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Wednesday, April 29, 2026

खोज


नमस्ते वणक्कम्।
स्वयं की खोज
++++++++++
मनुष्य ही इस प्रपंच के
सुखी जीवन के भोगी
और दुख भोगी।
इतना ही नहीं,
उसके सूक्ष्म बुद्धि
जिज्ञासु
आत्म ज्ञान ही
आविष्कारों की देन।
नसीहतों की देन।
मनुष्य ही सोच विचार
करके अपने को
‌सज्जन, सभ्य, सांस्कृतिक
जीवन को प्रभावित कर सकता है।
सब में ऐसे आविष्कार करने की बुद्धि नहीं।
क्षमता नहीं।
अपने दायरे में
अपने को श्रेष्ठ बनाना है तो
स्वयं की खोज करनी चाहिए।
मैं कौन हूँ?
मेरी अपनी क्षमता क्या है?
प्रपंच क्या है?
प्रपंच में राग द्वेष क्यों ?
जन्म मरण क्यों?
भाग्य दुर्भाग्य क्यों?
भगवान संसार की सृष्टि कर्ता है
तो माता पिता
के द्वारा हमारा जन्म क्यों?
मनुष्य मनुष्य में गुण भेद
रंग भेद
सोच विचार में अंतर क्यों?
बुद्धि लब्धि में भिन्नता क्यों?
अमीरी गरीबी
स्वार्थ निस्वार्थ क्यों?
अल्प आयु क्यों?
साध्य योग असाध्य रोग क्यों?
मानवेत्तर एक शक्ति है तो
उस शक्ति के सामने सब ड्रायर है तो भेद भाव के गुण क्यों?
असंख्य प्रश्न मानव जीवन में?
जन्म मृत्यु रोग रहित
मानव जीवन क्यों नहीं।
जन्म का उद्देश्य क्या है?
प्राकृतिक संतुलन क्यों नहीं?
मानव की इस अपनी खोज में
आध्यात्मिक महत्व है।
वैज्ञानिक महत्व है।
आत्मोन्नति आत्मज्ञान जानना ही
स्वयं खोज करने का परिणाम।
महावीर, बुद्ध, ऋषि मुनि
स्वयं की खोज में
मानव कल्याण का मार्ग ‌दिखाया।
जितेंद्रिय बनने
सत्यवादी बनने
मानवेत्तर ‌शक्ति कै दर्शन के लिए
ध्यान तपस्या का मार्ग
अहिंसा
प्यार द्वेष रहित
तटस्थ जीवन
पाप पुण्य के परिणाम
‌दुख के कारण।
कबीर हठयोगी
अपने बारे में
स्वयं की खोज में कहते हैं
बुरा जो देखन मैं गया,
बुरा नमिलिया कोई
जो दिल खोजा आपना
मुझसे बुरा न कोई।
‌आत्म चिंतन आत्म विचार
मानव को श्रैष्ठ बनाता है।
स्वयं की खोज में
मानव अहम् ब्रह्मास्मी
बन सकता है।
अद्वैत भावना जगाती है।
लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल।
लाली देखन मैं गयी,
मैं भी होगयी लाल।

सुधारात्मक  रूप 


नमस्ते वணक्कम्।

आपकी रचना में गहन चिंतन और आध्यात्मिक जिज्ञासा है। मैंने इसे काव्यमय, प्रवाहपूर्ण और थोड़ा अधिक छंदबद्ध रूप देने का प्रयास किया है — भाव वही रखते हुए भाषा को और मधुर बनाया है:

स्वयं की खोज

++++++++++++++++++

मनुष्य ही इस जगत का,

सुख-दुख का है भोक्ता;

हँसता भी, रोता भी वही,

जीवन का सच्चा योगता।

सूक्ष्म बुद्धि, जिज्ञासा लेकर,

आत्मज्ञान की राह चले;

आविष्कारों का दीप जलाकर,

अज्ञान तम सब दूर करे।

नसीहत, अनुभव, चिंतन से,

जीवन को संवार सकता;

सज्जन, सभ्य, संस्कारित बन,

जगत को निखार सकता।

पर सबमें वह शक्ति कहाँ,

सबकी क्षमता एक न हो;

अपने छोटे से दायरे में,

श्रेष्ठता का दीपक हो।

स्वयं की खोज में उतरकर,

प्रश्नों का सागर मंथन हो—

"मैं कौन हूँ? मेरी सीमा क्या?

यह जग क्या, इसका कारण क्या?"

राग-द्वेष क्यों मन में बसते?

जन्म-मरण का चक्र क्यों?

भाग्य-दुर्भाग्य की रेखाएँ,

जीवन में यह भेद क्यों?

ईश्वर सृष्टि का रचयिता जब,

जन्म माता-पिता से क्यों?

गुण, रंग, विचारों में भिन्नता,

मानव-मानव में क्यों?

धन-दौलत का अंतर क्यों है?

स्वार्थ और निस्वार्थ क्यों?

अल्पायु, रोग, असाध्य पीड़ा,

जीवन में यह क्लेश क्यों?

यदि कोई परम शक्ति है,

जिसके आगे सब लघु हैं;

तो फिर इस संसार में,

भेदभाव के ये स्वर क्यों हैं?

अनगिन प्रश्नों की ज्वाला में,

मन हर पल झुलसता है;

उत्तर पाने की अभिलाषा,

जीवन को तरसता है।

इस खोज में छिपा हुआ,

आध्यात्मिक गूढ़ महत्व;

विज्ञान भी इसके आगे,

झुकता पाकर सत्य तत्व।

आत्मज्ञान की ज्योति जगाकर,

मनुष्य ऊँचा उठ जाता;

महावीर, बुद्ध, ऋषि-मुनियों सा,

कल्याण मार्ग दिखलाता।

जितेन्द्रिय बन, सत्य का साधक,

अहिंसा का पथ अपनाए;

प्रेम, समता, द्वेष-रहित जीवन,

ध्यान-तप से प्रभु को पाए।

कर्मों के फल, पाप-पुण्य से,

दुख-सुख का यह बंधन है;

आत्मचिंतन, आत्मविचार ही,

जीवन का सच्चा साधन है।

कहते संत कबीर सहज स्वर में—

"बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय;

जब दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"

स्वयं की खोज में अंततः,

अहं का आवरण हटता है;

"अहं ब्रह्मास्मि" का बोध जागे,

अद्वैत भाव जगता है।

लाली मेरे लाल की,

जित देखूँ तित लाल;

लाली देखने मैं गई,

मैं भी हो गई लाल।



Tuesday, April 28, 2026

அமருதத் துளிகள். अमृत की बूंदें

 

அமிர்தத் துளிகள் 

இன்றைய சவால் — 

அமிர்தத் துளிகள்

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வாழ்க்கையை சீராகவும், சிறப்பாகவும் நடத்த உதவும்

நிலையான சிந்தனைகள் அனைத்தும்

உண்மையில் அமிர்தத் துளிகள் ஆகும்.

உபநிஷத்துகளின் ஆழமான சிந்தனைகள்,

பகவத் கீதையின் கர்மயோகப் போதனைகள்,

ஜாதகக் கதைகளின் நன்னெறி உணர்வுகள்,

நெறி நூல்களின் அறிவுரைகள்,

ஆன்மஞானத்தின் உண்மைகள்,

ஞானிகளின் உபதேசங்கள்—

இவை அனைத்தும் வாழ்க்கைக்கு அமிர்தத் துளிகளே.

யோகப் பயிற்சி,

சீரான உணவு முறையின் அறிவியல் பார்வை,

தத்துவ சிந்தனைகள்—

இவையும் உடல்-மனம் ஆரோக்கியமாக்கும் அமிர்தத் துளிகள்.

கபீர், துலஸிதாஸ், ரஹீம், விரிந்த் போன்ற கவிஞர்களின் தோஹாக்கள்) ஈரடி கள்.

பக்தி, மனிதநேயம், நெறி ஆகியவற்றின் பொக்கிஷங்கள்.

“யாரை கடவுள் காக்கிறாரோ, அவரை யாராலும் காயப்படுத்த முடியாது;

உலகமே பகை கொண்டாலும், அவருக்கு எதுவும் ஆகாது.”

இந்த எண்ணம் கடவுளின் பேராற்றலின் அமிர்தம் ஆகும்।

“வசுதைவ குடும்பகம்” — உலகம் ஒரே குடும்பம்,

“சர்வே ஜனாஃ சுகினோ பவந்து” — எல்லோரும் இன்புற வாழ்க,

ஒரே ஆகாயம், ஒரே உலகம்—

வெறுப்பும் விரோதமும் இல்லாத

மனிதநேய உலகம்.

மனிதன் காமம், கோபம், அகந்தை, பேராசை ஆகியவற்றில் மூழ்கினால்,

அறிஞனாக இருந்தாலும் அறியாமை உடையவனாகிறான்।

விவேகம் இழந்தவன் மிருகத்துக்கு சமம்.

ஆகவே விவேகம், கட்டுப்பாடு, கருணை—

இவையே வாழ்க்கையின் உண்மையான அமிர்தத் துளிகள்।

தேவர்களும் அசுரர்களும் செய்த

பாற்கடல் கடைவது போல,

அதில் இருந்து லட்சுமி, ஐராவதம், காமதேனு,

தன்வந்திரி, கல்பவிருட்சம் மற்றும் அமிர்தக் கலசம் தோன்றியது போல—

வாழ்க்கை கடைவதிலும்

நல்ல சிந்தனைகள் அமிர்தத் துளிகளாக வெளிப்படுகின்றன।

இந்த அமிர்தத் துளிகளை ஏற்றுக் கொண்டால்,

மனிதன் அமரத்துவத்தை அல்ல,

ஆனால் ஒரு சிறந்த, சத்தியமான வாழ்க்கையை பெறுகிறான்।


Monday, April 27, 2026

जीवन की तलक

 प्रयत्न और संशोधित दोनों रूप


 नमस्ते


जीत की ललक


++++++++++++++


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई


++++++++++++++


28-4-26


++++++++++++++


मानव जीवन भर


आगे बढ़ना चाहता है,


अंत तक प्रगति पथ पर


जीत पाने की चाह में


ख्वाब सजाता रहता है।


परीक्षा में सफलता की ललक,


डॉक्टरेट तक पहुँचने की चाह,


नौकरी पाने की आकांक्षा,


पदोन्नति की जीत,


निजी घर का निर्माण,


विवाह और संतान की प्रगति—


इन सबमें बसी है


जीत की ललक।


कभी अश्वमेध यज्ञ की विजय,


तो कभी लोकतंत्र के चुनाव में जीत,


परंतु जनप्रतिनिधि बनकर भी


वादा निभाने की ललक नहीं,


धन जोड़ने की चाह प्रबल—


यही मानव का लोभ, क्रोध, ईर्ष्या


जीवन को बना देते हैं


जय-पराजय का अखाड़ा।


जीत की ललक में


जीवन हो जाता है बेचैन,


एक विजय के बाद भी


और ऊँची उड़ान की चाह,


चंचल मन,


असंतुष्ट जीवन।


मिथ्या जगत के पार भी


अमरता की आकांक्षा,


निराशा में जीवन का अंत,


और फिर पुनर्जन्म का चक्र—


यही है मानव की


अंतहीन ललक।



जीत की तलक

++++++++++++++

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

+++++++++++++  

28-4-25.

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 मानव अपने जीवन में 

 आगे बढ़ना ही चाहता है।

अंत तक  प्रगति पथ पर

 जीत पाने  के प्रयत्न में 

ख्वाब देखता रहता है।

 परीक्षा में जीत की तलक,

डाक्टरेट तक,

नौकरी पाने

पदोन्नति के जीत,

निजी घर बनवाने

 विवाह करने

 संतान की प्रगति 

 पारिवारिक सफलता

जीत की तलक  में 

 जीवन में रहता है।

महाराजा अश्वमेध यज्ञ

 लोक तंत्र में चुनाव जीतने की तलक,

 पर विधायक संसद को

 वादा निभाने की तलक नहीं,

 धन जोड़ने की तलक,

 यही मानव जीवन का लोभ,

 क्रोध, ईर्ष्या के कारण 

‌जय पराजय का जीवन।

 जीत की तलक में 

 बेचैनी जीवन,

 एक विजय के बाद 

 उससे बढ़िया कदम उठानेकी तलक 

 चंचल मन,

असंतुष्ट जीवन 

 मिथ्या जगत जाकर भी

 सफल अमरजीवन   की तलक,

 निराशा में जीवन का अंत

 पुनर्जन्म लेने के कारण।

Sunday, April 26, 2026

सुस्ती

 


नमस्ते वणक्कम्

आलस्य का विष

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

27-4-26

++++++++++++

तमिल में एक कहावत है—

"काणिच्चोम्बल कोटि नष्टम्"।

एक छोटे-से काम में

ज़रा-सी आलसी,

लापरवाही बनकर

करोड़ों का नुकसान कर देती है।

कबीर ने भी चेताया है—

"कल करे सो आज कर,

आज करे सो अब;

पल में प्रलय होएगी,

बहुरि करेगा कब?"

दिन आते-जाते रहते हैं,

हरि से होता क्या?

अब पछताने से क्या होगा,

जब चिड़िया चुग गई खेत?

तमिल के विश्वविख्यात कवि

तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा—

आलस्य के कारण

परिवार तक नष्ट हो जाता है।

प्रयत्न न करने पर

घर-परिवार बिगड़ते हैं,

और अपराध भी बढ़ते हैं।

आज का पाठ यदि

आज ही पढ़ लिया जाए,

तो परीक्षा देना

सरल हो जाता है।

पर साल भर का पाठ

इकट्ठा कर लेने से

परीक्षा के समय

मन व्याकुल हो जाता है।

नेत्र बिगड़ जाने के बाद

सूर्य नमस्कार से क्या लाभ?

आलसी व्यक्ति

किसी भी कार्य में

सफलता प्राप्त नहीं करता।

आलसी प्रशंसा का पात्र नहीं,

जीवन की प्रगति में

सुस्ती सबसे बड़ी बाधा है।

बचपन से ही चुस्त रहना—

यही सफलता का रहस्य है।

नमस्ते वणक्कम्।

आलस्य का विष

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

27-4-26

++++++++++++

तमिल में एक कहावत है—

"काणिच्चोम्बल कोटि नष्टम्"।

एक छोटे-से काम में

ज़रा-सी आलसी,

लापरवाही बनकर

करोड़ों का नुकसान कर देती है।

कबीर ने भी चेताया है—

"कल करे सो आज कर,

आज करे सो अब;

पल में प्रलय होएगी,

बहुरि करेगा कब?"

दिन आते-जाते रहते हैं,

हरि से होता क्या?

अब पछताने से क्या होगा,

जब चिड़िया चुग गई खेत?

तमिल के विश्वविख्यात कवि

तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा—

आलस्य के कारण

परिवार तक नष्ट हो जाता है।

प्रयत्न न करने पर

घर-परिवार बिगड़ते हैं,

और अपराध भी बढ़ते हैं।

आज का पाठ यदि

आज ही पढ़ लिया जाए,

तो परीक्षा देना

सरल हो जाता है।

पर साल भर का पाठ

इकट्ठा कर लेने से

परीक्षा के समय

मन व्याकुल हो जाता है।

नेत्र बिगड़ जाने के बाद

सूर्य नमस्कार से क्या लाभ?

आलसी व्यक्ति

किसी भी कार्य में

सफलता प्राप्त नहीं करता।

आलसी प्रशंसा का पात्र नहीं,

जीवन की प्रगति में

सुस्ती सबसे बड़ी बाधा है।

बचपन से ही चुस्त रहना—

यही सफलता का रहस्य है।

जो जागे, वही पाए,

जो सोये, वही खोए।

Saturday, April 25, 2026

शिक्षित बालिका

 शिक्षित बालिका


एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

)

शिक्षित बालिका

एस. अनंतकृष्णन

++++++++++++++++

शिक्षित बालिका होती जहाँ,

वहाँ उज्ज्वल हर एक कुल होता।

ज्ञान की ज्योति जलाकर वह,

घर-आँगन भी गुरु-सा होता।

माता, सखी, सलाहकार बन,

सद्गुण का संचार करती,

भारतीय संस्कृति की रक्षक,

संस्कारों का विस्तार करती।

आधुनिक युग की नारी भी,

स्वावलंबन अपनाती है,

घर और बाहर दोनों संभाल,

नई दिशा दिखलाती है।

गृहिणी बनकर स्नेह लुटाए,

ममता से संसार सजाए,

पति-संतान संग परिवार को,

प्रेम-धागों में बाँध निभाए।

शिक्षा से उसका आत्मविश्वास,

दिन-प्रतिदिन सुदृढ़ होता,

समाज सुधार की राह पकड़,

अंधविश्वासों को भी धोता।

दहेज जैसी कुरीतियों पर,

जब नारी आवाज उठाती,

शिक्षित होकर स्वाभिमान से,

नई व्यवस्था वह बनवाती।

++++++++++++++++


 


Friday, April 24, 2026

जग ग्रंथ दिवस

 नमस्ते वणक्कम् 

विश्व पुस्तक दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

25-4-2026

++++++++++++++++

नमस्ते! वणक्कम्।

छापाखाने के अभाव में,

ताड़पत्रों पर लिखी पुस्तकें,

शिलालेखों के उस युग में

मानव श्रवण कर-करके

ज्ञान को कंठस्थ करता था।

स्मरण शक्ति थी प्रखर, अद्भुत—

मेरे हिंदी प्राध्यापक

कुरुक्षेत्र

बिना देखे ही सुनाते थे;

अंग्रेज़ी प्राध्यापक

विलियम शेक्सपियर

के नाटकों की पंक्तियाँ

सहज ही दोहराते थे।

जब हुआ छापाखाने का आविष्कार,

ग्रंथ सुलभ हो गए,

संदर्भों का संसार बढ़ा—

किताबें लेना, सहेज कर रखना,

आवश्यकता पर पढ़ना

आसान हो गया।

पर आज के युग में,

स्मरण शक्ति कहीं क्षीण हुई—

मोबाइल के सहारे

अपनी दूरभाष संख्या भी

याद नहीं रहती।

फिर भी—

पुस्तकें ज्ञान का भंडार हैं,

हर ग्रंथ देता है

कोई न कोई अमूल्य संदेश।

नैतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक ग्रंथ,

महाकाव्य और खंडकाव्य—

जीवन-पथ के मार्गदर्शक,

प्रेरणा के स्रोत,

निराश को आशा देने वाले,

आदर्श जीवन के शिक्षक।

पढ़ना, लिखना, रचना—

इसी प्रेरणा के लिए

सन् 1922 में

विन्सेंट क्लावेल

ने इस दिवस का आरंभ किया।

किताबें केवल सजाने के लिए नहीं,

ज्ञान के भंडार को

मन में बसाने के लिए हैं—

पढ़ना, समझना,

विचार करना और लिखना,

सीखे हुए ज्ञान का

प्रवचन, व्याख्या, समालोचना—

यही उद्देश्य है

विश्व पुस्तक दिवस का।

आओ, हम संकल्प लें—

नए ग्रंथ लिखें, पढ़ें, सुनें,

समाज, राष्ट्र और मातृभाषा की

संस्कृति को संवारें;

आदर्श, अनुशासन और

विश्व बंधुत्व को अपनाएँ।

हर वर्ष 23 अप्रैल को

मनाया जाता यह दिवस

ज्ञानार्जन और अभिव्यक्ति का पर्व है।

विचित्र है—

1 अप्रैल मूर्खता का दिवस,

और 23 अप्रैल

ज्ञान, सृजन और अध्ययन का उत्सव!

++++++++++++++++

सुप्रभात्

 

सिंहपुर के रंगनाथ सुप्रभात्

कौशल्या सुप्रजा राम… (मूल श्लोक का अर्थ)
कौशल्या के सुपुत्र राम!
प्रातःकालीन संध्या का समय हो गया है।
हे नरश्रेष्ठ (नर-व्याघ्र)! जागिए,
दैविक नित्य कर्म करने का समय आ गया है।


उत्तिष्ठ… श्लोक का भावार्थ
उठिए, हे सिंगवर के स्वामी!
उठिए, हे कमलापति!
उठिए, हे रंगनाथ पर्वत के अधिपति!
हे ब्रह्मा द्वारा पूजित प्रभु, जागिए!


श्लोक 1

संस्कृत:
मातः समस्त जगतां महिते सरोजे...

संशोधित हिंदी:
हे समस्त जगत की जननी, पूजनीय कमल-वासी देवी!
असीम वैभव से युक्त, सिंहपुरी में प्रतिष्ठित,
हे श्रीरंगनाथ की प्रिय!
आपका यह प्रभात मंगलमय हो।


श्लोक 2

संशोधित हिंदी:
चेंजी नगर के समीप स्थित सिंहवर क्षेत्र में,
पर्वत शिखर पर निर्मित इस मंदिर में विराजमान देवी!
भक्तों को समस्त मंगल प्रदान करने वाली,
हे श्रीरंगनाथ की प्रिया,
आपका यह प्रभात शुभ हो।


श्लोक 3

संशोधित हिंदी:
हे सृष्टि के मूल कारण, ब्रह्मा के सृजनकर्ता!
पीपल वृक्ष से सुशोभित इस पावन स्थल में,
शेषशय्या पर विश्राम करने वाले प्रभु!
सिंहपुर के नायक,
आपका यह सुप्रभात मंगलमय हो।


श्लोक 4

संशोधित हिंदी:
प्रभात में शीतल, सुखद वायु बह रही है,
कोयलें मधुर और मनोहर स्वर में गा रही हैं।
आकाश में तारे लुप्त हो रहे हैं,
हे रंगेश, सिंहपुर के नायक!
आपका यह सुप्रभात मंगलमय हो।


🌼 सिंगवर रंगनाथ सुप्रभातम् (छंदबद्ध हिंदी रूप)

१.
कौशल्या के राम उठो, प्राची हुई उजास।
नर-व्याघ्र! अब जागिए, करो दिवस उपवास॥ (= नित्य कर्म)

देव-कर्म का काल है, छोड़ो निद्रा-भोग।
उठो प्रभो! जग दीखता, नव प्रभात संयोग॥


२.
उठो सिंगवर के प्रभु, कमला-पति भगवान।
रंगनाथ गिरि-नाथ हे, ब्रह्मा करें गुणगान॥

जागो हे जगदीश अब, करुणा-सागर नाथ।
भक्त प्रतीक्षा कर रहे, खोलो कृपा के पाथ॥


३.
जग की जननी, वंदिता, कमल-विहारिणी मात।
असीम विभव-विलासिनी, मंगलमय यह प्रात॥

सिंहपुरी में राजती, पूजित सदा सुविभूष।
रंगनाथ की प्रिया तुम, हर लो जन की क्लेश॥


४.
चेंजी नगरी पास में, सिंहवर पावन धाम।
गिरि-शिखर पर मंदिरा, जहाँ विराजे राम॥

भक्तों को वरदान दो, मंगलमयी स्वरूप।
रंगनाथ प्रिय वल्लभे, हर लो भव का कूप॥


५.
पीपल तरु से शोभित, पावन सुंदर थान।
शेष-शय्या पर शयन, जग के पालनधाम॥

ब्रह्मा जिनसे जन्म लें, सृष्टि करें विस्तार।
सिंहपुर के नायक हे, करो कृपा अपार॥


६.
शीतल मंद समीर बहे, भोर हुई सुखदाय।
कोयल मधुरिम गान कर, हृदय हर्ष उपजाय॥

नभ के तारे लुप्त हैं, छाया नव प्रकाश।
रंगेश! जागो अब प्रभु, पूर्ण करो सब आश॥