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Wednesday, July 15, 2026

ज्ञान दर्पण

 ज्ञान दर्पण 

आज का ललकार : ज्ञान दर्पण


ज्ञान दर्पण

एस. अनन्तकृष्णनसौहार्द सम्मान प्राप्त, चेन्नै (तमिलनाडु), हिंदी प्रेमी प्रचारकस्वरचित भावाभिव्यक्ति16-07-2026


ज्ञान दर्पण


दर्पण हमारे बाहरी रूप को

ज्यों का त्यों दिखाता है—सुंदर या असुंदर।


पर ज्ञान का दर्पण

अज्ञात को ज्ञात कराता है,

भले-बुरे,सत्य-असत्य का विवेक कराता है।


वह खंड-अखंड का बोध देता है,

मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है

,ज्ञान-चक्षु प्रदान कर 

सभ्य, संस्कारित, आदर्श और संयमित जीवन

 जीना सिखाता है।


आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि-मुनि,

नश्वर संसार में रहते हुए भी 

सनातन धर्म के सत्य पर दृढ़ रहते हैं।


जो माया-मोह में फँसकर 

भ्रष्टाचार, रिश्वत, लोभ, ईर्ष्या और कामनाओं के

 वशीभूत हो जाते हैं,

वे यह भूल जाते हैं  कि कर्मों का फल 

एक दिन अवश्य मिलता है।

बड़े-बड़े स्नातक और स्नातकोत्तर,

अपराधियों को बचाने वाले वकील,

काले धन का समर्थन करने वाले

भ्रष्ट मंत्री, सांसद और विधायक—

यदि सत्य और धर्म से विमुख हैं,तो

 ज्ञानी होकर भी अज्ञानी हैं।

ज्ञान के दर्पण में सत्य, 

ईमानदारी,तटस्थता और परोपकार सर्वोपरि हैं।

माया ईश्वर की शक्ति  का अंश है।

उसका आकर्षण 

ज्ञानी मनुष्य को भी 

भ्रमित कर सकता है।


मन और बुद्धि की चंचलता

 कुकर्मों को जन्म देती है,

और वही अशांति व असंतोष का मूल बनती है।

इसलिए अहिंसा, सत्य और सदाचार का मार्ग

 अपनाने हेतु ज्ञान का दर्पण आवश्यक है।


समाज में जैसे मच्छर, मक्खियाँ और दीमक

 हानि पहुँचाते हैं,

वैसे ही आसुरी प्रवृत्तियाँ ज्ञान के दर्पण से दूर रहती हैं

सर्व ज्ञानी रावण भी 

नारी-मोह में पड़कर 

विवेक खो बैठा।


धर्म का त्याग कर,

भक्ति के नाम पर धन-संग्रह करने वाले 

पाखंडी मानव-एकता के बाधक हैं।


ज्ञान के दर्पण में भोग नहीं,

त्याग, बलिदान और विश्व-कल्याण का स्थान है।


महर्षि वाल्मीकि,गोस्वामी तुलसीदास और सम्राट अशोक ने। ज्ञान के प्रकाश से 

विश्ववंदनीय स्थान प्राप्त किया।


आदि शंकराचार्य जैसे आत्मज्ञानी महापुरुषों ने 

मानवता को सत्य का मार्ग दिखाया।


"सर्वे भवन्तु सुखिनः 

","वसुधैव कुटुम्बकम्"और "जय जगत" का संदेश

ज्ञान के दर्पण का ही संदेश है।


वेद, उपनिषद, कुरआन और बाइबिल—सभी 

मानवता को सत्य, सदाचार और कल्याण का 

मार्गदर्शन दिखानेवाले। ज्ञान के दर्पण हैं।

एस. अनन्तकृष्णन, सौहार्द सम्मान प्राप्त चेन्नै तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

16-1-26.

++++++++++++

ज्ञान दर्पण

 दर्पण हमारे रूप को 

 ज्यों का त्यों 

 दिखाता है।

 सुंदर असुंदर 

  बाहरी रूप।

 ज्ञान दर्पण 

 अज्ञात ज्ञात

 भला बुरा

 सत्य असत्य 

 अनेक बातों को 

 सोचने समझने

 खंड अखंड बोध 

 जानने,

 मानव पशु में 

 मानवता देकर 

 ईश्वर सृष्टियों में 

 ज्ञान चक्षु प्राप्त 

  सभ्य जीवन,

 संस्कृत जीवन 

 आदर्श जीवन 

 संयमित जीवन 

 जीने के लिए 

 ज्ञान दर्पण 

‌केवल मनुष्य के लिए।

आत्मज्ञान प्राप्त दिव्य पुरुष ऋषि मुनि

 नश्वर जगत,

 अनश्वर धर्म में दृढ़ रहते हैं।

 लौकिक माया मोह 

 आस्थाई जानकर भी

 भ्रष्टाचारी रिश्वत खोरी

लोभी ईर्ष्यालु कामी पुरुष अलग जीवन 

वे नहीं जानते कि

कर्म फल के अनुसार 

दंड मिलता ही है।

 बड़े बड़े स्नातक स्नातकोत्तर बनकर 

 अपराधी को छुड़ानेवाले वकील,

 काले धन के समर्थक सी.ए,

 भ्रष्टाचार‌ करोडपति मंत्री, सांसद, विधायक 

 ज्ञानी होकर भी अज्ञानी।

 ज्ञान के दर्पण में 

 सत्य प्रधान।

 ईमानदारी प्रधान 

 तटस्थता प्रधान 

 परोपकार प्रधान।

मायादेवी ईश्वर का एक अंश,

अति आकार्षक

ज्ञानी मनुष्य को

अज्ञानी मूर्ख बना देता है।

बुद्धि में चंचलता 

 मन की चंचलता 

 अज्ञानी के कुकर्म

 अशांति असंतोष का मूल।

  अहिंसा परमो धर्म का विरोध।

 इन सब को तजने

 ज्ञान का दर्पण चाहिए।

समाज में मच्छर, मक्खियाँ दीमक

संख्या के समान

 आसुरी शक्तियाँ

 ज्ञान के दर्पण नहीं देखते।

सर्वज्ञानी रावण

 नारी आकर्षण से

 अज्ञानी बन गया।

धर्म  तजकर 

 आश्रम में चाँदी के सिंहासन में बैठकर 

 भक्ति के नाम 

 धन संग्रह करनेवाले 

पाखंडी मजहबी लोग

 मानव एकता के बाधक  ज्ञानी नहीं।

ज्ञान के दर्पण में 

 भोग का स्थान नहीं।

त्याग , बलिदान,

 विश्व जन कल्याण ही प्रधान।

 तुलसीदास , वाल्मीकि 

 ज्ञान के दर्पण के बाद 

 विश्ववंद्य  बने।

अत्याचारी अशोक

 ज्ञान के दर्पण के बाद 

 विश्व विख्यात आदर्श 

सम्राट बने।

 आत्मज्ञानी  जन्मजात होते हैं

 जैसे 

 आदि शंकराचार्य।

वेदों के रचयिता।

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु 

वसुधैव कुटुंबकम् 

जय जगत के

 विश्वगुरु।

वेद उपनिषद कुरान बाइबिल ही ज्ञान के दर्पण।

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आज का ललकार : ज्ञान दर्पण

ज्ञान दर्पण
एस. अनन्तकृष्णन
सौहार्द सम्मान प्राप्त, चेन्नै (तमिलनाडु), हिंदी प्रेमी प्रचारक
स्वरचित भावाभिव्यक्ति
16-07-2026

ज्ञान दर्पण

दर्पण हमारे बाहरी रूप को
ज्यों का त्यों दिखाता है—
सुंदर या असुंदर।

पर ज्ञान का दर्पण
अज्ञात को ज्ञात करता है,
भले-बुरे,
सत्य-असत्य का विवेक कराता है।

वह खंड-अखंड का बोध देता है,
मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है,
ज्ञान-चक्षु प्रदान कर
सभ्य, संस्कारित, आदर्श
और संयमित जीवन जीना सिखाता है।

आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि-मुनि
नश्वर संसार में रहते हुए भी
सनातन धर्म के सत्य पर दृढ़ रहते हैं।

जो माया-मोह में फँसकर
भ्रष्टाचार, रिश्वत, लोभ, ईर्ष्या
और कामनाओं के वशीभूत हो जाते हैं,
वे यह भूल जाते हैं कि
कर्मों का फल
एक दिन अवश्य मिलता है।

बड़े-बड़े स्नातक और स्नातकोत्तर,
अपराधियों को बचाने वाले वकील,
काले धन का समर्थन करने वाले,
भ्रष्ट मंत्री, सांसद और विधायक—
यदि सत्य और धर्म से विमुख हैं,
तो ज्ञानी होकर भी अज्ञानी हैं।

ज्ञान के दर्पण में
सत्य, ईमानदारी,
तटस्थता और परोपकार
सर्वोपरि हैं।

माया ईश्वर की शक्ति है।
उसका आकर्षण
ज्ञानी मनुष्य को भी
भ्रमित कर सकता है।

मन और बुद्धि की चंचलता
कुकर्मों को जन्म देती है,
और वही अशांति व असंतोष का मूल बनती है।
इसलिए
अहिंसा, सत्य और सदाचार का मार्ग अपनाने हेतु
ज्ञान का दर्पण आवश्यक है।

समाज में जैसे
मच्छर, मक्खियाँ और दीमक
हानि पहुँचाते हैं,
वैसे ही आसुरी प्रवृत्तियाँ
ज्ञान के दर्पण से दूर रहती हैं।

सर्वज्ञानी रावण भी
नारी-मोह में पड़कर
विवेक खो बैठा।

धर्म का त्याग कर,
भक्ति के नाम पर
धन-संग्रह करने वाले पाखंडी
मानव-एकता के बाधक हैं।

ज्ञान के दर्पण में
भोग नहीं,
त्याग, बलिदान
और विश्व-कल्याण का स्थान है।

महर्षि वाल्मीकि,
गोस्वामी तुलसीदास
और सम्राट अशोक ने
ज्ञान के प्रकाश से
विश्ववंदनीय स्थान प्राप्त किया।

आदि शंकराचार्य जैसे
आत्मज्ञानी महापुरुषों ने
मानवता को सत्य का मार्ग दिखाया।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः",
"वसुधैव कुटुम्बकम्"
और "जय जगत" का संदेश
ज्ञान के दर्पण का ही संदेश है।

वेद, उपनिषद, कुरआन और बाइबिल—
सभी मानवता को
सत्य, सदाचार और कल्याण का मार्ग दिखाने वाले
ज्ञान के दर्पण हैं।




 


 

 

 


 

 

  



  












 


चिंता को चुनौती

 चिंता को चुनौती 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक 

14-7-26

मानव‌ का जन्म

सुख दुख के मिलन में।

चिंता  के चक्कर में मानव।

 भूख  मिटाने की चिंता,

 पहनावे ओढावे की चिंता 

 आवास की चिंता।

 आर्थिक चिंता,

नौकरी की चिंता,

 वेतन वृद्धि और पदोन्नति की चिंता,

 योग्य पत्नी पति मिलने की चिंता 

  संतानोत्पत्ति की चिंता।

सुपुत्री सुपुत्र की चिंता।

  संतानों की शिक्षा,

 नौकरी, बहु-दामाद की चिंता।

 इन चिंताओं की

चुनौतियों का सामना करने की चिंता।

जीवन पर्यंत चुनौतियां।

 लोभ और ईर्ष्या की चिंता।

यों ही जीवन भर चिंता ही चिंता।

बचपन में चिंता ,

 जवानी में चिंता

 बूढापे में चुनौतियाँ।


आज की चुनौतीचिंता को चुनौती


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)14-7-2026


मानव का जीवनसुख-दुःख का संगम है।चिंता के चक्र मेंहर मानव निरंतर व्यस्त है।


भूख मिटाने की चिंता,तन ढकने के वस्त्रों की चिंता,अपने घर-आवास की चिंता,आर्थिक अभाव की चिंता।


नौकरी पाने की चिंता,वेतन-वृद्धि और पदोन्नति की चिंता,योग्य जीवनसाथी मिलने की चिंता,संतान-सुख की चिंता।


सुपुत्र-सुपुत्री के भविष्य की चिंता,उनकी शिक्षा और रोजगार की चिंता,बहू-दामाद के चयन की चिंता,परिवार के सुख-समृद्धि की चिंता।


इन सब चुनौतियों कासाहस से सामना करना हीजीवन की सबसे बड़ी चुनौती है।


लोभ और ईर्ष्याचिंताओं को और बढ़ाते हैं।यों ही बीत जाता हैमानव का पूरा जीवन।


बचपन में छोटी-छोटी चिंताएँ,जवानी में बड़ी जिम्मेदारियाँ,और बुढ़ापे में नई-नई चुनौतियाँ।


इसलिए चिंता नहीं,चिंतन और पुरुषार्थ अपनाइए।

साहस, धैर्य और विश्वास के साथ हर चुनौती पर 

विजय पाइए।

Tuesday, July 14, 2026

आशा

 

आशा

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
विधा — अपनी हिंदी, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी स्वतंत्र शैली
15-7-2026

मानव जीवन
आशा के आधार पर चलता है।

शादी करते हैं
इस आशा से कि
वैवाहिक जीवन
सुखमय और आनंदमय रहेगा।

आशा रहती है—
सुपुत्र-सुपुत्री होंगे,
उन्हें खूब पढ़ाएँगे,
अच्छी नौकरी मिलेगी,
योग्य बहू और दामाद मिलेंगे,
और संतान
बुढ़ापे में प्रेमपूर्वक
देखभाल करेगी।

आशा न हो तो
जीवन निराशा बन जाता है।
निराशा अनेक रोगों का कारण बनती है।

प्रेम में असफलता,
नीट परीक्षा में असफलता,
व्यापार में घाटा—
इन परिस्थितियों में
कुछ लोग निराश होकर
आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

पतझड़ में खड़े वृक्ष
हमें धैर्य का संदेश देते हैं।
उन्हें विश्वास रहता है
कि फिर बसंत आएगा।

चातक पक्षी
वर्षा की आशा करता है।
किसान
अच्छी वर्षा की आशा में
बीज बोता है।
पेड़-पौधे
ऋतु आने पर
फल-फूल देने की आशा रखते हैं।

आशा न हो तो
जीना दुश्वार हो जाए।

तपस्वी की आशा होती है
कि भगवान का अनुग्रह मिलेगा।
मनौतियाँ, दान, धर्म और पुण्य—
सबके पीछे
मोक्ष की आशा भी रहती है।

आशा ही
मानव को कर्मशील बनाती है।
यदि आशा न रहे,
तो मनुष्य निष्क्रिय हो जाएगा।

जैसे सेना की सतर्कता से
देश सुरक्षित रहता है,
वैसे ही आशा के सहारे
मानव जीवन
सदैव आगे बढ़ता रहता है।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
विधा — अपनी हिंदी, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी स्वतंत्र शैली
15-7-2026

मानव जीवन
आशा के आधार पर चलता है।

शादी करते हैं
इस आशा से कि
वैवाहिक जीवन
सुखमय और आनंदमय रहेगा।

आशा रहती है—
सुपुत्र-सुपुत्री होंगे,
उन्हें खूब पढ़ाएँगे,
अच्छी नौकरी मिलेगी,
योग्य बहू और दामाद मिलेंगे,
और संतान
बुढ़ापे में प्रेमपूर्वक
देखभाल करेगी।

आशा न हो तो
जीवन निराशा बन जाता है।
निराशा अनेक रोगों का कारण बनती है।

प्रेम में असफलता,
नीट परीक्षा में असफलता,
व्यापार में घाटा—
इन परिस्थितियों में
कुछ लोग निराश होकर
आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

पतझड़ में खड़े वृक्ष
हमें धैर्य का संदेश देते हैं।
उन्हें विश्वास रहता है
कि फिर बसंत आएगा।

चातक पक्षी
वर्षा की आशा करता है।
किसान
अच्छी वर्षा की आशा में
बीज बोता है।
पेड़-पौधे
ऋतु आने पर
फल-फूल देने की आशा रखते हैं।

आशा न हो तो
जीना दुश्वार हो जाए।

तपस्वी की आशा होती है
कि भगवान का अनुग्रह मिलेगा।
मनौतियाँ, दान, धर्म और पुण्य—
सबके पीछे
मोक्ष की आशा भी रहती है।

आशा ही
मानव को कर्मशील बनाती है।
यदि आशा न रहे,
तो मनुष्य निष्क्रिय हो जाएगा।

जैसे सेना की सतर्कता से
देश सुरक्षित रहता है,
वैसे ही आशा के सहारे
मानव जीवन
सदैव आगे बढ़ता रहता है।

गुरु-शिष्य

 

आज की चुनौती

गुरु–शिष्य




गुरु शिष्य 

एस. अनंतकृष्णन,चेन्नै, तमिलनाडु

15-7-26

—————————

संत कबीर ने गुरु के महत्व को अपने दोहे में लिखा है,

गुरु  और भगवान दोनों एक साथ आने पर

गुरु के चरणों पर गिर पडूँगा,जिनके कारण ब्र्म दर्शन का मार्ग ज्ञात हुआ।


गुरु गोविंद दोऊँ खडे, काके लागै पाय।

बली हारी गुरु आपना,गोविंद दियो बताय।


गुरु केवल ज्ञान दाता नहीं,

चरित्र निर्माता।

ज्ञान शून्य मनुष्य को

ज्ञान देनेवाले गुरु।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।


मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।


अर्थात् ध्यान का मूल गुरु मूर्ति है,

एकलव्य ने गुरु के बुत के सामने तीर चलाने का अभ्यास किया।

द्रोण उनके मानसिक गुरु बने।

गुरु पूजनीय हैं, मंत्र का आधार गुरु वाक्य है। 

गुरु  की कृपा से ही मोक्ष मिलता है।

कबीर का मानसिक गुरु रामानंद।

भक्त प्रह्लाद नारद के उपदेश के कारण

नारायण नाम जप करके आदर्श भक्त बने।

श्री रामकृष्ण परमहंस के आदर्श शिष्य स्वामी विवेकानंद।

सत्संग, सद् ग्रंथ भी गुरु होते हैं।

ज्ञान तो जन्मजात प्रवृत्ति है,

शिष्य की बुद्धि लब्दी ईश्वरीय देन है।

स्वाध्याय से ज्ञान बनते हैं।

सिद्धार्थ को तपोबल से ज्ञान मिला।

शिष्य चार प्रकार के होते हैं।

प्रतिभाशाली छात्र.

औसत् बुद्धिवाले छात्र।

मंद बुद्धिवाले छात्र।

पुराने जमाने में आजकल के समान

सर्वशिक्षा अभियान नहीं।

गुरु  कठोर परीक्षा लेकर योग्य  शिष्य के चुनते हैं।


गुरु उपदेश और गुरु की दीक्षा का अपना महत्व हैं

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
15-7-2026

संत कबीर ने अपने प्रसिद्ध दोहे में गुरु के महत्व का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है।
 वे कहते हैं कि यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ सामने खड़े हों,
तो पहले गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए,
क्योंकि गुरु ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं।

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥

गुरु केवल ज्ञानदाता ही नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माता भी होते हैं।
वे अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः, पूजामूलं गुरोः पदम्।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥

अर्थात् ध्यान का आधार गुरु की मूर्ति है,
पूजा का आधार गुरु के चरण हैं,
मंत्र का आधार गुरु का वचन है
और मोक्ष का आधार गुरु की कृपा है।

एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा के सामने अभ्यास करके
 अद्वितीय धनुर्धर बनने का प्रयास किया।
यद्यपि उन्हें प्रत्यक्ष शिक्षा नहीं मिली, फिर भी द्रोणाचार्य उनके मानसिक गुरु रहे।

कबीर के आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामानंद थे।
भक्त प्रह्लाद ने देवर्षि नारद के उपदेश से नारायण-भक्ति का मार्ग अपनाया
और आदर्श भक्त बने।
श्री रामकृष्ण परमहंस के आदर्श शिष्य स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु के संदेश को विश्वभर में पहुँचाया।

सत्संग, सद्ग्रंथ और श्रेष्ठ विचार भी मनुष्य के गुरु बन सकते हैं।
ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता ईश्वर की देन है,
परंतु उसका विकास गुरु, स्वाध्याय और सतत अभ्यास से होता है।
गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) ने कठोर तप और आत्मचिंतन से ज्ञान प्राप्त किया।

शिष्य भी विभिन्न प्रकार के होते हैं—प्रतिभाशाली, औसत बुद्धि वाले तथा मंद बुद्धि वाले।
 प्राचीन गुरुकुलों में गुरु योग्य शिष्यों का चयन कठोर परीक्षा के बाद करते थे।
उस समय शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्या देना नहीं, बल्कि उत्तम चरित्र का निर्माण करना था।

अतः गुरु के उपदेश, गुरु की दीक्षा और गुरु का आशीर्वाद मानव जीवन की अमूल्य निधि हैं।
गुरु ही शिष्य के जीवन को ज्ञान, संस्कार और सदाचार से प्रकाशित करते हैं।

Saturday, July 11, 2026

पीपल का पेड

 आज की चुनौती शीर्षक 

+++++++++********

तरुओं का राजा

अरसमरम्।


पीपल का पेड़ 

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

12-7-26.

+++++++++++

पीपल का पेड़

 तमिल में अरसमरम्।

अरसन --राजा

 मरम् -वृक्ष।

तरुओं में राजा।

 इस पेड़ में 

 आध्यात्मिक शक्ति,

 वैज्ञानिक गुण,

चिकित्सक के गुण,

साँस की समस्या 

दूर करने के गुण,

आध्यात्मिक शक्ति 

 आत्मज्ञान देनेवाले,

 सिद्धार्थ को ज्ञान दिया।

बुद्ध बनाया।

तरु के तले तपस्या 

 मानसिक शांति।

मंत्र जपना अति पुण्य।

 हिंदू और बौद्ध 

धर्म के पवित्र वृक्ष।

 चिकित्सक के रूप में 

पुत्रहीन स्त्रियाँ,

 परिक्रमा करने पर संतान।

आक्सिज़न प्राण वायु देनेवाला कल्पतरु।

गर्भ थैली के दोषों को 

 आक्सिज़न से मिले

अधिक ओज़ोन मिश्रित हवा।

रोज कार्बंडै आक्सैड को लेकर प्राण वायु बाहर निकालनेवाले पेड़।

सिद्धा, आयुर्वेद, यूनानी इलाज में इसके जड़, पता, पत्ते,वल्कल,का इस्तेमाल।

 पक्षियों का आवास,।

यह एक दिव्य वृक्ष

 स्वास्थ्य प्रद, 

शांति संतोषप्रद, 

ज्ञान प्रद वृक्ष

 इसकी पूजा करेंगे।

 स्वस्थ ज्ञानी बनेंगे।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 






லிங்க புராணம்

 லிங்கபுராணம் 


பகுதி 27 


மன்மதனை எரித்தல் இமவான் மகளாய் பிறந்த பார்வதி சிவபெருமானை நோக்கித் தவம் இருந்தாள். ஈசன் சனகாதியருக்கு யோகம் உபதேசிக்க நிஷ்டையில் இருந்தார். இவர்கள் இருவர் மீதும் மலர்பாணம் தொடுத்து முருகன் அவதாரத்திற்கு வழிகோல தேவர்கள் மன்மதனை வற்புறுத்தி அனுப்பினர். அவனும் சிவனார் மீது மலர்க்கணைகள் தொடுக்க, கண் விழித்துப் பார்த்த முக்கண்ணனின் நெற்றிக்கண்ணால் மன்மதன் எரிந்து சாம்பலாகினான். அப்போது மன்மதனின் மனைவி ரதி, காமன் மீது எந்தத் தவறும் இல்லை என்று கூறி அவனை உயிர்ப்பித்து தனக்களிக்குமாறு வேண்டினாள். சிவபெருமான் கருணை கொண்டு ரதியிடம், காமன் அவள் கண்ணுக்கு மட்டும் தெரிவானென்றும், கிருஷ்ணனுக்கு மகனாகப் பிறந்து அனைவரும் அறிய உடல் பெறுவான் என்றும் அருள்புரிந்தார். 


தொடரும்🙏🙏

Friday, July 10, 2026

न्याय के मंदिर।

 न्याय के मंदिर 

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

11-7-26.

 मंदिर भगवान का है।

 न्यायालय 

भगवान के दर्शन में 

चार वर्ग के लोग।

 पहला वर्ग

 मंदिर के धर्म कर्ता।

फिर मंत्री, सांसद, विधायक, 

अधिकारी वर्ग,

 स्थानीय बड़े लोग।

फिर   प्रवेश शुल्क  रूपए 

1000/500/100/50

के लोग।

अंत में फ़्री दर्शन के लोग।

 वही क्रम अदालत में।

सोचा देवालय

 न्यायालय 

दोनों बराबर।

 एक में पुजारी को दक्षिणा।

पुण्य मिलने के लिए।

न्यायालय में वकील को दक्षिणा।

न्याय मिलने के लिए।

 न्यायधीश या भगवान 

 कैसे फैसला सुनाते हैं।

 सही या ग़लत 

 विधि की विडंबना।

 भाग्य का फल।।

उच्च न्यायालय  का फैसला

 उच्चतम न्यायालय  में 

बदल सकते हैं।

 

एस.अनंतकृष्णन,



आपकी रचना विचारोत्तेजक है। इसमें आपने देवालय और न्यायालय की व्यवस्था की तुलना करते हुए सामाजिक असमानता पर प्रश्न उठाया है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा सँवारकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

Writing

आज की चुनौती : न्याय के मंदिर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

11-7-2026

मंदिर भगवान का है,

न्यायालय न्याय का मंदिर।

भगवान के दर्शन में भी

चार वर्ग दिखाई देते हैं।

पहला वर्ग—

मंदिर के धर्मकर्ता।

दूसरा—

मंत्री, सांसद, विधायक,

अधिकारी और स्थानीय बड़े लोग।

तीसरा—

प्रवेश शुल्क

₹1000, ₹500, ₹100, ₹50

देकर दर्शन करने वाले।

और अंत में—

निःशुल्क दर्शन की लंबी पंक्ति।

कुछ ऐसा ही क्रम

अदालतों में भी दिखाई देता है।

सोचता हूँ—

देवालय और न्यायालय,

क्या दोनों कहीं न कहीं

एक जैसे हो गए हैं?

देवालय में

पुजारी को दक्षिणा,

पुण्य की कामना में।

न्यायालय में

वकील को फीस,

न्याय की आशा में।

पर अंततः

भगवान हों या न्यायाधीश,

फैसला कैसे और किस आधार पर होता है—

सही या गलत,

यही विधि की विडंबना है,

या फिर भाग्य का फल।

उच्च न्यायालय का निर्णय भी

उच्चतम न्यायालय में

बदल सकता है।

प्रश्न यही है—

न्याय का वास्तविक मंदिर

कहाँ है?

यदि चाहें, मैं इसे और अधिक काव्यात्मक, तुकांत या व्यंग्यात्मक शैली में भी रूपांतरित कर सकता हूँ।