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Saturday, June 6, 2026

अन्याय की ईंट

 आपकी रचना समसामयिक सामाजिक यथार्थ को तीखे और स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करती है। इसे थोड़ा परिष्कृत और काव्यात्मक रूप देकर भावों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

अन्याय की ईंटें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

7-6-2026

ईंटें तो होती हैं

घर और इमारतें बनाने के लिए,

पर आज कहीं-कहीं

अन्याय की ईंटों पर ही

सत्ता के महल खड़े किए जाते हैं।

वोट पाने और दिलाने में

रिश्वत का खेल,

पदोन्नति और नियुक्ति में

सिफारिश और धन का मेल।

सांसद, विधायक, मंत्री तक

जब भ्रष्टाचार की नींव पर चुन लिए जाएँ,

तो प्रशासन की इमारत में

न्याय के दीप कैसे जगमगाएँ?

जन्म प्रमाण-पत्र हो या

मृत्यु का प्रमाण,

संपत्ति का क्रय-विक्रय हो या

कार्यालय का कोई काम,

हर ओर दलाली का जाल

और घूस का बढ़ता नाम।

न्यायालयों में भी कभी-कभी

धन का पलड़ा भारी दिखता है,

न्याय की ईंटों से अधिक

चतुर वकीलों का कौशल बिकता है।

आयकर की भूलभुलैया में

छिपाने और बचाने की कला,

ड्राइविंग लाइसेंस, बिजली, पानी,

हर सेवा में फैला गला-सड़ा सिलसिला।

यों ही यदि अन्याय की ईंटों से

व्यवस्था का निर्माण होगा,

तो जनविश्वास का सुंदर भवन

धीरे-धीरे वीरान होगा।

संदेश:

अन्याय की ईंटों से बनी इमारतें भले ऊँची दिखाई दें, पर वे टिकाऊ नहीं होतीं। सच्चा समाज न्याय, ईमानदारी और नैतिकता की मजबूत नींव पर ही खड़ा रह सकता है।

बहुत सार्थक और विचारोत्तेजक रचना। आपने समाज की एक गंभीर समस्या को निर्भीकता से व्यक्त किया है।

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