है—


"स्वार्थ लागी करै सब प्रीति।सुर नर मुनि सब की यह रीति॥"


रहीम कहते हैं—


"धन, दारा अरु सुतन सों, लग्यो रहै नित चित्त।नहि रहीम कोऊ लख्यो, गाढ़े दिन को मित्त॥"


आज संसार मेंस्वार्थी लोगों की संख्या अधिक है।


निस्वार्थ तोनदी और वृक्ष हैं।


"वृक्ष कबहुँ फल न भखै,नदी न संचै नीर।परमारथ के कारणे,साधु धरा शरीर॥"


यही संदेश है—स्वार्थ नहीं,परमार्थ ही मानव जीवन का सच्चा आभूषण है।

Friday, August 7, 2026

आर्तनाद

 अनंत कृष्णन का आर्तनाद।

बचपन से आज तक 

सत्रह साल तक 

माँ  पिता की ग़रीबी।

हर साल एक बच्ची,

 दो-तीन  साल पलना, 

मर जाना।

 बच्ची तो अति सुन्दर,

 मैं माँ का दूसरा बेटा।

 मेरे पहले एक बेटा 

वह भी दो साल पलकर चल बसा।

मेरे बाद छे सुंदर बहनें 

 पर पर कर मर गयी।

 यह आर्तनाद  में ही  

भगवान की देन।

 सातवीं बच्ची हुई।

 उसका नाम वेंबु रखा गया।

 वेंबु का मतलब है नीम का पेड़।

मेरे दादा ने कहा,

 अंगुली नाम जिंदा रहेगी।

मेरा और मेरी बहन की उम्र फ़रक ग्यारह साल।

मैं भी संघर्ष ग़रीबी, 

असह्य मानसिक पीड़ा में पला।

 मेरी सत्रह साल की उम्र में 

 माँ बोन टी.बी.के कारण बीमार पड़ी।

जो भी सर्वेश्वर कलियुग के ईश्वर

श्री वेंकटाचलपति , कार्तिकेय की कृपा से

 मेरी सारी माँगें पूरी हुई।

चार बार यम धामके द्वार तक जाकर 

 जान बची।

पर मेरी प्राण प्रिया सौ साल तक 

जीने की बात कह रही थी।

 मेरे प्राण रक्षा के लिए 

 अधिक ध्यान दें रही थी।

 पर मैं भगवान पर भरोसा रखकर

 जीना मरना ईश्वर के अनुग्रह से ।

 वह अचानक इलाज के बाद भी मर गयी।

 इस में कमी मेरी है या  विधि की विडंबना है‌ या डाक्टर 

की गलत इलाज है कितने विचार,

कितने प्रलाप, कितने आर्तनाद 

 कितने विचारों के ज्वार भाटे,

 चिंता की लहरें,

 मेरी पत्नी के जिंदा रहकर 

मेरे प्राण पखेरू उड़ जाने पर केवल 

 उसको असहनीय वेदनाएँ होंगी।

 बाकी लोग तो अत्यंत खुशी का अनुभव करेंगे।

 मेरे साले मेरी साली

 सब उसके साथ रहकर 

 धीरज बँधाएँगे।  

दिलासा देंगे।

 क्यों कि वह मिलनसार ही नहीं,

हर नाते रिश्तेदारों के बारे में 

 उनके शारीरिक रोग, मानसिक रोगी

 सब के लिए सलाह देती।

 पर में तो बचपन से ही रो रहा हूँ।

मेरी माँ,सांस, ससुर, साले सब के पसंद का पात्र नहीं हूँ।

 पर मैं अब अकेले बचपन से लेकर बुढ़ापे तक

 सब के नफरत का पात्र बनकर जी रहा हूँ।

 मेरे आर्तनाद किसको सुनाऊँ।

हर पल  उसकी याद में रो रहा हूँ।

 मैं जिंदा हूँ। 

मेरे आर्तनाद सुनने मेरे आँसू पोंछने कोई नहीं।

 मेरे गुण जान समझकर  प्यार करनेवाली मेरी अर्धांगिनी गोमती ही है।

दिल रो रहा है तड़प रहा हैं।

सब कुछ ‌देकर मेरी माँग पूरी करनेवाले ईश्वर

मेरी अर्द्धांगिनी के प्राण लेकर 

 दुख सागर में डुबो दिया है।














 







Thursday, August 6, 2026

अहंकार की राख

 आज की चुनौती

अहंकार की राख

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
07-08-2026

अहंकार मानव की प्रगति का सबसे बड़ा बाधक है।

मनुष्य अपने धन,
अपनी वीरता,
अपनी सुंदरता,
अपने वंश और प्रतिष्ठा पर
अहंकार करने लगता है।

ऐसे अहंकारी व्यक्ति का
अंततः कोई सच्चा समर्थक नहीं होता।
वह हठी और जिद्दी बन जाता है।
उसकी विजय भी अंततः पराजय में बदल जाती है।
अहंकारी अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करता है।

वह परिवार और समाज के रिश्तों से दूर हो जाता है।
दूसरों की सलाह, अनुभव और उपदेश को अनसुना कर देता है।
धीरे-धीरे उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है
और उसका मन अशांत एवं बेचैन रहने लगता है।

रावण का पतन भी उसके अहंकार का ही परिणाम था।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं—

काम, क्रोध, मद, लोभ जब, मन में बसें निदान।
तुलसी पंडित मूर्ख सम, हर ले विवेक-ज्ञान॥

संत कबीरदास जी ने कहा है—

मैं-मैं बड़ी बलाई है, सके तो निकसो भाग।
कहै कबीर कब लग रहो, रुई लपेटी आग॥

वास्तव में अहंकार अग्नि के समान ज्वलनशील है।
यह पहले विवेक को जलाता है,
फिर संबंधों को,
और अंत में स्वयं मनुष्य को राख बना देता है।

संदेश:
विनम्रता उन्नति का द्वार है, जबकि अहंकार विनाश का आधार।

Tuesday, August 4, 2026

पिंजरे का बंद पक्षी

 आज की चुनौती – पिंजरे का बंद पक्षी



पिंजरे के पक्षी

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

5-8-26

नमस्ते वणक्कम्।

 पिंजरे के पक्षी

 गुलाम है मानव का।

यह एक मानव के मनोरंजन के साधन।

अपनी खुशी के लिए 

 स्वतंत्र हम उड़ान के

 पक्षी की आज़ादी 

 छीनना  निर्दय मानव का गुण।

 नवविवाहिता बहु को भी लोग घर के पिंजड़े में बंद कर रखते हैं।

 एक कवि ने लिखा 

 पिंजरे में बन्द पक्षी

 गा न सकता।

अपनी आज़ादी खोकर

 दुखी रहता है।

आज़ादी की लड़ाई में 

 अनेक लोग  कारावास में रहे।

 पिंजड़े के पक्षी का पंख भी काट देते हैं।

 यातना सहकर

 वह मूक पक्षी  

  रोता रहेगा।

स्वच्छ गगन में उड़ना,

 मन पसंद दाल चुगना

अपने अन्य पक्षियों से मिलना, 

 प्यार हम करना सब कल्पना करके घुट-घुट कर मरेगा।

 हिंदू शास्त्रों के अनुसार 

 पक्षी को जो

 पिंजड़े में बंदकर 

 सताता है,

 उसको उसके वंशज को जेल की सज़ा भोगना पड़ेगा।

 जैसी करनी,

 वैसी भरनी।

कर्म फल भोगना 

 निश्चित।


+++++++++++

पिंजरे का पक्षी
एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)
5-8-2026

नमस्ते। वणक्कम्।

पिंजरे का पक्षी,
मानव का गुलाम बन जाता है।
वह किसी के मनोरंजन का साधन है,
पर उसकी स्वतंत्रता छिन जाती है।

मनुष्य अपनी खुशी के लिए
उसकी उड़ान रोक देता है।
खुले आकाश में विचरने का अधिकार
निर्दयता से छीन लेता है।

कभी-कभी नवविवाहिता बहू भी
घर की चारदीवारी में
मानो पिंजरे की चिड़िया बनकर रह जाती है।

एक कवि ने ठीक ही कहा है—
"पिंजरे में बंद पक्षी
मन से गा नहीं सकता।
स्वतंत्रता खोकर
वह भीतर ही भीतर रोता है।"

स्वतंत्रता की रक्षा के लिए
अनेक वीरों ने कारावास सहा।
पिंजरे के पक्षी के तो
पंख भी काट दिए जाते हैं।

यातना सहता वह मूक प्राणी
कुछ कह नहीं पाता,
केवल मौन आँसू बहाता है।

स्वच्छ गगन में उड़ना,
मनचाहा दाना चुगना,
अपने साथियों से मिलना,
प्रेम से जीवन जीना—
ये सब उसके लिए
केवल कल्पना बनकर रह जाते हैं।
वह घुट-घुटकर जीता है।

हिंदू शास्त्रों में भी कहा गया है कि
निर्दोष प्राणियों को कष्ट देना
पाप का कारण बनता है।
हर कर्म का फल
एक न एक दिन अवश्य मिलता है।

जैसी करनी, वैसी भरनी।
कर्मफल से कोई बच नहीं सकता।

Monday, August 3, 2026

जैसी करनी वैसी भरनी


आज की चुनौती

जैसी करनी वैसी भरनी

++++++++++++++

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

मानव का जन्म,

शास्त्रों के अनुसार,

पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरूप होता है।

आकाश से गिरी

जल की एक बूँद,

सीपी में गिरे तो मोती बन जाती है;

उसका तेज और चमक

उसके भाग्य और कर्मफल का प्रतीक है।

वही बूँद

यदि गंदे नाले में गिरे

या अंगारे पर पड़े,

तो उसका स्वरूप बदल जाता है।

मानव की बुद्धि और प्रवृत्ति

क्यों भिन्न-भिन्न होती है?

सुविचार से सुख और शांति मिलती है,

कुविचार से बेचैनी और दुःख।

अपने अंतर्मन को जानकर

कभी झूठ मत बोलो।

झूठ सिद्ध होने पर

सबसे अधिक पीड़ा

अपना ही अंतःकरण देता है।

सुकर्म करने वाला

सीना तानकर चलता है,

कुकर्म करने वाला

स्वयं ही सिर झुका लेता है।

एक डाकू को कभी शांति नहीं मिली।

जब वह गुरु के सान्निध्य में पहुँचा,

तो उसे कहा गया—

"दिनभर जो भी कर्म करो,

उन्हें लिखकर सायंकाल सभा में पढ़ना।"

अपने ही कर्मों को पढ़ते समय

वह लज्जित हो उठा।

सभा में उन्हें सुनाने का साहस न हुआ।

यहीं से उसका जीवन बदल गया।

जैसी करनी, वैसी भरनी।

आत्मचिंतन से ही ज्ञात होता है

कि मनुष्य सुखी क्यों है,

और दुःखी क्यों।

सुकर्म का फल

आनंद ही आनंद है;

कुकर्म का फल

दंड और पश्चाताप।

संत कबीर ने कहा है—

"बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥"

और यह भी—

"जो तोको काँटा बुवै,

ताहि बोय तू फूल।

तोको फूल के फूल हैं,

बाकू है त्रिशूल॥"

ध्यान और साधना से

ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त होता है।

नशे से मिलने वाली शांति

क्षणिक होती है,

और शरीर, विशेषकर फेफड़ों के लिए, हानिकारक।

सोचो, समझो—

जैसा आहार,

वैसी बुद्धि।

सत्संग का फल

ज्ञान और विवेक है;

कुसंग का फल

बुरी आदतें और दुःख।

अतः जीवन का अटल सत्य है—

जैसी करनी, वैसी भरनी। 

प्रेम चंद जयंती

 साहित्य संगम संस्थान, मध्यप्रदेश इकाई को नमस्कार।


 मुंशी प्रेमचंद  दिवस।


एस.अनंतकृष्णन , चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक।

 हिंदी साहित्य संस्थान लखनऊ उत्तर प्रदेश द्वारा सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक अनुवादक। हिंदी प्रचारक।

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मुंशी प्रेमचंद हिन्दी कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में सम्राट है। 

 उनकी कहानियाँ और उपन्यास 

सदा हर युग के अनुकूल  

  चिर स्मरणीय और अनुकरणीय हैं।

 उनकी कहानियों के उद्धरण 

 सदा स्मरणीय और प्रेरणादायक हैं।

1.दौलत से आदमी को जो इज्ज़त मिलती है,

वह उसकी नहीं, उसकी दौलत की इज्ज़त होती है।

 2. जीवन --खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है, जीवन नाम है आगे बढ़ते रहने की लगन का।

3.न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती है नचाती हैं।

4.सुंदरता मन की चीज़ है,तन की नहीं।

5.चली हुई बात और सीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता।

6. जो अपने घर में ही सुधार न कर सका हो,उसका दूसरों को सुधारने की चेष्टा करना बड़ी भारी धूर्तता है।

7.क्रोध अत्यंत कठोर  होता है, वह देखना चाहता है कि मेरा वाक्य निशाने पर बैठता है या नहीं, वह मौन को सहन नहीं कर सकता।

8.अपमान को निगल जाना चरित्र पतन की अंतिम सीमा है।

9.स्पष्टवादिता मनुष्य का एक उच्च गुण है।


10.माता का हृदय  दया का आगार है। उसे जलाओ तो उसमें दया की ही सुगंध निकलती है,

पीसो तो दया का ही रस निकलता है। वह देवी है, विपत्ति की क्रूर लीलाएँ  भी उस स्वच्छ निर्मल स्रोत को मलिन नहीं कर सकती।


 


 

 

 


Sunday, August 2, 2026

नियती का खेल

 नियति का खेल

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 


नियती का खेल।

 भाग्य चक्र

 विधि की विडंबना 

सोचो समझो जानो जागो

कर्म फल की देन।

 सुविचार बदविचार 

 किसका कसर?

परिणाम निम्न चिंतन:-

नमस्ते वणक्कम्।

 मानव क्या बुद्धिमान हैं?

क्या मानव में सहज क्रिया है?

 मानव सुखी क्यों?

मानव दुखी क्यों?

एक ही राजा रानी के पुत्रों में 

एक वीर,एक कायर क्यों?

अमीर के परिवार में जन्म क्यों?

अमीर के यहाँ असाध्य रोगी क्यों?

खानदान का उत्थान पतन क्यों?

एक ही गुरु के शिष्यों में 

प्रतिभाशाली और मंद बुद्धि हम क्योँ?

 डाक्टरों में भेदभाव क्यों?

 अध्यापक में अच्छे  शिक्षक क्यों?

 आध्यात्मिक क्षेत्रों में ढोंगी पाखंडी हम क्यों?

पतिव्रता भद्र महिला 

वीरांगना  क्यों?

विषकन्या  वारांगना क्यों?

सत्यवान क्यों?

 असत्यवान क्यों?

दादू निर्दयी, त्यागी भोगी क्यों?

 सोचो समझो

 मानव केवल कठपुतली है।

स्वार्थ कृपन देश द्रोही क्यों?

 न्याय अन्याय क्यों?

 खूँख्वारादमखोर बाघ क्यों? 

हिरन क्यों?

बलवान हाथी पालतू जानवर

मानव की कठपुतली क्यों?

मकड़ी का जाल क्यों?

उसमें फँसकर आहार 

बननेवाला कीड़ा क्यों?

 अंतिम निष्कर्ष यही

 सबहीं नचावत राम गोसाईं!

 जानो समझो जागो जगाओ

 एकांत ध्यान में 

 अपने को सुधारो!

जनकल्याणकारी कामों में लगो।

आज का तेरे नाम ,पद, धन

  मृत्यु के बाद बेकार ही।

 भूल जाने में न देरी।

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   एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।