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Wednesday, August 26, 2026

महिला समाज दिवस।

 [26/08, 2:55 pm] sanantha.50@gmail.com: महिला समानता दिवस।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

महिलाएँ कितने प्रकार के हैं?

 सीता जैसे,

 द्रौपदी जैसे

 रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाएँ,

  लाल दीप क्षेत्र की वारांगनाएँ,

 राजा भर्तृहरि की रानी की तरह रखैला रखनेवाली,

 धन के लालच में 

 पति बदलनेवाली,

 ईश्वर की सृष्टि में 

 समानता कहाँ?

त्यागी भी भोगी भी।

 ज्ञानी भी अज्ञानी भी।

अति रूपवती,

 काली कलूटी कुरूप।

 कंजूसी, उदार,

 न जाने समानता कैसे?

 सब समान डाक्टर बन जाते तो नाम कौन बनती।

 सर्वशिक्षा अभियान में 

 क्या सब के सब प्रतिभाशाली हैं क्या?

मंद बुद्धिवाली भी है न?

 समान अधिकार,

 समान दहेज़ 

 फिजूलखर्ची महिला 

 फिर भी आएगी पैसे माँगने!

 मितव्यई तो संतुष्ट।

समानता कहीं भी कैसी भी लाना असंभव।

 मोटी,दुबली पतली

 शूर्पणखा जैसी कामुक्ता।

 समानता का अधिकार तो दे सकते हैं।

 संविधान में समानता कहाँ?

 अल्पसंख्यकों का अधिकार अलग।

 सूचित अनुसूचित जाति के अधिकार अलग।

 कानून तो समान अधिकार,

 सहूलियतें दे सकता है।

पर व्यवहार भिन्न।

 बास्मति चावल चावलों की राजा।

 वह और साधारण चावल में बराबरी कैसे?

 समान अधिकार देने तैयार।

 महिलाओं को ईश्वर ने कोमल बनाया है।

 गर्भधारण  उसी को करना है, न पुरुष।

ईश्वर  ईश्वरीय में 

अर्धांगिनी तो है

पर पति बराबर पत्नी नहीं।

 ईश्वर की रचना में 

 गुण में भिन्नता,

 आकार में भिन्नता।चालचलन में भिन्नता।

इन भेदों में समानता लाना  असंभव ही।

[26/08, 2:59 pm] sanantha.50@gmail.com: आज की चुनौती


महिला समानता दिवस


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई


महिलाएँ अनेक रूपों में हैं—

सीता जैसी त्यागमयी,

द्रौपदी जैसी स्वाभिमानी,

रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना,

और अपने-अपने जीवन-संघर्ष में

अनेक प्रकार की महिलाएँ।


ईश्वर की सृष्टि में

क्या सभी मनुष्य एक जैसे हैं?


कोई ज्ञानी है,

कोई अल्पज्ञानी।

कोई अत्यंत प्रतिभाशाली,

कोई सामान्य क्षमता वाला।

किसी का शरीर बलवान,

किसी का कमजोर।

किसी का स्वभाव उदार,

किसी का मितव्ययी।


फिर समानता का अर्थ क्या है?


समानता का अर्थ

यह नहीं कि सभी डॉक्टर बन जाएँ,

सभी प्रतिभाशाली बन जाएँ

या सभी का रूप और स्वभाव एक जैसा हो जाए।


समानता का वास्तविक अर्थ है—

समान सम्मान,

समान अधिकार,

समान अवसर और

समान न्याय।


संविधान हमें

कानून के सामने समानता का अधिकार देता है।

महिला हो या पुरुष,

हर व्यक्ति को

सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है।


महिलाओं को शिक्षा मिले,

रोजगार के अवसर मिलें,

निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले,

और उनके साथ

भेदभाव न हो—

यही सच्ची समानता है।


प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को

हर दृष्टि से एक जैसा नहीं बनाया।

स्त्री को मातृत्व की विशेष जिम्मेदारी मिली है।

पुरुष और स्त्री के शरीर,

भूमिकाओं और क्षमताओं में

प्राकृतिक भिन्नताएँ हो सकती हैं।


लेकिन प्राकृतिक भिन्नता

अधिकारों में असमानता का कारण नहीं बननी चाहिए।


चावल अनेक प्रकार के होते हैं—

बासमती की अपनी विशेषता है,

साधारण चावल की अपनी उपयोगिता।

दोनों एक जैसे नहीं,

पर दोनों का अपना मूल्य है।


इसी प्रकार

स्त्री और पुरुष एक जैसे नहीं,

लेकिन दोनों का मानव-मूल्य समान है।


इसलिए हमें

समानता का अर्थ

“एक जैसा बनाना” नहीं,

बल्कि

“भिन्नताओं का सम्मान करते हुए

समान अधिकार देना” समझना चाहिए।


यही सच्ची महिला समानता है।

Saturday, August 22, 2026

विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस

 वह वरिष्ठ नागरिक दिवस 

आज की चुनौती
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
23-8-26

+++++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में
वृद्धावस्था को
संन्यासी जीवन की ओर
बढ़ने का समय माना गया है।

सांसारिक मोह से दूर होकर,
केवल ईश्वर का ध्यान करते हुए,
पुत्र-पुत्री, नाते-रिश्तेदारों की
चिंताओं से मुक्त होकर,
एकांत में
मन को आत्मा में विलीन करते हुए
जीवन बिताने की कल्पना की गई है।

पर आज की लौकिक जीवन-व्यवस्था में
वृद्धावस्था की अपनी ही चिंताएँ हैं—
वृद्धाश्रम की चिंता,
भोजन की चिंता,
स्वास्थ्य और दवाइयों की चिंता।

आज अनेक वृद्ध
वृद्धाश्रमों में रहने को विवश हैं।
कहीं संतान की लापरवाही,
कहीं पुत्रों और बहुओं का उपेक्षापूर्ण व्यवहार।

माता-पिता की संपत्ति चाहिए,
लेकिन माता-पिता की
देखभाल करने की जिम्मेदारी
नहीं चाहिए!

बढ़िया भोजन तो दूर,
कभी-कभी रूखी-सूखी रोटी भी
सम्मान के साथ नहीं मिलती।

दवा लेनी है या नहीं,
चश्मा बनवाना है या नहीं,
बाल कटवाने हैं या नहीं—
इन छोटी-छोटी आवश्यकताओं पर भी
ध्यान नहीं दिया जाता।

ऐसे बेसहारे,
संतान द्वारा त्यागे गए वरिष्ठ नागरिक,
निस्संतान वृद्ध
और आर्थिक रूप से कमजोर वरिष्ठ लोग—
इन सभी के संरक्षण और सम्मान के लिए
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस
एक महत्वपूर्ण अवसर है।

वरिष्ठ नागरिक
परिवार और समाज पर बोझ नहीं हैं।
उन्होंने अपने जीवन के वर्षों में
परिवार, समाज और देश के निर्माण में
अपना योगदान दिया है।

उनके पास
जीवन का अनुभव है,
ज्ञान है,
संघर्षों की कहानी है,
और आने वाली पीढ़ियों के लिए
बहुमूल्य मार्गदर्शन है।

इसलिए इस दिवस का उद्देश्य केवल
एक दिन वरिष्ठ नागरिकों को याद करना नहीं,
बल्कि उनके आजीवन योगदान,
अनुभव और ज्ञान का सम्मान करना है।

वृद्ध नागरिकों की सेवा करें,
उनका सम्मान करें,
उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखें,
और उन्हें प्रेम तथा आत्मसम्मान के साथ
जीवन जीने का अवसर दें।

वरिष्ठ नागरिकों की सेवा
केवल हमारा कर्तव्य नहीं,
हमारी संस्कृति और मानवता की पहचान है।

एक दिन हम भी वृद्ध होंगे—
आज उन्हें जो सम्मान देंगे,
कल वही सम्मान
हमें भी मिलेगा।

नोट: विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस प्रत्येक वर्ष 21 अगस्त को मनाया जाता है।

Thursday, August 20, 2026

सद्भावना दिवस


आज की चुनौती

सद्भावना दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

21-8-26

+++++++++++++

भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है।

यहाँ प्रत्यक्ष रूप में

विविधता दिखाई देती है—

प्राकृतिक विविधता,

मजहबी विविधता,

भाषाई विविधता,

सांस्कृतिक विविधता।

इन विविधताओं के बावजूद

विचारों की एकता,

राष्ट्रीय भावना,

भाईचारा और राष्ट्रप्रेम

भारत को एक सूत्र में बाँधते हैं।

आसेतु हिमाचल तक

एकता और सद्भावना को मजबूत करने के लिए

हर वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री

स्वर्गीय राजीव गांधीजी के जन्मदिन

“सद्भावना दिवस” के रूप में

मनाया जाता है।

भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराएँ

और सनातन चिंतन

आसेतु हिमाचल

एकता और सह-अस्तित्व की भावना को

मजबूत करने में अपना योगदान देते आए हैं।

भारत की संस्कृति की विशेषता है—

अनेक धर्म, अनेक भाषाएँ,

अनेक परंपराएँ होते हुए भी

एक-दूसरे के प्रति सम्मान और

सह-अस्तित्व की भावना।

तमिलनाडु में भी

विभिन्न धार्मिक परंपराओं में

स्थानीय सांस्कृतिक प्रभाव दिखाई देते हैं।

कई गिरिजाघरों में

रथयात्रा जैसी स्थानीय परंपराएँ

और चर्चों में ध्वजस्तंभ

भारतीय सांस्कृतिक समन्वय की

सुंदर झलक प्रस्तुत करते हैं।

सद्भावना दिवस के अवसर पर

सरकारी कार्यालयों और संस्थानों में

राष्ट्रीय एकता और सद्भावना की

शपथ दिलाई जाती है।

आज के समय में

क्षेत्रीय राजनीति और

विभिन्न राजनीतिक मतभेदों के कारण

नीट, नवोदय विद्यालय और

राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे विषयों पर

विभिन्न राज्यों में अलग-अलग विचार

सामने आते हैं।

मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं,

लेकिन मतभेदों के कारण

मनभेद नहीं होना चाहिए।

राष्ट्रीय एकता,

भाईचारा,

राष्ट्रप्रेम और सद्भावना को बढ़ाना

आज समय की माँग है।

आइए, सद्भावना दिवस पर

हम केवल शपथ ही न लें,

बल्कि अपने व्यवहार में भी

सद्भावना को अपनाएँ।

विविधता हमारी शक्ति है,

एकता हमारी पहचान है,

और सद्भावना हमारे राष्ट्र की

सबसे बड़ी आवश्यकता है।

Wednesday, August 19, 2026

नेकी की छाँव

 नेकी की छाँव।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

20-8-26

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नेक रहना श्रेष्ठ है।

 नेकी की छाँव में 

 रहना हिफाजत है।

 संगति का फल

 भलाई में है।

 

 हमें ज़रूरत के समय मदद करनेवाले हमारे लिए सज्जन हैं।

सज्जनता में धर्म है, 

परोपकार है,सत्य है।


भलाई करने पर

 हमारे दायरे में नाम मिलेगा।

 दोस्ती मिलेगी।

हम समाज के 

विश्वास पात्र बनेंगे।

बुराई करने पर

 हमारा मन  बेचैन होगा।

 भलाई करने पर चैन की नींद सोएँगे।

मानसिक हलचल न होगा।

 शांति मिलेगी।

 ईश्वर का अनुग्रह मिलेगा।

 नेकी की छाया 

 संतोष देगी।

बद विचार 

सद विचार में बदलेगा।

 सदाबहार है 

नेकी की छाँव में।





Tuesday, August 18, 2026

सुभाष चंद्र बोस

 नेता जी सुभाष चंद्र बोस 

एस. अनंतकृष्णन चेन्नई 

19-8-26

++++++++++

भारत के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम के नेता,

 स्वाभिमानी ऐएएस उत्तीर्ण होकर भी

 अंग्रेज़ी सरकार के अधीन नौकरी करने से मना कर दिया।

 कांग्रेस के नेता चुने जाने पर भी,

 कांग्रेस से मत भेद होकर,

 आज़ाद हिन्द सेना  की स्थापना की।

 उन्होंने  घोषणा की कि

 मुझे खून दो,

मैं देश को आज़ाद दूँगा।

उनकी सेना में  

आ सेतु हिमाचल से

 सभी देश भक्त वीर 

भाग लेने आये।

 उस महान वीर सेनानी 

 जर्मन गये ।

 हिटलर से मिले।

 जापान आये।

सैना को आज्ञा दी दिल्ली चलो।

 ऐसे वीर  नेता के 

 पक्ष में  मोहन दास करमचंद गांधीजी नहीं थे।

  कांग्रेस के नेता चुने 

जाने पर भी बोस 

गांधीजी के कारण  नेता न बने।

उन्होंने फार्वेडब्लाक  की स्थापना की।

 देश के लिए  वीर धीर 

साहसी   नेता  का स्वर्गवास 

 विमान दुर्घटना में हो गया।

 पर जनता को इस पर विश्वास नहीं है।।

अनेक लोगों का विश्वास है कि

वै आज़ादी के बाद भी जिंदा रहे।

 ऐसे महान नेता को‍ वीर सलाम।

वीर वणक्कम्।








 

 


 

 

 

 

 

 


 


   

 


Sunday, August 16, 2026

 

आज की चुनौती

अंधविश्वास का जाल

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

17-8-26

++++++++++

अंधविश्वास का जाल
मनुष्य को भय में बाँधता है।

माता-पिता,
दादा-दादी भी कभी-कभी
बच्चों को भय दिखाकर
अनजाने में अंधविश्वास फैलाते हैं—

“आधी रात बाहर मत जाना,
इमली के पेड़ पर भूत रहता है!”

ऐसी बातें
बालमन में भय पैदा करती हैं।

बिल्ली का रास्ता काटना,
विधवा का सामने आना,
अकेले किसी ब्राह्मण का सामने आना—
इन सबको अपशकुन मानना
किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है।

सर्पदोष जैसे भय भी
कई बार लोगों की अज्ञानता और चिंता का
लाभ उठाने का माध्यम बन जाते हैं।

अंधविश्वास
एक मनोवैज्ञानिक भय है।
जिसके पीछे
प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं होता।

अंधविश्वास
अज्ञानता बढ़ाता है,
मनुष्य को भयभीत करता है,
उसकी आत्मशक्ति को कमजोर करता है।

कुछ आश्रमों में
आचार्य दीक्षा देकर
ईश्वर-दर्शन का वादा करते हैं।
लोग दीक्षा-शुल्क भी देते हैं।
लेकिन प्रश्न यह है—
क्या उन सभी को
ईश्वर के दर्शन हुए?

राहुकाल, यमगंड आदि का
अनावश्यक भय दिखाकर
मनुष्य को अपने कर्म से विमुख करना
कहाँ तक उचित है?

तमिल में एक सुंदर भाव है—

“भगवान साथ हैं,
उनका अनुग्रह है,
तो दिन, ग्रह और नक्षत्र
कुछ नहीं कर सकते।”

अंधविश्वास
केवल एक मायाजाल है।
यह मनुष्य को भय दिखाकर
बलहीन बनाता है।

विवेकहीन भय
मनुष्य की शक्ति को छीन लेता है।
आलस्य और अज्ञान
उसकी उन्नति में बाधक बनते हैं।

सच्चा ईश्वर-भक्त
ईश्वर पर विश्वास रखेगा,
लेकिन अंधविश्वास पर नहीं।

ईश्वर में श्रद्धा रखें,
लेकिन विवेक को न छोड़ें।
प्रार्थना करें,
परिश्रम करें,
सत्य को प्रमाण से परखें—
यही अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग है।

Saturday, August 15, 2026

திருமந்திரம். श्रीमंत्र

 உள்ளம் பெருங்கோயில் ஊனுடம் பாலையம்

வள்ளற் பிரானார்க்கு வாய்கோ புரவாசல்
தெள்ளித் தெளிந்தார்க்குச் சீவன் சிவலிங்கங்
கள்ளப் புலனைந்துங் காளா விளக்கே."
(பாடல் எண்: 1823)

उळ्ळम्  पेरुम कोयिल ऊनुडंबालैयम्
वळ्ळल्  पिरानार्क्कु वाय गोपुरवासल्
तॆळ्ळित् तॆळिंतारुक्कु जीवन  शिवलिंगंकळ्ळप्पुलनैंतुंकाळा विळक्के।
(तिरुमंत्र 1823)

उळ्ळम --मन
पेरुम कोयिल  =भगवान बसा बडा मंदिर 
ऊनुडंबु आलयम् =इस माँस का शरीर उस मंदिर की इमारत है।
वाय गोपुरम वासल =मुख गोपुरम द्वार है
जीवन शिवलिंग ==स्पष्ट ज्ञानी को हमारे प्राण ही शिवलिंग है।
 कळ्ळप्पुलनैंदुम  काळा मणिविळक्कु = हानियाँ पहुँचानेवाली पंचेंद्रियाँ मणि दीप होते हैं।

  मानव मन ही ईश्वर बसा एक बड़ा मंदिर है।इस 
माँस का शरीर उस मंदिर की इमारत है। मुख गोपूर का द्वार  है।  स्पष्ट ज्ञानियों के लिए हानियाँ पहुँचानेवाली 
पंचेंद्रियाँ ही मणि दीप होते हैं।