आज की चुनौती
मदद के हाथ
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
11-9-26
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मानव सामाजिक प्राणी है।
वह अकेला नहीं जी सकता।
संन्यासी होने पर भी
उसे भोजन, वस्त्र और आवास चाहिए।
अतः मानव जीवन में
सहारे की आवश्यकता है,
आश्रय और आश्रयदाता की आवश्यकता है।
मदद के हाथ
सबसे पहले किसान से शुरू होते हैं।
वही हमारा सबसे बड़ा सहायक है।
उसके परिश्रम से ही
समस्त मानव समाज का पेट भरता है।
सनातन धर्म में
दान और वीरता का विशेष महत्व है।
परोपकार मानव जीवन की आवश्यकता है।
जब कष्ट के समय
कोई हमारी ओर मदद का हाथ बढ़ाता है,
तब वही भगवान के समान होता है।
भगवान भी तो
मनुष्य के रूप में ही
मददगार बनकर आते हैं।
नेपाल में आई बाढ़ में
हजारों लोगों की मृत्यु हुई,
करोड़ों रुपये की संपत्ति नष्ट हुई।
ऐसे संकट के समय
आस-पड़ोस के देशों ने
मदद के हाथ बढ़ाए।
यही सच्ची मानवता है।
मदद के हाथ
न्याय के लिए भी बढ़ते हैं।
कर्ण की असहाय अवस्था में
दुर्योधन ने उसकी ओर
मदद का हाथ बढ़ाया और
उसे अपने साथ खड़ा किया।
मदद के हाथ
ईश्वर के हाथ के समान होते हैं।
बेकार युवक को
नौकरी देने वाला मालिक
मदद का हाथ बढ़ाता है।
भारतीय सनातन धर्म में
अन्नदान करने वाले
पुण्यात्मा माने जाते हैं।
इसी प्रकार गोदान, भूदान
और स्वर्णदान का भी महत्व है।
आधुनिक वैज्ञानिक युग में
रक्तदान, नेत्रदान और
अंगदान का महत्वपूर्ण स्थान है।
एक जीवन बचाने के लिए
रक्तदान करने वाले
मदद के हाथ
सदैव सराहनीय हैं।
मदद के हाथ,
सहकारिता के बिना
मानव जीवन दुर्लभ है।
दूसरों की सहायता के लिए
मदद का हाथ बढ़ाने वाले ही
वास्तव में महान हैं।
मदद के हाथ बढ़ाइए—
मानवता को मजबूत बनाइए।