आज की चुनौती
संस्कारों की पूँजी
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
7-11-2026
आध्यात्मिक भूमि भारत में
संस्कारों की कमी नहीं है।
जीवन के विभिन्न चरणों में
संस्कारों का विशेष महत्त्व है।
संस्कारों का उद्देश्य है
मानसिक और शारीरिक शुद्धीकरण,
अनुशासन एवं सदाचरण,
आदर्श चरित्र का निर्माण।
ज्ञान और आत्मज्ञान प्राप्त कर
आत्मसम्मान के साथ
सिर ऊँचा करके चलना,
सीना तानकर जीवन जीना।
मायामय इस संसार में
आकर्षण और प्रलोभन अनेक हैं।
क्षणभंगुर आनंद की चाह में
मनुष्य भटक जाता है।
वेश्यागमन और मदिरालय गमन,
भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी,
क्षणिक सुख और तात्कालिक लाभ के लिए
नैतिक मूल्यों का पतन होता है।
संस्कार क्या है?
संस्कार अर्थात् संवारना,
परिष्कृत करना और सुधारना।
यह मानसिक, नैतिक
एवं आध्यात्मिक प्रशिक्षण की प्रक्रिया है।
कर्तव्य का पालन,
सत्य का आचरण,
वचन का निर्वाह,
सहकारिता और परोपकार,
इनसे मानवता का विकास होता है।
भारतीय परंपरा के सोलह संस्कार
भारतीय प्राचीन ग्रंथों में
जीवन के सोलह संस्कारों का उल्लेख मिलता है।
1. गर्भाधान
2. पुंसवन
3. सीमन्तोन्नयन
4. जातकर्म
5. नामकरण
6. निष्क्रमण
7. अन्नप्राशन
8. चूड़ाकर्म
9. कर्णवेध
10. विद्यारंभ
11. उपनयन (यज्ञोपवीत)
12. वेदारंभ
13. केशांत
14. समावर्तन
15. विवाह
16. अन्त्येष्टि
ये संस्कार जीवन के विभिन्न पड़ावों पर
धर्म, कर्तव्य, सदाचार और परोपकार
की भावना विकसित करने के प्रतीक हैं।
संक्षेप में,
संस्कारों का अंतिम उद्देश्य
मानवता का निर्वाह करना है।
संस्कार ही मानव जीवन की सच्ची पूँजी हैं।
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।
युवा पीढ़ी को भारतीय महानता जान समझनी चाहिए।