गाँव की आत्मा
एस . अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
10-8-26
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भारत गाँवों का देश।
प्रधान धंधा खेती।
मोहनदास करमचंद गांधी जी ने ग्राम राज्य का स्वप्न देखा था।
ग्राम की आत्मा
परिश्रम का महत्व।।
वह आत्मा न चाहती
बाह्याडंबर
पूर्ण जीवन।
एक बार नारद ने
विष्णु से पूछा
तेरा श्रेष्ठ भक्त कौन?
विष्णु ने नारद से कहा
भूलोक के एक गाँव में
एक किसान रहता है।
उससे मिलने के बाद आओ।
उस के पहले तेल से भरा कठोरी हाथ में लेकर जाओ।
देखो, एक बूँद भी न गिरे।
नारद यों ही कठोरी लेकर गया।
किसान को देखा तो
वह तड़के उठकर एक बार भगवान क्षय का नाम लिया।
फिर हल लेकर खेत गया।
खेत जोतकर दोपहर खाने के पहले एक बार लिया।
अपने खेत का काम खत्म करके शामको घर लौटा।
भगवान का नाम लिया।
सो गया।
नारद लौटकर विष्णु से मिला।
विष्णु ने कहा किसान मेरा श्रेष्ठ भक्त हैं।
नारद ने कहा
मैं सदा आपका नाम रटता रहता हूँ।
वह किसान तो तीन ही बार आपका नाम लेता है।
तब विष्णु ने पूछा
तुम तेल की कठौरी लेकर जाते समय कितने बार मेरा धन आम लिया।
तब नारद ने कहा
मैं आपके काम में लगा था।
विष्णू ने कहा किसान भी अपना कर्तव्य कर रहा था।
फिर भी मेरे नाम लिया।
वह सबका अन्नदाता है।
इसलिए वह मेरा बड़ा भक्त हैं।
यही गाँव की आत्मा।
किसान ने तो सब भूखों मर जाते।
संत तिरुवल्लुवर ने कहा
जो भी काम करो,
कारखाना , कंपनी चलाओ।
पेशे जोड़ों।
गाँव की आत्मा खेत में न लगा तो
भूखा भजन न गोपाल।
जहाँ भी जाओ,
जो भी धंधा करो
गाँव की आत्मा
किसान की आत्मा
न तो जगत आहार रहित तड़पता।
वास्तव में गाँव की आत्मा एकाग्रता
कर्तव्य पालन।
जगत का अन्नदाता।