आपकी रचना में के रहस्यों, नियति, ईर्ष्या, विपत्तियों और मानव की सीमाओं को "अदृश्य दीवारों" के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इसे थोड़ा सुव्यवस्थित रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:
अदृश्य दीवारें
एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
11-6-2026
मानव जीवन में हैं
अनेक अदृश्य दीवारें।
मानव ज्ञान से परे
एक दिव्य ज्ञान,
दिव्य सृष्टियाँ
और रहस्यमयी विधान।
जन्म से लेकर जीवन-पथ तक,
कहीं अमीरी, कहीं गरीबी,
कहीं बीमारी का बोझ,
तो कहीं मंज़िलों की दुर्लभ सीढ़ी।
सफलता के साथ ईर्ष्या,
शत्रुओं का सामना,
अचानक प्राकृतिक प्रकोप,
अधूरी इच्छाओं का ताना-बाना।
बाढ़, आँधी और तूफ़ान,
संक्रामक रोगों की मार,
तथास्तु भगवान की लीला,
समय-समय का व्यवहार।
बुरे समय में बुद्धि भ्रष्ट होना,
विधि की विचित्र विडंबना,
बाहरी रूप में सरलता,
भीतर कपट की साधना।
ये सब मानव जीवन की
अदृश्य दीवारें हैं,
अर्थात् ज्ञान से परे
खड़ी अनगिनत बाधाएँ हैं।
इन दीवारों को पार करने का
साधन है धैर्य और विवेक,
ईश्वर-विश्वास, सत्कर्म और
आत्मबल का आलोक।
भावार्थ:
मानव जीवन में अनेक ऐसी बाधाएँ और परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें हम देख नहीं सकते, समझ नहीं सकते या नियंत्रित नहीं कर सकते। यही "अदृश्य दीवारें" हैं, जिनका सामना धैर्य, विवेक और ईश्वर-विश्वास से किया जा सकता है।
रचना का विषय गहन और चिंतनशील है। विशेष रूप से "बाह्य रूप, भीतर कपट" तथा "बुद्धि भ्रष्ट होना" जैसी पंक्तियाँ जीवन की यथार्थ परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं।॥
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