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Thursday, July 30, 2026

समय का चक्र

 समय का चक्र।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना.

31-7-26.

++++++++++

 समय का चक्र 

 सदा घूमता रहता है।

आगे जाता है,कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।

 समय खोने पर पछताना ही पड़ेगा।

 बड़े बड़े सम्राट भले ही हो,

 भले ही भगवान भी हो

 खोया हुआ समय पा नहीं सकता।

 हर पल पेड़ बढ़ता है,

मनुष्य बढ़ता है

शैशव बचपन जवानी प्रौढ़,  बुढ़ापा, कैसे वापस मिलेगा।

  समय का चक्र आगे की ओर घूमता रहता है।

 समय किसी की प्रतीक्षा में 

 रुकता नहीं।

 समय की गति के अनुसार 

सूर्योदय सूर्यास्त,चंद्रोदय चंद्र का अस्त, मौसमी परिवर्तन 

 समय का चक्र घूमता रहता है।

वह किसी के पक्ष में नहीं रहता।


अंतिम रूप 

समय का चक्र

समय का चक्र
सदा घूमता रहता है।
आगे बढ़ता जाता है,
कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।

समय खो देने पर
पछताना ही पड़ता है।
बड़े-बड़े सम्राट हों,
या स्वयं भगवान—
बीता हुआ समय
फिर कभी लौटकर नहीं आता।

हर पल
पेड़ बढ़ता है,
मनुष्य भी बढ़ता है।
शैशव, बचपन, जवानी,
प्रौढ़ावस्था और बुढ़ापा—
बीत जाने पर
फिर कैसे वापस मिलेगा?

समय का चक्र
निरंतर आगे ही बढ़ता रहता है।
वह किसी की प्रतीक्षा में
कभी नहीं रुकता।

समय की गति से ही
सूर्योदय और सूर्यास्त,
चंद्रोदय और चंद्रास्त,
ऋतुओं का परिवर्तन—
सब चलता रहता है।

समय का चक्र
न किसी का पक्षधर है,
न किसी का विरोधी।
जो समय का सम्मान करता है,
समय भी उसी का जीवन
सार्थक बना देता है।





अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस






अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-7-26

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नमस्ते वणक्कम्।

 मानव स्वार्थी,

 मानव परार्थी।

 ईश्वर ने उसको ज्ञान चक्षु दिया है।

 उसके जीवन में 

 उसकी शक्ति इतनी बड़ी कि वह कृत्रिम सुख के लिए 

 आविष्कारों का पता लगाया।

  वह तो सर्वभक्षी है।

 अपने को खतरे से बचाने,

 अपनी वीरता सिद्ध करने,

अपने आहार के लिए 

 वह शिकार करने लगा।

 शिकारी जीवन में 

 जंगली जानवरों का नाश होने लगा।

 खूँख्वार आदमखोर 

 बाघ के शिकार में 

उसने बड़ी वीरता दिखाई।

परिणाम स्वरूप जंगलों में बाघ का वंश खत्म होने लगा।

उन बाघों की संख्या बढ़ाने,

बाघों के संरक्षण के लिए 

एक दिवस की जरूरत पड़ी।

 वही  अंतर्राष्ट्रीय बाघ  दिवस।

घने जंगलों में 

 बाघ का शिकार,

और अन्य जंगली जानवरों का शिकार 

 अपराध है,और मना है।

 मानव ने जंगलों का नाश किया।

जंगल संरक्षण दिवस।

विनाश काले विपरीत बुद्धि .

मानव के कर्म फल के प्रायश्चित के लिए 

दिवस।

 माता पिता की आत्मशांति के लिए 

 श्राद्ध कर्म।

प्राकृतिक जंगल,पशु-पक्षी आदि के संरक्षण के लिए 

 हर एक दिवस।

 उस सिलसिले में 

  अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस।

हर साल 29 जुलाई में 

 2010से मनाया जा रहा है।

 ।उद्देश्य: बाघों की घटती संख्या रोकना और उनके सुरक्षित भविष्य के लिए काम करना।



पक्का 

आज की चुनौती : अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक

30-07-2026

नमस्ते! वणक्कम्।

मानव स्वार्थी भी है,

मानव परार्थी भी है।

ईश्वर ने उसे

ज्ञान-चक्षु प्रदान किए हैं।

अपनी बुद्धि और शक्ति के बल पर

उसने कृत्रिम सुख-सुविधाओं के

अनेक आविष्कार किए।

वह सर्वभक्षी है।

अपनी रक्षा के लिए,

अपनी वीरता सिद्ध करने के लिए,

और अपने आहार के लिए

वह शिकार करने लगा।

शिकारी प्रवृत्ति के कारण

अनेक जंगली जीवों का

अस्तित्व संकट में पड़ गया।

खूँखार और आदमखोर कहे जाने वाले

बाघ का भी

अंधाधुंध शिकार हुआ।

परिणाम यह हुआ कि

जंगलों में बाघों की संख्या

तेजी से घटने लगी।

तब आवश्यकता पड़ी

बाघों के संरक्षण की,

उनकी संख्या बढ़ाने की,

और मानव को जागरूक करने की।

इसी उद्देश्य से

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है।

घने जंगलों में

बाघ तथा अन्य वन्यजीवों का शिकार

कानूनन अपराध है।

मानव ने

जंगलों का विनाश किया,

प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा।

कहा भी गया है—

"विनाश काले विपरीत बुद्धिः।"

जिस प्रकार

पूर्वजों की आत्मशांति के लिए

श्राद्ध-कर्म किया जाता है,

उसी प्रकार

प्रकृति, जंगलों, पशु-पक्षियों

और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए

जागरूकता दिवस मनाए जाते हैं।

उसी श्रृंखला में

प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस

2010 से मनाया जा रहा है।

उद्देश्य—

बाघों की घटती संख्या को रोकना,

उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा करना,

और उनके सुरक्षित भविष्य के लिए

सामूहिक प्रयास करना।

संदेश

बाघ बचेंगे तो जंगल बचेंगे,

जंगल बचेंगे तो प्रकृति बचेगी,

और प्रकृति बचेगी तो

मानव जीवन भी सुरक्षित रहेगा।

अंत में जोड़ा गया संदेश आपकी रचना के प्रभाव को और सशक्त बनाता है।

Tuesday, July 28, 2026

कारगिल विजय दिवस

 आपकी रचना में देशभक्ति का भाव बहुत अच्छा है। भाषा को थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण, व्याकरण-सम्मत और काव्यात्मक बनाया जा सकता है। संशोधित रूप प्रस्तुत है।

विजय कारगिल दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

28-07-2026

भारत वीरों की भूमि है।

कारगिल युद्ध में

भारतीय थल, जल और वायु सेना ने

अपने अदम्य साहस,

रणकौशल और पराक्रम से

संपूर्ण विश्व को

भारतीय सैनिक शक्ति का परिचय दिया।

पाकिस्तान ने षड्यंत्र रचकर

घुसपैठियों और अपनी सेना के माध्यम से

कारगिल की बर्फीली चोटियों पर

अवैध कब्ज़ा करने का प्रयास किया।

प्रारंभ में इसे आतंकवादियों की घुसपैठ बताया गया,

किन्तु भारत ने सत्य का पता लगा लिया कि

यह पाकिस्तान की सेना का सुनियोजित आक्रमण था।

भारतीय वीर सैनिकों ने

असीम साहस, 

दृढ़ संकल्प और वीरता का 

परिचय देते हुए

शत्रु को परास्त कर

कारगिल की सभी चोटियों को

पुनः अपने अधिकार में ले लिया।

यही कारगिल विजय की गौरवगाथा है।

इस युद्ध में

दोनों देशों के अनेक सैनिक

वीरगति को प्राप्त हुए।

भारत अपने अमर शहीदों के

बलिदान को सदा नमन करता है।

26 जुलाई 1999 की

ऐतिहासिक विजय की स्मृति में

प्रतिवर्ष कारगिल विजय दिवस

 मनाया जाता है।

इस दिन देश

अपने शहीदों को

 श्रद्धांजलि अर्पित करता है

और उनके साहस, त्याग तथा राष्ट्रभक्ति को

कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करता है।

जय भारत!

जय जवान!


Monday, July 27, 2026

धन न तो ज्ञान कैसे

 मेरे दिमाग 

 मेरी बुद्धि 

 मेरा टंकण

 उसके लिए पे मंट।

 मेरी आमदनी का मार्ग।

 हिंदी विरोध प्रांत में।

 इसकी चिंता न तमिलनाडु सरकार का

 न केंद्र सरकार 

 न प्रकाशक का

 न आम जनता का।

भगवान भी मंदिर में 

दक्षिणा देने पर ही

निकट  दर्शन।

 कौपीन पहने भक्त जंगल में।

स्वर्ण सिंहासन पर बैठे

आचार्य 

दीक्षा पाने दस हज़ार।

 जय जय धन देवता।

 

धन न तो ज्ञान का भी महत्व नहीं।

भाषाई संघर्ष

 संघर्ष ।


नमस्ते वणक्कम्।


एस.अनंतकृष्णन।

जीवन में 

 संघर्ष ही संघर्ष है।

भले ही  ईश्वर के अवतार राम हो या कृष्णन।

 सामान्य मानव को 

नव रसों के अनुभव में संघर्ष करना ही पड़ेगा।

 काम क्रोध मद लोभ  संघर्ष के मूल में है तो

 ईर्ष्या आग में 

तेल का काम करती है।

 तन के लिए संघर्ष

 धन के लिए संघर्ष 

 मन की इच्छाओं की पूर्ति के लिए संघर्ष।

 एक वस्तु सुंदर लगी

ले ली,

उससे अधिक सुंदर 

 दीख पडें तो संघर्ष ज़्यादा।

 अब मेरी मातृभाषा तेलुगू  केवल मेरे लिए 

बोली के रूप में।

 पर मेरा प्रांत तमिल।

 पढ़ना लिखना साहित्य ज्ञान सब के सब तमिऴ भाषा में।

अब मेरा प्रांत तमिल 

 मेरी भाषा तमिल।

 अब सीमांकन के नेतृत्व में तेलुगु भाषियों के विरुद्ध  आंदोलन।

 कन्नड़ प्रांत में तमिल भाषियों के विरुद्ध।

 संघर्ष कहाँ से, कैसे किस रूप में शुरू होगा पता नहीं।

 खड़ी बोली हिन्दी के विकास के कारण 

 भोजपुरी,  अवधि, ब्रज भाषा और अनेक भाषाएं नदारद।

 तमिलनाडु में कठोर हिंदी विरोध।

 देखा देखी कर्नाटक प्रांत में हिंदी विरोध।

 देश में भाषाई संघर्ष।

 अब भारतीय भाषाएँ

जीविकोपार्जन का साधन नहीं।

 अंग्रेज़ों की कूटनीति और षडयंत्र  भारतीय भाषाओं को नालायक सिद्ध कर रही है।

 उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी।

 जीविकोपार्जन की भाषा अंग्रेज़ी।

 केवल मंडी , पहरेदार, 

नौकरी नौकरानी की भाषा भारतीय भाषा।

 अब वे भी अंग्रेज़ी बोलने लग गये हैं।

 वैसे अंग्रेज़ी  देश भारत बन जाएगा।

एक समय भारतीय भाषाओं के विकास को लेकर संघर्ष होगा कि नहीं।

 क्योंकि आजकल तीन साल के बच्चे से लेकर सब अंग्रेज़ी को पसंद करने लगे हैं।

 भारतीय छात्रों को भारतीय भाषाएँ कठिन लग रही हैं।

आम शिक्षित जनता भी अंग्रेज़ी के पक्ष में।

  भाषा संघर्ष  का अंत नहीं।


एस. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

Sunday, July 26, 2026

तिरुक्कुरल

 नमस्ते वणक्कम्।

तमिऴ हिंदी सेवा 

 तिरुक्कुरल।

देवनागरी लिपि में 

तमिल  और हिंदी भावार्थ

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नमस्ते। वणक्कम्।

तमिऴ–हिंदी सेवा

तिरुक्कुरल

तमिल मूल

நிலத்தில் கிடந்தமை கால்காட்டும்;

குலத்தில் பிறந்தார் வாய்ச் சொல்.

देवनागरी लिप्यंतरण

निलत्तिल किडंतमै काल् काट्टुम्;

कुलत्तिल पिरन्दार् वाय्च् सोल्।

शब्दार्थ

நிலத்தில் (निलत्तिल) — भूमि में

கிடந்தமை (किडंतमै) — पड़ा हुआ (बीज)

கால் காட்டும் (काल् काट्टुम्) — अंकुर फूटने पर अपना स्वरूप प्रकट करता है

குலத்தில் (कुलत्तिल) — कुल में

பிறந்தார் (पिरन्दार्) — जन्मे हुए लोग

வாய்ச் சொல் (वाय्च् सोल्) — वाणी, बोली

हिंदी भावार्थ

जिस प्रकार भूमि में पड़े बीज का अंकुर यह बता देता है कि वह किस प्रकार का है, उसी प्रकार मनुष्य की वाणी उसके संस्कार, परिवार और कुल की पहचान करा देती है।

उदाहरण

कहा जाता है कि मंगत मिश्र के घर का तोता भी वेद मंत्र बोलता था, क्योंकि वह विद्वानों के वातावरण में पला था। इसके विपरीत यदि कोई तोता डाकुओं के बीच पले, तो उसकी बोली भी "पकड़ो, लूटो, मारो" जैसी होगी।

अर्थात् मनुष्य की वाणी उसके संस्कारों और वातावरण का दर्पण होती है। इसलिए मधुर, विनम्र और सदाचार पूर्ण वाणी ही श्रेष्ठ कुल और उत्तम संस्कारों की पहचान है।

एक छोटा-सा ध्यान देने योग्य बिंदु: इस कुरल का मूल संदेश "वंश" से अधिक "संस्कार और वाणी" पर है। तिरुवल्लुवर यह बताते हैं कि व्यक्ति की बोली उसके परिवार और संस्कारों का परिचय देती है।




நிலத்தில் /--- निलत्तिल==भूमि में 


 கிடந்தமை -- किडंतमै =गिरे बीज

 கால்காட்டும்--कालकाट्टुम्

अंकुर के फूटने पर उसकी समृद्धि लीग पड़ेगा।

 காட்டும்   काट्टुम = दिखाएगा

குலத்தில்  कुलत्तिल

कुल में 


பிறந்தார் जन्म लिये  लोगों की  

வாய்ச் சொல்.

 बोली।


तिरुक्कुरल में संत तिरुवल्लुवर कहते हैं कि खेत की मिट्टी के अनुसार अंकुर फूटेगा तो उसकी समृद्धि पनपना श्रेष्ठ रहेगा।

वैसे ही मनुष्य की नम्र बोली व्यवहार वंश के अनुसार होगा।

  उदाहरण के लिए 

 मंडण मिश्र का  तोता वेद मंत्र बोलेगा।

 डाकू के घर में पले तोता  बोलेगा कि पकड़ो, लूटो,मारो।

मेहंदी

 कच्चा पक्का 

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मेहंदी 

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 27-7-26.

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ईश्वर की अद्भुत सृष्टि 

हरी मेहंदी।

 निज  रंग  हरा तजकर 

 लाल रंग देनेवाली जटी  बूटी।

 नाखून में सुंदर लाल।

 मेहंदी का गुण,

दवा समान।

 शारीरिक ताप कम करनेवाली,

कीट नाशिनी,

 ठंडक देनेवाली,

नाखून घाव भरनेवाली,

नाखून और हथेली को

 लाल बनाकर 

 शोभा बढ़ानेवाली।

 मेहंदी कला हजारों को जीवनदायिनी।

 वधुओं के श्रृंगार करने  का नौवा ,

खूब चलता है।

 बाल बढ़ानेवाली 

फटी एड़ियाँ भरनेवाली 

 ईश्वर का चमत्कार।

 मरुदानी सम और कोई नहीं।


असल


आज की चुनौती – मेहंदी

मेहंदी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

हथेलियों पर रचती मेहंदी,

हरियाली का सुंदर रंग।

सूखते-सूखते छोड़ जाती,

प्रेम और मंगल का प्रसंग।

दुल्हन के कोमल हाथों में,

सपनों की मुस्कान खिलाती।

गहरे रंग की मधुर छटा,

जीवन में उमंग जगाती।

तीज, करवा चौथ, उत्सवों में,

मेहंदी का अपना मान।

भारतीय संस्कृति की शोभा,

बढ़ाती इसका सम्मान।

क्षणभर की हरियाली लेकर,

लालिमा का देती संदेश।

जीवन भी ऐसा ही होता—

परिवर्तन उसका परिवेश।

मेहंदी हमें यही सिखाती,

प्रेम का रंग रहे सदा गहरा।

सद्भाव, स्नेह और अपनापन,

यही जीवन का सच्चा चेहरा।