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Friday, September 25, 2026

भाषा का विकास

 एक भाषा जब अपनी   परंपरागत शैली से नई

शैली  अपनाता है,तभी विकास होती है।

तुलसी सूर कबीर मीरा रहीम की शैली अब नहीं।

भाषा परिवर्तन शील है।

  कर का भूतकाल रूप 

किया,किए की कीं।

 अब करा,करी का प्रयोग चलता है।

लिया लिए ली लीं  नहीं बदला।  लेया, लेयी का प्रयोग 

पी पिया  पिये पियी 

देया/देयी का प्रयोग नहीं।

 पिओ  पी इये का प्रयोग नहीं ।

दे ओ, देइए का प्रयोग नहीं।

 ऐसे परिवर्तन भी कालांतर में होगा जिससे 

विशेष अपवाद की कठिनाई से बच सकते है।

वैसे ही ने नियम।   

ने नियम के न होने पर हिंदी और भी आसान।

  सोचिए।

स्वचिं तक - अनंत कृष्णन, चेन्नै।

Thursday, September 24, 2026

बेटियाँ

 

बेटियाँ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

भारतीय इतिहास में
बेटियाँ और नारियाँ
पूजनीय रही हैं।

फिर भी इतिहास के पन्नों में
कुछ कड़वी सच्चाइयाँ भी हैं—

सती-प्रथा,
जौहर-व्रत,
बाल-विवाह,
विधवा को अपशकुन मानना,
गर्भ में शिशु लड़की हो
तो उसे मार देना,
दहेज-प्रथा—

इन कुप्रथाओं ने
नारी जीवन को
कितना पीड़ित किया!

बाल-विवाह और
अनमेल विवाह की पीड़ा
कितनी बेटियों ने सही।

धन्य हैं
समाज-सुधारक
राजा राममोहन राय जैसे महापुरुष,
जिन्होंने कुप्रथाओं के विरुद्ध
आवाज़ उठाई।

कितनी बहुएँ
दहेज के कारण
जिंदा जला दी गईं!

इतिहास में
ऐसे अनेक प्रसंग हैं
जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं।

रामायण में भी
सीता जैसी पतिव्रता पत्नी को
वन में छोड़ने का प्रसंग
आज भी अनेक प्रश्न खड़े करता है।

ये हैं
भारतीय समाज में
बेटियों और नारियों के
कुछ शंकालु और पीड़ादायक पक्ष।

पर कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

आज की नारी के
सकारात्मक पक्ष भी हैं—
शिक्षा, आत्मनिर्भरता,
साहस, अधिकार और सम्मान।

आज की बेटियाँ
ज्ञान के आकाश में उड़ रही हैं,
विज्ञान, खेल, कला, प्रशासन
और अंतरिक्ष तक
अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं।
वे चुनौतियों को अवसर बनाकर
अपने सपनों को साकार कर रही हैं
और समाज को नई दिशा दे रही हैं।

यह परिवर्तन
नारी की असीम शक्ति,
दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास की
प्रेरक कहानी है।

अगले भाग में
हम उन साहसी और सफल नारियों की
उपलब्धियों से परिचित होंगे,
जिन्होंने अपने संघर्षों से
नई राह बनाई और
अनगिनत बेटियों के लिए
आशा का दीप जलाया।

बेटियाँ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

आधुनिक युग में बेटियाँ
शिक्षित हैं,
अपने पैरों पर खड़ी हैं।

स्नातक, स्नातकोत्तर होकर
डॉक्टर, इंजीनियर,
शिक्षिका, प्राध्यापिका,
पायलट और
उच्च पदों पर आसीन होकर
अपने दायित्वों को
सुचारु रूप से निभा रही हैं।

मायके और ससुराल—
दोनों परिवारों की
आमदनी और उन्नति का
महत्त्वपूर्ण आधार बन रही हैं।

पति के बराबर शिक्षा,
पति के बराबर योग्यता,
पति के बराबर आत्मविश्वास—
आज की बेटी
भयभीत होकर जीना नहीं चाहती।

फिर भी
भारतीय संस्कृति के संस्कारों से
पति-परायणता,
ससुराल की सेवा
और परिवार के प्रति समर्पण
आज भी उसके जीवन का
महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन प्रश्न अभी भी है—
क्या बेटी सचमुच सुरक्षित है?

छह वर्ष की बच्ची से लेकर
साठ वर्ष की वृद्धा तक,
महिलाओं के विरुद्ध होने वाले
यौन अपराधों की खबरें
समाज की अंतरात्मा को
झकझोर देती हैं।

युग बदल गया,
शिक्षा बढ़ गई,
तकनीक बढ़ गई,
लेकिन नारी की सुरक्षा का प्रश्न
अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

आज विवाह के साथ
‘तलाक’ और ‘डिवोर्स’ जैसे शब्द भी
सामाजिक चर्चा का हिस्सा बन गए हैं।
कहीं विवाह का बंधन कमजोर पड़ता है,
कहीं पति-पत्नी के संबंधों में
तनाव बढ़ता है।

कभी वृद्ध कन्याओं की चिंता थी,
आज अनेक पुरुष और महिलाएँ
विवाह के बिना भी
अपना जीवन जी रहे हैं।

कहीं परिवार में
नारी का प्रभाव बढ़ा है,
तो कहीं पुरुष स्वयं को
पत्नी के निर्णयों पर निर्भर पाता है।

पर प्रश्न यह नहीं कि
कौन किसके अधीन है।

सच्चा प्रश्न यह है—
क्या पति-पत्नी एक-दूसरे के
सहयोगी हैं?

बेटियाँ आज चतुर हैं,
शिक्षित हैं,
जागरूक हैं,
आत्मनिर्भर हैं।

फिर भी
भारतीय संस्कृति के
आचार-विचार और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच
कई बेटियाँ
आज भी मानसिक दबाव और
असमानता का सामना करती हैं।

इस स्थिति को बदलने के प्रयास
साहित्य, समाज, शिक्षा और
चित्रपट—हर क्षेत्र में दिखाई देते हैं।

आज माता-पिता भी
बेटियों को बोझ नहीं,
परिवार की शक्ति मानने लगे हैं।

बेटी पढ़ती है—
तो परिवार आगे बढ़ता है।
बेटी आत्मनिर्भर होती है—
तो परिवार मजबूत होता है।
बेटी सुरक्षित रहती है—
तो समाज सुरक्षित होता है।

सुंदर निष्कर्ष

बेटी केवल किसी की बेटी नहीं,
वह किसी की बहन है,
किसी की पत्नी है,
किसी की माँ है—
और सबसे पहले
वह स्वयं एक स्वतंत्र मनुष्य है।

बेटी को दया नहीं,
सम्मान चाहिए।
बेटी को बंधन नहीं,
सुरक्षा चाहिए।
बेटी को केवल शिक्षा नहीं,
निर्भय होकर जीने का अधिकार चाहिए।

जिस घर में बेटी मुस्कुराती है,
वहीं सच्ची खुशहाली बसती है।
जिस समाज में बेटी सुरक्षित है,
वही समाज वास्तव में सभ्य है।

बेटी बचाना ही नहीं—
बेटी को पढ़ाना,
बेटी को सम्मान देना,
बेटी को समान अवसर देना
और बेटी को निर्भय जीवन देना—
यही आधुनिक भारत की
सच्ची पहचान होनी चाहिए।

बेटी बोझ नहीं,
बेटी भविष्य है।
बेटी परिवार की शान नहीं केवल—
बेटी राष्ट्र की पहचान है।


अर्द्ध सत्य का माया जाल

 अर्द्धसत्य का माया जाल।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

25-9-26.


सत्य में भी संपूर्ण सत्य

 अपूर्ण सत्य

 परिणाम अर्द्ध सत्य

 नीति नियम के विरुद्ध 

 बदनाम का पात्र।।

रामायण में वाली से न मिलकर, सचित न करके आगे में खड़े होकर 

 वध करना,

 पता नहीं चलता

 यह राम का कार्य

 पूर्ण न्याय या अपूर्ण न्याय।

 अर्द्ध सत्य का परिणाम।

 पुराणों में  अनेक उदाहरण।

 ईश्वर संबंधित कार्य में 

 सवाल करना,

 पाप या पुण्य पता नहीं,

 हर बात में अर्द्ध सत्य की छाया।

 आजकल के राजनैतिक 

नेता पक्की सड़कें बनाने का वादा करता हैं।

 सड़कें ठेके दार बनाते हैं।

 एक महीने में बनायी सड़कें गड्ढे टेढ़े मेढे होते हैं।

 उनका वचन अर्द्धसत्य ही होते हैं।

 असंभव को संभव बना लेने का वादा 

 अर्द्ध सत्य ही है।

मतदाता आदर्श प्रतिनिधि   चुनने के बजाय,

अपराधियों को चुनते हैं,

वोट के लिए नोट लेते हैं,

 यह दोनों तरफ़ से अर्द्ध सत्य है।

 हरिश्चन्द्र सत्य का पूर्ण रूप।

 उसको सत्यवादी साबित करने विश्वामित्र के कदम  सत्य को अर्द्ध सत्य ही नहीं,

 समाज सत्य बोलने डरते हैं।

  सत्य मेव जयते को

 अर्द्ध सत्य बनाने में 

 सरकारी कार्यालय, 

 वकील,

 साक्षी और विवाद के बल पर न्याय सुनानेवाली नीतिपति 

आडिटर सब सन्नद्ध है तो संसार अर्द्धसत्य पर चलता है।

 सरकार भी जनता भी। 

आज की चुनौती


अर्द्धसत्य का मायाजाल


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

25-9-26


सत्य में भी

संपूर्ण सत्य होता है,

अपूर्ण सत्य होता है।

अपूर्ण सत्य का परिणाम

अर्द्धसत्य बन जाता है,

और अर्द्धसत्य

नीति-नियमों के विरुद्ध जाकर

किसी को बदनामी का पात्र बना सकता है।


रामायण में

वाली से आमने-सामने युद्ध न करके,

पीछे से बाण चलाकर

राम द्वारा वाली का वध—

यह प्रसंग आज भी

मन में प्रश्न उठाता है।

क्या यह पूर्ण न्याय था

या अपूर्ण न्याय?


अर्द्धसत्य का परिणाम

कभी-कभी ऐसा ही

एक प्रश्नचिह्न बन जाता है।


पुराणों में भी

अर्द्धसत्य के अनेक प्रसंग मिलते हैं।

ईश्वर से संबंधित घटनाओं में भी

प्रश्न उठते हैं—

क्या यह पाप है?

या पुण्य?


हर बात पर

अर्द्धसत्य की छाया पड़ जाए

तो सत्य की पहचान

कठिन हो जाती है।


आजकल के राजनीतिक नेता

पक्की सड़कें बनाने का

वादा करते हैं।

सड़कें ठेकेदार बनाते हैं,

और कुछ ही समय में

गड्ढों और टेढ़े-मेढ़े रास्तों में

बदल जाती हैं।


तब उनका वचन

क्या पूर्ण सत्य था?


असंभव को संभव बना देने का

वादा करना भी

अर्द्धसत्य का एक रूप है।


मतदाता

आदर्श प्रतिनिधि चुनने के बजाय

कभी-कभी अपराधियों को चुनते हैं,

और कुछ लोग

वोट के बदले नोट लेते हैं।


यहाँ भी

दोनों ओर से

सत्य अधूरा रह जाता है।


राजा हरिश्चंद्र

सत्य के पूर्ण रूप के

एक महान उदाहरण माने जाते हैं।

उनके सत्य को परखने के लिए

विश्वामित्र ने अनेक कठिन परीक्षाएँ लीं।


सत्य बोलना सरल नहीं है।

सत्य के मार्ग पर चलने में

समाज और परिस्थितियाँ

अनेक बार मनुष्य को

डरा देती हैं।


“सत्यमेव जयते”

हमारा राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है।

लेकिन जब

सरकारी कार्यालय,

वकील,

साक्षी,

विवाद और

न्याय-प्रक्रिया में जुड़े लोग

सत्य को अपने-अपने ढंग से

प्रस्तुत करने लगते हैं,

तब पूर्ण सत्य

अर्द्धसत्य के जाल में

फँस जाता है।


यदि सत्य

अर्द्धसत्य बनता रहा,

तो संसार

अर्द्धसत्य के आधार पर ही

चलता रहेगा।


सरकार हो या जनता—

सत्य की रक्षा

हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।


अर्द्धसत्य केवल सत्य का अधूरा रूप नहीं,

बल्कि कई बार

सत्य को छिपाकर

अन्याय को उचित ठहराने का साधन बन जाता है।

यह किसी निर्दोष की प्रतिष्ठा छीन सकता है,

दोषी को बचा सकता है

और समाज के विश्वास की नींव हिला सकता है।


इसलिए हमें यह समझना होगा

कि सत्य का एक अंश बोलकर

शेष सत्य छिपा लेना भी

नैतिक छल है।

मौन, तोड़-मरोड़ और आधी जानकारी—

इन सबके पीछे छिपा अर्द्धसत्य

अंततः मनुष्य और समाज

दोनों को भीतर से खोखला कर देता है।


अर्द्धसत्य का मायाजाल

तभी टूटेगा,

जब हम सुविधा के अनुसार नहीं,

अंतरात्मा के अनुसार बोलेंगे;

जब सत्य को छिपाएँगे नहीं,

तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत नहीं करेंगे,

और उसके संपूर्ण रूप को

स्वीकार करने का साहस रखेंगे।

क्योंकि सत्य कठिन हो सकता है,

पर अर्द्धसत्य से जन्मा अन्याय

उससे कहीं अधिक विनाशकारी होता है।

सत्य की रक्षा केवल शब्दों से नहीं,

बल्कि ईमानदार आचरण से होती है—

और यही प्रत्येक मनुष्य का

सबसे बड़ा नैतिक दायित्व है।

मन

 [10:10 AM, 9/21/2020] Ananda Krishnan Sethurama: நமஸ்தே .वणक्कम। 

   अंतर्मन  यह मन  आत्मानुभूति ,

  ब्रह्मानंद ,सुखप्रद ,चैनप्रद। 

ऐसा एक  मन न होता ,तो 

मानव जीवन में सदा बेचैनी। 

लोभ यह चीज़ तुम्हारे घर में न होना ,

मेरे घर में होता ,अंतर्मन। 

बाहर मन दूसरा कहता।

ये भ्रष्टाचारी ,तुझे वोट न देता।

अंतर्मन कहता ,पर नमस्ते कह 

मत मांगते ही आपका ही मेरा वोट.

कहता बाहर मन। 

कर्जा लेकर न देने का बहाना मन में 

बाहर मन कहता तो क्या होता।

हाथ में माला ,मुँह  में राम 

अंतर्मन आसाराम ,प्रेमानंद। 

बाहर कहता तो जूते का मार। 

भूख दोस्त के यहाँ भोजन का वक्त 

अंतर्मन कहता खिलाता तो 

बाहर मन यही कहता अभी खाया है। 

रिश्वत देकर स्नातक ,

रिश्वत देकर अंक 

अंतर्मन बाहर प्रकट न करता।

विवशता  अंतर्मन में 

बाहरी मन लाचारी। 

कबीर ने  यों  ही बताया 

मनका मनका डारी दें ,

मन  का  मन  का फेर। .

बाह्याडम्बर काम का नहीं भक्ति में 

अंतरम…

[10:44 AM, 9/21/2020] Ananda Krishnan Sethurama: अब तो झूठ का बोलबाला है --


नमस्कार।  वणक्कम। 

 हम कहते हैं --अब तो झूठ का बोलबाला है। 

पर इनका समर्थन हम ही करते। 

यथा राजा तथा प्रजा। 

वादा न निभाया,अगले चुनाव वही वादा। 

वही शासन ,वही विधायक ,वही शासन 

हम ही मतदाता ,कहते हैं झूठ का बोलबाला।

मंदिर के आसपास नकली चन्दन ,नकली चंदनकी लकड़ी 

जानते हैं सब  चुप रहते क्यों ?

कहते हैं झूठ का बोलबाला है। 

जानते हैं भिखारी झूठा लंगड़ा ,फिर भी भीख देते हैं। 

कहते हैं झूठ का बोलबाला। 

सिंग्नल में  बच्चे सहित भीख ,

वह बच्चा न हिलता डुलता कटु धुप में भी 

कहते हैं झूठ का बोलबाला।

कोई भीख देता तो रोकना पाप। 

कहते हैं सर्वत्र झूठ का बोलबाला है। 

मंदिर दर्शन  जल्दी जाने कोई 

पहरेदार से पैसे देकर आगे जाता तो 

हम भी अनुकरण करते हैं ,रोकते नहीं 

कहते हैं झूठ का बोलबाला।

जल्दी काम होने पहले हम 

गलत रास्ते पर जाने सिफारिश की तलाश में 

कहते हैं झूठ का बोलबाला है। 

झूठ के पक्ष में ही हम 

फिर भी कहते हैं झूठ का बोलबाला है। 

जब मैं बच्चा था कहते झूठ पाप.

अब कहते हैं होशियार होनहार 

झूठ भाषण कला में वैज्ञानिक झूठ 

पता लगाना मुश्किल। 

कहते हैं झूठ का बोलबाला है। 

कृष्ण अश्वत्थामा जोर न लगाकर कुञ्जरः  जोर लगाता तो 

द्रोण  की मृत्यु न होती ,

हम कहते हैं 

हर कहीं झूठ का बोलबाला है. 

स्वरचित स्वचिंतक --एस। अनंत कृष्णन।


லலித் எம் தோகா 

 உள்மனம் , இந்த மனம் 

ஆன்ம உணர்வு ,பிரம்மானந்தம்,சுகம் தருபது  ,அமைதி தருபது .

இப்படி உள்மனம் என்று ஒன்று இல்லை என்றால் ,

மனித வாழ்க்கை எப்பொழுதுமே அமைதியின்றி இருக்கும்.

பேராசை இந்தப்பொருள்  உன் வீட்டில் இருக்கக்கூடாது .

என் வீட்டில் இருந்தால் --உள்  மனது .

வெளி மனம் சொல்வது வேறு.

இந்த ஊழல்வாதிக்கு நான் வாக்களிக்க மாட்டேன் .

என்று உல் மனம் சொல்லும் .

ஆனால் வணக்கம் என்று சொல்லி வாக்கு கேட்டதும் 

உங்களுக்கே என் வாக்கு வெளி மனம் சொல்லும் .

கடன் வாங்கி கொடுக்கவேண்டாம் என்ற சாக்குப்போக்கு உள்  மனதில் ,

வெளிமனம் இதை சொன்னால் என்ன ஆகும் .

கையில் மாலை ,சொல்வது ராமா .

உள்  மனதில் ஆசாராம் ,பிரேமானந்தா 

வெளியில் சொன்னால் செருப்படி .

பசி. நண்பன் வீட்டில் சாப்பாட்டு நேரம் 

உள்  மனம் சொல்லும் சாப்பாடு போட்டால் என்று 

வெளிமனம் சொல்லும் இப்பொழுதுதான் சாப்பிட்டிருக்கிறேன் .

லஞ்சம் அளித்து பட்டம் .லஞ்சம் கொடுத்து மதிப்பெண் 

உள்மனம் வெளியில் சொல்லவிடாது .

உள்  மனதில்  நிர்பந்தம் ,

வெளிமனம் அவசியமானது .

மாலை ஜெப மாலை போட்டுவிடு ,

மனம் சுற்றுவதை மாற்று .நிறுத்து .

வெளி ஆடம்பரம் பக்தியில் பயன் படாது .

உள்  மனதில் ஒரு மனா தியானமே பக்தி.

உள்  மன சோதனை யால்  குந்திக்கு களங்கம் .

கர்ணனின் பிறப்பு நிலையான களங்கம் .

உள்  மனத்தடை இல்லை என்றால் 

மனித வாழ்க்கை திண்சம்தோறும் அச்சமிக்கது .

அமைதியின்மை ,அதிருப்தி ,அவமானம் .

திருட்டை உள்மனம் தடுக்கவில்லை என்றால் 

மனித நிலை நிலையற்ற நிலை .

   அனந்தகிருஷ்ணன் மன வெளிப்பாட்டை ஹிந்தியில் எழுதி தமிழில் மொழிபெயர்ப்பு அதே 

அனந்தகிருஷ்ணன்.

கவிஞர்  லலிதா எம் தோகா  ललिता एम् ढोका  जी आप मुझ से तमिल सीखिए। 

अर्थ को अनर्थ न करना

Tuesday, September 22, 2026

राह के काँटे

 राह के काँटे

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।

विधा--अपनी हिंदी, अपने विचार, अपनी स्वतंत्र शैली।

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राह /मार्ग 

सही मार्ग न तो आगे बढ़ना मुश्किल।

  अड़चनें ज्यादा है तो 

 आगे बढ़ना

 उन्नति करना 

अति मुश्किल।

 पढ़ने राह के काँटे

रूपये।

एक धंधा करने रूपये।

व्यापार की प्रगति करने

 बुद्धि चातुर्य।

भगवान के ध्यान में 

चंचल मन।

 परिवार चलाने में महँगाई।

कदम कदम पर राह के काँटें।

भूख तो राह के काँटों में बड़ा।

 नाते रिश्तेदारों के प्रेम भी

 राह के काँटे।

 अविद्या, ग़रीबी,  मधुशालाएँ

 माया देवी, रोग राह के ही काँटे।

 इन सब का सामना करके 

 आगे बढने चाहिए प्रयत्न।।

ईश्वरीय अनुग्रह।

 ज्ञान दर्पण।

 एस.अनंतकृष्णन , द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


Monday, September 21, 2026

नीति का पथ

 नीति का पथ।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-9-26

++++++++

नीति का पथ,

 तटस्थ पथ।

 उस पथ पर चलने में 

 अड़चनें हैं ज्यादा।

हिम बड़े गौरीशंकर की 

चोटी पर चढ़ने के समान साँस घुटेगा।

ठंड से   राहत नहीं।

दूसरा  मार्ग भी नहीं।

काँटों से भरे पेड़ पर के

 फल निकलने के समान।

राम भी तटस्थ न रहे,

कृष्ण भी न रहे,

मंदिर के पुजारी भी नहीं।

 भगवान तटस्थ हैं क्या?

 शासकों और धन 

के अधीन  नीति पथ।

अवकाश प्राप्त न्यायाधीश का कहना है कि

सत्य न्याय शासकों  और धन के आगे डांवाडोल।।

 70% मत मिलते हैं 

४०% मत लेने पर जीत।

अल्पसंख्यकों का शासन।

 पंच तत्व ही  नीति के पथ  पर दृढ़।

[ आज की चुनौती


नीति के पथ


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

22-9-26


++++++++++++


नीति का पथ,

तटस्थता का पथ—

उस पथ पर चलना

आसान नहीं।


अड़चनें हैं बहुत,

जैसे हिम से ढकी

गौरीशंकर की चोटी पर

चढ़ते समय

हर कदम पर साँस घुटती हो।


कड़ाके की ठंड,

राहत का कोई साधन नहीं,

और पीछे लौटने का

कोई दूसरा मार्ग भी नहीं।


काँटों से भरे वृक्ष से

फल तोड़ने जैसा

कठिन है

नीति के पथ पर चलना।


राम भी हर परिस्थिति में

तटस्थ नहीं रहे,

कृष्ण भी तटस्थ नहीं रहे,

तो फिर

मंदिर का पुजारी

कैसे तटस्थ रह पाएगा?


प्रश्न उठता है—

क्या भगवान भी तटस्थ हैं?


आज नीति का पथ

कहीं-कहीं

शासन और धन

के प्रभाव में

डगमगाता दिखाई देता है।


एक अवकाशप्राप्त न्यायाधीश का कहना है—

सत्य और न्याय भी

कभी-कभी

शासन और धन के प्रभाव के सामने

डाँवाडोल हो जाते हैं।


सत्तर प्रतिशत मत

किसी एक पक्ष को मिलें,

पर चालीस प्रतिशत मतों से

जीत हो जाए—

तो प्रश्न उठता है,

क्या यह

बहुमत का शासन है

या अल्पमत की सत्ता?


फिर भी

नीति का पथ

छोड़ना नहीं चाहिए।


पंचतत्व की तरह

जो अपने स्वभाव पर

दृढ़ रहते हैं,

वैसे ही मनुष्य को भी

सत्य, न्याय और नीति पर

दृढ़ रहना चाहिए।


नीति का पथ कठिन हो सकता है,

पर वही पथ

मनुष्य को

सच्चा मनुष्य बनाता है।

Sunday, September 20, 2026

आखिरी घड़ी

 

आज की चुनौती

आखिरी घड़ी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक
21-9-26

+++++++++++++

आखिरी घड़ी!

ईश्वर की सृष्टि में
हर वस्तु और हर जीव के लिए
एक न एक दिन
आखिरी दिन और आखिरी घड़ी
निश्चित है।

अचानक आई बाढ़ में
जीवन की आखिरी घड़ी हो सकती है।

परीक्षा-केंद्र में
तीन घंटे की परीक्षा के बाद
उत्तर-पुस्तिका जमा करने की
आखिरी घड़ी आती है।

आवेदन-पत्र भेजने की
एक आखिरी तारीख होती है,
और उस तारीख की भी
एक आखिरी घड़ी होती है।

चुनाव में
नामांकन-पत्र जमा करने की
एक निर्धारित समय-सीमा होती है—
उसकी भी आती है
आखिरी घड़ी।

आरंभ है तो
अंत भी निश्चित है;
और अंत के साथ
आती है—
आखिरी घड़ी।

जन्म से मृत्यु तक
जीवन भी इसी क्रम का नाम है—

शैशव की आखिरी घड़ी,
बचपन का आरंभ।

बचपन की आखिरी घड़ी,
लड़कपन का आरंभ।

लड़कपन की आखिरी घड़ी,
जवानी का आरंभ।

जवानी की आखिरी घड़ी,
प्रौढ़ावस्था का आरंभ।

प्रौढ़ावस्था की आखिरी घड़ी,
बुढ़ापे का आरंभ।

और बुढ़ापे के अंत में
आती है वह
आखिरी घड़ी—

जब
प्राण-पखेरू
उड़ जाते हैं।

इसलिए जीवन में
हर आरंभ को सार्थक बनाना चाहिए,
हर क्षण को मूल्यवान समझना चाहिए;
क्योंकि हमें पता नहीं—
हमारी आखिरी घड़ी
कब आ जाए!