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Saturday, July 18, 2026

अंध भक्ति में भला नहीं।

 अंध भक्ति में भला नहीं।


अंध भक्ति प्रह्लाद में अपने पिता के प्रति नहीं।

अंध। भक्ति के कारण एकलव्य अंगूठा को बैठा।

कर्ण  अपने पुण्य को बैठा।

 हरिश्चंद्र अपने जीवन को बैठा।

 सीता  को संन्यासी वेशधारी रावण को भक्त समझकर लक्ष्मण रेखा पारकर रावण के अशोक वन  में रहना पड़ा।

 पिता के अंधभक्ति के कारण रावण के बेटा

प्राण को बैठा।

 अंध भक्ति तोड़कर 

 कार्तिकेय तमिलनाडु पलनी शहर में आकर 

‌तमिल भगवान बन गये।

 पिताजी को उपदेश देकर 

 स्वामि नाथ बन गये।

 अंध भक्ति प्रेम के कारण 

 भ्रष्टाचारी नेता  जीतता है।

 अभिनेता पर अंधविश्वास तमिलनाडु के शासक।

 यही अंध भक्ति अंधे प्रेम का परिणाम।


 



नदियों की पुकार

 

आज की चुनौती

नदी की पुकार





नदी की पुकार

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।
मैं हूँ नदी।
कहते हैं 
नदियों के तट,
सभ्यता का पलना।
नदी मैं न तो
 जीना दुश्वार।
 पशु पक्षी वनस्पति
 सब के जीवधार।
 खेद की बात  है 
 रेत का लूट करते हैं।
कारखानों के 
 विषैले पानी बहाते हैं,
बाँध बाँधकर रोकते हैं 
 मैरी चौड़ाई कम करते हैं,
 पवित्र गंगाजल को
 प्रदूषित करै
 गंगा के किनारे
 मिनरल वाटर बेचते हैं।
नदियों को बचानै
आंदोलन भी करते हैं।
 भारतीय नदियों को 
जोडकर राष्ट्रीय जल 
योजना का भी विचार करते हैं।
जन संख्या बढ़ने से
‌जंगलों का नाश,
झीलों  का नदारद 
 नगर विस्तार नगरीकरण
 कारखानों का विकास 
मेरे विकास में बाधक।
अब नदी की पुकार 
नदी बचाओ की क्रांतियाँ 
नदी की पुकार।
  जल प्रदूषण 
 सही नहीं,
उर्वर धरती के लिए खतरा।
नदियों को
 न बचाने पर
 भूतल में
 अकाल के कारण बनाएंगे।
 धरती सूख जाएगी।
अतः नदी बचाने की 
योजना को  प्राथमिकता देनी चाहिए।
तभी हम भूलोक को
 हरे भरे रखेंगी।






एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

मैं हूँ नदी।
कहते हैं,
नदियों के तट पर
सभ्यता का पालना पला है।

मेरे बिना
जीवन दुश्वार है।
पशु, पक्षी, वनस्पति
सभी का मैं जीवनाधार हूँ।

खेद की बात है कि
मेरी रेत लूटी जाती है।
कारखानों का विषैला जल
मुझमें बहाया जाता है।
बाँध बनाकर
मेरे स्वाभाविक प्रवाह को रोका जाता है,
मेरी चौड़ाई और अस्तित्व
धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं।

पवित्र गंगाजल को भी
प्रदूषित किया जाता है,
और गंगा के किनारे
मिनरल वाटर बेचा जाता है।
एक ओर
नदियों को बचाने के आंदोलन चलते हैं,
दूसरी ओर
भारतीय नदियों को जोड़ने की
राष्ट्रीय जल योजना पर विचार होता है।

बढ़ती जनसंख्या,
जंगलों का विनाश,
झीलों का लुप्त होना,
नगरों का विस्तार,
और कारखानों की बढ़ती संख्या—
ये सब मेरे अस्तित्व के लिए चुनौती हैं।

अब मेरी पुकार सुनो।
"नदी बचाओ" केवल नारा नहीं,
जीवन बचाने का संकल्प है।
जल प्रदूषण
धरती की उर्वरता के लिए
गंभीर खतरा है।

यदि नदियों को
समय रहते नहीं बचाया गया,
तो धरती पर
जल संकट और अकाल
मानवता के भविष्य को चुनौती देंगे।
धरती सूख जाएगी,
जीवन कठिन हो जाएगा।

अतः
नदियों के संरक्षण और संवर्धन की
योजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
तभी हमारा यह भू-लोक
सदा हरा-भरा, समृद्ध
और जीवनदायी बना रहेगा।

— एस. अनंतकृष्णन

Friday, July 17, 2026

इच्छाओं का अंत

 



इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

18-7-26

+++++++++++++

 इच्छाओं का अंत कहाँ?

  राजपाट त्यागकर 

  सिद्धार्थ  इस आकांक्षा लेकर 

 जंगल में गये

 कि मानव जीवन

 को रोग, मृत्यु, बुढ़ापे से मुक्ति कर सकें।

 अंत में ज्ञान मिला 

 इच्छा ही दुखों का मूल।

 कबीर ने लिखा है

 चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।जिनको कछु न चाहिए, 

वे साहन के साह ॥

 उज्जैन के राजा

 भर्तृहरि संन्यासी बने।

 उनके लगाव एक कुतिया में लगा।

 कुतिया के बच्चे हुए।

 तब संत पट्टिनत्तार ने उनसे कहा ,"तुम बड़े कुटुंबी हो गये।

एक हिंदी कहानी है

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्यागा। संन्यासी बना,

 पर उनके एक बढ़िया घोड़ा था। उस पर का प्यार तज न सका।

  इच्छा रहित  जीवन

  जीना अंत तक असंभव।

 जीवन पर्यन्त 

 ईश्वर के ध्यान में 

 लगना भी

 ऊँची अभिलाषा पाने के लिए।

 ईश्वर में विलीन होने के लिए।

 इच्छाएँ ज्वार भाटे के समान।

 समुद्र की तरंगों के समान।

 हवा के समान।

 जब तक साँस,तब तक आस।




इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-7-2026

इच्छाओं का अंत कहाँ?

राजपाट त्यागकर

सिद्धार्थ वन को गए,

इस आकांक्षा के साथ

कि मानव जीवन को

रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के दुःख से

मुक्ति का मार्ग मिले।

अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ—

इच्छा ही दुःखों का मूल है।

संत कबीर ने कहा है—

“चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥”

उज्जैन के राजा

भर्तृहरि संन्यासी बने,

पर उनका मोह

एक कुतिया से जुड़ा रहा।

जब उसके बच्चे हुए,

तब संत पट्टिनत्तार ने कहा—

“तुम तो बड़े कुटुंबी हो गए!”

एक हिंदी कहानी भी यही सिखाती है—

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्याग दिया,

संन्यासी बन गया,

किन्तु अपने प्रिय घोड़े का मोह

न छोड़ सका।

पूर्णतः इच्छा-रहित जीवन

जीना अत्यंत कठिन है।

ईश्वर के ध्यान में निरंतर लीन रहना भी

एक उच्च अभिलाषा ही है—

परमात्मा में विलीन होने की अभिलाषा।

इच्छाएँ ज्वार-भाटे-सी उठती हैं,

समुद्र की तरंगों-सी उमड़ती हैं,

हवा की तरह निरंतर बहती रहती हैं।

सच ही कहा गया है—

“जब तक साँस, तब तक आस।” 


इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-7-2026

इच्छाओं का अंत कहाँ?

राजपाट त्यागकर

सिद्धार्थ वन को गए,

इस आकांक्षा के साथ

कि मानव जीवन को

रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के दुःख से

मुक्ति का मार्ग मिले।

अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ—

इच्छा ही दुःखों का मूल है।

संत कबीर ने कहा है—

“चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥”

उज्जैन के राजा

भर्तृहरि संन्यासी बने,

पर उनका मोह

एक कुतिया से जुड़ा रहा।

जब उसके बच्चे हुए,

तब संत पट्टिनत्तार ने कहा—

“तुम तो बड़े कुटुंबी हो गए!”

एक हिंदी कहानी भी यही सिखाती है—

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्याग दिया,

संन्यासी बन गया,

किन्तु अपने प्रिय घोड़े का मोह

न छोड़ सका।

पूर्णतः इच्छा-रहित जीवन

जीना अत्यंत कठिन है।

ईश्वर के ध्यान में निरंतर लीन रहना भी

एक उच्च अभिलाषा ही है—

परमात्मा में विलीन होने की अभिलाषा।

इच्छाएँ ज्वार-भाटे-सी उठती हैं,

समुद्र की तरंगों-सी उमड़ती हैं,

हवा की तरह निरंतर बहती रहती हैं।

सच ही कहा गया है—

“जब तक साँस, तब तक आस।” :::**




Thursday, July 16, 2026

भ्रम का जाल

 आज की चुनौती

भ्रमजाल (भ्रम का जाल)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
17-7-26

भ्रम में
नकली को असली समझकर
मनुष्य धोखा खा जाता है,
भयभीत हो जाता है।

रस्सी को साँप समझ लेना,
मृगमरीचिका को पानी मान लेना—
यही भ्रम का जाल है।

भ्रम से जन्म लेती हैं
गलतफ़हमियाँ,
गलत कदम,
गलत निर्णय और
गलत कार्यवाही।

झूठी खबरें,
अधूरी बातें और
अफ़वाहें
मानव जीवन को
दुविधा और संकट में डाल देती हैं।

रात्रि के अंधकार में
भूत की कल्पना करना,
नश्वर जगत को
अनश्वर समझ बैठना,
क्षणिक लाभ के लिए
गलत मार्ग अपनाना—
ये भी भ्रम के ही रूप हैं।

महाभारत में
"अश्वत्थामा हतः" सुनकर
आचार्य द्रोण
अपने पुत्र के मोह में पड़ गए।
"कुंजरः" शब्द धीमे स्वर में कहा गया,
और वे शस्त्र त्यागकर
निहत्थे हो गए।

दानवीर कर्ण ने
वेशधारी ब्राह्मण बने इन्द्र को
अपना कवच-कुण्डल दान दे दिया।

महाबली ने
वामन रूपधारी
भगवान विष्णु को न पहचानकर
तीन पग भूमि दान कर दी।

अज्ञातवास में
पाण्डवों ने
अपने नाम, रूप और कार्य बदलकर
जीवन बिताया।

दमयंती के स्वयंवर में
देवताओं ने
नल का रूप धारण कर
उसे भ्रमित करना चाहा।

मारीच का स्वर्ण-मृग रूप
और रावण का संन्यासी वेश
राम और सीता को
भ्रम के जाल में ले गया।

पौधों की समान आकृति वाली
पत्तियों को देखकर भी
मनुष्य कई बार
पहचानने में भूल कर बैठता है।

संक्षेप में—
भ्रम का जाल
मानव जीवन में
दुःख, संकट और संताप का
एक बड़ा कारण है।

इसलिए
सत्य, विवेक और धैर्य से ही
भ्रम का निवारण संभव है।

Wednesday, July 15, 2026

ज्ञान दर्पण

 ज्ञान दर्पण 

आज का ललकार : ज्ञान दर्पण


ज्ञान दर्पण

एस. अनन्तकृष्णनसौहार्द सम्मान प्राप्त, चेन्नै (तमिलनाडु), हिंदी प्रेमी प्रचारकस्वरचित भावाभिव्यक्ति16-07-2026


ज्ञान दर्पण


दर्पण हमारे बाहरी रूप को

ज्यों का त्यों दिखाता है—सुंदर या असुंदर।


पर ज्ञान का दर्पण

अज्ञात को ज्ञात कराता है,

भले-बुरे,सत्य-असत्य का विवेक कराता है।


वह खंड-अखंड का बोध देता है,

मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है

,ज्ञान-चक्षु प्रदान कर 

सभ्य, संस्कारित, आदर्श और संयमित जीवन

 जीना सिखाता है।


आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि-मुनि,

नश्वर संसार में रहते हुए भी 

सनातन धर्म के सत्य पर दृढ़ रहते हैं।


जो माया-मोह में फँसकर 

भ्रष्टाचार, रिश्वत, लोभ, ईर्ष्या और कामनाओं के

 वशीभूत हो जाते हैं,

वे यह भूल जाते हैं  कि कर्मों का फल 

एक दिन अवश्य मिलता है।

बड़े-बड़े स्नातक और स्नातकोत्तर,

अपराधियों को बचाने वाले वकील,

काले धन का समर्थन करने वाले

भ्रष्ट मंत्री, सांसद और विधायक—

यदि सत्य और धर्म से विमुख हैं,तो

 ज्ञानी होकर भी अज्ञानी हैं।

ज्ञान के दर्पण में सत्य, 

ईमानदारी,तटस्थता और परोपकार सर्वोपरि हैं।

माया ईश्वर की शक्ति  का अंश है।

उसका आकर्षण 

ज्ञानी मनुष्य को भी 

भ्रमित कर सकता है।


मन और बुद्धि की चंचलता

 कुकर्मों को जन्म देती है,

और वही अशांति व असंतोष का मूल बनती है।

इसलिए अहिंसा, सत्य और सदाचार का मार्ग

 अपनाने हेतु ज्ञान का दर्पण आवश्यक है।


समाज में जैसे मच्छर, मक्खियाँ और दीमक

 हानि पहुँचाते हैं,

वैसे ही आसुरी प्रवृत्तियाँ ज्ञान के दर्पण से दूर रहती हैं

सर्व ज्ञानी रावण भी 

नारी-मोह में पड़कर 

विवेक खो बैठा।


धर्म का त्याग कर,

भक्ति के नाम पर धन-संग्रह करने वाले 

पाखंडी मानव-एकता के बाधक हैं।


ज्ञान के दर्पण में भोग नहीं,

त्याग, बलिदान और विश्व-कल्याण का स्थान है।


महर्षि वाल्मीकि,गोस्वामी तुलसीदास और सम्राट अशोक ने। ज्ञान के प्रकाश से 

विश्ववंदनीय स्थान प्राप्त किया।


आदि शंकराचार्य जैसे आत्मज्ञानी महापुरुषों ने 

मानवता को सत्य का मार्ग दिखाया।


"सर्वे भवन्तु सुखिनः 

","वसुधैव कुटुम्बकम्"और "जय जगत" का संदेश

ज्ञान के दर्पण का ही संदेश है।


वेद, उपनिषद, कुरआन और बाइबिल—सभी 

मानवता को सत्य, सदाचार और कल्याण का 

मार्गदर्शन दिखानेवाले। ज्ञान के दर्पण हैं।

एस. अनन्तकृष्णन, सौहार्द सम्मान प्राप्त चेन्नै तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

16-1-26.

++++++++++++

ज्ञान दर्पण

 दर्पण हमारे रूप को 

 ज्यों का त्यों 

 दिखाता है।

 सुंदर असुंदर 

  बाहरी रूप।

 ज्ञान दर्पण 

 अज्ञात ज्ञात

 भला बुरा

 सत्य असत्य 

 अनेक बातों को 

 सोचने समझने

 खंड अखंड बोध 

 जानने,

 मानव पशु में 

 मानवता देकर 

 ईश्वर सृष्टियों में 

 ज्ञान चक्षु प्राप्त 

  सभ्य जीवन,

 संस्कृत जीवन 

 आदर्श जीवन 

 संयमित जीवन 

 जीने के लिए 

 ज्ञान दर्पण 

‌केवल मनुष्य के लिए।

आत्मज्ञान प्राप्त दिव्य पुरुष ऋषि मुनि

 नश्वर जगत,

 अनश्वर धर्म में दृढ़ रहते हैं।

 लौकिक माया मोह 

 आस्थाई जानकर भी

 भ्रष्टाचारी रिश्वत खोरी

लोभी ईर्ष्यालु कामी पुरुष अलग जीवन 

वे नहीं जानते कि

कर्म फल के अनुसार 

दंड मिलता ही है।

 बड़े बड़े स्नातक स्नातकोत्तर बनकर 

 अपराधी को छुड़ानेवाले वकील,

 काले धन के समर्थक सी.ए,

 भ्रष्टाचार‌ करोडपति मंत्री, सांसद, विधायक 

 ज्ञानी होकर भी अज्ञानी।

 ज्ञान के दर्पण में 

 सत्य प्रधान।

 ईमानदारी प्रधान 

 तटस्थता प्रधान 

 परोपकार प्रधान।

मायादेवी ईश्वर का एक अंश,

अति आकार्षक

ज्ञानी मनुष्य को

अज्ञानी मूर्ख बना देता है।

बुद्धि में चंचलता 

 मन की चंचलता 

 अज्ञानी के कुकर्म

 अशांति असंतोष का मूल।

  अहिंसा परमो धर्म का विरोध।

 इन सब को तजने

 ज्ञान का दर्पण चाहिए।

समाज में मच्छर, मक्खियाँ दीमक

संख्या के समान

 आसुरी शक्तियाँ

 ज्ञान के दर्पण नहीं देखते।

सर्वज्ञानी रावण

 नारी आकर्षण से

 अज्ञानी बन गया।

धर्म  तजकर 

 आश्रम में चाँदी के सिंहासन में बैठकर 

 भक्ति के नाम 

 धन संग्रह करनेवाले 

पाखंडी मजहबी लोग

 मानव एकता के बाधक  ज्ञानी नहीं।

ज्ञान के दर्पण में 

 भोग का स्थान नहीं।

त्याग , बलिदान,

 विश्व जन कल्याण ही प्रधान।

 तुलसीदास , वाल्मीकि 

 ज्ञान के दर्पण के बाद 

 विश्ववंद्य  बने।

अत्याचारी अशोक

 ज्ञान के दर्पण के बाद 

 विश्व विख्यात आदर्श 

सम्राट बने।

 आत्मज्ञानी  जन्मजात होते हैं

 जैसे 

 आदि शंकराचार्य।

वेदों के रचयिता।

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु 

वसुधैव कुटुंबकम् 

जय जगत के

 विश्वगुरु।

वेद उपनिषद कुरान बाइबिल ही ज्ञान के दर्पण।

++++++++++++++


आज का ललकार : ज्ञान दर्पण

ज्ञान दर्पण
एस. अनन्तकृष्णन
सौहार्द सम्मान प्राप्त, चेन्नै (तमिलनाडु), हिंदी प्रेमी प्रचारक
स्वरचित भावाभिव्यक्ति
16-07-2026

ज्ञान दर्पण

दर्पण हमारे बाहरी रूप को
ज्यों का त्यों दिखाता है—
सुंदर या असुंदर।

पर ज्ञान का दर्पण
अज्ञात को ज्ञात करता है,
भले-बुरे,
सत्य-असत्य का विवेक कराता है।

वह खंड-अखंड का बोध देता है,
मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है,
ज्ञान-चक्षु प्रदान कर
सभ्य, संस्कारित, आदर्श
और संयमित जीवन जीना सिखाता है।

आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि-मुनि
नश्वर संसार में रहते हुए भी
सनातन धर्म के सत्य पर दृढ़ रहते हैं।

जो माया-मोह में फँसकर
भ्रष्टाचार, रिश्वत, लोभ, ईर्ष्या
और कामनाओं के वशीभूत हो जाते हैं,
वे यह भूल जाते हैं कि
कर्मों का फल
एक दिन अवश्य मिलता है।

बड़े-बड़े स्नातक और स्नातकोत्तर,
अपराधियों को बचाने वाले वकील,
काले धन का समर्थन करने वाले,
भ्रष्ट मंत्री, सांसद और विधायक—
यदि सत्य और धर्म से विमुख हैं,
तो ज्ञानी होकर भी अज्ञानी हैं।

ज्ञान के दर्पण में
सत्य, ईमानदारी,
तटस्थता और परोपकार
सर्वोपरि हैं।

माया ईश्वर की शक्ति है।
उसका आकर्षण
ज्ञानी मनुष्य को भी
भ्रमित कर सकता है।

मन और बुद्धि की चंचलता
कुकर्मों को जन्म देती है,
और वही अशांति व असंतोष का मूल बनती है।
इसलिए
अहिंसा, सत्य और सदाचार का मार्ग अपनाने हेतु
ज्ञान का दर्पण आवश्यक है।

समाज में जैसे
मच्छर, मक्खियाँ और दीमक
हानि पहुँचाते हैं,
वैसे ही आसुरी प्रवृत्तियाँ
ज्ञान के दर्पण से दूर रहती हैं।

सर्वज्ञानी रावण भी
नारी-मोह में पड़कर
विवेक खो बैठा।

धर्म का त्याग कर,
भक्ति के नाम पर
धन-संग्रह करने वाले पाखंडी
मानव-एकता के बाधक हैं।

ज्ञान के दर्पण में
भोग नहीं,
त्याग, बलिदान
और विश्व-कल्याण का स्थान है।

महर्षि वाल्मीकि,
गोस्वामी तुलसीदास
और सम्राट अशोक ने
ज्ञान के प्रकाश से
विश्ववंदनीय स्थान प्राप्त किया।

आदि शंकराचार्य जैसे
आत्मज्ञानी महापुरुषों ने
मानवता को सत्य का मार्ग दिखाया।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः",
"वसुधैव कुटुम्बकम्"
और "जय जगत" का संदेश
ज्ञान के दर्पण का ही संदेश है।

वेद, उपनिषद, कुरआन और बाइबिल—
सभी मानवता को
सत्य, सदाचार और कल्याण का मार्ग दिखाने वाले
ज्ञान के दर्पण हैं।




 


 

 

 


 

 

  



  












 


चिंता को चुनौती

 चिंता को चुनौती 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक 

14-7-26

मानव‌ का जन्म

सुख दुख के मिलन में।

चिंता  के चक्कर में मानव।

 भूख  मिटाने की चिंता,

 पहनावे ओढावे की चिंता 

 आवास की चिंता।

 आर्थिक चिंता,

नौकरी की चिंता,

 वेतन वृद्धि और पदोन्नति की चिंता,

 योग्य पत्नी पति मिलने की चिंता 

  संतानोत्पत्ति की चिंता।

सुपुत्री सुपुत्र की चिंता।

  संतानों की शिक्षा,

 नौकरी, बहु-दामाद की चिंता।

 इन चिंताओं की

चुनौतियों का सामना करने की चिंता।

जीवन पर्यंत चुनौतियां।

 लोभ और ईर्ष्या की चिंता।

यों ही जीवन भर चिंता ही चिंता।

बचपन में चिंता ,

 जवानी में चिंता

 बूढापे में चुनौतियाँ।


आज की चुनौतीचिंता को चुनौती


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)14-7-2026


मानव का जीवनसुख-दुःख का संगम है।चिंता के चक्र मेंहर मानव निरंतर व्यस्त है।


भूख मिटाने की चिंता,तन ढकने के वस्त्रों की चिंता,अपने घर-आवास की चिंता,आर्थिक अभाव की चिंता।


नौकरी पाने की चिंता,वेतन-वृद्धि और पदोन्नति की चिंता,योग्य जीवनसाथी मिलने की चिंता,संतान-सुख की चिंता।


सुपुत्र-सुपुत्री के भविष्य की चिंता,उनकी शिक्षा और रोजगार की चिंता,बहू-दामाद के चयन की चिंता,परिवार के सुख-समृद्धि की चिंता।


इन सब चुनौतियों कासाहस से सामना करना हीजीवन की सबसे बड़ी चुनौती है।


लोभ और ईर्ष्याचिंताओं को और बढ़ाते हैं।यों ही बीत जाता हैमानव का पूरा जीवन।


बचपन में छोटी-छोटी चिंताएँ,जवानी में बड़ी जिम्मेदारियाँ,और बुढ़ापे में नई-नई चुनौतियाँ।


इसलिए चिंता नहीं,चिंतन और पुरुषार्थ अपनाइए।

साहस, धैर्य और विश्वास के साथ हर चुनौती पर 

विजय पाइए।

Tuesday, July 14, 2026

आशा

 

आशा

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
विधा — अपनी हिंदी, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी स्वतंत्र शैली
15-7-2026

मानव जीवन
आशा के आधार पर चलता है।

शादी करते हैं
इस आशा से कि
वैवाहिक जीवन
सुखमय और आनंदमय रहेगा।

आशा रहती है—
सुपुत्र-सुपुत्री होंगे,
उन्हें खूब पढ़ाएँगे,
अच्छी नौकरी मिलेगी,
योग्य बहू और दामाद मिलेंगे,
और संतान
बुढ़ापे में प्रेमपूर्वक
देखभाल करेगी।

आशा न हो तो
जीवन निराशा बन जाता है।
निराशा अनेक रोगों का कारण बनती है।

प्रेम में असफलता,
नीट परीक्षा में असफलता,
व्यापार में घाटा—
इन परिस्थितियों में
कुछ लोग निराश होकर
आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

पतझड़ में खड़े वृक्ष
हमें धैर्य का संदेश देते हैं।
उन्हें विश्वास रहता है
कि फिर बसंत आएगा।

चातक पक्षी
वर्षा की आशा करता है।
किसान
अच्छी वर्षा की आशा में
बीज बोता है।
पेड़-पौधे
ऋतु आने पर
फल-फूल देने की आशा रखते हैं।

आशा न हो तो
जीना दुश्वार हो जाए।

तपस्वी की आशा होती है
कि भगवान का अनुग्रह मिलेगा।
मनौतियाँ, दान, धर्म और पुण्य—
सबके पीछे
मोक्ष की आशा भी रहती है।

आशा ही
मानव को कर्मशील बनाती है।
यदि आशा न रहे,
तो मनुष्य निष्क्रिय हो जाएगा।

जैसे सेना की सतर्कता से
देश सुरक्षित रहता है,
वैसे ही आशा के सहारे
मानव जीवन
सदैव आगे बढ़ता रहता है।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
विधा — अपनी हिंदी, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी स्वतंत्र शैली
15-7-2026

मानव जीवन
आशा के आधार पर चलता है।

शादी करते हैं
इस आशा से कि
वैवाहिक जीवन
सुखमय और आनंदमय रहेगा।

आशा रहती है—
सुपुत्र-सुपुत्री होंगे,
उन्हें खूब पढ़ाएँगे,
अच्छी नौकरी मिलेगी,
योग्य बहू और दामाद मिलेंगे,
और संतान
बुढ़ापे में प्रेमपूर्वक
देखभाल करेगी।

आशा न हो तो
जीवन निराशा बन जाता है।
निराशा अनेक रोगों का कारण बनती है।

प्रेम में असफलता,
नीट परीक्षा में असफलता,
व्यापार में घाटा—
इन परिस्थितियों में
कुछ लोग निराश होकर
आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

पतझड़ में खड़े वृक्ष
हमें धैर्य का संदेश देते हैं।
उन्हें विश्वास रहता है
कि फिर बसंत आएगा।

चातक पक्षी
वर्षा की आशा करता है।
किसान
अच्छी वर्षा की आशा में
बीज बोता है।
पेड़-पौधे
ऋतु आने पर
फल-फूल देने की आशा रखते हैं।

आशा न हो तो
जीना दुश्वार हो जाए।

तपस्वी की आशा होती है
कि भगवान का अनुग्रह मिलेगा।
मनौतियाँ, दान, धर्म और पुण्य—
सबके पीछे
मोक्ष की आशा भी रहती है।

आशा ही
मानव को कर्मशील बनाती है।
यदि आशा न रहे,
तो मनुष्य निष्क्रिय हो जाएगा।

जैसे सेना की सतर्कता से
देश सुरक्षित रहता है,
वैसे ही आशा के सहारे
मानव जीवन
सदैव आगे बढ़ता रहता है।