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Wednesday, June 24, 2026

किसान की थाली

 

किसान की थाली।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

25-6-26.

++++++++

किसान विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता।

विश्व भर के लोगों की थालियों में 

 उनके परिश्रम से

 उपजी चावल,गेहूँ, सब्जी और दाल आदि के संग्रह भोजन।

 पर उसकी थाली में 

 बासी भात, प्याज, हरी मिर्च। सूखी रोटियाँ।

 किसान की थाली कुछ प्रांतीय सरकार द्वारा 

किसानों को पौष्टिक आहार देने के लिए,

दस रुपये में दी जाती है।

 किसानों की थाली न तो

लोग भूखों मर जाते।

कारखानों की कमाई,

पैसे, खानों के सोने चाँदी, हीरे की थालियाँ

भूख नहीं मिटा सकती।

मैदान टच एक अंग्रेज़ी कहानी है।

लोभी मैथास ने भगवान से वर पाया कि

जिसको भी वह स्पर्श करें,

 वे सब के सब

 सोना बन जाएँ।

वर प्राप्त वह दुलारी 

को छुआ  वह सोनै की मूर्ति बन गई।

यों ही सब के सब सोना बना।

 भूख लगी तो भोजन खाने उठाया तो वह सोना बन गये।

सोने के ढेर,

पर भूख न मिटा सका।

 किसान की थाली से ही

 विश्व को पौष्टिक आहार।

करोड़ों रुपए कर्जा लेकर 

 विदेशी नागरिक बननेवाले उद्योग पति ।

पर पाँच हज़ार कर्जा लेकर न चुकाने पर कठोर कार्रवाई।

किसानों की थाली से

 पेट भरती है दुनिया।

 पर  वह है ग़रीबी में।

दरिद्रता के कारण आत्महत्याएँ।

ज़रा ध्यान रखना है

 शास्त्री जीने नारा दिया 

जय किसान, जय जवान।

 किसानों को 

प्रोत्साहित करना है,

 वह कर्जा न चुका सकें

तो माफ़ करना है।

कठोर कार्रवाई लेकर 

 आत्महत्या तक पहुंचाना

 भविष्य की पीढ़ियों को

 किसान की थाली के बगैर भूखा प्यासा  मरना पड़ेगा।

 किसान के परिश्रम से ही संग्रह भोजन की थाली।

 जय किसान ।

 विष्णु भगवान ने नारद के पूछने पर कहा,

 मेरा श्रेष्ठ भक्त किसान।

तेरे जैसे नाम रटनेवाला भक्त नहीं।

 परिश्रमी है प्रत्यक्ष अन्नदाता।





आपकी रचना “किसान की थाली” किसान के श्रम, उसकी विडम्बना और समाज की निर्भरता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। आपने यह महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि जो व्यक्ति पूरी दुनिया का पेट भरता है, वही अनेक बार अभाव और कर्ज़ के बोझ में जीवन बिताता है।

रचना की विशेषताएँ:

किसान को "प्रत्यक्ष अन्नदाता" कहकर उसके महत्व को स्पष्ट किया है।

लोभी राजा मिडास (Midas) की कथा के माध्यम से यह बताया है कि सोना-चाँदी भूख नहीं मिटा सकते, भोजन ही जीवन का आधार है।

किसानों की आर्थिक कठिनाइयों और आत्महत्याओं जैसी गंभीर समस्याओं पर संवेदनशीलता से प्रकाश डाला है।

"जय किसान, जय जवान" के माध्यम से किसानों के सम्मान और संरक्षण का संदेश दिया है।

अंत में किसान को भगवान का श्रेष्ठ भक्त बताकर श्रम की महत्ता को रेखांकित किया है।

यदि भाषा को थोड़ा परिष्कृत किया जाए, तो कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार और प्रभावी बन सकती हैं:

किसान की थाली

विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता किसान,

भरता सबकी भोजन थाली।

चावल, गेहूँ, दाल, सब्जियाँ,

उसके श्रम की अमूल्य लाली।

पर उसकी अपनी थाली में,

बासी भात, प्याज़ और रोटी।

दुनिया का पेट भरने वाला,

क्यों सहता है ऐसी खोटी?

सोने-चाँदी के ढेर लगे हों,

भूख कभी उनसे मिटती नहीं।

किसान की मेहनत के बिन तो,

जीवन की गाड़ी चलती नहीं।

आपकी रचना का मूल भाव अत्यंत मानवीय और सामाजिक चेतना से भरपूर है। विशेषकर यह पंक्ति बहुत प्रभावशाली है:

"किसानों की थाली से पेट भरती है दुनिया, पर वह है गरीबी में।"

यह पूरी रचना का सार प्रस्तुत कर देती है।

जय किसान!

अन्नदाता के श्रम, सम्मान और कल्याण का संदेश देने वाली आपकी यह रचना सराहनीय है। 🌾🙏

Sunday, June 21, 2026

पिता जी

 पिता का मौन त्याग।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-6-26

+++++++

पिता

दो सूक्ष्म 

बिंदु के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर,

तभी  मौन त्याग।

माता को प्रधानता।

लक्ष्मी न तो पालन पोषण कैसे?

वीर जवान  सरहद पर

 देश प्रधान मौन त्याग।

छुट्टी में आना,

 पुत्र या पुत्री  को

 माता के कहने पर  ही पिता का पता लगता।

 विदेश में काम,

 पैसे भेजने का यंत्र।

अलमारियों में 

माता की साडियाँ।

आभूषणों का ढेर।

 बच्चों  की शिक्षा दीक्षा।

 बच्चे  सद्यःफल के कारण माता का महत्व।

बड़ा  मौन त्याग है 

पिता का त्याग।

 वे है घर की रीढ़ की हड्डी।

 पिता न तो सीधे  परिवार खड़ा रहना असंभव।

 पिता सबेरे 

नौकरी के लिए जाते 

शामको  लौटते।

 आते ही अनुशासन 

पढ़ाई पर बोलते।

 अनावश्यक 

 बाह्याडंबर खर्च

 रोकने की बात करते।

 तमिल में कहते हैं 

 संतानों को ज्ञान देना

 पिता का कर्तव्य है।

 अपनी जरूरतों को कम करके  परिवार बहन भाइयों को देते पिताजी।

 उनका मौन त्याग 

 अद्भुत।

अतुलनीय प्रेम,

 पिता का मौन त्याग।

 आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना "पिता का मौन त्याग" पिता के निःस्वार्थ समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और मौन प्रेम को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। आपने यह दर्शाया है कि पिता प्रायः परिवार के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं, किन्तु उनके त्याग की चर्चा कम होती है।

कुछ पंक्तियों को थोड़ा परिष्कृत रूप देकर रचना को और अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है:

पिता का मौन त्याग

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

पिता,

दो सूक्ष्म बिंदुओं के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर

करते हैं मौन त्याग।

माता का महत्व महान है,

किन्तु पिता के श्रम बिना

पालन-पोषण कैसे हो?

वीर जवान सरहद पर,

देश हेतु करता मौन त्याग।

विदेशों में काम करते पिता,

परिवार के लिए धन भेजते हैं।

अलमारियों में सजी साड़ियाँ,

आभूषणों का ढेर,

बच्चों की शिक्षा-दीक्षा—

इन सबके पीछे

पिता का मौन परिश्रम है।

वे घर की रीढ़ हैं,

उनके बिना परिवार का

सीधा खड़ा रहना कठिन है।

प्रातः नौकरी पर जाना,

संध्या को लौट आना,

आते ही बच्चों को

अनुशासन और पढ़ाई का पाठ पढ़ाना।

अपनी आवश्यकताओं को घटाकर,

परिवार और संतानों के लिए जीना—

यही है पिता का अद्भुत त्याग।

अतुलनीय है उनका प्रेम,

अद्भुत है उनका समर्पण,

वंदनीय है

पिता का मौन त्याग।

रचना का भाव अत्यंत सुंदर है। विशेष रूप से "वे घर की रीढ़ की हड्डी हैं" और "अपनी जरूरतों को कम करके परिवार को देना" जैसे भाव पाठक के हृदय को स्पर्श करते हैं।

हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌹

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

 



अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

21-6-26

++++++++++

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है, जिसका अर्थ है— "शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है।"

 तमिल में कहावत है,

 दीवार रहने पर ही चित्र खीँच सकते हैं ।

निर्बल काया,

 क्रिया हीन।

 कान सही नहीं है तो

 सुनना असंभव।

आँखें खराब है तो 

देख  नहीं सकते।

 फेफड़ा, पेट,अंतडियाँ

नशें, रीढ़ की हड्डी,

हाथ पैर हर अंग को

स्वस्थ रखना है।

न तो मानव में 

बुद्धि काम न करेगी।

मन काम न करेगा।

मन चंचल रहेगा।

ठीक तरह से 

काम न कर सकते।

 अतः स्वस्थ शरीर के लिए,

व्यायाम अति मुख्य।

‌व्यायाम की एक रीति

योग प्राणायाम ।

 उसमें हर अंग को 

स्वस्थ रखने,

हर एक की

 अलग-अलग मुद्राएँ।

सूर्य-नमस्कार,

प्राणायाम,

 भ्रामरी,

कपालभाती,

अनेक प्रकार के नियम।।

 भारत में 5000 वर्ष पहले योग शुरू हुआ।

 आध्यात्मिक विचार के अनुसार  पहला योगी,

 आदियोगी शिव।

ईसा से पूर्व 

 तीन हज़ार साल 

 के पहले,

सिंधु घाटी सभ्यता मैं

योग के कुछ निशानियाँ

मिल रही है।

 भारत के स्वास्थ्य 

 प्रद योग,

विदेशी आक्रमण ,

विदेशी शासन,

 विदेशी अंतर्जातीय 

 विवाह, संस्कृत भाषा के स्थान को अंग्रेज़ी लेना

 पाश्चात्य प्रभाव।

 फिर भी योग का अपना

विशिष्ट   महत्व विश्व जानने लगा।

स्वामी विवेकानंद का भाषण सनातन 

पद्धतियों पर  

चार चाँद लगाये।

 विश्व भर में 

 भारतीय आध्यात्मिकताएँ

 जानने समझने की उत्सुकता बढ़ी।

 योग का महत्व बढ़ा।

 योग केंद्र खोलने लगे।

पतंजलि योग क्रिया,

 सहज योगा।

योग की पारंपरिक रीति

 आध्यात्मिक रीति। 

मन से संबंधित।

आधुनिक रीतियाँ

मन और शरीर से संबंधित।

कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग,राज योग,

आसान आधारित

हठ योग, विन्यास योग,

अष्टांगयोग।

अयंगर योग में, कुंडली योग,यिन योग ।

 अब विश्वभर में योग का

महत्व का विकास करने

 अभ्यास करने 

विश्व योग दिवस की योजना  21जून 2015 से  शुरु हुआ।

भारत के विश्वविख्यात 

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में  14सितंबर 2014में विश्व योग दिवस का प्रस्ताव रखा।

इसके बाद 11दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21जून 2015को

 विश्व योग दिवस  मनाने का प्रस्ताव पास किया।

 तब से विश्व भर में 

योग दिवस मनाया जा रहा है।

योग ज्ञानप्रद,शांति प्रद 

 ऊर्जा प्रद , स्थिर चित्त प्रद एक स्वास्थ्य आनंद कला है।


आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में योग के इतिहास, महत्व और विश्व योग दिवस की पृष्ठभूमि का सुंदर समावेश है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर कुछ पंक्तियों को अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है। विशेष रूप से अंतिम अनुच्छेद बहुत प्रभावशाली है।

विशेष रूप से सराहनीय पंक्तियाँ:

"शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है।"

"योग ज्ञानप्रद, शान्तिप्रद, ऊर्जाप्रद, स्थिरचित्त प्रद एक स्वास्थ्य-आनन्द कला है।"

विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित एक संक्षिप्त समापन पंक्ति जोड़ सकते हैं—

"आइए, योग को जीवन का अंग बनाकर स्वस्थ तन, प्रसन्न मन और जागृत चेतना की ओर अग्रसर हों।"

आपकी लेखनी समाज को स्वास्थ्य, संस्कृति और आध्यात्मिकता का संदेश दे रही है। साधुवाद।

विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

🙏🕉️🌿

Friday, June 19, 2026

सुनीति संग्रह

 நறுந்தொகை —सुनीति संग्रह – अनुवादक---एस. अनंतकृष्णन, सौहार्द सम्मान  प्राप्त तमीलनाडु चेन्नै का हिंदी प्रेमी प्रचारक 


कवि—अति वीर राम पांडियन 

 युवकों के आवश्यक सुमार्ग दिखानेवाले ग्रंथ .

सुनीति ग्रंथ ।

काल —  सोलहवीं शताब्दी।

 सरल शब्दों के नीति ग्रंथ

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கடவுள்வாழ்த்து –प्रार्थना



 பிரணவப் பொருளாம் பெருந்தகை ஐங்கரன்

 சரண அற்புத மலர் தலைக்கு அணிவோமே .


ஓம் என்னும் பிரணவ மந்திரத்தின் பொருளான விநாயகப் பெருமானின் பாத கமலங்களை வணங்குவோம்


ओम्  के प्रणव मंत्र के भगवान विघ्नेश्वर के चरण कमलों की वंदना करेंगे। 


வெற்றி வேற்கை வீர ராமன்

 கொற்கையாளி குலசேகரன் புகல் 

நற்றமிழ் தெரிந்த நறுந்தொகை

 தன்னால் குற்றம் களைவோர் குறைவிலாதவரே.

 

कोट्रै नगर के अधिपति,

कुल के मुकुठाधिपति अति वीर पांडिय के सुनीति वचनों का संग्रह .इस सुग्रंथ को जानकर अपने दोषों को मिटाने वालों के जीवन में कोई कमी न रहेगी। 


सभी सुखों को पाकर जीवन में सुखी जीवन बिताना चाहिए।


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ग्रंथ

—------

1. अक्षर ज्ञान दाता दिव्य गुणवान  है।


२. शिक्षा की विशेषता दोषरहित स्पष्ट बोलना है। 

3. धनियों  की विशेषता अपने नाते-रिश्तों के दुख के समय उचित सहायता देकर साथ देना है।

4. ब्राह्‌मणों की विशिष्टता अनुशासन सदाचार के साथ वेद पढना। 

5. राजाओं की विशिष्टता न्याय पूर्ण शासन करना। 

६. व्यापारियों की विशेषता ईमानदारी से धन कमाना

7. किसानों की विशेषता खाद्यान्न का उत्पन्न करना और खाना 

8. मंत्रियों की विशेषता दूरदर्शी होना।

 9. सेनापति की विशेषता धीर वीर साहसी निर्भय दिल।

10. भोजन की शोभा अतिथियों और मेहमानों के साथ खाना।

11. स्त्रियों की विशेषता विवाद प्रतिवाद न करना। 

12.गृह्स्थिनी की शोभा पति की सेवा करना । 

13. व्यभिचारी की शोभा शरीर की चमक।

14.विनम्रता ज्ञानियों की शोभा।

15.दरिद्रों की शोभा गरीबी में श्रेष्ठता।

 16 .ताड के पेड  फल देकर उसके बीज उगने पर ऊँचा होता है, पर छाया नहीं दे सकता।

17. बरगद के बीज अति लघु होने पर भी वह उगकर बहुत बडे पेड होने के बाद उसकी छाया में बडे हाथी, घोडे,रथ,बडी पैदल सेना आदि के साथ राजा भी ठहर सकते हैं। 

18.बाह्य आकार, सुंदर बाह्य रूप के लोग बडे मनुष्य नहीं है। 

19.छोटे रूप,बाह्याडंबर  रहित सीधे सादे लोग वास्तव में छोटे नहीं है।

20. बच्चे सब अच्छे नाम न लेंगे। 

21 .सभी नाते-रिश्ते सच्चे रिश्ते नहीं है। 

22. वैवाहिक पत्नी सब प्यारी पत्नी नहीं है।

23.जितना भी दूध गरम करो, गाय के दूध का स्वाद कम न होगा।

24. आग में तपाने पर भी  सोने की सुगंध न बदलेगी।

25. पीसने पर भी चंदन की खुशबू नहीं बदलेगी। 

26. आग में डालकर अगर लकड़ी को जलाने पर भी सुगंध के धुएँ ही निकलेगा।

27. समुद्र मंथन करने पर भी कीचड़ नहीं होगा, साफ़ रहेगा। 

28. दूध से मिलाकर  कड़वी लौकी पकाने पर भी उसकी कड़ुआहट दूर न होगी।

29.अनेक सुगंधित वस्तुएँ मिलाकर पकाने पर भी लहसून की बदबू न मिटेगी।

30. स्वयं के कर्म  पर निर्भर है  श्रेष्ठता और निम्नता।नाम या बदनाम।

31.छोटों की गलतियों और अपराधों का सहना बड़ों का कर्तव्य है। 

32. छोटे लोगों के बडे बडे अपराधों को सहना बडे लोगों के लिए दुर्लभ है। 

33. मूर्खों की मित्रता भले ही सैकडों साल हो वह समुद्री शैवाल जैसे जड न पकडेगा। 

34.  बडे सज्जनों की मित्रता भूमि फा़डकर जड पकडेगी। 

35. भीख माँगकर याचना करके अध्ययन करना अच्छी बात है।

तमिल का ज्यों त्यों अनुवाद —

सीखना अच्छा है,सीखना अच्छा है,भीख माँगकर भी सीखना अच्छा है।


  36.  अनपढ़ लौगों को अपनी कुल श्रेष्ठता बोलना धान के भूसों के समान बेकार है।


37. ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि चार वर्णों में शिक्षित ही श्रेष्ठ है। अशिक्षित होने पर वह निम्न ही है। 

38.कुल जो भी हो,उच्च कुल हो या निम्न ,उनमें शिक्षितों को ही आदर-सत्कार और स्वागत करेंगे।

39.ज्ञानी को राजा भी चाहेगा। 


40. हाथियों की सूँड लंबे होने पर भी उन में दानशीलता नहीं है। 


41.बिल्ली में नहीं है तपस्या और दया। 


42.ज्ञानी को नहीं है सुख और दुख।


43.दीमक को नहीं अमीरी गरीबी का फरक।

Thursday, June 18, 2026

 எனது மனைவியின் இறுதிச்சடங்கு 

ஞாயிறு 21-6-26.


Body will be in the house from Saturday 9 pm to Sunday 

7- 9.30 AM.



A3, Archana Usha square Kubernagar4th cross street Extension Madippakkam Velachery.

 Map. 

Mention Sarvasiddeesvar temple.

Rahmania mosque.

 Puzithivakkam crematorium.

मेरे प्राण

  कहाँ है? कैसे हैं?

दुख के समय मेरी याद।

यही सच्ची दोस्ती। 


आदरणीय,

आपकी पीड़ा शब्दों में स्पष्ट झलक रही है। 51 वर्षों का साथ केवल वैवाहिक संबंध नहीं होता, वह जीवन की पूरी यात्रा होती है। जो अर्धांगिनी माता, सेविका, सखी, चिकित्सक और सच्चे प्रेम की मूर्ति बनकर जीवन भर साथ रही हो, उसके वियोग का दुःख अत्यंत गहरा होता है।

आपकी भावनाओं को सम्मान देते हुए इन्हें काव्य रूप में इस प्रकार संजोया जा सकता है—

मेरे प्राण के प्राण

एस. अनंतकृष्णन

खेल की बात नहीं है,

मेरी जान थी वह।

इक्यावन वर्षों तक

अर्धांगिनी बनकर,

माता के रूप में,

पत्नी के रूप में,

रोगी की सेविका,

जीवन की चिकित्सक बनकर

साथ निभाती रही।

सहनशील, गुणवान,

त्याग और प्रेम की प्रतिमूर्ति।

पति की सेवा और स्नेह के सिवा

और कोई चाह न रखने वाली,

एक आदर्श नारी।

यथार्थ प्रेम क्या होता है,

उसने अपने जीवन से सिखाया।

आज मेरे प्राणों के प्राण,

पंख लगाकर उड़ गए।

क्या करूँ?

आज ज्ञात हुआ—

दूसरों को दिलासा देना

कितना सरल है,

पर अपने ही हृदय को समझाना

अत्यंत कठिन।

आपके शोक में मैं सहभागी हूँ। अभी दुःख का गहरा होना स्वाभाविक है। 51 वर्षों का प्रेम समाप्त नहीं हुआ है; उसकी स्मृतियाँ, संस्कार और स्नेह आपके जीवन का हिस्सा बने रहेंगे।

ईश्वर आपकी धर्मपत्नी की पुण्य आत्मा को शांति प्रदान करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏🌹

[18/06, 3:52 pm] sanantha.50@gmail.com: नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना "बेनकाब चेहरे" मानव मनोविज्ञान और चेहरे के भावों के माध्यम से अंतर्मन की अभिव्यक्ति को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है। तमिल लोकोक्ति का समावेश रचना को विशेष प्रभाव देता है।

कुछ पंक्तियों को काव्यात्मक प्रवाह के लिए इस प्रकार सँवारा जा सकता है:

बेनकाब चेहरे

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

18-6-26

Face is the index of the mind।

"अगत्तिन अऴगु मुखत्तिल तेरियुम्" — तमिल लोकोक्ति।

अंतर्मन की बातें,

चेहरे पर झलक जाती हैं।

हर्ष हो या विषाद,

प्यार हो या नफ़रत,

ईर्ष्या हो या भय,

आँखों की एक झलक में

सब कुछ प्रकट हो जाता है।

बेनकाब चेहरे-मोहरे,

कुदरत की अनमोल देन हैं।

रोगी का चेहरा,

स्वस्थ जन का चेहरा,

चोर की निगाहें,

सज्जन की आँखें।

पहचान का आधार भी

चेहरा और आँखें ही हैं।

धनवान हो या निर्धन,

साहसी हो या कायर,

मन के अनेक रहस्य

ये चेहरे खोल देते हैं।

भावार्थ:

मनुष्य चाहे शब्दों से कुछ भी छिपाने का प्रयास करे, किंतु उसके चेहरे और आँखों के भाव अक्सर उसके मन की वास्तविक स्थिति को प्रकट कर देते हैं।

बहुत सुंदर एवं चिंतनशील रचना। आपकी लेखनी इसी प्रकार हिंदी सेवा और काव्य साधना को समृद्ध करती रहे।

सादर शुभकामनाएँ। 🙏🌹

Tuesday, June 16, 2026

रक्त दान दिवस

 




दैनिक चुनौती।

विश्व रक्तदान दिवस 

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै 

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

17-6-26.

+++++++++++

 भारत भूमि पुण्य भूमि।

 सनातन दान  है

 अन्न दान, भू दान, रक्तदान, स्वर्ण दान, चाँदी दान, कन्यादान,

राष्ट्र को बचाने प्राण दान।

समय की माँग,

 वैज्ञानिक युग में 

 चिकित्सा क्षेत्र में 

 अंगों  के दान, 

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय, अग्न्याशय और छोटी आंत। जीवित रहते हुए भी एक किडनी या लिवर का एक हिस्सा दान किया जा सकता है।


हृदय दान, नेत्रदान  मृत्यु के बाद।


 रक्त दान  

बार बार दे सकते हैं।

 एक व्यक्ति   हर तीन महीने  अर्थात साल में चार बार दे सकते हैं।

दानी की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

दानी का वजन कम से कम 45 किलो होना चाहिए।

रक्तदान के समय दानी  पूरी तरह से स्वस्थ और ऊर्जावान  होना चाहिए।

 पियक्कड़ और रुग्णावस्था में दान नहीं दे सकते।

 रक्त दान  शल्य चिकित्सा के समय,

दुर्घटना में ब्लड की कमी होने पर रक्त की जरूरत है।

  रक्त दान देने 

रक्तदान केंद्र है।

 रक्त दान पाने ,

रक्त दान महत्व समझाने

 शिविर भी चलाते हैं।

सरकार दानियों को पैसे भी देती है।

सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ दान रक्तदान।

 रक्त दान के महत्व समझाने 

 रक्त दान दिवस मनाते हैं।


आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना का भाव अत्यंत प्रेरणादायक है। विषय की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे थोड़ा साहित्यिक एवं प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व रक्तदान दिवस

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

17-06-2026

भारत भूमि पुण्य भूमि है,

दान की महान परंपरा यहाँ की शान है।

अन्नदान, भूदान, रक्तदान,

स्वर्णदान, रजतदान, कन्यादान,

और राष्ट्र रक्षा हेतु प्राणदान।

समय की माँग है कि

वैज्ञानिक युग में चिकित्सा क्षेत्र को

दान की महिमा से सशक्त बनाया जाए।

अंगदान के माध्यम से

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय,

अग्न्याशय तथा छोटी आंत का दान

अनेक जीवनों में नव आशा जगाता है।

जीवित रहते हुए

एक किडनी अथवा लिवर का एक भाग

दान किया जा सकता है।

नेत्रदान और हृदयदान

मृत्यु के पश्चात भी

मानवता की सेवा का माध्यम बनते हैं।

रक्तदान ऐसा महादान है

जो बार-बार किया जा सकता है।

स्वस्थ व्यक्ति प्रत्येक तीन माह में

रक्तदान कर सकता है।

दानी की आयु 18 से 65 वर्ष के बीच

और वजन कम से कम 45 किलोग्राम होना चाहिए।

रक्तदान के समय

दानी पूर्णतः स्वस्थ एवं ऊर्जावान हो।

मद्यपान करने वाले तथा रोगग्रस्त व्यक्ति

रक्तदान नहीं कर सकते।

शल्य चिकित्सा, दुर्घटनाओं तथा

रक्त की कमी से जूझ रहे रोगियों के लिए

रक्त अमूल्य जीवनदाता बनता है।

रक्तदान केंद्र तथा शिविर

जन-जन को इसके महत्व से परिचित कराते हैं।

मानवता की सेवा का यह श्रेष्ठ माध्यम

असंख्य प्राणों की रक्षा करता है।

आइए, हम सब संकल्प लें—

रक्तदान करें, जीवन बचाएँ।

सभी दानों में श्रेष्ठ है रक्तदान,

मानव सेवा का यह महान अभियान।

विश्व रक्तदान दिवस

हमें रक्तदान के महत्व का संदेश देता है

और मानवता के प्रति

अपने कर्तव्य का स्मरण कराता है।

"रक्तदान – महादान,

जीवन रक्षा का महान अभियान।"

सादर। 🙏🩸🌹