कल्पना का जाल
एस.अनंतकृष्णन, चेन्नै
तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक
29-3-26
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मानव ज्ञान चक्षु प्राप्त पशु।
जिज्ञासु प्रवृत्ति वाला मानव
विचारशील और चिंतन शील।
यथार्थ घटनाएँ,
वास्तविक दृश्य
उसकी है कल्पना का आधार।
पक्षी को देखा,
उड़ने की कल्पना,
परिणाम हवाई जहाज का आविष्कार।
दृश्य, दृश्य से विचार चिंतन सच्चाई के आधार पर कल्पना,
परिणाम आदर्शोंन्मुख यथार्थवाद।
रंग-बिरंगी बिल्लियों को देखा, सोचा, मानव की एकता की कल्पना की।
एक ही बिल्ली ने बच्चे दिये नाना रंग के।
कल्पना जागी,
कवि ने लिखा
भले ही रंग भिन्न-भिन्न,
पर एक ही माँके बच्चे।
आगे इस की कल्पना,
एक ही भारतवासी,
भारत माौ एक
कश्मीरियों के ,
उत्तर प्रदेश के गोरे लोग,
दक्षिण के काले लोग
भिन्न-भिन्न भाषाएँ,
आसेतु हिमाचल में
विचारों की एकता,
आध्यात्मिक एकता,
कैलाश का शिव,
रामेश्वर का शिव
लोकनाथ विश्वनाथ
एकता की यथार्थता
आदर्श एकता प्रेरणा।
उत्तर के बाढ़ भरी जीव नदियाँ,
दक्षिण के सूखे इलाके,
यथार्थ में कल्पना
जोड़ों नदियों को,
व्यर्थ पानियों को
नदियों को जोड़कर
देश को समृद्ध बनाओ।
उत्तर के गेहूँ, दक्षिण के चावल, पान सुपारी।
समृद्ध कृषि प्रधान भारत भूमि
विश्वभर के अन्नदाता,
पाश्चात्य बर्फीले,
आहार सामग्रियों का अभाव,
अतः भारत को औद्योगीकरण के नाम से
मरुभूमि मत बनाओ।
सोना चांदी,रकम
भूखे के सामने कुछ नहीं
खेती की प्रधानता पर ध्यान रखो,
विश्व भर को भूख से बचाओ,
स्वर्ण उगलते कृषी भूमि को कारखानों की भूमि
बनाकर भावी पीढ़ियों के लिए भारत को अकाल-ग्रस्त मत बनाओ।
मैदान टच कहानी याद रखो,
मैदान ने वर पाया,
जिसको वह छुएगा,वह सोना बनना है,
वर मिल गया,
उसकी मनोकामना पूरी हुई।
पत्नी बेटे माँ बाप जिसको भी स्पर्श करता,
बन जाता सोना।
भूखे लगी, खाने भोजन पर हाथ रखा तो
भोजन सोना।
समझा भोजन ही प्रधान।
यह साधारण कल्पना नहीं,
भारत के कृषी संपन्न देश को नगरीकरण, नगर विस्तार के नाम से
मरुस्थलीय प्रदेश बनाना
सही नहीं,
झीलों का नदारद करना
समृद्ध भारत भूमि को
मृग मरीचिका बनाना है।
वहाँ मरुभूमि को कृषि प्रधान बना रहे हैं,
यहाँ कृषी प्रधान को
सद्यःफल के लिए
नगर विस्तार।
भारतीय सहनशीलता
पाश्चात्य भाषा धन दे रही है,
पर पारिवारिक शांति नष्ट कर रही है।
तलाक बढ़ रहा है।
जितेंद्रियता, मर्यादा पुरुषोत्तमता अशांति ला रही है।
यही कल्पना कीजिए,
भारत को कृषी प्रधान बनाइए।
न तो भावी पीढ़ी अकाल पीड़ित दाने दाने के लिए तड़पेगा ही।
यह कल्पना भावी अकाल भारत की सावधानी।