शब्दों का प्रहार
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।
दिनांक: 9-10-2026
शब्दों का महत्त्व अपार है।
शब्दों की शक्ति से
बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ होती हैं।
शब्द जोड़ते हैं,
शब्द तोड़ते हैं।
शब्द प्रेम जगाते हैं,
शब्द वैर बढ़ाते हैं।
‘जियो, जीने दो’
जीवन का सुंदर संदेश है।
लेकिन शब्दों के प्रयोग में
सावधानी भी आवश्यक है।
हँसमुख और हँसकर मुख दिखाने में,
शब्दों के अर्थ और भाव में
सूक्ष्म अंतर हो सकता है।
शब्दों का गलत प्रयोग
किसी के मन को आहत कर सकता है।
बिना सोचे-समझे बोले गए कठोर शब्द
श्रोता के हृदय पर गहरा प्रहार करते हैं।
शरीर का घाव भर सकता है,
लेकिन मन का घाव
लंबे समय तक हरा रह सकता है।
प्रियजनों के कठोर शब्द
कभी-कभी सुधार की भावना से निकलते हैं,
जबकि अप्रिय व्यक्तियों के कठोर शब्द
क्रोध और प्रतिशोध की भावना जगा सकते हैं।
संत तिरुवल्लुवर का संदेश
अग्नि से जला हुआ घाव
समय के साथ भर सकता है,
लेकिन जिह्वा से निकले कटु शब्दों का घाव
आसानी से नहीं भरता।
रहीम का दोहा
रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पाताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥
अर्थात् जिह्वा बिना सोचे-समझे
स्वर्ग से पाताल तक की बातें कह जाती है।
वह स्वयं तो मुख के भीतर रहती है,
लेकिन उसके कटु वचनों के कारण
सिर पर जूते पड़ने की नौबत आ जाती है।
कबीर का दोहा
एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुःख रासि।
एक शब्द बंधन कटे, एक शब्द गल फाँसी॥
अर्थात् एक शब्द सुख का भंडार बन सकता है,
दूसरा दुःख का कारण।
एक शब्द बंधनों से मुक्त कर सकता है,
तो दूसरा फाँसी तक की नौबत ला सकता है।
वाणी का विवेक
ऐसे शब्द बोलने चाहिए
कि सुनने वाला अपना बन जाए।
हमारे शब्दों से
दूसरों के मन में शांति आए
और हमारे अपने हृदय को भी
शांति का अनुभव हो।
कबीर का अमर संदेश है—
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥
शब्दों का प्रहार कैसा हो?
शब्दों का प्रहार
मरहम के स्पर्श जैसा सुखद हो,
न कि लाठी के प्रहार जैसा
पीड़ादायक और दुःखद।
बोलने से पहले सोचें,
शब्द चुनने से पहले समझें,
और अपनी वाणी में
प्रेम, करुणा तथा विवेक भरें।
क्योंकि—
शब्दों से दिल जीते जाते हैं,
शब्दों से दिल टूट भी जाते हैं।
सोच-समझकर बोलेंगे,
तो प्रेम और शांति बाँटेंगे।
बिना सोचे बोलेंगे,
तो दुःख के घाव छोड़ जाएँगे।
— एस. अनंतकृष्णन