[02/10, 5:53 pm] sanantha.50@gmail.com: भीतर का खालीपन।
एस. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु।
3-10-26.
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भीतर का खालीपन,
अल्पसंख्यकों का अधिकार।
आरक्षण नीति।
मंदिरों में वी.ऐ .पी दर्शन।
शिक्षा निजी स्कूलों में
धन के आधार पर।
सरकार स्कूल में
पानी नहीं, शौचालय नहीं प्रयोगशाला नहीं।
अच्छी चिकित्सा प्लैनेट अस्पतालों में।
सरकारी अस्पतालों में
न दवा, न एम.आर.ऐ.स्केन।
चुनाव में गरीबों का उद्धार।
गरीबों की बस्ती में पानी नहीं,
सड़क नहीं, गंदे पानी बहने का नारा नहीं,
कच्ची छोटे मोटे गड्ढे दार सडकेँ।
पुलिस फुटपाथ व्यापारियों से डरा धमकाकर रिश्वत।
बाहर वाग्वीर
भीतर खालीपन।
नदी तो देवियां हैं,
पर गंदगी करना खालीपन भक्ति का।
[02/10, 5:53 pm] sanantha.50@gmail.com: भीतर का खालीपन
एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
3-10-2026
भीतर का खालीपन—
बाहर अधिकारों की बातें,
अल्पसंख्यकों के अधिकार,
आरक्षण की नीतियाँ,
समानता के नारे।
मंदिरों में भी
वी.आई.पी. दर्शन—
धनवानों के लिए शीघ्र दर्शन,
साधारण भक्त
लंबी कतार में भगवान की प्रतीक्षा।
निजी विद्यालयों में
धन के आधार पर शिक्षा,
सरकारी विद्यालयों में
कहीं पानी नहीं,
कहीं शौचालय नहीं,
कहीं प्रयोगशाला नहीं।
बड़े अस्पतालों में
अच्छी चिकित्सा की सुविधा,
गरीब के सरकारी अस्पताल में
दवा का अभाव,
जाँच की सुविधा का अभाव—
फिर भी स्वास्थ्य सबका अधिकार!
चुनाव आते ही
गरीबों के उद्धार के वादे,
गरीब बस्तियों में
आज भी पानी की कमी,
पक्की सड़क का अभाव,
गंदे पानी की निकासी नहीं,
गड्ढों से भरी राहें।
फुटपाथ पर
छोटा-सा व्यापार करने वाला गरीब—
कभी डराया जाता है,
कभी धमकाया जाता है,
कभी रिश्वत के बोझ तले दबाया जाता है।
बाहर वाग्वीर—
भीतर खालीपन!
नदियों को
हम देवियाँ कहते हैं,
उन्हें पवित्र मानकर
आरती उतारते हैं;
फिर उन्हीं नदियों में
गंदगी बहाते हैं।
यह कैसी भक्ति?
यह कैसा धर्म?
यह कैसी संस्कृति?
मंदिर में दीप जलाने से पहले
मन में दीप जलाना होगा।
नदी को देवी कहने से पहले
उसकी निर्मलता बचानी होगी।
अधिकार केवल भाषण में नहीं,
शिक्षा केवल धनवानों के लिए नहीं,
चिकित्सा केवल संपन्नों के लिए नहीं,
विकास केवल घोषणाओं में नहीं।
जब तक
बाहर शब्दों की सजावट
और भीतर संवेदना का अभाव है—
तब तक
समाज कितना भी आगे बढ़े,
मनुष्य भीतर से खाली ही रहेगा।
सच्चा विकास वही,
जहाँ बाहर व्यवस्था सुंदर हो
और भीतर इंसानियत जीवित हो।
बाहर नहीं—
पहले भीतर का खालीपन भरें।