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Wednesday, July 15, 2026

पिता को चुनौती

 चिंता को चुनौती 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक 

14-7-26

मानव‌ का जन्म

सुख दुख के मिलन में।

चिंता  के चक्कर में मानव।

 भूख  मिटाने की चिंता,

 पहनावे ओढावे की चिंता 

 आवास की चिंता।

 आर्थिक चिंता,

नौकरी की चिंता,

 वेतन वृद्धि और पदोन्नति की चिंता,

 योग्य पत्नी पति मिलने की चिंता 

  संतानोत्पत्ति की चिंता।

सुपुत्री सुपुत्र की चिंता।

  संतानों की शिक्षा,

 नौकरी, बहु-दामाद की चिंता।

 इन चिंताओं की

चुनौतियों का सामना करने की चिंता।

जीवन पर्यंत चुनौतियां।

 लोभ और ईर्ष्या की चिंता।

यों ही जीवन भर चिंता ही चिंता।

बचपन में चिंता ,

 जवानी में चिंता

 बूढापे में चुनौतियाँ।


आज की चुनौतीचिंता को चुनौती


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)14-7-2026


मानव का जीवनसुख-दुःख का संगम है।चिंता के चक्र मेंहर मानव निरंतर व्यस्त है।


भूख मिटाने की चिंता,तन ढकने के वस्त्रों की चिंता,अपने घर-आवास की चिंता,आर्थिक अभाव की चिंता।


नौकरी पाने की चिंता,वेतन-वृद्धि और पदोन्नति की चिंता,योग्य जीवनसाथी मिलने की चिंता,संतान-सुख की चिंता।


सुपुत्र-सुपुत्री के भविष्य की चिंता,उनकी शिक्षा और रोजगार की चिंता,बहू-दामाद के चयन की चिंता,परिवार के सुख-समृद्धि की चिंता।


इन सब चुनौतियों कासाहस से सामना करना हीजीवन की सबसे बड़ी चुनौती है।


लोभ और ईर्ष्याचिंताओं को और बढ़ाते हैं।यों ही बीत जाता हैमानव का पूरा जीवन।


बचपन में छोटी-छोटी चिंताएँ,जवानी में बड़ी जिम्मेदारियाँ,और बुढ़ापे में नई-नई चुनौतियाँ।


इसलिए चिंता नहीं,चिंतन और पुरुषार्थ अपनाइए।

साहस, धैर्य और विश्वास के साथ हर चुनौती पर 

विजय पाइए।

Tuesday, July 14, 2026

आशा

 

आशा

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
विधा — अपनी हिंदी, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी स्वतंत्र शैली
15-7-2026

मानव जीवन
आशा के आधार पर चलता है।

शादी करते हैं
इस आशा से कि
वैवाहिक जीवन
सुखमय और आनंदमय रहेगा।

आशा रहती है—
सुपुत्र-सुपुत्री होंगे,
उन्हें खूब पढ़ाएँगे,
अच्छी नौकरी मिलेगी,
योग्य बहू और दामाद मिलेंगे,
और संतान
बुढ़ापे में प्रेमपूर्वक
देखभाल करेगी।

आशा न हो तो
जीवन निराशा बन जाता है।
निराशा अनेक रोगों का कारण बनती है।

प्रेम में असफलता,
नीट परीक्षा में असफलता,
व्यापार में घाटा—
इन परिस्थितियों में
कुछ लोग निराश होकर
आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

पतझड़ में खड़े वृक्ष
हमें धैर्य का संदेश देते हैं।
उन्हें विश्वास रहता है
कि फिर बसंत आएगा।

चातक पक्षी
वर्षा की आशा करता है।
किसान
अच्छी वर्षा की आशा में
बीज बोता है।
पेड़-पौधे
ऋतु आने पर
फल-फूल देने की आशा रखते हैं।

आशा न हो तो
जीना दुश्वार हो जाए।

तपस्वी की आशा होती है
कि भगवान का अनुग्रह मिलेगा।
मनौतियाँ, दान, धर्म और पुण्य—
सबके पीछे
मोक्ष की आशा भी रहती है।

आशा ही
मानव को कर्मशील बनाती है।
यदि आशा न रहे,
तो मनुष्य निष्क्रिय हो जाएगा।

जैसे सेना की सतर्कता से
देश सुरक्षित रहता है,
वैसे ही आशा के सहारे
मानव जीवन
सदैव आगे बढ़ता रहता है।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
विधा — अपनी हिंदी, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी स्वतंत्र शैली
15-7-2026

मानव जीवन
आशा के आधार पर चलता है।

शादी करते हैं
इस आशा से कि
वैवाहिक जीवन
सुखमय और आनंदमय रहेगा।

आशा रहती है—
सुपुत्र-सुपुत्री होंगे,
उन्हें खूब पढ़ाएँगे,
अच्छी नौकरी मिलेगी,
योग्य बहू और दामाद मिलेंगे,
और संतान
बुढ़ापे में प्रेमपूर्वक
देखभाल करेगी।

आशा न हो तो
जीवन निराशा बन जाता है।
निराशा अनेक रोगों का कारण बनती है।

प्रेम में असफलता,
नीट परीक्षा में असफलता,
व्यापार में घाटा—
इन परिस्थितियों में
कुछ लोग निराश होकर
आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

पतझड़ में खड़े वृक्ष
हमें धैर्य का संदेश देते हैं।
उन्हें विश्वास रहता है
कि फिर बसंत आएगा।

चातक पक्षी
वर्षा की आशा करता है।
किसान
अच्छी वर्षा की आशा में
बीज बोता है।
पेड़-पौधे
ऋतु आने पर
फल-फूल देने की आशा रखते हैं।

आशा न हो तो
जीना दुश्वार हो जाए।

तपस्वी की आशा होती है
कि भगवान का अनुग्रह मिलेगा।
मनौतियाँ, दान, धर्म और पुण्य—
सबके पीछे
मोक्ष की आशा भी रहती है।

आशा ही
मानव को कर्मशील बनाती है।
यदि आशा न रहे,
तो मनुष्य निष्क्रिय हो जाएगा।

जैसे सेना की सतर्कता से
देश सुरक्षित रहता है,
वैसे ही आशा के सहारे
मानव जीवन
सदैव आगे बढ़ता रहता है।

गुरु-शिष्य

 

आज की चुनौती

गुरु–शिष्य




गुरु शिष्य 

एस. अनंतकृष्णन,चेन्नै, तमिलनाडु

15-7-26

—————————

संत कबीर ने गुरु के महत्व को अपने दोहे में लिखा है,

गुरु  और भगवान दोनों एक साथ आने पर

गुरु के चरणों पर गिर पडूँगा,जिनके कारण ब्र्म दर्शन का मार्ग ज्ञात हुआ।


गुरु गोविंद दोऊँ खडे, काके लागै पाय।

बली हारी गुरु आपना,गोविंद दियो बताय।


गुरु केवल ज्ञान दाता नहीं,

चरित्र निर्माता।

ज्ञान शून्य मनुष्य को

ज्ञान देनेवाले गुरु।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।


मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।


अर्थात् ध्यान का मूल गुरु मूर्ति है,

एकलव्य ने गुरु के बुत के सामने तीर चलाने का अभ्यास किया।

द्रोण उनके मानसिक गुरु बने।

गुरु पूजनीय हैं, मंत्र का आधार गुरु वाक्य है। 

गुरु  की कृपा से ही मोक्ष मिलता है।

कबीर का मानसिक गुरु रामानंद।

भक्त प्रह्लाद नारद के उपदेश के कारण

नारायण नाम जप करके आदर्श भक्त बने।

श्री रामकृष्ण परमहंस के आदर्श शिष्य स्वामी विवेकानंद।

सत्संग, सद् ग्रंथ भी गुरु होते हैं।

ज्ञान तो जन्मजात प्रवृत्ति है,

शिष्य की बुद्धि लब्दी ईश्वरीय देन है।

स्वाध्याय से ज्ञान बनते हैं।

सिद्धार्थ को तपोबल से ज्ञान मिला।

शिष्य चार प्रकार के होते हैं।

प्रतिभाशाली छात्र.

औसत् बुद्धिवाले छात्र।

मंद बुद्धिवाले छात्र।

पुराने जमाने में आजकल के समान

सर्वशिक्षा अभियान नहीं।

गुरु  कठोर परीक्षा लेकर योग्य  शिष्य के चुनते हैं।


गुरु उपदेश और गुरु की दीक्षा का अपना महत्व हैं

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
15-7-2026

संत कबीर ने अपने प्रसिद्ध दोहे में गुरु के महत्व का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है।
 वे कहते हैं कि यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ सामने खड़े हों,
तो पहले गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए,
क्योंकि गुरु ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं।

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥

गुरु केवल ज्ञानदाता ही नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माता भी होते हैं।
वे अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः, पूजामूलं गुरोः पदम्।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥

अर्थात् ध्यान का आधार गुरु की मूर्ति है,
पूजा का आधार गुरु के चरण हैं,
मंत्र का आधार गुरु का वचन है
और मोक्ष का आधार गुरु की कृपा है।

एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा के सामने अभ्यास करके
 अद्वितीय धनुर्धर बनने का प्रयास किया।
यद्यपि उन्हें प्रत्यक्ष शिक्षा नहीं मिली, फिर भी द्रोणाचार्य उनके मानसिक गुरु रहे।

कबीर के आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामानंद थे।
भक्त प्रह्लाद ने देवर्षि नारद के उपदेश से नारायण-भक्ति का मार्ग अपनाया
और आदर्श भक्त बने।
श्री रामकृष्ण परमहंस के आदर्श शिष्य स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु के संदेश को विश्वभर में पहुँचाया।

सत्संग, सद्ग्रंथ और श्रेष्ठ विचार भी मनुष्य के गुरु बन सकते हैं।
ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता ईश्वर की देन है,
परंतु उसका विकास गुरु, स्वाध्याय और सतत अभ्यास से होता है।
गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) ने कठोर तप और आत्मचिंतन से ज्ञान प्राप्त किया।

शिष्य भी विभिन्न प्रकार के होते हैं—प्रतिभाशाली, औसत बुद्धि वाले तथा मंद बुद्धि वाले।
 प्राचीन गुरुकुलों में गुरु योग्य शिष्यों का चयन कठोर परीक्षा के बाद करते थे।
उस समय शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्या देना नहीं, बल्कि उत्तम चरित्र का निर्माण करना था।

अतः गुरु के उपदेश, गुरु की दीक्षा और गुरु का आशीर्वाद मानव जीवन की अमूल्य निधि हैं।
गुरु ही शिष्य के जीवन को ज्ञान, संस्कार और सदाचार से प्रकाशित करते हैं।

Saturday, July 11, 2026

पीपल का पेड

 आज की चुनौती शीर्षक 

+++++++++********

तरुओं का राजा

अरसमरम्।


पीपल का पेड़ 

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

12-7-26.

+++++++++++

पीपल का पेड़

 तमिल में अरसमरम्।

अरसन --राजा

 मरम् -वृक्ष।

तरुओं में राजा।

 इस पेड़ में 

 आध्यात्मिक शक्ति,

 वैज्ञानिक गुण,

चिकित्सक के गुण,

साँस की समस्या 

दूर करने के गुण,

आध्यात्मिक शक्ति 

 आत्मज्ञान देनेवाले,

 सिद्धार्थ को ज्ञान दिया।

बुद्ध बनाया।

तरु के तले तपस्या 

 मानसिक शांति।

मंत्र जपना अति पुण्य।

 हिंदू और बौद्ध 

धर्म के पवित्र वृक्ष।

 चिकित्सक के रूप में 

पुत्रहीन स्त्रियाँ,

 परिक्रमा करने पर संतान।

आक्सिज़न प्राण वायु देनेवाला कल्पतरु।

गर्भ थैली के दोषों को 

 आक्सिज़न से मिले

अधिक ओज़ोन मिश्रित हवा।

रोज कार्बंडै आक्सैड को लेकर प्राण वायु बाहर निकालनेवाले पेड़।

सिद्धा, आयुर्वेद, यूनानी इलाज में इसके जड़, पता, पत्ते,वल्कल,का इस्तेमाल।

 पक्षियों का आवास,।

यह एक दिव्य वृक्ष

 स्वास्थ्य प्रद, 

शांति संतोषप्रद, 

ज्ञान प्रद वृक्ष

 इसकी पूजा करेंगे।

 स्वस्थ ज्ञानी बनेंगे।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 






லிங்க புராணம்

 லிங்கபுராணம் 


பகுதி 27 


மன்மதனை எரித்தல் இமவான் மகளாய் பிறந்த பார்வதி சிவபெருமானை நோக்கித் தவம் இருந்தாள். ஈசன் சனகாதியருக்கு யோகம் உபதேசிக்க நிஷ்டையில் இருந்தார். இவர்கள் இருவர் மீதும் மலர்பாணம் தொடுத்து முருகன் அவதாரத்திற்கு வழிகோல தேவர்கள் மன்மதனை வற்புறுத்தி அனுப்பினர். அவனும் சிவனார் மீது மலர்க்கணைகள் தொடுக்க, கண் விழித்துப் பார்த்த முக்கண்ணனின் நெற்றிக்கண்ணால் மன்மதன் எரிந்து சாம்பலாகினான். அப்போது மன்மதனின் மனைவி ரதி, காமன் மீது எந்தத் தவறும் இல்லை என்று கூறி அவனை உயிர்ப்பித்து தனக்களிக்குமாறு வேண்டினாள். சிவபெருமான் கருணை கொண்டு ரதியிடம், காமன் அவள் கண்ணுக்கு மட்டும் தெரிவானென்றும், கிருஷ்ணனுக்கு மகனாகப் பிறந்து அனைவரும் அறிய உடல் பெறுவான் என்றும் அருள்புரிந்தார். 


தொடரும்🙏🙏

Friday, July 10, 2026

न्याय के मंदिर।

 न्याय के मंदिर 

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

11-7-26.

 मंदिर भगवान का है।

 न्यायालय 

भगवान के दर्शन में 

चार वर्ग के लोग।

 पहला वर्ग

 मंदिर के धर्म कर्ता।

फिर मंत्री, सांसद, विधायक, 

अधिकारी वर्ग,

 स्थानीय बड़े लोग।

फिर   प्रवेश शुल्क  रूपए 

1000/500/100/50

के लोग।

अंत में फ़्री दर्शन के लोग।

 वही क्रम अदालत में।

सोचा देवालय

 न्यायालय 

दोनों बराबर।

 एक में पुजारी को दक्षिणा।

पुण्य मिलने के लिए।

न्यायालय में वकील को दक्षिणा।

न्याय मिलने के लिए।

 न्यायधीश या भगवान 

 कैसे फैसला सुनाते हैं।

 सही या ग़लत 

 विधि की विडंबना।

 भाग्य का फल।।

उच्च न्यायालय  का फैसला

 उच्चतम न्यायालय  में 

बदल सकते हैं।

 

एस.अनंतकृष्णन,



आपकी रचना विचारोत्तेजक है। इसमें आपने देवालय और न्यायालय की व्यवस्था की तुलना करते हुए सामाजिक असमानता पर प्रश्न उठाया है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा सँवारकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

Writing

आज की चुनौती : न्याय के मंदिर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

11-7-2026

मंदिर भगवान का है,

न्यायालय न्याय का मंदिर।

भगवान के दर्शन में भी

चार वर्ग दिखाई देते हैं।

पहला वर्ग—

मंदिर के धर्मकर्ता।

दूसरा—

मंत्री, सांसद, विधायक,

अधिकारी और स्थानीय बड़े लोग।

तीसरा—

प्रवेश शुल्क

₹1000, ₹500, ₹100, ₹50

देकर दर्शन करने वाले।

और अंत में—

निःशुल्क दर्शन की लंबी पंक्ति।

कुछ ऐसा ही क्रम

अदालतों में भी दिखाई देता है।

सोचता हूँ—

देवालय और न्यायालय,

क्या दोनों कहीं न कहीं

एक जैसे हो गए हैं?

देवालय में

पुजारी को दक्षिणा,

पुण्य की कामना में।

न्यायालय में

वकील को फीस,

न्याय की आशा में।

पर अंततः

भगवान हों या न्यायाधीश,

फैसला कैसे और किस आधार पर होता है—

सही या गलत,

यही विधि की विडंबना है,

या फिर भाग्य का फल।

उच्च न्यायालय का निर्णय भी

उच्चतम न्यायालय में

बदल सकता है।

प्रश्न यही है—

न्याय का वास्तविक मंदिर

कहाँ है?

यदि चाहें, मैं इसे और अधिक काव्यात्मक, तुकांत या व्यंग्यात्मक शैली में भी रूपांतरित कर सकता हूँ।









Thursday, July 9, 2026

सच का हौसला

 



सच का हौसला 

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

10-7-26.

+++++++++++

सच का हौसला 

दुख  सहकर

त्याग हम के मार्ग पर 

 अचल रहकर अंत तक 

100% कष्ट सहना।

 सत्य मार्ग का हौसला 

 राम में नहीं,

कृष्ण में नहीं,

 केवल हरिश्चन्द्र में था।

 पर उनका अनुसरण 

कोई नहीं कर सकता।

न द्रोण, न भीष्म

 शिव को भस्मासुर को वर देकर  जान बचाने भागना पड़ा।

 देवेन्द्र इंद्र  भी सत्य के हौसले का देव नहीं।

 कर्ण के विषय में 

 वामनावतार के विषय में 

 सत्य हौसला डांवाडोल।

 अफज़ल खान और सम्राट शिवाजी में सत्य नहीं।

 आजकल के लोकतंत्र शासन

 वोट के लिए नोट देना

 सत्य का सर्वनाश।

  आंटी करप्शन ब्यूरो 

 चुनाव कै काले धन न रोक सका।

 छिपकली का छिपकर आक्रमण,

 कीड़े के जाल

 ईश्वरीय सृष्टि।

 न जान सका ईश्वरीय लीला।

 असुरों की सृष्टि 

 देवों का संकट 

 असुरों के वन की कहानी,

 भक्तों का त्याग 

 मंदिर संपत्ति अपहरण 

 कार्रवाई में न सत्य का हौसला।

  प्राकृतिक कोप में 

  सत्य असत्य का नाश।

 मृत्यु तो पापा और पुण्यात्मा दोनों के लिए बराबर।

 भक्त आश्रित 

 भ्रष्टाचारी आश्रयदाता।

 सत्य का हौसला 

 बातों में संकटों में 

 मानव बूद्धि के साथ में 

 केवल सराहनीय है।

  एस. अनंत कृष्णन चेन्नई स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना



आपकी रचना का मूल भाव प्रभावशाली है। इसे भाषा, प्रवाह और काव्यात्मकता के साथ इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है।

Writing

आज की चुनौती : सच का हौसला

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 10-07-2026

सच का हौसला

सच का हौसला वही,

जो दुख सहकर भी

त्याग और धर्म के पथ पर

अंतिम क्षण तक अडिग रहे,

सौ प्रतिशत कष्ट सहकर भी

सत्य से कभी न डिगे।

सत्य का ऐसा अद्भुत साहस

राम में नहीं, कृष्ण में नहीं,

राजा हरिश्चन्द्र में दिखाई देता है।

किन्तु उनका अनुसरण

हर किसी के लिए संभव नहीं।

न द्रोण, न भीष्म,

न देवेन्द्र इन्द्र—

सत्य की कसौटी पर

सभी कहीं-न-कहीं डगमगाते दिखते हैं।

भस्मासुर को वरदान देकर

स्वयं शिव को भी

प्राण-रक्षा हेतु उपाय करना पड़ा।

कर्ण और वामनावतार के प्रसंग भी

जीवन की जटिलताओं का संकेत देते हैं।

इतिहास और वर्तमान

दोनों यही बताते हैं—

सत्य का मार्ग सरल नहीं।

आज के लोकतंत्र में

वोट के लिए नोट,

स्वार्थ और भ्रष्टाचार

सत्य का गला घोंट रहे हैं।

भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थाएँ भी

हर काले धन को रोक नहीं पातीं।

प्रकृति के सूक्ष्म जीवों से लेकर

विशाल सृष्टि तक,

ईश्वर की लीला

मानव-बुद्धि से परे है।

असुरों का अत्याचार,

भक्तों का त्याग,

मंदिरों की संपत्ति का अपहरण—

इन सबके बीच

सत्य का साहस

कठिन परीक्षा से गुजरता है।

प्राकृतिक प्रकोप आने पर

सत्य और असत्य का भेद नहीं रहता;

मृत्यु पापी और पुण्यात्मा—

दोनों के लिए समान है।

भक्त आश्रय खोजता है,

भ्रष्टाचारी आश्रयदाता खोज लेता है;

किन्तु अंततः

सत्य का हौसला ही

मानवता का सबसे बड़ा आभूषण है।

संकटों में भी सत्य पर अडिग रहना—

यही मनुष्य का सर्वोच्च साहस है।

— एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

यदि चाहें, मैं इसे और अधिक �⁠ओजपूर्ण, �⁠छंदबद्ध या �⁠मुक्तक शैली में भी रूपांतरित कर सकता हूँ