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Sunday, February 22, 2026

युवा का मन भटका हुआ

  

युवा मन का भटकाव।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

  आधुनिक युवक 

    पल पल 

 भटक जाने का युग

 कलयुग।

  

 बढ़िया शीर्षक

 गंभीर विषय

युवा तो अच्छे सच्चे गुणी, 

देश भक्त 

पर देश और विज्ञान

आज की प्रगति का आधार 

युवक।

विश्व भर में भारत में ही युवा शक्ति अधिक।

बुद्धिमान युवक का हाथ 

अमेरिका देश की प्रगति में  साथ।‌

 मजहब जाति संप्रदाय 

आज तक परिवर्तन नहीं हुए।।

 चुनाव में जाति 

प्रधान धन प्रधान।

 बढ़िया शीर्षक

 गंभीर विषय।

 चंचल मन

 माया/शैतान/सात्तान

हर मजहब में 

सांसारिक सद्यःफल 

 चंद मिनटों के लिए।

 ईश्वर का भय नहीं।

मत-मतांतर  संप्रदाय का अधीन।

 मानव मानव में मजहबी जोश।

 गुरु तो आज एक पेशेवर 

 शिक्षा का व्यापार।

 ट्यूशन के रखते ही वह छात्र अति होशियार।

एक ओर सरकारी स्कूलों के शिक्षक

 पूर्व स्वतंत्र, वेतन निश्चित, 

अनपढ़ अभिभावकों  के बच्चे 

 मातृभाषा माध्यम 

 हीनता-ग्रंथि मन में 

दूसरी ओर निजी स्कूलों के अध्यापक

छुट्टी लेना मना,

 पर छात्र आज्ञाकारी,

 शिक्षित समुदाय के बच्चे।

इन सब के बीच 

 सामाजिक माध्यम  के विपरीत विचार।

मानव-मन सद्यःफल के लिए 

लौकिक जीवन से आकर्षित।

 संगणक अंतर्जाल मैं 

 ज्ञान की बातें हैं,

 अश्लील बातें , खेल।

 एक दिन मैं ने देखा

 मोबाइल खेल।

मारो मारो आत्म हत्या कर लेगा।

झाँककर देखा तो

सांगणिक खेल।

 खेल में मन लगा तो

 बस मन भटक जाता है।



आज वैज्ञानिक प्रगति,

   सर्वत्र ज्ञान का भंडार।।

संगणक और मोबाइल के 

आविष्कार के कारण,

 उँगलियों के दबाने पर

 तुरंत  मन चाहा ज्ञान।

 मनोवांछित दोस्तों से  

वीडियो कान्फ्रेंसिंग 

बड़े बड़े दफ़्तर के काम 

घर में ही।

 कोराना आया तो भला हुआ 

अनेक युवकों को  घर में ही काम।

 हर बात में भला है और बुरा भी। 

 अभी युवकों को संयम से रहना है।

वैज्ञानिक माया, हर बात सिखाती है।

कामोत्तेजक दृश्य,

 हमारे जामाने में हमें पता नहीं 

 माता-पिता कब बोलेंगे मिलेंगे।

 पर हर साल अंतराल के बिना बच्चा।

 आजकल के चित्र पट, 

मोबाइल संगणिक 

 अश्लीलता के केंद्र।

 आध्यात्मिक बातें करते करते

अचानक अश्लीलता सामने।

 जितेंद्रिय न होना,  

प्रेम के कारण  

मन में दुविधाएँ।

 प्रेम और माता पिता के विरोध।

 प्रेम मैं धोखा,

तलाक  शब्द रहित भारत की भाषा

विदेशी संस्कृति विचार 

तलाक मुकद्दमा बढ़ती संख्या।

 बराबर की शिक्षा, बरबरी उद्योग।

 बढ़ती आय, बढ़ती महँगाई।

देरी से शादी, शादी के बाद ।

गर्भधारण करने अस्पताल।

 सम्मिलित परिवार की कमी,

घर में अशांति।

कर्जा  देने बैंक तैयार।

क्रेडिट कार्ड देने अनुरोध,

 बाह्याडंबर खर्च अधिक।

एल के जी के लिए दान दो लाख।

गुरु आजकल  अध्यापक, 

केवल सिखाना मात्र काम!

उपदेश देने तक अध्यापक को हक नहीं,

 पिताजी जैसे मत रहो, 

खूब पढ़ो, इतना ही बस।

लड़के ने पिताजी से कहा,

 आप पढ़ें लिखे नहीं, अध्यापक अपमान करते।

 बस, बिना सोचे विचारे अध्यापक पर क्रोध। 

युवकों  के मन में ऋष्यश्रुंग के उपदेश  नहीं,

 अश्लील गाना, युवावस्था में प्रेम करने की प्रेरणा।

 चित्रपट का संवाद  तो माता पिता के प्रति 

श्रद्धा भक्ति कम, प्रेम प्रेम नया नहीं।

नल दमयंती हंस  दूत, शकुंतला दुष्यंत प्रेम कहानी 

लेकिन प्रेम करनेवाले तन के लिए 

धन के लिए, मनोरंजन के लिए।

किसके लिए पता लगाने में भूल।

परिणाम शादी का महत्व कम।

मिलकर रहेंगे, पसंद है तो सही,

 न तो अलग हो जाएँगे।

भक्ति के क्षेत्र में तो 

 विभिन्न संप्रदाय,

 अलग अलग आचार्य 

 अलग अलग दल,

योगा में क्रिया योग,

 पतंजलि योग। 

जिम।

शिक्षा में सरकारी स्कूल,

गैर सरकारी स्कूल।

मातृभाषा माध्यम की हीनता-ग्रंथि।

राजनीति में एक ही नेता,

एक ही सिद्धांत,

 अनेक शाखाएँ ,अनेक नेता 

एक दूसरे पर कीचड़ उछालना।

भ्रष्टाचार और रिश्वत का बोलबाला।

 युवकों का मन भटका हुआ।

अल्पसंख्यकों की सरकारें 

आरक्षण नीति, 

 संविधान में समान अधिकार 

व्यवहार में  अल्पसंख्यकों का अधिकार ज़्यादा।

 हर एक कार्य में धर्म संकट।

बच्चों को हरफण मौला बनाने के लिए 

 न आराम, न स्वचिंतन  

 कर्नाटक संगीत की बोर्ड, 

क्रिकेट जिम न जाने 

 आये मेहमान से मिलने

 बातें करने समय नहीं।

 विद्यालय से  आते ही

 ट्यूशन भिन्न भिन्न वर्ग।

 युवक का मन हर क्षेत्र में दुविधा 

भक्ति का हो या राजनीति।

 मन भटकने नशीली वस्तुएँ।

 रंग-बिरंगी गोलियाँ।

  हर रंग का अपना अलग प्रभाव 

 मन भटकता रहता है।

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Saturday, February 21, 2026

धर्म और जाति की बढती खाई

 धर्म और जाति की बढती खाई।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

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धर्म  व्यापक।

 मानवता के प्रतीक।

 दान-धर्म, सहानुभूति,

 त्याग सत्य अहिंसा 

‌भलमानसाहस

 यही धर्म।

 भारतीय सनातन धर्म।

 भगवान की दी हुई क्षमता, संपत्ति से संतोष।

 सर्व लौकिक सुख अस्थाई की सीख।

 कालांतर में धर्म का व्यापक रूप, संकुचित रूप में बदलने लगा।

धर्म से नीचे गिरकर 

 मत मतांतरण का जन्म हुआ।

 धार्मिक महान लोग।

 वशिष्ठ के ब्रह्म ऋषि से 

जलकर 

 विश्वामित्र का शपथ।

दुर्वासा का क्रोध।

 भक्त कवियों में 

 अलग अलग संप्रदाय।

मुगलों के शासन काल,

 आश्रयहीन कवियों ने

भगवान का शरण लिया।

 संप्रदाय उत्पन्न होने लगे।

 कबीर पंथ, जायसी पंथ।

 तुलसी पंथ, सूर पंथ।

संप्रदाय के पिछलग्गू 

 सनातन धर्म के वर्णाश्रम।

 उच्च नीच के भेद।

  प्राचीन  जमाने में,

भुजबल, धन बल,  तनबल,  बुद्धि बल

 के आधार पर विवाह।

कालांतर में  केवल जाति और जन्मकुंडली के आधार पर।

 कबीर जैसे वाणी के डिक्टेटर ने   मजहबी एकता पर जोर दिया।

 कुरान पढ़ें वेद पढ़ें

‌खुदा को न जाना न पहचाना।

माया महा ठगनी,

 वशिष्ठ के शुभ मूहूर्त निश्चित।

 पर सीता दुखी थी।

 लोगों के विचार में 

 चिंतन में  जड़मूल 

 परिवर्तन।

 हिंदुओं के अंधविश्वास 

 अत्याचार,

  नये मतों के उदय।

पाश्चात्य देशों के आक्रमण।

 अंग्रेजों के षडयंत्र 

 जीविकोपार्जन अंग्रेज़ी 

 बुद्धि जीवी, प्रतिभाशाली।

 अंग्रेज़ी भाषा के पारंगत।

 वेश भूषा अंग्रेज़ों के जैसे,

 परिणाम ईसाई धर्म के प्रचार,

 देश भर में यह भ्रम,

 बगैर अंग्रेज़ी के

 भारतीय अज्ञानी।

स्वतंत्रता के होते ही

 अंग्रेज़ी देश की भाषा बनी।

 संविधान धर्म निरपेक्षता के आधार पर।

78साल में सब  वेद उपनिषद  सनातन धर्म भूल गये।

 अस्पताल में  रोग दूर करने 

बाइबिल पढ़ने लगे।

‌गली गली प्रचार में 

 बाइबिल साहित्य देने लगे।

 हिंदुओं ने करोड़ों खर्च में 

 काली देवी, गणेश की मूर्ति अति सुंदर बनाकर समुद्र में फेंकने लगे।

 करोड़ों रूपयों के देव देवियाँ,

कबंध बनकर, हाथ रहित पैर रहित ईश्वर का अपमान।

 अब धर्म ,मत माने मजहब, जाति संप्रदाय के आधार पर

 मानव मानव में  भेद भाव, राग-द्वेष।

 अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा में गर्व।

 दो हाथ जोड़कर नमस्कार भूल

 एक हाथ का सलाम। 

 धर्म और जाति की  बढती खाई,

 जीविकोपार्जन की भाषा के कारण 

गहरी होती जा रही है।

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 तीसरा संग्रह युग की पुकार के लिए ज्ञ

Friday, February 20, 2026

निस्वार्थ सेवा तटस्थ सेवा

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निस्वार्थ सेवा

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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21-2-26

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स्वार्थ निस्वार्थ 

 तटस्थ ईमानदारी 

  पूर्ण सेवा है क्या?

भूलोक में माया महादेवी,

अहंकार में फँसाकर 

 सेवा के बदले

अपनी शक्ति दिखाने

 अश्वमेध यज्ञ।

 सत्य , अहिंसा,मानवता,

दान, धर्म परोपकार दया

 मूल सिद्धांत एक।

 शैव उसमें भी वीर शैव,

वैष्णव उसमें भी राम कृष्ण।

 अल्लाह उसमें भी भेद।

 ईसा उसमें भी भेद।

अपने अपने अनुयायी,

 अपने अपने दल।

‌मतभेद के ज्ञान चक्षु प्राप्त मनुष्य में निस्वार्थ सेवा कहाँ? 

 मूल संस्थापक नेता एक।

सिद्धांत लागू करने में

 अगले चुनाव की याद में 

 शासक दल।

 उनको पतन करके 

 सत्ता पकड़ने में विपक्ष दल।

 निस्वार्थ सेवा ,

तटस्थ सेवा कहाँ।

 मानव मानव में समानता,

सही,

 बुद्धि लब्धि में 

 अंतर।

आकार गुण में अंतर।

 तन में अंतर विचार में अंतर।

 तमाशा देखिए,

 सबेरे तक नेता भ्रष्टाचारी,

स्वार्थी, देश विनाश करनेवाले,

 वहीं शाम को उस नेता की प्रशंसा में दल बदलकर शाम की सभा में भ्रष्टाचारी नेता 

 आदर्श जन सेवक,

 रिश्वत क्या है?

 भ्रष्टाचार क्या है?

 पता नहीं।

राज्यसभा सांसद बोलता है,

  सौ करोड़ है यह सांसद सम्मान।

 निस्वार्थ सेवा तटस्थ सेवा कहाँ?

 ट्यूशन के जमाने में 

 ट्यूशन शुल्क के पाते ही

 कल तक मूर्ख नालायक छात्र आज होशियार कैसे?

 भगवान के सामने अमीरों के सम्मान अलग अलग। 

 गरीब घंटों कतार पर,

 निकट जाते ही पलक झपकने के पहले बाहर।

 निस्वार्थ सेवा कहाँ?

रामायण में मंथरा,

अहंकार में रावण,

 विभीषण कुल कलंक।

 हरिश्चंद्र सत्यवादी,

उसको झूठा स्थापित करने विश्वामित्र।

 महाबली के सामने 

विष्णु का वामन रूप।

 इंद्र को शाप नहीं,

अहल्या को शाप।

 ईसा को शूली,

मुहम्मद नबी को पत्थर मार।

 मानवता भूल मजहबी लड़ाई।

मूर्ति पूजा के विरोध 

मंदिर तोड़ना।

 अपने मजहबी ग्रंथ

 मात्र श्रेष्ठ, अन्य धार्मिक 

ग्रंथों को जलाना।

 बाघ सृष्टि, 

हिरण की सृष्टि।

 बाज की सृष्टि,

 गौरैया की सृष्टि।

 मकड़ी के जाल में 

 फँसे कीड़े पर शोक,

 दुखी प्रकट करते हुए

 मानव गया कसाई की दूकान की ओर।

 कदम कदम पर विपरीत 

 अपना अपना न्याय।

 अपना अपना राग,

 अपनी अपनी डफली।

 राधा और कृष्ण प्रेम की प्रशंसा,

अपने बैठे बेटी का प्रेम विरोध।

कदम कदम पर निस्वार्थ सेवा और तटस्थ सेवा

न जाने समझ पाया।

‌यह ईश्वरीय लीला,

 सूक्ष्म व्यवहार।

विपरीत बुद्धि मिलने में 

 किसका कसर?

 निस्वार्थ सेवा कहाँ।

दो हज़ार रानियों के अंत:पुर,

 बड़े बड़े राजमहल।

 जनता गरीब बेगार गुलाम।

 निस्वार्थ सेवा, तटस्थ सेवा कहाँ।

Wednesday, February 18, 2026

भोग और कर्म

 भोग और कर्म 

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से.अनंतकृष्णन

(सेतुरामनपिताकानाम-से)

१९-२-२६

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भोग का आधार कर्म।

 सुकर्म से आनंद।

 कुकर्म से दुख।

कर्म सुख दुख के आधार 

संचित कर्म

 पूर्व जन्म कर्म

 परंपरागत कर्म

दादा दादी माता पिता के कर्म।

कर्म के अनुसार जन्म

‌ईश्वरीय संविधान में 

 सुदृढ कानून,

न उपविधि

 न पुनरावेदन 

 पुरस्कार या दंड

निश्चित है।

जन्म अमीर  के घर में 

गरीब के घर में 

 परंपरागत अधिकार

भिखारी के यहाँ जन्म

कुत्ते में भी

 गली के कुत्ते 

 अमीर के कुत्ते 

 मंडन मिश्र का तोता 

डाकू के तोता

 मिथ्या जगत में 

 नश्वर जगत में

 माया में फँसकर

क्षणिक सुख को

 स्थाई मानकर 

किये पाप अन्याय का

 मद्यपान का वेश्यागमन का

 सब का दंड  भोग

 कर्म फल का आधार।

 जन्म लेते ही  

असाध्य रोगी

 गूंगा, बहरा, अंधा

 दुर्घटना, अकालमृत्यु,

  सूक्ष्म दंड कोई नहीं जानता।

 बड़े बड़े अमीर

 इकलौता पुत्र।

 अकाल मृत्यु।

 बड़े बड़े बंगले 

 अकेले बूढ़े 

 कलियुग का दंड

 रिश्वत भ्रष्टाचार का फल

 भोगते हम देखते हैं 

 कर्म फल।

Tuesday, February 17, 2026

तिरु मंत्र

 748

सुख आनंद तुम में 

बाहर नहीं।

 बाह्य सुख अशुद्ध माया।

आंतरिक सुख शुद्ध माया।

 बाह्य सुख अस्थाई,

 मिथ्या सुख।

 वह जीवन भर दुख देनेवाला।

 मद्यपान  के सुख 

 चंद घंटों के लिए।

 नारी सुख चंद मिनटों के लिए।

 बाह्य आकर्षण 

 लौकिक माया।

 लौकिक आकर्षण 

 स्वास्थ्य बिगाड़ देता है।

 मन की चंचलता बढ़ाती है।

 एक के बाद एक  आकर्षण 

 कैसे स्थाई सुख, संभव नहीं।

 ईश्वर के ध्यान में,

 जप में , एकाग्रता में 

अनंत आनंद, 

अनंत सुख,

 न पैसे की चिंता।

 वह ब्रह्मानंद मुफ़्त में मिलता है,

वह आनंद परमानंद 

में मन भर जाता है।

 मन न तो चिंतन नहीं,

 विचारों के विकार नहीं।

 भड़कना नहीं।

 स्थाई आनंद। 

 अतः  अंतर्मुखी आनंद के लिए बाहरी आडंबर तज देना चाहिए।

ईश्वर ध्यान में 

ईश्वर खुद भक्त के सेवक बनेंगे।

 जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्यं।

 शरीर नश्वर।

 आत्मा ज्ञान आत्म सुख

 आत्मबोध ध्यान में। त्याग में, न भोग में।

 एस.अनंतकृष्णन, 

सत्संग सिरोमणी श्री मुनीश्वर शास्त्री के तिरु मंत्र गीत विचार चिंतन भाषण के आधार पर।

ॐ नमः शिवाय ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

Monday, February 16, 2026

तिरु मंत्र

 नमस्ते। 🙏

आपका प्रयास अत्यंत सराहनीय है। भाव बहुत सुंदर है। मैं प्रत्येक पद को थोड़ा शुद्ध, सरल और दार्शनिक दृष्टि से सुसंगत हिंदी में प्रस्तुत कर रहा हूँ — मूल भावना को बनाए रखते हुए।

35. मेरा मार्ग – अनोखा मार्ग

(என் வழி – தனி வழி)

मेरा मार्ग एक अद्वितीय मार्ग है।

सर्वेश्वर शिव का भी अपना एक विलक्षण मार्ग है।

हम शिव का यशोगान करेंगे।

जब शिव प्रसन्न होते हैं,

तो देवलोक, भूलोक और अष्टदिशाओं के सभी सुख प्रदान करते हैं।

और तब हम अपनी इच्छाओं को भी उनके अनुग्रह से साध सकते हैं।

टिप्पणी:

यहाँ “उनको हम अपनी इच्छाओं के अनुसार शासन करेंगे” वाक्य थोड़ा कठोर प्रतीत होता है। शिव को शासन करना नहीं, बल्कि उनके अनुग्रह से इच्छाओं की सिद्धि होना — यह भाव अधिक उपयुक्त है।

36. प्रधान (मुदल्वन्)

(முதல்வன்)

हम अपने आदि पिता,

नंदी के स्वामी,

अमृत समान अनुपम दानी,

विश्वनाथ शिव की

निष्कपट भाव से प्रार्थना करें।

यदि हम बिना भेदभाव के, शुद्ध हृदय से प्रार्थना करें,

तो निश्चय ही सर्वेश्वर का अनुग्रह प्राप्त होगा।

37.

मैं प्रतिदिन स्थिर चित्त होकर भगवान की प्रार्थना करूँगा।

वह भगवान प्रज्वलित अग्नि के समान ज्योति-स्वरूप हैं।

जैसे आकाश में चन्द्रमा शीतल प्रकाश देता है,

वैसे ही वे मेरे शरीर में निवास कर

मुझे जीवन प्रदान करते हैं।

यदि आप चाहें तो मैं इसे और अधिक काव्यात्मक शैली में भी ढाल सकता हूँ —

जैसे आपने “दैनिक काव्य साधना” में आरंभ किया है।

आपका आध्यात्मिक चिंतन दिन-प्रतिदिन अधिक गहराता जा रहा है। 🙏

विचार

 आराधिका  साहित्यिक मंच  साप्ताहिक लेखन आयोजन

वार 16-2-26 to 22-226

सोमवार 16-2-26

शीर्षक--विचार

विधा - अपनी हिंदी अपने विचार अपनी स्वतंत्र शैली  भावाभिव्यक्ति

रचना--मन है विचारों के कंद्र।

           विचाह ही ऊँचे हीरे।

           हम जो भी दृश्य देखते हैंं,

           घटना देखते हैं, 

            उनसे जो अनुभव 

           संकलन त्रय के अनुसार। 

           विचारों में क्रांति लाते हैं

           स्वतंत्रता संग्राम के नारा ---जन्म सिद्ध  अधिकार.

             आज़ाद भारत --गरीबी हटाओ।

           जनसंख्या --- हम दो,हमारे दो।

            जय जवान जय किसान।

           विचार तरंगों में

            सद्विचार सदा सुख देता है,

           भूमि पर ठहरना,आकाश पर उडना,

          उत्थान-पतन विचारों पर निर्भर

         स्वाश्रित रहना,पराश्रित रहना 

           स्वाभिमान, मर्यादा , अवमर्यादा

           मान-अपमान  विचारों पर निर्भर।

          सादा जीवव उच्च विचार 

            धर्म चिंतन,मानवता

        मनुष्य को ले जाता शिखर पर।


रचनकार का नाम :- एस. अनंतकृष्णन ,तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक के द्वारा  रचित

मौलिक स्वरचित रचना,