हिंदी दिवस की सार्थकता
अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1953से 2026तक
हिंदी दिवस मनाकर
फिर भूल जाना
अंग्रेज़ी का गुणगान करना,
अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों को
केंद्र और राज्य सरकारें होड़ लगाकर
खोलने की अनुमति देना।
अंग्रेज़ी माध्यम धन प्रधान।
अंग्रेज़ी मगर मच्छ भारतीय
भाषाओं को निगल रही है।
भारतीय सम्मिलित परिवार व्यवस्था
सहनशीलता मिटा रही है।
तलाक़ संख्या बढ़ा रही है।
माता-पिता गुरु भगवान के आदर्श
अब अध्यापक एक पेशा मजदूर
यही अंग्रेज़ी देन।
इस स्थिति को बदलना
हिंदी दिवस का उद्देश्य होना चाहिए।
अधिक , न्याय अन्याय अधिकार निर्वाह
निर्वाण संदेह प्रयत्न महान महात्मा
घेरा बंद शिखर पर्वत कवि काव्य
ऐसे हजारों शब्द हिंदी को सीखने सरलतम
बनिए रहे हैं।
मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा स्थापित हिंदी प्रचार सभा का नारा
एक राष्ट्र भाषा हिंदी हो एक हृदय हो भारत जननी।
भारत विविध भाषाओं के देश है।
भारतीय भाषाओं में
एक भाषा को
राष्ट्र के संपर्क के लिए
और राजभाषा के लिए
बनाने से भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति और
कलाचार, चिंतन आदि का विशिष्ट स्थान होगा।
पर आज़ादी के बाद
भारतीय 85% प्रधान जीविकोपार्जन का
साधन कृषी पर ध्यान न देकर
भारतीय कुटिल उद्योगों के विकास को
प्रधानता और प्राथमिकता न देकर
विदेशी मशीनीकरण और उद्योगों को
प्रधानता देने लगे।
परिणाम स्वरूप अंग्रेज़ी प्रधान भाषा बनी।
अंग्रेज़ी के बिना नौकरी नहीं
ऐसी एक परिस्थिति पर ध्यान न देकर
उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी
आज़ादी के अस्सी साल में
जनप्रिय बन गयी।
शुद्ध मातृभाषा बोलना
गँवार का अपमान मिला।
स्वार्थ शिक्षित समाज
आमदनी के लिए अंग्रेज़ी माध्यम
के स्कूल खोलने लगे।
वहाँ तीन से पांच साल के
बच्चों को अंग्रेज़ी ही सिखाने लगे।
दूसरी ओर भारतीय भाषाओं के माध्यम
ग्यारहवीं कक्षा तक पढ़कर
पीयूसी में अंग्रेज़ी माध्यम मुश्किल रहा।
अतः जनता अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल चाहने लगे।
और सरकारी नौकरी के लिए
अंग्रेज़ी ही प्रधान भाषा बनी।
अब आजादी के अस्सी वर्ष में
सब के सब भारतीय शिक्षा विभाग,
मंत्री, सांसद, विधायक सरकारी स्कूल के अध्यापक
सब इस अंग्रेज़ी माध्यम के पक्ष में हो गये।
परिणाम स्वरूप मातृभाषा माध्यम की
पाठशालाएं गरीबों के लिए ।
मध्यम वर्ग , प्रशासनिक अधिकारी अंग्रेज़ी
बोलने में माहिर हो गये!
सरकारी कार्रवाइयाँ अंग्रेज़ी में ही होने लगी।
आज़ादी के बाद २० - २५ साल तक भारतीय भाषाओं का महत्व घट गया।
इस परिस्थिति को बदलने के लिए
हिंदी दिवस मनाने की योजना बनाई गई।
पर हिंदी के प्रचार प्रसार में
भारतीय प्राचीन संपर्क की भाषा
संस्कृति पर ध्यान न देकर
हिंदी को एक नव निर्मित भाषा के रूप में
प्रचार करने लगे।
आसेतु हिमाचल तक मेंं
व्यवहार के हजारों शब्द समानता का प्रचार न हुआ।
अतः जनता में हिंदी राजभाषा के महत्व समझाने
हर साल सितंबर में हिंदी दिवस मनाने लगे।
लेकिन हिंदी के विरोध वातावरण ही दक्षिण में खासकर तमिलनाडु में है।
प्रबोध प्राज्ञा प्रवीण परीक्षा में उत्तीर्ण
केंद्रीय कर्मचारियों को हिंदी में पत्रचार करने के आदेश देने में केंद्र सरकार असमर्थ ही रही।
अब भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा और नौकरी की संभावना नहीं।
अस्सी साल में शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम ही बन गई।
भारतीय जनता अंग्रेज़ी माध्यम ही चाहती है।
आगे हिंदी राजभाषा के रूप में कैसे चमकेगी।
दिल्ली मुंबई सर्वत्र अंग्रेज़ी माध्यम ही लोग चाहते हैं।
अतः यह हिंदी राजभाषा बनने की संभावना कम ही है।