आज की चुनौती
विश्व हिंदी दिवस
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
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दिल्ली, मेरठ, आगरा आदि क्षेत्रों की
खड़ी बोली,
हिंदुस्तानी और हिंदी का रूप लेकर
आज विश्व की प्रमुख भाषाओं में
अपना स्थान बना चुकी है।
लगभग दो सौ वर्षों की यात्रा में
हिंदी ने बहुत लंबा सफर तय किया है।
यदि हिंदी दिवस और
हिंदी सप्ताह न मनाए जाते,
तो शायद हिंदी की ओर
हमारा ध्यान भी कम होता जाता।
आज आधुनिक आहार में
पिज़्ज़ा, बर्गर और न जाने कितने
विदेशी खाद्य पदार्थ आ गए हैं।
हमारी पोशाक में भी
पाश्चात्य प्रभाव दिखाई देता है।
उच्च शिक्षा का माध्यम
मुख्यतः अंग्रेज़ी है।
जिन लोगों को
हिंदी के माध्यम से रोजगार मिला,
उनके लिए हिंदी के प्रति
अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का
हिंदी दिवस एक सुंदर अवसर है।
दूसरी ओर, हर वर्ष
केंद्र और राज्य सरकारें
अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों को
अनुमति देने में
एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में दिखाई देती हैं।
तीन वर्ष की उम्र से ही
बच्चे अंग्रेज़ी के वातावरण में
ढलने लगते हैं।
अंग्रेज़ी का ज्ञान आवश्यक है,
लेकिन भारतीय भाषाओं के साथ
अंग्रेज़ी का संतुलित प्रयोग
समाज में गौरव और आत्मविश्वास
दोनों दे सकता है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता—
जिसे हम ए.आई. (AI) कहते हैं—
भी अंग्रेज़ी के व्यापक उपयोग को
और बढ़ावा दे रही है।
जीविकोपार्जन की भाषा
अंग्रेज़ी बनती जा रही है।
व्यापार और व्यवहार में भी
अंग्रेज़ी-मिश्रित हिंदी
तेजी से बढ़ रही है।
1953 से 2026 तक
सितंबर महीने में मनाया जाने वाला
हिंदी दिवस
हिंदी के प्रति हमारी जिम्मेदारी
याद दिलाता है।
केवल सरकार का ही नहीं,
जनता का भी कर्तव्य है कि
हिंदी के विकास के साथ-साथ
सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करे।
एक दिन मैंने अपने पोते से पूछा—
“सोमवार को पाठशाला है क्या?”
उसने पूछा—
“दादा, सोमवार और पाठशाला क्या होता है?”
तब मैंने आधुनिक भारत की भाषा में कहा—
“Monday और School।”
यह केवल एक बच्चे का प्रश्न नहीं,
हमारी बदलती भाषायी स्थिति का
एक छोटा-सा उदाहरण है।
ऐसी परिस्थिति में
हिंदी दिवस और हिंदी सप्ताह
हिंदी के लिए स्मरणीय अवसर हैं।
हिंदी को सम्मान मिले,
भारतीय भाषाओं को सम्मान मिले,
और अपनी भाषा के प्रति
हमारे मन में गौरव जागे।
जय हिंदी!
जय हिंद!
जय भारत!