உள்ளம் பெருங்கோயில் ஊனுடம் பாலையம்
வள்ளற் பிரானார்க்கு வாய்கோ புரவாசல்தெள்ளித் தெளிந்தார்க்குச் சீவன் சிவலிங்கங்
கள்ளப் புலனைந்துங் காளா விளக்கே."
(பாடல் எண்: 1823)
“Spiritual reflections in Tamil and Hindi.”
உள்ளம் பெருங்கோயில் ஊனுடம் பாலையம்
வள்ளற் பிரானார்க்கு வாய்கோ புரவாசல்जीवन की दिशा
एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।
16-8-26
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जीवन की दिशा
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
16-8-26
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जीवन की दिशा
हर एक की रुचि,
क्षमता, बुद्धि-लब्धि,
जीवन-रेखा—
भगवान के अनुग्रह की
दिशा दिखाती है।
मानव अपने प्रयत्न करता है,
अपने परिश्रम करता है,
सफलता के लिए
दिशा स्वयं निर्धारित करता है।
लेकिन हर किसी को
अपनी चाही हुई दिशा में
कामयाबी नहीं मिलती।
मेरे जीवन में
तमिलनाडु में हिंदी-विरोध के बीच
हिंदी का ज्ञान,
हिंदी का प्रचार,
हिंदी से जीविकोपार्जन—
सब ईश्वर की देन है।
मैं अपने क्षेत्र में ही
नौकरी ढूँढ़ता रहा।
अपने ही शहर में रहने के लिए
लाखों प्रयास किए।
पर मेरे जीवन की दिशा
किसी और ओर थी।
मेरा भाई
अपने शहर से बाहर
नौकरी ढूँढ़ता रहा।
आज वह
अपने ही शहर में है।
मैं बाहर आया,
जिस दिशा को मैंने नहीं चुना,
वही मेरे जीवन की दिशा बनी।
तब समझ में आया—
मनुष्य दिशा चुनता है,
पर जीवन की अंतिम दिशा
ईश्वर निर्धारित करता है।
हमारी इच्छा
एक रास्ता दिखाती है;
ईश्वर का अनुग्रह ही
जीवन की दिशा का निर्धारण करता है।
सबहीं नचावत राम गोसाईं।
तिरुक्कुरल।
कालत्तिनाल् चेय्त उदवि चिऱितेनिनुम् ज्ञालत्तिल माणप्पेरितु --- संत तिरुवल्लुवर का तिरुक्कुरल।
समय पर की गयी मदद ब्रह्मांड से बड़ा है।
कालत्तिल --समय पर
चेय्त =की गयी
उदवि =मदद
चिरितेनिनुम् ==छोटा होने पर भी
ज्ञालत्तिल - ब्रह्मांड से
माणप्पेरितु == बहुत बड़ा है।
भावार्थ --
समय पर अर्थात वक्त पर की गई मदद
अति छोटी होने पर भी ब्रह्मांड से बड़ी है।
ब्रह्माण्ड तो सद्यःफल नहीं देता। उसमें बीज बोने पर अंकुर फूटकर पौधे बनकर फल देने देर लगेगा।
दोस्ती ==
उडुक्कै इऴंदवन कै पोल अंगे इडुक्कण कळैवताम् नट्पु।
उडुक्कै -- कमर की धोती
इऴंदवन = फिसलने पर
कै =हाथ के जैसे
इडुक्कन =दुख
कळैवताम् =दूर करना ही
नट्पु ==मित्रता है।
कमर की धोती गिरने पर तुरंत हाथ उसे पकड़कर मान की रक्षा करेंगे, वैसे ही दुख के आते ही दुख दूर करना ही सच्ची मित्रता है।
एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित अनूदित भावाभिव्यक्ति रचना।
शब्द और संवाद।
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
१४-८-२६
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शब्द का अपना महत्व है,
संवाद का अपना महत्व है।
आजकल जोरदार असरदार संवाद
जिसे अंग्रेजी में
पंच डयलाग् कहते हैं।
तमिल सिनेमा के रजनिकांत का एक संवाद प्रसिद्ध है
मैं एक बार कहूँ तो
सौ बार कहने के समान है,
आज सर्वत्र यह संवाद
चालू है।
प्रेम ही प्रेम नाम है प्रेम चोपड़ा
यह भी प्रसिद्ध है।
चित्रपट की सफलता के लिए
शब्द चयन , संवाद गीत अति मुख्य हैं।
तीनों के लिए शब्द प्रधान।
तुम तो बड़े आदमी हो।
दृश्य और बोलने के ढंग से वह छोटे आदमी हो जाता है।
उसे काक वक्रोक्ति कहते हैं।
दोनों हाथों में लड्डू है।
मुहावरे और लोकोक्तियां
संवाद में भी प्रयोग होते हैं।
दुरंगी दुनिया।
हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और।
नाच न जाने आंगन टेढ़ा।
ये सब संवाद में भी है तो शब्द शक्ति और संवाद कला में निपुण होना चाहिए।
शब्दों की असावधानी के बारे में रहीम ने कहा है--
रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पताल।आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥।
शब्द, संवाद मानव जीवन में अधिक महत्वपूर्ण है।
श्लेष शब्द में तो भिन्न अर्थ आते हैं।
काकवक्रोक्ति में
तो कहने का अभिनय प्रधान होता है।
सुवर्ण को खोजते फिरत
कवि व्यभिचारी चोर।
सुवर्ण के तीन अर्थ है
सुंदर शब्द, सुंदर रंग सोना।
कवि सुंदर शब्द का,
वेश्या सुंदर रूप रंग का
चोर सोने का
यही शब्द विशेष है।
जीवन में शब्द भंडार उसका प्रयोग संवाद
अति प्रधान है।
शब्द हमारा परिचय है,
संवाद हमारी कला।
शब्दों में शक्ति हो,
संवाद में संवेदना हो,
तो साधारण बात भी
हृदय को छू जाती है।
इसलिए जीवन में
शब्द-भंडार ही नहीं,
शब्दों का उचित प्रयोग
और संवाद-कला में निपुणता
भी अत्यंत आवश्यक है।
Writing
ज्ञान का महत्व वो अंदर में कुल घ में
एस. अनंत कृष्णन दो
चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
13-08-2026
ज्ञान का दीप
जीवन का प्रकाश।
ईश्वर की अनुपम
दिव्य सौगात।
वैज्ञानिक ज्ञान,
आर्थिक ज्ञान,
आध्यात्मिक ज्ञान,
दार्शनिक ज्ञान—
जीवन के विविध
आयाम खोलते हैं।
ज्ञान है दर्पण,
ज्ञान है शक्ति।
बुद्धि और लब्धि में
होती है भिन्नता।
कोई प्रतिभाशाली,
कोई औसत ज्ञानी,
कोई समालोचक,
कोई आत्मज्ञानी।
वरकवि को
ईश्वर का वरदान,
आत्मज्ञानी को
सत्य का ज्ञान।
जगत मिथ्या,
ईश्वर सत्य।
नश्वर है संसार,
नश्वर है शरीर।
कर्मफल के अनुसार
मिलता है ज्ञान।
गुरु की कृपा से
होता है कल्याण।
गुरु का स्मरण
ज्ञान का द्वार।
अज्ञान में जीवन
हो जाता दुश्वार।
स्वदेशे पूज्यते राजा,
विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।
ज्ञान ही मानव का
सच्चा धन है,
जो जीवन भर साथ रहता है
और मृत्यु के बाद भी
यश के रूप में अमर रहता है।
गाँव की आत्मा
एस . अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
10-8-26
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भारत गाँवों का देश।
प्रधान धंधा खेती।
मोहनदास करमचंद गांधी जी ने ग्राम राज्य का स्वप्न देखा था।
ग्राम की आत्मा
परिश्रम का महत्व।।
वह आत्मा न चाहती
बाह्याडंबर
पूर्ण जीवन।
एक बार नारद ने
विष्णु से पूछा
तेरा श्रेष्ठ भक्त कौन?
विष्णु ने नारद से कहा
भूलोक के एक गाँव में
एक किसान रहता है।
उससे मिलने के बाद आओ।
उस के पहले तेल से भरा कठोरी हाथ में लेकर जाओ।
देखो, एक बूँद भी न गिरे।
नारद यों ही कठोरी लेकर गया।
किसान को देखा तो
वह तड़के उठकर एक बार भगवान क्षय का नाम लिया।
फिर हल लेकर खेत गया।
खेत जोतकर दोपहर खाने के पहले एक बार लिया।
अपने खेत का काम खत्म करके शामको घर लौटा।
भगवान का नाम लिया।
सो गया।
नारद लौटकर विष्णु से मिला।
विष्णु ने कहा किसान मेरा श्रेष्ठ भक्त हैं।
नारद ने कहा
मैं सदा आपका नाम रटता रहता हूँ।
वह किसान तो तीन ही बार आपका नाम लेता है।
तब विष्णु ने पूछा
तुम तेल की कठौरी लेकर जाते समय कितने बार मेरा धन आम लिया।
तब नारद ने कहा
मैं आपके काम में लगा था।
विष्णू ने कहा किसान भी अपना कर्तव्य कर रहा था।
फिर भी मेरे नाम लिया।
वह सबका अन्नदाता है।
इसलिए वह मेरा बड़ा भक्त हैं।
यही गाँव की आत्मा।
किसान ने तो सब भूखों मर जाते।
संत तिरुवल्लुवर ने कहा
जो भी काम करो,
कारखाना , कंपनी चलाओ।
पेशे जोड़ों।
गाँव की आत्मा खेत में न लगा तो
भूखा भजन न गोपाल।
जहाँ भी जाओ,
जो भी धंधा करो
गाँव की आत्मा
किसान की आत्मा
न तो जगत आहार रहित तड़पता।
वास्तव में गाँव की आत्मा एकाग्रता
कर्तव्य पालन।
जगत का अन्नदाता।
स्वार्थ के काँटे
एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।
8-8-26
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स्वार्थ
मानव के लिए
कलंक।
स्वार्थ व्यक्ति
लोभी होता है।
अपने लिए जीता है।
कंजूसी होता है।
स्वार्थ मनुष्य
अपने हित के लिए
अन्याय करता है।
भ्रष्टाचार और रिश्वत
लेकर धन जोड़ता है।
विभीषण अपने भाई तजकर राम से मिल गया।
कुल द्रोही बन गया।
वीर और देश भक्त पुरुषोत्तम महाराज का भाई सिकंदर से मिल गया।
पद , नौकरी, सुखी जीवन के लिए
भारतीय प्रतिभाशाली लोग अपनी भाषा,
अपने मजहब
अपनी पोशाक तक बदलकर अंग्रेज़ी के पिछलग्गू बन गये।
ताजमहल को सराहा।
भारतीय अपूर्व मंदिर
जो ताज़महल से श्रेष्ठ है, उनको चमकने न दिया।
कबीर ने स्वार्थ के गुण पर अपने दोहे लिखे:--
सुख के संगी स्वार्थी, दुख मे रहते दूर।कहे कबीर परमारथी, दुख सुख सदा हजूर॥
स्वार्थी सुख के समय साथ रहता है,
दुख के समय तजकर चला जाता है।
परमार्थी सुख दुख में
साथ रहता है।
कबीर कहते हैं --
तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ।मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ।
तुलसीदास ने लिखा है
स्वार्थ लागी करै सब प्रीति।
सुर नर मुनि सब की यह रीति॥
रहीम के दोहे
धन दारा अरु सुतन सों, लग्यों रहै नित चित्त।
नहि रहीम कोऊ लख्यो, गाढ़े दिन को मित्त॥
राम भी स्वार्थ के लिए
छिपकर वाली को मारा।
वाली से युद्ध के पहले
बातें नहीं की।
अतः स्वार्थ प्रधान लोग जग में अधिक।।
निस्वार्थ है
नदी,पेड़।
वृक्ष कबहु फल न भखै,
नदी न संचै नीर।
परमार्थ के कारणे साधुने धरा शरीर।
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सही सुधारा रूप
आज की चुनौती : स्वार्थ के काँटे
स्वार्थ के काँटेएस. अनंतकृष्णन, चेन्नई8-8-2026
स्वार्थमानव के लिएएक कलंक है।
स्वार्थी व्यक्तिलोभी होता है,अपने लिए ही जीता है,कंजूस प्रवृत्ति का होता है।
अपने हित के लिएअन्याय करता है,भ्रष्टाचार और रिश्वत सेधन का अंबार लगाता है।
इतिहास में भीस्वार्थ के अनेक उदाहरण मिलते हैं।पद, नौकरी और सुख-सुविधाओं के लिएकई लोगअपनी भाषा,अपनी संस्कृति,अपनी वेशभूषा तक छोड़करपरायी संस्कृति के अनुयायी बन जाते हैं।
कबीर ने कहा है—
"सुख के संगी स्वार्थी, दुख में रहते दूर।कहे कबीर परमारथी, दुख-सुख सदा हजूर॥"
अर्थात् स्वार्थी व्यक्तिसुख में साथ रहता है,पर दुःख आते हीसाथ छोड़ देता है।
कबीर का एक और दोहा—
"तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ।मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ॥"
तुलसीदास ने भी लिखा है—
"स्वार्थ लागी करै सब प्रीति।सुर नर मुनि सब की यह रीति॥"
रहीम कहते हैं—
"धन, दारा अरु सुतन सों, लग्यो रहै नित चित्त।नहि रहीम कोऊ लख्यो, गाढ़े दिन को मित्त॥"
आज संसार मेंस्वार्थी लोगों की संख्या अधिक है।
निस्वार्थ तोनदी और वृक्ष हैं।
"वृक्ष कबहुँ फल न भखै,नदी न संचै नीर।परमारथ के कारणे,साधु धरा शरीर॥"
यही संदेश है—स्वार्थ नहीं,परमार्थ ही मानव जीवन का सच्चा आभूषण है।