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Saturday, February 21, 2026

धर्म और जाति की बढती खाई

 धर्म और जाति की बढती खाई।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

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धर्म  व्यापक।

 मानवता के प्रतीक।

 दान-धर्म, सहानुभूति,

 त्याग सत्य अहिंसा 

‌भलमानसाहस

 यही धर्म।

 भारतीय सनातन धर्म।

 भगवान की दी हुई क्षमता, संपत्ति से संतोष।

 सर्व लौकिक सुख अस्थाई की सीख।

 कालांतर में धर्म का व्यापक रूप, संकुचित रूप में बदलने लगा।

धर्म से नीचे गिरकर 

 मत मतांतरण का जन्म हुआ।

 धार्मिक महान लोग।

 वशिष्ठ के ब्रह्म ऋषि से 

जलकर 

 विश्वामित्र का शपथ।

दुर्वासा का क्रोध।

 भक्त कवियों में 

 अलग अलग संप्रदाय।

मुगलों के शासन काल,

 आश्रयहीन कवियों ने

भगवान का शरण लिया।

 संप्रदाय उत्पन्न होने लगे।

 कबीर पंथ, जायसी पंथ।

 तुलसी पंथ, सूर पंथ।

संप्रदाय के पिछलग्गू 

 सनातन धर्म के वर्णाश्रम।

 उच्च नीच के भेद।

  प्राचीन  जमाने में,

भुजबल, धन बल,  तनबल,  बुद्धि बल

 के आधार पर विवाह।

कालांतर में  केवल जाति और जन्मकुंडली के आधार पर।

 कबीर जैसे वाणी के डिक्टेटर ने   मजहबी एकता पर जोर दिया।

 कुरान पढ़ें वेद पढ़ें

‌खुदा को न जाना न पहचाना।

माया महा ठगनी,

 वशिष्ठ के शुभ मूहूर्त निश्चित।

 पर सीता दुखी थी।

 लोगों के विचार में 

 चिंतन में  जड़मूल 

 परिवर्तन।

 हिंदुओं के अंधविश्वास 

 अत्याचार,

  नये मतों के उदय।

पाश्चात्य देशों के आक्रमण।

 अंग्रेजों के षडयंत्र 

 जीविकोपार्जन अंग्रेज़ी 

 बुद्धि जीवी, प्रतिभाशाली।

 अंग्रेज़ी भाषा के पारंगत।

 वेश भूषा अंग्रेज़ों के जैसे,

 परिणाम ईसाई धर्म के प्रचार,

 देश भर में यह भ्रम,

 बगैर अंग्रेज़ी के

 भारतीय अज्ञानी।

स्वतंत्रता के होते ही

 अंग्रेज़ी देश की भाषा बनी।

 संविधान धर्म निरपेक्षता के आधार पर।

78साल में सब  वेद उपनिषद  सनातन धर्म भूल गये।

 अस्पताल में  रोग दूर करने 

बाइबिल पढ़ने लगे।

‌गली गली प्रचार में 

 बाइबिल साहित्य देने लगे।

 हिंदुओं ने करोड़ों खर्च में 

 काली देवी, गणेश की मूर्ति अति सुंदर बनाकर समुद्र में फेंकने लगे।

 करोड़ों रूपयों के देव देवियाँ,

कबंध बनकर, हाथ रहित पैर रहित ईश्वर का अपमान।

 अब धर्म ,मत माने मजहब, जाति संप्रदाय के आधार पर

 मानव मानव में  भेद भाव, राग-द्वेष।

 अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा में गर्व।

 दो हाथ जोड़कर नमस्कार भूल

 एक हाथ का सलाम। 

 धर्म और जाति की  बढती खाई,

 जीविकोपार्जन की भाषा के कारण 

गहरी होती जा रही है।

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 तीसरा संग्रह युग की पुकार के लिए ज्ञ

Friday, February 20, 2026

निस्वार्थ सेवा तटस्थ सेवा

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निस्वार्थ सेवा

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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21-2-26

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स्वार्थ निस्वार्थ 

 तटस्थ ईमानदारी 

  पूर्ण सेवा है क्या?

भूलोक में माया महादेवी,

अहंकार में फँसाकर 

 सेवा के बदले

अपनी शक्ति दिखाने

 अश्वमेध यज्ञ।

 सत्य , अहिंसा,मानवता,

दान, धर्म परोपकार दया

 मूल सिद्धांत एक।

 शैव उसमें भी वीर शैव,

वैष्णव उसमें भी राम कृष्ण।

 अल्लाह उसमें भी भेद।

 ईसा उसमें भी भेद।

अपने अपने अनुयायी,

 अपने अपने दल।

‌मतभेद के ज्ञान चक्षु प्राप्त मनुष्य में निस्वार्थ सेवा कहाँ? 

 मूल संस्थापक नेता एक।

सिद्धांत लागू करने में

 अगले चुनाव की याद में 

 शासक दल।

 उनको पतन करके 

 सत्ता पकड़ने में विपक्ष दल।

 निस्वार्थ सेवा ,

तटस्थ सेवा कहाँ।

 मानव मानव में समानता,

सही,

 बुद्धि लब्धि में 

 अंतर।

आकार गुण में अंतर।

 तन में अंतर विचार में अंतर।

 तमाशा देखिए,

 सबेरे तक नेता भ्रष्टाचारी,

स्वार्थी, देश विनाश करनेवाले,

 वहीं शाम को उस नेता की प्रशंसा में दल बदलकर शाम की सभा में भ्रष्टाचारी नेता 

 आदर्श जन सेवक,

 रिश्वत क्या है?

 भ्रष्टाचार क्या है?

 पता नहीं।

राज्यसभा सांसद बोलता है,

  सौ करोड़ है यह सांसद सम्मान।

 निस्वार्थ सेवा तटस्थ सेवा कहाँ?

 ट्यूशन के जमाने में 

 ट्यूशन शुल्क के पाते ही

 कल तक मूर्ख नालायक छात्र आज होशियार कैसे?

 भगवान के सामने अमीरों के सम्मान अलग अलग। 

 गरीब घंटों कतार पर,

 निकट जाते ही पलक झपकने के पहले बाहर।

 निस्वार्थ सेवा कहाँ?

रामायण में मंथरा,

अहंकार में रावण,

 विभीषण कुल कलंक।

 हरिश्चंद्र सत्यवादी,

उसको झूठा स्थापित करने विश्वामित्र।

 महाबली के सामने 

विष्णु का वामन रूप।

 इंद्र को शाप नहीं,

अहल्या को शाप।

 ईसा को शूली,

मुहम्मद नबी को पत्थर मार।

 मानवता भूल मजहबी लड़ाई।

मूर्ति पूजा के विरोध 

मंदिर तोड़ना।

 अपने मजहबी ग्रंथ

 मात्र श्रेष्ठ, अन्य धार्मिक 

ग्रंथों को जलाना।

 बाघ सृष्टि, 

हिरण की सृष्टि।

 बाज की सृष्टि,

 गौरैया की सृष्टि।

 मकड़ी के जाल में 

 फँसे कीड़े पर शोक,

 दुखी प्रकट करते हुए

 मानव गया कसाई की दूकान की ओर।

 कदम कदम पर विपरीत 

 अपना अपना न्याय।

 अपना अपना राग,

 अपनी अपनी डफली।

 राधा और कृष्ण प्रेम की प्रशंसा,

अपने बैठे बेटी का प्रेम विरोध।

कदम कदम पर निस्वार्थ सेवा और तटस्थ सेवा

न जाने समझ पाया।

‌यह ईश्वरीय लीला,

 सूक्ष्म व्यवहार।

विपरीत बुद्धि मिलने में 

 किसका कसर?

 निस्वार्थ सेवा कहाँ।

दो हज़ार रानियों के अंत:पुर,

 बड़े बड़े राजमहल।

 जनता गरीब बेगार गुलाम।

 निस्वार्थ सेवा, तटस्थ सेवा कहाँ।

Wednesday, February 18, 2026

भोग और कर्म

 भोग और कर्म 

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से.अनंतकृष्णन

(सेतुरामनपिताकानाम-से)

१९-२-२६

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भोग का आधार कर्म।

 सुकर्म से आनंद।

 कुकर्म से दुख।

कर्म सुख दुख के आधार 

संचित कर्म

 पूर्व जन्म कर्म

 परंपरागत कर्म

दादा दादी माता पिता के कर्म।

कर्म के अनुसार जन्म

‌ईश्वरीय संविधान में 

 सुदृढ कानून,

न उपविधि

 न पुनरावेदन 

 पुरस्कार या दंड

निश्चित है।

जन्म अमीर  के घर में 

गरीब के घर में 

 परंपरागत अधिकार

भिखारी के यहाँ जन्म

कुत्ते में भी

 गली के कुत्ते 

 अमीर के कुत्ते 

 मंडन मिश्र का तोता 

डाकू के तोता

 मिथ्या जगत में 

 नश्वर जगत में

 माया में फँसकर

क्षणिक सुख को

 स्थाई मानकर 

किये पाप अन्याय का

 मद्यपान का वेश्यागमन का

 सब का दंड  भोग

 कर्म फल का आधार।

 जन्म लेते ही  

असाध्य रोगी

 गूंगा, बहरा, अंधा

 दुर्घटना, अकालमृत्यु,

  सूक्ष्म दंड कोई नहीं जानता।

 बड़े बड़े अमीर

 इकलौता पुत्र।

 अकाल मृत्यु।

 बड़े बड़े बंगले 

 अकेले बूढ़े 

 कलियुग का दंड

 रिश्वत भ्रष्टाचार का फल

 भोगते हम देखते हैं 

 कर्म फल।

Tuesday, February 17, 2026

तिरु मंत्र

 748

सुख आनंद तुम में 

बाहर नहीं।

 बाह्य सुख अशुद्ध माया।

आंतरिक सुख शुद्ध माया।

 बाह्य सुख अस्थाई,

 मिथ्या सुख।

 वह जीवन भर दुख देनेवाला।

 मद्यपान  के सुख 

 चंद घंटों के लिए।

 नारी सुख चंद मिनटों के लिए।

 बाह्य आकर्षण 

 लौकिक माया।

 लौकिक आकर्षण 

 स्वास्थ्य बिगाड़ देता है।

 मन की चंचलता बढ़ाती है।

 एक के बाद एक  आकर्षण 

 कैसे स्थाई सुख, संभव नहीं।

 ईश्वर के ध्यान में,

 जप में , एकाग्रता में 

अनंत आनंद, 

अनंत सुख,

 न पैसे की चिंता।

 वह ब्रह्मानंद मुफ़्त में मिलता है,

वह आनंद परमानंद 

में मन भर जाता है।

 मन न तो चिंतन नहीं,

 विचारों के विकार नहीं।

 भड़कना नहीं।

 स्थाई आनंद। 

 अतः  अंतर्मुखी आनंद के लिए बाहरी आडंबर तज देना चाहिए।

ईश्वर ध्यान में 

ईश्वर खुद भक्त के सेवक बनेंगे।

 जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्यं।

 शरीर नश्वर।

 आत्मा ज्ञान आत्म सुख

 आत्मबोध ध्यान में। त्याग में, न भोग में।

 एस.अनंतकृष्णन, 

सत्संग सिरोमणी श्री मुनीश्वर शास्त्री के तिरु मंत्र गीत विचार चिंतन भाषण के आधार पर।

ॐ नमः शिवाय ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

Monday, February 16, 2026

तिरु मंत्र

 नमस्ते। 🙏

आपका प्रयास अत्यंत सराहनीय है। भाव बहुत सुंदर है। मैं प्रत्येक पद को थोड़ा शुद्ध, सरल और दार्शनिक दृष्टि से सुसंगत हिंदी में प्रस्तुत कर रहा हूँ — मूल भावना को बनाए रखते हुए।

35. मेरा मार्ग – अनोखा मार्ग

(என் வழி – தனி வழி)

मेरा मार्ग एक अद्वितीय मार्ग है।

सर्वेश्वर शिव का भी अपना एक विलक्षण मार्ग है।

हम शिव का यशोगान करेंगे।

जब शिव प्रसन्न होते हैं,

तो देवलोक, भूलोक और अष्टदिशाओं के सभी सुख प्रदान करते हैं।

और तब हम अपनी इच्छाओं को भी उनके अनुग्रह से साध सकते हैं।

टिप्पणी:

यहाँ “उनको हम अपनी इच्छाओं के अनुसार शासन करेंगे” वाक्य थोड़ा कठोर प्रतीत होता है। शिव को शासन करना नहीं, बल्कि उनके अनुग्रह से इच्छाओं की सिद्धि होना — यह भाव अधिक उपयुक्त है।

36. प्रधान (मुदल्वन्)

(முதல்வன்)

हम अपने आदि पिता,

नंदी के स्वामी,

अमृत समान अनुपम दानी,

विश्वनाथ शिव की

निष्कपट भाव से प्रार्थना करें।

यदि हम बिना भेदभाव के, शुद्ध हृदय से प्रार्थना करें,

तो निश्चय ही सर्वेश्वर का अनुग्रह प्राप्त होगा।

37.

मैं प्रतिदिन स्थिर चित्त होकर भगवान की प्रार्थना करूँगा।

वह भगवान प्रज्वलित अग्नि के समान ज्योति-स्वरूप हैं।

जैसे आकाश में चन्द्रमा शीतल प्रकाश देता है,

वैसे ही वे मेरे शरीर में निवास कर

मुझे जीवन प्रदान करते हैं।

यदि आप चाहें तो मैं इसे और अधिक काव्यात्मक शैली में भी ढाल सकता हूँ —

जैसे आपने “दैनिक काव्य साधना” में आरंभ किया है।

आपका आध्यात्मिक चिंतन दिन-प्रतिदिन अधिक गहराता जा रहा है। 🙏

विचार

 आराधिका  साहित्यिक मंच  साप्ताहिक लेखन आयोजन

वार 16-2-26 to 22-226

सोमवार 16-2-26

शीर्षक--विचार

विधा - अपनी हिंदी अपने विचार अपनी स्वतंत्र शैली  भावाभिव्यक्ति

रचना--मन है विचारों के कंद्र।

           विचाह ही ऊँचे हीरे।

           हम जो भी दृश्य देखते हैंं,

           घटना देखते हैं, 

            उनसे जो अनुभव 

           संकलन त्रय के अनुसार। 

           विचारों में क्रांति लाते हैं

           स्वतंत्रता संग्राम के नारा ---जन्म सिद्ध  अधिकार.

             आज़ाद भारत --गरीबी हटाओ।

           जनसंख्या --- हम दो,हमारे दो।

            जय जवान जय किसान।

           विचार तरंगों में

            सद्विचार सदा सुख देता है,

           भूमि पर ठहरना,आकाश पर उडना,

          उत्थान-पतन विचारों पर निर्भर

         स्वाश्रित रहना,पराश्रित रहना 

           स्वाभिमान, मर्यादा , अवमर्यादा

           मान-अपमान  विचारों पर निर्भर।

          सादा जीवव उच्च विचार 

            धर्म चिंतन,मानवता

        मनुष्य को ले जाता शिखर पर।


रचनकार का नाम :- एस. अनंतकृष्णन ,तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक के द्वारा  रचित

मौलिक स्वरचित रचना,

Saturday, February 14, 2026

शिवरात्रि

 शिव रात्रि 

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 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई 

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

15-2-26

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शिव विश्वनाथ, लोकनाथ।

निराकार आकार

मेक्का में भी वही रूप।

 वेटिकन सिटी  में भी 

शिव के आकार।

आ सेतु हिमाचल  की

आध्यात्मिक एकता 

शिव भगवान के नाम से

 अक्षुण्ण है।

 काशी रामेश्वर 

  शैव वैष्णव दोनों की 

एकता के आधार।।

तमिल में नारा है

 दक्षिण के शिव की जय।

देश देश के शिव की जय।

 कैलाश से कार्तिक शिवपुत्र दक्षिण आये,

वे बन गए तमिल भगवान।

 भारतीय  एकता के सूत्र धारी ‌शिव।

 पुण्य कमाने काशी जाने के पहले  

रामेश्वर जाना शास्त्र नियत सत्य है।

शिव शक्ति की महिमा अनंत।

 आदि शिव  अपनी शक्ति माया 

द्वारा संसार  को दुखी बनाकर 

‌लोगों को  अपनी ओर 

 ध्यान मग्न कराते हैं।

 महान शिव की आराधना

  फाल्गुन महीने में।

  15-2-26 महाशिवरात्रि।


 व्रत  पद्धति 

 शिवरात्रि के दिन सबेरे से 

दूसरे दिन के सबेरे तक

  उपवास रखते हैं।

रात भर शिव नाम जपा करते हैं।

 मंदिरों में पूजा 

 रात भर मेला लगता है।

 चार काल  पूजा करते हैं।

अभिषेक आराधना करते हैं।

 भक्ति पूर्ण वातावरण में 

शिव नाम जपकर 

  शिव के अनुग्रह  के पात्र बनते हैं।

 तमिलनाडु के शिव क्षेत्र में 

रात भर जागकर 

 शिव  का यशोगान करते हैं।

फाल्गुन महीने चतुर्थी तिथि में 

 एक शिकारी रात भर

 बिल्व पेड़ पर बैठकर 

बिल्वपत्र तोड़कर

 एक एक करके नीचे डालता रहा।

पेड़ के नीचे ‌शिवलिंग था।

 उसके है अज्ञान के

 इस कार्य शिव प्रसन्न हुए।

सुबह तक वह  बिल्र्चव पत्र  डालता रहा।

अनजान अर्चना  शिव प्रसन्न।

वह दिन फाल्गुन महीने 

चतुर्दशी में मनाया जाता है।

देव असुर समुद्र मंथन में 

 जो विषय निकला, उसे 

‌शिव ने पिया।

शिव और पार्वती का विवाह हुआ।

अनेक कहानियां।

हरि अंत हरि कथा अनंत।

जो भी हो,

 मानव मन में 

 शिवरात्रि शिवाराधना 

 मनोवांछित फल प्राप्त करने का मार्ग है।