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Wednesday, July 22, 2026

खुशियों की‌ चाबी

 



खुशियों की चाबी

‌एस.अनंतकृष्णन्

चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

23-7-26

++++++++++++

चाबी का काम बंद कमरे को खोलना।

 खुशियों की चाबी का मतलब  संताप के अंधेरे से  बाहर आना।

 वह चाबी है, 

अपने लक्ष्य पर

 दृढ़ रहना।

 मार्ग के अन्य आकर्षणों से बचना।

चक्रव्यूह के समान 

 राह में अड़चनें,

 ईर्ष्यालु  सब आएँगी।

 चाबी खुशियों के लिए 

 ज्ञान का प्रयोग,

 चतुराई आदि।

सदा चाहिए सकारात्मक सोच।

हार में हतोत्साहित नहीं होना।

 सदा कामयाब के चिंतन में रहना।

 स्वस्थ तन,मन,तन

अध्यवसाय आदि 

 सफलता की चाबी।

सुविचार, सद्चिंतन,

वचन में पक्का,

 करने में लग्न।

 ये हैं सफलता की चाबी।




आज की चुनौती

खुशियों की चाबी

एस. अनंतकृष्णन्
चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
23-7-26

चाबी का कार्य
बंद कमरे का द्वार खोलना है।

खुशियों की चाबी का अर्थ है—
संताप के अंधेरे से
आशा के उजाले में आना।

यह चाबी है—
अपने लक्ष्य पर
दृढ़ बने रहना,
मार्ग के आकर्षणों से
स्वयं को बचाए रखना।

जीवन के चक्रव्यूह में
अनेक बाधाएँ आएँगी,
ईर्ष्यालु लोग भी
रास्ता रोकने का प्रयास करेंगे।

खुशियों की चाबी है—
ज्ञान का सदुपयोग,
विवेक, चतुराई
और सकारात्मक सोच।

हार से
कभी हतोत्साहित न हों,
सदैव सफलता का
सकारात्मक चिंतन करें।

स्वस्थ तन,
स्वस्थ मन,
निरंतर अध्यवसाय,
सुविचार, सद्चिंतन,
वचन का पालन
और कर्म के प्रति लगन—

यही हैं
सफलता और
खुशियों की सच्ची चाबियाँ।

Tuesday, July 21, 2026

दीपक और सबेरा

 


दीपक और सबेरा


 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

22-7-27

+++++++---

  रात का अंधेरा,

  दिन का उजाला 

 मानव जीवन को

 सोने जगाने 

प्रकृति का देन।

 अंधेरे रात में 

 लघु दीप हमारे 

 प्रकाश देता हैं।

 उस दीप के प्रकाश में 

 पतंगा अपने जान देता है।

 उल्लू की आँखें प्रकाशित होती हैं।

 जुगनू चमचमाती है।

 धूप में छाया की तरह

 अंधेरे में दीपक का     प्रकाश।

 थकामांदा मानव

 आराम से सोने का समय।

 अंधेरे में जीने 

निशीचर

 ईश्वर की सृष्टि में अद्भुत।।

  सबेरे सूर्योदय,

  मुर्गी ,पक्षियों  का कलरव,

  प्रकाश मय वातावरण में  जगना जगाना,

व्यस्त मानव समाज।

 ग्वाले का दूध दुहना,

 समाचार पत्र वाले का व्यस्त रहना 

 मंदिरों में घंटी बजना,

 बच्चों का स्कूल जाना।

 आराम के बाद 

  दिन में ज्ञानार्जन,

  धनार्जन 

 अहर्निशं सेवा में

 ऐसे काम करनेवाले 

 पुलिस विभाग,

 वैज्ञानिक प्रगति 

 हमेशा व्यस्त 

 रेल, विमान,बस 

 के आवागमन सेवा,

 डे डूटी, नैट डूटी करनेवाले कर्मचारी 

 दिन में सोना, रात में काम।

 अंधेरा का आनंद 

 जनसंख्या की वृद्धि

 यह भूलोक दिवा रात 

 दीपक का उजाला,

 सबेरे सूर्य का प्रकाश 

 मानव जीवन में सुख दुख का आना।

 ईश्वरीय सूक्ष्म लीला 

 न समझ सकता मानव का ज्ञान।

 जन्म लेना  सबेरा

 मृत्यु जीवन का अंधियारा।

 यही दीपक और सबेरा

 सुख दुख का अद्भुत ज्ञान।


आपकी रचना में दीपक और सबेरा के माध्यम से जीवन, प्रकृति, कर्म और जन्म–मृत्यु का सुंदर दार्शनिक चित्रण है।

आज की चुनौती

दीपक और सबेरा

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

रात का अंधेरा,

दिन का उजाला—

मानव जीवन को

सुलाने और जगाने

प्रकृति का अनुपम उपहार।

अंधेरी रात में

छोटा-सा दीपक

अपना प्रकाश बिखेरता है।

उसी दीपक की लौ पर

पतंगा प्राण न्योछावर कर देता है।

उल्लू की आँखें

अंधकार में भी देख पाती हैं,

जुगनू अपनी चमक से

रात को आलोकित करता है।

जैसे धूप में छाया,

वैसे अंधेरे में दीपक का प्रकाश।

थका-माँदा मानव

आराम से सो जाता है।

रात्रि में विचरण करने वाले निशाचर भी

ईश्वर की अद्भुत सृष्टि हैं।

सबेरे सूर्योदय होता है,

मुर्गे की बाँग,

पक्षियों का मधुर कलरव,

प्रकाशमय वातावरण में

जगना और जगाना।

ग्वाले का दूध दुहना,

समाचार-पत्र वाले की व्यस्तता,

मंदिरों में घंटियों का नाद,

बच्चों का विद्यालय जाना—

सब जीवन की गति का संकेत हैं।

आराम के बाद

दिन में ज्ञानार्जन,

धनार्जन और सेवा का क्रम चलता है।

पुलिस विभाग,

वैज्ञानिक,

रेल, विमान और बस सेवाएँ—

सब निरंतर कार्यरत रहते हैं।

कुछ दिन में काम करते हैं,

तो कुछ रात की ड्यूटी निभाते हैं।

अंधकार का भी अपना आनंद है,

प्रकाश का भी अपना महत्व।

यह दिवा-रात्रि का क्रम,

दीपक का उजाला

और सूर्य का प्रकाश—

मानव जीवन में

सुख-दुःख का संदेश देते हैं।

ईश्वर की सूक्ष्म लीला को

मानव का ज्ञान

पूर्णतः नहीं समझ सकता।

जन्म है सबेरा,

मृत्यु है जीवन का अंधियारा।

यही दीपक और सबेरा

हमें सुख-दुःख का

अद्भुत ज्ञान कराते हैं। :::**

यदि चाहें, मैं इसे �⁠और अधिक **काव्यात्मक, छंदबद्ध और प्रभावशाली** रूप भी दे सकता हूँ।

Monday, July 20, 2026

कलम का धर्म

 कलम का धर्म 

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

21-7-26

++++++++++-

कलम का धर्म लिखना ,

जगने के लिए लिखना,

जगाने के लिए लिखना

उत्तेजित  करने के लिए लिखना।

यथार्थता लिखना,

आदर्श बातें लिखना,

समाज हित के लिए ,

 समाज कल्याण के लिए 

 राष्ट्र हित के लिए 

 राष्ट्र प्रेम के लिए 

 राष्ट्रोन्नति के लिए 

 निस्वार्थ सेवा के लिए 

 परोपकार की भावना के लिए,

दान धर्म के विकास के लिए 

जगत मिथ्या,

 ब्रह्म सत्यं 

 समझाने के लिए,

 शिक्षा के महत्व समझाने के लिए,

 लिखना 

कलम का धर्म है।

जीना,जीने देना कलम का धर्म है।

विश्वशांति के लिए 

अहिंसा परमो धर्म 

 वसुधैव कुटुंबकम् 

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु आदि

सिखाने

 अच्छी चालचलन सिखाने,

 लिखना कलम का धर्म है।


आपकी रचना का संदेश अत्यंत प्रेरणादायक है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करके इसे अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

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आज की चुनौती

कलम का धर्म

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

21-7-2026

कलम का धर्म

कलम का धर्म है लिखना,

जगने के लिए लिखना,

जगाने के लिए लिखना,

जन-जन को जागृत करने के लिए लिखना।

यथार्थ लिखना,

आदर्शों की बात लिखना,

समाजहित के लिए,

समाज-कल्याण के लिए,

राष्ट्रहित के लिए,

राष्ट्र-प्रेम के लिए,

राष्ट्रोन्नति के लिए,

निस्वार्थ सेवा के लिए,

परोपकार की भावना के लिए,

दान-धर्म के विकास के लिए लिखना।

"जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य" का बोध कराना,

शिक्षा का महत्व समझाना,

सदाचार और उत्तम आचरण सिखाना—

यही कलम का धर्म है।

जीओ और जीने दो का संदेश देना,

विश्व-शांति का मार्ग दिखाना,

"अहिंसा परमो धर्मः",

"वसुधैव कुटुम्बकम्",

"सर्वे जना: सुखिनो भवन्तु" जैसे

उदात्त विचारों का प्रसार करना—

यही कलम का सच्चा धर्म है। :::


Sunday, July 19, 2026

अंधविश्वास।

 आज की चुनौती : अंधविश्वास

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
20-7-2027

अंधविश्वास

नमस्ते। वणक्कम्।

वैज्ञानिक प्रमाण और वास्तविकता के बिना जिन बातों पर विश्वास किया जाता है, उन्हें अंधविश्वास कहा जाता है।

जैसे—
इमली के पेड़ में भूत होना,
राहुकाल देखकर ही कार्य करना,
घर से निकलते समय किसी का "कहाँ जा रहे हो?" पूछना अशुभ मानना,
छींक आने पर रुक जाना,
बिल्ली का रास्ता काटना,
अकेले ब्राह्मण का सामने आना,
विधवा का सामने आना आदि अनेक धारणाएँ अंधविश्वास की श्रेणी में आती हैं।

तमिल का एक प्रसिद्ध भक्तिगीत कहता है—

दिन क्या करेगा?
कर्मफल क्या करेगा?
ग्रह क्या करेंगे?
निर्दयी यम क्या करेगा,
जब भगवान कुमारेश की कृपा प्राप्त हो जाए।

अर्थात भगवान पर विश्वास रखो। शकुन-अपशकुन और शुभ-अशुभ की अनावश्यक चिंता मत करो।

संत कबीर ने भी कहा है—

"जाको राखे साइयाँ, मारि सके न कोय।
बाल न बाँका कर सके, जो जग बैरी होय।।"

भक्ति का संदेश यही है कि ईश्वर पर विश्वास रखो, अपने कर्म करते रहो और अंधविश्वासों के जाल में मत फँसो।

हाँ, नमस्कार करना, बड़ों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना तथा मंदिर में साष्टांग प्रणाम करना अंधविश्वास नहीं हैं। ये हमारी संस्कृति, विनम्रता और स्वास्थ्यप्रद अभ्यास के प्रतीक हैं।

दुर्भाग्य से आजकल अभिवादन भी केवल हाथ हिलाने या सैन्य शैली के सैल्यूट तक सीमित होता जा रहा है। अनेक शिक्षित युवक-युवतियाँ भी साष्टांग प्रणाम की परंपरा से दूर होते जा रहे हैं।

आइए, विवेक अपनाएँ,

 अंधविश्वास छोड़ें,

 विज्ञान और सदाचार को स्वीकार करें ।

तथा ईश्वर में सच्ची श्रद्धा रखते हुए 

कर्मपथ पर आगे बढ़ें।

Saturday, July 18, 2026

अंध भक्ति में भला नहीं।

 अंध भक्ति में भला नहीं।


अंध भक्ति प्रह्लाद में अपने पिता के प्रति नहीं।

अंध। भक्ति के कारण एकलव्य अंगूठा को बैठा।

कर्ण  अपने पुण्य को बैठा।

 हरिश्चंद्र अपने जीवन को बैठा।

 सीता  को संन्यासी वेशधारी रावण को भक्त समझकर लक्ष्मण रेखा पारकर रावण के अशोक वन  में रहना पड़ा।

 पिता के अंधभक्ति के कारण रावण के बेटा

प्राण को बैठा।

 अंध भक्ति तोड़कर 

 कार्तिकेय तमिलनाडु पलनी शहर में आकर 

‌तमिल भगवान बन गये।

 पिताजी को उपदेश देकर 

 स्वामि नाथ बन गये।

 अंध भक्ति प्रेम के कारण 

 भ्रष्टाचारी नेता  जीतता है।

 अभिनेता पर अंधविश्वास तमिलनाडु के शासक।

 यही अंध भक्ति अंधे प्रेम का परिणाम।


 



नदियों की पुकार

 

आज की चुनौती

नदी की पुकार





नदी की पुकार

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।
मैं हूँ नदी।
कहते हैं 
नदियों के तट,
सभ्यता का पलना।
नदी मैं न तो
 जीना दुश्वार।
 पशु पक्षी वनस्पति
 सब के जीवधार।
 खेद की बात  है 
 रेत का लूट करते हैं।
कारखानों के 
 विषैले पानी बहाते हैं,
बाँध बाँधकर रोकते हैं 
 मैरी चौड़ाई कम करते हैं,
 पवित्र गंगाजल को
 प्रदूषित करै
 गंगा के किनारे
 मिनरल वाटर बेचते हैं।
नदियों को बचानै
आंदोलन भी करते हैं।
 भारतीय नदियों को 
जोडकर राष्ट्रीय जल 
योजना का भी विचार करते हैं।
जन संख्या बढ़ने से
‌जंगलों का नाश,
झीलों  का नदारद 
 नगर विस्तार नगरीकरण
 कारखानों का विकास 
मेरे विकास में बाधक।
अब नदी की पुकार 
नदी बचाओ की क्रांतियाँ 
नदी की पुकार।
  जल प्रदूषण 
 सही नहीं,
उर्वर धरती के लिए खतरा।
नदियों को
 न बचाने पर
 भूतल में
 अकाल के कारण बनाएंगे।
 धरती सूख जाएगी।
अतः नदी बचाने की 
योजना को  प्राथमिकता देनी चाहिए।
तभी हम भूलोक को
 हरे भरे रखेंगी।






एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

मैं हूँ नदी।
कहते हैं,
नदियों के तट पर
सभ्यता का पालना पला है।

मेरे बिना
जीवन दुश्वार है।
पशु, पक्षी, वनस्पति
सभी का मैं जीवनाधार हूँ।

खेद की बात है कि
मेरी रेत लूटी जाती है।
कारखानों का विषैला जल
मुझमें बहाया जाता है।
बाँध बनाकर
मेरे स्वाभाविक प्रवाह को रोका जाता है,
मेरी चौड़ाई और अस्तित्व
धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं।

पवित्र गंगाजल को भी
प्रदूषित किया जाता है,
और गंगा के किनारे
मिनरल वाटर बेचा जाता है।
एक ओर
नदियों को बचाने के आंदोलन चलते हैं,
दूसरी ओर
भारतीय नदियों को जोड़ने की
राष्ट्रीय जल योजना पर विचार होता है।

बढ़ती जनसंख्या,
जंगलों का विनाश,
झीलों का लुप्त होना,
नगरों का विस्तार,
और कारखानों की बढ़ती संख्या—
ये सब मेरे अस्तित्व के लिए चुनौती हैं।

अब मेरी पुकार सुनो।
"नदी बचाओ" केवल नारा नहीं,
जीवन बचाने का संकल्प है।
जल प्रदूषण
धरती की उर्वरता के लिए
गंभीर खतरा है।

यदि नदियों को
समय रहते नहीं बचाया गया,
तो धरती पर
जल संकट और अकाल
मानवता के भविष्य को चुनौती देंगे।
धरती सूख जाएगी,
जीवन कठिन हो जाएगा।

अतः
नदियों के संरक्षण और संवर्धन की
योजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
तभी हमारा यह भू-लोक
सदा हरा-भरा, समृद्ध
और जीवनदायी बना रहेगा।

— एस. अनंतकृष्णन

Friday, July 17, 2026

इच्छाओं का अंत

 



इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

18-7-26

+++++++++++++

 इच्छाओं का अंत कहाँ?

  राजपाट त्यागकर 

  सिद्धार्थ  इस आकांक्षा लेकर 

 जंगल में गये

 कि मानव जीवन

 को रोग, मृत्यु, बुढ़ापे से मुक्ति कर सकें।

 अंत में ज्ञान मिला 

 इच्छा ही दुखों का मूल।

 कबीर ने लिखा है

 चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।जिनको कछु न चाहिए, 

वे साहन के साह ॥

 उज्जैन के राजा

 भर्तृहरि संन्यासी बने।

 उनके लगाव एक कुतिया में लगा।

 कुतिया के बच्चे हुए।

 तब संत पट्टिनत्तार ने उनसे कहा ,"तुम बड़े कुटुंबी हो गये।

एक हिंदी कहानी है

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्यागा। संन्यासी बना,

 पर उनके एक बढ़िया घोड़ा था। उस पर का प्यार तज न सका।

  इच्छा रहित  जीवन

  जीना अंत तक असंभव।

 जीवन पर्यन्त 

 ईश्वर के ध्यान में 

 लगना भी

 ऊँची अभिलाषा पाने के लिए।

 ईश्वर में विलीन होने के लिए।

 इच्छाएँ ज्वार भाटे के समान।

 समुद्र की तरंगों के समान।

 हवा के समान।

 जब तक साँस,तब तक आस।




इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-7-2026

इच्छाओं का अंत कहाँ?

राजपाट त्यागकर

सिद्धार्थ वन को गए,

इस आकांक्षा के साथ

कि मानव जीवन को

रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के दुःख से

मुक्ति का मार्ग मिले।

अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ—

इच्छा ही दुःखों का मूल है।

संत कबीर ने कहा है—

“चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥”

उज्जैन के राजा

भर्तृहरि संन्यासी बने,

पर उनका मोह

एक कुतिया से जुड़ा रहा।

जब उसके बच्चे हुए,

तब संत पट्टिनत्तार ने कहा—

“तुम तो बड़े कुटुंबी हो गए!”

एक हिंदी कहानी भी यही सिखाती है—

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्याग दिया,

संन्यासी बन गया,

किन्तु अपने प्रिय घोड़े का मोह

न छोड़ सका।

पूर्णतः इच्छा-रहित जीवन

जीना अत्यंत कठिन है।

ईश्वर के ध्यान में निरंतर लीन रहना भी

एक उच्च अभिलाषा ही है—

परमात्मा में विलीन होने की अभिलाषा।

इच्छाएँ ज्वार-भाटे-सी उठती हैं,

समुद्र की तरंगों-सी उमड़ती हैं,

हवा की तरह निरंतर बहती रहती हैं।

सच ही कहा गया है—

“जब तक साँस, तब तक आस।” 


इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-7-2026

इच्छाओं का अंत कहाँ?

राजपाट त्यागकर

सिद्धार्थ वन को गए,

इस आकांक्षा के साथ

कि मानव जीवन को

रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के दुःख से

मुक्ति का मार्ग मिले।

अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ—

इच्छा ही दुःखों का मूल है।

संत कबीर ने कहा है—

“चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥”

उज्जैन के राजा

भर्तृहरि संन्यासी बने,

पर उनका मोह

एक कुतिया से जुड़ा रहा।

जब उसके बच्चे हुए,

तब संत पट्टिनत्तार ने कहा—

“तुम तो बड़े कुटुंबी हो गए!”

एक हिंदी कहानी भी यही सिखाती है—

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्याग दिया,

संन्यासी बन गया,

किन्तु अपने प्रिय घोड़े का मोह

न छोड़ सका।

पूर्णतः इच्छा-रहित जीवन

जीना अत्यंत कठिन है।

ईश्वर के ध्यान में निरंतर लीन रहना भी

एक उच्च अभिलाषा ही है—

परमात्मा में विलीन होने की अभिलाषा।

इच्छाएँ ज्वार-भाटे-सी उठती हैं,

समुद्र की तरंगों-सी उमड़ती हैं,

हवा की तरह निरंतर बहती रहती हैं।

सच ही कहा गया है—

“जब तक साँस, तब तक आस।” :::**