लालची जमाई।
एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
6.3-26.
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मानव ज्ञान चक्षु प्राप्त है।
फिर भी वह दुखी हैं।
विश्वामित्र मुनि वशिष्ठ समान बनने के प्रयत्न में।
रामावतार कृष्णावतार
वामनावतार में विशिष्ट उद्देश्य।
वे दुखी थे, अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए ज़रा अधर्म से हटे।
ऐसी नश्वर और मिथ्या जगत में मानव सद्यःफल के लिए,
माया में ही फँस जाता।
अनजान में ही
वह लालची बन जाता।
धन के लालची,
पद के लालची
अधिकारक्षेत्र में लालची।
वाराणसी ईर्ष्या के केंद्र।
ईर्ष्यालु और लालची
कभी सुखी नहीं होते।
उनके मन में
जो नहीं है,
उसको प्राप्त करने की
अभिलाषा।
अडैस पड़ोस के लोगों में
जो नया है
जो संपत्ति है
उनको प्राप्त करने सदा दुखी ।
लोभ से बड़ा घाटा होता है।
असंतुष्ट और बेचैनी जीवन।
जितना है, उससे आनंद नहीं।
जो नहीं है,उसकी चिंता।
लालची कंजूसी होता है।
कबीर के दोहे देखिए
कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करे कोई सूरमा, जाति बरन कुल खोय॥"
"गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव।
दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव॥"
"माया मुई न मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर।
आसा त्रिष्णाँ नाँ मुई, यौं कहै दास कबीर॥"
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