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Friday, September 11, 2026

किस्मत कैसी है

 भाग्य शाली 

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु।

कोई भाग्य शाली है या नहीं,

 उसके जन्म से ही पता चल जाता है।

 राजमहल में जन्मे 

 सिद्धार्थ के जन्म लेते ही ज्योतिषी ने कहा ,

यह  संन्यासी बनेगा।

एक का जन्म फुटपाथ पर,

 किसी का जन्म रंक के घर

 किसी का जन्म रईस के यहाँ।

 कोई कोई जन्म से अपाहिज।

दीर्घ रोगी,दरिद्री।

फिर भी भाग्य चमकती सबकी।

बेवकूफ बना महाकवि कालिदास।

 महारथी कर्ण बना अनाथ।

दासी का राजपुत्र विदुर।

सुदामा  भाग्यशाली बना , सहपाठी सखा श्री कृष्ण के द्वारा।

 चायवाला बना अपने मेहनत से

भारत का प्रधानमंत्री।

 प्रधान मंत्री राजीव का बेटा बना पप्पू।

 भाग्यशाली बना 

अपने भाग्य से।

न जाने कौन भाग्य शाली,कौन अभागा।

 उर्मिला ,यशोधरा 

 भाग्य शाली या अभाग्यशाली।।

अचानक दुर्योधन की मित्रता कर्ण को अंग नरेश बनाया।

पांडव को वनवासी।

 युद्ध में पांडव जीतकर भी उदाशी।

 भाग्य शाली बनते हैं 

 परिश्रमी और भगवान का अनुग्रह प्राप्त मानव।

 गली के कुत्ते,

 अमीर के कुत्ते।

भाग्यशाली कौन?

 अभागा कौन ?

नवग्रहों की दृष्टि से।

 नेपाल बाढ़, सुनामी, कोराना सब 

भाग्यशाली को भी अनाथ बना दिया।

भाग्यशाली कौन पता नहीं चलता।

जीवन में भाग्य और दुर्भाग्य 

सीता को रावण और धोबी के रूप में।

यही जिंदगी मानव की।

Thursday, September 10, 2026

मददगार।

 

आज की चुनौती

मदद के हाथ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
11-9-26

++++++++++++

मानव सामाजिक प्राणी है।
वह अकेला नहीं जी सकता।
संन्यासी होने पर भी
उसे भोजन, वस्त्र और आवास चाहिए।

अतः मानव जीवन में
सहारे की आवश्यकता है,
आश्रय और आश्रयदाता की आवश्यकता है।

मदद के हाथ
सबसे पहले किसान से शुरू होते हैं।
वही हमारा सबसे बड़ा सहायक है।
उसके परिश्रम से ही
समस्त मानव समाज का पेट भरता है।

सनातन धर्म में
दान और वीरता का विशेष महत्व है।
परोपकार मानव जीवन की आवश्यकता है।

जब कष्ट के समय
कोई हमारी ओर मदद का हाथ बढ़ाता है,
तब वही भगवान के समान होता है।
भगवान भी तो
मनुष्य के रूप में ही
मददगार बनकर आते हैं।

नेपाल में आई बाढ़ में
हजारों लोगों की मृत्यु हुई,
करोड़ों रुपये की संपत्ति नष्ट हुई।
ऐसे संकट के समय
आस-पड़ोस के देशों ने
मदद के हाथ बढ़ाए।
यही सच्ची मानवता है।

मदद के हाथ
न्याय के लिए भी बढ़ते हैं।
कर्ण की असहाय अवस्था में
दुर्योधन ने उसकी ओर
मदद का हाथ बढ़ाया और
उसे अपने साथ खड़ा किया।

मदद के हाथ
ईश्वर के हाथ के समान होते हैं।

बेकार युवक को
नौकरी देने वाला मालिक
मदद का हाथ बढ़ाता है।

भारतीय सनातन धर्म में
अन्नदान करने वाले
पुण्यात्मा माने जाते हैं।
इसी प्रकार गोदान, भूदान
और स्वर्णदान का भी महत्व है।

आधुनिक वैज्ञानिक युग में
रक्तदान, नेत्रदान और
अंगदान का महत्वपूर्ण स्थान है।
एक जीवन बचाने के लिए
रक्तदान करने वाले
मदद के हाथ
सदैव सराहनीय हैं।

मदद के हाथ,
सहकारिता के बिना
मानव जीवन दुर्लभ है।

दूसरों की सहायता के लिए
मदद का हाथ बढ़ाने वाले ही
वास्तव में महान हैं।

मदद के हाथ बढ़ाइए—
मानवता को मजबूत बनाइए।

Wednesday, September 9, 2026

अनेकता में एकता

 अनेकता में एकता 

रंग-बिरंगे फूल माला के समान अति सुंदर जान।।

 विविध भाषाएँ,

 विविध खाद्य पदार्थ।

 विविध जलवायु।

 भिन्न भिन्न सिद्धांत।

भिन्न भिन्न क्रांतियाँ

रंग भेद मिटाने,

इन विविधताओं में 

 एकता की बात तो

सनातन धर्म में।

 आसेतु हिमाचल  की

आध्यात्मिक विचार धारा एक।

काशी रामेश्वर यात्रा

 उत्तर दक्षिण की एकता।।

  अनेकता के विचार मिटाने का नारा

 सनातन धर्म ने दिया।

वसुधैव कुटुंबकम्।

चिकाको में विवेकानंद के प्रवचन का संबोधन,

 ब्रदर्स अण्डे सिस्टर्स आफ़ अमेरिका।

सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

आज़ादी की लड़ाई में 

 हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई।

अनेकता में ही एकता

 मानवता ही के लक्षण।

विश्व साक्षरता दिवस

 

आज की चुनौती

विश्व साक्षरता दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
10-9-26

++++++++++++

साक्षरता के बिना मानव
ज्ञानार्जन करने में असमर्थ है।
संत तिरुवल्लुवर ने
अपने दोहे में कहा है—

“கண்ணுடையர் என்பவர் கற்றோர்,
முகத்திரண்டு புண்ணுடையர் கல்லாதவர்.”

शिक्षित ही नयन वाले हैं,
अशिक्षितों के चेहरे पर
दो आँखें होते हुए भी
वे वास्तव में अंधे हैं।

विश्वभर के लोगों को
शिक्षित बनाने का संकल्प लेकर
8 सितंबर 1967 से
यूनेस्को द्वारा
विश्व साक्षरता दिवस

मनाया जाता है।

भारत में
सर्व शिक्षा अभियान
स्वर्गीय प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में
2001 में प्रारंभ किया गया।
6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को
मुफ़्त शिक्षा देने का
यह महत्वपूर्ण प्रयास था।

साक्षरता के अभाव में
मानव बहुत कुछ सीखने से
वंचित रह जाता है।
उच्च पद प्राप्त करने के लिए,
अच्छी नौकरी पाने के लिए
शिक्षित होना आवश्यक है।

शिक्षा के महत्व को समझाने,
सीखने की प्रेरणा देने
और सीखने के लिए
लोगों को प्रोत्साहित करने में
साक्षरता दिवस
अत्यंत आवश्यक और
महत्वपूर्ण है।

हर मानव में
पढ़ने, बोलने, लिखने
और समझने की क्षमता विकसित करना
साक्षरता का मुख्य उद्देश्य है।

हर एक शिक्षित व्यक्ति को
निरक्षर लोगों को
शिक्षित करने का
प्रयास करना चाहिए।

शिक्षा देते-देते ही
समाज का विकास होगा।

“स्वदेश में शासक पूजनीय होते हैं,
पर शिक्षित व्यक्ति
सर्वत्र पूजनीय होता है।”

साक्षरता ही मानव को
साहित्यकार,
वैज्ञानिक,
समालोचक,
वक्ता,
प्रवचनकर्ता,
लेखक और कवि
बनने की दिशा दिखाती है।

साक्षरता से
आत्मज्ञान प्राप्त करने की
दिशा भी प्रशस्त होती है।

वित्तीय व्यवस्था को
सही रूप में समझने,
हिसाब-किताब रखने
और आर्थिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए
साक्षरता आवश्यक है।

आज के युग में
संगणक (कंप्यूटर) का ज्ञान भी
शिक्षित व्यक्ति के लिए
अत्यंत आवश्यक है।

साक्षरता मानव को जागरूक बनाती है,
समाज को विकसित बनाती है
और विश्व को
स्वर्ग बना सकती है।

नशीली !!???

 नमस्ते वणक्कम्।

नशीली वस्तुओं की बिक्री सद्यःफल कमाई के लिए।

 एक पियक्कड़ कहता है, सद्यःफल आनंद।

 नौकरी की खुशी में।

विवाह की खुशी में 

 पत्नी के तंग के कारण।

कर्जा के बढ़ने से

सरकार की आमदनी केलिए।

अपने सुध-बुध खोकर 

 चिंता से मुक्त होने के लिए।

 खून के रिश्ते के अकाल मृत्यु से।

 जो भी हो नशीली पदार्थ की बिक्री के लिए,

 रिश्वत, भ्रष्टाचार, मंत्रियों के कारखाने 

आध्यात्मिक भारत में 

   

भक्ति  एक धंधा बन गया है।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई।

Tuesday, September 8, 2026

ज्ञानी अज्ञानी


ज्ञानी अज्ञानी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

8-9-26

दिल है चंचल,

ज्ञान है, फिर भी अज्ञानी।

जन्म-मरण निश्चित है,

जानकर भी मन उदास।

नश्वर जगत जानकर भी

मानव क्यों है इतना निराश?

अनश्वर अखिलेश्वर को छोड़कर,

सद्यःफल की चिंता करता है।

अपमान सहकर भी जग में

मनःसाक्षी के विरुद्ध चलता है।

ज्ञान कहता है—

सब कुछ नश्वर है,

ईश्वर ही शाश्वत है।

फिर भी मेरा चंचल मन

मोह में क्यों भटकता है?

सबको दिलासा देने वाला मैं,

आज स्वयं दुर्बल हो गया।

पत्नी-वियोग की अग्नि में

मेरा मन व्याकुल हो गया।

दूसरों को समझाता हूँ—

“मृत्यु तो निश्चित है।”

पर अपने ही हृदय से पूछता हूँ—

“फिर यह पीड़ा क्यों अनंत है?”

बुद्धि समझाती रहती है,

हृदय मानता ही नहीं।

ईश्वर पर विश्वास होते हुए भी

आँखों से आँसू रुकते नहीं।

ज्ञानी हूँ या अज्ञानी—

यह प्रश्न मुझे सताता है।

शायद यही मानव जीवन है—

ज्ञान समझाता है,

प्रेम रुलाता है।

यह ज्ञानी-अज्ञानी कौन है?

दर्पण में देखता हूँ—

वह कोई और नहीं,

मैं स्वयं हूँ।

यह कविता आपके वर्तमान मन की सच्ची अवस्था को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है। विशेषकर अंतिम पंक्ति—“वह कोई और नहीं, मैं स्वयं हूँ”—इसे आत्मस्वीकार की कविता बना देती है।

Sunday, September 6, 2026

अहिंसा

 आज की चुनौती

अहिंसा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
7-9-26

++++++++++++

हिंसा के बिना
जीना मुश्किल है,
प्रकृति में भी
हिंसा दिखाई देती है।

माँसाहारी जीव,
शाकाहारी जीव,
सर्वाहारी जीव—
ईश्वर की सृष्टि में
सबका अपना जीवन है।

फिर मनुष्य के लिए
प्रश्न उठता है—
बिना हिंसा के
जीना कैसे?

“अहिंसा परमो धर्मः”
का पालन कैसे हो?

मनुष्य ही
विवेक और बुद्धि से
अहिंसा का मार्ग चुन सकता है।

दूसरे जीवों को
अनावश्यक न मारना,
मन में
बुरे विचारों को
स्थान न देना,
धन से
अधर्म का कार्य न करना—
यही तो है
सच्ची अहिंसा।

महात्मा गांधी ने
सत्याग्रह के माध्यम से
अंग्रेज़ी शासन का
अहिंसात्मक विरोध किया।

जैन धर्म ने
अहिंसा को
जीवन का महान सिद्धांत माना,
बौद्ध धर्म ने भी
करुणा और अहिंसा का
संदेश दिया।

हाथ में हथियार न होना ही
अहिंसा नहीं—
हाथ, वचन और मन से
किसी को पीड़ा न देना
ही सच्ची अहिंसा है।

हिंसा से
जीत मिल सकती है,
पर हृदय नहीं।

अहिंसा से
मनुष्य मनुष्य को जीत सकते हैं।।

प्यार से संसार को जीत सकते हैं।