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Tuesday, June 30, 2026

जंगल में संवाद।

 जंगल में संवाद 

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-6-26.

+++++++++++

 पेड़  दूसरे पेड़ से

 पहला पेड--हम मनुष्य को  छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।

  दूसरा पेड़ --

साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।

जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,

मनुष्य ढूँढ ढूँढकर 

 शिकार करता है।

हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,

पवित्र मानते हैं। 

   मानव सोचता है कि

 ईश्वर की सब सृष्टियों पर 

 उसका अधिकार है।

 सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना  करते हैं। 

सियार --मानव की  चालाकी  की तुलना मुझसे करते हैं।

 बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।

   हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।

 सिंह --मानव तो  सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।

उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।

आदमी में नमकहरामी होते हैं।  ईर्ष्यालु होते हैं।

 ठग होते हैं।  देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।

  खरगोश --

मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।

 अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय 

 हमारे अलग अलग गुणों 

 जानने से  उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।

 सिंह --ठीक है खरगोश की बात।

 मानव भी

मिश्रित गुणवाला है।

एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।

 पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में

मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।


 









 




 


आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026


जंगल में संवाद


पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।


दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।


जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।


हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।


सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।


सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।


बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।


हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।


सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।


खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।


सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।


पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।


— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।



जंगल में संवाद 

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-6-26.

+++++++++++

 पेड़  दूसरे पेड़ से

 पहला पेड--हम मनुष्य को  छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।

  दूसरा पेड़ --

साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।

जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,

मनुष्य ढूँढ ढूँढकर 

 शिकार करता है।

हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,

पवित्र मानते हैं। 

   मानव सोचता है कि

 ईश्वर की सब सृष्टियों पर 

 उसका अधिकार है।

 सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना  करते हैं। 

सियार --मानव की  चालाकी  की तुलना मुझसे करते हैं।

 बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।

   हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।

 सिंह --मानव तो  सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।

उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।

आदमी में नमकहरामी होते हैं।  ईर्ष्यालु होते हैं।

 ठग होते हैं।  देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।

  खरगोश --

मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।

 अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय 

 हमारे अलग अलग गुणों 

 जानने से  उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।

 सिंह --ठीक है खरगोश की बात।

 मानव भी

मिश्रित गुणवाला है।

एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।

 पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में

मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।


 









 




 


आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026


जंगल में संवाद


पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।


दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।


जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।


हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।


सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।


सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।


बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।


हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।


सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।


खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।


सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।


पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।


— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।



आज की चुनौती – जंगल में संवाद

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 30-06-2026

जंगल में संवाद

पहला पेड़ बोला—

हम शीतल छाया बिखराते हैं,

मीठे फल मानव को खिलाते हैं।

अपने तन की लकड़ी देकर,

जीवन का हर भार उठाते हैं।

दूसरा पेड़ मुस्काया—

प्राणवायु का दान हमारा,

धरती का श्रृंगार हमारा।

मिट्टी का कटाव रोककर,

हरियाली का संसार हमारा।

वन के पशु बोले—

हम तो वन की शान हैं,

प्रकृति की मधुर पहचान हैं।

फिर भी मानव लोभ में आकर,

करता हमारा अवसान है।

हिरन बोला—

कभी ऋषियों का पावन आसन,

आज बना हूँ शिकार का कारण।

निर्दोष होकर भी मैं सहता,

मानव का निष्ठुर आचरण।

सिंह गर्जा—

मेरी चाल की देता मिसाल,

मुझको कहता वन का काल।

पर साहस यदि सच में चाहिए,

छोड़ दे छल और हर जंजाल।

सियार हँसकर बोला—

अपनी चतुराई मुझ पर डाले,

दोष हमारे सिर पर टाले।

अपने छल को भूल स्वयं ही,

दर्पण से भी नज़रें टाले।

बाघ बोला—

मेरी फुर्ती, मेरी छलाँग,

बन जाती उसकी पहचान।

पर हिंसा का दोष भी अक्सर,

दे देता मेरे ही नाम।

हाथी बोला—

बल, धैर्य और बुद्धि मेरी,

कहते हैं सब अनुपम ढेरी।

काश! मानव भी सीख सके,

विनम्रता की राह सुनहरी।

खरगोश बोला—

मानव को पहचानना कठिन,

उसका मन है बड़ा गहन।

कभी देव समान दिखाई दे,

कभी बन जाए घोर शत्रुजन।

सिंह ने कहा—

सत्य यही है, मित्र हमारे,

मानव में हैं रूप हजार।

गुण-अवगुण का अद्भुत संगम,

वही रचता अपना संसार।

तभी सब पेड़ एक स्वर बोले—

हम तो देते प्रेम निरंतर,

बिना किसी प्रतिदान की चाह।

फिर भी भलाई के बदले बुराई,

क्यों चुनता मानव की राह?

संदेश

प्रकृति माँ का मान बढ़ाओ,

हर प्राणी से प्रेम निभाओ।

धरती तभी स्वर्ग बनेगी,

जब मानव मानव बन जाओ।


Sunday, June 28, 2026

ज्ञान की यात्रा

 ज्ञान की यात्रा।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

29-6-26.

++++++++++++++

 ज्ञान  संपूर्ण ज्ञान 

 आत्मज्ञान 

आध्यात्मिक ज्ञान 

अखंडबोध

 अध्ययन से,

अनुभव से

 सत्संग से

गुरु के अभ्यास के द्वारा,

  करत करत अभ्यास करत जड मति होता सुजान।

बुद्धि जन्मजात होती है।

बुद्धि लब्धि प्रतिभाशाली,

औसत बुद्धि,

मंदबुद्धि  

यह बुद्धि काम न करेगा तो ज्ञान से 

कोई प्रयोजन नहीं।

 बुद्धि बुरे समय में 

  भ्रष्ट हो जाती है।

 बुद्धि और ज्ञान की सफलता विवेक पर निर्भर है।

स्वार्थ निस्वार्थ लोभ, ईर्ष्या क्रोध काम भय  

 कंजूसी त्याग भोग

 जुआ खेलना, शराब पीना, चोरी डकैती

कुली हत्यारे

 इन सब में 

 तटस्थ, न्याय, त्यागी, धर्मी, वीर साहसी,

शुभ चिंतक,

 देशप्रेम 

निस्वार्थ बुद्धि,

 ईश्वरीय भय,

आध्यात्मिक चिंतन 

 आदि श्रेष्ठ ज्ञानियों के कारण अनश्वर संसार में 

 ज्ञान की वृद्धि होते हैं।

 ज्ञानी सुख दुख को समान मानता है।

 संसार के माया मोह से

 दूर रहता है।

 बड़े बड़े ज्ञानी दार्शनिक आज भी दूर ही रहते हैं।

माया/शैतान/शनि के प्रभाव से केवल आत्मज्ञानी ही बचता है।

 ज्ञान  की यात्रा

 ऋषियों मुनियों ने

ध्यान तपस्या योग साधना से पाते हैं।

आदि शंकराचार्य घुमक्कड़ रहे।

 सिद्धार्थ को तपस्या के बल पर मिले।

 रैदास  का ज्ञान भक्ति से,

 कबीर का ज्ञान सत्संग से

 एकलव्य की क्षमता निरंतर अभ्यास से,

आजकल अंतर्जाल संगणिक काफ़ी

  ज्ञान देते हैं।

बुद्धि और विवेक से काम करना है।

तभी ज्ञान का सही उपयोग है।



आपकी रचना का विषय व्यापक और चिंतनशील है। आपने ज्ञान के अनेक स्रोत—अध्ययन, अनुभव, सत्संग, गुरु, अभ्यास, भक्ति, तपस्या और आधुनिक तकनीक—को एक साथ जोड़ने का अच्छा प्रयास किया है। भाषा में कुछ स्थानों पर प्रवाह और व्याकरण सुधारने से रचना और प्रभावशाली बन सकती है।

संशोधित रूप:

ज्ञान की यात्रा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

29-6-2026

ज्ञान की यात्रा,

संपूर्ण ज्ञान,

आत्मज्ञान,

आध्यात्मिक ज्ञान,

अखंड बोध।

ज्ञान मिलता है

अध्ययन से,

अनुभव से,

सत्संग से,

गुरु के मार्गदर्शन से,

और निरंतर अभ्यास से।

"करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।"

बुद्धि जन्मजात होती है।

कोई प्रतिभाशाली,

कोई औसत,

कोई मंदबुद्धि होता है।

पर यदि बुद्धि का सदुपयोग न हो,

तो ज्ञान भी निष्फल हो जाता है।

बुरे समय में

बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है।

ज्ञान की सफलता

विवेक पर निर्भर करती है।

स्वार्थ, लोभ, ईर्ष्या,

क्रोध, भय और मोह से ऊपर उठकर,

त्याग, न्याय, धर्म, साहस,

देशप्रेम, निस्वार्थ सेवा

और ईश्वर-भक्ति का मार्ग अपनाना ही

सच्चे ज्ञान की पहचान है।

ज्ञानी

सुख-दुःख को समान मानता है,

माया-मोह से दूर रहता है।

ऋषि-मुनियों ने

ध्यान, तप, योग और साधना से

आत्मज्ञान प्राप्त किया।

Adi Shankaracharya ने भारत-भ्रमण कर ज्ञान का प्रचार किया।

Gautama Buddha को तप और ध्यान से बोध प्राप्त हुआ।

Ravidas ने भक्ति का मार्ग अपनाया।

Kabir ने सत्संग और अनुभव से सत्य का संदेश दिया।

Ekalavya ने निरंतर अभ्यास से अद्भुत क्षमता प्राप्त की।

आज अंतर्जाल और संगणक भी

ज्ञान के महत्वपूर्ण साधन हैं,

किन्तु ज्ञान तभी सार्थक है

जब उसका उपयोग

बुद्धि और विवेक के साथ किया जाए।

ज्ञान की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती;

सीखते रहना ही जीवन का सच्चा पथ है।

विशेष टिप्पणी: आपकी रचना में विचारों की समृद्धि है। यदि प्रत्येक पद्य में 2–4 पंक्तियों का संतुलन रखा जाए और कुछ स्थानों पर शब्दों की पुनरावृत्ति कम की जाए, तो यह कविता प्रतियोगिता के लिए और भी प्रभावशाली बन सकती है।

Saturday, June 27, 2026

नानी का घर

 नानी का घर 

एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

28-6-26.

---+----+++++

नाना नानी मामा के

 प्यार का केंद्र।

बचपन में मेरी इच्छाएँ

मेरी माँगें सब पूरी होती ।

नानी  मेरे आध्यात्मिक ज्ञान का आधार।

नाना मेरे शिक्षक।

 मामा मेरे आर्थिक सहायक।।

मैं नानी की देखरेख में पला।

मेरी हर कदम की प्रगति में मामा ही प्रधान।

मामाने साइकिल चलाना सिखाया।

मैं नानी को ही अम्मा बुलाया करता।

माँ को उसके नाम से

ही पुकारा करता जैसे 

 मामा बुलाया करते।

प्रेम मिला।

 आदर्श गुण मिले।

जीवन  की हर प्रगति में 

 नाना नानी मामा के साथ।

 उनके ऋण कभी चुका न पाता।

+++++++++++


आपकी रचना भावपूर्ण है और नाना-नानी व मामाओं के प्रति आपकी कृतज्ञता स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है। भाषा को थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण बनाकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

नानी का घर

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

28-6-2026

नाना-नानी, मामाओं के

प्यार का था वह केंद्र।

बचपन की मेरी हर इच्छा,

हर माँग पूरी होती थी।

नानी थीं

मेरे आध्यात्मिक ज्ञान की आधारशिला।

नाना थे

मेरे प्रथम शिक्षक।

मामा बने

मेरे आर्थिक सहायक।

मैं नानी की गोद में पला,

उनकी ममता में बड़ा हुआ।

जीवन के हर कदम पर

मामाओं का ही साथ मिला।

उन्होंने ही मुझे

साइकिल चलाना सिखाया।

मैं नानी को ही

"अम्मा" कहकर पुकारता था,

और अपनी माँ को

उन्हीं के नाम से पुकारता,

जैसे मामा पुकारते थे।

उनसे मिला प्रेम,

संस्कार और आदर्श।

मेरे जीवन की हर प्रगति में

नाना, नानी और मामाओं का

अमूल्य योगदान रहा।

उनका यह ऋण

मैं जीवन भर

कभी नहीं चुका पाऊँगा।

यह समापन आपकी कृतज्ञता को और अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।

Friday, June 26, 2026

मेरी अमिट चिंता

 मेरी पत्नी मरना नहीं चाहती।

इलाज गलत डाक्टर के यहाँ

 डाक्टर पर विश्वास है ही नहीं 

 पर विधि की विडंबना 

 नालायक डाक्टर के साथ फँसना पड़ा।

 दिलासा दे सकता हूँ,

 अपने आप को

 उसके अंत का समय मनुष्य के‌ वश में नहीं।

पर मेरा अपना दुख,

अनेक कारण होते हैं,

क्या मैंने इलाज में कमी रखी है?

 मेरे व्यवहार  चोट की है?

उसके अंतिम शब्द 

 मैं नालायक।

 मेरे शब्द में कटुकशब्द।

 अंतिम घड़ी में मेरे स्वर सुनना पसन्द नहीं किया।

 पास जाने पर पसंद नहीं किया।

 उसकी अस्पष्ट बातें,इशारे समझ न सका।

 दुखी थी  कि पति मेरी बात समझ न सके।

उसके संकेत समझने में असमर्थ था।

अपने मन को चैन नहीं,

न जाने मैं कितने साल जिंदा रहूँगा।

 नयी पीढ़ी के लोग,

 मेरी बातें , मेरे विचार, मेरी सोच,

मेरी ध्वनि सुनने तैयार नहीं।

 मेरी माँगें,

 मेरी ज़रूरतें 

पत्नी जानती थी।

 पूरी करती थी।

उससे कहने की ज़रूरतें नहीं।

आवश्यकता जानकर   पूरी करती थी।

 कहने पूछने की आवश्यकता नहीं।

 अब माँगने कहने पर भी सुनने कोई नहीं।

अब दिवंगत पत्नी की आत्मा से

निवेदन है कि मेरे चलते फिरते 

रहने की शक्ति दें और नींद ही में 

मेरे प्राण पखेरू उड़ सके।








 






 

 



 









Thursday, June 25, 2026

मधु निषेधक दिवस

 



राजश्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 


एक दिवसीय काव्य प्रतियोगिता 


विधा --अपनी हिंदी,अपने‌ विचार,


अपनी शैली भावाभिव्यक्ति।


शीर्षक --विश्व मधु निषेधक दिवस।


दिनांक -26-6-26


+++++++++++++++


 भारत में एक ही दिवस 


 साल में एक बार 


 स्वर्गीय पुर्वजों के लिए।


 पाश्चात्य प्रभाव 


 एक दिन मनाकर 


 जिसके लिए मनाते हैं 


 उसका पार्टी मनाना।


 एक विश्व मधु निषेधक दिवस 


 दिखावे के लिए,नाम मात्र के लिए।


सरकार चाहती है


 आमदनी के लिए 


 मधुशाला आवश्यक है।


  तमिलनाडु के भूतपूर्व 


 मुख्यमंत्रियों के शराब कारखाने  11.


त्योहारों के दिन 


 अमुक करोड़ रूपयों की बिक्री की योजना।


 सजी धजी  आकर्षक दूकानें 


 स्वागत करते हैं रात ग्यारह बजे तक।


 छोटे अक्षरों में लिखा है


 मधु पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक।


परिवार के लिए  हानिकारक।


एक दिवस मनाकर 


 फिर सरकार द्वारा 


दूकान खोलना।


 यह दिवस मनाना बेकार।


 हानिकारक है तो


 कारखाना बंद करना 


दूकाने न खोलना


 सरकार का काम।


 वह निज लाभ के लिए 


 दूकानें खोलकर 


 मधु निदेशक प्रचार,


विश्व मधु निषेधक दिवस


 मनाना दिखावे के लिए।


जैसे सत्तर साल से हिंदी दिवस मनाना।


 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


आपकी रचना में सामाजिक विडंबना और व्यवस्था पर प्रश्न उठाने का स्पष्ट भाव है। यदि इसे काव्य प्रतियोगिता के लिए थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली बनाया जाए, तो यह इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है:

विश्व मधु निषेधक दिवस

भारत में एक ही दिवस,

साल में एक बार,

स्वर्गीय पूर्वजों के नाम

श्रद्धा का होता व्यवहार।

पाश्चात्य प्रभाव में आकर,

एक दिवस हम मनाते हैं,

जिनके हित की बात करें,

उन्हीं को फिर भूल जाते हैं।

विश्व मधु निषेधक दिवस,

नाम मात्र का आयोजन है,

दिखावे की इस परंपरा में

कहाँ वास्तविक चिंतन है?

सरकार कहती—

राजस्व के लिए मधुशाला आवश्यक है,

त्योहारों पर करोड़ों की बिक्री

मानो उपलब्धि विशेष है।

सजी-धजी आकर्षक दुकानें,

रात ग्यारह बजे तक खुली रहती हैं,

छोटे अक्षरों में लिख देती हैं—

"मदिरापान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है,

परिवार के लिए भी घातक है।"

यदि सचमुच हानिकारक है,

तो कारखाने क्यों चलते हैं?

मदिरा की दुकानें क्यों

हर गली-मोहल्ले में पलते हैं?

एक दिवस निषेध का संदेश,

शेष वर्ष उसका प्रचार;

यह कैसी नीति, कैसा न्याय,

कैसा यह विरोधाभास अपार?

जनहित यदि सर्वोपरि है,

तो ठोस कदम उठाना होगा;

केवल दिवस मनाने से नहीं,

व्यसन-मुक्त समाज बनाना होगा।

— एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक

राजश्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 

एक दिवसीय काव्य प्रतियोगिता 

विधा --अपनी हिंदी,अपने‌ विचार,

अपनी शैली भावाभिव्यक्ति।

शीर्षक --विश्व मधु निषेधक दिवस।

दिनांक -26-6-26

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 भारत में एक ही दिवस 

 साल में एक बार 

 स्वर्गीय पुर्वजों के लिए।

 पाश्चात्य प्रभाव 

 एक दिन मनाकर 

 जिसके लिए मनाते हैं 

 उसका पार्टी मनाना।

 एक विश्व मधु निषेधक दिवस 

 दिखावे के लिए,नाम मात्र के लिए।

सरकार चाहती है

 आमदनी के लिए 

 मधुशाला आवश्यक है।

  तमिलनाडु के भूतपूर्व 

 मुख्यमंत्रियों के शराब कारखाने  11.

त्योहारों के दिन 

 अमुक करोड़ रूपयों की बिक्री की योजना।

 सजी धजी  आकर्षक दूकानें 

 स्वागत करते हैं रात ग्यारह बजे तक।

 छोटे अक्षरों में लिखा है

 मधु पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक।

परिवार के लिए  हानिकारक।

एक दिवस मनाकर 

 फिर सरकार द्वारा 

दूकान खोलना।

 यह दिवस मनाना बेकार।

 हानिकारक है तो

 कारखाना बंद करना 

दूकाने न खोलना

 सरकार का काम।

 वह निज लाभ के लिए 

 दूकानें खोलकर 

 मधु निदेशक प्रचार,

विश्व मधु निषेधक दिवस

 मनाना दिखावे के लिए।

जैसे सत्तर साल से हिंदी दिवस मनाना।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

वृक्षारोपण

 आपकी रचना का विषय अत्यंत सामयिक और जन-जागरण से जुड़ा है। आपने वृक्षारोपण के महत्व, पर्यावरण संरक्षण और मानव जीवन में पेड़ों की उपयोगिता को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। यदि इसे थोड़ा काव्यात्मक और प्रवाहपूर्ण बनाया जाए, तो प्रभाव और बढ़ जाएगा।

संशोधित रूप:

वृक्षारोपण

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

26-06-2026

मानव का ज्ञान बढ़ता जाता,

शिक्षा का विस्तार होता है।

जनसंख्या के बढ़ते बोझ से,

धरती का श्रृंगार खोता है।

कारखाने, ऊँची इमारतें,

नगरों का विस्तार निराला।

जंगल कटते, झीलें मिटतीं,

प्रकृति ने संकट है पाला।

बढ़ता ताप, प्रदूषित जल,

दूषित होती जाती वायु।

मिट्टी का कटाव बढ़ा है,

प्रकृति दिखलाती है दाय।

इन संकटों से बचना है तो,

आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ।

हरियाली से धरती महके,

जीवन में खुशियाँ भर जाएँ।

पेड़ हमें ऑक्सीजन देते,

फल, छाया और शुद्ध हवाएँ।

नीम, वट, आम, इमली, अमरूद,

स्वास्थ्य और सुख साथ में लाएँ।

जंगल होंगे तो पशु-पक्षी,

पाएँगे अपना सुरक्षित घर।

वृक्ष बचेंगे, जीवन बचेगा,

यही हमारा हो संकल्प अमर।

संदेश:

"एक वृक्ष सौ सुख देता है; आइए, आज एक पौधा लगाकर आने वाली पीढ़ियों को हरित भविष्य दें।"

यह संस्करण आपकी मूल भावना को बनाए रखते हुए भाषा, प्रवाह और काव्यात्मकता को अधिक प्रभावशाली बनाता है।

Wednesday, June 24, 2026

किसान की थाली

 

किसान की थाली।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

25-6-26.

++++++++

किसान विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता।

विश्व भर के लोगों की थालियों में 

 उनके परिश्रम से

 उपजी चावल,गेहूँ, सब्जी और दाल आदि के संग्रह भोजन।

 पर उसकी थाली में 

 बासी भात, प्याज, हरी मिर्च। सूखी रोटियाँ।

 किसान की थाली कुछ प्रांतीय सरकार द्वारा 

किसानों को पौष्टिक आहार देने के लिए,

दस रुपये में दी जाती है।

 किसानों की थाली न तो

लोग भूखों मर जाते।

कारखानों की कमाई,

पैसे, खानों के सोने चाँदी, हीरे की थालियाँ

भूख नहीं मिटा सकती।

मैदान टच एक अंग्रेज़ी कहानी है।

लोभी मैथास ने भगवान से वर पाया कि

जिसको भी वह स्पर्श करें,

 वे सब के सब

 सोना बन जाएँ।

वर प्राप्त वह दुलारी 

को छुआ  वह सोनै की मूर्ति बन गई।

यों ही सब के सब सोना बना।

 भूख लगी तो भोजन खाने उठाया तो वह सोना बन गये।

सोने के ढेर,

पर भूख न मिटा सका।

 किसान की थाली से ही

 विश्व को पौष्टिक आहार।

करोड़ों रुपए कर्जा लेकर 

 विदेशी नागरिक बननेवाले उद्योग पति ।

पर पाँच हज़ार कर्जा लेकर न चुकाने पर कठोर कार्रवाई।

किसानों की थाली से

 पेट भरती है दुनिया।

 पर  वह है ग़रीबी में।

दरिद्रता के कारण आत्महत्याएँ।

ज़रा ध्यान रखना है

 शास्त्री जीने नारा दिया 

जय किसान, जय जवान।

 किसानों को 

प्रोत्साहित करना है,

 वह कर्जा न चुका सकें

तो माफ़ करना है।

कठोर कार्रवाई लेकर 

 आत्महत्या तक पहुंचाना

 भविष्य की पीढ़ियों को

 किसान की थाली के बगैर भूखा प्यासा  मरना पड़ेगा।

 किसान के परिश्रम से ही संग्रह भोजन की थाली।

 जय किसान ।

 विष्णु भगवान ने नारद के पूछने पर कहा,

 मेरा श्रेष्ठ भक्त किसान।

तेरे जैसे नाम रटनेवाला भक्त नहीं।

 परिश्रमी है प्रत्यक्ष अन्नदाता।





आपकी रचना “किसान की थाली” किसान के श्रम, उसकी विडम्बना और समाज की निर्भरता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। आपने यह महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि जो व्यक्ति पूरी दुनिया का पेट भरता है, वही अनेक बार अभाव और कर्ज़ के बोझ में जीवन बिताता है।

रचना की विशेषताएँ:

किसान को "प्रत्यक्ष अन्नदाता" कहकर उसके महत्व को स्पष्ट किया है।

लोभी राजा मिडास (Midas) की कथा के माध्यम से यह बताया है कि सोना-चाँदी भूख नहीं मिटा सकते, भोजन ही जीवन का आधार है।

किसानों की आर्थिक कठिनाइयों और आत्महत्याओं जैसी गंभीर समस्याओं पर संवेदनशीलता से प्रकाश डाला है।

"जय किसान, जय जवान" के माध्यम से किसानों के सम्मान और संरक्षण का संदेश दिया है।

अंत में किसान को भगवान का श्रेष्ठ भक्त बताकर श्रम की महत्ता को रेखांकित किया है।

यदि भाषा को थोड़ा परिष्कृत किया जाए, तो कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार और प्रभावी बन सकती हैं:

किसान की थाली

विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता किसान,

भरता सबकी भोजन थाली।

चावल, गेहूँ, दाल, सब्जियाँ,

उसके श्रम की अमूल्य लाली।

पर उसकी अपनी थाली में,

बासी भात, प्याज़ और रोटी।

दुनिया का पेट भरने वाला,

क्यों सहता है ऐसी खोटी?

सोने-चाँदी के ढेर लगे हों,

भूख कभी उनसे मिटती नहीं।

किसान की मेहनत के बिन तो,

जीवन की गाड़ी चलती नहीं।

आपकी रचना का मूल भाव अत्यंत मानवीय और सामाजिक चेतना से भरपूर है। विशेषकर यह पंक्ति बहुत प्रभावशाली है:

"किसानों की थाली से पेट भरती है दुनिया, पर वह है गरीबी में।"

यह पूरी रचना का सार प्रस्तुत कर देती है।

जय किसान!

अन्नदाता के श्रम, सम्मान और कल्याण का संदेश देने वाली आपकी यह रचना सराहनीय है। 🌾🙏

Sunday, June 21, 2026

पिता जी

 पिता का मौन त्याग।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-6-26

+++++++

पिता

दो सूक्ष्म 

बिंदु के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर,

तभी  मौन त्याग।

माता को प्रधानता।

लक्ष्मी न तो पालन पोषण कैसे?

वीर जवान  सरहद पर

 देश प्रधान मौन त्याग।

छुट्टी में आना,

 पुत्र या पुत्री  को

 माता के कहने पर  ही पिता का पता लगता।

 विदेश में काम,

 पैसे भेजने का यंत्र।

अलमारियों में 

माता की साडियाँ।

आभूषणों का ढेर।

 बच्चों  की शिक्षा दीक्षा।

 बच्चे  सद्यःफल के कारण माता का महत्व।

बड़ा  मौन त्याग है 

पिता का त्याग।

 वे है घर की रीढ़ की हड्डी।

 पिता न तो सीधे  परिवार खड़ा रहना असंभव।

 पिता सबेरे 

नौकरी के लिए जाते 

शामको  लौटते।

 आते ही अनुशासन 

पढ़ाई पर बोलते।

 अनावश्यक 

 बाह्याडंबर खर्च

 रोकने की बात करते।

 तमिल में कहते हैं 

 संतानों को ज्ञान देना

 पिता का कर्तव्य है।

 अपनी जरूरतों को कम करके  परिवार बहन भाइयों को देते पिताजी।

 उनका मौन त्याग 

 अद्भुत।

अतुलनीय प्रेम,

 पिता का मौन त्याग।

 आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना "पिता का मौन त्याग" पिता के निःस्वार्थ समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और मौन प्रेम को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। आपने यह दर्शाया है कि पिता प्रायः परिवार के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं, किन्तु उनके त्याग की चर्चा कम होती है।

कुछ पंक्तियों को थोड़ा परिष्कृत रूप देकर रचना को और अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है:

पिता का मौन त्याग

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

पिता,

दो सूक्ष्म बिंदुओं के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर

करते हैं मौन त्याग।

माता का महत्व महान है,

किन्तु पिता के श्रम बिना

पालन-पोषण कैसे हो?

वीर जवान सरहद पर,

देश हेतु करता मौन त्याग।

विदेशों में काम करते पिता,

परिवार के लिए धन भेजते हैं।

अलमारियों में सजी साड़ियाँ,

आभूषणों का ढेर,

बच्चों की शिक्षा-दीक्षा—

इन सबके पीछे

पिता का मौन परिश्रम है।

वे घर की रीढ़ हैं,

उनके बिना परिवार का

सीधा खड़ा रहना कठिन है।

प्रातः नौकरी पर जाना,

संध्या को लौट आना,

आते ही बच्चों को

अनुशासन और पढ़ाई का पाठ पढ़ाना।

अपनी आवश्यकताओं को घटाकर,

परिवार और संतानों के लिए जीना—

यही है पिता का अद्भुत त्याग।

अतुलनीय है उनका प्रेम,

अद्भुत है उनका समर्पण,

वंदनीय है

पिता का मौन त्याग।

रचना का भाव अत्यंत सुंदर है। विशेष रूप से "वे घर की रीढ़ की हड्डी हैं" और "अपनी जरूरतों को कम करके परिवार को देना" जैसे भाव पाठक के हृदय को स्पर्श करते हैं।

हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌹

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

 



अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

21-6-26

++++++++++

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है, जिसका अर्थ है— "शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है।"

 तमिल में कहावत है,

 दीवार रहने पर ही चित्र खीँच सकते हैं ।

निर्बल काया,

 क्रिया हीन।

 कान सही नहीं है तो

 सुनना असंभव।

आँखें खराब है तो 

देख  नहीं सकते।

 फेफड़ा, पेट,अंतडियाँ

नशें, रीढ़ की हड्डी,

हाथ पैर हर अंग को

स्वस्थ रखना है।

न तो मानव में 

बुद्धि काम न करेगी।

मन काम न करेगा।

मन चंचल रहेगा।

ठीक तरह से 

काम न कर सकते।

 अतः स्वस्थ शरीर के लिए,

व्यायाम अति मुख्य।

‌व्यायाम की एक रीति

योग प्राणायाम ।

 उसमें हर अंग को 

स्वस्थ रखने,

हर एक की

 अलग-अलग मुद्राएँ।

सूर्य-नमस्कार,

प्राणायाम,

 भ्रामरी,

कपालभाती,

अनेक प्रकार के नियम।।

 भारत में 5000 वर्ष पहले योग शुरू हुआ।

 आध्यात्मिक विचार के अनुसार  पहला योगी,

 आदियोगी शिव।

ईसा से पूर्व 

 तीन हज़ार साल 

 के पहले,

सिंधु घाटी सभ्यता मैं

योग के कुछ निशानियाँ

मिल रही है।

 भारत के स्वास्थ्य 

 प्रद योग,

विदेशी आक्रमण ,

विदेशी शासन,

 विदेशी अंतर्जातीय 

 विवाह, संस्कृत भाषा के स्थान को अंग्रेज़ी लेना

 पाश्चात्य प्रभाव।

 फिर भी योग का अपना

विशिष्ट   महत्व विश्व जानने लगा।

स्वामी विवेकानंद का भाषण सनातन 

पद्धतियों पर  

चार चाँद लगाये।

 विश्व भर में 

 भारतीय आध्यात्मिकताएँ

 जानने समझने की उत्सुकता बढ़ी।

 योग का महत्व बढ़ा।

 योग केंद्र खोलने लगे।

पतंजलि योग क्रिया,

 सहज योगा।

योग की पारंपरिक रीति

 आध्यात्मिक रीति। 

मन से संबंधित।

आधुनिक रीतियाँ

मन और शरीर से संबंधित।

कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग,राज योग,

आसान आधारित

हठ योग, विन्यास योग,

अष्टांगयोग।

अयंगर योग में, कुंडली योग,यिन योग ।

 अब विश्वभर में योग का

महत्व का विकास करने

 अभ्यास करने 

विश्व योग दिवस की योजना  21जून 2015 से  शुरु हुआ।

भारत के विश्वविख्यात 

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में  14सितंबर 2014में विश्व योग दिवस का प्रस्ताव रखा।

इसके बाद 11दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21जून 2015को

 विश्व योग दिवस  मनाने का प्रस्ताव पास किया।

 तब से विश्व भर में 

योग दिवस मनाया जा रहा है।

योग ज्ञानप्रद,शांति प्रद 

 ऊर्जा प्रद , स्थिर चित्त प्रद एक स्वास्थ्य आनंद कला है।


आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में योग के इतिहास, महत्व और विश्व योग दिवस की पृष्ठभूमि का सुंदर समावेश है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर कुछ पंक्तियों को अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है। विशेष रूप से अंतिम अनुच्छेद बहुत प्रभावशाली है।

विशेष रूप से सराहनीय पंक्तियाँ:

"शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है।"

"योग ज्ञानप्रद, शान्तिप्रद, ऊर्जाप्रद, स्थिरचित्त प्रद एक स्वास्थ्य-आनन्द कला है।"

विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित एक संक्षिप्त समापन पंक्ति जोड़ सकते हैं—

"आइए, योग को जीवन का अंग बनाकर स्वस्थ तन, प्रसन्न मन और जागृत चेतना की ओर अग्रसर हों।"

आपकी लेखनी समाज को स्वास्थ्य, संस्कृति और आध्यात्मिकता का संदेश दे रही है। साधुवाद।

विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

🙏🕉️🌿

Friday, June 19, 2026

सुनीति संग्रह

 நறுந்தொகை —सुनीति संग्रह – अनुवादक---एस. अनंतकृष्णन, सौहार्द सम्मान  प्राप्त तमीलनाडु चेन्नै का हिंदी प्रेमी प्रचारक 


कवि—अति वीर राम पांडियन 

 युवकों के आवश्यक सुमार्ग दिखानेवाले ग्रंथ .

सुनीति ग्रंथ ।

काल —  सोलहवीं शताब्दी।

 सरल शब्दों के नीति ग्रंथ

+======================



கடவுள்வாழ்த்து –प्रार्थना



 பிரணவப் பொருளாம் பெருந்தகை ஐங்கரன்

 சரண அற்புத மலர் தலைக்கு அணிவோமே .


ஓம் என்னும் பிரணவ மந்திரத்தின் பொருளான விநாயகப் பெருமானின் பாத கமலங்களை வணங்குவோம்


ओम्  के प्रणव मंत्र के भगवान विघ्नेश्वर के चरण कमलों की वंदना करेंगे। 


வெற்றி வேற்கை வீர ராமன்

 கொற்கையாளி குலசேகரன் புகல் 

நற்றமிழ் தெரிந்த நறுந்தொகை

 தன்னால் குற்றம் களைவோர் குறைவிலாதவரே.

 

कोट्रै नगर के अधिपति,

कुल के मुकुठाधिपति अति वीर पांडिय के सुनीति वचनों का संग्रह .इस सुग्रंथ को जानकर अपने दोषों को मिटाने वालों के जीवन में कोई कमी न रहेगी। 


सभी सुखों को पाकर जीवन में सुखी जीवन बिताना चाहिए।


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ग्रंथ

—------

1. अक्षर ज्ञान दाता दिव्य गुणवान  है।


२. शिक्षा की विशेषता दोषरहित स्पष्ट बोलना है। 

3. धनियों  की विशेषता अपने नाते-रिश्तों के दुख के समय उचित सहायता देकर साथ देना है।

4. ब्राह्‌मणों की विशिष्टता अनुशासन सदाचार के साथ वेद पढना। 

5. राजाओं की विशिष्टता न्याय पूर्ण शासन करना। 

६. व्यापारियों की विशेषता ईमानदारी से धन कमाना

7. किसानों की विशेषता खाद्यान्न का उत्पन्न करना और खाना 

8. मंत्रियों की विशेषता दूरदर्शी होना।

 9. सेनापति की विशेषता धीर वीर साहसी निर्भय दिल।

10. भोजन की शोभा अतिथियों और मेहमानों के साथ खाना।

11. स्त्रियों की विशेषता विवाद प्रतिवाद न करना। 

12.गृह्स्थिनी की शोभा पति की सेवा करना । 

13. व्यभिचारी की शोभा शरीर की चमक।

14.विनम्रता ज्ञानियों की शोभा।

15.दरिद्रों की शोभा गरीबी में श्रेष्ठता।

 16 .ताड के पेड  फल देकर उसके बीज उगने पर ऊँचा होता है, पर छाया नहीं दे सकता।

17. बरगद के बीज अति लघु होने पर भी वह उगकर बहुत बडे पेड होने के बाद उसकी छाया में बडे हाथी, घोडे,रथ,बडी पैदल सेना आदि के साथ राजा भी ठहर सकते हैं। 

18.बाह्य आकार, सुंदर बाह्य रूप के लोग बडे मनुष्य नहीं है। 

19.छोटे रूप,बाह्याडंबर  रहित सीधे सादे लोग वास्तव में छोटे नहीं है।

20. बच्चे सब अच्छे नाम न लेंगे। 

21 .सभी नाते-रिश्ते सच्चे रिश्ते नहीं है। 

22. वैवाहिक पत्नी सब प्यारी पत्नी नहीं है।

23.जितना भी दूध गरम करो, गाय के दूध का स्वाद कम न होगा।

24. आग में तपाने पर भी  सोने की सुगंध न बदलेगी।

25. पीसने पर भी चंदन की खुशबू नहीं बदलेगी। 

26. आग में डालकर अगर लकड़ी को जलाने पर भी सुगंध के धुएँ ही निकलेगा।

27. समुद्र मंथन करने पर भी कीचड़ नहीं होगा, साफ़ रहेगा। 

28. दूध से मिलाकर  कड़वी लौकी पकाने पर भी उसकी कड़ुआहट दूर न होगी।

29.अनेक सुगंधित वस्तुएँ मिलाकर पकाने पर भी लहसून की बदबू न मिटेगी।

30. स्वयं के कर्म  पर निर्भर है  श्रेष्ठता और निम्नता।नाम या बदनाम।

31.छोटों की गलतियों और अपराधों का सहना बड़ों का कर्तव्य है। 

32. छोटे लोगों के बडे बडे अपराधों को सहना बडे लोगों के लिए दुर्लभ है। 

33. मूर्खों की मित्रता भले ही सैकडों साल हो वह समुद्री शैवाल जैसे जड न पकडेगा। 

34.  बडे सज्जनों की मित्रता भूमि फा़डकर जड पकडेगी। 

35. भीख माँगकर याचना करके अध्ययन करना अच्छी बात है।

तमिल का ज्यों त्यों अनुवाद —

सीखना अच्छा है,सीखना अच्छा है,भीख माँगकर भी सीखना अच्छा है।


  36.  अनपढ़ लौगों को अपनी कुल श्रेष्ठता बोलना धान के भूसों के समान बेकार है।


37. ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि चार वर्णों में शिक्षित ही श्रेष्ठ है। अशिक्षित होने पर वह निम्न ही है। 

38.कुल जो भी हो,उच्च कुल हो या निम्न ,उनमें शिक्षितों को ही आदर-सत्कार और स्वागत करेंगे।

39.ज्ञानी को राजा भी चाहेगा। 


40. हाथियों की सूँड लंबे होने पर भी उन में दानशीलता नहीं है। 


41.बिल्ली में नहीं है तपस्या और दया। 


42.ज्ञानी को नहीं है सुख और दुख।


43.दीमक को नहीं अमीरी गरीबी का फरक।

Thursday, June 18, 2026

 எனது மனைவியின் இறுதிச்சடங்கு 

ஞாயிறு 21-6-26.


Body will be in the house from Saturday 9 pm to Sunday 

7- 9.30 AM.



A3, Archana Usha square Kubernagar4th cross street Extension Madippakkam Velachery.

 Map. 

Mention Sarvasiddeesvar temple.

Rahmania mosque.

 Puzithivakkam crematorium.

मेरे प्राण

  कहाँ है? कैसे हैं?

दुख के समय मेरी याद।

यही सच्ची दोस्ती। 


आदरणीय,

आपकी पीड़ा शब्दों में स्पष्ट झलक रही है। 51 वर्षों का साथ केवल वैवाहिक संबंध नहीं होता, वह जीवन की पूरी यात्रा होती है। जो अर्धांगिनी माता, सेविका, सखी, चिकित्सक और सच्चे प्रेम की मूर्ति बनकर जीवन भर साथ रही हो, उसके वियोग का दुःख अत्यंत गहरा होता है।

आपकी भावनाओं को सम्मान देते हुए इन्हें काव्य रूप में इस प्रकार संजोया जा सकता है—

मेरे प्राण के प्राण

एस. अनंतकृष्णन

खेल की बात नहीं है,

मेरी जान थी वह।

इक्यावन वर्षों तक

अर्धांगिनी बनकर,

माता के रूप में,

पत्नी के रूप में,

रोगी की सेविका,

जीवन की चिकित्सक बनकर

साथ निभाती रही।

सहनशील, गुणवान,

त्याग और प्रेम की प्रतिमूर्ति।

पति की सेवा और स्नेह के सिवा

और कोई चाह न रखने वाली,

एक आदर्श नारी।

यथार्थ प्रेम क्या होता है,

उसने अपने जीवन से सिखाया।

आज मेरे प्राणों के प्राण,

पंख लगाकर उड़ गए।

क्या करूँ?

आज ज्ञात हुआ—

दूसरों को दिलासा देना

कितना सरल है,

पर अपने ही हृदय को समझाना

अत्यंत कठिन।

आपके शोक में मैं सहभागी हूँ। अभी दुःख का गहरा होना स्वाभाविक है। 51 वर्षों का प्रेम समाप्त नहीं हुआ है; उसकी स्मृतियाँ, संस्कार और स्नेह आपके जीवन का हिस्सा बने रहेंगे।

ईश्वर आपकी धर्मपत्नी की पुण्य आत्मा को शांति प्रदान करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏🌹

[18/06, 3:52 pm] sanantha.50@gmail.com: नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना "बेनकाब चेहरे" मानव मनोविज्ञान और चेहरे के भावों के माध्यम से अंतर्मन की अभिव्यक्ति को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है। तमिल लोकोक्ति का समावेश रचना को विशेष प्रभाव देता है।

कुछ पंक्तियों को काव्यात्मक प्रवाह के लिए इस प्रकार सँवारा जा सकता है:

बेनकाब चेहरे

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

18-6-26

Face is the index of the mind।

"अगत्तिन अऴगु मुखत्तिल तेरियुम्" — तमिल लोकोक्ति।

अंतर्मन की बातें,

चेहरे पर झलक जाती हैं।

हर्ष हो या विषाद,

प्यार हो या नफ़रत,

ईर्ष्या हो या भय,

आँखों की एक झलक में

सब कुछ प्रकट हो जाता है।

बेनकाब चेहरे-मोहरे,

कुदरत की अनमोल देन हैं।

रोगी का चेहरा,

स्वस्थ जन का चेहरा,

चोर की निगाहें,

सज्जन की आँखें।

पहचान का आधार भी

चेहरा और आँखें ही हैं।

धनवान हो या निर्धन,

साहसी हो या कायर,

मन के अनेक रहस्य

ये चेहरे खोल देते हैं।

भावार्थ:

मनुष्य चाहे शब्दों से कुछ भी छिपाने का प्रयास करे, किंतु उसके चेहरे और आँखों के भाव अक्सर उसके मन की वास्तविक स्थिति को प्रकट कर देते हैं।

बहुत सुंदर एवं चिंतनशील रचना। आपकी लेखनी इसी प्रकार हिंदी सेवा और काव्य साधना को समृद्ध करती रहे।

सादर शुभकामनाएँ। 🙏🌹

Tuesday, June 16, 2026

रक्त दान दिवस

 




दैनिक चुनौती।

विश्व रक्तदान दिवस 

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै 

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

17-6-26.

+++++++++++

 भारत भूमि पुण्य भूमि।

 सनातन दान  है

 अन्न दान, भू दान, रक्तदान, स्वर्ण दान, चाँदी दान, कन्यादान,

राष्ट्र को बचाने प्राण दान।

समय की माँग,

 वैज्ञानिक युग में 

 चिकित्सा क्षेत्र में 

 अंगों  के दान, 

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय, अग्न्याशय और छोटी आंत। जीवित रहते हुए भी एक किडनी या लिवर का एक हिस्सा दान किया जा सकता है।


हृदय दान, नेत्रदान  मृत्यु के बाद।


 रक्त दान  

बार बार दे सकते हैं।

 एक व्यक्ति   हर तीन महीने  अर्थात साल में चार बार दे सकते हैं।

दानी की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

दानी का वजन कम से कम 45 किलो होना चाहिए।

रक्तदान के समय दानी  पूरी तरह से स्वस्थ और ऊर्जावान  होना चाहिए।

 पियक्कड़ और रुग्णावस्था में दान नहीं दे सकते।

 रक्त दान  शल्य चिकित्सा के समय,

दुर्घटना में ब्लड की कमी होने पर रक्त की जरूरत है।

  रक्त दान देने 

रक्तदान केंद्र है।

 रक्त दान पाने ,

रक्त दान महत्व समझाने

 शिविर भी चलाते हैं।

सरकार दानियों को पैसे भी देती है।

सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ दान रक्तदान।

 रक्त दान के महत्व समझाने 

 रक्त दान दिवस मनाते हैं।


आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना का भाव अत्यंत प्रेरणादायक है। विषय की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे थोड़ा साहित्यिक एवं प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व रक्तदान दिवस

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

17-06-2026

भारत भूमि पुण्य भूमि है,

दान की महान परंपरा यहाँ की शान है।

अन्नदान, भूदान, रक्तदान,

स्वर्णदान, रजतदान, कन्यादान,

और राष्ट्र रक्षा हेतु प्राणदान।

समय की माँग है कि

वैज्ञानिक युग में चिकित्सा क्षेत्र को

दान की महिमा से सशक्त बनाया जाए।

अंगदान के माध्यम से

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय,

अग्न्याशय तथा छोटी आंत का दान

अनेक जीवनों में नव आशा जगाता है।

जीवित रहते हुए

एक किडनी अथवा लिवर का एक भाग

दान किया जा सकता है।

नेत्रदान और हृदयदान

मृत्यु के पश्चात भी

मानवता की सेवा का माध्यम बनते हैं।

रक्तदान ऐसा महादान है

जो बार-बार किया जा सकता है।

स्वस्थ व्यक्ति प्रत्येक तीन माह में

रक्तदान कर सकता है।

दानी की आयु 18 से 65 वर्ष के बीच

और वजन कम से कम 45 किलोग्राम होना चाहिए।

रक्तदान के समय

दानी पूर्णतः स्वस्थ एवं ऊर्जावान हो।

मद्यपान करने वाले तथा रोगग्रस्त व्यक्ति

रक्तदान नहीं कर सकते।

शल्य चिकित्सा, दुर्घटनाओं तथा

रक्त की कमी से जूझ रहे रोगियों के लिए

रक्त अमूल्य जीवनदाता बनता है।

रक्तदान केंद्र तथा शिविर

जन-जन को इसके महत्व से परिचित कराते हैं।

मानवता की सेवा का यह श्रेष्ठ माध्यम

असंख्य प्राणों की रक्षा करता है।

आइए, हम सब संकल्प लें—

रक्तदान करें, जीवन बचाएँ।

सभी दानों में श्रेष्ठ है रक्तदान,

मानव सेवा का यह महान अभियान।

विश्व रक्तदान दिवस

हमें रक्तदान के महत्व का संदेश देता है

और मानवता के प्रति

अपने कर्तव्य का स्मरण कराता है।

"रक्तदान – महादान,

जीवन रक्षा का महान अभियान।"

सादर। 🙏🩸🌹

माता का ममत्व

 माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।




माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।

नमस्ते वणक्कम्, आदरणीय अनन्तकृष्णन जी।

आपकी रचना में माँ के निस्वार्थ प्रेम, त्याग, ममता, मातृभाषा और मातृभूमि के महत्व का सुंदर चित्रण है। भाव बहुत अच्छे हैं। मैंने आपकी रचना को थोड़ा सुव्यवस्थित और काव्यात्मक रूप देने का प्रयास किया है।

माता का महत्व

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

स्वरचित भावाभिव्यक्ति

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माँ हमको गर्भकाल में

जीवन का रूप देती है,

अपने आँचल की छाया में

पलने-बढ़ने की सुविधा देती है।

जन्म लेते ही शिशु को

स्तनपान का अमृत मिलता,

पहला शब्द जो मुख से निकले,

वह "माँ" का स्वर ही होता।

माँ के दुलार भरे शब्दों से

मातृभाषा का ज्ञान मिलता,

निस्वार्थ प्रेम और त्याग से

जीवन का सम्मान मिलता।

तन से, मन से, धन से

माँ करती सतत उपकार,

ममता की शीतल छाया में

खिलता जीवन का संसार।

माँ के संस्कारों से ही

वीर और महापुरुष बनते हैं,

जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज को

माता के आदर्श प्रेरित करते हैं।

तमिल की एक सुंदर कहावत है—

"माता जैसी संतान, धागे जैसा कपड़ा",

सुशिक्षित और संस्कारवान माँ से

निखरता शिशु का व्यक्तित्व सारा।





माँ से ही बंधुत्व के रिश्ते,

माँ से ही परिवार की शान,

माँ न हो तो मानव जीवन में

न रहे ममता का सम्मान।

मातृभाषा, मातृभूमि और माता,

जीवन के तीन अनमोल राग,

इनके प्रति श्रद्धा और समर्पण

बनें मानव जीवन का सुहाग।

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भावार्थ:

माता केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन को संस्कार, भाषा, प्रेम, त्याग और व्यक्तित्व प्रदान करने वाली प्रथम गुरु है। माता, मातृभाषा और मातृभूमि का सम्मान मानव जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य है।

सादर प्रणाम। 🙏

जय माता। जय मातृभूमि। जय मातृभाषा।

Sunday, June 14, 2026

समय यात्रा

 


समय का मुसाफिर 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

15.6.26

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मानव समय का मुसाफिर।

मोसम समय का मुसाफिर।

 बचपन एक मुसाफिर 

 लड़कपन एक मुसाफ़िर।

जवानी एक मुसाफिर 

 बुढ़ापा यात्रा का विश्राम 

 मौसमी फूल फल

सूर्य चन्द्र चौबीस घंटों के मुसाफिर।।

 पृथ्वी के सब जीव-जंतु जीवन काल निर्णय।

 अतः भूलोक समय का मुसाफिर।

नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

आपकी रचनाओं में जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन और अनुभूति की गहराई दिखाई देती है। "समय का मुसाफिर" हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन की प्रत्येक अवस्था एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं।

समय चलता रहता है,

जीवन बदलता रहता है।

जो समय का महत्व समझ ले,

उसका जीवन सँवरता रहता है।

आप इसी प्रकार हिंदी सेवा, साहित्य-साधना और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से अपने विचारों का प्रकाश फैलाते रहें।

ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और सृजन की निरंतर प्रेरणा प्रदान करें। आपकी धर्मपत्नी को भी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ मिले, यही मंगलकामना है।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री गणेशाय नमः।

जय श्री राम।

जय हनुमान।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

सादर प्रणाम एवं शुभकामनाएँ।

प्रार्थना

 


नमस्ते वणक्कम्।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ
‌मेरी प्यारी अर्द्धांगिनी मेरी जान
जल्दी स्वस्थ हो जाएँ।
मेरी जाने अनजाने गलतियों को
माफ़ कर दीजिए।
हे भगवान मेरे प्राण उनकी प्रार्थना से बची।
उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।
‌विनम्र निवेदन करता हूँ।
ॐ गणेशाय नमः
ॐ कार्तिकेयाय नमः
ॐ नमः शिवाय
ऊँ दुर्गा मैं नमः।
सत् चित् आनन्द स्वामिये नमः।
सच्चिदानंद स्वामिये नमः
अगस्त्याय नमः
भोगरे नमः
कडुवॆळि सिद्ध पुरुषाय नमः
इडैक्काडरे नमः
पुलिप्पाणिये नमः
अऴुकिनी सिद्ध पुरुषाय नमः
ॐशीरडी साईं नमः
ॐ पुट्टभर्ति स्वामिये नमः
जय जय शंकर हर हर शंकर।
ॐ रमण महर्षिये नमः
ॐ राघवेंद्राय नमः
ॐ शेषाद्रि स्वामिये नमः
ॐ गोरख सिद्ध पुरुषायै नमः
ॐ चिदंबरम स्वामिये नमः
ओम् रेड्डी पट्टी स्वामिये नमः
ॐ बड़े भाई साहब नमः।
ॐ पांबन स्वामिये नमः
ओम् पूंडीमहाने नमः
ओं भृगु मुनि ये नमः
ओं भ्रुंगी मुनिये नमः
ओं ईश्वरभट्टाय नमः
ओं कणक्कण पट्टी स्वामिये नमः
ओं माधूरी स्वामिये नमः
ओं चाक्कडै सिद्धपुरुषाय नमः
अरुट पेरुंज्योति अरुट् पॆरुँज्योति
तनिप्पेरुम् करुणै अरुट् पेरुमल ज्योति ।
ओम् भैरवाय नमः
ओं जय हनुमान।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
ॐॐ ॐॐ ॐॐ ॐॐ



नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपकी प्रार्थना में प्रेम, समर्पण, करुणा और जीवनसाथी के प्रति अटूट निष्ठा झलक रही है। अपनी अर्द्धांगिनी के स्वास्थ्य के लिए आपका हृदय जिस वेदना और श्रद्धा से भगवान के चरणों में झुक रहा है, वह स्वयं एक महान तपस्या है।

ईश्वर से मेरी भी यही प्रार्थना है—

हे गणपति, हे शिवशंकर, हे माता दुर्गा, हे मुरुगन, हे साईंनाथ, हे हनुमान, हे सभी सिद्ध पुरुषों और महापुरुषों!

आपकी कृपा से AK जी की धर्मपत्नी को शक्ति, शांति और स्वास्थ्य प्रदान करें।

उनकी पीड़ा कम हो, श्वास सहज हो, मन में साहस बना रहे और उपचार सफल हो।

परिवार को धैर्य, विश्वास और मानसिक बल दें।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।"

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

आपने लिखा — "उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।"

यह एक पति के प्रेम और कर्तव्य का अत्यंत मार्मिक भाव है। वर्षों तक जो साथ निभाता है, उसकी पीड़ा अपनी पीड़ा बन जाती है। आपकी सेवा, जागरण, चिंता और प्रार्थना भी ईश्वर की दृष्टि में एक पुण्य यज्ञ के समान हैं।

विश्वास बनाए रखिए। चिकित्सा और प्रार्थना दोनों साथ-साथ चलें।

ईश्वर आपकी अर्द्धांगिनी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री सुब्रह्मण्याय नमः।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

हार्दिक शुभकामनाएँ एवं प्रार्थनाएँ।

Saturday, June 13, 2026

पुण्य कलश

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏


पुण्य कलश

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

14-6-26

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मानव तो

सर्वगुण संपन्न 

 ज्ञानी, ब्रह्म सम।

पर  महामायादेवी

ईश्वर का एक अंग,

संसार को माया छाया जगत के रूप में 

बनाते रखने में समर्थ।

अचूक, सद्यःफल दाता।

परिणाम स्वरूप वह

 स्वार्थ निस्वार्थ 

बन जाता है।

 अन्याय का साथ देता है।

दशरथ की भूल,

शब्द भेदी बाण का प्रयोग 

शिशु हत्या पाप।

 राम का दुख

 रावण का बुद्धि भ्रष्ट 

 ये सब  न होने

 आदि काल में वेद उपनिषद और अनेक पुराण, प्रासांगिक कथाएँ।

पापों से मुक्ति पाने 

 हवन होम पुण्य कलश का महत्व।

 पुण्य कलश  सकारात्मक ऊर्जा,

 कलश में त्रिदेव और देवियों की उपस्थिति 

 सद्विचारों का स्रोत।

 दान धर्म का महत्व।

 परोपकार्थ

 इदम् शरीरम् की सीख।

 पापों की मुक्ति के लिए 

भूदान स्वर्ण दान चाँदीदान।

  जगत मिथ्या

 ब्रह्म सत्यं।

नश्वर दुनिया 

 अनश्वर सत्य प्रभाव।

 अनश्वर सूक्ष्म शक्ति

 परिणाम 

 अखिलेश्वर की अनंत शक्ति।

 पुण्य कर्म का फल,

 पाप कर्म का दंड।

 मानव  लौकिक 

 बंधन से छूटता नहीँ।

अतः जन्म पुनर्जन्म 

 सुखी दुखी का अनुभव।।

इन सब से छूटकर 

 दिव्य शक्ति सद्बुद्धि 

 आत्मसंतोष, 

आत्मज्ञान पाने,

पुण्य कलश की स्थापना

 फिर भी ज्ञान चक्षु प्राप्त मानव अपने अस्थाई जीवन को स्थाई मानकर 

 नकारात्मक विचार में।

 यही संसार है के दुःखों का मूल।

 पुण्य कलश की स्थापना 

आदर्श परोपकार जीवन कै लिए।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई


आपकी रचना में आध्यात्मिक चिंतन, कर्मफल, माया, दान, परोपकार तथा पुण्य कलश के प्रतीकात्मक महत्व का सुंदर समावेश है। भाव अत्यंत गहन हैं। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहमय रूप देने का एक विनम्र प्रयास प्रस्तुत है।

पुण्य कलश

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

14-6-2026

मानव तो

सर्वगुण-संपन्न,

ज्ञानी, ब्रह्म के समान है।

पर महामायादेवी,

ईश्वर की ही एक शक्ति,

इस संसार को

माया-छाया जगत के रूप में

संचालित करने में समर्थ है।

वह अचूक,

सद्यःफलदायिनी है।

उसके प्रभाव से मानव

स्वार्थी भी बन जाता है,

तो कभी निस्वार्थ भी।

कभी अन्याय का साथ देता है,

कभी धर्म के पथ पर चलता है।

दशरथ की भूल,

शब्दभेदी बाण का प्रयोग,

श्रवण कुमार के वध का पाप;

राम का दुःख,

रावण की बुद्धि का भ्रष्ट होना—

इन सब घटनाओं में

कर्मफल का संदेश छिपा है।

इसीलिए आदि काल से

वेद, उपनिषद, पुराण

और अनेक प्रेरक कथाएँ

मानव को सत्कर्म का मार्ग दिखाती हैं।

पापों से मुक्ति हेतु

हवन, होम और पुण्य कलश का

विशेष महत्व बताया गया है।

पुण्य कलश

सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

मान्यता है कि उसमें

त्रिदेव तथा देवियों का वास होता है।

वह सद्विचारों का स्रोत है,

दान और धर्म का प्रेरक है,

और सिखाता है—

"परोपकारार्थम् इदं शरीरम्"

अर्थात यह शरीर

परोपकार के लिए है।

भूदान, स्वर्णदान, चाँदीदान

और सेवा के विविध रूप

मानव को पुण्य के मार्ग पर ले जाते हैं।

जगत मिथ्या है,

ब्रह्म ही सत्य है।

यह संसार नश्वर है,

पर सत्य और दिव्य शक्ति अमर हैं।

पुण्य कर्म का फल मिलता है,

पाप कर्म का दंड भी।

फिर भी मानव

लौकिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता।

अतः जन्म-पुनर्जन्म के चक्र में

सुख-दुःख का अनुभव करता रहता है।

इन बंधनों से ऊपर उठकर,

सद्बुद्धि, आत्मसंतोष

और आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु

पुण्य कलश की स्थापना

एक शुभ प्रेरणा है।

किन्तु ज्ञान-चक्षु प्राप्त मानव भी

अपने अस्थायी जीवन को स्थायी मानकर

नकारात्मक विचारों में उलझ जाता है।

यही संसार के दुःखों का मूल है।

अतः पुण्य कलश की स्थापना

केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,

अपितु आदर्श, परोपकारी

और सदाचारी जीवन का संकल्प है।

— एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 🙏

रचना का मूल संदेश अत्यंत सुंदर है— सत्कर्म, परोपकार, आत्मज्ञान और सकारात्मक चिंतन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।

Friday, June 12, 2026

बाल श्रम दिवस

 नमस्ते आदरणीय अनंत कृष्णन जी।

आपकी रचना में बाल श्रम की सामाजिक विडंबना, गरीबी, उपेक्षा और बच्चों के शोषण के प्रति गहरी चिंता व्यक्त हुई है। इसे थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

13-06-2026

मानव जीवन में

जीने के लिए धन की आवश्यकता है।

परंतु धनाभाव में भी

संतान का जन्म

ईश्वर की देन है।

किन्तु जब माता-पिता

पालन-पोषण में असमर्थ होते हैं,

तब जन्म लेती है

एक सामाजिक त्रासदी—

बाल श्रम।

कहीं पियक्कड़ पिता,

कहीं असहाय माँ,

कहीं पिता का नदारद होना,

कहीं जन्म लेते ही

शिशु का त्याग।

कुछ बच्चे अनाथालयों में पलते हैं,

कुछ अपराधियों के हाथों

शोषण का शिकार बनते हैं।

गरीबी, उपेक्षा और विवशता

बचपन का अधिकार छीन लेती है।

सौतेले व्यवहार की पीड़ा,

भूख और अभाव की मार,

नन्हे हाथों को

पुस्तकों की जगह

मजदूरी का बोझ दे देती है।

दयालु और संवेदनशील लोग

बाल श्रम के विरुद्ध

आवाज़ उठाते हैं,

समाज को जागृत करते हैं,

और ठोस कदम भी उठाते हैं।

भीख माँगना भी

एक संगठित धंधा बन गया है।

मासूम बच्चों को आगे कर

दया का व्यापार होता है,

पर उसे रोकने वाले

बहुत कम दिखाई देते हैं।

केवल एक दिवस मनाने से

समस्या का समाधान नहीं होगा।

आवश्यक है

जागरूकता, शिक्षा और संवेदना।

अमीर संतान के लिए तरसते हैं,

गरीबों के यहाँ

फुटपाथों पर बचपन पलता है।

यह भी जीवन का

एक कठोर सत्य है।

आओ मिलकर संकल्प लें—

हर बच्चे को शिक्षा मिले,

हर बच्चे को सम्मान मिले,

हर बच्चे को उसका बचपन मिले।

नारा लगाएँ—

"बाल श्रमिक रहने न देंगे,

बचपन का अधिकार देंगे।"

"पुस्तक, शिक्षा और मुस्कान,

हर बच्चे का हो सम्मान।"

"बाल श्रम का हो अंत,

शिक्षा से बने उज्ज्वल भविष्य अनंत।"

सादर।

Thursday, June 11, 2026

नये भोर की प्रतीक्षा में

 एक नये भोर की प्रतीक्षा।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

++++++++++++++

12-6-26

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 हे अंतर्यामी!

तेरे चरणो में शरणागति मैं।

 तेरे ही ध्यान में 

 एक नये भोर की प्रतीक्षा में,

 जी के तम मिटने,

 पत्नी अपने रोग से बचने,

 जीवन में सुख देने,

 सर्वेश्वर तेरे चरणों में 

 निवेदन।

 जीवन में  तूने  सब कुछ दिया।

 मेरी पत्नी को स्वस्थ बनाकर,

अति शीघ्र चंगा करके,

मेरे जीवन में 

 सकारात्मक ऊर्जा दो।

शक्ति दो।

 सिवा तेरे अनुग्रह 

तेरी कृपा के

 और कोई शक्ति है नहीं 

नयी शक्ति नया उम्मीद 

‌देनै तेरे चरणों में 

शरणागत हूँ मैं।

 तू है शरणागत वत्सल।

 मार्कंडेय को जीवन दान दिया।

गूँगे को बोलने की शक्ति दी।

 मूर्ख कालिदास को

 महा कवि बनाया।

 नरसिंह अवतार लेकर 

 प्रह्लाद को बचाया।

मैं  निवेदन करता हूँ,

जल्दी चंगा करो।

शक्ति दो।

 नये भोर की प्रतीक्षा में 

 हर कोई तेरे ध्यान में।


आपकी भावाभिव्यक्ति अत्यंत हृदयस्पर्शी है। इसमें पत्नी के स्वास्थ्य हेतु प्रार्थना, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आशा का सुंदर भाव व्यक्त हुआ है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर प्रवाह और काव्यात्मकता बढ़ाई जा सकती है।

नये भोर की प्रतीक्षा में

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

12-6-2026

हे अंतर्यामी!

तेरे चरणों में शरणागत हूँ मैं।

तेरे ही ध्यान में लीन,

एक नये भोर की प्रतीक्षा में।

जीवन का तम मिट जाए,

पत्नी मेरे रोग से उबर जाए,

जीवन में फिर सुख का सूरज उगे,

ऐसी विनती तेरे चरणों में।

हे सर्वेश्वर!

जीवन में तूने सब कुछ दिया,

अब मेरी जीवन-संगिनी को

स्वस्थ कर, नवजीवन प्रदान कर।

मेरे जीवन में

सकारात्मक ऊर्जा भर दे,

संघर्ष सहने की शक्ति दे,

आशा का दीप पुनः जला दे।

तेरी कृपा के बिना

और कोई शक्ति नहीं।

नई शक्ति, नया विश्वास,

नया उत्साह प्रदान कर।

मैं तेरी शरण में हूँ,

तू शरणागत-वत्सल है।

मार्कण्डेय को जीवनदान दिया,

गूँगे को वाणी का वरदान दिया।

मूर्ख कालिदास को

महाकवि बना दिया,

नृसिंह रूप धारण कर

प्रह्लाद की रक्षा की।

मैं भी विनम्र निवेदन करता हूँ—

मेरी प्रार्थना स्वीकार करो,

पत्नी को शीघ्र स्वास्थ्य दो,

जीवन में पुनः मुस्कान भरो।

नये भोर की प्रतीक्षा में

मैं तेरा ध्यान करता हूँ,

और इस संसार का हर प्राणी

तेरी ही करुणा की राह निहारता है।

ओम् नमः शिवाय।

ओम् सरवनभवाय नमः।

ओम् मुरुगा। 🙏

आपकी पत्नी के स्वास्थ्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य और आपको धैर्य, शक्ति तथा आशा प्रदान करें। 🙏🌅

Wednesday, June 10, 2026

जीवन की अड़चनें

 अदृश्य दीवारें 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

11-6-26.

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मानव जीवन में है,

 अनेक अदृश्य दीवारें।

 मानव ज्ञान  से

परे एक

दिव्य ज्ञान ,

 दिव्य 

सृष्टियाँ,

 जन्म

जन्म के बाद 

 पलने में 

अमीरी, ग़रीबी, बीमारी।

असाध्य साध्य मंजिलें।

 सफलता में ईर्ष्या,

 शत्रृओं का सामना।

  अचानक प्राकृतिक प्रकोप,

 पूर्ण अपूर्ण  ख्वाहिशें।

बाढ, आँधी- तूफान,

संक्रामक रोग,

 तथास्तु भगवान की लीला,

 बुरे समय में 

 बुद्धि भ्रष्ट होना, 

विधि की विडंबना

 बुद्धि लब्धि 

  बाह्य रूप, भीतर कपट

 ये सब मानव जीवन के

अदृश्य दीविरें।

 अर्थात ज्ञान से परे बाधाएँ।

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जीवन की अड़चनें।

 आपकी रचना में  के रहस्यों, नियति, ईर्ष्या, विपत्तियों और मानव की सीमाओं को "अदृश्य दीवारों" के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इसे थोड़ा सुव्यवस्थित रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

अदृश्य दीवारें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

11-6-2026

मानव जीवन में हैं

अनेक अदृश्य दीवारें।

मानव ज्ञान से परे

एक दिव्य ज्ञान,

दिव्य सृष्टियाँ

और रहस्यमयी विधान।

जन्म से लेकर जीवन-पथ तक,

कहीं अमीरी, कहीं गरीबी,

कहीं बीमारी का बोझ,

तो कहीं मंज़िलों की दुर्लभ सीढ़ी।

सफलता के साथ ईर्ष्या,

शत्रुओं का सामना,

अचानक प्राकृतिक प्रकोप,

अधूरी इच्छाओं का ताना-बाना।

बाढ़, आँधी और तूफ़ान,

संक्रामक रोगों की मार,

तथास्तु भगवान की लीला,

समय-समय का व्यवहार।

बुरे समय में बुद्धि भ्रष्ट होना,

विधि की विचित्र विडंबना,

बाहरी रूप में सरलता,

भीतर कपट की साधना।

ये सब मानव जीवन की

अदृश्य दीवारें हैं,

अर्थात् ज्ञान से परे

खड़ी अनगिनत बाधाएँ हैं।

इन दीवारों को पार करने का

साधन है धैर्य और विवेक,

ईश्वर-विश्वास, सत्कर्म और

आत्मबल का आलोक।

भावार्थ:

मानव जीवन में अनेक ऐसी बाधाएँ और परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें हम देख नहीं सकते, समझ नहीं सकते या नियंत्रित नहीं कर सकते। यही "अदृश्य दीवारें" हैं, जिनका सामना धैर्य, विवेक और ईश्वर-विश्वास से किया जा सकता है।

रचना का विषय गहन और चिंतनशील है। विशेष रूप से "बाह्य रूप, भीतर कपट" तथा "बुद्धि भ्रष्ट होना" जैसी पंक्तियाँ जीवन की यथार्थ परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं।॥

Tuesday, June 9, 2026

मानव और वृक्ष




वृक्ष एवं मानव।

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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10-6-26.

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मानव को जीने के लिए 

 शुद्ध प्राणवायु की ज़रूरत है।

पेड़ कार्बन्डै

 आक्सैड चूसकर 

शुद्ध आक्सिजन देते हैं।

आदिकाल में मनुष्य 

पेड़ के खोखले में 

रहता था। 

मनुष्य और आवास।

पेड़ के स्वादिष्ट फल,

 पौष्टिक आहार है।

 पेड़ के सूखे पत्ते खाद।

 पेड़ की लकड़ी ईँधन ।

 पेड़ ही हमारे घर की

खिड़की और दरवाजे।

  ठंड प्रदेश में ,

 जंगलों में ,

 पाश्चात्य देशों में 

 लकड़ी के घर।

लकड़ी  से ही नावें 

 कुर्सी मेज अल्मारी दरवाजा।

आदि मानव का मान रक्षक लकडी की छाल।

मानव जीने के लिए 

पानी चाहिए,

वह भी पेड़ों पर के कारण।

 भू क्षरण के रक्षक।

खजूर, आम,इमली,कटहल केला, अमरूद ,नारियल

 नारंगी सेब आदि फल।

वाहन‌ के चक्र

 ये सब  पेड़ के कारण।

  चंदन पेड़ की महक,

सागौन की लकड़ी 

 बेहद मजबूत, टिकाऊ और दीमक-प्रतिरोधी होती है। यह पानी और मौसम की मार आसानी से झेल सकती है।

 मानव और पेड़ 

दोनों में पेड़ परोपकारी।

 मानव के जीने का आधार।

कबीर  का यह दोहा

 पेड़ की गुणवत्ता  और मानव संसाधन के लिए 

 बढ़िया है।

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।

 मानव परोपकार के गुण के शिक्षक पेड़  होते हैं।


नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में वृक्षों के महत्व, मानव जीवन से उनके गहरे संबंध तथा परोपकार की भावना का सुंदर वर्णन है। भाषा और प्रस्तुति को थोड़ा परिष्कृत कर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

वृक्ष एवं मानव

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

10-6-2026

मानव को जीने के लिए

शुद्ध प्राणवायु की आवश्यकता है।

वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर

जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।

आदिकाल में मानव

वृक्षों के खोखलों में आश्रय पाता था।

मानव और उसके आवास का

वृक्षों से अटूट संबंध रहा है।

वृक्षों के स्वादिष्ट फल

पौष्टिक आहार बनते हैं।

सूखे पत्ते उत्तम खाद,

लकड़ी ईंधन का आधार है।

घर की खिड़कियाँ, दरवाजे,

कुर्सियाँ, मेज और अलमारियाँ,

नावों से लेकर अनेक उपयोगी वस्तुएँ

वृक्षों की देन हैं।

शीत प्रदेशों और वनों में

लकड़ी के घर बनाए जाते हैं।

आदिमानव के तन की रक्षा भी

वृक्षों की छाल ने ही की थी।

मानव के लिए जल आवश्यक है,

और वर्षा चक्र में भी

वृक्षों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

वे भूमि क्षरण रोककर

धरती की रक्षा करते हैं।

खजूर, आम, इमली, कटहल,

केला, अमरूद, नारियल,

संतरा, सेब और अनेक फल

वृक्षों का अमूल्य उपहार हैं।

चंदन की सुगंध,

सागौन की दृढ़ता,

प्रकृति की अनुपम देन हैं।

सागौन की लकड़ी मजबूत, टिकाऊ

और दीमक-प्रतिरोधी होती है।

मानव और वृक्ष दोनों जीवित हैं,

पर वृक्ष निस्वार्थ परोपकारी हैं।

वे मानव जीवन के आधार हैं

और सेवा का संदेश देते हैं।

संत कबीर का यह दोहा

वृक्षों के परोपकार को सुंदरता से व्यक्त करता है—

"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।"

वास्तव में,

वृक्ष मानव को परोपकार,

त्याग और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं।

मानव यदि वृक्षों के गुण अपनाए,

तो समाज और संसार

दोनों अधिक सुखी और समृद्ध बन सकते हैं।

भावार्थ:

"वृक्ष एवं मानव" रचना हमें बताती है कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के सच्चे संरक्षक, पोषक और परोपकार के महान शिक्षक हैं। 🌳🙏



 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में वृक्षों के महत्व, मानव जीवन से उनके गहरे संबंध तथा परोपकार की भावना का सुंदर वर्णन है। भाषा और प्रस्तुति को थोड़ा परिष्कृत कर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

वृक्ष एवं मानव

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

10-6-2026

मानव को जीने के लिए

शुद्ध प्राणवायु की आवश्यकता है।

वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर

जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।

आदिकाल में मानव

वृक्षों के खोखलों में आश्रय पाता था।

मानव और उसके आवास का

वृक्षों से अटूट संबंध रहा है।

वृक्षों के स्वादिष्ट फल

पौष्टिक आहार बनते हैं।

सूखे पत्ते उत्तम खाद,

लकड़ी ईंधन का आधार है।

घर की खिड़कियाँ, दरवाजे,

कुर्सियाँ, मेज और अलमारियाँ,

नावों से लेकर अनेक उपयोगी वस्तुएँ

वृक्षों की देन हैं।

शीत प्रदेशों और वनों में

लकड़ी के घर बनाए जाते हैं।

आदिमानव के तन की रक्षा भी

वृक्षों की छाल ने ही की थी।

मानव के लिए जल आवश्यक है,

और वर्षा चक्र में भी

वृक्षों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

वे भूमि क्षरण रोककर

धरती की रक्षा करते हैं।

खजूर, आम, इमली, कटहल,

केला, अमरूद, नारियल,

संतरा, सेब और अनेक फल

वृक्षों का अमूल्य उपहार हैं।

चंदन की सुगंध,

सागौन की दृढ़ता,

प्रकृति की अनुपम देन हैं।

सागौन की लकड़ी मजबूत, टिकाऊ

और दीमक-प्रतिरोधी होती है।

मानव और वृक्ष दोनों जीवित हैं,

पर वृक्ष निस्वार्थ परोपकारी हैं।

वे मानव जीवन के आधार हैं

और सेवा का संदेश देते हैं।

संत कबीर का यह दोहा

वृक्षों के परोपकार को सुंदरता से व्यक्त करता है—

"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।"

वास्तव में,

वृक्ष मानव को परोपकार,

त्याग और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं।

मानव यदि वृक्षों के गुण अपनाए,

तो समाज और संसार

दोनों अधिक सुखी और समृद्ध बन सकते हैं।

भावार्थ:

"वृक्ष एवं मानव" रचना हमें बताती है कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के सच्चे संरक्षक, पोषक और परोपकार के महान शिक्षक हैं। 🌳🙏

Monday, June 8, 2026

विश्व सागर दिवस

 आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में विश्व सागर दिवस के महत्व, समुद्री व्यापार, सुरक्षा तथा मानव सभ्यता में समुद्र के योगदान का सुंदर वर्णन है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और काव्यमय रूप देकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

Writing

विश्व सागर दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

9-6-2026

भूमि पर फैले जल-विस्तार में,

सागर का अनुपम संसार।

भूमध्य सागर विशाल प्रसिद्ध,

पूरब-पश्चिम तक विस्तृत अपार।

कैस्पियन सागर यूरोप-एशिया के,

मध्य स्थित जल का भंडार।

लाल सागर अफ्रीका-एशिया के बीच,

बनता प्राकृतिक सेतु साकार।

मृत सागर भी अद्भुत झील है,

जॉर्डन-इज़राइल के मध्य स्थित।

इन जलराशियों ने विश्वभर में,

संपर्क और व्यापार को किया विकसित।

जहाज़ी यात्राएँ, विश्व मैत्री,

समुद्रों का अनुपम उपहार।

देशों को जोड़ें, संस्कृतियाँ मिलाएँ,

बढ़ाएँ सहयोग और व्यापार।

समुद्री डाकुओं से रक्षा हो,

आँधी-तूफानों की मिले खबर।

कालाबाज़ारी, आतंक, आक्रमण से,

सुरक्षित रहे सागर का सफर।

प्राचीन काल से तमिलनाडु में,

समुद्री व्यापार रहा महान।

स्वाधीनता युग में व. उ. चिदंबरनार ने,

निजी जहाज़ चलाकर बढ़ाया मान।

समुद्र हमारी अमूल्य धरोहर,

जीवन, विकास और अवसर का आधार।

इसकी रक्षा करना हम सबका,

है नैतिक और वैश्विक दायित्व अपार।

"हमारा महासागर, हमारा दायित्व, हमारा अवसर"—

यही विश्व का आज संदेश।

स्वच्छ, सुरक्षित और समृद्ध सागर,

बनाएँ मिलकर अपना विशेष उद्देश्य।

தமிழில் பாராட்டு :

அருமை ஐயா!

உலக சமுத்திர தினத்தின் முக்கியத்துவம், கடல் வாணிபம், பாதுகாப்பு, மனித நாகரிக வளர்ச்சி ஆகியவற்றை உங்கள் கவிதை அழகாக எடுத்துரைக்கிறது. பரந்த அறிவும் சமூகப் பொறுப்பும் கலந்த சிறந்த படைப்பு. வாழ்த்துகள்! 🌹🙏

நன்றி. வணக்கம்.

Sunday, June 7, 2026

विश्वासघात

 विश्वासघात 

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।8-626

++++++++++

 मानव जीवन में 

उत्थान पतन के मूल में 

विश्वासघात ।

 भारतीय विदेशी शासन और पराधीनता के मूल में 

 भाई भाई  में ईर्ष्या।

 क्रोध, बदला , विदेशियों का साथ देना।

रामायण काल में 

 विभीषण, कैकेई , मंथरा।

महाभारत में तो

 सूची लंबी।

 कुंती,

 कृष्ण का दान माँगना

 कर्ण कवच कुंडल दान में पाना, कुंती द्वारा पांडवों को जिंदा छोडने का कसम कर्ण से लेना।

  सिकंदर के आक्रमण में 

 इन्हीं का द्रोह।

 स्वतंत्रता संग्राम में 

 अंग्रेज़ी वेतन के लिए 

 उनका साथ दिये द्विभाषी।

 अंग्रेज़ी सीखकर भारतीय भाषाओं को

‌अवहेलना किये

 प्रतिभाशाली उच्चवर्ण।

 देश से बढ़कर राव बहादुर सर उपाधी।

 अंग्रेज़ों के अधीन भारतिय सत्याग्रहियों को मारे भारतीय वेतन भोगी सिपाही।

 रीतिकालीन की विलासिता।

 इन घटनाओं की सीख से सबक,

 विश्वासघातियों को कठोर दंइ।

 तमिलनाडु के चुनाव में

डी.एम. के साथ उनके चुनाव चिन्ह से जीते

 उनके समर्थन से जीते

 कांग्रेस, मुस्लिम लीक, कम्युनिस्ट का द्रोह।

‌इन नमकहराम स्वार्थी, पद धन प्रेमी ठगों से

 देशोन्नति में अड़चनें।

 बाधाएँ, रुकावटें।

 यही भारत के   इतिहास की सीख।

 फिर भी भारत की उन्नति 

 देश भक्त, देश प्रमी, निस्वार्थ नेता, अधिकारी,

 सरकारी कर्मचारी,

 कर्त्तव्यपरायण शहीदों के कारण।

 अतः शिक्षा संस्थाओं के पाठ्यक्रम में  देश भक्ति,

 राणा प्रताप सिंह, छत्रपति शिवाजी 

 लाल,बाल,पाल,

 सुभाष चंद्र बोस आदि

 नेताओं की जीवनी,

राष्ट्रीय कवियों की 

 देशप्रेम जगानेवाली कविताओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।

 आजकल अनुशासन की शिक्षा की कमी है,

 केवल जीविकोपार्जन की शिक्षा।

 शिक्षित ईमानदारी लोगों को पद पर रहने न देना ,

ईमानदारी अफसरों को 

अकर्मण्य इलाका देना

 तबादला और इस्तीफा करने, कराने करवाने का जोर देना।

 देश प्रधान, 

 अति कठिनाइयों से

 प्राप्त देश की आज़ादी और एकता और अखंड भारत की रक्षा,

 राष्ट्रीय शिक्षा के विरुद्ध 

 रहनेवाले प्रांतों के मन में 

 प्रांतीय मोह के साथ राष्ट्रीय विचारधारा उत्पन्न करना।

 जागना, जगाना राष्ट्रप्रेम बढ़ाना,

 समय की सदस्य माँग।

 जय भारत। वंदेमातरम।


 





 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय अनंत कृष्णन जी।

आपकी रचना में राष्ट्रप्रेम, इतिहास से सीख लेने की प्रेरणा और नैतिक मूल्यों के प्रति चिंता स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्वासघात

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

8-6-2026

मानव जीवन के उत्थान और पतन के मूल में

विश्वास और विश्वासघात दोनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारत की पराधीनता के इतिहास में भी

आपसी ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और प्रतिशोध ने

कई बार विदेशियों को अवसर प्रदान किया।

रामायण में कैकेयी, मंथरा और विभीषण के प्रसंग हों,

या महाभारत के जटिल घटनाक्रम—

इतिहास और पुराण हमें यह शिक्षा देते हैं कि

स्वार्थ जब कर्तव्य पर भारी पड़ता है,

तो समाज और राष्ट्र दोनों को हानि पहुँचती है।

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में भी

कुछ लोगों ने स्वार्थवश विदेशी शासन का साथ दिया,

जबकि असंख्य देशभक्तों ने

अपने प्राणों की आहुति देकर

स्वतंत्रता का दीप जलाए रखा।

इतिहास की यही सीख है कि

राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना चाहिए।

स्वार्थ, पद और धन के मोह में

राष्ट्रीय एकता को क्षति नहीं पहुँचनी चाहिए।

भारत की उन्नति उन देशभक्तों के कारण हुई है

जिन्होंने निस्वार्थ भाव से

देश, समाज और मानवता की सेवा की।

कर्तव्यनिष्ठ नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों

और अमर शहीदों का योगदान

सदैव स्मरणीय रहेगा।

अतः शिक्षा के पाठ्यक्रम में

देशभक्ति, चरित्र निर्माण और अनुशासन को

विशेष स्थान मिलना चाहिए।

राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी,

लाल-बाल-पाल, सुभाषचंद्र बोस तथा

अन्य महान राष्ट्रनायकों की जीवनगाथाएँ

नई पीढ़ी को प्रेरणा देती रहें।

आज आवश्यकता है कि

केवल जीविकोपार्जन ही नहीं,

अपितु राष्ट्रनिर्माण की शिक्षा भी दी जाए।

राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सद्भाव को सुदृढ़ बनाते हुए

जन-जन में राष्ट्रप्रेम का भाव जागृत किया जाए।

जागें, जगाएँ और राष्ट्रप्रेम बढ़ाएँ—

यही समय की पुकार है।

जय भारत! वंदे मातरम्! 🇮🇳

आपकी भावनाएँ अत्यंत प्रखर हैं। मैंने भाषा को अधिक साहित्यिक और संतुलित रूप देने का प्रयास किया है, जबकि मूल संदेश को यथासंभव सुरक्षित रखा है।


 







++++++++++++

Saturday, June 6, 2026

अन्याय की ईंट

 आपकी रचना समसामयिक सामाजिक यथार्थ को तीखे और स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करती है। इसे थोड़ा परिष्कृत और काव्यात्मक रूप देकर भावों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

अन्याय की ईंटें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

7-6-2026

ईंटें तो होती हैं

घर और इमारतें बनाने के लिए,

पर आज कहीं-कहीं

अन्याय की ईंटों पर ही

सत्ता के महल खड़े किए जाते हैं।

वोट पाने और दिलाने में

रिश्वत का खेल,

पदोन्नति और नियुक्ति में

सिफारिश और धन का मेल।

सांसद, विधायक, मंत्री तक

जब भ्रष्टाचार की नींव पर चुन लिए जाएँ,

तो प्रशासन की इमारत में

न्याय के दीप कैसे जगमगाएँ?

जन्म प्रमाण-पत्र हो या

मृत्यु का प्रमाण,

संपत्ति का क्रय-विक्रय हो या

कार्यालय का कोई काम,

हर ओर दलाली का जाल

और घूस का बढ़ता नाम।

न्यायालयों में भी कभी-कभी

धन का पलड़ा भारी दिखता है,

न्याय की ईंटों से अधिक

चतुर वकीलों का कौशल बिकता है।

आयकर की भूलभुलैया में

छिपाने और बचाने की कला,

ड्राइविंग लाइसेंस, बिजली, पानी,

हर सेवा में फैला गला-सड़ा सिलसिला।

यों ही यदि अन्याय की ईंटों से

व्यवस्था का निर्माण होगा,

तो जनविश्वास का सुंदर भवन

धीरे-धीरे वीरान होगा।

संदेश:

अन्याय की ईंटों से बनी इमारतें भले ऊँची दिखाई दें, पर वे टिकाऊ नहीं होतीं। सच्चा समाज न्याय, ईमानदारी और नैतिकता की मजबूत नींव पर ही खड़ा रह सकता है।

बहुत सार्थक और विचारोत्तेजक रचना। आपने समाज की एक गंभीर समस्या को निर्भीकता से व्यक्त किया है।

Friday, June 5, 2026

विश्व विश्व पर्यावरण दिवसएस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति6-6-2026 मानव आज विज्ञान के युग मेंनित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है,किन्तु प्रकृति के नियमों से दूर होकरकृत्रिम सुखों में खो रहा है। बिजली के पंखे, वातानुकूलित कक्ष,फ्रिज में रखा बासी भोजन,जंगलों का अंधाधुंध विनाश,पहाड़ों का चूर्णीकरण,कारखानों का धुआँ और अपशिष्ट,धरती और जल का निरंतर दोहन। वाहनों का बढ़ता शोर,ऊँची-ऊँची इमारतों का विस्तार,गौरैया का शहरों से विलुप्त होना,खेतों का सिकुड़ना,रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग,झीलों और तालाबों का लुप्त होना—ये सब प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। परिणामस्वरूपवायु प्रदूषण, जल प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण, भूमि प्रदूषण,यहाँ तक कि विचार प्रदूषण भीमानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।धरती का तापमान बढ़ रहा हैऔर पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है। इसी चेतना को जगाने हेतुविश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।यह हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है—प्लास्टिक का उपयोग कम करें,अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ,जल, जंगल और जमीन की रक्षा करें। आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें— "पेड़ लगाओ, हरियाली लाओ,धरती को फिर से स्वर्ग बनाओ।" "प्रदूषण मिटाओ, पर्यावरण बचाओ,धरती को रहने योग्य बनाओ।" "जल है तो कल है,धरती का संरक्षण ही हमारा बल है।" "एक पेड़, एक जीवन;धरती बचाना हमारा सच्चा संकल्प है।" "कचरा फैलाना बंद करो,धरती को संवारना शुरू करो।" "पृथ्वी बचाओ, भविष्य बचाओ;पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का आधार है।" आज का हर पौधाकल की सुरक्षित साँस है।आइए, हम सभी मिलकरप्रकृति की रक्षा का संकल्प लेंऔर आने वाली पीढ़ियों कोस्वच्छ, सुंदर और हरित धरती सौंपें। विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

 


विश्व पर्यावरण दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
6-6-2026

मानव आज विज्ञान के युग में
नित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है,
किन्तु प्रकृति के नियमों से दूर होकर
कृत्रिम सुखों में खो रहा है।

बिजली के पंखे, वातानुकूलित कक्ष,
फ्रिज में रखा बासी भोजन,
जंगलों का अंधाधुंध विनाश,
पहाड़ों का चूर्णीकरण,
कारखानों का धुआँ और अपशिष्ट,
धरती और जल का निरंतर दोहन।

वाहनों का बढ़ता शोर,
ऊँची-ऊँची इमारतों का विस्तार,
गौरैया का शहरों से विलुप्त होना,
खेतों का सिकुड़ना,
रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग,
झीलों और तालाबों का लुप्त होना—
ये सब प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं।

परिणामस्वरूप
वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण,
ध्वनि प्रदूषण, भूमि प्रदूषण,
यहाँ तक कि विचार प्रदूषण भी
मानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।
धरती का तापमान बढ़ रहा है
और पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है।

इसी चेतना को जगाने हेतु
विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
यह हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है—
प्लास्टिक का उपयोग कम करें,
अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ,
जल, जंगल और जमीन की रक्षा करें।

आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें—

"पेड़ लगाओ, हरियाली लाओ,
धरती को फिर से स्वर्ग बनाओ।"

"प्रदूषण मिटाओ, पर्यावरण बचाओ,
धरती को रहने योग्य बनाओ।"

"जल है तो कल है,
धरती का संरक्षण ही हमारा बल है।"

"एक पेड़, एक जीवन;
धरती बचाना हमारा सच्चा संकल्प है।"

"कचरा फैलाना बंद करो,
धरती को संवारना शुरू करो।"

"पृथ्वी बचाओ, भविष्य बचाओ;
पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का आधार है।"

आज का हर पौधा
कल की सुरक्षित साँस है।
आइए, हम सभी मिलकर
प्रकृति की रक्षा का संकल्प लें
और आने वाली पीढ़ियों को
स्वच्छ, सुंदर और हरित धरती सौंपें।

विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Thursday, June 4, 2026

गाँव और शहरी जीवन

 आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में गाँव और शहर के जीवन का यथार्थपूर्ण चित्रण है। भावों को बनाए रखते हुए इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ:

गाँव से शहर का सफ़र

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

5-6-2026

मेरा गाँव था अति छोटा,

न आवागमन की सुविधा थी,

नदी तो थी, पर पुल नहीं था।

वर्षाकाल आते ही

चारों ओर जल ही जल दिखाई देता।

वहीं से मैं चेन्नई आया,

एक बार वर्षा ऋतु में मुंबई भी गया।

तब मन में विचार आया—

मेरा गाँव ही कितना अच्छा था।

शहर में कूड़ों के ढेर,

फुटपाथों पर जीवन बिताते लोग,

थोड़ी-सी वर्षा होते ही

नालों की दुर्गंध फैल जाती है।

न गाँव जैसी शांति,

न वैसा आत्मीय वातावरण।

मैं जिस गेटेड कम्यूनिटी में रहता हूँ,

वहाँ पाँच सौ से अधिक घर हैं,

पर गाँव की तरह खुले दरवाज़े नहीं,

सब अपने-अपने संसार में बंद हैं।

गाँव में मिलते ही

लोग कुशल-क्षेम पूछते हैं,

एक-दूसरे को पहचानते हैं।

शहर में यह अपनापन दुर्लभ है।

ऑटो वालों की मनमानी,

यंत्रीकृत जीवन की भाग-दौड़,

लंगोटीधारी से लेकर करोड़पति तक—

सब इसी दौड़ में शामिल हैं।

हाँ, शहर की एक विशेषता है—

यहाँ किसी न किसी प्रकार का काम मिल जाता है।

आय के अनुसार

आवास और भोजन की व्यवस्था भी हो जाती है।

इसीलिए लोग शहर के

कोलाहल और दुर्गंध को सहते हुए भी

जीवन बिताते हैं।

किन्तु सरकार, उद्योगपति और नगरवासी

यह बात कभी न भूलें कि

धन, कारखाने, कारें और ऊँची इमारतें

तभी सार्थक हैं,

जब गाँव का किसान अपने परिश्रम से

अन्न उपजाता रहे।

यदि किसान न हो,

तो भूख मिटाने वाला कोई नहीं।

अतः गाँवों में सशक्त ग्राम-स्वराज स्थापित हो,

किसानों को प्राथमिकता मिले,

उनका सम्मान और जीवन स्तर बढ़े।

सच ही कहा गया है—

"भूखे भजन न होय गोपाला।"

🌾 गाँव भारत की आत्मा है, और किसान भारत का अन्नदाता। 🌾

आपकी रचना में सामाजिक चेतना, ग्रामीण जीवन का अपनापन और किसान के प्रति सम्मान का सुंदर संदेश निहित है।

Wednesday, June 3, 2026

पैर गाडी दिवस

 आपकी रचना में स्मृतियाँ, सामाजिक परिवर्तन और साइकिल के इतिहास का सुंदर समन्वय है। इसे थोड़ा परिष्कृत एवं काव्यमय रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व साइकिल दिवस

(पैरगाड़ी का महत्त्व)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

4-6-2026

पैरगाड़ी एक अनोखा वाहन,

सादा जीवन, उच्च विधान।

जब मैं आठ वर्ष का बालक था,

हमारे गाँव में साइकिल का मालिक

बहुत बड़ा अमीर माना जाता था।

किराये पर मिलती थी साइकिल,

एक घंटे का अधन्नी भाड़ा।

पर वह अधन्नी जुटाना भी

हम बच्चों के लिए था बड़ा कठिन।

उस समय वही सबसे तेज़ सवारी,

फिर भी नियमों की थी जिम्मेदारी।

सरकार को कर देना पड़ता था,

डबल सवारी अपराध कहलाती थी।

रात्रि में दीप जलाकर चलना,

अनिवार्य नियम माना जाता।

डायनमो की चमकती रोशनी

साइकिल की शान बढ़ाती जाती।

आज साइकिलों की संख्या घटी,

मोटर वाहनों की भीड़ बढ़ी।

किन्तु साइकिल का महत्त्व आज भी,

कहीं कम नहीं हुआ है।

न पेट्रोल चाहिए, न डीज़ल,

बस पैडलों का सतत प्रयास।

चलाने से व्यायाम भी होता,

स्वास्थ्य का मिलता है उपहार।

पेट्रोल के बढ़ते दामों पर,

कभी-कभी नेता और मंत्री भी

साइकिल चलाकर संदेश देते हैं

सादगी और बचत का।

सन् 1817 में जर्मनी के

Karl Drais ने

लकड़ी की, बिना पैडल और बिना चेन वाली

प्रारम्भिक पैरगाड़ी का निर्माण किया।

फिर सन् 1839 में

Kirkpatrick Macmillan ने

पैडल युक्त साइकिल का विकास किया।

यही क्रम आगे बढ़ता गया,

और आज गियर वाली आधुनिक साइकिलों तक पहुँच गया।

साइकिल केवल वाहन नहीं,

स्वास्थ्य, पर्यावरण और सादगी की पहचान है।

विश्व साइकिल दिवस पर

आइए इसका महत्त्व समझें और अपनाएँ।

साइकिल चलाना स्वास्थ्यप्रद है,

और प्रकृति के प्रति हमारा सुंदर योगदान भी। 🚲🌿

संदेश:

"पैडल घुमाइए, स्वास्थ्य पाइए;

प्रदूषण घटाइए, पर्यावरण बचाइए।"

Tuesday, June 2, 2026

अनमोल वचन

 


अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।

++++++++++++++

++++++++++++++++

अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।


अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

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भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।








 

 



 

 






 

 

 



 



 






 


 





 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹






 

 



 

 






 

 

 



 



 






 


 





 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹


 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹


नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹

विश्व माता-पिता दिवस

 

विश्व माता-पिता दिवस।

एस ‌. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-6-26

माता-पिता गुरु ईश्वर

भारतीय धर्म की नसीहतों में श्रेष्ठ।

 हर रोज़ माता पिता की आशीषें लेना।

नमस्कार करना भारतीय धर्म।

 तब माता-पिता के लिए विश्व दिवस क्यों?

 भारतीय धर्म में 

 वैवाहिक बंधन बीच में नहीं छूटता।

 पसंद हो या न पसंद

‌जीवन पर्यंत अलग नहीं होते।

 भारतीय धर्म तलाक शब्द नहीं जानता।

पति की मृत्यु होते ही

 पत्नी का जिंदा जलाया करते।

वह सती प्रथा सुधारवादी 

 राजा राममोहन राय के द्वारा बंद हुई।

 विधवा पुनर्विवाह का शुभारंभ हुआ।

 फिर भी माता पिता तो वंदनीय,

 जो भगवान के प्रतिनिधि बनकर  प्रत्यक्ष देवी देवता बनकर शिशु का जन्म देकर,

 शिक्षा दीक्षा तक साथ देकर विवाह तक जिम्मेदारी लेते।

 पर विदेशी भारत में आये,

 तलाक शब्द आया।

 पहली शादी के बच्चे के रहते,

 तलाक हो जाने पर

 वह बच्चा माँ के साथ या

 पिता के साथ।

 पाश्चात्य देशों में 

 तलाक, पुनर्विवाह मामूली बात।

 अतः माता पिता से बिछुड़ी संतानें,

 माता हीन,पिता हीन हो जाते।

 माता या पिता से मिलना कभी कभी,

 या वह भी संभव नहीं।

अतः माता-पिता दिवस 

 पाश्चात्य अनुकरण।

 भारतीय परंपरा में 

 माता या पिता दिवस

 दोनों  की मृत्यु के बाद ही।

मातृ-पितृ तर्पण।

 अब भारत भी पाश्चात्य 

 देश के जैसे 

  माता-पिता से साल में 

 एक बार मिलने आते।

कारण स्नातक स्नातकोत्तर  डाक्ट्रेट 

 नोकरी विदेश में 

 माता -पिता  , भाई बहन बहु का सम्मिलित परिवार कम होता जा रहा है।

वृद्धाश्रम बढ़ता जा रहा है।

 तलाक की संख्या बढ़ रही है।

 अंतर्जातीय,

 अंतर्मजहबी  विवाह।

 एकैल परिवार,

 दूर दूर 

की नौकरी ,

 माता-पिता दिवस मनाने

 मजबूर कर दिया।

 अतः हम भी पालन करने में विवश हैं।

 यकीनन भारत में 

 

रोज  माता पिता की आराधना करना  भारतीय धर्म हैं।

 राम जैसा आज्ञाकारी पुत्र  भारतीय देन है।



नमस्ते वणक्कम्।

आपकी भावाभिव्यक्ति में भारतीय संस्कृति, माता-पिता के प्रति श्रद्धा और बदलते सामाजिक परिवेश की चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए प्रस्तुत है—

विश्व माता-पिता दिवस

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

2-6-2026

माता, पिता, गुरु और ईश्वर—

भारतीय संस्कृति में इनका स्थान सर्वोच्च माना गया है।

प्रतिदिन माता-पिता का आशीर्वाद लेना,

उन्हें प्रणाम करना,

हमारी सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि

माता-पिता के लिए अलग से "विश्व दिवस" की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारतीय जीवन-दर्शन में

वैवाहिक संबंध को एक पवित्र बंधन माना गया है,

जो जीवनपर्यंत निभाने का संकल्प देता है।

समय के साथ समाज में अनेक परिवर्तन आए।

सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का अंत हुआ,

विधवा पुनर्विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ,

और समाज सुधार की नई चेतना जागृत हुई।

किन्तु माता-पिता का महत्व कभी कम नहीं हुआ।

वे ही तो भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि हैं,

जो संतान को जन्म देते हैं,

उसका पालन-पोषण करते हैं,

शिक्षा, संस्कार और जीवन-निर्माण में

अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं।

आधुनिक युग में परिस्थितियाँ बदल रही हैं।

उच्च शिक्षा, रोजगार और विदेश-प्रवास के कारण

संयुक्त परिवारों का स्वरूप सिमटता जा रहा है।

संतानें माता-पिता से दूर रहने को विवश हैं।

वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है,

एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है,

और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता

कई बार दूरी की भेंट चढ़ जाती है।

इन्हीं बदलती परिस्थितियों ने

माता-पिता दिवस जैसे अवसरों को जन्म दिया है,

ताकि संतानें कम-से-कम एक दिन ही सही,

अपने माता-पिता के प्रति

कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त कर सकें।

किन्तु भारतीय संस्कृति का संदेश इससे कहीं बड़ा है।

यह हमें सिखाती है कि

माता-पिता का सम्मान किसी एक दिन का नहीं,

जीवन के प्रत्येक दिन का कर्तव्य है।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम

भारतीय संस्कृति के उस आदर्श पुत्र का प्रतीक हैं,

जिसने माता-पिता की आज्ञा और सम्मान को

अपने जीवन का सर्वोच्च धर्म माना।

आइए, विश्व माता-पिता दिवस पर

यह संकल्प लें कि

हम केवल एक दिन नहीं,

प्रतिदिन माता-पिता की सेवा, सम्मान और आराधना करेंगे।

माता-पिता का प्रेम ही जीवन का प्रथम तीर्थ है,

और उनका आशीर्वाद ही सबसे बड़ा वरदान।

🙏 मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। 🙏