संस्मरण
उसकी याद में जीवन
मेरी शादी 1975 में हुई—बिना धूमधाम, बिना बाह्य आडंबर के। न छायाचित्र, न दिखावा। था तो केवल प्रेम—भाई-बहन जैसा अपनापन और फिर जीवनसाथी का गहरा स्नेह।
1950 में मेरे जन्म के समय ही मेरे मामा ने मेरी माँ से कहा था—“मेरी बेटी हुई तो उसका विवाह तुम्हारे बेटे से करूँगा।” उसी वर्ष गोमती का जन्म हुआ और हमारा रिश्ता जैसे जन्म से पहले ही तय हो गया।
मई 1975 से जून 2026 तक—इक्यावन वर्षों का साथ।
इन वर्षों में कमाना मेरा काम रहा और घर-गृहस्थी उसने सँभाली। मैं उस जमाने का पुरुष था; घर के कामों से लगभग अनजान। एक लोटा तक अपनी जगह से सरकाने की जरूरत मुझे नहीं पड़ती थी। वह मेरी हर आवश्यकता बिना कहे समझ लेती—समय पर भोजन, स्वादिष्ट पकवान, दवाइयाँ, पानी और न जाने कितनी छोटी-बड़ी बातें।
उसकी वाणी में मैंने कभी क्रोध नहीं देखा, चेहरे पर शिकायत नहीं। मेरी तीन बार ऐसी स्थिति आई जब जीवन और मृत्यु के बीच खड़ा था। हर बार वह मेरे साथ चट्टान की तरह खड़ी रही। मुझे वह सत्यवान के लिए सावित्री जैसी लगती थी।
लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अपनी एक बड़ी भूल साफ दिखाई देती है।
मैंने उसकी सेवा को अपना अधिकार समझ लिया और उसके श्रम को उसका कर्तव्य।
उसने कभी हिसाब नहीं माँगा, इसलिए मैंने भी हिसाब नहीं रखा। उसने बिना कहे मेरी जरूरतें पूरी कीं, इसलिए मैं उसकी जरूरतों को समझने में पीछे रह गया।
मैं कमाता रहा और समझता रहा कि अपना दायित्व निभा रहा हूँ। पर घर को घर बनाए रखने में उसके दिन-रात के श्रम, धैर्य और प्रेम का मूल्य मैंने समय रहते नहीं पहचाना।
आज मन में यही कसक है—
जिस स्त्री ने मेरी हर जरूरत बिना माँगे समझी, उसकी जरूरतों को समझने में मैं कितना पीछे रह गया!
उसके अंतिम दिन
जीवन के अंतिम दौर में जब बीमारी ने उसे घेर लिया, तब वर्षों से मुझे सँभालने वाली वही स्त्री स्वयं सहारे की आवश्यकता में थी। उसके शरीर की शक्ति कम होती गई, लेकिन मेरे प्रति उसकी चिंता कम नहीं हुई।
अंतिम दिनों में भी उसकी चिंता अपने लिए कम, मेरी अधिक थी। वह मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। जैसे जीवन भर मेरी जिम्मेदारी उठाती रही, वैसे ही अंत तक मेरे बारे में सोचती रही।
उन दिनों उसके पास बैठना, उसे देखना और उसकी पुरानी सेवा को याद करना मेरे लिए एक मौन आत्मपरीक्षण था। मन बार-बार कहता था—काश, उसके रहते मैं उसकी सेवा का उतना ही अर्थ समझ पाता, जितना आज उसकी अनुपस्थिति में समझ रहा हूँ।
जून 2026 में वह मुझे छोड़कर चली गई।
उसके जाने के बाद घर वही है, सामान वही है, दिन-रात वही हैं—पर जीवन की सहजता चली गई।
आज मैं अकेला हूँ।
सुबह उठकर कॉफी माँगनी पड़ती है। गोलियाँ स्वयं लेनी पड़ती हैं। पानी की बोतल भरनी पड़ती है। नाश्ते और भोजन के लिए भी कहना पड़ता है। जिन बातों का मुझे कभी ध्यान ही नहीं रखना पड़ा, वे आज मेरे अपने दायित्व हैं।
तभी उसकी सेवा का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।
वह केवल मेरी पत्नी नहीं थी; वह मेरे जीवन की अनकही व्यवस्था थी। उसकी उपस्थिति इतनी सहज थी कि उसका महत्व शायद मैंने उसके रहते पूरी तरह जाना ही नहीं।
आज वह नहीं है, पर उसकी सेवा की स्मृतियाँ मेरे हर दिन में बसी हैं। सुबह से रात तक, छोटी-सी जरूरत से लेकर बड़े संकट तक—हर जगह उसकी याद साथ चलती है।
इक्यावन वर्ष का साथ समाप्त हुआ है,
स्मृतियों का नहीं।
गोमती,
तुम मेरे जीवन से चली गई हो,
पर मेरे जीवन को जिस प्रेम और सेवा से सँवारा,
वह मेरे भीतर हमेशा जीवित रहेगा।
तुम्हारी सेवा का ऋण
मैं चुका नहीं सकता।
केवल इतना स्वीकार कर सकता हूँ—
तुमने अपना जीवन मुझे दिया,
और मैंने बहुत देर से समझा
कि तुम्हारा होना ही
मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख था।
अब शेष जीवन—
तुम्हारी याद में।