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Saturday, June 27, 2026

नानी का घर

 नानी का घर 

एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

28-6-26.

---+----+++++

नाना नानी मामा के

 प्यार का केंद्र।

बचपन में मेरी इच्छाएँ

मेरी माँगें सब पूरी होती ।

नानी  मेरे आध्यात्मिक ज्ञान का आधार।

नाना मेरे शिक्षक।

 मामा मेरे आर्थिक सहायक।।

मैं नानी की देखरेख में पला।

मेरी हर कदम की प्रगति में मामा ही प्रधान।

मामाने साइकिल चलाना सिखाया।

मैं नानी को ही अम्मा बुलाया करता।

माँ को उसके नाम से

ही पुकारा करता जैसे 

 मामा बुलाया करते।

प्रेम मिला।

 आदर्श गुण मिले।

जीवन  की हर प्रगति में 

 नाना नानी मामा के साथ।

 उनके ऋण कभी चुका न पाता।

+++++++++++


आपकी रचना भावपूर्ण है और नाना-नानी व मामाओं के प्रति आपकी कृतज्ञता स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है। भाषा को थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण बनाकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

नानी का घर

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

28-6-2026

नाना-नानी, मामाओं के

प्यार का था वह केंद्र।

बचपन की मेरी हर इच्छा,

हर माँग पूरी होती थी।

नानी थीं

मेरे आध्यात्मिक ज्ञान की आधारशिला।

नाना थे

मेरे प्रथम शिक्षक।

मामा बने

मेरे आर्थिक सहायक।

मैं नानी की गोद में पला,

उनकी ममता में बड़ा हुआ।

जीवन के हर कदम पर

मामाओं का ही साथ मिला।

उन्होंने ही मुझे

साइकिल चलाना सिखाया।

मैं नानी को ही

"अम्मा" कहकर पुकारता था,

और अपनी माँ को

उन्हीं के नाम से पुकारता,

जैसे मामा पुकारते थे।

उनसे मिला प्रेम,

संस्कार और आदर्श।

मेरे जीवन की हर प्रगति में

नाना, नानी और मामाओं का

अमूल्य योगदान रहा।

उनका यह ऋण

मैं जीवन भर

कभी नहीं चुका पाऊँगा।

यह समापन आपकी कृतज्ञता को और अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।

Friday, June 26, 2026

मेरी अमिट चिंता

 मेरी पत्नी मरना नहीं चाहती।

इलाज गलत डाक्टर के यहाँ

 डाक्टर पर विश्वास है ही नहीं 

 पर विधि की विडंबना 

 नालायक डाक्टर के साथ फँसना पड़ा।

 दिलासा दे सकता हूँ,

 अपने आप को

 उसके अंत का समय मनुष्य के‌ वश में नहीं।

पर मेरा अपना दुख,

अनेक कारण होते हैं,

क्या मैंने इलाज में कमी रखी है?

 मेरे व्यवहार  चोट की है?

उसके अंतिम शब्द 

 मैं नालायक।

 मेरे शब्द में कटुकशब्द।

 अंतिम घड़ी में मेरे स्वर सुनना पसन्द नहीं किया।

 पास जाने पर पसंद नहीं किया।

 उसकी अस्पष्ट बातें,इशारे समझ न सका।

 दुखी थी  कि पति मेरी बात समझ न सके।

उसके संकेत समझने में असमर्थ था।

अपने मन को चैन नहीं,

न जाने मैं कितने साल जिंदा रहूँगा।

 नयी पीढ़ी के लोग,

 मेरी बातें , मेरे विचार, मेरी सोच,

मेरी ध्वनि सुनने तैयार नहीं।

 मेरी माँगें,

 मेरी ज़रूरतें 

पत्नी जानती थी।

 पूरी करती थी।

उससे कहने की ज़रूरतें नहीं।

आवश्यकता जानकर   पूरी करती थी।

 कहने पूछने की आवश्यकता नहीं।

 अब माँगने कहने पर भी सुनने कोई नहीं।

अब दिवंगत पत्नी की आत्मा से

निवेदन है कि मेरे चलते फिरते 

रहने की शक्ति दें और नींद ही में 

मेरे प्राण पखेरू उड़ सके।








 






 

 



 









Thursday, June 25, 2026

मधु निषेधक दिवस

 



राजश्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 


एक दिवसीय काव्य प्रतियोगिता 


विधा --अपनी हिंदी,अपने‌ विचार,


अपनी शैली भावाभिव्यक्ति।


शीर्षक --विश्व मधु निषेधक दिवस।


दिनांक -26-6-26


+++++++++++++++


 भारत में एक ही दिवस 


 साल में एक बार 


 स्वर्गीय पुर्वजों के लिए।


 पाश्चात्य प्रभाव 


 एक दिन मनाकर 


 जिसके लिए मनाते हैं 


 उसका पार्टी मनाना।


 एक विश्व मधु निषेधक दिवस 


 दिखावे के लिए,नाम मात्र के लिए।


सरकार चाहती है


 आमदनी के लिए 


 मधुशाला आवश्यक है।


  तमिलनाडु के भूतपूर्व 


 मुख्यमंत्रियों के शराब कारखाने  11.


त्योहारों के दिन 


 अमुक करोड़ रूपयों की बिक्री की योजना।


 सजी धजी  आकर्षक दूकानें 


 स्वागत करते हैं रात ग्यारह बजे तक।


 छोटे अक्षरों में लिखा है


 मधु पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक।


परिवार के लिए  हानिकारक।


एक दिवस मनाकर 


 फिर सरकार द्वारा 


दूकान खोलना।


 यह दिवस मनाना बेकार।


 हानिकारक है तो


 कारखाना बंद करना 


दूकाने न खोलना


 सरकार का काम।


 वह निज लाभ के लिए 


 दूकानें खोलकर 


 मधु निदेशक प्रचार,


विश्व मधु निषेधक दिवस


 मनाना दिखावे के लिए।


जैसे सत्तर साल से हिंदी दिवस मनाना।


 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


आपकी रचना में सामाजिक विडंबना और व्यवस्था पर प्रश्न उठाने का स्पष्ट भाव है। यदि इसे काव्य प्रतियोगिता के लिए थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली बनाया जाए, तो यह इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है:

विश्व मधु निषेधक दिवस

भारत में एक ही दिवस,

साल में एक बार,

स्वर्गीय पूर्वजों के नाम

श्रद्धा का होता व्यवहार।

पाश्चात्य प्रभाव में आकर,

एक दिवस हम मनाते हैं,

जिनके हित की बात करें,

उन्हीं को फिर भूल जाते हैं।

विश्व मधु निषेधक दिवस,

नाम मात्र का आयोजन है,

दिखावे की इस परंपरा में

कहाँ वास्तविक चिंतन है?

सरकार कहती—

राजस्व के लिए मधुशाला आवश्यक है,

त्योहारों पर करोड़ों की बिक्री

मानो उपलब्धि विशेष है।

सजी-धजी आकर्षक दुकानें,

रात ग्यारह बजे तक खुली रहती हैं,

छोटे अक्षरों में लिख देती हैं—

"मदिरापान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है,

परिवार के लिए भी घातक है।"

यदि सचमुच हानिकारक है,

तो कारखाने क्यों चलते हैं?

मदिरा की दुकानें क्यों

हर गली-मोहल्ले में पलते हैं?

एक दिवस निषेध का संदेश,

शेष वर्ष उसका प्रचार;

यह कैसी नीति, कैसा न्याय,

कैसा यह विरोधाभास अपार?

जनहित यदि सर्वोपरि है,

तो ठोस कदम उठाना होगा;

केवल दिवस मनाने से नहीं,

व्यसन-मुक्त समाज बनाना होगा।

— एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक

राजश्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 

एक दिवसीय काव्य प्रतियोगिता 

विधा --अपनी हिंदी,अपने‌ विचार,

अपनी शैली भावाभिव्यक्ति।

शीर्षक --विश्व मधु निषेधक दिवस।

दिनांक -26-6-26

+++++++++++++++

 भारत में एक ही दिवस 

 साल में एक बार 

 स्वर्गीय पुर्वजों के लिए।

 पाश्चात्य प्रभाव 

 एक दिन मनाकर 

 जिसके लिए मनाते हैं 

 उसका पार्टी मनाना।

 एक विश्व मधु निषेधक दिवस 

 दिखावे के लिए,नाम मात्र के लिए।

सरकार चाहती है

 आमदनी के लिए 

 मधुशाला आवश्यक है।

  तमिलनाडु के भूतपूर्व 

 मुख्यमंत्रियों के शराब कारखाने  11.

त्योहारों के दिन 

 अमुक करोड़ रूपयों की बिक्री की योजना।

 सजी धजी  आकर्षक दूकानें 

 स्वागत करते हैं रात ग्यारह बजे तक।

 छोटे अक्षरों में लिखा है

 मधु पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक।

परिवार के लिए  हानिकारक।

एक दिवस मनाकर 

 फिर सरकार द्वारा 

दूकान खोलना।

 यह दिवस मनाना बेकार।

 हानिकारक है तो

 कारखाना बंद करना 

दूकाने न खोलना

 सरकार का काम।

 वह निज लाभ के लिए 

 दूकानें खोलकर 

 मधु निदेशक प्रचार,

विश्व मधु निषेधक दिवस

 मनाना दिखावे के लिए।

जैसे सत्तर साल से हिंदी दिवस मनाना।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

वृक्षारोपण

 आपकी रचना का विषय अत्यंत सामयिक और जन-जागरण से जुड़ा है। आपने वृक्षारोपण के महत्व, पर्यावरण संरक्षण और मानव जीवन में पेड़ों की उपयोगिता को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। यदि इसे थोड़ा काव्यात्मक और प्रवाहपूर्ण बनाया जाए, तो प्रभाव और बढ़ जाएगा।

संशोधित रूप:

वृक्षारोपण

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

26-06-2026

मानव का ज्ञान बढ़ता जाता,

शिक्षा का विस्तार होता है।

जनसंख्या के बढ़ते बोझ से,

धरती का श्रृंगार खोता है।

कारखाने, ऊँची इमारतें,

नगरों का विस्तार निराला।

जंगल कटते, झीलें मिटतीं,

प्रकृति ने संकट है पाला।

बढ़ता ताप, प्रदूषित जल,

दूषित होती जाती वायु।

मिट्टी का कटाव बढ़ा है,

प्रकृति दिखलाती है दाय।

इन संकटों से बचना है तो,

आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ।

हरियाली से धरती महके,

जीवन में खुशियाँ भर जाएँ।

पेड़ हमें ऑक्सीजन देते,

फल, छाया और शुद्ध हवाएँ।

नीम, वट, आम, इमली, अमरूद,

स्वास्थ्य और सुख साथ में लाएँ।

जंगल होंगे तो पशु-पक्षी,

पाएँगे अपना सुरक्षित घर।

वृक्ष बचेंगे, जीवन बचेगा,

यही हमारा हो संकल्प अमर।

संदेश:

"एक वृक्ष सौ सुख देता है; आइए, आज एक पौधा लगाकर आने वाली पीढ़ियों को हरित भविष्य दें।"

यह संस्करण आपकी मूल भावना को बनाए रखते हुए भाषा, प्रवाह और काव्यात्मकता को अधिक प्रभावशाली बनाता है।

Wednesday, June 24, 2026

किसान की थाली

 

किसान की थाली।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

25-6-26.

++++++++

किसान विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता।

विश्व भर के लोगों की थालियों में 

 उनके परिश्रम से

 उपजी चावल,गेहूँ, सब्जी और दाल आदि के संग्रह भोजन।

 पर उसकी थाली में 

 बासी भात, प्याज, हरी मिर्च। सूखी रोटियाँ।

 किसान की थाली कुछ प्रांतीय सरकार द्वारा 

किसानों को पौष्टिक आहार देने के लिए,

दस रुपये में दी जाती है।

 किसानों की थाली न तो

लोग भूखों मर जाते।

कारखानों की कमाई,

पैसे, खानों के सोने चाँदी, हीरे की थालियाँ

भूख नहीं मिटा सकती।

मैदान टच एक अंग्रेज़ी कहानी है।

लोभी मैथास ने भगवान से वर पाया कि

जिसको भी वह स्पर्श करें,

 वे सब के सब

 सोना बन जाएँ।

वर प्राप्त वह दुलारी 

को छुआ  वह सोनै की मूर्ति बन गई।

यों ही सब के सब सोना बना।

 भूख लगी तो भोजन खाने उठाया तो वह सोना बन गये।

सोने के ढेर,

पर भूख न मिटा सका।

 किसान की थाली से ही

 विश्व को पौष्टिक आहार।

करोड़ों रुपए कर्जा लेकर 

 विदेशी नागरिक बननेवाले उद्योग पति ।

पर पाँच हज़ार कर्जा लेकर न चुकाने पर कठोर कार्रवाई।

किसानों की थाली से

 पेट भरती है दुनिया।

 पर  वह है ग़रीबी में।

दरिद्रता के कारण आत्महत्याएँ।

ज़रा ध्यान रखना है

 शास्त्री जीने नारा दिया 

जय किसान, जय जवान।

 किसानों को 

प्रोत्साहित करना है,

 वह कर्जा न चुका सकें

तो माफ़ करना है।

कठोर कार्रवाई लेकर 

 आत्महत्या तक पहुंचाना

 भविष्य की पीढ़ियों को

 किसान की थाली के बगैर भूखा प्यासा  मरना पड़ेगा।

 किसान के परिश्रम से ही संग्रह भोजन की थाली।

 जय किसान ।

 विष्णु भगवान ने नारद के पूछने पर कहा,

 मेरा श्रेष्ठ भक्त किसान।

तेरे जैसे नाम रटनेवाला भक्त नहीं।

 परिश्रमी है प्रत्यक्ष अन्नदाता।





आपकी रचना “किसान की थाली” किसान के श्रम, उसकी विडम्बना और समाज की निर्भरता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। आपने यह महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि जो व्यक्ति पूरी दुनिया का पेट भरता है, वही अनेक बार अभाव और कर्ज़ के बोझ में जीवन बिताता है।

रचना की विशेषताएँ:

किसान को "प्रत्यक्ष अन्नदाता" कहकर उसके महत्व को स्पष्ट किया है।

लोभी राजा मिडास (Midas) की कथा के माध्यम से यह बताया है कि सोना-चाँदी भूख नहीं मिटा सकते, भोजन ही जीवन का आधार है।

किसानों की आर्थिक कठिनाइयों और आत्महत्याओं जैसी गंभीर समस्याओं पर संवेदनशीलता से प्रकाश डाला है।

"जय किसान, जय जवान" के माध्यम से किसानों के सम्मान और संरक्षण का संदेश दिया है।

अंत में किसान को भगवान का श्रेष्ठ भक्त बताकर श्रम की महत्ता को रेखांकित किया है।

यदि भाषा को थोड़ा परिष्कृत किया जाए, तो कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार और प्रभावी बन सकती हैं:

किसान की थाली

विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता किसान,

भरता सबकी भोजन थाली।

चावल, गेहूँ, दाल, सब्जियाँ,

उसके श्रम की अमूल्य लाली।

पर उसकी अपनी थाली में,

बासी भात, प्याज़ और रोटी।

दुनिया का पेट भरने वाला,

क्यों सहता है ऐसी खोटी?

सोने-चाँदी के ढेर लगे हों,

भूख कभी उनसे मिटती नहीं।

किसान की मेहनत के बिन तो,

जीवन की गाड़ी चलती नहीं।

आपकी रचना का मूल भाव अत्यंत मानवीय और सामाजिक चेतना से भरपूर है। विशेषकर यह पंक्ति बहुत प्रभावशाली है:

"किसानों की थाली से पेट भरती है दुनिया, पर वह है गरीबी में।"

यह पूरी रचना का सार प्रस्तुत कर देती है।

जय किसान!

अन्नदाता के श्रम, सम्मान और कल्याण का संदेश देने वाली आपकी यह रचना सराहनीय है। 🌾🙏

Sunday, June 21, 2026

पिता जी

 पिता का मौन त्याग।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-6-26

+++++++

पिता

दो सूक्ष्म 

बिंदु के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर,

तभी  मौन त्याग।

माता को प्रधानता।

लक्ष्मी न तो पालन पोषण कैसे?

वीर जवान  सरहद पर

 देश प्रधान मौन त्याग।

छुट्टी में आना,

 पुत्र या पुत्री  को

 माता के कहने पर  ही पिता का पता लगता।

 विदेश में काम,

 पैसे भेजने का यंत्र।

अलमारियों में 

माता की साडियाँ।

आभूषणों का ढेर।

 बच्चों  की शिक्षा दीक्षा।

 बच्चे  सद्यःफल के कारण माता का महत्व।

बड़ा  मौन त्याग है 

पिता का त्याग।

 वे है घर की रीढ़ की हड्डी।

 पिता न तो सीधे  परिवार खड़ा रहना असंभव।

 पिता सबेरे 

नौकरी के लिए जाते 

शामको  लौटते।

 आते ही अनुशासन 

पढ़ाई पर बोलते।

 अनावश्यक 

 बाह्याडंबर खर्च

 रोकने की बात करते।

 तमिल में कहते हैं 

 संतानों को ज्ञान देना

 पिता का कर्तव्य है।

 अपनी जरूरतों को कम करके  परिवार बहन भाइयों को देते पिताजी।

 उनका मौन त्याग 

 अद्भुत।

अतुलनीय प्रेम,

 पिता का मौन त्याग।

 आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना "पिता का मौन त्याग" पिता के निःस्वार्थ समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और मौन प्रेम को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। आपने यह दर्शाया है कि पिता प्रायः परिवार के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं, किन्तु उनके त्याग की चर्चा कम होती है।

कुछ पंक्तियों को थोड़ा परिष्कृत रूप देकर रचना को और अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है:

पिता का मौन त्याग

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

पिता,

दो सूक्ष्म बिंदुओं के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर

करते हैं मौन त्याग।

माता का महत्व महान है,

किन्तु पिता के श्रम बिना

पालन-पोषण कैसे हो?

वीर जवान सरहद पर,

देश हेतु करता मौन त्याग।

विदेशों में काम करते पिता,

परिवार के लिए धन भेजते हैं।

अलमारियों में सजी साड़ियाँ,

आभूषणों का ढेर,

बच्चों की शिक्षा-दीक्षा—

इन सबके पीछे

पिता का मौन परिश्रम है।

वे घर की रीढ़ हैं,

उनके बिना परिवार का

सीधा खड़ा रहना कठिन है।

प्रातः नौकरी पर जाना,

संध्या को लौट आना,

आते ही बच्चों को

अनुशासन और पढ़ाई का पाठ पढ़ाना।

अपनी आवश्यकताओं को घटाकर,

परिवार और संतानों के लिए जीना—

यही है पिता का अद्भुत त्याग।

अतुलनीय है उनका प्रेम,

अद्भुत है उनका समर्पण,

वंदनीय है

पिता का मौन त्याग।

रचना का भाव अत्यंत सुंदर है। विशेष रूप से "वे घर की रीढ़ की हड्डी हैं" और "अपनी जरूरतों को कम करके परिवार को देना" जैसे भाव पाठक के हृदय को स्पर्श करते हैं।

हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌹

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

 



अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

21-6-26

++++++++++

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है, जिसका अर्थ है— "शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है।"

 तमिल में कहावत है,

 दीवार रहने पर ही चित्र खीँच सकते हैं ।

निर्बल काया,

 क्रिया हीन।

 कान सही नहीं है तो

 सुनना असंभव।

आँखें खराब है तो 

देख  नहीं सकते।

 फेफड़ा, पेट,अंतडियाँ

नशें, रीढ़ की हड्डी,

हाथ पैर हर अंग को

स्वस्थ रखना है।

न तो मानव में 

बुद्धि काम न करेगी।

मन काम न करेगा।

मन चंचल रहेगा।

ठीक तरह से 

काम न कर सकते।

 अतः स्वस्थ शरीर के लिए,

व्यायाम अति मुख्य।

‌व्यायाम की एक रीति

योग प्राणायाम ।

 उसमें हर अंग को 

स्वस्थ रखने,

हर एक की

 अलग-अलग मुद्राएँ।

सूर्य-नमस्कार,

प्राणायाम,

 भ्रामरी,

कपालभाती,

अनेक प्रकार के नियम।।

 भारत में 5000 वर्ष पहले योग शुरू हुआ।

 आध्यात्मिक विचार के अनुसार  पहला योगी,

 आदियोगी शिव।

ईसा से पूर्व 

 तीन हज़ार साल 

 के पहले,

सिंधु घाटी सभ्यता मैं

योग के कुछ निशानियाँ

मिल रही है।

 भारत के स्वास्थ्य 

 प्रद योग,

विदेशी आक्रमण ,

विदेशी शासन,

 विदेशी अंतर्जातीय 

 विवाह, संस्कृत भाषा के स्थान को अंग्रेज़ी लेना

 पाश्चात्य प्रभाव।

 फिर भी योग का अपना

विशिष्ट   महत्व विश्व जानने लगा।

स्वामी विवेकानंद का भाषण सनातन 

पद्धतियों पर  

चार चाँद लगाये।

 विश्व भर में 

 भारतीय आध्यात्मिकताएँ

 जानने समझने की उत्सुकता बढ़ी।

 योग का महत्व बढ़ा।

 योग केंद्र खोलने लगे।

पतंजलि योग क्रिया,

 सहज योगा।

योग की पारंपरिक रीति

 आध्यात्मिक रीति। 

मन से संबंधित।

आधुनिक रीतियाँ

मन और शरीर से संबंधित।

कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग,राज योग,

आसान आधारित

हठ योग, विन्यास योग,

अष्टांगयोग।

अयंगर योग में, कुंडली योग,यिन योग ।

 अब विश्वभर में योग का

महत्व का विकास करने

 अभ्यास करने 

विश्व योग दिवस की योजना  21जून 2015 से  शुरु हुआ।

भारत के विश्वविख्यात 

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में  14सितंबर 2014में विश्व योग दिवस का प्रस्ताव रखा।

इसके बाद 11दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21जून 2015को

 विश्व योग दिवस  मनाने का प्रस्ताव पास किया।

 तब से विश्व भर में 

योग दिवस मनाया जा रहा है।

योग ज्ञानप्रद,शांति प्रद 

 ऊर्जा प्रद , स्थिर चित्त प्रद एक स्वास्थ्य आनंद कला है।


आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में योग के इतिहास, महत्व और विश्व योग दिवस की पृष्ठभूमि का सुंदर समावेश है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर कुछ पंक्तियों को अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है। विशेष रूप से अंतिम अनुच्छेद बहुत प्रभावशाली है।

विशेष रूप से सराहनीय पंक्तियाँ:

"शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है।"

"योग ज्ञानप्रद, शान्तिप्रद, ऊर्जाप्रद, स्थिरचित्त प्रद एक स्वास्थ्य-आनन्द कला है।"

विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित एक संक्षिप्त समापन पंक्ति जोड़ सकते हैं—

"आइए, योग को जीवन का अंग बनाकर स्वस्थ तन, प्रसन्न मन और जागृत चेतना की ओर अग्रसर हों।"

आपकी लेखनी समाज को स्वास्थ्य, संस्कृति और आध्यात्मिकता का संदेश दे रही है। साधुवाद।

विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

🙏🕉️🌿