वह वरिष्ठ नागरिक दिवस
आज की चुनौती
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
23-8-26
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भारतीय सनातन धर्म में
वृद्धावस्था को
संन्यासी जीवन की ओर
बढ़ने का समय माना गया है।
सांसारिक मोह से दूर होकर,
केवल ईश्वर का ध्यान करते हुए,
पुत्र-पुत्री, नाते-रिश्तेदारों की
चिंताओं से मुक्त होकर,
एकांत में
मन को आत्मा में विलीन करते हुए
जीवन बिताने की कल्पना की गई है।
पर आज की लौकिक जीवन-व्यवस्था में
वृद्धावस्था की अपनी ही चिंताएँ हैं—
वृद्धाश्रम की चिंता,
भोजन की चिंता,
स्वास्थ्य और दवाइयों की चिंता।
आज अनेक वृद्ध
वृद्धाश्रमों में रहने को विवश हैं।
कहीं संतान की लापरवाही,
कहीं पुत्रों और बहुओं का उपेक्षापूर्ण व्यवहार।
माता-पिता की संपत्ति चाहिए,
लेकिन माता-पिता की
देखभाल करने की जिम्मेदारी
नहीं चाहिए!
बढ़िया भोजन तो दूर,
कभी-कभी रूखी-सूखी रोटी भी
सम्मान के साथ नहीं मिलती।
दवा लेनी है या नहीं,
चश्मा बनवाना है या नहीं,
बाल कटवाने हैं या नहीं—
इन छोटी-छोटी आवश्यकताओं पर भी
ध्यान नहीं दिया जाता।
ऐसे बेसहारे,
संतान द्वारा त्यागे गए वरिष्ठ नागरिक,
निस्संतान वृद्ध
और आर्थिक रूप से कमजोर वरिष्ठ लोग—
इन सभी के संरक्षण और सम्मान के लिए
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस
एक महत्वपूर्ण अवसर है।
वरिष्ठ नागरिक
परिवार और समाज पर बोझ नहीं हैं।
उन्होंने अपने जीवन के वर्षों में
परिवार, समाज और देश के निर्माण में
अपना योगदान दिया है।
उनके पास
जीवन का अनुभव है,
ज्ञान है,
संघर्षों की कहानी है,
और आने वाली पीढ़ियों के लिए
बहुमूल्य मार्गदर्शन है।
इसलिए इस दिवस का उद्देश्य केवल
एक दिन वरिष्ठ नागरिकों को याद करना नहीं,
बल्कि उनके आजीवन योगदान,
अनुभव और ज्ञान का सम्मान करना है।
वृद्ध नागरिकों की सेवा करें,
उनका सम्मान करें,
उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखें,
और उन्हें प्रेम तथा आत्मसम्मान के साथ
जीवन जीने का अवसर दें।
वरिष्ठ नागरिकों की सेवा
केवल हमारा कर्तव्य नहीं,
हमारी संस्कृति और मानवता की पहचान है।
एक दिन हम भी वृद्ध होंगे—
आज उन्हें जो सम्मान देंगे,
कल वही सम्मान
हमें भी मिलेगा।
नोट: विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस प्रत्येक वर्ष 21 अगस्त को मनाया जाता है।