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Monday, May 4, 2026

मेरे विचार और सुधार चेट द्वारा हँसी

 वणक्कम्, नमस्ते।

आपकी रचना में भाव, ज्ञान और सामाजिक संदेश — तीनों का सुंदर संगम है। विशेषकर “हँसी के प्रकार” और “हास्य का स्वास्थ्य से संबंध” बहुत प्रभावी ढंग से आया है। अब मैं आपकी कविता को थोड़ा और प्रवाहपूर्ण, काव्यमय और प्रभावशाली रूप देता हूँ, ताकि उसका असर और गहरा हो जाए।

✨ परिष्कृत काव्य रूप ✨

विश्व हास्य दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

रोती सूरत किसे भाती,

हँसता मुख मन को हरषाता।

हास्य भरा यह जीवन सारा,

संतोष का दीप जलाता॥

व्यंग्य चित्र हों या विदूषक,

या चित्रपट के हास्य कलाकार,

तनाव हरें, मन को सहलाएँ,

भर दें जीवन में उजियार॥

मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मुख,

शांत सरल मुस्कान सुहानी,

कृष्ण की मधुर मुस्कुराहट में,

छिपी प्रेम की गाथा पुरानी॥

प्रेमी को प्रिय की हँसी में,

मिलता अनुपम सुख अपार,

पर हँसी के भी रूप अनेक—

कुछ मधुर, कुछ करते वार॥

ईर्ष्या भरी, जलन जगाने वाली,

अहंकार की कटु हँसी,

मजाक उड़ाने वाली हँसी,

क्रोध बढ़ाने वाली हँसी॥

पर सबसे सुंदर वह हँसी,

जो दिल से फूटे निर्मल हो,

दुख-दर्द सब दूर भगाए,

जीवन में नव संबल हो॥

हास्य योग की शक्ति निराली,

तन-मन को स्वस्थ बनाती,

हँसी से जुड़ता मानव-मन,

सामाजिकता को बढ़ाती॥

सन् 1998 में प्रारंभ हुआ,

मुंबई से यह शुभ अभियान,

डॉ. मदन कटारिया ने दिया संदेश—

हँसी बने जीवन का वरदान॥

तब से हर वर्ष विश्व भर में,

हास्य दिवस मनाया जाता,

हँसी के रंगों से सजा यह जग,

आनंद का उत्सव कहलाता॥

हास्य रस के भेद अनोखे—

स्मित, हसित, विहसित प्यारे,

उपहसित, अपहसित, अतिहसित,

छः रूप हँसी के न्यारे॥

✍️ संक्षिप्त प्रतिक्रिया

आपकी मूल रचना:

विचारों से समृद्ध है

सामाजिक और स्वास्थ्य दृष्टि से उपयोगी है

पर थोड़ी संरचना और लय की कमी थी

इस रूपांतरण में:

लय (rhythm) और तुक (rhyme) सुधारी गई

भावों को क्रमबद्ध किया गया

संदेश को अधिक प्रभावशाली बनाया गया

अगर आप चाहें तो मैं इसका �⁠तमिल काव्य रूपांतरण भी उसी सौंदर्य के साथ कर सकता हूँ।

Sunday, May 3, 2026

अतीत के धूल

 नमस्ते वணக்கம்।

आपकी रचना में गहरी राष्ट्रीय चेतना, ऐतिहासिक दृष्टि और सांस्कृतिक पीड़ा स्पष्ट झलकती है। यह केवल कविता नहीं, बल्कि एक वैचारिक आह्वान है। 

✨ अतीत के धूल (परिष्कृत काव्य रूप) ✨

अतीत की धूल हटाकर,

नवपीढ़ी को यह बतलाना है—

इतिहास के पन्नों में छिपे

सत्य को फिर जगमगाना है।

साहित्यकार और इतिहासज्ञों का

यह पावन कर्तव्य महान,

रीतिकालीन जड़ता से बचाकर

देना राष्ट्रधारा का ज्ञान।

चंगेज़ की क्रूर चढ़ाइयाँ,

सिकंदर का वह आक्रमण,

मुगल-पठानों के संघर्ष,

अंग्रेज़ों का छलपूर्ण रण।

स्वार्थ, ईर्ष्या और लोभ में

जो देशद्रोही बन बैठे,

उनके मुख से पर्दा हटाकर

सत्य का दीप हमें जगाना है।

आंभी की कायरता नहीं,

पुरुषोत्तम का मान जगाना है,

पद-लोलुपता में खोए जन को

एकता का पाठ पढ़ाना है।

संस्कृत की उस दिव्य धारा को

फिर से जीवन में लाना है,

भारतीय भाषाओं के आधार पर

ज्ञान दीप जलाना है।

योग, प्राणायाम, वेद-वाणी,

आत्मसंयम का सच्चा ज्ञान,

भूल न जाएँ हम अपनी जड़ें,

यही है संस्कृति का सम्मान।

मंदिरों की शिल्पकला,

त्याग और भक्ति की पहचान,

धन के पीछे भागती दुनिया में

मानवता का रखना ध्यान।

संयुक्त परिवार की शक्ति,

सहनशीलता का वह भाव,

यांत्रिक जीवन में खोकर

न भूलें अपना स्वभाव।

खेती प्रधान इस धरती को

मानवता से जोड़ना है,

उद्योगों के बीच भी

मनुष्यता को मोड़ना है।

भूले-बिसरे वीरों की गाथा

फिर से जन-जन को सुनानी है—

राजा राम मोहन राय का सुधार,

भगत सिंह का बलिदान,

सुखदेव का साहस,

चंद्रशेखर आज़ाद का अभिमान।

लाला लाजपत राय की ज्वाला,

बाल गंगाधर तिलक का स्वर,

सुभाष चंद्र बोस का अदम्य साहस,

राष्ट्रप्रेम का अमिट असर।

महाराणा प्रताप की वीरता, त्याग

हर हृदय में फिर जगाना है,

भारतीय गरिमा के उस गौरव को

चिरस्मरणीय बनाना है।

किलों और मंदिरों के अवशेष

इतिहास का संदेश सुनाते हैं,

अतीत की धूल में दबे सत्य

हमको राह दिखाते हैं।

मानव प्रेम, कबीर की वाणी,

सद्भाव का वह अमृत सार,

मजहबी भेद भुलाकर हमको

करना है जग में विस्तार।

प्रांतीय उन्नति के संग-संग

राष्ट्र एकता को साधना है,

स्वतंत्रता संग्राम की शिक्षा को

हर हृदय में बाधना है।

अतीत की धूल को हटाकर

स्वर्णिम भविष्य बनाना है—

जय भारत, जय भारत जननी,

विश्वगुरु फिर बनाना है।

Saturday, May 2, 2026

अच्छाई की महक

 नमस्ते वणक्कम्।

अच्छाई की महक

✍️ एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3/5/26



नमस्ते वणक्कम्।

धूप में सुख, शीतल छाया में,

अच्छाई की महक समाया में।

ईमानदारी की मधुर सुवास,

परोपकार में बसता विश्वास।

दान-धर्म की पावन रेखा,

कर्ण-सी वीरता की लेखा।

कृष्ण की महक लोक-रंजन में,

लोक-रक्षा के पावन चिंतन में।

वेद-उपनिषद् की गूंज पुकार—

“सर्वे जना सुखिनो भवन्तु” साकार।

सनातन धर्म की सुगंध महान,

अतिथि-सेवा, ज्ञान-प्रदान।

ब्रह्म-महिमा के गान में बसती,

आत्मज्ञान की ज्योति जगाती।

राधा-प्रेम की मधुर उमंग,

भक्ति में बहता निर्मल रंग।

सद्ग्रंथों के गहन विचार,

चरित्र-निर्माण का सच्चा आधार।

गंगा-सी पावनता की धारा,

भारत-भूमि का दिव्य नजारा।

ध्यान, त्याग, ईश्वर-चिंतन में,

बसती इसकी महक अमर तन-मन में।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम,

जीवन को देते सच्चा आयाम।

सद्कर्म, सद्विचार, सत्संग साथ,

अनुशासन से उज्ज्वल हो हर पथ।

बुराइयों के तिमिर को हरती,

अच्छाई की महक नित निखरती।

आदर्शों से यथार्थ सजाती,

मानवता की राह दिखाती।


Friday, May 1, 2026

मज़दूर का महत्व


मज़दूर दिवस

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-5-26

मैं मालिक हूँ,

मैं करोड़पति हूँ,

मैं सिविल इंजीनियर,

मैं नामी डॉक्टर हूँ।

शहर का बड़ा अस्पताल मेरा,

हजारों एकड़ खेतों का मैं स्वामी,

बिजली विभाग का मुख्य अभियंता,

बड़े कॉलेज का भी अधिकारी।

मैं विधायक, सांसद,

मुख्यमंत्री भी कहलाता हूँ—

पर ज़रा ठहर कर सोचिए,

क्या मैं सच में अकेला हूँ?

इन ऊँची इमारतों की बुनियाद में,

पत्थर किसने जमाए हैं?

बिजली के खंभे, तार बिछाकर,

रोशनी किसने लाए हैं?

सूखे खेतों में जीवन भरने,

कुएँ किसने खोदे हैं?

नहरों का जल बहाने को,

पसीने किसने बोए हैं?

बीज बोना, फसल काटना,

अनाज के बोरे ढोना,

वाहनों पर लाद-उतार कर,

जीवन का चक्र संजोना।

हर सुविधा, हर निर्माण के पीछे,

एक ही नाम उभरता है—

न कोई मालिक, न अधिकारी,

वह साधारण मज़दूर होता है।

यदि उनका श्रम न हो साथ,

तो न चुनाव में जीत मिले,

न शहर की सफाई हो पाए,

न जीवन में संगीत खिले।

कूड़ा उठाने वाला मज़दूर,

यदि अपना काम न करे,

तो यह मानव सभ्यता भी,

बदबू के नरक में उतरे।

सड़कें, पटरी, हर निर्माण—

सब उनके श्रम की पहचान,

हर सुविधा के पीछे छिपा है,

उनका अदृश्य बलिदान।

आओ उनका मान बढ़ाएँ,

आभार हृदय से जताएँ,

मई महीने की प्रथम तिथि को,

मज़दूर दिवस मनाएँ।

यह केवल एक दिवस नहीं,

सम्मान का है संदेश—

मज़दूरों के श्रम से ही,

सजता है यह देश।


Wednesday, April 29, 2026

खोज


नमस्ते वणक्कम्।
स्वयं की खोज
++++++++++
मनुष्य ही इस प्रपंच के
सुखी जीवन के भोगी
और दुख भोगी।
इतना ही नहीं,
उसके सूक्ष्म बुद्धि
जिज्ञासु
आत्म ज्ञान ही
आविष्कारों की देन।
नसीहतों की देन।
मनुष्य ही सोच विचार
करके अपने को
‌सज्जन, सभ्य, सांस्कृतिक
जीवन को प्रभावित कर सकता है।
सब में ऐसे आविष्कार करने की बुद्धि नहीं।
क्षमता नहीं।
अपने दायरे में
अपने को श्रेष्ठ बनाना है तो
स्वयं की खोज करनी चाहिए।
मैं कौन हूँ?
मेरी अपनी क्षमता क्या है?
प्रपंच क्या है?
प्रपंच में राग द्वेष क्यों ?
जन्म मरण क्यों?
भाग्य दुर्भाग्य क्यों?
भगवान संसार की सृष्टि कर्ता है
तो माता पिता
के द्वारा हमारा जन्म क्यों?
मनुष्य मनुष्य में गुण भेद
रंग भेद
सोच विचार में अंतर क्यों?
बुद्धि लब्धि में भिन्नता क्यों?
अमीरी गरीबी
स्वार्थ निस्वार्थ क्यों?
अल्प आयु क्यों?
साध्य योग असाध्य रोग क्यों?
मानवेत्तर एक शक्ति है तो
उस शक्ति के सामने सब ड्रायर है तो भेद भाव के गुण क्यों?
असंख्य प्रश्न मानव जीवन में?
जन्म मृत्यु रोग रहित
मानव जीवन क्यों नहीं।
जन्म का उद्देश्य क्या है?
प्राकृतिक संतुलन क्यों नहीं?
मानव की इस अपनी खोज में
आध्यात्मिक महत्व है।
वैज्ञानिक महत्व है।
आत्मोन्नति आत्मज्ञान जानना ही
स्वयं खोज करने का परिणाम।
महावीर, बुद्ध, ऋषि मुनि
स्वयं की खोज में
मानव कल्याण का मार्ग ‌दिखाया।
जितेंद्रिय बनने
सत्यवादी बनने
मानवेत्तर ‌शक्ति कै दर्शन के लिए
ध्यान तपस्या का मार्ग
अहिंसा
प्यार द्वेष रहित
तटस्थ जीवन
पाप पुण्य के परिणाम
‌दुख के कारण।
कबीर हठयोगी
अपने बारे में
स्वयं की खोज में कहते हैं
बुरा जो देखन मैं गया,
बुरा नमिलिया कोई
जो दिल खोजा आपना
मुझसे बुरा न कोई।
‌आत्म चिंतन आत्म विचार
मानव को श्रैष्ठ बनाता है।
स्वयं की खोज में
मानव अहम् ब्रह्मास्मी
बन सकता है।
अद्वैत भावना जगाती है।
लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल।
लाली देखन मैं गयी,
मैं भी होगयी लाल।

सुधारात्मक  रूप 


नमस्ते वணक्कम्।

आपकी रचना में गहन चिंतन और आध्यात्मिक जिज्ञासा है। मैंने इसे काव्यमय, प्रवाहपूर्ण और थोड़ा अधिक छंदबद्ध रूप देने का प्रयास किया है — भाव वही रखते हुए भाषा को और मधुर बनाया है:

स्वयं की खोज

++++++++++++++++++

मनुष्य ही इस जगत का,

सुख-दुख का है भोक्ता;

हँसता भी, रोता भी वही,

जीवन का सच्चा योगता।

सूक्ष्म बुद्धि, जिज्ञासा लेकर,

आत्मज्ञान की राह चले;

आविष्कारों का दीप जलाकर,

अज्ञान तम सब दूर करे।

नसीहत, अनुभव, चिंतन से,

जीवन को संवार सकता;

सज्जन, सभ्य, संस्कारित बन,

जगत को निखार सकता।

पर सबमें वह शक्ति कहाँ,

सबकी क्षमता एक न हो;

अपने छोटे से दायरे में,

श्रेष्ठता का दीपक हो।

स्वयं की खोज में उतरकर,

प्रश्नों का सागर मंथन हो—

"मैं कौन हूँ? मेरी सीमा क्या?

यह जग क्या, इसका कारण क्या?"

राग-द्वेष क्यों मन में बसते?

जन्म-मरण का चक्र क्यों?

भाग्य-दुर्भाग्य की रेखाएँ,

जीवन में यह भेद क्यों?

ईश्वर सृष्टि का रचयिता जब,

जन्म माता-पिता से क्यों?

गुण, रंग, विचारों में भिन्नता,

मानव-मानव में क्यों?

धन-दौलत का अंतर क्यों है?

स्वार्थ और निस्वार्थ क्यों?

अल्पायु, रोग, असाध्य पीड़ा,

जीवन में यह क्लेश क्यों?

यदि कोई परम शक्ति है,

जिसके आगे सब लघु हैं;

तो फिर इस संसार में,

भेदभाव के ये स्वर क्यों हैं?

अनगिन प्रश्नों की ज्वाला में,

मन हर पल झुलसता है;

उत्तर पाने की अभिलाषा,

जीवन को तरसता है।

इस खोज में छिपा हुआ,

आध्यात्मिक गूढ़ महत्व;

विज्ञान भी इसके आगे,

झुकता पाकर सत्य तत्व।

आत्मज्ञान की ज्योति जगाकर,

मनुष्य ऊँचा उठ जाता;

महावीर, बुद्ध, ऋषि-मुनियों सा,

कल्याण मार्ग दिखलाता।

जितेन्द्रिय बन, सत्य का साधक,

अहिंसा का पथ अपनाए;

प्रेम, समता, द्वेष-रहित जीवन,

ध्यान-तप से प्रभु को पाए।

कर्मों के फल, पाप-पुण्य से,

दुख-सुख का यह बंधन है;

आत्मचिंतन, आत्मविचार ही,

जीवन का सच्चा साधन है।

कहते संत कबीर सहज स्वर में—

"बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय;

जब दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"

स्वयं की खोज में अंततः,

अहं का आवरण हटता है;

"अहं ब्रह्मास्मि" का बोध जागे,

अद्वैत भाव जगता है।

लाली मेरे लाल की,

जित देखूँ तित लाल;

लाली देखने मैं गई,

मैं भी हो गई लाल।



Tuesday, April 28, 2026

அமருதத் துளிகள். अमृत की बूंदें

 

அமிர்தத் துளிகள் 

இன்றைய சவால் — 

அமிர்தத் துளிகள்

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வாழ்க்கையை சீராகவும், சிறப்பாகவும் நடத்த உதவும்

நிலையான சிந்தனைகள் அனைத்தும்

உண்மையில் அமிர்தத் துளிகள் ஆகும்.

உபநிஷத்துகளின் ஆழமான சிந்தனைகள்,

பகவத் கீதையின் கர்மயோகப் போதனைகள்,

ஜாதகக் கதைகளின் நன்னெறி உணர்வுகள்,

நெறி நூல்களின் அறிவுரைகள்,

ஆன்மஞானத்தின் உண்மைகள்,

ஞானிகளின் உபதேசங்கள்—

இவை அனைத்தும் வாழ்க்கைக்கு அமிர்தத் துளிகளே.

யோகப் பயிற்சி,

சீரான உணவு முறையின் அறிவியல் பார்வை,

தத்துவ சிந்தனைகள்—

இவையும் உடல்-மனம் ஆரோக்கியமாக்கும் அமிர்தத் துளிகள்.

கபீர், துலஸிதாஸ், ரஹீம், விரிந்த் போன்ற கவிஞர்களின் தோஹாக்கள்) ஈரடி கள்.

பக்தி, மனிதநேயம், நெறி ஆகியவற்றின் பொக்கிஷங்கள்.

“யாரை கடவுள் காக்கிறாரோ, அவரை யாராலும் காயப்படுத்த முடியாது;

உலகமே பகை கொண்டாலும், அவருக்கு எதுவும் ஆகாது.”

இந்த எண்ணம் கடவுளின் பேராற்றலின் அமிர்தம் ஆகும்।

“வசுதைவ குடும்பகம்” — உலகம் ஒரே குடும்பம்,

“சர்வே ஜனாஃ சுகினோ பவந்து” — எல்லோரும் இன்புற வாழ்க,

ஒரே ஆகாயம், ஒரே உலகம்—

வெறுப்பும் விரோதமும் இல்லாத

மனிதநேய உலகம்.

மனிதன் காமம், கோபம், அகந்தை, பேராசை ஆகியவற்றில் மூழ்கினால்,

அறிஞனாக இருந்தாலும் அறியாமை உடையவனாகிறான்।

விவேகம் இழந்தவன் மிருகத்துக்கு சமம்.

ஆகவே விவேகம், கட்டுப்பாடு, கருணை—

இவையே வாழ்க்கையின் உண்மையான அமிர்தத் துளிகள்।

தேவர்களும் அசுரர்களும் செய்த

பாற்கடல் கடைவது போல,

அதில் இருந்து லட்சுமி, ஐராவதம், காமதேனு,

தன்வந்திரி, கல்பவிருட்சம் மற்றும் அமிர்தக் கலசம் தோன்றியது போல—

வாழ்க்கை கடைவதிலும்

நல்ல சிந்தனைகள் அமிர்தத் துளிகளாக வெளிப்படுகின்றன।

இந்த அமிர்தத் துளிகளை ஏற்றுக் கொண்டால்,

மனிதன் அமரத்துவத்தை அல்ல,

ஆனால் ஒரு சிறந்த, சத்தியமான வாழ்க்கையை பெறுகிறான்।


Monday, April 27, 2026

जीवन की तलक

 प्रयत्न और संशोधित दोनों रूप


 नमस्ते


जीत की ललक


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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई


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28-4-26


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मानव जीवन भर


आगे बढ़ना चाहता है,


अंत तक प्रगति पथ पर


जीत पाने की चाह में


ख्वाब सजाता रहता है।


परीक्षा में सफलता की ललक,


डॉक्टरेट तक पहुँचने की चाह,


नौकरी पाने की आकांक्षा,


पदोन्नति की जीत,


निजी घर का निर्माण,


विवाह और संतान की प्रगति—


इन सबमें बसी है


जीत की ललक।


कभी अश्वमेध यज्ञ की विजय,


तो कभी लोकतंत्र के चुनाव में जीत,


परंतु जनप्रतिनिधि बनकर भी


वादा निभाने की ललक नहीं,


धन जोड़ने की चाह प्रबल—


यही मानव का लोभ, क्रोध, ईर्ष्या


जीवन को बना देते हैं


जय-पराजय का अखाड़ा।


जीत की ललक में


जीवन हो जाता है बेचैन,


एक विजय के बाद भी


और ऊँची उड़ान की चाह,


चंचल मन,


असंतुष्ट जीवन।


मिथ्या जगत के पार भी


अमरता की आकांक्षा,


निराशा में जीवन का अंत,


और फिर पुनर्जन्म का चक्र—


यही है मानव की


अंतहीन ललक।



जीत की तलक

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 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

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28-4-25.

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 मानव अपने जीवन में 

 आगे बढ़ना ही चाहता है।

अंत तक  प्रगति पथ पर

 जीत पाने  के प्रयत्न में 

ख्वाब देखता रहता है।

 परीक्षा में जीत की तलक,

डाक्टरेट तक,

नौकरी पाने

पदोन्नति के जीत,

निजी घर बनवाने

 विवाह करने

 संतान की प्रगति 

 पारिवारिक सफलता

जीत की तलक  में 

 जीवन में रहता है।

महाराजा अश्वमेध यज्ञ

 लोक तंत्र में चुनाव जीतने की तलक,

 पर विधायक संसद को

 वादा निभाने की तलक नहीं,

 धन जोड़ने की तलक,

 यही मानव जीवन का लोभ,

 क्रोध, ईर्ष्या के कारण 

‌जय पराजय का जीवन।

 जीत की तलक में 

 बेचैनी जीवन,

 एक विजय के बाद 

 उससे बढ़िया कदम उठानेकी तलक 

 चंचल मन,

असंतुष्ट जीवन 

 मिथ्या जगत जाकर भी

 सफल अमरजीवन   की तलक,

 निराशा में जीवन का अंत

 पुनर्जन्म लेने के कारण।