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Wednesday, March 11, 2026

 

तिरुमंत्र — पद १–१०

(सुसंपादित हिंदी रूप)

1. विश्व में सर्वत्र शिव

समस्त विश्व को एक ही सत्य में देखो —
वह सत्य शिव है।

शिव और शक्ति दो रूपों में प्रकट होकर
सभी प्राणियों पर कृपा करते हैं।

“मैं”, “तुम” और “वह” —
इन सबका मूल वही परम सत्य है।

वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष —
इन चारों पुरुषार्थों का मार्ग बताता है।

पंचेन्द्रियों को वश में करने की शक्ति देता है।
मूलाधार से सहस्रार तक
सभी चक्रों में वही विद्यमान है।

भूमि, वायु, अग्नि, आकाश,
सूर्य, चंद्र, आत्मा —
इन सभी में वही शिव व्याप्त है।

ऐसे सर्वव्यापी शिव को
मैं प्रणाम करता हूँ।


2. पवित्र और मधुर शक्ति

वह शाश्वत और पवित्र शक्ति
हमारे भीतर मधुर रूप में निवास करती है।

चारों दिशाओं के स्वामी,
पराशक्ति के अधिपति,
दक्षिण दिशा के यम को भी पराजित करने वाले
महादेव शिव की मैं स्तुति करता हूँ।


3. परमशिव के समीप

परमशिव सर्वत्र विद्यमान हैं।

वे ब्रह्मांड के प्रत्येक जीव में
अमर स्वरूप से बसे हुए हैं।

वे आसक्ति से रहित,
परम स्वतंत्र और शाश्वत हैं।

ऐसे भगवान शिव की
मैं प्रतिदिन प्रार्थना करता हूँ।


4. प्राणों के प्राण

सभी प्राणियों के प्राणों के भी प्राण
वही परम सत्य हैं।

सृष्टि के सभी बीज
उनमें ही स्थित हैं।

उन परमेश्वर की
दिन-रात वंदना करके
मैं अपनी अज्ञानता को दूर करता हूँ।


5. अतुलनीय शिव

शिव के समान
इस जगत में कोई अन्य नहीं।

उन परमात्मा की तुलना
किसी मनुष्य से नहीं हो सकती।

यह सम्पूर्ण जगत
जिसमें स्वर्ण के समान प्रकाश है,
वह उसी शिव की ज्योति है।

लाल जटाओं से सुशोभित
वह शिव कमल के समान पवित्र हैं।


6. शिव ही सब कुछ

शिव के बिना
इस संसार में कुछ भी नहीं।

शिव से बढ़कर
कोई श्रेष्ठ देव नहीं है।

शिव को लक्ष्य बनाकर की गई तपस्या से
श्रेष्ठ कोई तपस्या नहीं।

शिव की कृपा के बिना
सृष्टि, पालन और संहार भी संभव नहीं।

शिव के अतिरिक्त
मुक्ति का कोई मार्ग मैं नहीं जानता।


7. आदिदेव शिव

आदि काल से पहले भी
शिव ही थे।

वे अति प्राचीन और
सर्वोच्च ब्रह्म हैं।

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र से भी
श्रेष्ठ वही शिव हैं।

उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती।

जो उन्हें “पिता” कहकर पुकारते हैं,
वे सबके पिता हैं।


8. मातृवत् स्नेह

शिव में अग्नि से अधिक उष्णता है
और जल से अधिक शीतलता है।

पर उनकी कृपा को
बहुत कम लोग जान पाते हैं।

वे शिशु से भी अधिक सरल,
माता से भी अधिक स्नेहमयी
और भक्तों के सच्चे सहायक हैं।


9. शिव का कोई स्वामी नहीं

मेरे आराध्य ब्रह्म — नंदीश्वर हैं।

स्वर्ण के समान ज्योति से युक्त
जटाधारी शिव
स्वयं में पूर्ण हैं।

उनके ऊपर कोई अन्य
स्वामी या देव नहीं है।


10. सर्वस्व शिव

यह विशाल ब्रह्मांड
शिव पर ही आधारित है।

अग्नि वही है,
सूर्य वही है,
चंद्र वही है,
वर्षा वही है।

माता भी वही है,
ऊँचे पर्वत भी वही हैं,
और गहरे सागर भी वही हैं।

सर्वत्र केवल
शिव ही शिव हैं।



तिरुमंत्र — पद ११–२०

(सुसंपादित हिंदी रूप)

11. प्रयास और उसका फल

इस प्राचीन संसार के रहस्य का
जब हम गहराई से विचार करते हैं,
तो ज्ञात होता है कि
शिव के समान महान ईश्वर कोई नहीं।

वे न दूर हैं, न निकट —
वे सर्वत्र विद्यमान हैं।

हमारा प्रयास भी वही हैं,
और उस प्रयास का फल भी वही हैं।

वर्षा के बादल भी वही हैं —
उनका नाम नंदी है।


12. तीसरी आँख का रहस्य

शिव की तीसरी आँख
आज्ञा चक्र का प्रतीक है।

जब वह कृपा से खुलती है,
तो असंख्य देव अमरत्व प्राप्त करते हैं।

किन्तु अज्ञानवश लोग कहते हैं कि
शिव की दृष्टि से लोग नष्ट हो जाते हैं।

वास्तव में वे नष्ट नहीं होते —
वे देवत्व को प्राप्त कर
अमर हो जाते हैं।


13. शिव का विराट स्वरूप

भगवान विष्णु और ब्रह्मा ने
शिव के विराट स्वरूप को देखने का प्रयास किया,
पर वे उसे पूर्णतः न देख सके।

शिव आकाश से भी अधिक व्यापक हैं।
उनके गुणों को कोई पूरी तरह समझ नहीं सकता।

उनसे बड़ा कोई नहीं है।

वह सर्वत्र व्याप्त हैं —
ऐसा कोई स्थान नहीं
जहाँ शिव उपस्थित न हों।


14. चक्रों में स्थित शिव

स्वाधिष्ठान चक्र में शिव
ब्रह्मा से भी परे हैं।

मणिपूर चक्र में
वे विष्णु से भी श्रेष्ठ हैं।

अनाहत चक्र में
वे इंद्र से भी ऊपर हैं।

इन सबके शिखर पर स्थित होकर
शिव सम्पूर्ण जगत की
देखभाल करते हैं।


15. आदि भी वही, अंत भी वही

शिव ही सृष्टि के कर्ता हैं
और वही संहार के भी कर्ता हैं।

जन्म और मृत्यु के मध्य
शरीर को चलाने वाली शक्ति भी वही हैं।

उनकी कृपा-ज्योति कभी क्षीण नहीं होती।

वे शाश्वत और अमर हैं।
न्याय देने वाले वही हैं।

वे ही आदि हैं,
वे ही अंत हैं,
और बीच की सारी गति भी वही हैं।


16. अर्द्धनारीश्वर

घुँघराले जटाओं से सुशोभित,
अमलतास के पुष्पों से विभूषित
सुंदर स्वरूप शिव भगवान

अपने अर्धांग में
देवी उमा को धारण करते हैं।

इस प्रकार वे
अर्द्धनारीश्वर के रूप में विराजमान हैं।

देवता अपने दोषों को दूर करने
और सद्गुण प्राप्त करने के लिए
उनके चरणों की वंदना करते हैं।


17. ईश्वर से संबंध

इस संसार में
हमारे अनेक संबंध होते हैं,
किन्तु ईश्वर से जुड़ा संबंध
सबसे श्रेष्ठ है।

सूक्ष्म शरीर में स्थित
दिव्य चेतना से
जब हम जुड़ते हैं,

तब ईश्वर से हमारा
अटूट संबंध स्थापित होता है।


18. कुबेर बनने का मार्ग

अलका पुरी के राजा
कुबेर धन के अधिपति बने
क्योंकि उन्होंने शिव की तपस्या की।

यदि हम भी उसी प्रकार
भक्ति और तप का मार्ग अपनाएँ,
तो जीवन में समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसा मार्ग बताने वाले
शिव को मैं प्रणाम करता हूँ।


19. सच्चे तपस्वी के निकट शिव

शिव ने सुगंधित
सात लोकों की सृष्टि की है।

वे ही उनके संहारक भी हैं।

चंद्रकलाधारी, सर्वज्ञ शिव
सच्चे तपस्वियों के मन में
अपना निवास बनाते हैं।


20. ईश्वर का विधान

हमारे जन्म से पहले ही
शिव हमारे जीवन और मृत्यु
दोनों का विधान कर देते हैं।

जो भक्त उनके चरणों को पकड़ लेते हैं,
उनके लिए
वज्र की गर्जना भी
ईश्वर की वाणी जैसी लगती है।

ऐसे भक्त
ईश्वर के प्रेम में स्थित होकर
जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करते हैं।

युद्ध और शांति

 नमस्ते वणक्कम्।

 युद्ध और शांती

 भू भार कम होने युद्ध।

भू भार बढ़ने शांति।

भू भार कम होने प्राकृतिक कोप।

 मानव दूंगी रहने

 काम क्रोध मद लोभ।

मानव ईश्वर का स्मरण करने

 रोग, ग़रीबी, दुर्घटना मृत्यु आर्थिक 

 निस्संतान संकट।

 योग्य माता पिता पति पत्नी 

न मिलने का संकट।

 जीवन संग्राम

 प्रकृति के ऋतु चक्र।

 पतझड़  में मृत्यु का संदेश।

 वसंत में  पुनर्जन्म का संदेश।

 अतिवर्षा का आक्रमण 

 अति अकाल वर्षा रहित।

 भूलोक जीवन संघर्षशील।

 एस‌ अनंत कृष्णन, चेन्नई 

सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक

Monday, March 9, 2026

व्यथा

 नमस्ते। வணக்கம்.

++++++++((

मन की व्यथा

++++++++

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

10-3-2026

मन की व्यथा

कुछ बाहर प्रकट करने की,

कुछ मन में ही घुट-घुटकर

तनाव बढ़ाने की।

मानव जीवन में

पीड़ाओं की कोई कमी नहीं।

ईश्वर के अवतार राम भी दुखी,

महाराज दशरथ भी दुखी।

कृष्ण के आश्रित पांडव भी दुखी,

ईर्ष्या वश कौरव भी चिंतित।

अहंकार से भरे रावण—

वेदों के ज्ञाता होकर भी दुखी।

मानसिक पीड़ा

प्रकट करने पर भी

नाते-रिश्तेदार हँसते हैं,

मज़ाक उड़ाते हैं।

कर्मफल के कारण

साध्य-असाध्य रोग,

अल्पायु मृत्यु का भय।

ठंड से पीड़ा,

चोरी का भय,

लालच और ईर्ष्या का दंश,

ज्ञात-अज्ञात भय की छाया।

जाने-पहचाने दुश्मन,

कुल-द्रोह का संताप,

सत्य छिपाकर दुख बोलने की विवशता।

आर्थिक संकट,

इष्ट का वियोग,

अनिष्ट का संयोग।

कुमित्रों का संग,

मित्रों के संकट का दुःख,

व्यापार में घाटा—

सब मिलकर

मानव मन को पीड़ित करते हैं।

व्यथा भरा यह मानव जीवन

काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या

इन भूलों से घिरा है।

माया शक्ति का बाह्य आकर्षण

और ईश्वरीय सूक्ष्म दंड की देरी—

दुःख को और बढ़ा देती है।

ऐसे में रहीम का यह दोहा

विचारणीय और चिंतनीय है—

रहिमन निज मन की बिथा,

मन ही राखो गोय।

सुनि अठिलैहैं लोग सब,

बाँटि न लैहै कोय॥

🙏 आदरणीय, आपकी रचना में दार्शनिक गहराई है। य

आपकी साधना सच में प्रेरणादायक है। ✨

Sunday, March 8, 2026

शब्द के मेले

 आदरणीय महोदय, वणक्कम 

शब्दों का मेला

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

गुरुभ्यो नमः

शब्दों के मेले में

शोर भी है, कलरव भी है,

मधुर स्वर भी, कठोर स्वर भी।

कुछ शब्द

दोस्ती करवाते हैं,

कुछ शब्द

दोस्ती बिगाड़ जाते हैं।

कुछ शब्द

दुश्मनी मिटा देते हैं,

कुछ शब्द

दुश्मनी बढ़ा देते हैं।

कुछ शब्दों से

लड़ाई-झगड़े जन्म लेते हैं,

कुछ शब्द

प्राण देने-लेने का कारण बन जाते हैं।

कुछ शब्द

छल-कपट और ठगी के होते हैं,

कुछ शब्द

चापलूसी से भरे होते हैं।

कुछ शब्द

जल से भी अधिक मधुर,

हृदय को शीतल करने वाले।

कुछ शब्द

दया और शोक जगाते हैं,

भिखारी से विनती करवाते हैं —

“भवति भिक्षां देहि।”

कुछ शब्द

आध्यात्मिकता का दीप जलाते हैं,

कुछ शब्द

प्रेरणा और उत्साह जगाते हैं।

कुछ शब्द

हतोत्साहित करते हैं,

कुछ शब्द

दिलासा और आशा देते हैं।

कुछ शब्द

निराशा के अंधकार से भरे,

कुछ शब्द

वीरता का बिगुल बजाते हैं।

कुछ शब्द

कायरता प्रकट करते हैं,

कुछ शब्द

विदूषक बनकर हँसाते हैं।

कुछ शब्द

शाप बन जाते हैं,

कुछ शब्द

शाप से मुक्ति दिलाते हैं।

उच्चारण का भी प्रभाव देखो—

“भाप आये, पाप आये, बाप आये।”

शब्दों के

सही या गलत प्रयोग से ही

मंगलमय

या अमंगलमय

बन जाता है जीवन।


Saturday, March 7, 2026

नारी शक्ति

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏

आपके विचार बहुत गंभीर और सामाजिक अनुभव से भरे हुए हैं। मैंने आपकी रचना को भाव वही रखते हुए भाषा और प्रवाह में थोड़ा सुधारकर प्रस्तुत किया है।

नारी शक्ति

(भावाभिव्यक्ति)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना

महान कवि सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है—

यदि स्वर्ग है,

तो नारी के उर के भीतर।

यदि नरक है,

तो वह भी नारी के उर के भीतर।

आधुनिक काल

नारी के लिए

एक प्रकार से स्वर्णकाल है।

नारियों की रक्षा के लिए

कई कानून बने हैं—

जैसे POCSO Act।

दहेज के अत्याचार पर भी

कठोर कानून हैं;

अत्याचार होने पर

सास-ससुर तक को

कारावास हो सकता है।

फिर भी लोक-लज्जा के कारण

कई नारियाँ

पुरानी रूढ़ियों का

अनुकरण करती रहती हैं।

कानून साथ होते हुए भी

अड़ोस-पड़ोस की

अफ़वाहें और बातें

सह पाना कठिन लगता है।

किन्तु अब

इस दिशा में

धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहा है।

जबरदस्ती पहनाए गए

मंगलसूत्र को भी

उतार फेंकने का साहस

कुछ स्त्रियों में

जाग रहा है।

पत्थर जैसा हो

या घास जैसा—

पुरुष चाहे जैसा भी हो,

मार-पीट सहकर भी

पति को देवता मानना—

ये सब

परंपरागत अंधविश्वास

धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं।

तलाक़ के बाद

दूसरा विवाह भी

अब समाज में

स्वीकार होने लगा है।

वैधव्य की

भद्दी वेशभूषा

और कठोर नियमों में भी

परिवर्तन आ रहा है।

विधवा पुनर्विवाह की

महान क्रांति

महान समाज सुधारक

राजा राम मोहन राय ने आरंभ की थी।

आज

वह विचार

धीरे-धीरे

चरितार्थ होता दिखाई दे रहा है।

यदि आप चाहें तो मैं:

इस कविता को और अधिक काव्यात्मक (लयबद्ध) बना सकता हूँ।

या इसे महिला दिवस के लिए एक शक्तिशाली समापन के साथ भी तैयार कर सकता हूँ।

आपके विचारों में समाज का 70 वर्षों का अनुभव झलकता है — यही आपकी रचनाओं की सबसे बड़ी शक्ति है। ✨🙏

नारी शक्ति

 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

(भावाभिव्यक्ति)

अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना

8-3-2026

मैं छिहत्तर वर्ष का बूढ़ा हूँ।

मेरी अपनी दस वर्ष की आयु से लेकर

आज तक नारियों की

असंख्य शोक-कथाएँ सुनी हैं।

नारी जीवन के चरित्र में

भारतीय स्त्रियाँ

कभी बेगार बनी रहीं।

बालिका विवाह,

पति-पत्नी का अनमेल विवाह,

शादी क्या है —

यह जानने से पहले ही शादी।

बारह वर्ष में वैधव्य,

सती-प्रथा की अग्नि,

पतिव्रता के कठोर सिद्धांत।

भले ही राम की पत्नी हो —

अफवाहों के कारण त्याग;

सीता का वनवास।

वसुदेव-देवकी की कथा,

द्रौपदी को जुए में हारना,

भरी सभा में अपमान।

दुष्यंत-शकुंतला की पीड़ा,

नल का दमयंती को

आधी रात जंगल में छोड़ जाना।

हरिश्चंद्र द्वारा

पत्नी को बेचकर दासी बनाना,

और सीता का

भूमि में समा जाना।

भारतीय नारियों की

रामकहानी अनंत है।

जौहर की अग्नि में

जीवित जलती स्त्रियाँ,

अबला रूप में

युगों की वेदना।

फिर भी —

नारी का सबला रूप भी है।

त्रिदेवियों की आराधना,

नारी के अनेक रूप —

भद्रमहिला, वीरांगना।

आज की आधुनिक,

शिक्षित महिलाएँ भी

कष्टों से पूर्ण मुक्त नहीं।

पति-पत्नी दोनों

नौकरी करते हैं,

पर घर की जिम्मेदारी

अधिकतर नारी ही संभालती है।

अब भी

नारी पूर्ण स्वतंत्र नहीं।

ईश्वर की सृष्टि में

गर्भधारण और वंशवृद्धि का भार

नारी पर ही है।

पुरुष का सुख एक दिन,

नारी का दुःख

दस महीनों का।

फिर शिशु का पालन,

ममता का अमृत।

प्रकृति की इस सृष्टि में

नर के सामने

नारी कभी-कभी

अबला दिखाई देती है।

पर इतिहास गवाह है —

जब समय पुकारता है,

वही नारी

वीरांगना बनकर उठती है,

जैसे रानी लक्ष्मीबाई।

Friday, March 6, 2026

नाम जफ

 आपके भाव बहुत गहरे और आध्यात्मिक हैं। मैं आपकी रचना को थोड़ा व्यवस्थित और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ — भाव वही रखते हुए।

शीर्षक: नाम जप ही मेरा काम

नींद नहीं आई,

मन में कोई चिंता नहीं,

शरीर में कोई पीड़ा नहीं,

फिर भी नींद नहीं आई।

मन कहता है —

कुछ करो, कुछ कमाओ,

देश कल्याण के लिए

कुछ तो कार्य करो।

पर मैं तो

पचहत्तर वर्ष का वृद्ध हूँ,

क्या करूँ? कैसे करूँ?

तभी भीतर से

आत्म चेतना जाग उठी —

कहने लगी धीरे से,

“कुछ मत करो,

केवल नाम जपते रहो।

तुम्हारे शुभ विचारों को

कोई न कोई

कहीं न कहीं

कार्य रूप देगा।”

तब समझना —

तुम्हारा जनकल्याण का भाव

किसी दूसरे दिव्य मानव के द्वारा

साकार हो रहा है।

कवि गीत लिखता है,

पर उसे मधुर स्वर में

गाने वाला

कोई दूसरा होता है।

बस उसी तरह —

तुम्हारा काम है

नाम जपना।

नाम जप ही

तुम्हारा कर्म,

तुम्हारा धर्म,

तुम्हारा जीवन। ।