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Sunday, August 30, 2026

आईने का सच

 आज की चुनौती

आईने का सच

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
31-8-26

+++++++++++++

आईना
ज्यों का त्यों
सामने वाले का रूप
दिखाता है—
सुंदर हो या कुरूप,
सच को छिपाता नहीं।

आजकल
जो आँखों के सामने
स्पष्ट दिखाई देता है,
उसे भी
आईने का सच कहते हैं।

चेहरा
मन का आईना है।
मनुष्य का सुख-दुःख
चेहरे पर
दिखाई पड़ता है।

मन की बातें
चेहरे से प्रकट हो जाती हैं।
चेहरे से पता चलता है—
वह सत्यवादी है
या असत्यवादी,
अमीर है
या गरीब।

बोली से पता चलता है
वह शिक्षित है
या अशिक्षित।

कदम रखने के ढंग से
पता चल जाता है
कि वह नशे में है
या नहीं।

हँसी से भी
कभी-कभी पता चलता है
कि सामने वाला
सरल है
या छली-कपटी।

चेहरे के भावों से
रोगी और निरोगी का
भी अनुमान लगाया जा सकता है।

आईना केवल चेहरा दिखाता है,
पर चेहरा
कभी-कभी मनुष्य का
पूरा सच दिखा देता है।

Saturday, August 29, 2026

राष्ट्रीय खेल दिवस

नमस्ते वणक्कम्।

आज की चुनौती

राष्ट्रीय खेल दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

30-8-26

“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।”

शरीर ही

धर्म और कर्म करने का

मुख्य साधन है।

स्वस्थ शरीर से

स्वास्थ्य और शक्ति मिलती है,

हार सहने की शक्ति मिलती है,

अपने ज्ञान का प्रसार करने की

क्षमता मिलती है।

अपने कर्तव्यों का पालन करने,

अपनों से प्रेम निभाने,

अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने,

पतन से उत्थान की ओर बढ़ने के लिए

मनोबल के साथ-साथ

शारीरिक बल भी

अत्यंत आवश्यक है।

कमजोर शरीर,

शिथिल हाथ-पाँव—

जीवन में बहुत कुछ

नहीं कर सकते।

शारीरिक बल के लिए

स्वस्थ शरीर चाहिए;

और स्वस्थ शरीर के लिए

नियमित व्यायाम तथा

खेलकूद आवश्यक हैं।

दौड़ना,

दंड-बैठक करना,

पैदल चलना,

योगाभ्यास करना—

ये सभी शरीर को

स्वस्थ और मजबूत बनाते हैं।

मैदानी खेलों में

कबड्डी, हॉकी, क्रिकेट,

फुटबॉल, टेनिस आदि हैं।

दिमागी खेलों में

शतरंज और

बकरी-बाघ जैसे खेल

बुद्धि को तीक्ष्ण बनाते हैं।

खेल केवल मनोरंजन नहीं,

बल्कि अनुशासन,

एकाग्रता,

सहनशीलता,

आत्मविश्वास और

खेल भावना भी सिखाते हैं।

विश्व स्तर पर

ओलंपिक खेलों के माध्यम से

खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा

दिखाने का अवसर मिलता है।

दक्षिण एशियाई खेलों तथा

अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के द्वारा

खेलों को प्रोत्साहन मिलता है।

भारत में

खेलों के प्रति जागरूकता बढ़ाने,

युवाओं को खेलों के लिए प्रेरित करने

और उत्कृष्ट खिलाड़ियों तथा प्रशिक्षकों को

सम्मानित करने के उद्देश्य से

राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।

भारत के महान हॉकी खिलाड़ी

मेजर ध्यानचंद को

“हॉकी का जादूगर” कहा जाता है।

उनके जन्मदिवस

29 अगस्त को

राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।

ध्यानचंद ने

1928, 1932 और 1936 के

ओलंपिक खेलों में

भारत को लगातार तीन

स्वर्ण पदक दिलाने में

महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस अवसर पर

देश के उत्कृष्ट खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को

मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार,

अर्जुन पुरस्कार और

द्रोणाचार्य पुरस्कार जैसे

प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है।

राष्ट्रीय खेल दिवस का संदेश है—

खेलो, स्वस्थ रहो,

अनुशासन से जियो;

हार से मत घबराओ,

प्रयास करते रहो।

शारीरिक शक्ति से

मनोबल बढ़ता है,

मनोबल से आत्मविश्वास बढ़ता है,

और आत्मविश्वास से

सफलता का मार्ग खुलता है।

खेल भावना से

जीवन में विजय ही नहीं,

हार को स्वीकार करने की

परिपक्वता भी आती है।

खेल स्वस्थ जीवन का आधार,

खेल युवाओं की शक्ति;

खेल राष्ट्र की प्रतिष्ठा,

खेल ही जीवन की स्फूर्ति।

धन्य हैं मेजर ध्यानचंद!

धन्य है खेल भावना!

जय हिंद!


Friday, August 28, 2026

जीवन का दृष्टिकोण

 आज की चुनौती


जीवन का दृष्टिकोण


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-8-26


+++++++++++++


जीवन क्या है?

जन्म और मृत्यु के बीच

मिला हुआ समय—

नश्वर जगत में

जीवन का एक अवसर।


जब तक जिएँ,

परोपकार के लिए जिएँ।

त्यागी और हितचिंतक का

यही दृष्टिकोण होना चाहिए।


परमार्थ के लिए

साधु भी शरीर धारण करते हैं।

स्वार्थी भी जीता है,

लोभी भी जीता है,

ईर्ष्यालु भी जीता है,

कामांध भी जीता है,

चोर-डाकू भी जीते हैं।


परंतु

हर व्यक्ति के जीवन का

दृष्टिकोण

भिन्न-भिन्न होता है।


देश के लिए

अपना सिर न्योछावर करना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


चुनाव जीतकर

जनसेवा करना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


पर मालामाल बनने के लिए

चुनाव लड़ना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


सेवा-भाव से

संसार चलता है।

निःस्वार्थता,

सत्यवादिता,

निष्काम कर्म

और ईमानदारी का दृष्टिकोण

सदैव स्तुत्य है।


जीवन का उद्देश्य

सकारात्मक होना चाहिए।

मानवता और परोपकार को

अपनाना चाहिए।


आदर्श दृष्टिकोण ही

जीवन को सार्थक बनाता है

और वही

स्थायी स्मृति बनकर रहता है।

भारत आध्यात्मिक भूमि

 नमस्ते वणक्कम्।

राम नाम जपना 

 राग-द्वेष भूलना 

 भेदभाव रहित 

 चंचल मन को

 आत्मा में विलीन करना

 आत्म चिंतन करना

 अनेक विचारों का समन्वय 

 राम नाम जपने का परिणाम।।

 राम नाम 

 शिवनाम 

 आध्यात्मिक भूमि में 

 आसुरी शक्तियों का षडयंत्र,

फिर भी भारत 

 जगत मार्ग दर्शक।

 कारण भारत है 

 त्याग की भूमि,

समरस सन्मार्ग की भूमि,

 सनातन धर्म सागर।

 सभ्यता का शिरमौर।

  सनातन धर्म  ही

 सर्व जन कल्याणकारी।

 वसुधैव कुटुंबकम्,

वैश्वमैत्री का बुनियाद।

 शिवराम आसेतुहिमाचल  के

 विचारों की एकता।

 जय भारत।

 जय राम। राम राम।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक


आज की चुनौती

राम नाम जपना

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी-प्रेमी प्रचारक

राम-नाम जपना,
राग-द्वेष भूलना,
भेदभाव मिटाना,
चंचल मन को
आत्मा में विलीन करना,
आत्मचिंतन करना।

अनेक विचारों का
समन्वय करना—
यही है
राम-नाम जपने का परिणाम।

राम-नाम हो या शिव-नाम,
आध्यात्मिक भूमि भारत में
आसुरी शक्तियों का षड्यंत्र
चाहे कितना भी हो,
फिर भी भारत
जगत का मार्गदर्शक है।

कारण—भारत है
त्याग की भूमि,
समरसता और सन्मार्ग की भूमि,
सनातन धर्म का सागर।

सनातन संस्कृति
सभ्यता की शिरमौर है।
सनातन धर्म ही
सर्वजन-कल्याणकारी है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्”
विश्व-मैत्री की बुनियाद है।

शिव और राम—
आसेतु-हिमाचल तक
विचारों की एकता के प्रतीक हैं।

जय भारत!
जय राम!
राम राम!

Thursday, August 27, 2026

रक्षाबंधन

 

आज की चुनौती

रक्षाबंधन

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

बहन के हाथों भाई की कलाई पर
राखी बाँधना—
यही है रक्षाबंधन।

यह त्योहार
परंपरागत रूप से उत्तर भारत में
विशेष रूप से मनाया जाता रहा है।
पर भाई-बहन के पवित्र रिश्ते
और प्रेम का यह पर्व
अब उत्तर-दक्षिण का भेद मिटाकर
दक्षिण भारत में भी
उत्साह से मनाया जाने लगा है।

आज राखी के पर्व में
मजहब और जाति का भेद नहीं।
यह प्रेम, भाईचारे और एकता का
सुंदर संदेश देता है।

प्रचलित ऐतिहासिक कथा के अनुसार,
मेवाड़ की रानी कर्णावती ने
हुमायूँ को राखी भेजकर
भाई का रिश्ता बनाया था।
हुमायूँ ने भी
रानी को अपनी बहन मानकर
उनकी सहायता करने का प्रयास किया।

पौराणिक कथा में कहा जाता है कि
जब श्रीकृष्ण की उँगली से रक्त निकला,
तब द्रौपदी ने
अपने आँचल का कपड़ा फाड़कर
उनकी उँगली पर बाँध दिया।
कृष्ण ने द्रौपदी को
अपनी बहन के समान माना।

बाद में जब भरी सभा में
दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया,
तब श्रीकृष्ण ने
उनकी लाज की रक्षा की।
इसी कथा को भी
रक्षाबंधन के पवित्र भाव से जोड़ा जाता है।

एक अन्य प्रचलित कथा
राजा महाबली और माता लक्ष्मी से जुड़ी है।

वामन अवतार में
भगवान विष्णु ने महाबली से
तीन पग भूमि माँगी।
महाबली की दानशीलता से प्रसन्न होकर
विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बनाया
और स्वयं उनके द्वारपाल बनकर
वहीं रहने लगे।

भगवान विष्णु के वापस न लौटने पर
माता लक्ष्मी पाताल लोक पहुँचीं।
उन्होंने महाबली की कलाई पर
रक्षा-सूत्र बाँधकर
उन्हें अपना भाई बनाया।

महाबली ने बहन लक्ष्मी की इच्छा का सम्मान करते हुए
भगवान विष्णु को
उनके साथ जाने की अनुमति दी।

रक्षाबंधन केवल
कलाई पर धागा बाँधने का पर्व नहीं है।
यह भाई-बहन के बीच
पवित्र प्रेम, विश्वास, स्नेह
और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है।

आज बहनें केवल अपने सगे भाई की ही नहीं,
बल्कि अनेक लोगों की कलाई पर
राखी बाँधकर
भाईचारे का संदेश देती हैं।

प्रधानमंत्री सहित अनेक सार्वजनिक व्यक्तियों को भी
राखी बाँधने की परंपरा दिखाई देती है।

रक्षाबंधन—
भाई-बहन के पवित्र प्रेम,
अटूट विश्वास
और परस्पर सुरक्षा के संकल्प का
एक सुंदर भारतीय पर्व है।

भारतीय भक्ति साहित्य।

 प्राचीन भारत ज्ञान परंपरा ही

 विश्व को सही मार्ग पर ले चलेगा।

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एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

++++++



जितनी बातें आजकल 

 हो रही है, उनकेहै कारण तुलसी के दोहों में है,

 कबीर के दोहों में हैं।

 काम क्रोध मद लोभ

 जब मन में लगे खान,

 पंडित मूर्खो एक समान,तुलसी कहत विवेक।

 कबीर आत्म चिंतन करने की सीख देते हैं --

बुरा जो देखन मैं गया,बुरा न तिलिया कोय।

 जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय।।

 जाति भेद के खंडण 

 में  

जाति न पूछो साधु की पूंछ लीजिए ज्ञान।

 मोल करो तलवार का,

पड़ा रहने दो म्यान।।

 पानी के अर्थ है -जल, इज्ज़त,चमक।

 पानी की रक्षा कीजिए।

 पानी बचाइए ।

रहीम का दोहा --

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती मानुष सून।

 शिक्षा का महत्व-

स्वदेशे पूज्यंते राजा,

विद्वान सर्वत्र पूज्यंते।।

विश्व में शांति के लिए 

वसुधैव कुटुंबकम्।

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।।

ईश्वर महिमा--

 कबीर --

जाको राखे साइयां,मारी न सकै कोय।

 बाल न बांका करि सकै,जो जग वैरी होय।

 गुरु महिमा-

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताया।।

  संत तिरुवल्लुवर 

 संपत्तियों में बड़ी सौपत्ति सुनना।

 श्रवण संपत्ति।

वही सभी संपत्तियों का सिरमौर।।

 दो हजार की किताबें लेना आसान है।

पर उस महान ग्रंथ ज्ञान को प्रवचन में सुनने से 

ज्ञान जल्दी मिल जाता है।

  ईश्वर ध्यान 

 माला तो कर में फिरै जीभ फिरै मुख माहीं।

मनुवा तो दस दिशै फिरै यह तो सुमिरन नाहीं। दल

  सत्यं वद।

 जय जगत।

 स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार।

 ये सब प्राचीन ज्ञान परंपरा की देन है।

अपने दोष निवारण के लिए -

निंदक नियारे राखिये, आंगन कुटी समाय।।

 जय भारत की ज्ञान परंपरा।

त्यागमय जीवन भारतीय परंपरा।

पाश्चात्य परंपरा भोग मय।

जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्यं।।

नश्वर जगत।

Wednesday, August 26, 2026

महिला समाज दिवस।

 [26/08, 2:55 pm] sanantha.50@gmail.com: महिला समानता दिवस।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

महिलाएँ कितने प्रकार के हैं?

 सीता जैसे,

 द्रौपदी जैसे

 रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाएँ,

  लाल दीप क्षेत्र की वारांगनाएँ,

 राजा भर्तृहरि की रानी की तरह रखैला रखनेवाली,

 धन के लालच में 

 पति बदलनेवाली,

 ईश्वर की सृष्टि में 

 समानता कहाँ?

त्यागी भी भोगी भी।

 ज्ञानी भी अज्ञानी भी।

अति रूपवती,

 काली कलूटी कुरूप।

 कंजूसी, उदार,

 न जाने समानता कैसे?

 सब समान डाक्टर बन जाते तो नाम कौन बनती।

 सर्वशिक्षा अभियान में 

 क्या सब के सब प्रतिभाशाली हैं क्या?

मंद बुद्धिवाली भी है न?

 समान अधिकार,

 समान दहेज़ 

 फिजूलखर्ची महिला 

 फिर भी आएगी पैसे माँगने!

 मितव्यई तो संतुष्ट।

समानता कहीं भी कैसी भी लाना असंभव।

 मोटी,दुबली पतली

 शूर्पणखा जैसी कामुक्ता।

 समानता का अधिकार तो दे सकते हैं।

 संविधान में समानता कहाँ?

 अल्पसंख्यकों का अधिकार अलग।

 सूचित अनुसूचित जाति के अधिकार अलग।

 कानून तो समान अधिकार,

 सहूलियतें दे सकता है।

पर व्यवहार भिन्न।

 बास्मति चावल चावलों की राजा।

 वह और साधारण चावल में बराबरी कैसे?

 समान अधिकार देने तैयार।

 महिलाओं को ईश्वर ने कोमल बनाया है।

 गर्भधारण  उसी को करना है, न पुरुष।

ईश्वर  ईश्वरीय में 

अर्धांगिनी तो है

पर पति बराबर पत्नी नहीं।

 ईश्वर की रचना में 

 गुण में भिन्नता,

 आकार में भिन्नता।चालचलन में भिन्नता।

इन भेदों में समानता लाना  असंभव ही।

[26/08, 2:59 pm] sanantha.50@gmail.com: आज की चुनौती


महिला समानता दिवस


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई


महिलाएँ अनेक रूपों में हैं—

सीता जैसी त्यागमयी,

द्रौपदी जैसी स्वाभिमानी,

रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना,

और अपने-अपने जीवन-संघर्ष में

अनेक प्रकार की महिलाएँ।


ईश्वर की सृष्टि में

क्या सभी मनुष्य एक जैसे हैं?


कोई ज्ञानी है,

कोई अल्पज्ञानी।

कोई अत्यंत प्रतिभाशाली,

कोई सामान्य क्षमता वाला।

किसी का शरीर बलवान,

किसी का कमजोर।

किसी का स्वभाव उदार,

किसी का मितव्ययी।


फिर समानता का अर्थ क्या है?


समानता का अर्थ

यह नहीं कि सभी डॉक्टर बन जाएँ,

सभी प्रतिभाशाली बन जाएँ

या सभी का रूप और स्वभाव एक जैसा हो जाए।


समानता का वास्तविक अर्थ है—

समान सम्मान,

समान अधिकार,

समान अवसर और

समान न्याय।


संविधान हमें

कानून के सामने समानता का अधिकार देता है।

महिला हो या पुरुष,

हर व्यक्ति को

सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है।


महिलाओं को शिक्षा मिले,

रोजगार के अवसर मिलें,

निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले,

और उनके साथ

भेदभाव न हो—

यही सच्ची समानता है।


प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को

हर दृष्टि से एक जैसा नहीं बनाया।

स्त्री को मातृत्व की विशेष जिम्मेदारी मिली है।

पुरुष और स्त्री के शरीर,

भूमिकाओं और क्षमताओं में

प्राकृतिक भिन्नताएँ हो सकती हैं।


लेकिन प्राकृतिक भिन्नता

अधिकारों में असमानता का कारण नहीं बननी चाहिए।


चावल अनेक प्रकार के होते हैं—

बासमती की अपनी विशेषता है,

साधारण चावल की अपनी उपयोगिता।

दोनों एक जैसे नहीं,

पर दोनों का अपना मूल्य है।


इसी प्रकार

स्त्री और पुरुष एक जैसे नहीं,

लेकिन दोनों का मानव-मूल्य समान है।


इसलिए हमें

समानता का अर्थ

“एक जैसा बनाना” नहीं,

बल्कि

“भिन्नताओं का सम्मान करते हुए

समान अधिकार देना” समझना चाहिए।


यही सच्ची महिला समानता है।

Saturday, August 22, 2026

विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस

 वह वरिष्ठ नागरिक दिवस 

आज की चुनौती
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
23-8-26

+++++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में
वृद्धावस्था को
संन्यासी जीवन की ओर
बढ़ने का समय माना गया है।

सांसारिक मोह से दूर होकर,
केवल ईश्वर का ध्यान करते हुए,
पुत्र-पुत्री, नाते-रिश्तेदारों की
चिंताओं से मुक्त होकर,
एकांत में
मन को आत्मा में विलीन करते हुए
जीवन बिताने की कल्पना की गई है।

पर आज की लौकिक जीवन-व्यवस्था में
वृद्धावस्था की अपनी ही चिंताएँ हैं—
वृद्धाश्रम की चिंता,
भोजन की चिंता,
स्वास्थ्य और दवाइयों की चिंता।

आज अनेक वृद्ध
वृद्धाश्रमों में रहने को विवश हैं।
कहीं संतान की लापरवाही,
कहीं पुत्रों और बहुओं का उपेक्षापूर्ण व्यवहार।

माता-पिता की संपत्ति चाहिए,
लेकिन माता-पिता की
देखभाल करने की जिम्मेदारी
नहीं चाहिए!

बढ़िया भोजन तो दूर,
कभी-कभी रूखी-सूखी रोटी भी
सम्मान के साथ नहीं मिलती।

दवा लेनी है या नहीं,
चश्मा बनवाना है या नहीं,
बाल कटवाने हैं या नहीं—
इन छोटी-छोटी आवश्यकताओं पर भी
ध्यान नहीं दिया जाता।

ऐसे बेसहारे,
संतान द्वारा त्यागे गए वरिष्ठ नागरिक,
निस्संतान वृद्ध
और आर्थिक रूप से कमजोर वरिष्ठ लोग—
इन सभी के संरक्षण और सम्मान के लिए
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस
एक महत्वपूर्ण अवसर है।

वरिष्ठ नागरिक
परिवार और समाज पर बोझ नहीं हैं।
उन्होंने अपने जीवन के वर्षों में
परिवार, समाज और देश के निर्माण में
अपना योगदान दिया है।

उनके पास
जीवन का अनुभव है,
ज्ञान है,
संघर्षों की कहानी है,
और आने वाली पीढ़ियों के लिए
बहुमूल्य मार्गदर्शन है।

इसलिए इस दिवस का उद्देश्य केवल
एक दिन वरिष्ठ नागरिकों को याद करना नहीं,
बल्कि उनके आजीवन योगदान,
अनुभव और ज्ञान का सम्मान करना है।

वृद्ध नागरिकों की सेवा करें,
उनका सम्मान करें,
उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखें,
और उन्हें प्रेम तथा आत्मसम्मान के साथ
जीवन जीने का अवसर दें।

वरिष्ठ नागरिकों की सेवा
केवल हमारा कर्तव्य नहीं,
हमारी संस्कृति और मानवता की पहचान है।

एक दिन हम भी वृद्ध होंगे—
आज उन्हें जो सम्मान देंगे,
कल वही सम्मान
हमें भी मिलेगा।

नोट: विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस प्रत्येक वर्ष 21 अगस्त को मनाया जाता है।

Thursday, August 20, 2026

सद्भावना दिवस


आज की चुनौती

सद्भावना दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

21-8-26

+++++++++++++

भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है।

यहाँ प्रत्यक्ष रूप में

विविधता दिखाई देती है—

प्राकृतिक विविधता,

मजहबी विविधता,

भाषाई विविधता,

सांस्कृतिक विविधता।

इन विविधताओं के बावजूद

विचारों की एकता,

राष्ट्रीय भावना,

भाईचारा और राष्ट्रप्रेम

भारत को एक सूत्र में बाँधते हैं।

आसेतु हिमाचल तक

एकता और सद्भावना को मजबूत करने के लिए

हर वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री

स्वर्गीय राजीव गांधीजी के जन्मदिन

“सद्भावना दिवस” के रूप में

मनाया जाता है।

भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराएँ

और सनातन चिंतन

आसेतु हिमाचल

एकता और सह-अस्तित्व की भावना को

मजबूत करने में अपना योगदान देते आए हैं।

भारत की संस्कृति की विशेषता है—

अनेक धर्म, अनेक भाषाएँ,

अनेक परंपराएँ होते हुए भी

एक-दूसरे के प्रति सम्मान और

सह-अस्तित्व की भावना।

तमिलनाडु में भी

विभिन्न धार्मिक परंपराओं में

स्थानीय सांस्कृतिक प्रभाव दिखाई देते हैं।

कई गिरिजाघरों में

रथयात्रा जैसी स्थानीय परंपराएँ

और चर्चों में ध्वजस्तंभ

भारतीय सांस्कृतिक समन्वय की

सुंदर झलक प्रस्तुत करते हैं।

सद्भावना दिवस के अवसर पर

सरकारी कार्यालयों और संस्थानों में

राष्ट्रीय एकता और सद्भावना की

शपथ दिलाई जाती है।

आज के समय में

क्षेत्रीय राजनीति और

विभिन्न राजनीतिक मतभेदों के कारण

नीट, नवोदय विद्यालय और

राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे विषयों पर

विभिन्न राज्यों में अलग-अलग विचार

सामने आते हैं।

मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं,

लेकिन मतभेदों के कारण

मनभेद नहीं होना चाहिए।

राष्ट्रीय एकता,

भाईचारा,

राष्ट्रप्रेम और सद्भावना को बढ़ाना

आज समय की माँग है।

आइए, सद्भावना दिवस पर

हम केवल शपथ ही न लें,

बल्कि अपने व्यवहार में भी

सद्भावना को अपनाएँ।

विविधता हमारी शक्ति है,

एकता हमारी पहचान है,

और सद्भावना हमारे राष्ट्र की

सबसे बड़ी आवश्यकता है।

Wednesday, August 19, 2026

नेकी की छाँव

 नेकी की छाँव।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

20-8-26

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नेक रहना श्रेष्ठ है।

 नेकी की छाँव में 

 रहना हिफाजत है।

 संगति का फल

 भलाई में है।

 

 हमें ज़रूरत के समय मदद करनेवाले हमारे लिए सज्जन हैं।

सज्जनता में धर्म है, 

परोपकार है,सत्य है।


भलाई करने पर

 हमारे दायरे में नाम मिलेगा।

 दोस्ती मिलेगी।

हम समाज के 

विश्वास पात्र बनेंगे।

बुराई करने पर

 हमारा मन  बेचैन होगा।

 भलाई करने पर चैन की नींद सोएँगे।

मानसिक हलचल न होगा।

 शांति मिलेगी।

 ईश्वर का अनुग्रह मिलेगा।

 नेकी की छाया 

 संतोष देगी।

बद विचार 

सद विचार में बदलेगा।

 सदाबहार है 

नेकी की छाँव में।





Tuesday, August 18, 2026

सुभाष चंद्र बोस

 नेता जी सुभाष चंद्र बोस 

एस. अनंतकृष्णन चेन्नई 

19-8-26

++++++++++

भारत के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम के नेता,

 स्वाभिमानी ऐएएस उत्तीर्ण होकर भी

 अंग्रेज़ी सरकार के अधीन नौकरी करने से मना कर दिया।

 कांग्रेस के नेता चुने जाने पर भी,

 कांग्रेस से मत भेद होकर,

 आज़ाद हिन्द सेना  की स्थापना की।

 उन्होंने  घोषणा की कि

 मुझे खून दो,

मैं देश को आज़ाद दूँगा।

उनकी सेना में  

आ सेतु हिमाचल से

 सभी देश भक्त वीर 

भाग लेने आये।

 उस महान वीर सेनानी 

 जर्मन गये ।

 हिटलर से मिले।

 जापान आये।

सैना को आज्ञा दी दिल्ली चलो।

 ऐसे वीर  नेता के 

 पक्ष में  मोहन दास करमचंद गांधीजी नहीं थे।

  कांग्रेस के नेता चुने 

जाने पर भी बोस 

गांधीजी के कारण  नेता न बने।

उन्होंने फार्वेडब्लाक  की स्थापना की।

 देश के लिए  वीर धीर 

साहसी   नेता  का स्वर्गवास 

 विमान दुर्घटना में हो गया।

 पर जनता को इस पर विश्वास नहीं है।।

अनेक लोगों का विश्वास है कि

वै आज़ादी के बाद भी जिंदा रहे।

 ऐसे महान नेता को‍ वीर सलाम।

वीर वणक्कम्।








 

 


 

 

 

 

 

 


 


   

 


Sunday, August 16, 2026

 

आज की चुनौती

अंधविश्वास का जाल

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

17-8-26

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अंधविश्वास का जाल
मनुष्य को भय में बाँधता है।

माता-पिता,
दादा-दादी भी कभी-कभी
बच्चों को भय दिखाकर
अनजाने में अंधविश्वास फैलाते हैं—

“आधी रात बाहर मत जाना,
इमली के पेड़ पर भूत रहता है!”

ऐसी बातें
बालमन में भय पैदा करती हैं।

बिल्ली का रास्ता काटना,
विधवा का सामने आना,
अकेले किसी ब्राह्मण का सामने आना—
इन सबको अपशकुन मानना
किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है।

सर्पदोष जैसे भय भी
कई बार लोगों की अज्ञानता और चिंता का
लाभ उठाने का माध्यम बन जाते हैं।

अंधविश्वास
एक मनोवैज्ञानिक भय है।
जिसके पीछे
प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं होता।

अंधविश्वास
अज्ञानता बढ़ाता है,
मनुष्य को भयभीत करता है,
उसकी आत्मशक्ति को कमजोर करता है।

कुछ आश्रमों में
आचार्य दीक्षा देकर
ईश्वर-दर्शन का वादा करते हैं।
लोग दीक्षा-शुल्क भी देते हैं।
लेकिन प्रश्न यह है—
क्या उन सभी को
ईश्वर के दर्शन हुए?

राहुकाल, यमगंड आदि का
अनावश्यक भय दिखाकर
मनुष्य को अपने कर्म से विमुख करना
कहाँ तक उचित है?

तमिल में एक सुंदर भाव है—

“भगवान साथ हैं,
उनका अनुग्रह है,
तो दिन, ग्रह और नक्षत्र
कुछ नहीं कर सकते।”

अंधविश्वास
केवल एक मायाजाल है।
यह मनुष्य को भय दिखाकर
बलहीन बनाता है।

विवेकहीन भय
मनुष्य की शक्ति को छीन लेता है।
आलस्य और अज्ञान
उसकी उन्नति में बाधक बनते हैं।

सच्चा ईश्वर-भक्त
ईश्वर पर विश्वास रखेगा,
लेकिन अंधविश्वास पर नहीं।

ईश्वर में श्रद्धा रखें,
लेकिन विवेक को न छोड़ें।
प्रार्थना करें,
परिश्रम करें,
सत्य को प्रमाण से परखें—
यही अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग है।

Saturday, August 15, 2026

திருமந்திரம். श्रीमंत्र

 உள்ளம் பெருங்கோயில் ஊனுடம் பாலையம்

வள்ளற் பிரானார்க்கு வாய்கோ புரவாசல்
தெள்ளித் தெளிந்தார்க்குச் சீவன் சிவலிங்கங்
கள்ளப் புலனைந்துங் காளா விளக்கே."
(பாடல் எண்: 1823)

उळ्ळम्  पेरुम कोयिल ऊनुडंबालैयम्
वळ्ळल्  पिरानार्क्कु वाय गोपुरवासल्
तॆळ्ळित् तॆळिंतारुक्कु जीवन  शिवलिंगंकळ्ळप्पुलनैंतुंकाळा विळक्के।
(तिरुमंत्र 1823)

उळ्ळम --मन
पेरुम कोयिल  =भगवान बसा बडा मंदिर 
ऊनुडंबु आलयम् =इस माँस का शरीर उस मंदिर की इमारत है।
वाय गोपुरम वासल =मुख गोपुरम द्वार है
जीवन शिवलिंग ==स्पष्ट ज्ञानी को हमारे प्राण ही शिवलिंग है।
 कळ्ळप्पुलनैंदुम  काळा मणिविळक्कु = हानियाँ पहुँचानेवाली पंचेंद्रियाँ मणि दीप होते हैं।

  मानव मन ही ईश्वर बसा एक बड़ा मंदिर है।इस 
माँस का शरीर उस मंदिर की इमारत है। मुख गोपूर का द्वार  है।  स्पष्ट ज्ञानियों के लिए हानियाँ पहुँचानेवाली 
पंचेंद्रियाँ ही मणि दीप होते हैं।








जीवन की दिशा

 जीवन की दिशा 

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

16-8-26

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जीवन की दिशा


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

16-8-26


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जीवन की दिशा

हर एक की रुचि,

क्षमता, बुद्धि-लब्धि,

जीवन-रेखा—

भगवान के अनुग्रह की

दिशा दिखाती है।


मानव अपने प्रयत्न करता है,

अपने परिश्रम करता है,

सफलता के लिए

दिशा स्वयं निर्धारित करता है।

लेकिन हर किसी को

अपनी चाही हुई दिशा में

कामयाबी नहीं मिलती।


मेरे जीवन में

तमिलनाडु में हिंदी-विरोध के बीच

हिंदी का ज्ञान,

हिंदी का प्रचार,

हिंदी से जीविकोपार्जन—

सब ईश्वर की देन है।


मैं अपने क्षेत्र में ही

नौकरी ढूँढ़ता रहा।

अपने ही शहर में रहने के लिए

लाखों प्रयास किए।

पर मेरे जीवन की दिशा

किसी और ओर थी।


मेरा भाई

अपने शहर से बाहर

नौकरी ढूँढ़ता रहा।

आज वह

अपने ही शहर में है।


मैं बाहर आया,

जिस दिशा को मैंने नहीं चुना,

वही मेरे जीवन की दिशा बनी।


तब समझ में आया—

मनुष्य दिशा चुनता है,

पर जीवन की अंतिम दिशा

ईश्वर निर्धारित करता है।


हमारी इच्छा

एक रास्ता दिखाती है;

ईश्वर का अनुग्रह  ही

 जीवन की दिशा का निर्धारण करता है।

 सबहीं नचावत राम गोसाईं।

Friday, August 14, 2026

तिरुक्कुरल

 

तिरुक्कुरल।


कालत्तिनाल् चेय्त उदवि चिऱितेनिनुम् ज्ञालत्तिल माणप्पेरितु --- संत तिरुवल्लुवर का तिरुक्कुरल।

  समय पर की गयी मदद ब्रह्मांड से बड़ा है।

 कालत्तिल --समय पर

 चेय्त =की गयी

 उदवि =मदद 

चिरितेनिनुम् ==छोटा होने पर भी

ज्ञालत्तिल - ब्रह्मांड से

 माणप्पेरितु == बहुत बड़ा है।

  भावार्थ --

     समय पर अर्थात वक्त पर  की गई मदद 

अति छोटी होने पर भी ब्रह्मांड से बड़ी है।

 ब्रह्माण्ड तो सद्यःफल नहीं देता। उसमें बीज बोने पर अंकुर फूटकर पौधे बनकर फल देने देर लगेगा।

 

दोस्ती ==

 उडुक्कै इऴंदवन कै पोल अंगे इडुक्कण कळैवताम् नट्पु।

 उडुक्कै  -- कमर की धोती

 इऴंदवन = फिसलने पर

कै =हाथ के जैसे 

 इडुक्कन =दुख

 कळैवताम् =दूर करना  ही

 नट्पु ==मित्रता है।

  कमर की धोती गिरने पर तुरंत हाथ उसे पकड़कर  मान की रक्षा करेंगे, वैसे ही दुख के आते ही दुख दूर  करना ही  सच्ची मित्रता है।


एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित अनूदित भावाभिव्यक्ति रचना।

Thursday, August 13, 2026

शब्द और संवाद

 शब्द और संवाद।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

१४-८-२६

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शब्द का अपना महत्व है,

 संवाद का अपना महत्व है।

आजकल जोरदार असरदार संवाद 

जिसे अंग्रेजी में 

पंच डयलाग् कहते हैं।

 तमिल सिनेमा के रजनिकांत का एक संवाद प्रसिद्ध है

 मैं एक बार कहूँ तो 

सौ बार कहने के समान है,

आज सर्वत्र यह संवाद 

चालू है।

प्रेम ही प्रेम नाम है प्रेम चोपड़ा 

यह भी प्रसिद्ध है।

 चित्रपट की सफलता के लिए 

 शब्द चयन , संवाद गीत अति मुख्य  हैं।

 तीनों के लिए शब्द प्रधान।

 तुम तो बड़े आदमी हो।

  दृश्य और बोलने के ढंग से वह छोटे आदमी हो जाता है।

 उसे काक वक्रोक्ति कहते हैं।

दोनों हाथों में लड्डू है।

मुहावरे  और  लोकोक्तियां 

संवाद में भी प्रयोग होते हैं।


 दुरंगी दुनिया।

हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और।

 नाच न जाने आंगन टेढ़ा।

 ये सब संवाद में भी है तो  शब्द शक्ति और संवाद कला में निपुण होना चाहिए।

 शब्दों की असावधानी के बारे में रहीम ने कहा है--

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पताल।आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥।

  शब्द, संवाद मानव जीवन में अधिक महत्वपूर्ण है।

श्लेष शब्द में तो भिन्न अर्थ आते हैं।

काकवक्रोक्ति में 

तो कहने का अभिनय प्रधान होता है।

 सुवर्ण को खोजते फिरत

कवि व्यभिचारी चोर।

 सुवर्ण के तीन अर्थ है

सुंदर शब्द, सुंदर रंग सोना।

 कवि सुंदर शब्द का,

वेश्या सुंदर रूप रंग का

 चोर सोने का 

यही शब्द विशेष  है।

 जीवन में शब्द भंडार उसका प्रयोग संवाद 

 अति प्रधान है।


शब्द हमारा परिचय है,

संवाद हमारी कला।

शब्दों में शक्ति हो,

संवाद में संवेदना हो,

तो साधारण बात भी

हृदय को छू जाती है।

इसलिए जीवन में

शब्द-भंडार ही नहीं,

शब्दों का उचित प्रयोग

और संवाद-कला में निपुणता

भी अत्यंत आवश्यक है।

Wednesday, August 12, 2026

ज्ञान का महत्व

 Writing

ज्ञान का महत्व वो अंदर में कुल घ में

एस. अनंत कृष्णन दो

चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

13-08-2026

ज्ञान का दीप

जीवन का प्रकाश।

ईश्वर की अनुपम

दिव्य सौगात।

वैज्ञानिक ज्ञान,

आर्थिक ज्ञान,

आध्यात्मिक ज्ञान,

दार्शनिक ज्ञान—

जीवन के विविध

आयाम खोलते हैं।

ज्ञान है दर्पण,

ज्ञान है शक्ति।

बुद्धि और लब्धि में

होती है भिन्नता।

कोई प्रतिभाशाली,

कोई औसत ज्ञानी,

कोई समालोचक,

कोई आत्मज्ञानी।

वरकवि को

ईश्वर का वरदान,

आत्मज्ञानी को

सत्य का ज्ञान।

जगत मिथ्या,

ईश्वर सत्य।

नश्वर है संसार,

नश्वर है शरीर।

कर्मफल के अनुसार

मिलता है ज्ञान।

गुरु की कृपा से

होता है कल्याण।

गुरु का स्मरण

ज्ञान का द्वार।

अज्ञान में जीवन

हो जाता दुश्वार।

स्वदेशे पूज्यते राजा,

विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।

ज्ञान ही मानव का

सच्चा धन है,

जो जीवन भर साथ रहता है

और मृत्यु के बाद भी

यश के रूप में अमर रहता है।

Sunday, August 9, 2026

गाँव की आत्मा

 गाँव की आत्मा


एस . अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

10-8-26

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 भारत गाँवों का देश।

प्रधान धंधा खेती।

मोहनदास करमचंद गांधी जी ने ग्राम राज्य का स्वप्न देखा था।

 ग्राम की आत्मा 

 परिश्रम का महत्व।।

 वह आत्मा  न चाहती

 बाह्याडंबर 

 पूर्ण जीवन।

 एक बार नारद ने 

विष्णु से पूछा

 तेरा श्रेष्ठ भक्त कौन?

 विष्णु ने नारद से कहा

 भूलोक के एक गाँव में 

 एक किसान  रहता है।

 उससे मिलने के बाद आओ।

 उस के पहले तेल से भरा कठोरी हाथ में लेकर जाओ।

 देखो, एक बूँद भी न गिरे।

 नारद यों ही कठोरी लेकर गया।

 किसान को देखा तो

 वह तड़के उठकर एक बार  भगवान क्षय का नाम लिया।

 फिर हल लेकर खेत गया।

  खेत जोतकर दोपहर खाने के पहले एक बार लिया।

 अपने खेत का काम खत्म करके शामको घर लौटा।

 भगवान का  नाम लिया।

 सो गया।

 नारद लौटकर विष्णु से मिला।

 विष्णु ने कहा किसान मेरा श्रेष्ठ भक्त हैं।

नारद ने कहा 

 मैं सदा आपका नाम रटता रहता हूँ।

 वह किसान तो तीन ही बार आपका नाम लेता है।

 तब विष्णु ने पूछा

 तुम तेल की कठौरी लेकर जाते समय कितने बार  मेरा धन आम लिया।

 तब नारद ने   कहा

 मैं आपके काम में लगा था।

विष्णू ने कहा  किसान भी  अपना कर्तव्य कर रहा था।

फिर भी मेरे नाम लिया।

 वह सबका अन्नदाता है।

 इसलिए वह मेरा बड़ा भक्त हैं।

 यही गाँव की आत्मा।

 किसान ने तो सब भूखों मर जाते।

 संत तिरुवल्लुवर ने कहा 

 जो भी काम  करो,

 कारखाना , कंपनी चलाओ।

 पेशे जोड़ों।

 गाँव की आत्मा खेत में न लगा तो 

 भूखा भजन न गोपाल।

 जहाँ भी जाओ,

 जो भी धंधा करो

 गाँव की आत्मा 

 किसान की आत्मा 

न तो  जगत आहार रहित तड़पता।

 वास्तव में‌ गाँव की आत्मा  एकाग्रता 

 कर्तव्य पालन।

 जगत का अन्नदाता।

 

Saturday, August 8, 2026

स्वार्थ के कांटे


 स्वार्थ के काँटे

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।

 8-8-26

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स्वार्थ

 मानव के लिए

 कलंक।

 स्वार्थ व्यक्ति 

लोभी होता है।

अपने लिए जीता है।

कंजूसी होता है।

स्वार्थ मनुष्य 

 अपने हित के लिए 

 अन्याय करता है।

भ्रष्टाचार और रिश्वत 

 लेकर धन जोड़ता है।

 विभीषण अपने भाई तजकर  राम से मिल गया। 

कुल द्रोही बन गया।

  वीर और देश भक्त पुरुषोत्तम महाराज का भाई सिकंदर से मिल गया।

 पद , नौकरी, सुखी जीवन के लिए 

 भारतीय प्रतिभाशाली लोग अपनी भाषा,

 अपने मजहब

 अपनी पोशाक तक बदलकर अंग्रेज़ी के पिछलग्गू बन गये।

 ताजमहल को सराहा।

 भारतीय अपूर्व मंदिर 

 जो ताज़महल से श्रेष्ठ है, उनको चमकने न दिया।

  कबीर ने स्वार्थ के गुण पर अपने दोहे लिखे:--

सुख के संगी स्वार्थी, दुख मे रहते दूर।कहे कबीर परमारथी, दुख सुख सदा हजूर॥

 स्वार्थी सुख के समय साथ रहता है,

 दुख के समय तजकर चला जाता है।

परमार्थी सुख दुख में 

साथ रहता है।


कबीर कहते हैं --


तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ।मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ।

तुलसीदास ने लिखा है


स्वार्थ लागी करै सब प्रीति।

सुर नर मुनि सब की यह रीति॥

 रहीम के दोहे


धन दारा अरु सुतन सों, लग्यों रहै नित चित्त।

नहि रहीम कोऊ लख्यो, गाढ़े दिन को मित्त॥

 राम भी स्वार्थ के लिए 

 छिपकर वाली को मारा।

 वाली से युद्ध के पहले

 बातें नहीं की।

 अतः स्वार्थ प्रधान लोग जग में अधिक।।

निस्वार्थ है

 नदी,पेड़।

वृक्ष कबहु फल न भखै,

नदी न संचै नीर।

 परमार्थ के कारणे साधुने धरा शरीर।

++++++++++


सही सुधारा रूप


आज की चुनौती : स्वार्थ के काँटे


स्वार्थ के काँटेएस. अनंतकृष्णन, चेन्नई8-8-2026


स्वार्थमानव के लिएएक कलंक है।


स्वार्थी व्यक्तिलोभी होता है,अपने लिए ही जीता है,कंजूस प्रवृत्ति का होता है।


अपने हित के लिएअन्याय करता है,भ्रष्टाचार और रिश्वत सेधन का अंबार लगाता है।


इतिहास में भीस्वार्थ के अनेक उदाहरण मिलते हैं।पद, नौकरी और सुख-सुविधाओं के लिएकई लोगअपनी भाषा,अपनी संस्कृति,अपनी वेशभूषा तक छोड़करपरायी संस्कृति के अनुयायी बन जाते हैं।


कबीर ने कहा है—


"सुख के संगी स्वार्थी, दुख में रहते दूर।कहे कबीर परमारथी, दुख-सुख सदा हजूर॥"


अर्थात् स्वार्थी व्यक्तिसुख में साथ रहता है,पर दुःख आते हीसाथ छोड़ देता है।


कबीर का एक और दोहा—


"तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ।मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ॥"


तुलसीदास ने भी लिखा है—


"स्वार्थ लागी करै सब प्रीति।सुर नर मुनि सब की यह रीति॥"


रहीम कहते हैं—


"धन, दारा अरु सुतन सों, लग्यो रहै नित चित्त।नहि रहीम कोऊ लख्यो, गाढ़े दिन को मित्त॥"


आज संसार मेंस्वार्थी लोगों की संख्या अधिक है।


निस्वार्थ तोनदी और वृक्ष हैं।


"वृक्ष कबहुँ फल न भखै,नदी न संचै नीर।परमारथ के कारणे,साधु धरा शरीर॥"


यही संदेश है—स्वार्थ नहीं,परमार्थ ही मानव जीवन का सच्चा आभूषण है।

Friday, August 7, 2026

आर्तनाद

 अनंत कृष्णन का आर्तनाद।

बचपन से आज तक 

सत्रह साल तक 

माँ  पिता की ग़रीबी।

हर साल एक बच्ची,

 दो-तीन  साल पलना, 

मर जाना।

 बच्ची तो अति सुन्दर,

 मैं माँ का दूसरा बेटा।

 मेरे पहले एक बेटा 

वह भी दो साल पलकर चल बसा।

मेरे बाद छे सुंदर बहनें 

 पर पर कर मर गयी।

 यह आर्तनाद  में ही  

भगवान की देन।

 सातवीं बच्ची हुई।

 उसका नाम वेंबु रखा गया।

 वेंबु का मतलब है नीम का पेड़।

मेरे दादा ने कहा,

 अंगुली नाम जिंदा रहेगी।

मेरा और मेरी बहन की उम्र फ़रक ग्यारह साल।

मैं भी संघर्ष ग़रीबी, 

असह्य मानसिक पीड़ा में पला।

 मेरी सत्रह साल की उम्र में 

 माँ बोन टी.बी.के कारण बीमार पड़ी।

जो भी सर्वेश्वर कलियुग के ईश्वर

श्री वेंकटाचलपति , कार्तिकेय की कृपा से

 मेरी सारी माँगें पूरी हुई।

चार बार यम धामके द्वार तक जाकर 

 जान बची।

पर मेरी प्राण प्रिया सौ साल तक 

जीने की बात कह रही थी।

 मेरे प्राण रक्षा के लिए 

 अधिक ध्यान दें रही थी।

 पर मैं भगवान पर भरोसा रखकर

 जीना मरना ईश्वर के अनुग्रह से ।

 वह अचानक इलाज के बाद भी मर गयी।

 इस में कमी मेरी है या  विधि की विडंबना है‌ या डाक्टर 

की गलत इलाज है कितने विचार,

कितने प्रलाप, कितने आर्तनाद 

 कितने विचारों के ज्वार भाटे,

 चिंता की लहरें,

 मेरी पत्नी के जिंदा रहकर 

मेरे प्राण पखेरू उड़ जाने पर केवल 

 उसको असहनीय वेदनाएँ होंगी।

 बाकी लोग तो अत्यंत खुशी का अनुभव करेंगे।

 मेरे साले मेरी साली

 सब उसके साथ रहकर 

 धीरज बँधाएँगे।  

दिलासा देंगे।

 क्यों कि वह मिलनसार ही नहीं,

हर नाते रिश्तेदारों के बारे में 

 उनके शारीरिक रोग, मानसिक रोगी

 सब के लिए सलाह देती।

 पर में तो बचपन से ही रो रहा हूँ।

मेरी माँ,सांस, ससुर, साले सब के पसंद का पात्र नहीं हूँ।

 पर मैं अब अकेले बचपन से लेकर बुढ़ापे तक

 सब के नफरत का पात्र बनकर जी रहा हूँ।

 मेरे आर्तनाद किसको सुनाऊँ।

हर पल  उसकी याद में रो रहा हूँ।

 मैं जिंदा हूँ। 

मेरे आर्तनाद सुनने मेरे आँसू पोंछने कोई नहीं।

 मेरे गुण जान समझकर  प्यार करनेवाली मेरी अर्धांगिनी गोमती ही है।

दिल रो रहा है तड़प रहा हैं।

सब कुछ ‌देकर मेरी माँग पूरी करनेवाले ईश्वर

मेरी अर्द्धांगिनी के प्राण लेकर 

 दुख सागर में डुबो दिया है।














 







Thursday, August 6, 2026

अहंकार की राख

 आज की चुनौती

अहंकार की राख

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
07-08-2026

अहंकार मानव की प्रगति का सबसे बड़ा बाधक है।

मनुष्य अपने धन,
अपनी वीरता,
अपनी सुंदरता,
अपने वंश और प्रतिष्ठा पर
अहंकार करने लगता है।

ऐसे अहंकारी व्यक्ति का
अंततः कोई सच्चा समर्थक नहीं होता।
वह हठी और जिद्दी बन जाता है।
उसकी विजय भी अंततः पराजय में बदल जाती है।
अहंकारी अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करता है।

वह परिवार और समाज के रिश्तों से दूर हो जाता है।
दूसरों की सलाह, अनुभव और उपदेश को अनसुना कर देता है।
धीरे-धीरे उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है
और उसका मन अशांत एवं बेचैन रहने लगता है।

रावण का पतन भी उसके अहंकार का ही परिणाम था।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं—

काम, क्रोध, मद, लोभ जब, मन में बसें निदान।
तुलसी पंडित मूर्ख सम, हर ले विवेक-ज्ञान॥

संत कबीरदास जी ने कहा है—

मैं-मैं बड़ी बलाई है, सके तो निकसो भाग।
कहै कबीर कब लग रहो, रुई लपेटी आग॥

वास्तव में अहंकार अग्नि के समान ज्वलनशील है।
यह पहले विवेक को जलाता है,
फिर संबंधों को,
और अंत में स्वयं मनुष्य को राख बना देता है।

संदेश:
विनम्रता उन्नति का द्वार है, जबकि अहंकार विनाश का आधार।

Tuesday, August 4, 2026

पिंजरे का बंद पक्षी

 आज की चुनौती – पिंजरे का बंद पक्षी



पिंजरे के पक्षी

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

5-8-26

नमस्ते वणक्कम्।

 पिंजरे के पक्षी

 गुलाम है मानव का।

यह एक मानव के मनोरंजन के साधन।

अपनी खुशी के लिए 

 स्वतंत्र हम उड़ान के

 पक्षी की आज़ादी 

 छीनना  निर्दय मानव का गुण।

 नवविवाहिता बहु को भी लोग घर के पिंजड़े में बंद कर रखते हैं।

 एक कवि ने लिखा 

 पिंजरे में बन्द पक्षी

 गा न सकता।

अपनी आज़ादी खोकर

 दुखी रहता है।

आज़ादी की लड़ाई में 

 अनेक लोग  कारावास में रहे।

 पिंजड़े के पक्षी का पंख भी काट देते हैं।

 यातना सहकर

 वह मूक पक्षी  

  रोता रहेगा।

स्वच्छ गगन में उड़ना,

 मन पसंद दाल चुगना

अपने अन्य पक्षियों से मिलना, 

 प्यार हम करना सब कल्पना करके घुट-घुट कर मरेगा।

 हिंदू शास्त्रों के अनुसार 

 पक्षी को जो

 पिंजड़े में बंदकर 

 सताता है,

 उसको उसके वंशज को जेल की सज़ा भोगना पड़ेगा।

 जैसी करनी,

 वैसी भरनी।

कर्म फल भोगना 

 निश्चित।


+++++++++++

पिंजरे का पक्षी
एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)
5-8-2026

नमस्ते। वणक्कम्।

पिंजरे का पक्षी,
मानव का गुलाम बन जाता है।
वह किसी के मनोरंजन का साधन है,
पर उसकी स्वतंत्रता छिन जाती है।

मनुष्य अपनी खुशी के लिए
उसकी उड़ान रोक देता है।
खुले आकाश में विचरने का अधिकार
निर्दयता से छीन लेता है।

कभी-कभी नवविवाहिता बहू भी
घर की चारदीवारी में
मानो पिंजरे की चिड़िया बनकर रह जाती है।

एक कवि ने ठीक ही कहा है—
"पिंजरे में बंद पक्षी
मन से गा नहीं सकता।
स्वतंत्रता खोकर
वह भीतर ही भीतर रोता है।"

स्वतंत्रता की रक्षा के लिए
अनेक वीरों ने कारावास सहा।
पिंजरे के पक्षी के तो
पंख भी काट दिए जाते हैं।

यातना सहता वह मूक प्राणी
कुछ कह नहीं पाता,
केवल मौन आँसू बहाता है।

स्वच्छ गगन में उड़ना,
मनचाहा दाना चुगना,
अपने साथियों से मिलना,
प्रेम से जीवन जीना—
ये सब उसके लिए
केवल कल्पना बनकर रह जाते हैं।
वह घुट-घुटकर जीता है।

हिंदू शास्त्रों में भी कहा गया है कि
निर्दोष प्राणियों को कष्ट देना
पाप का कारण बनता है।
हर कर्म का फल
एक न एक दिन अवश्य मिलता है।

जैसी करनी, वैसी भरनी।
कर्मफल से कोई बच नहीं सकता।

Monday, August 3, 2026

जैसी करनी वैसी भरनी


आज की चुनौती

जैसी करनी वैसी भरनी

++++++++++++++

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

मानव का जन्म,

शास्त्रों के अनुसार,

पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरूप होता है।

आकाश से गिरी

जल की एक बूँद,

सीपी में गिरे तो मोती बन जाती है;

उसका तेज और चमक

उसके भाग्य और कर्मफल का प्रतीक है।

वही बूँद

यदि गंदे नाले में गिरे

या अंगारे पर पड़े,

तो उसका स्वरूप बदल जाता है।

मानव की बुद्धि और प्रवृत्ति

क्यों भिन्न-भिन्न होती है?

सुविचार से सुख और शांति मिलती है,

कुविचार से बेचैनी और दुःख।

अपने अंतर्मन को जानकर

कभी झूठ मत बोलो।

झूठ सिद्ध होने पर

सबसे अधिक पीड़ा

अपना ही अंतःकरण देता है।

सुकर्म करने वाला

सीना तानकर चलता है,

कुकर्म करने वाला

स्वयं ही सिर झुका लेता है।

एक डाकू को कभी शांति नहीं मिली।

जब वह गुरु के सान्निध्य में पहुँचा,

तो उसे कहा गया—

"दिनभर जो भी कर्म करो,

उन्हें लिखकर सायंकाल सभा में पढ़ना।"

अपने ही कर्मों को पढ़ते समय

वह लज्जित हो उठा।

सभा में उन्हें सुनाने का साहस न हुआ।

यहीं से उसका जीवन बदल गया।

जैसी करनी, वैसी भरनी।

आत्मचिंतन से ही ज्ञात होता है

कि मनुष्य सुखी क्यों है,

और दुःखी क्यों।

सुकर्म का फल

आनंद ही आनंद है;

कुकर्म का फल

दंड और पश्चाताप।

संत कबीर ने कहा है—

"बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥"

और यह भी—

"जो तोको काँटा बुवै,

ताहि बोय तू फूल।

तोको फूल के फूल हैं,

बाकू है त्रिशूल॥"

ध्यान और साधना से

ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त होता है।

नशे से मिलने वाली शांति

क्षणिक होती है,

और शरीर, विशेषकर फेफड़ों के लिए, हानिकारक।

सोचो, समझो—

जैसा आहार,

वैसी बुद्धि।

सत्संग का फल

ज्ञान और विवेक है;

कुसंग का फल

बुरी आदतें और दुःख।

अतः जीवन का अटल सत्य है—

जैसी करनी, वैसी भरनी। 

प्रेम चंद जयंती

 साहित्य संगम संस्थान, मध्यप्रदेश इकाई को नमस्कार।


 मुंशी प्रेमचंद  दिवस।


एस.अनंतकृष्णन , चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक।

 हिंदी साहित्य संस्थान लखनऊ उत्तर प्रदेश द्वारा सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक अनुवादक। हिंदी प्रचारक।

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मुंशी प्रेमचंद हिन्दी कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में सम्राट है। 

 उनकी कहानियाँ और उपन्यास 

सदा हर युग के अनुकूल  

  चिर स्मरणीय और अनुकरणीय हैं।

 उनकी कहानियों के उद्धरण 

 सदा स्मरणीय और प्रेरणादायक हैं।

1.दौलत से आदमी को जो इज्ज़त मिलती है,

वह उसकी नहीं, उसकी दौलत की इज्ज़त होती है।

 2. जीवन --खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है, जीवन नाम है आगे बढ़ते रहने की लगन का।

3.न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती है नचाती हैं।

4.सुंदरता मन की चीज़ है,तन की नहीं।

5.चली हुई बात और सीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता।

6. जो अपने घर में ही सुधार न कर सका हो,उसका दूसरों को सुधारने की चेष्टा करना बड़ी भारी धूर्तता है।

7.क्रोध अत्यंत कठोर  होता है, वह देखना चाहता है कि मेरा वाक्य निशाने पर बैठता है या नहीं, वह मौन को सहन नहीं कर सकता।

8.अपमान को निगल जाना चरित्र पतन की अंतिम सीमा है।

9.स्पष्टवादिता मनुष्य का एक उच्च गुण है।


10.माता का हृदय  दया का आगार है। उसे जलाओ तो उसमें दया की ही सुगंध निकलती है,

पीसो तो दया का ही रस निकलता है। वह देवी है, विपत्ति की क्रूर लीलाएँ  भी उस स्वच्छ निर्मल स्रोत को मलिन नहीं कर सकती।


 


 

 

 


Sunday, August 2, 2026

नियती का खेल

 नियति का खेल

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 


नियती का खेल।

 भाग्य चक्र

 विधि की विडंबना 

सोचो समझो जानो जागो

कर्म फल की देन।

 सुविचार बदविचार 

 किसका कसर?

परिणाम निम्न चिंतन:-

नमस्ते वणक्कम्।

 मानव क्या बुद्धिमान हैं?

क्या मानव में सहज क्रिया है?

 मानव सुखी क्यों?

मानव दुखी क्यों?

एक ही राजा रानी के पुत्रों में 

एक वीर,एक कायर क्यों?

अमीर के परिवार में जन्म क्यों?

अमीर के यहाँ असाध्य रोगी क्यों?

खानदान का उत्थान पतन क्यों?

एक ही गुरु के शिष्यों में 

प्रतिभाशाली और मंद बुद्धि हम क्योँ?

 डाक्टरों में भेदभाव क्यों?

 अध्यापक में अच्छे  शिक्षक क्यों?

 आध्यात्मिक क्षेत्रों में ढोंगी पाखंडी हम क्यों?

पतिव्रता भद्र महिला 

वीरांगना  क्यों?

विषकन्या  वारांगना क्यों?

सत्यवान क्यों?

 असत्यवान क्यों?

दादू निर्दयी, त्यागी भोगी क्यों?

 सोचो समझो

 मानव केवल कठपुतली है।

स्वार्थ कृपन देश द्रोही क्यों?

 न्याय अन्याय क्यों?

 खूँख्वारादमखोर बाघ क्यों? 

हिरन क्यों?

बलवान हाथी पालतू जानवर

मानव की कठपुतली क्यों?

मकड़ी का जाल क्यों?

उसमें फँसकर आहार 

बननेवाला कीड़ा क्यों?

 अंतिम निष्कर्ष यही

 सबहीं नचावत राम गोसाईं!

 जानो समझो जागो जगाओ

 एकांत ध्यान में 

 अपने को सुधारो!

जनकल्याणकारी कामों में लगो।

आज का तेरे नाम ,पद, धन

  मृत्यु के बाद बेकार ही।

 भूल जाने में न देरी।

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   एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।