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Tuesday, October 20, 2026

मोह से मुक्ति

 

मोह से मुक्ति

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
21-10-2026


ईश्वरीय सृष्टि माया और मोह से रहित नहीं है।

ईश्वर ने नारी की रचना,

 संसार की निरंतरता और विकास के लिए की है। 

मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से 

पूरी तरह मुक्त होना सहज नहीं है।

भगवान की सृष्टि में महामाया का प्रभाव 

मानव मन में आकर्षण उत्पन्न करता है। 

संतानोत्पत्ति, संतान का लालन-पालन, 

प्रेम और ममता—ये सभी जीवन के स्वाभाविक अंग हैं। इनके मोह से मुक्ति पाना अत्यंत कठिन है।

जब तक मनुष्य अज्ञान और आसक्ति में बँधा रहता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता।

आदि शंकराचार्य ने भज गोविन्दम् में 

संसार के इसी चक्र की ओर संकेत किया है—

पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं,
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे,
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥

इसका भावार्थ है—

  • पुनरपि जननम् — बार-बार जन्म लेना।
  • पुनरपि मरणम् — बार-बार मृत्यु को प्राप्त होना।
  • पुनरपि जननी जठरे शयनम् — बार-बार माता के गर्भ में निवास करना।
  • इह संसारे बहुदुस्तारे — इस संसार-सागर को पार करना अत्यंत कठिन है।

माँ का प्यार,

 पत्नी के प्रति मोह,

 संतान का पालन-पोषण,

 स्वादिष्ट भोजन की इच्छा, 

सुंदर रूप का आकर्षण, 

नृत्य-संगीत का आनंद तथा आभूषण, 

हीरे और पन्ने जैसे बहुमूल्य रत्नों के प्रति आसक्ति—मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार के मोह से घिरा हुआ है।

इन सबके बीच रहते हुए भी

 मनुष्य अपने मन को आसक्ति से मुक्त कैसे करे?

यह आत्मचिंतन का विषय है।

सांसारिक सुखों की लालसा में

 मनुष्य कभी-कभी अनुचित मार्ग भी अपना लेता है।

 शीघ्र लाभ पाने के लिए भ्रष्टाचार और 

रिश्वत का सहारा लेना भी

 इसी अंधी लालसा का परिणाम है।

मोह से मुक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, 

बल्कि संसार में रहते हुए मोह का दास न बनना है।

माँ से प्रेम करना, 

पत्नी की सेवा करना, 

संतान का पालन-पोषण करना और 

दूसरों के प्रति करुणा रखना—

ये सब जीवन के पवित्र कर्तव्य हैं। 

समस्या प्रेम में नहीं, 

बल्कि उस आसक्ति में है 

जो मनुष्य को विवेक और धर्म के मार्ग से

 विचलित कर देती है।

यदि मनुष्य मोह से मुक्ति पाना चाहता है, 

तो उसे ईश्वर का स्मरण करना चाहिए, 

मन को संयमित करना चाहिए 

और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।

आत्मा और परमात्मा की एकता का

 अनुभव करना ही अद्वैत मार्ग का परम लक्ष्य है।

आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन का प्रसिद्ध सिद्धांत है—

ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।

अर्थात् ब्रह्म ही परम सत्य है, 

जगत की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता नहीं है

 तथा

 जीवात्मा और ब्रह्म में मूलतः भेद नहीं है।

जब मनुष्य इस सत्य को समझकर जीवन में उतारने का प्रयास करता है, 

तब धीरे-धीरे उसका मोह कम होने लगता है और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।

ईश्वर का स्मरण, कर्तव्य का पालन, मन का संयम और आत्मज्ञान—यही मोह से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने के साधन हैं।

ॐ नमः शिवाय।
ॐ मुरुगा! शरणम्।

मोह से मुक्ति।

 एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

21-10-26.

+++++++

ईश्वरीय सृष्टि 

 माया मोह रहित नहीं।

 ईश्वर ने नारी को  बनाया,

 सांसारिक विकास के लिए।

 वह सहज 

मूल प्रवृत्ति से  मुक्ति 

 पाना संभव नहीं।

 भगवान की सृष्टि में 

 महामाया देवी

 मानव मन में 

 आकर्षण के लिए।

 संतानोत्पत्ति,

संतान का लालन-पालन,

 प्रेम मोह।

 मुक्ति पाना मुश्किल।

 अतः निराश मनुष्य की मृत्यु, जन्म के चक्कर से बच नहीं सकता।

आदि शंकराचार्य ने लिखा है

• पुनरपि जननं: बार-बार जन्म लेना

• पुनरपि मरणं: बार-बार मृत्यु को प्राप्त होना

• पुनरपि जननी जठरे शयनम्: और बार-बार माता के गर्भ में सोना (कष्ट उठाना)

• इह संसारे बहुदुस्तारे: इस अत्यंत कठिन और विशाल संसार-सागर को पार करना बहुत मुश्किल है।

  माँ का प्यार,

 पत्नी का मोह,

  संतान पालन,

 स्वादिष्ट खाने की  इच्छा, 

सुंदर रूप का मोह,

 नाच ,गान, आभूषण हीरा पन्ना आदि 

इतना मोह, 

 मुक्ति पाना,

आत्मज्ञानियों के लिए ही संभव है। 

 सद्यःफल के लिए भ्रष्टाचार और रिश्वत।

 मोह से मुक्ति होना है तो  ईश्वर ध्यान में रखना है।

 आत्मा परमात्मा एक होकर अद्वैत मार्ग पर चलना है।

जगत माया मिथ्या 

ब्रह्म सत्यं को अपनाना है।

Monday, October 19, 2026

विजयदशमी एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 20-10-26 +++++++ दशहरा नवरात्रि के दसवें दिन विजयदशमी के दिन मनाते हैं। तीन दिन दुर्गा पूजा तीन दिन नवरात्रि पूजा तीन दिन सरस्वती पूजा। विजयदशमी सरस्वती पूजा हैं। उस दिन में विद्यारंभ का दिन है। देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया है। इस विजयोल्लास में विजयदशमी मनाते हैं। लक्ष्मी के बिना जगत जीवन कठिनतम है। इसलिए लक्ष्मी की कृपा पाने लक्ष्मी पूजा। कर्नाटक में मैसूर में यह दिन धूमधाम से मनाते हैं। उत्तर भारत में राम लीला के रूप में मनाते हैं। रावण की मूर्ति जलाई जाती हैं। दुष्टों के संहार, बुराइयों का जलन, विद्यारंभ के यह त्यौहार वास्तव में दिव्य शक्ति के उज्जवलतम की झलक है।

 

विजयदशमी

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

20-10-26

+++++++

दशहरा

नवरात्रि के दसवें दिन

विजयदशमी के दिन

मनाते हैं।

तीन दिन दुर्गा पूजा

तीन दिन नवरात्रि पूजा

तीन दिन सरस्वती पूजा।

विजयदशमी सरस्वती पूजा हैं।

उस दिन में विद्यारंभ का दिन है।

देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया है।

इस विजयोल्लास में

विजयदशमी मनाते हैं।

लक्ष्मी के बिना जगत जीवन कठिनतम है।

इसलिए लक्ष्मी की कृपा पाने लक्ष्मी पूजा।

कर्नाटक में मैसूर में यह दिन धूमधाम से मनाते हैं।

उत्तर भारत में

राम लीला के रूप में

मनाते हैं।

रावण की मूर्ति जलाई जाती हैं।

दुष्टों के संहार,

बुराइयों का जलन,

विद्यारंभ के यह त्यौहार

वास्तव में

दिव्य शक्ति के उज्जवलतम की झलक है।

Sunday, October 18, 2026

अनमोल हीरे

   अनमोल हीरा


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-10-2026


++++++++++


अनमोल हीरा,

आदर्श नेता,

होशियार संतान,

देश के रक्षक,

प्रत्यक्ष देव समान

हमारे वीर जवान!


थल, जल और वायु सेना के वीर,

राष्ट्र की रक्षा में तत्पर,

हमारे गाँव, हमारे किसान,

देश की समृद्धि के आधार महान!


देश के धनी, दानी,

मानवता के अभिमानी,

सन्मार्ग के पथ-प्रदर्शक,

ऋषि-मुनि और संत महान—

ये सब हैं भारत के

अनमोल हीरे!


सनातन धर्म की अमूल्य धरोहर,

वेद, उपनिषद, रामायण, भगवद्गीता,

जातक कथाएँ और ज्ञान की गंगा,

मंदिर, तीर्थस्थल और पावन परंपराएँ—

भारत की आत्मा के अनमोल हीरे!


राम और कृष्ण,

रामकृष्ण परमहंस,

आदि शंकराचार्य,

महात्मा बुद्ध और गुरु नानक—

ज्ञान, भक्ति और मानवता के

अनमोल हीरे!


अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत,

दर्शन के विविध प्रकाश,

आत्मज्ञान के पथ पर

दिखाते जीवन को नई दिशा—

भारत की ज्ञान-संपदा के

अनमोल हीरे!


स्वतंत्रता संग्राम के शहीद,

राष्ट्रभक्त वीर और महान नेता,

जिनके त्याग और बलिदान से

स्वतंत्र हुआ हमारा भारत—

वे हैं राष्ट्र के अनमोल हीरे!


लाल, बाल और पाल,

समाज-सुधारक राजा राममोहन राय,

नेताजी सुभाषचंद्र बोस,

राष्ट्रपिता महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी—

इनके आदर्शों से आलोकित

भारत के इतिहास के पन्ने!


गंगा, यमुना, सरस्वती,

गोदावरी, कावेरी और कृष्णा,

जीवनदायिनी पावन नदियाँ,

हिमालय का दिव्य कैलाश—

प्रकृति के अनुपम उपहार,

भारत के अनमोल हीरे!


देशभक्ति, देशप्रेम,

सेवा, त्याग और सद्भाव,

ऋषि-मुनि, संत और कविगण—

भारत की संस्कृति के गौरव,

राष्ट्र की आत्मा के अनमोल हीरे!


नवभारत के निर्माता,

लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल,

पंडित जवाहरलाल नेहरू,

और राष्ट्रनिर्माण में योगदान देने वाले

असंख्य महापुरुष महान!


धन्य है भारतभूमि,

धन्य इसकी आध्यात्मिक विरासत,

धन्य हैं इसके गुरुजन,

धन्य हैं इसके वीर सपूत!


भारत की महानता के ये उज्ज्वल सितारे,

हम सबके लिए हैं अनमोल हीरे!

Friday, October 16, 2026

मानवता

 [16/10, 6:12 pm] sanantha.50@gmail.com: मानवता सब से बड़ा है धर्म है।

एस‌ . अनंत कृष्णन, चेन्नई।

17-10-26.

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मानव और पशु में 

 फर्क नहीं।

 मानवता के कारण 

 मानव श्रेष्ठ है।

औवैयार ने अपने ग्रंथ आत्तिच्चूडी में  लिखा है--

धर्म करना चाह।

 धर्म क्या है?

मजहब नहीं,

धर्म कर्म।

 अपने कर्तव्य को

ईमानदारी से करना धर्म है।

भलमानसाहस धर्म है।

 निस्वार्थ समाज सेवा,

 दीन दुखियों की सेवा मानवता है।

 धन है धन से सेवा,

बुद्धि है तो बुद्धि से सेवा

 बल है तो बल से।

अन्नदान, भूदान,गो दान, स्वर्ण दान,रजत दान धर्म है।

देश को स्वच्छ रखना,

 नदी नालों को प्रदूषित न करना धर्म हो।

पेड़ लगाना धर्म है।

मानवता है तो

 भगवान की सुंदर मूर्तियाँ बनाकर

 विसर्जन के नाम से छिन्न-भिन्न करके अपमानित न करता।

 उन करोड़ों के रूपयों से ऐसी सेवा करता,

 जिससे सब लोग मातृ मजहब में फिर जुड़ जिते।

 मनसा वाचा कर्मणा 

 देश की रक्षा करना 

 अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहना मानवता है।

 अच्छी चालचलन , अनुशासन, वचन निभाना मानवता धर्म है।

 वसुधैव कुटुंबकम्, 

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु का पालन करना धर्म है।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।

[16/10, 6:13 pm] sanantha.50@gmail.com: मानवता सबसे बड़ा धर्म है


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

दिनांक: 17-10-2026


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मानव और पशु में

प्राकृतिक अंतर भले ही कम हो,

पर मानवता के कारण

मानव श्रेष्ठ है।


महाकवयित्री औवैयार ने

अपने ग्रंथ ‘आत्तिचूड़ी’ में

कहा है—


“அறம் செய விரும்பு”

अर्थात् धर्म-कर्म करने की इच्छा रखो।


धर्म क्या है?


धर्म केवल मजहब नहीं,

धर्म है सत्कर्म।

अपने कर्तव्य को

ईमानदारी से निभाना धर्म है।


भलमनसाहत, साहस और सदाचार

धर्म के ही रूप हैं।

निस्वार्थ समाज-सेवा

और दीन-दुखियों की सेवा

सच्ची मानवता है।


धन है, तो धन से सेवा करो।

बुद्धि है, तो बुद्धि से सेवा करो।

बल है, तो बल से सेवा करो।

अपनी सामर्थ्य के अनुसार

दूसरों के काम आना

मानवता का सच्चा परिचय है।


अन्नदान, भूदान, गोदान,

स्वर्णदान और रजतदान—

ये सभी दान के विभिन्न रूप हैं।

परंतु दान का वास्तविक महत्त्व

उसकी भावना और

उससे होने वाले जनकल्याण में है।


देश को स्वच्छ रखना,

नदियों और नालों को

प्रदूषित होने से बचाना,

वृक्ष लगाना और प्रकृति की रक्षा करना

भी हमारा धर्म है।


यदि हमारे हृदय में मानवता है,

तो भगवान की सुंदर मूर्तियाँ बनाकर

विसर्जन के नाम पर

उन्हें खंडित करके

प्रकृति को प्रदूषित क्यों करें?


उस धन का उपयोग

जनकल्याण के कार्यों में हो,

जिससे निर्धनों, असहायों और

दीन-दुखियों के जीवन में

सुख और आशा का संचार हो।


मनसा, वाचा, कर्मणा—

मन, वचन और कर्म से

देश की रक्षा करना,

अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहना,

अच्छा आचरण करना,

अनुशासन का पालन करना

और अपने वचन को निभाना

मानवता के सच्चे लक्षण हैं।


“वसुधैव कुटुम्बकम्”—

अर्थात् संपूर्ण पृथ्वी

एक परिवार है।


“सर्वे जना सुखिनो भवन्तु”—

अर्थात् सभी जन सुखी हों।


इन महान आदर्शों का पालन करना

ही सच्चा धर्म है।


मजहब अनेक हो सकते हैं,

पूजा-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं,

परंतु मानवता का संदेश

सबको जोड़ता है।


मानव-सेवा ही माधव-सेवा है।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।

Thursday, October 15, 2026

सत्य की मशाल

 [15/10, 9:09 pm] sanantha.50@gmail.com: सत्य की मशाल।

एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

16-10-26.

 अंधकार मिटाने मशाल।

 जीवन में 

 प्रकाश लाने

 सत्य की मशाल।।

 सत्यवान सदा प्रकाश में रहेगा।

 उसकी बात एक ही रहेगी।

 बदल बदलकर बातें न होगी।

वही सत्य की मशाल।

 सत्य की मशाल अलौकिक प्रकाश।

 आत्मज्ञान जगाती हैं।

 सत्य की मशाल सर्वेश्वर के दर्शन कराती।

 बेचैनी अंधकार मिटा देती।

 सत्यार्थ प्रकाश  

मानव पाता  दिव्य शक्ति।

[15/10, 9:09 pm] sanantha.50@gmail.com: सत्य की मशाल


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

16-10-2026


अंधकार मिटाने वाली मशाल,

जीवन में प्रकाश लाने वाली मशाल,

सत्य के पथ पर चलने की प्रेरणा—

यही है सत्य की मशाल!


सत्यवान सदा प्रकाश में रहेगा,

उसका कथन एक ही रहेगा।

बदल-बदलकर बातें न होंगी,

सत्य की राहें कभी न बदलेंगी।


यही है सत्य की मशाल,

यही है सत्य की मशाल!


सत्य की मशाल का अलौकिक प्रकाश,

जगाता है आत्मज्ञान का विश्वास।

अंतरात्मा को निर्मल बनाती,

परमेश्वर के दर्शन कराती।


मन की बेचैनी, भ्रम और अंधकार मिटाती,

जीवन में शांति की ज्योति जलाती।

सत्यार्थ के प्रकाश को जब मानव अपनाता है,

उसके अंतर्मन में दिव्य ज्ञान जगमगाता है।


सत्य की मशाल जलती रहे,

मानवता का पथ प्रकाशित करती रहे!

Wednesday, October 14, 2026

परमाचार्य वाणी

 परमाचार्य वाणी

परमाचार्य की दिव्यवाणी — भाग 1


मंगलारंभ : विनायक और तत्त्वमय विनायक


सादर समर्पण — महापेरियवा के श्रीचरणों में


कांचीपुरम मठ के परमाचार्य की दिव्यवाणी को सरल हिंदी में YouTube के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाने के विनम्र प्रयास में, उनके कमल-सदृश श्रीचरणों में सादर प्रणाम करके इस कार्य का श्रीगणेश कर रहा हूँ।


मेरी अर्धांगिनी अपने अंतिम समय तक यही विश्वास व्यक्त करती रही कि महापेरियवा उसकी रक्षा करेंगे। अंततः वह उन्हीं का नाम स्मरण करते हुए इस संसार से विदा हो गई।


यह YouTube प्रस्तुति मेरी अर्धांगिनी की पावन स्मृति में तथा महापेरियवा के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक समर्पित है।


मेरी विनम्र प्रार्थना है कि कांची कामकोटि पीठ इस प्रयास को अपना आशीर्वाद प्रदान करे और इसकी प्रस्तुति के लिए आवश्यक अनुमति प्रदान करने की कृपा करे।


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विषय-प्रवेश


इस श्रृंखला में परमाचार्य की दिव्यवाणी के माध्यम से निम्नलिखित विषयों को सरल हिंदी में प्रस्तुत करने का प्रयास रहेगा।


1. मंगलारंभ

   - विनायक

   - तत्त्वमय विनायक

2. अद्वैत

3. धर्म और मत

4. वैदिक धर्म

5. सामान्य धर्म

6. सामाजिक विषय

7. संस्कृति

8. कर्ममार्ग

9. भक्तिमार्ग

10. देवता, मूर्तियाँ और अवतार-पुरुष

11. मंगलारती


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1. तमिलनाडु की विशेषता — सर्वत्र विराजमान पिळ्ळैयार


तमिलनाडु की एक विशेषता है कि यहाँ पग-पग पर भगवान विनायक के दर्शन होते हैं। तमिल भाषा में उन्हें स्नेह और आदर से ‘पिळ्ळैयार’ कहा जाता है।


विनायक के मंदिरों के लिए विशाल गोपुरम और भव्य भवन ही आवश्यक नहीं हैं। कहीं वे पीपल के वृक्ष के नीचे खुले आकाश में विराजमान हैं, कहीं गली के मोड़ पर, तो कहीं नदी के किनारे।


इस प्रकार पिळ्ळैयार जनसामान्य के जीवन के साथ सहज रूप से जुड़े हुए हैं। वे अपने भक्तों पर अनुग्रह करने वाले विघ्नेश्वर हैं।


तमिल भाषा में ‘पिळ्ळै’ का अर्थ बालक या पुत्र होता है। उसके साथ आदरसूचक ‘आर’ जोड़कर ‘पिळ्ळैयार’ कहना तमिलनाडु की विशिष्ट भाषायी और सांस्कृतिक परंपरा है।


पार्वती और परमेश्वर के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण भी उन्हें विशेष आदर प्राप्त है। तमिल परंपरा में उनके नाम के भीतर ही पुत्र के प्रति स्नेह और सम्मान की भावना व्यक्त होती है।


‘कुमारन’ शब्द का प्रयोग भी तमिल में बालक अथवा युवक के अर्थ में होता है। किंतु धार्मिक परंपरा में ‘कुमारन’ या ‘कुमारस्वामी’ कहने पर प्रायः भगवान सुब्रह्मण्य अर्थात् कार्तिकेय का स्मरण होता है। तमिल में उन्हें ‘कुमरक्कडवुळ’ भी कहा जाता है।


इस प्रकार तमिल संस्कृति में दोनों दिव्य पुत्रों के नामों और संबोधनों की अपनी विशिष्ट परंपरा है।


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2. बालस्वरूप में आदि-देव — तत्त्वमय विनायक


विनायक बालस्वरूप में दिखाई देते हैं। फिर भी वे आदि-तत्त्व के प्रतीक माने जाते हैं।


प्रणव अर्थात् ‘ॐ’ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में परम तत्त्व का प्रतीक है। सृष्टि के मूल में स्थित इसी प्रणव-तत्त्व से विनायक का संबंध माना गया है।


उनका गजमुख और उनकी वक्र सूँड भक्तों को प्रणव के स्वरूप का स्मरण कराते हैं। इस प्रकार बालस्वरूप में विराजमान विनायक अपने भीतर गहन आध्यात्मिक तत्त्व को समेटे हुए हैं।


वे विघ्नों को दूर करने वाले और शुभ कार्यों के आरंभ में सर्वप्रथम पूजे जाने वाले देवता हैं। भक्तों को अनुग्रह प्रदान करने में भी उनका स्थान विशेष है।


इसका सुंदर उदाहरण तमिल भक्ति-साहित्य की महान कवयित्री औवैयार के जीवन से संबंधित परंपरागत कथा है।


3. औवैयार और विनायक की असीम कृपा


औवैयार भगवान गणपति की महान उपासिका थीं। उन्होंने विनायक के प्रणवस्वरूप का ध्यान करते हुए ‘विनायकर अकवल्’ नामक प्रसिद्ध भक्तिपरक रचना की। इस रचना में योग, आध्यात्मिक साधना और ज्ञान से संबंधित अनेक गहन भाव सरल काव्यात्मक शैली में व्यक्त हुए हैं।


तमिल भक्ति-परंपरा में इस रचना को विशेष श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है।


औवैयार के संबंध में एक प्रसिद्ध कथा भी प्रचलित है।


सुंदरमूर्ति नायनार, जिन्हें आरूरर भी कहा जाता है, और चेरमान पेरुमाल नायनार कैलास की ओर प्रस्थान करने वाले थे। दोनों औवैयार को भी अपने साथ ले जाना चाहते थे।


उस समय औवैयार भगवान विनायक की पूजा में लीन थीं। उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे शीघ्र पूजा समाप्त करके उनके साथ चलें।


औवैयार ने उत्तर दिया:


“आपको कैलास जाना है तो जाइए। आपके लिए मैं अपनी पूजा में शीघ्रता नहीं करूँगी। मेरे लिए विनायक की पूजा ही कैलास के समान है।”


वे अपनी पूजा में पूरी तरह तल्लीन रहीं।


कथा के अनुसार, पूजा पूर्ण होने पर भगवान विनायक ने उन्हें अपनी सूँड से उठाया और क्षणभर में कैलास पहुँचा दिया। इस प्रकार औवैयार उन दोनों भक्तों के पहुँचने से पहले ही कैलास पहुँच गईं।


यह कथा भगवान विनायक की कृपा, भक्त की अनन्य निष्ठा और सच्ची उपासना की महिमा को दर्शाती है।


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4. सुंदरमूर्ति नायनार और चेरमान पेरुमाल


तमिल शैव भक्ति-साहित्य में सुंदरमूर्ति नायनार और चेरमान पेरुमाल नायनार की मैत्री का विशेष स्थान है।


आपके द्वारा उद्धृत तमिल पद्य में चेरमान पेरुमाल की कैलास-यात्रा और उनकी काव्य-प्रतिभा का स्मरण किया गया है।


सरल हिंदी भावानुवाद


आरूरर अर्थात् सुंदरमूर्ति नायनार के प्रिय मित्र बनकर,


पूर्वकाल से ही उनसे मैत्री का संबंध निभाते हुए,


तीव्र वेग से दौड़ते अश्व पर सवार होकर,


महान कैलास पर्वत पर पहुँचकर,


‘आदि-अंत उला’ नामक काव्य की तत्काल रचना करके उसका गान करने वाले चेर राजा की महिमा अद्भुत है।


भावार्थ


ये पंक्तियाँ चेरमान पेरुमाल नायनार की ओर संकेत करती हैं। वे सुंदरमूर्ति नायनार के परम मित्र माने जाते हैं। शैव भक्ति-परंपरा में उनकी कैलास-यात्रा और ‘तिरुक्कैलाय ज्ञान उला’ नामक रचना का विशेष उल्लेख मिलता है।


आपके उद्धृत प्रसंग में भगवान विनायक की कृपा से औवैयार का कैलास पहुँचना और सुंदरमूर्ति नायनार तथा चेरमान पेरुमाल की कैलास-यात्रा—इन दोनों घटनाओं का सुंदर संबंध दिखाई देता है।


इस प्रकार भगवान विनायक और भगवान कार्तिकेय, दोनों दिव्य भाइयों की कथाएँ इस प्रसंग में एक साथ स्मरण की जाती हैं।


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5. विनायक की सहज कृपा


भगवान विनायक को विघ्नेश्वर कहा जाता है। वे भक्तों के विघ्न दूर करने वाले और शुभ कार्यों के आराध्य देवता हैं।


तमिलनाडु के पलनी में भगवान कार्तिकेय की विशेष महिमा है। इस प्रसंग में ज्येष्ठ पुत्र विनायक और कनिष्ठ पुत्र कार्तिकेय—दोनों का स्मरण होता है।


बालस्वरूप में विराजमान विनायक को आदि-तत्त्व का प्रतीक मानकर उनकी उपासना की जाती है। भक्तिभाव से की गई उनकी आराधना हमें यह संदेश देती है कि ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए बाहरी आडंबर से अधिक महत्त्व सच्ची श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण का है।


श्री गणेशाय नमः।


महापेरियवा के श्रीचरणों में सादर प्रणाम।


— एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु


मोबाइल

 

मोबाइल में उलझा बचपन

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
15-10-2026

+++++++++

मैं 77 वर्ष का जवान हूँ,
मन से आज भी युवा हूँ।
पर बचपन में मोबाइल की ऊर्जा कैसी होगी,
इसका निजी अनुभव कहाँ से लाऊँ?

पर देखता हूँ समाज को,
देखता हूँ बहू-बेटे, बेटी-दामाद को,
पोते-पोतियों के बचपन को,
और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव को।

एक परिवार में
एक मोबाइल की कीमत
एक लाख रुपये तक पहुँच जाती है,
पेड़-पौधों से भी कम महत्त्वपूर्ण
प्रकृति नहीं,
बल्कि मोबाइल ही
बच्चों की दुनिया बन जाती है।

शिशु रोता है तो
लोरी नहीं सुनाई जाती,
यूट्यूब पर लोरी सुनाकर
उसे चुप कराया जाता है।

बच्चे को खाना खिलाना हो तो
मोबाइल पर अंग्रेज़ी की राइम्स चलती हैं।
तीन वर्ष के बच्चे को भी
मातृभाषा के बालगीतों से
परिचित कराने का समय कहाँ है?

बच्चे को चुप बैठाना हो,
तो मोबाइल गेम का सहारा।
ज्ञान चाहिए तो मोबाइल,
पढ़ाई चाहिए तो मोबाइल,
हर प्रश्न का उत्तर पाने के लिए
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा!

माँ से पूछकर संदेह मिटाने की
सहज परंपरा कहाँ खो गई?
स्वाभाविक सोच और समझ के स्थान पर
चैटजीपीटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
का बढ़ता हुआ सहारा!

स्मरणशक्ति घटती जाती है,
अपनी बुद्धि पर भरोसा कम होता जाता है।

मित्र को फोन करना हो,
और मोबाइल की बैटरी समाप्त हो जाए,
तो मन में उलझन ही उलझन!

गृहकार्य लिखना हो,
गणित का प्रश्न हल करना हो,
निबंध तैयार करना हो,
तो तुरंत ए.आई. की याद आती है।

घर में कोई मेहमान आए,
तो स्वागत के शब्द कम पड़ जाते हैं।
बातचीत चलती रहती है,
पर आँखें मोबाइल पर टिकी रहती हैं।
सामने बैठा मनुष्य उपेक्षित,
मोबाइल ही सबसे निकट का साथी!

भोजन सामने रखा है,
पर मन भोजन में कहाँ?
आँखें मोबाइल पर,
हाथ भोजन उठाता है,
मुँह तक पहुँचाता है,
पर खाने में पड़ा बाल भी
नज़र नहीं आता!

मोबाइल की यह कैसी परेशानी?
बच्चा चाहता है अपना एकांत,
घर में कोई भी आए,
न स्वागत, न आत्मीय बातचीत,
सिर झुका हुआ,
आँखें मोबाइल पर!

आस-पड़ोस के बच्चों के साथ
खेलना-कूदना बंद,
मिलना-जुलना बंद।
मोबाइल का एक कोना ही
उसकी पूरी दुनिया बन जाता है।

न खान-पान की चिंता,
न मित्रों की चिंता,
न परिवार के साथ समय बिताने की इच्छा।
एक आभासी दुनिया में
बचपन धीरे-धीरे सिमटता जाता है।

ऐसे बचपन में
हँसी भी व्यक्तिगत,
बातचीत भी सीमित,
संबंध भी दूर-दूर,
और मनुष्य के बीच
मनुष्य ही अपरिचित!

मोबाइल स्वयं दोषी नहीं,
उसका अतिरेक चिंता का विषय है।
उचित उपयोग ज्ञान देता है,
पर असीमित उपयोग
बचपन की सहजता छीन सकता है।

बचपन को मोबाइल का बंदी नहीं,
मानवीय संबंधों का धनी बनाइए।
मातृभाषा के गीत सुनाइए,
प्रकृति से प्रेम कराइए,
मित्रों के साथ खेलने दीजिए,
बड़ों के अनुभव सुनने दीजिए।

मोबाइल में उलझा बचपन
केवल बच्चों की समस्या नहीं,
अभिभावकों के लिए भी
एक गंभीर उलझन है!

प्रश्न यही है—
बच्चों के हाथ में मोबाइल हो,
या मोबाइल के हाथ में
बच्चों का बचपन?