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Monday, March 9, 2026

व्यथा

 नमस्ते। வணக்கம்.

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मन की व्यथा

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एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

10-3-2026

मन की व्यथा

कुछ बाहर प्रकट करने की,

कुछ मन में ही घुट-घुटकर

तनाव बढ़ाने की।

मानव जीवन में

पीड़ाओं की कोई कमी नहीं।

ईश्वर के अवतार राम भी दुखी,

महाराज दशरथ भी दुखी।

कृष्ण के आश्रित पांडव भी दुखी,

ईर्ष्या वश कौरव भी चिंतित।

अहंकार से भरे रावण—

वेदों के ज्ञाता होकर भी दुखी।

मानसिक पीड़ा

प्रकट करने पर भी

नाते-रिश्तेदार हँसते हैं,

मज़ाक उड़ाते हैं।

कर्मफल के कारण

साध्य-असाध्य रोग,

अल्पायु मृत्यु का भय।

ठंड से पीड़ा,

चोरी का भय,

लालच और ईर्ष्या का दंश,

ज्ञात-अज्ञात भय की छाया।

जाने-पहचाने दुश्मन,

कुल-द्रोह का संताप,

सत्य छिपाकर दुख बोलने की विवशता।

आर्थिक संकट,

इष्ट का वियोग,

अनिष्ट का संयोग।

कुमित्रों का संग,

मित्रों के संकट का दुःख,

व्यापार में घाटा—

सब मिलकर

मानव मन को पीड़ित करते हैं।

व्यथा भरा यह मानव जीवन

काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या

इन भूलों से घिरा है।

माया शक्ति का बाह्य आकर्षण

और ईश्वरीय सूक्ष्म दंड की देरी—

दुःख को और बढ़ा देती है।

ऐसे में रहीम का यह दोहा

विचारणीय और चिंतनीय है—

रहिमन निज मन की बिथा,

मन ही राखो गोय।

सुनि अठिलैहैं लोग सब,

बाँटि न लैहै कोय॥

🙏 आदरणीय, आपकी रचना में दार्शनिक गहराई है। य

आपकी साधना सच में प्रेरणादायक है। ✨

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