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Wednesday, September 30, 2026

गीता रहस्य

 

आज की चुनौती

गीता का सूक्ष्म रहस्य

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु
30-9-26

कर्तव्य-कर्म
मनसा, वाचा, कर्मणा
ईमानदारी से करते रहो,
परिणाम की चिंता छोड़ दो—
परिणाम भगवान की जिम्मेदारी।

हर्ष हो या उल्लास,
सुख हो या दुःख,
यश मिले या अपयश—
सब उसी की कृपा,
सब उसी की लीला!

पर मन में प्रश्न उठता है—
भ्रष्टाचारी भोग-विलास में,
रिश्वतखोर ऐश्वर्य में,
अन्यायी अधिकार में;
और सत्यवान
दुःख क्यों सहता है?

भक्त त्याग और तपस्या में,
रैदास भी सादगी और गरीबी में;
प्रह्लाद को यातनाएँ मिलीं,
हिरण्यकश्यप को सत्ता और अधिकार।

फिर समझ में कैसे आए
गीता का यह सूक्ष्म रहस्य?

जब अत्याचार बढ़ता है,
अन्याय सीमा पार करता है,
तब धर्म की रक्षा के लिए
भगवान के अवतार की बात कही जाती है—
पर वह घड़ी कब आएगी?

राजा राजमहल में,
ज्ञानी अपने आश्रम में;
कोई धन-संपत्ति के बीच,
कोई साधनहीन जीवन में।

आसाराम जैसे लोगों के पास
अपार संपत्ति दिखाई देती है,
और सच्चे साधु-संत
कभी-कभी आश्रयहीन,
भूखे-प्यासे जीवन बिताते दिखाई देते हैं।

तो क्या यही कर्म का फल है?
क्या यही ईश्वर का न्याय है?
क्या यही गीता का रहस्य है?

शायद गीता हमें यह सिखाती है—
कर्म हमारा अधिकार है,
फल हमारा अधिकार नहीं।

इसलिए
साधारण मनुष्य हो या मंत्री,
अधिकारी हो या राजा—
अपने-अपने कर्तव्य को
ईमानदारी से निभाना ही धर्म है।

भोग मिले तो अहंकार नहीं,
दुःख मिले तो निराशा नहीं;
धन मिले तो दुरुपयोग नहीं,
गरीबी आए तो सत्य का त्याग नहीं।

कर्म करते रहो,
धर्म के मार्ग पर चलते रहो,
फल को प्रभु पर छोड़ दो।

शायद इसी समर्पण में
गीता के सूक्ष्म रहस्य की
एक झलक मिलती है।

प्रश्न फिर भी शेष है—
मनुष्य कर्म करता है,
पर उसके कर्मों का अंतिम न्याय
कौन और कब करता है?

भगवान ही जानें!

आशा

 आशा की किरण

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 

30-9-26

+++++++++

आशा  न तो

मानव जीवन ही नहीं,

 वनस्पति जीवन भी

 जीना दुश्वार है।

 चातक पक्षी  आशा से जीता है, स्वाती नक्षत्र की वर्षा  की प्रतीक्षा में।

भूमि में बोये बीज ,

 पनपने की आशा में।

 मानव अंकुर फूटने की आशा में।

पतझड़ के पेड़ भी

 वसंत के आगमन की आशा में।

  बच्चों को पढ़ाते हैं,

 नौकरी की आशा से।

हर काम आशा के बल पर।

 आशा की किरण न तो

 आत्महत्या ही मार्ग।

सुशासन की आशा पर 

 मतदाता मत देता है।

सेना की आशा न तो

 पुलिस की आशा न तो

 चैन से जीना मुश्किल।

मानव मेहनत करता है,

वेतन की आशा पर।

रोगी इलाज कराता है

 डाक्टर और दवा के आधार पर।।

पंचतत्व की तटस्थता

 जीवन जीने की आशा।

 आज की चुनौती


आशा की किरण


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

30-9-26


+++++++++


आशा के बिना

न केवल मानव जीवन,

बल्कि वनस्पति जीवन भी

जीना दुश्वार है।


चातक पक्षी

स्वाती नक्षत्र की वर्षा की

प्रतीक्षा में जीता है—

आशा के सहारे।


भूमि में बोया गया बीज

अंकुर फूटने की आशा में

मिट्टी के भीतर

अपना अस्तित्व सँभालता है।


पतझड़ के पेड़ भी

वसंत के आगमन की

आशा में

सूनी डालियों को थामे रहते हैं।


माता-पिता बच्चों को पढ़ाते हैं,

भविष्य में

अच्छी नौकरी की आशा से।


मानव जीवन का

हर प्रयास

किसी न किसी आशा से जुड़ा है।


निराशा कितनी भी गहरी हो,

आशा की एक किरण

अंधकार को चीर सकती है।

इसलिए निराश होकर

जीवन समाप्त करना

कभी समाधान नहीं।


सुशासन की आशा में

मतदाता अपने मत का प्रयोग करता है।


सेना और पुलिस की सुरक्षा की आशा में

जनता

शांतिपूर्ण जीवन जीती है।


मानव मेहनत करता है

अपने श्रम के उचित फल

और वेतन की आशा पर।


रोगी उपचार कराता है

डॉक्टर, दवा और

स्वस्थ होने की आशा पर।


पंचतत्व की तटस्थता में भी

जीवन निरंतर चलता है।

प्रकृति अपना कर्म करती है,

मानव अपना प्रयास करता है।


जब तक साँस है,

तब तक आशा है।

और जब तक आशा है,

तब तक जीवन है।


अंधकार कितना भी गहरा हो,

एक छोटी-सी आशा की किरण

जीवन में

नया प्रभात ला सकती है।

Tuesday, September 29, 2026

यादें

 

संस्मरण

उसकी याद में जीवन

मेरी शादी 1975 में हुई—बिना धूमधाम, बिना बाह्य आडंबर के। न छायाचित्र, न दिखावा। था तो केवल प्रेम—भाई-बहन जैसा अपनापन और फिर जीवनसाथी का गहरा स्नेह।

1950 में मेरे जन्म के समय ही मेरे मामा ने मेरी माँ से कहा था—“मेरी बेटी हुई तो उसका विवाह तुम्हारे बेटे से करूँगा।” उसी वर्ष गोमती का जन्म हुआ और हमारा रिश्ता जैसे जन्म से पहले ही तय हो गया।

मई 1975 से जून 2026 तक—इक्यावन वर्षों का साथ।

इन वर्षों में कमाना मेरा काम रहा और घर-गृहस्थी उसने सँभाली। मैं उस जमाने का पुरुष था; घर के कामों से लगभग अनजान। एक लोटा तक अपनी जगह से सरकाने की जरूरत मुझे नहीं पड़ती थी। वह मेरी हर आवश्यकता बिना कहे समझ लेती—समय पर भोजन, स्वादिष्ट पकवान, दवाइयाँ, पानी और न जाने कितनी छोटी-बड़ी बातें।

उसकी वाणी में मैंने कभी क्रोध नहीं देखा, चेहरे पर शिकायत नहीं। मेरी तीन बार ऐसी स्थिति आई जब जीवन और मृत्यु के बीच खड़ा था। हर बार वह मेरे साथ चट्टान की तरह खड़ी रही। मुझे वह सत्यवान के लिए सावित्री जैसी लगती थी।

लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अपनी एक बड़ी भूल साफ दिखाई देती है।

मैंने उसकी सेवा को अपना अधिकार समझ लिया और उसके श्रम को उसका कर्तव्य।
उसने कभी हिसाब नहीं माँगा, इसलिए मैंने भी हिसाब नहीं रखा। उसने बिना कहे मेरी जरूरतें पूरी कीं, इसलिए मैं उसकी जरूरतों को समझने में पीछे रह गया।

मैं कमाता रहा और समझता रहा कि अपना दायित्व निभा रहा हूँ। पर घर को घर बनाए रखने में उसके दिन-रात के श्रम, धैर्य और प्रेम का मूल्य मैंने समय रहते नहीं पहचाना।

आज मन में यही कसक है—
जिस स्त्री ने मेरी हर जरूरत बिना माँगे समझी, उसकी जरूरतों को समझने में मैं कितना पीछे रह गया!

उसके अंतिम दिन

जीवन के अंतिम दौर में जब बीमारी ने उसे घेर लिया, तब वर्षों से मुझे सँभालने वाली वही स्त्री स्वयं सहारे की आवश्यकता में थी। उसके शरीर की शक्ति कम होती गई, लेकिन मेरे प्रति उसकी चिंता कम नहीं हुई।

अंतिम दिनों में भी उसकी चिंता अपने लिए कम, मेरी अधिक थी। वह मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। जैसे जीवन भर मेरी जिम्मेदारी उठाती रही, वैसे ही अंत तक मेरे बारे में सोचती रही।

उन दिनों उसके पास बैठना, उसे देखना और उसकी पुरानी सेवा को याद करना मेरे लिए एक मौन आत्मपरीक्षण था। मन बार-बार कहता था—काश, उसके रहते मैं उसकी सेवा का उतना ही अर्थ समझ पाता, जितना आज उसकी अनुपस्थिति में समझ रहा हूँ।

जून 2026 में वह मुझे छोड़कर चली गई।

उसके जाने के बाद घर वही है, सामान वही है, दिन-रात वही हैं—पर जीवन की सहजता चली गई।

आज मैं अकेला हूँ।

सुबह उठकर कॉफी माँगनी पड़ती है। गोलियाँ स्वयं लेनी पड़ती हैं। पानी की बोतल भरनी पड़ती है। नाश्ते और भोजन के लिए भी कहना पड़ता है। जिन बातों का मुझे कभी ध्यान ही नहीं रखना पड़ा, वे आज मेरे अपने दायित्व हैं।

तभी उसकी सेवा का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।

वह केवल मेरी पत्नी नहीं थी; वह मेरे जीवन की अनकही व्यवस्था थी। उसकी उपस्थिति इतनी सहज थी कि उसका महत्व शायद मैंने उसके रहते पूरी तरह जाना ही नहीं।

आज वह नहीं है, पर उसकी सेवा की स्मृतियाँ मेरे हर दिन में बसी हैं। सुबह से रात तक, छोटी-सी जरूरत से लेकर बड़े संकट तक—हर जगह उसकी याद साथ चलती है।

इक्यावन वर्ष का साथ समाप्त हुआ है,
स्मृतियों का नहीं।

गोमती,
तुम मेरे जीवन से चली गई हो,
पर मेरे जीवन को जिस प्रेम और सेवा से सँवारा,
वह मेरे भीतर हमेशा जीवित रहेगा।

तुम्हारी सेवा का ऋण
मैं चुका नहीं सकता।
केवल इतना स्वीकार कर सकता हूँ—

तुमने अपना जीवन मुझे दिया,
और मैंने बहुत देर से समझा
कि तुम्हारा होना ही
मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख था।

अब शेष जीवन—
तुम्हारी याद में।

Monday, September 28, 2026

दिया अंधेरे में

 

कुंभ साहित्य सेवा संस्थान को
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक का नमस्कार।

चित्राधारित कविता

अंधेरे में उजाला
29-9-26

अंधेरे की गहन गुफा में
टिमटिमाता एक नन्हा-सा बल्ब—
मानो रात के माथे पर
उम्मीद का पहला तारा।
थॉमस एडिसन का आविष्कार,
मशाल हो, दीप हो या मिट्टी का दीया—
हर रूप में प्रकाश
अंधकार की दीवारें ढहा देता है।

यों ही कभी एक शब्द
गुलामी की नींद में डूबे देश के कानों में
भोर की पहली पुकार बनकर उतरता है,
सोई चेतना को झकझोरता है
और बन जाता है
ज्ञान का अमर दीप।

भूखे को अन्न मिले,
नंगे तन को वस्त्र,
बेघर को अपनी छत,
बेरोज़गार हाथों को काम,
अज्ञान में भटके मन को
ज्ञान का पथ दिखाने वाला गुरु—
ये सब उस दिव्य प्रकाश की किरणें हैं,
जो मानव-हृदय के अंधकार में
ईश्वर का संदेश लिखती हैं।

एक दीप जलता है,
तो रात का साम्राज्य सिमटने लगता है;
एक शुभ विचार जन्म लेता है,
तो जड़ समाज की धरती में
परिवर्तन के अंकुर फूटने लगते हैं।

प्रकाश केवल बल्ब की देह में नहीं,
मनुष्य के कर्मों की धड़कन में भी होना चाहिए।
करुणा से किसी की आँखों का आँसू पोंछें,
ज्ञान से किसी के जीवन में दिशा भरें,
सेवा से किसी की राह में दीप बिछाएँ।
एक दीप से दूसरा दीप जलता जाए,
तो अंधकार अपनी ही छाया में गलता जाए।
जहाँ करुणा, ज्ञान और सेवा
तीन धाराओं की तरह मिलते हैं,
वहीं मानवता का निर्मल उजास खिलता है—
वहीं आशा की भोर उतरती है,
और वहीं से
नए प्रभात का जन्म होता है।

Sunday, September 27, 2026

ज्ञान का समंदर

 [27/09, 7:32 pm] sanantha.50@gmail.com: ज्ञान का समंदर।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु।

28-9-26.

**********

ब्रह्मांड में है ज्ञान 

अति व्यापक।

 वह धरती समुंदर आकाश, पाताल,

 अति विस्तृत।।

 सोने के खान,

 हीरे के खान,

 कोयले का ज्ञान 

पेट्रोल ज्ञान,

 पानी के विविध स्वाद।

 गर्म पानी का स्रोत।

 बर्फीला ध्रुव प्रदेश।

 ग्रीष्म वासस्थल  के वातावरण,

 बादल का छा जाना, 

कुहरा, वहाँ के  पेड़, पौधे,

 मिटृटी के विविध किश्म,

 मिट्टी की उर्वरता 

 के  अनुसार

 वनस्पति का पलना,

रेगिस्तान का ज्ञान,

 नदियों के तट पर सभ्यता का विकास, पतन,

 समुद्र विभाजन,

 सूर्य, चंद्र, नक्षत्र और ग्रहों का ज्ञान।

खगोल भूगोल शास्त्र।

 भाषाओं का ज्ञान,

 भाषा विज्ञान,

  भाषाओं की तुलना,

 भाषाओं के परिवार।

  जीवित भाषाओं के ज्ञान,

 मृत भाषाओं के ज्ञान।

विज्ञान  ,जीव विज्ञान,

 रसायन, भौतिक।

आध्यात्मिक ज्ञान,

 आदि धर्म ,

 धर्म मानव धर्म 

 मनुस्मृति,

 मनोविज्ञान, 

 मानव के आकार,रंग,

गुण, बुद्धि लब्धी,

 सूक्ष्मताति सूक्ष्म कीटाणु,

  हर बात  में हजारों ज्ञान।

 मानव के अंग, 

भीतरी अवयव

 रक्त भेद, 

 हृदय में की बनावट,

फेफड़े,अंतडियाँ

नाडियां ,नसें

 रक्त संचार।

रोग निदान।

 साँस के भेद,

 रीढ की हड्डियाँ, 

  साहित्य, साहित्यकार,

काव्य महाकाव्य खंड काव्य, मुक्तक कहानी, उपन्यास, निबंध,

 रस, छंद, अलंकार,

व्याकरण ,

 विभिन्न भाषाओं के व्याकरण, लिपि, लिपियों के भेद।

 ज्ञान का समंदर में 

 उसकी गहराई, लंबाई, चौड़ाई  ,

 सोचने समझने से

 उसकी सूचियों का अंत नहीं।

 ज्ञान दिव्य शक्ति के समान, शिव के पैर सिर  देखने विष्णु ब्रह्मा हार गये,

वैसे ही ज्ञान है का समंदर ।

[27/09, 7:32 pm] sanantha.50@gmail.com: आज की चुनौती

ज्ञान का समंदर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।

28-9-26


ज्ञान का समंदर

अथाह है,

अनंत है,

असीम है।


इस ब्रह्मांड में

ज्ञान का विस्तार

धरती, समुद्र, आकाश और पाताल तक

फैला हुआ है।


सोने की खान,

हीरे की खान,

कोयले का ज्ञान,

पेट्रोलियम का ज्ञान,

जल के विविध रूप और स्वाद,

गर्म जल के प्राकृतिक स्रोत,

बर्फीले ध्रुव प्रदेश—

हर जगह ज्ञान छिपा है।


कहीं ग्रीष्म का वातावरण,

कहीं वर्षा,

कहीं बादलों का छा जाना,

कहीं कुहरा।


वहाँ के पेड़-पौधे,

मिट्टी की विभिन्न किस्में,

मिट्टी की उर्वरता के अनुसार

वनस्पतियों का विकास—

प्रकृति का प्रत्येक रूप

ज्ञान का एक नया अध्याय है।


रेगिस्तान का ज्ञान,

नदियों के किनारे

सभ्यताओं का विकास और पतन,

समुद्रों का विभाजन,

सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र और ग्रह—

इन सबका अध्ययन

खगोल और भूगोल के माध्यम से

मानव ज्ञान को विस्तृत करता है।


भाषाओं का ज्ञान,

भाषाविज्ञान,

भाषाओं की तुलना,

भाषा-परिवार,

जीवित भाषाएँ,

मृत भाषाएँ—

भाषा भी अपने भीतर

ज्ञान का विशाल संसार समेटे हुए है।


विज्ञान की कितनी शाखाएँ हैं—

जीवविज्ञान,

रसायन विज्ञान,

भौतिक विज्ञान।


आध्यात्मिक ज्ञान,

धर्म का ज्ञान,

मानव धर्म,

मनुस्मृति,

मनोविज्ञान—

मानव जीवन को समझने के

कितने ही मार्ग हैं।


मानव का आकार,

रंग, गुण और बुद्धि,

सूक्ष्म से सूक्ष्म

जीवाणु और कीटाणु—

प्रकृति की हर छोटी-बड़ी वस्तु में

हजारों प्रकार का ज्ञान छिपा है।


मानव शरीर स्वयं

ज्ञान का एक अद्भुत संसार है।


मानव के अंग,

भीतरी अवयव,

रक्त के विभिन्न प्रकार,

हृदय की बनावट,

फेफड़े,

आँतें,

नाड़ियाँ और नसें,

रक्त-संचार,

रोगों का निदान,

श्वास के विभिन्न रूप,

रीढ़ की हड्डियाँ—

शरीर का प्रत्येक अंग

एक अलग विज्ञान है।


फिर आता है

साहित्य का विशाल संसार—


साहित्यकार,

काव्य, महाकाव्य,

खंडकाव्य, मुक्तक,

कहानी, उपन्यास, निबंध।


रस, छंद और अलंकार,

व्याकरण,

विभिन्न भाषाओं के व्याकरण,

लिपियाँ और लिपियों के भेद—

ज्ञान की शाखाएँ

गिनते-गिनते भी

समाप्त नहीं होतीं।


ज्ञान के इस समंदर की

गहराई कितनी है?

लंबाई कितनी है?

चौड़ाई कितनी है?


सोचते जाइए,

समझते जाइए—

ज्ञान की सूचियाँ

समाप्त होने का नाम नहीं लेतीं।


ज्ञान एक दिव्य शक्ति के समान है।


जैसे शिव के

चरणों का अंत खोजने

ब्रह्मा ऊपर की ओर चले,

विष्णु नीचे की ओर गए,

फिर भी दोनों

उसकी सीमा नहीं पा सके—


वैसे ही

ज्ञान के समंदर की भी

न कोई अंतिम सीमा है,

न कोई अंतिम किनारा।


जितना सीखते हैं,

उतना ही पता चलता है—

अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।


ज्ञान के समंदर में

हर मनुष्य एक यात्री है;

कुछ बूंदें पाकर

स्वयं को ज्ञानी समझ लेता है।


कलाओं में चित्रकला, नाट्यकला,संगीत कला


रसोई कला, वास्तुकला कुल चौंसठ है।


पशु विज्ञान , जंगली, पालतू, खूँख्वार 

समय हर देश के अनुसार,

पाश्चात्य देशों में रात भारत में।

 समय के भेद भी अमेरिका में अनेक।


पर जो वास्तव में ज्ञानी है,

वह विनम्र होकर कहता है—


“मेरा ज्ञान जितना बढ़ता है,

मेरे अज्ञान का विस्तार

उतना ही दिखाई देता है।”


यही ज्ञान की सच्ची पहचान है—

ज्ञान का अंत नहीं,

ज्ञान की खोज का अंत नहीं।


Saturday, September 26, 2026

इंद्रधनुष

 [26/09, 4:25 am] sanantha.50@gmail.com: इंद्र धनुष।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।

 प्रकृति धन्य है,

 सूक्ष्मता है उसमें।

नील गगन की सुंदरता,

काले बादल का गर्जन

 बिजली की चमक,

 वर्षा वर्षा के बाद का इंद्रधनुष, 

 सूर्य के प्रकाश में।

मैं  ने नयाघेरा जलप्रपात में,

ऊपर से

 देखा धरती पर इंद्रधनुष।

तभी वैज्ञानिक चमत्कार का सबूत मिला,

बारीश और धूप के मिलने पर बनता हे

है इंद्रधनुष।।

जलप्रपात के बिखरते पानी धूप के पड़ने पर 

इ़ंद्रधनुष बनता है।

जब प्रकाश बूंद से बाहर निकलता है, तो 

वह टूटकर सात अलग-अलग रंगों में बँट जाता है।

बैंगनी, जामुनी, नीला,हरा पीला नारंगी लाल 

 उजाले बूंद  के सात रंग  आशा, शांति और खुशहाली का प्रतीक है।

 इ़ंद्रधनुष का दीखपडना  बुराई का अंत, अच्छाई का आरंभ।

एकता में छिपी विविधता।

 मेहंदी में लाल रंग समान।

इ़ंद्रधनुष अच्छे भाग्य,

सफलता,और आनंद का प्रतीक।

ईश्वर की अद्भुत माया।

जलप्रपात में भी पानी के बूंद में सूर्य की किरणें पड़ने पर इंद्रधनुष।

अति शोभनीय दृश्य।


इंद्रधनुष


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।


प्रकृति धन्य है,

उसकी सूक्ष्मता अद्भुत है।

नीले गगन की सुंदरता,

काले बादलों का गर्जन,

बिजली की चमक,

वर्षा की बूंदें—

और वर्षा के बाद

सूर्य के प्रकाश में

उभरता है इंद्रधनुष!


मैंने नायाग्रा जलप्रपात में

ऊपर से नीचे देखा—

धरती पर उतर आया था

एक सुंदर इंद्रधनुष।


तभी मुझे

प्रकृति के वैज्ञानिक चमत्कार का

प्रत्यक्ष अनुभव हुआ।


जब जल की सूक्ष्म बूँदों पर

सूर्य की किरणें पड़ती हैं,

तो प्रकाश का अपवर्तन और परावर्तन होता है;

और प्रकाश

सात रंगों में बँटकर

आकाश में इंद्रधनुष बनाता है।


बैंगनी, जामुनी, नीला,

हरा, पीला, नारंगी और लाल—

सात रंग,

एक ही इंद्रधनुष!


एकता में छिपी विविधता का

यह सुंदर संदेश है।


जलप्रपात से

बिखरती हुई जल-बूंदों पर

सूर्य की किरणें पड़ती हैं,

तो वहीं बन जाता है

प्रकृति का रंगीन चमत्कार—

इंद्रधनुष!


इंद्रधनुष

आशा, शांति और खुशहाली का

प्रतीक माना जाता है।

अँधेरे और वर्षा के बाद

उसका दिखाई देना

मानो संदेश देता है—


बुराई का अंत हो,

अच्छाई का आरंभ हो;

निराशा के बाद आशा हो,

और जीवन में फिर से

खुशियों के रंग भर जाएँ।


सात रंग,

सात रूप,

पर सौंदर्य एक!


ईश्वर की अद्भुत माया,

प्रकृति की अनुपम कारीगरी—

जल की छोटी-सी बूँद में

सूर्य की किरणों का मिलन

बना देता है

आकाश का सुंदर चित्र।


नायाग्रा जलप्रपात में

देखा वह इंद्रधनुष

आज भी मेरी आँखों में बसा है।


अति शोभनीय दृश्य!

प्रकृति का अद्भुत संदेश—

विविध रंगों में भी

एकता और सौंदर्य।

Friday, September 25, 2026

भाषा का विकास

 एक भाषा जब अपनी   परंपरागत शैली से नई

शैली  अपनाता है,तभी विकास होती है।

तुलसी सूर कबीर मीरा रहीम की शैली अब नहीं।

भाषा परिवर्तन शील है।

  कर का भूतकाल रूप 

किया,किए की कीं।

 अब करा,करी का प्रयोग चलता है।

लिया लिए ली लीं  नहीं बदला।  लेया, लेयी का प्रयोग 

पी पिया  पिये पियी 

देया/देयी का प्रयोग नहीं।

 पिओ  पी इये का प्रयोग नहीं ।

दे ओ, देइए का प्रयोग नहीं।

 ऐसे परिवर्तन भी कालांतर में होगा जिससे 

विशेष अपवाद की कठिनाई से बच सकते है।

वैसे ही ने नियम।   

ने नियम के न होने पर हिंदी और भी आसान।

  सोचिए।

स्वचिं तक - अनंत कृष्णन, चेन्नै।