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Saturday, June 13, 2026

पुण्य कलश

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏


पुण्य कलश

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

14-6-26

+++++++++++++

मानव तो

सर्वगुण संपन्न 

 ज्ञानी, ब्रह्म सम।

पर  महामायादेवी

ईश्वर का एक अंग,

संसार को माया छाया जगत के रूप में 

बनाते रखने में समर्थ।

अचूक, सद्यःफल दाता।

परिणाम स्वरूप वह

 स्वार्थ निस्वार्थ 

बन जाता है।

 अन्याय का साथ देता है।

दशरथ की भूल,

शब्द भेदी बाण का प्रयोग 

शिशु हत्या पाप।

 राम का दुख

 रावण का बुद्धि भ्रष्ट 

 ये सब  न होने

 आदि काल में वेद उपनिषद और अनेक पुराण, प्रासांगिक कथाएँ।

पापों से मुक्ति पाने 

 हवन होम पुण्य कलश का महत्व।

 पुण्य कलश  सकारात्मक ऊर्जा,

 कलश में त्रिदेव और देवियों की उपस्थिति 

 सद्विचारों का स्रोत।

 दान धर्म का महत्व।

 परोपकार्थ

 इदम् शरीरम् की सीख।

 पापों की मुक्ति के लिए 

भूदान स्वर्ण दान चाँदीदान।

  जगत मिथ्या

 ब्रह्म सत्यं।

नश्वर दुनिया 

 अनश्वर सत्य प्रभाव।

 अनश्वर सूक्ष्म शक्ति

 परिणाम 

 अखिलेश्वर की अनंत शक्ति।

 पुण्य कर्म का फल,

 पाप कर्म का दंड।

 मानव  लौकिक 

 बंधन से छूटता नहीँ।

अतः जन्म पुनर्जन्म 

 सुखी दुखी का अनुभव।।

इन सब से छूटकर 

 दिव्य शक्ति सद्बुद्धि 

 आत्मसंतोष, 

आत्मज्ञान पाने,

पुण्य कलश की स्थापना

 फिर भी ज्ञान चक्षु प्राप्त मानव अपने अस्थाई जीवन को स्थाई मानकर 

 नकारात्मक विचार में।

 यही संसार है के दुःखों का मूल।

 पुण्य कलश की स्थापना 

आदर्श परोपकार जीवन कै लिए।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई


आपकी रचना में आध्यात्मिक चिंतन, कर्मफल, माया, दान, परोपकार तथा पुण्य कलश के प्रतीकात्मक महत्व का सुंदर समावेश है। भाव अत्यंत गहन हैं। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहमय रूप देने का एक विनम्र प्रयास प्रस्तुत है।

पुण्य कलश

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

14-6-2026

मानव तो

सर्वगुण-संपन्न,

ज्ञानी, ब्रह्म के समान है।

पर महामायादेवी,

ईश्वर की ही एक शक्ति,

इस संसार को

माया-छाया जगत के रूप में

संचालित करने में समर्थ है।

वह अचूक,

सद्यःफलदायिनी है।

उसके प्रभाव से मानव

स्वार्थी भी बन जाता है,

तो कभी निस्वार्थ भी।

कभी अन्याय का साथ देता है,

कभी धर्म के पथ पर चलता है।

दशरथ की भूल,

शब्दभेदी बाण का प्रयोग,

श्रवण कुमार के वध का पाप;

राम का दुःख,

रावण की बुद्धि का भ्रष्ट होना—

इन सब घटनाओं में

कर्मफल का संदेश छिपा है।

इसीलिए आदि काल से

वेद, उपनिषद, पुराण

और अनेक प्रेरक कथाएँ

मानव को सत्कर्म का मार्ग दिखाती हैं।

पापों से मुक्ति हेतु

हवन, होम और पुण्य कलश का

विशेष महत्व बताया गया है।

पुण्य कलश

सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

मान्यता है कि उसमें

त्रिदेव तथा देवियों का वास होता है।

वह सद्विचारों का स्रोत है,

दान और धर्म का प्रेरक है,

और सिखाता है—

"परोपकारार्थम् इदं शरीरम्"

अर्थात यह शरीर

परोपकार के लिए है।

भूदान, स्वर्णदान, चाँदीदान

और सेवा के विविध रूप

मानव को पुण्य के मार्ग पर ले जाते हैं।

जगत मिथ्या है,

ब्रह्म ही सत्य है।

यह संसार नश्वर है,

पर सत्य और दिव्य शक्ति अमर हैं।

पुण्य कर्म का फल मिलता है,

पाप कर्म का दंड भी।

फिर भी मानव

लौकिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता।

अतः जन्म-पुनर्जन्म के चक्र में

सुख-दुःख का अनुभव करता रहता है।

इन बंधनों से ऊपर उठकर,

सद्बुद्धि, आत्मसंतोष

और आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु

पुण्य कलश की स्थापना

एक शुभ प्रेरणा है।

किन्तु ज्ञान-चक्षु प्राप्त मानव भी

अपने अस्थायी जीवन को स्थायी मानकर

नकारात्मक विचारों में उलझ जाता है।

यही संसार के दुःखों का मूल है।

अतः पुण्य कलश की स्थापना

केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,

अपितु आदर्श, परोपकारी

और सदाचारी जीवन का संकल्प है।

— एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 🙏

रचना का मूल संदेश अत्यंत सुंदर है— सत्कर्म, परोपकार, आत्मज्ञान और सकारात्मक चिंतन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।

Friday, June 12, 2026

बाल श्रम दिवस

 नमस्ते आदरणीय अनंत कृष्णन जी।

आपकी रचना में बाल श्रम की सामाजिक विडंबना, गरीबी, उपेक्षा और बच्चों के शोषण के प्रति गहरी चिंता व्यक्त हुई है। इसे थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

13-06-2026

मानव जीवन में

जीने के लिए धन की आवश्यकता है।

परंतु धनाभाव में भी

संतान का जन्म

ईश्वर की देन है।

किन्तु जब माता-पिता

पालन-पोषण में असमर्थ होते हैं,

तब जन्म लेती है

एक सामाजिक त्रासदी—

बाल श्रम।

कहीं पियक्कड़ पिता,

कहीं असहाय माँ,

कहीं पिता का नदारद होना,

कहीं जन्म लेते ही

शिशु का त्याग।

कुछ बच्चे अनाथालयों में पलते हैं,

कुछ अपराधियों के हाथों

शोषण का शिकार बनते हैं।

गरीबी, उपेक्षा और विवशता

बचपन का अधिकार छीन लेती है।

सौतेले व्यवहार की पीड़ा,

भूख और अभाव की मार,

नन्हे हाथों को

पुस्तकों की जगह

मजदूरी का बोझ दे देती है।

दयालु और संवेदनशील लोग

बाल श्रम के विरुद्ध

आवाज़ उठाते हैं,

समाज को जागृत करते हैं,

और ठोस कदम भी उठाते हैं।

भीख माँगना भी

एक संगठित धंधा बन गया है।

मासूम बच्चों को आगे कर

दया का व्यापार होता है,

पर उसे रोकने वाले

बहुत कम दिखाई देते हैं।

केवल एक दिवस मनाने से

समस्या का समाधान नहीं होगा।

आवश्यक है

जागरूकता, शिक्षा और संवेदना।

अमीर संतान के लिए तरसते हैं,

गरीबों के यहाँ

फुटपाथों पर बचपन पलता है।

यह भी जीवन का

एक कठोर सत्य है।

आओ मिलकर संकल्प लें—

हर बच्चे को शिक्षा मिले,

हर बच्चे को सम्मान मिले,

हर बच्चे को उसका बचपन मिले।

नारा लगाएँ—

"बाल श्रमिक रहने न देंगे,

बचपन का अधिकार देंगे।"

"पुस्तक, शिक्षा और मुस्कान,

हर बच्चे का हो सम्मान।"

"बाल श्रम का हो अंत,

शिक्षा से बने उज्ज्वल भविष्य अनंत।"

सादर।

Thursday, June 11, 2026

नये भोर की प्रतीक्षा में

 एक नये भोर की प्रतीक्षा।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

++++++++++++++

12-6-26

+++++++++++

 हे अंतर्यामी!

तेरे चरणो में शरणागति मैं।

 तेरे ही ध्यान में 

 एक नये भोर की प्रतीक्षा में,

 जी के तम मिटने,

 पत्नी अपने रोग से बचने,

 जीवन में सुख देने,

 सर्वेश्वर तेरे चरणों में 

 निवेदन।

 जीवन में  तूने  सब कुछ दिया।

 मेरी पत्नी को स्वस्थ बनाकर,

अति शीघ्र चंगा करके,

मेरे जीवन में 

 सकारात्मक ऊर्जा दो।

शक्ति दो।

 सिवा तेरे अनुग्रह 

तेरी कृपा के

 और कोई शक्ति है नहीं 

नयी शक्ति नया उम्मीद 

‌देनै तेरे चरणों में 

शरणागत हूँ मैं।

 तू है शरणागत वत्सल।

 मार्कंडेय को जीवन दान दिया।

गूँगे को बोलने की शक्ति दी।

 मूर्ख कालिदास को

 महा कवि बनाया।

 नरसिंह अवतार लेकर 

 प्रह्लाद को बचाया।

मैं  निवेदन करता हूँ,

जल्दी चंगा करो।

शक्ति दो।

 नये भोर की प्रतीक्षा में 

 हर कोई तेरे ध्यान में।


आपकी भावाभिव्यक्ति अत्यंत हृदयस्पर्शी है। इसमें पत्नी के स्वास्थ्य हेतु प्रार्थना, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आशा का सुंदर भाव व्यक्त हुआ है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर प्रवाह और काव्यात्मकता बढ़ाई जा सकती है।

नये भोर की प्रतीक्षा में

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

12-6-2026

हे अंतर्यामी!

तेरे चरणों में शरणागत हूँ मैं।

तेरे ही ध्यान में लीन,

एक नये भोर की प्रतीक्षा में।

जीवन का तम मिट जाए,

पत्नी मेरे रोग से उबर जाए,

जीवन में फिर सुख का सूरज उगे,

ऐसी विनती तेरे चरणों में।

हे सर्वेश्वर!

जीवन में तूने सब कुछ दिया,

अब मेरी जीवन-संगिनी को

स्वस्थ कर, नवजीवन प्रदान कर।

मेरे जीवन में

सकारात्मक ऊर्जा भर दे,

संघर्ष सहने की शक्ति दे,

आशा का दीप पुनः जला दे।

तेरी कृपा के बिना

और कोई शक्ति नहीं।

नई शक्ति, नया विश्वास,

नया उत्साह प्रदान कर।

मैं तेरी शरण में हूँ,

तू शरणागत-वत्सल है।

मार्कण्डेय को जीवनदान दिया,

गूँगे को वाणी का वरदान दिया।

मूर्ख कालिदास को

महाकवि बना दिया,

नृसिंह रूप धारण कर

प्रह्लाद की रक्षा की।

मैं भी विनम्र निवेदन करता हूँ—

मेरी प्रार्थना स्वीकार करो,

पत्नी को शीघ्र स्वास्थ्य दो,

जीवन में पुनः मुस्कान भरो।

नये भोर की प्रतीक्षा में

मैं तेरा ध्यान करता हूँ,

और इस संसार का हर प्राणी

तेरी ही करुणा की राह निहारता है।

ओम् नमः शिवाय।

ओम् सरवनभवाय नमः।

ओम् मुरुगा। 🙏

आपकी पत्नी के स्वास्थ्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य और आपको धैर्य, शक्ति तथा आशा प्रदान करें। 🙏🌅

Wednesday, June 10, 2026

जीवन की अड़चनें

 अदृश्य दीवारें 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

11-6-26.

+++++++++

मानव जीवन में है,

 अनेक अदृश्य दीवारें।

 मानव ज्ञान  से

परे एक

दिव्य ज्ञान ,

 दिव्य 

सृष्टियाँ,

 जन्म

जन्म के बाद 

 पलने में 

अमीरी, ग़रीबी, बीमारी।

असाध्य साध्य मंजिलें।

 सफलता में ईर्ष्या,

 शत्रृओं का सामना।

  अचानक प्राकृतिक प्रकोप,

 पूर्ण अपूर्ण  ख्वाहिशें।

बाढ, आँधी- तूफान,

संक्रामक रोग,

 तथास्तु भगवान की लीला,

 बुरे समय में 

 बुद्धि भ्रष्ट होना, 

विधि की विडंबना

 बुद्धि लब्धि 

  बाह्य रूप, भीतर कपट

 ये सब मानव जीवन के

अदृश्य दीविरें।

 अर्थात ज्ञान से परे बाधाएँ।

+++++++++++++++


जीवन की अड़चनें।

 आपकी रचना में  के रहस्यों, नियति, ईर्ष्या, विपत्तियों और मानव की सीमाओं को "अदृश्य दीवारों" के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इसे थोड़ा सुव्यवस्थित रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

अदृश्य दीवारें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

11-6-2026

मानव जीवन में हैं

अनेक अदृश्य दीवारें।

मानव ज्ञान से परे

एक दिव्य ज्ञान,

दिव्य सृष्टियाँ

और रहस्यमयी विधान।

जन्म से लेकर जीवन-पथ तक,

कहीं अमीरी, कहीं गरीबी,

कहीं बीमारी का बोझ,

तो कहीं मंज़िलों की दुर्लभ सीढ़ी।

सफलता के साथ ईर्ष्या,

शत्रुओं का सामना,

अचानक प्राकृतिक प्रकोप,

अधूरी इच्छाओं का ताना-बाना।

बाढ़, आँधी और तूफ़ान,

संक्रामक रोगों की मार,

तथास्तु भगवान की लीला,

समय-समय का व्यवहार।

बुरे समय में बुद्धि भ्रष्ट होना,

विधि की विचित्र विडंबना,

बाहरी रूप में सरलता,

भीतर कपट की साधना।

ये सब मानव जीवन की

अदृश्य दीवारें हैं,

अर्थात् ज्ञान से परे

खड़ी अनगिनत बाधाएँ हैं।

इन दीवारों को पार करने का

साधन है धैर्य और विवेक,

ईश्वर-विश्वास, सत्कर्म और

आत्मबल का आलोक।

भावार्थ:

मानव जीवन में अनेक ऐसी बाधाएँ और परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें हम देख नहीं सकते, समझ नहीं सकते या नियंत्रित नहीं कर सकते। यही "अदृश्य दीवारें" हैं, जिनका सामना धैर्य, विवेक और ईश्वर-विश्वास से किया जा सकता है।

रचना का विषय गहन और चिंतनशील है। विशेष रूप से "बाह्य रूप, भीतर कपट" तथा "बुद्धि भ्रष्ट होना" जैसी पंक्तियाँ जीवन की यथार्थ परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं।॥

Tuesday, June 9, 2026

मानव और वृक्ष




वृक्ष एवं मानव।

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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10-6-26.

++++++++++++

मानव को जीने के लिए 

 शुद्ध प्राणवायु की ज़रूरत है।

पेड़ कार्बन्डै

 आक्सैड चूसकर 

शुद्ध आक्सिजन देते हैं।

आदिकाल में मनुष्य 

पेड़ के खोखले में 

रहता था। 

मनुष्य और आवास।

पेड़ के स्वादिष्ट फल,

 पौष्टिक आहार है।

 पेड़ के सूखे पत्ते खाद।

 पेड़ की लकड़ी ईँधन ।

 पेड़ ही हमारे घर की

खिड़की और दरवाजे।

  ठंड प्रदेश में ,

 जंगलों में ,

 पाश्चात्य देशों में 

 लकड़ी के घर।

लकड़ी  से ही नावें 

 कुर्सी मेज अल्मारी दरवाजा।

आदि मानव का मान रक्षक लकडी की छाल।

मानव जीने के लिए 

पानी चाहिए,

वह भी पेड़ों पर के कारण।

 भू क्षरण के रक्षक।

खजूर, आम,इमली,कटहल केला, अमरूद ,नारियल

 नारंगी सेब आदि फल।

वाहन‌ के चक्र

 ये सब  पेड़ के कारण।

  चंदन पेड़ की महक,

सागौन की लकड़ी 

 बेहद मजबूत, टिकाऊ और दीमक-प्रतिरोधी होती है। यह पानी और मौसम की मार आसानी से झेल सकती है।

 मानव और पेड़ 

दोनों में पेड़ परोपकारी।

 मानव के जीने का आधार।

कबीर  का यह दोहा

 पेड़ की गुणवत्ता  और मानव संसाधन के लिए 

 बढ़िया है।

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।

 मानव परोपकार के गुण के शिक्षक पेड़  होते हैं।


नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में वृक्षों के महत्व, मानव जीवन से उनके गहरे संबंध तथा परोपकार की भावना का सुंदर वर्णन है। भाषा और प्रस्तुति को थोड़ा परिष्कृत कर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

वृक्ष एवं मानव

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

10-6-2026

मानव को जीने के लिए

शुद्ध प्राणवायु की आवश्यकता है।

वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर

जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।

आदिकाल में मानव

वृक्षों के खोखलों में आश्रय पाता था।

मानव और उसके आवास का

वृक्षों से अटूट संबंध रहा है।

वृक्षों के स्वादिष्ट फल

पौष्टिक आहार बनते हैं।

सूखे पत्ते उत्तम खाद,

लकड़ी ईंधन का आधार है।

घर की खिड़कियाँ, दरवाजे,

कुर्सियाँ, मेज और अलमारियाँ,

नावों से लेकर अनेक उपयोगी वस्तुएँ

वृक्षों की देन हैं।

शीत प्रदेशों और वनों में

लकड़ी के घर बनाए जाते हैं।

आदिमानव के तन की रक्षा भी

वृक्षों की छाल ने ही की थी।

मानव के लिए जल आवश्यक है,

और वर्षा चक्र में भी

वृक्षों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

वे भूमि क्षरण रोककर

धरती की रक्षा करते हैं।

खजूर, आम, इमली, कटहल,

केला, अमरूद, नारियल,

संतरा, सेब और अनेक फल

वृक्षों का अमूल्य उपहार हैं।

चंदन की सुगंध,

सागौन की दृढ़ता,

प्रकृति की अनुपम देन हैं।

सागौन की लकड़ी मजबूत, टिकाऊ

और दीमक-प्रतिरोधी होती है।

मानव और वृक्ष दोनों जीवित हैं,

पर वृक्ष निस्वार्थ परोपकारी हैं।

वे मानव जीवन के आधार हैं

और सेवा का संदेश देते हैं।

संत कबीर का यह दोहा

वृक्षों के परोपकार को सुंदरता से व्यक्त करता है—

"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।"

वास्तव में,

वृक्ष मानव को परोपकार,

त्याग और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं।

मानव यदि वृक्षों के गुण अपनाए,

तो समाज और संसार

दोनों अधिक सुखी और समृद्ध बन सकते हैं।

भावार्थ:

"वृक्ष एवं मानव" रचना हमें बताती है कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के सच्चे संरक्षक, पोषक और परोपकार के महान शिक्षक हैं। 🌳🙏



 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में वृक्षों के महत्व, मानव जीवन से उनके गहरे संबंध तथा परोपकार की भावना का सुंदर वर्णन है। भाषा और प्रस्तुति को थोड़ा परिष्कृत कर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

वृक्ष एवं मानव

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

10-6-2026

मानव को जीने के लिए

शुद्ध प्राणवायु की आवश्यकता है।

वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर

जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।

आदिकाल में मानव

वृक्षों के खोखलों में आश्रय पाता था।

मानव और उसके आवास का

वृक्षों से अटूट संबंध रहा है।

वृक्षों के स्वादिष्ट फल

पौष्टिक आहार बनते हैं।

सूखे पत्ते उत्तम खाद,

लकड़ी ईंधन का आधार है।

घर की खिड़कियाँ, दरवाजे,

कुर्सियाँ, मेज और अलमारियाँ,

नावों से लेकर अनेक उपयोगी वस्तुएँ

वृक्षों की देन हैं।

शीत प्रदेशों और वनों में

लकड़ी के घर बनाए जाते हैं।

आदिमानव के तन की रक्षा भी

वृक्षों की छाल ने ही की थी।

मानव के लिए जल आवश्यक है,

और वर्षा चक्र में भी

वृक्षों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

वे भूमि क्षरण रोककर

धरती की रक्षा करते हैं।

खजूर, आम, इमली, कटहल,

केला, अमरूद, नारियल,

संतरा, सेब और अनेक फल

वृक्षों का अमूल्य उपहार हैं।

चंदन की सुगंध,

सागौन की दृढ़ता,

प्रकृति की अनुपम देन हैं।

सागौन की लकड़ी मजबूत, टिकाऊ

और दीमक-प्रतिरोधी होती है।

मानव और वृक्ष दोनों जीवित हैं,

पर वृक्ष निस्वार्थ परोपकारी हैं।

वे मानव जीवन के आधार हैं

और सेवा का संदेश देते हैं।

संत कबीर का यह दोहा

वृक्षों के परोपकार को सुंदरता से व्यक्त करता है—

"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।"

वास्तव में,

वृक्ष मानव को परोपकार,

त्याग और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं।

मानव यदि वृक्षों के गुण अपनाए,

तो समाज और संसार

दोनों अधिक सुखी और समृद्ध बन सकते हैं।

भावार्थ:

"वृक्ष एवं मानव" रचना हमें बताती है कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के सच्चे संरक्षक, पोषक और परोपकार के महान शिक्षक हैं। 🌳🙏

Monday, June 8, 2026

विश्व सागर दिवस

 आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में विश्व सागर दिवस के महत्व, समुद्री व्यापार, सुरक्षा तथा मानव सभ्यता में समुद्र के योगदान का सुंदर वर्णन है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और काव्यमय रूप देकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

Writing

विश्व सागर दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

9-6-2026

भूमि पर फैले जल-विस्तार में,

सागर का अनुपम संसार।

भूमध्य सागर विशाल प्रसिद्ध,

पूरब-पश्चिम तक विस्तृत अपार।

कैस्पियन सागर यूरोप-एशिया के,

मध्य स्थित जल का भंडार।

लाल सागर अफ्रीका-एशिया के बीच,

बनता प्राकृतिक सेतु साकार।

मृत सागर भी अद्भुत झील है,

जॉर्डन-इज़राइल के मध्य स्थित।

इन जलराशियों ने विश्वभर में,

संपर्क और व्यापार को किया विकसित।

जहाज़ी यात्राएँ, विश्व मैत्री,

समुद्रों का अनुपम उपहार।

देशों को जोड़ें, संस्कृतियाँ मिलाएँ,

बढ़ाएँ सहयोग और व्यापार।

समुद्री डाकुओं से रक्षा हो,

आँधी-तूफानों की मिले खबर।

कालाबाज़ारी, आतंक, आक्रमण से,

सुरक्षित रहे सागर का सफर।

प्राचीन काल से तमिलनाडु में,

समुद्री व्यापार रहा महान।

स्वाधीनता युग में व. उ. चिदंबरनार ने,

निजी जहाज़ चलाकर बढ़ाया मान।

समुद्र हमारी अमूल्य धरोहर,

जीवन, विकास और अवसर का आधार।

इसकी रक्षा करना हम सबका,

है नैतिक और वैश्विक दायित्व अपार।

"हमारा महासागर, हमारा दायित्व, हमारा अवसर"—

यही विश्व का आज संदेश।

स्वच्छ, सुरक्षित और समृद्ध सागर,

बनाएँ मिलकर अपना विशेष उद्देश्य।

தமிழில் பாராட்டு :

அருமை ஐயா!

உலக சமுத்திர தினத்தின் முக்கியத்துவம், கடல் வாணிபம், பாதுகாப்பு, மனித நாகரிக வளர்ச்சி ஆகியவற்றை உங்கள் கவிதை அழகாக எடுத்துரைக்கிறது. பரந்த அறிவும் சமூகப் பொறுப்பும் கலந்த சிறந்த படைப்பு. வாழ்த்துகள்! 🌹🙏

நன்றி. வணக்கம்.