नमस्ते वणक्कम्।
स्वयं की खोज
++++++++++
मनुष्य ही इस प्रपंच के
सुखी जीवन के भोगी
और दुख भोगी।
इतना ही नहीं,
उसके सूक्ष्म बुद्धि
जिज्ञासु
आत्म ज्ञान ही
आविष्कारों की देन।
नसीहतों की देन।
मनुष्य ही सोच विचार
करके अपने को
सज्जन, सभ्य, सांस्कृतिक
जीवन को प्रभावित कर सकता है।
सब में ऐसे आविष्कार करने की बुद्धि नहीं।
क्षमता नहीं।
अपने दायरे में
अपने को श्रेष्ठ बनाना है तो
स्वयं की खोज करनी चाहिए।
मैं कौन हूँ?
मेरी अपनी क्षमता क्या है?
प्रपंच क्या है?
प्रपंच में राग द्वेष क्यों ?
जन्म मरण क्यों?
भाग्य दुर्भाग्य क्यों?
भगवान संसार की सृष्टि कर्ता है
तो माता पिता
के द्वारा हमारा जन्म क्यों?
मनुष्य मनुष्य में गुण भेद
रंग भेद
सोच विचार में अंतर क्यों?
बुद्धि लब्धि में भिन्नता क्यों?
अमीरी गरीबी
स्वार्थ निस्वार्थ क्यों?
अल्प आयु क्यों?
साध्य योग असाध्य रोग क्यों?
मानवेत्तर एक शक्ति है तो
उस शक्ति के सामने सब ड्रायर है तो भेद भाव के गुण क्यों?
असंख्य प्रश्न मानव जीवन में?
जन्म मृत्यु रोग रहित
मानव जीवन क्यों नहीं।
जन्म का उद्देश्य क्या है?
प्राकृतिक संतुलन क्यों नहीं?
मानव की इस अपनी खोज में
आध्यात्मिक महत्व है।
वैज्ञानिक महत्व है।
आत्मोन्नति आत्मज्ञान जानना ही
स्वयं खोज करने का परिणाम।
महावीर, बुद्ध, ऋषि मुनि
स्वयं की खोज में
मानव कल्याण का मार्ग दिखाया।
जितेंद्रिय बनने
सत्यवादी बनने
मानवेत्तर शक्ति कै दर्शन के लिए
ध्यान तपस्या का मार्ग
अहिंसा
प्यार द्वेष रहित
तटस्थ जीवन
पाप पुण्य के परिणाम
दुख के कारण।
कबीर हठयोगी
अपने बारे में
स्वयं की खोज में कहते हैं
बुरा जो देखन मैं गया,
बुरा नमिलिया कोई
जो दिल खोजा आपना
मुझसे बुरा न कोई।
आत्म चिंतन आत्म विचार
मानव को श्रैष्ठ बनाता है।
स्वयं की खोज में
मानव अहम् ब्रह्मास्मी
बन सकता है।
अद्वैत भावना जगाती है।
लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल।
लाली देखन मैं गयी,
मैं भी होगयी लाल।
सुधारात्मक रूप
नमस्ते वணक्कम्।
आपकी रचना में गहन चिंतन और आध्यात्मिक जिज्ञासा है। मैंने इसे काव्यमय, प्रवाहपूर्ण और थोड़ा अधिक छंदबद्ध रूप देने का प्रयास किया है — भाव वही रखते हुए भाषा को और मधुर बनाया है:
स्वयं की खोज
++++++++++++++++++
मनुष्य ही इस जगत का,
सुख-दुख का है भोक्ता;
हँसता भी, रोता भी वही,
जीवन का सच्चा योगता।
सूक्ष्म बुद्धि, जिज्ञासा लेकर,
आत्मज्ञान की राह चले;
आविष्कारों का दीप जलाकर,
अज्ञान तम सब दूर करे।
नसीहत, अनुभव, चिंतन से,
जीवन को संवार सकता;
सज्जन, सभ्य, संस्कारित बन,
जगत को निखार सकता।
पर सबमें वह शक्ति कहाँ,
सबकी क्षमता एक न हो;
अपने छोटे से दायरे में,
श्रेष्ठता का दीपक हो।
स्वयं की खोज में उतरकर,
प्रश्नों का सागर मंथन हो—
"मैं कौन हूँ? मेरी सीमा क्या?
यह जग क्या, इसका कारण क्या?"
राग-द्वेष क्यों मन में बसते?
जन्म-मरण का चक्र क्यों?
भाग्य-दुर्भाग्य की रेखाएँ,
जीवन में यह भेद क्यों?
ईश्वर सृष्टि का रचयिता जब,
जन्म माता-पिता से क्यों?
गुण, रंग, विचारों में भिन्नता,
मानव-मानव में क्यों?
धन-दौलत का अंतर क्यों है?
स्वार्थ और निस्वार्थ क्यों?
अल्पायु, रोग, असाध्य पीड़ा,
जीवन में यह क्लेश क्यों?
यदि कोई परम शक्ति है,
जिसके आगे सब लघु हैं;
तो फिर इस संसार में,
भेदभाव के ये स्वर क्यों हैं?
अनगिन प्रश्नों की ज्वाला में,
मन हर पल झुलसता है;
उत्तर पाने की अभिलाषा,
जीवन को तरसता है।
इस खोज में छिपा हुआ,
आध्यात्मिक गूढ़ महत्व;
विज्ञान भी इसके आगे,
झुकता पाकर सत्य तत्व।
आत्मज्ञान की ज्योति जगाकर,
मनुष्य ऊँचा उठ जाता;
महावीर, बुद्ध, ऋषि-मुनियों सा,
कल्याण मार्ग दिखलाता।
जितेन्द्रिय बन, सत्य का साधक,
अहिंसा का पथ अपनाए;
प्रेम, समता, द्वेष-रहित जीवन,
ध्यान-तप से प्रभु को पाए।
कर्मों के फल, पाप-पुण्य से,
दुख-सुख का यह बंधन है;
आत्मचिंतन, आत्मविचार ही,
जीवन का सच्चा साधन है।
कहते संत कबीर सहज स्वर में—
"बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय;
जब दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"
स्वयं की खोज में अंततः,
अहं का आवरण हटता है;
"अहं ब्रह्मास्मि" का बोध जागे,
अद्वैत भाव जगता है।
लाली मेरे लाल की,
जित देखूँ तित लाल;
लाली देखने मैं गई,
मैं भी हो गई लाल।