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Sunday, June 14, 2026

समय यात्रा

 


समय का मुसाफिर 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

15.6.26

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मानव समय का मुसाफिर।

मोसम समय का मुसाफिर।

 बचपन एक मुसाफिर 

 लड़कपन एक मुसाफ़िर।

जवानी एक मुसाफिर 

 बुढ़ापा यात्रा का विश्राम 

 मौसमी फूल फल

सूर्य चन्द्र चौबीस घंटों के मुसाफिर।।

 पृथ्वी के सब जीव-जंतु जीवन काल निर्णय।

 अतः भूलोक समय का मुसाफिर।

नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

आपकी रचनाओं में जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन और अनुभूति की गहराई दिखाई देती है। "समय का मुसाफिर" हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन की प्रत्येक अवस्था एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं।

समय चलता रहता है,

जीवन बदलता रहता है।

जो समय का महत्व समझ ले,

उसका जीवन सँवरता रहता है।

आप इसी प्रकार हिंदी सेवा, साहित्य-साधना और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से अपने विचारों का प्रकाश फैलाते रहें।

ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और सृजन की निरंतर प्रेरणा प्रदान करें। आपकी धर्मपत्नी को भी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ मिले, यही मंगलकामना है।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री गणेशाय नमः।

जय श्री राम।

जय हनुमान।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

सादर प्रणाम एवं शुभकामनाएँ।

प्रार्थना

 


नमस्ते वणक्कम्।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ
‌मेरी प्यारी अर्द्धांगिनी मेरी जान
जल्दी स्वस्थ हो जाएँ।
मेरी जाने अनजाने गलतियों को
माफ़ कर दीजिए।
हे भगवान मेरे प्राण उनकी प्रार्थना से बची।
उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।
‌विनम्र निवेदन करता हूँ।
ॐ गणेशाय नमः
ॐ कार्तिकेयाय नमः
ॐ नमः शिवाय
ऊँ दुर्गा मैं नमः।
सत् चित् आनन्द स्वामिये नमः।
सच्चिदानंद स्वामिये नमः
अगस्त्याय नमः
भोगरे नमः
कडुवॆळि सिद्ध पुरुषाय नमः
इडैक्काडरे नमः
पुलिप्पाणिये नमः
अऴुकिनी सिद्ध पुरुषाय नमः
ॐशीरडी साईं नमः
ॐ पुट्टभर्ति स्वामिये नमः
जय जय शंकर हर हर शंकर।
ॐ रमण महर्षिये नमः
ॐ राघवेंद्राय नमः
ॐ शेषाद्रि स्वामिये नमः
ॐ गोरख सिद्ध पुरुषायै नमः
ॐ चिदंबरम स्वामिये नमः
ओम् रेड्डी पट्टी स्वामिये नमः
ॐ बड़े भाई साहब नमः।
ॐ पांबन स्वामिये नमः
ओम् पूंडीमहाने नमः
ओं भृगु मुनि ये नमः
ओं भ्रुंगी मुनिये नमः
ओं ईश्वरभट्टाय नमः
ओं कणक्कण पट्टी स्वामिये नमः
ओं माधूरी स्वामिये नमः
ओं चाक्कडै सिद्धपुरुषाय नमः
अरुट पेरुंज्योति अरुट् पॆरुँज्योति
तनिप्पेरुम् करुणै अरुट् पेरुमल ज्योति ।
ओम् भैरवाय नमः
ओं जय हनुमान।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
ॐॐ ॐॐ ॐॐ ॐॐ



नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपकी प्रार्थना में प्रेम, समर्पण, करुणा और जीवनसाथी के प्रति अटूट निष्ठा झलक रही है। अपनी अर्द्धांगिनी के स्वास्थ्य के लिए आपका हृदय जिस वेदना और श्रद्धा से भगवान के चरणों में झुक रहा है, वह स्वयं एक महान तपस्या है।

ईश्वर से मेरी भी यही प्रार्थना है—

हे गणपति, हे शिवशंकर, हे माता दुर्गा, हे मुरुगन, हे साईंनाथ, हे हनुमान, हे सभी सिद्ध पुरुषों और महापुरुषों!

आपकी कृपा से AK जी की धर्मपत्नी को शक्ति, शांति और स्वास्थ्य प्रदान करें।

उनकी पीड़ा कम हो, श्वास सहज हो, मन में साहस बना रहे और उपचार सफल हो।

परिवार को धैर्य, विश्वास और मानसिक बल दें।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।"

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

आपने लिखा — "उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।"

यह एक पति के प्रेम और कर्तव्य का अत्यंत मार्मिक भाव है। वर्षों तक जो साथ निभाता है, उसकी पीड़ा अपनी पीड़ा बन जाती है। आपकी सेवा, जागरण, चिंता और प्रार्थना भी ईश्वर की दृष्टि में एक पुण्य यज्ञ के समान हैं।

विश्वास बनाए रखिए। चिकित्सा और प्रार्थना दोनों साथ-साथ चलें।

ईश्वर आपकी अर्द्धांगिनी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री सुब्रह्मण्याय नमः।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

हार्दिक शुभकामनाएँ एवं प्रार्थनाएँ।

Saturday, June 13, 2026

पुण्य कलश

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏


पुण्य कलश

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

14-6-26

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मानव तो

सर्वगुण संपन्न 

 ज्ञानी, ब्रह्म सम।

पर  महामायादेवी

ईश्वर का एक अंग,

संसार को माया छाया जगत के रूप में 

बनाते रखने में समर्थ।

अचूक, सद्यःफल दाता।

परिणाम स्वरूप वह

 स्वार्थ निस्वार्थ 

बन जाता है।

 अन्याय का साथ देता है।

दशरथ की भूल,

शब्द भेदी बाण का प्रयोग 

शिशु हत्या पाप।

 राम का दुख

 रावण का बुद्धि भ्रष्ट 

 ये सब  न होने

 आदि काल में वेद उपनिषद और अनेक पुराण, प्रासांगिक कथाएँ।

पापों से मुक्ति पाने 

 हवन होम पुण्य कलश का महत्व।

 पुण्य कलश  सकारात्मक ऊर्जा,

 कलश में त्रिदेव और देवियों की उपस्थिति 

 सद्विचारों का स्रोत।

 दान धर्म का महत्व।

 परोपकार्थ

 इदम् शरीरम् की सीख।

 पापों की मुक्ति के लिए 

भूदान स्वर्ण दान चाँदीदान।

  जगत मिथ्या

 ब्रह्म सत्यं।

नश्वर दुनिया 

 अनश्वर सत्य प्रभाव।

 अनश्वर सूक्ष्म शक्ति

 परिणाम 

 अखिलेश्वर की अनंत शक्ति।

 पुण्य कर्म का फल,

 पाप कर्म का दंड।

 मानव  लौकिक 

 बंधन से छूटता नहीँ।

अतः जन्म पुनर्जन्म 

 सुखी दुखी का अनुभव।।

इन सब से छूटकर 

 दिव्य शक्ति सद्बुद्धि 

 आत्मसंतोष, 

आत्मज्ञान पाने,

पुण्य कलश की स्थापना

 फिर भी ज्ञान चक्षु प्राप्त मानव अपने अस्थाई जीवन को स्थाई मानकर 

 नकारात्मक विचार में।

 यही संसार है के दुःखों का मूल।

 पुण्य कलश की स्थापना 

आदर्श परोपकार जीवन कै लिए।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई


आपकी रचना में आध्यात्मिक चिंतन, कर्मफल, माया, दान, परोपकार तथा पुण्य कलश के प्रतीकात्मक महत्व का सुंदर समावेश है। भाव अत्यंत गहन हैं। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहमय रूप देने का एक विनम्र प्रयास प्रस्तुत है।

पुण्य कलश

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

14-6-2026

मानव तो

सर्वगुण-संपन्न,

ज्ञानी, ब्रह्म के समान है।

पर महामायादेवी,

ईश्वर की ही एक शक्ति,

इस संसार को

माया-छाया जगत के रूप में

संचालित करने में समर्थ है।

वह अचूक,

सद्यःफलदायिनी है।

उसके प्रभाव से मानव

स्वार्थी भी बन जाता है,

तो कभी निस्वार्थ भी।

कभी अन्याय का साथ देता है,

कभी धर्म के पथ पर चलता है।

दशरथ की भूल,

शब्दभेदी बाण का प्रयोग,

श्रवण कुमार के वध का पाप;

राम का दुःख,

रावण की बुद्धि का भ्रष्ट होना—

इन सब घटनाओं में

कर्मफल का संदेश छिपा है।

इसीलिए आदि काल से

वेद, उपनिषद, पुराण

और अनेक प्रेरक कथाएँ

मानव को सत्कर्म का मार्ग दिखाती हैं।

पापों से मुक्ति हेतु

हवन, होम और पुण्य कलश का

विशेष महत्व बताया गया है।

पुण्य कलश

सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

मान्यता है कि उसमें

त्रिदेव तथा देवियों का वास होता है।

वह सद्विचारों का स्रोत है,

दान और धर्म का प्रेरक है,

और सिखाता है—

"परोपकारार्थम् इदं शरीरम्"

अर्थात यह शरीर

परोपकार के लिए है।

भूदान, स्वर्णदान, चाँदीदान

और सेवा के विविध रूप

मानव को पुण्य के मार्ग पर ले जाते हैं।

जगत मिथ्या है,

ब्रह्म ही सत्य है।

यह संसार नश्वर है,

पर सत्य और दिव्य शक्ति अमर हैं।

पुण्य कर्म का फल मिलता है,

पाप कर्म का दंड भी।

फिर भी मानव

लौकिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता।

अतः जन्म-पुनर्जन्म के चक्र में

सुख-दुःख का अनुभव करता रहता है।

इन बंधनों से ऊपर उठकर,

सद्बुद्धि, आत्मसंतोष

और आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु

पुण्य कलश की स्थापना

एक शुभ प्रेरणा है।

किन्तु ज्ञान-चक्षु प्राप्त मानव भी

अपने अस्थायी जीवन को स्थायी मानकर

नकारात्मक विचारों में उलझ जाता है।

यही संसार के दुःखों का मूल है।

अतः पुण्य कलश की स्थापना

केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,

अपितु आदर्श, परोपकारी

और सदाचारी जीवन का संकल्प है।

— एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 🙏

रचना का मूल संदेश अत्यंत सुंदर है— सत्कर्म, परोपकार, आत्मज्ञान और सकारात्मक चिंतन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।

Friday, June 12, 2026

बाल श्रम दिवस

 नमस्ते आदरणीय अनंत कृष्णन जी।

आपकी रचना में बाल श्रम की सामाजिक विडंबना, गरीबी, उपेक्षा और बच्चों के शोषण के प्रति गहरी चिंता व्यक्त हुई है। इसे थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

13-06-2026

मानव जीवन में

जीने के लिए धन की आवश्यकता है।

परंतु धनाभाव में भी

संतान का जन्म

ईश्वर की देन है।

किन्तु जब माता-पिता

पालन-पोषण में असमर्थ होते हैं,

तब जन्म लेती है

एक सामाजिक त्रासदी—

बाल श्रम।

कहीं पियक्कड़ पिता,

कहीं असहाय माँ,

कहीं पिता का नदारद होना,

कहीं जन्म लेते ही

शिशु का त्याग।

कुछ बच्चे अनाथालयों में पलते हैं,

कुछ अपराधियों के हाथों

शोषण का शिकार बनते हैं।

गरीबी, उपेक्षा और विवशता

बचपन का अधिकार छीन लेती है।

सौतेले व्यवहार की पीड़ा,

भूख और अभाव की मार,

नन्हे हाथों को

पुस्तकों की जगह

मजदूरी का बोझ दे देती है।

दयालु और संवेदनशील लोग

बाल श्रम के विरुद्ध

आवाज़ उठाते हैं,

समाज को जागृत करते हैं,

और ठोस कदम भी उठाते हैं।

भीख माँगना भी

एक संगठित धंधा बन गया है।

मासूम बच्चों को आगे कर

दया का व्यापार होता है,

पर उसे रोकने वाले

बहुत कम दिखाई देते हैं।

केवल एक दिवस मनाने से

समस्या का समाधान नहीं होगा।

आवश्यक है

जागरूकता, शिक्षा और संवेदना।

अमीर संतान के लिए तरसते हैं,

गरीबों के यहाँ

फुटपाथों पर बचपन पलता है।

यह भी जीवन का

एक कठोर सत्य है।

आओ मिलकर संकल्प लें—

हर बच्चे को शिक्षा मिले,

हर बच्चे को सम्मान मिले,

हर बच्चे को उसका बचपन मिले।

नारा लगाएँ—

"बाल श्रमिक रहने न देंगे,

बचपन का अधिकार देंगे।"

"पुस्तक, शिक्षा और मुस्कान,

हर बच्चे का हो सम्मान।"

"बाल श्रम का हो अंत,

शिक्षा से बने उज्ज्वल भविष्य अनंत।"

सादर।

Thursday, June 11, 2026

नये भोर की प्रतीक्षा में

 एक नये भोर की प्रतीक्षा।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

++++++++++++++

12-6-26

+++++++++++

 हे अंतर्यामी!

तेरे चरणो में शरणागति मैं।

 तेरे ही ध्यान में 

 एक नये भोर की प्रतीक्षा में,

 जी के तम मिटने,

 पत्नी अपने रोग से बचने,

 जीवन में सुख देने,

 सर्वेश्वर तेरे चरणों में 

 निवेदन।

 जीवन में  तूने  सब कुछ दिया।

 मेरी पत्नी को स्वस्थ बनाकर,

अति शीघ्र चंगा करके,

मेरे जीवन में 

 सकारात्मक ऊर्जा दो।

शक्ति दो।

 सिवा तेरे अनुग्रह 

तेरी कृपा के

 और कोई शक्ति है नहीं 

नयी शक्ति नया उम्मीद 

‌देनै तेरे चरणों में 

शरणागत हूँ मैं।

 तू है शरणागत वत्सल।

 मार्कंडेय को जीवन दान दिया।

गूँगे को बोलने की शक्ति दी।

 मूर्ख कालिदास को

 महा कवि बनाया।

 नरसिंह अवतार लेकर 

 प्रह्लाद को बचाया।

मैं  निवेदन करता हूँ,

जल्दी चंगा करो।

शक्ति दो।

 नये भोर की प्रतीक्षा में 

 हर कोई तेरे ध्यान में।


आपकी भावाभिव्यक्ति अत्यंत हृदयस्पर्शी है। इसमें पत्नी के स्वास्थ्य हेतु प्रार्थना, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आशा का सुंदर भाव व्यक्त हुआ है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर प्रवाह और काव्यात्मकता बढ़ाई जा सकती है।

नये भोर की प्रतीक्षा में

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

12-6-2026

हे अंतर्यामी!

तेरे चरणों में शरणागत हूँ मैं।

तेरे ही ध्यान में लीन,

एक नये भोर की प्रतीक्षा में।

जीवन का तम मिट जाए,

पत्नी मेरे रोग से उबर जाए,

जीवन में फिर सुख का सूरज उगे,

ऐसी विनती तेरे चरणों में।

हे सर्वेश्वर!

जीवन में तूने सब कुछ दिया,

अब मेरी जीवन-संगिनी को

स्वस्थ कर, नवजीवन प्रदान कर।

मेरे जीवन में

सकारात्मक ऊर्जा भर दे,

संघर्ष सहने की शक्ति दे,

आशा का दीप पुनः जला दे।

तेरी कृपा के बिना

और कोई शक्ति नहीं।

नई शक्ति, नया विश्वास,

नया उत्साह प्रदान कर।

मैं तेरी शरण में हूँ,

तू शरणागत-वत्सल है।

मार्कण्डेय को जीवनदान दिया,

गूँगे को वाणी का वरदान दिया।

मूर्ख कालिदास को

महाकवि बना दिया,

नृसिंह रूप धारण कर

प्रह्लाद की रक्षा की।

मैं भी विनम्र निवेदन करता हूँ—

मेरी प्रार्थना स्वीकार करो,

पत्नी को शीघ्र स्वास्थ्य दो,

जीवन में पुनः मुस्कान भरो।

नये भोर की प्रतीक्षा में

मैं तेरा ध्यान करता हूँ,

और इस संसार का हर प्राणी

तेरी ही करुणा की राह निहारता है।

ओम् नमः शिवाय।

ओम् सरवनभवाय नमः।

ओम् मुरुगा। 🙏

आपकी पत्नी के स्वास्थ्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य और आपको धैर्य, शक्ति तथा आशा प्रदान करें। 🙏🌅

Wednesday, June 10, 2026

जीवन की अड़चनें

 अदृश्य दीवारें 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

11-6-26.

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मानव जीवन में है,

 अनेक अदृश्य दीवारें।

 मानव ज्ञान  से

परे एक

दिव्य ज्ञान ,

 दिव्य 

सृष्टियाँ,

 जन्म

जन्म के बाद 

 पलने में 

अमीरी, ग़रीबी, बीमारी।

असाध्य साध्य मंजिलें।

 सफलता में ईर्ष्या,

 शत्रृओं का सामना।

  अचानक प्राकृतिक प्रकोप,

 पूर्ण अपूर्ण  ख्वाहिशें।

बाढ, आँधी- तूफान,

संक्रामक रोग,

 तथास्तु भगवान की लीला,

 बुरे समय में 

 बुद्धि भ्रष्ट होना, 

विधि की विडंबना

 बुद्धि लब्धि 

  बाह्य रूप, भीतर कपट

 ये सब मानव जीवन के

अदृश्य दीविरें।

 अर्थात ज्ञान से परे बाधाएँ।

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जीवन की अड़चनें।

 आपकी रचना में  के रहस्यों, नियति, ईर्ष्या, विपत्तियों और मानव की सीमाओं को "अदृश्य दीवारों" के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इसे थोड़ा सुव्यवस्थित रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

अदृश्य दीवारें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

11-6-2026

मानव जीवन में हैं

अनेक अदृश्य दीवारें।

मानव ज्ञान से परे

एक दिव्य ज्ञान,

दिव्य सृष्टियाँ

और रहस्यमयी विधान।

जन्म से लेकर जीवन-पथ तक,

कहीं अमीरी, कहीं गरीबी,

कहीं बीमारी का बोझ,

तो कहीं मंज़िलों की दुर्लभ सीढ़ी।

सफलता के साथ ईर्ष्या,

शत्रुओं का सामना,

अचानक प्राकृतिक प्रकोप,

अधूरी इच्छाओं का ताना-बाना।

बाढ़, आँधी और तूफ़ान,

संक्रामक रोगों की मार,

तथास्तु भगवान की लीला,

समय-समय का व्यवहार।

बुरे समय में बुद्धि भ्रष्ट होना,

विधि की विचित्र विडंबना,

बाहरी रूप में सरलता,

भीतर कपट की साधना।

ये सब मानव जीवन की

अदृश्य दीवारें हैं,

अर्थात् ज्ञान से परे

खड़ी अनगिनत बाधाएँ हैं।

इन दीवारों को पार करने का

साधन है धैर्य और विवेक,

ईश्वर-विश्वास, सत्कर्म और

आत्मबल का आलोक।

भावार्थ:

मानव जीवन में अनेक ऐसी बाधाएँ और परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें हम देख नहीं सकते, समझ नहीं सकते या नियंत्रित नहीं कर सकते। यही "अदृश्य दीवारें" हैं, जिनका सामना धैर्य, विवेक और ईश्वर-विश्वास से किया जा सकता है।

रचना का विषय गहन और चिंतनशील है। विशेष रूप से "बाह्य रूप, भीतर कपट" तथा "बुद्धि भ्रष्ट होना" जैसी पंक्तियाँ जीवन की यथार्थ परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं।॥