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Friday, October 9, 2026

विश्व डाक दिवस

 विश्व डाक दिवस।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

101026

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डाक विभाग अंग्रेज़ी की देन।

 भारत के इतिहास में 

कबूतर, हंस पक्षी, मेघ ,राजदूत, संदेश ध्वनि द्वारा।

 प्राचीन काल से आज तक के परिवर्तन

  महत्व पूर्ण है। 

रोज़ डाकिये की प्रतीक्षा में।

 वह दिन याद है

 तार के आते ही 

 सब रोने लगते।

 वह केवल अशुभ संदेश लाता था।

 मणि आर्डर का महत्व 

विश्व डाक दिवस 

 आजकल वह स्पीड पोस्ट, बचत बैंक , 

आदि सुविधाओं से भरा है। 

 डाक घर का नारा है

अहर्निशम सेवा महे।।

 आजकल मोबाइल आने के बाद डाक सेवा कम।

 डाकिये की चिट्ठी ही नौकरी देती।

 दूर के मित्र, नाते रिश्तेदारों से कुशल क्षेम के संदेश लाते।

 धन्य है डाक सेवा के 

 अन्वेषक।

जय विश्व डाक दिवस।

 डाक विश्व दिवस


विश्व डाक दिवस


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।

10-10-2026


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यादों में डाक सेवा


डाक विभाग अंग्रेज़ों की देन,

भारत के इतिहास में

संदेशों का अपना रहा है विशेष स्थान।


कबूतरों से संदेश भेजना,

हंस-पक्षियों की कल्पना,

मेघों के माध्यम से संदेश,

राजदूतों का संदेश पहुँचाना,

ध्वनि और संकेतों द्वारा संवाद करना—

प्राचीन काल से आज तक

संचार के अनेक रूपों में

महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है।


रोज़ डाकिये की प्रतीक्षा में,

बीते दिनों की यादें ताज़ा होती हैं।


वह दिन आज भी याद है,

जब तार के आते ही

घर में हलचल मच जाती थी।

तार का नाम सुनते ही

मन में आशंका जाग उठती थी,

क्योंकि अक्सर वह

किसी अशुभ समाचार का संदेश लाता था।


मनीऑर्डर का भी

अपना विशेष महत्त्व था।

दूर रहने वाले परिजनों के लिए

वह आर्थिक सहारा बनता था,

और परिवार के चेहरों पर

खुशी की लहर दौड़ा देता था।


विश्व डाक दिवस!


आज डाक विभाग

स्पीड पोस्ट, बचत बैंक

और अनेक सुविधाओं से युक्त है।

जनसेवा के पथ पर चलते हुए

यह विभाग निरंतर

अपनी भूमिका निभा रहा है।


डाक विभाग का ध्येय-वाक्य है—


“अहर्निशं सेवामहे।”

अर्थात्—हम दिन-रात सेवा में तत्पर रहते हैं।


आज मोबाइल और इंटरनेट के युग में

डाक सेवाओं का उपयोग भले ही कम हुआ हो,

पर डाक सेवा का महत्त्व

आज भी कम नहीं हुआ है।


डाकिये के हाथों आई चिट्ठी

कभी नौकरी का समाचार लाती थी,

कभी दूर बैठे मित्रों का प्यार,

तो कभी नाते-रिश्तेदारों की

कुशल-क्षेम का संदेश।


वे चिट्ठियाँ केवल कागज़ नहीं थीं,

उनमें भावनाएँ बसती थीं,

अपनों का स्नेह झलकता था,

और दूरियाँ भी मिट जाती थीं।


धन्य हैं वे आविष्कारक,

धन्य है डाक सेवा,

जिसने दूरियों को घटाकर

मानव-हृदयों को जोड़ने में

अपना अमूल्य योगदान दिया।


जय हो डाक सेवा की!

जय हो विश्व डाक दिवस की!

जिंदगी

 जिंदगी  त्याग के लिए ,

जिंदगी भोग के लिए.

जिंदगी खुशी से जीने के लिए। 

कितने लोगों से यह संभव है ,पर 

त्यागियों के बिना संसार सुखी नहीं। 

माँ -बाप के त्याग से  बच्चा पलता  हैं.

राष्ट्र सेवकों के परिश्रम से 

देश का विकास होता है। 

पुलिस ,सैनिक आदि के त्याग से 

अमन चमन का जीवन बिताते हैं.

किसानों के परिश्रम से भोजन मिलता हैं। 

शिक्षित और चतुर लोगों की योजना से 

देश का विकास होता है.

आध्यात्मिक लोगों के उपदेश से 

अनुशासन ,सत्य ,अहिंसा ,दानी ,दयालु 

 के कारण परोपकारी  होते हैं.

भोगियों से देश का पतन ,

त्यागियों से देश का उत्थान। 

व्यवहार में देखें तो स्वार्थियों 

और भोगियों का पारा बढ़ता है. 

त्यागी बेचारा भला आदमी बन जाता है

स्वरचित अनंतकृष्णन द्वारा.

Thursday, October 8, 2026

शब्द

 

शब्दों का प्रहार

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।
दिनांक: 9-10-2026

शब्दों का महत्त्व अपार है।
शब्दों की शक्ति से
बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ होती हैं।

शब्द जोड़ते हैं,
शब्द तोड़ते हैं।
शब्द प्रेम जगाते हैं,
शब्द वैर बढ़ाते हैं।

‘जियो, जीने दो’
जीवन का सुंदर संदेश है।
लेकिन शब्दों के प्रयोग में
सावधानी भी आवश्यक है।

हँसमुख और हँसकर मुख दिखाने में,
शब्दों के अर्थ और भाव में
सूक्ष्म अंतर हो सकता है।
शब्दों का गलत प्रयोग
किसी के मन को आहत कर सकता है।

बिना सोचे-समझे बोले गए कठोर शब्द
श्रोता के हृदय पर गहरा प्रहार करते हैं।
शरीर का घाव भर सकता है,
लेकिन मन का घाव
लंबे समय तक हरा रह सकता है।

प्रियजनों के कठोर शब्द
कभी-कभी सुधार की भावना से निकलते हैं,
जबकि अप्रिय व्यक्तियों के कठोर शब्द
क्रोध और प्रतिशोध की भावना जगा सकते हैं।

संत तिरुवल्लुवर का संदेश

अग्नि से जला हुआ घाव
समय के साथ भर सकता है,
लेकिन जिह्वा से निकले कटु शब्दों का घाव
आसानी से नहीं भरता।

रहीम का दोहा

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पाताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥

अर्थात् जिह्वा बिना सोचे-समझे
स्वर्ग से पाताल तक की बातें कह जाती है।
वह स्वयं तो मुख के भीतर रहती है,
लेकिन उसके कटु वचनों के कारण
सिर पर जूते पड़ने की नौबत आ जाती है।

कबीर का दोहा

एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुःख रासि।
एक शब्द बंधन कटे, एक शब्द गल फाँसी॥

अर्थात् एक शब्द सुख का भंडार बन सकता है,
दूसरा दुःख का कारण।
एक शब्द बंधनों से मुक्त कर सकता है,
तो दूसरा फाँसी तक की नौबत ला सकता है।

वाणी का विवेक

ऐसे शब्द बोलने चाहिए
कि सुनने वाला अपना बन जाए।
हमारे शब्दों से
दूसरों के मन में शांति आए
और हमारे अपने हृदय को भी
शांति का अनुभव हो।

कबीर का अमर संदेश है—

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥

शब्दों का प्रहार कैसा हो?

शब्दों का प्रहार
मरहम के स्पर्श जैसा सुखद हो,
न कि लाठी के प्रहार जैसा
पीड़ादायक और दुःखद।

बोलने से पहले सोचें,
शब्द चुनने से पहले समझें,
और अपनी वाणी में
प्रेम, करुणा तथा विवेक भरें।

क्योंकि—

शब्दों से दिल जीते जाते हैं,
शब्दों से दिल टूट भी जाते हैं।
सोच-समझकर बोलेंगे,
तो प्रेम और शांति बाँटेंगे।
बिना सोचे बोलेंगे,
तो दुःख के घाव छोड़ जाएँगे।

— एस. अनंतकृष्णन

कविता प्रेम

 काव्य मराथान के चौथे दिन। श् , हिंदी के प्रसिद्ध कवि, गायक और मुरली वादक की प्रेरणा से कविता लिख रहा हूं। प्रेरक के प्रति आभारी हूं।

कविता ४. दिनांक -९-१०-२०२९
कविता प्रेमी संगीत प्रेमी,
कांचन प्रेमी,भाषा प्रेमी,
देश प्रेमी,ईश्वर प्रेमी।
दान धर्म प्रेमी ,
आसक्त अनासक्त लोग
ईश्वर की सृष्टि अनेक ।
कवि ही चिर स्मरणीय।
अनुकरणीय ,काव्य ही अमर।।
नमस्ते। वणक्कम।
चूड़ियां भारतीय संस्कृति का प्रतीक।।
नाम -अनंतकृष्णन।
विधा --अपनी शैली,अपना राग।
विषय: चूड़ियां।
चूड़ियां आध्यात्मिक प्रतीक।।
उनकी ध्वनी तरंगें स्वास्थ्य रक्षक।।
दिव्य शक्ति प्रदान करनेवाली।
कांच की चूड़ियां अति उत्तम।
प्लास्टिक चूड़ियां सही नहीं।।
पाश्चात्य सभ्यता अंग्रेजी स्नातक
माथे के तिलक ,हाथ की चूड़ियां
पहनाने को कम कर रहा है।।
चांदी, सोने व तांबे की चूड़ियां।।
सुमंगल के लक्षण चूड़ियां।।
लक्ष्मी के अनुग्रह के लिए
मानसिक शांति के लिए चूड़ियां।
मंदिरों में देवियों को
चूड़ियों का मेला भी।।
मेलों में चूड़ियों की दूकाने ।
पीले रंग आनंद प्रद।
हरा रंग शांति प्रद ।।
नीला रंग ऊर्जाप्रद।।
लाल रंग समस्या ओं को
सामने करने की शक्तिदायक।।
नारंगी रंग विजय प्रद।
काला रंग धैर्य प्रद ।
लाल और हरा शुभ मुहूर्त में
उत्साह प्रद ।
वैज्ञानिक आधार नकरात्मक विचार
भगाकर सकारात्मक
विचार देने वाले हैं।।
बुरी शक्तियों को भगाने वाली।
नेत्र दोष से बचाने वाली हैं चूड़ियां।।
आधुनिक फेशन ,भले ही
चूड़ियां पहनने की प्रथा दूर रखें
इसका महत्त्व समझाने
ऐसे शीर्षक भी ईश्वरीय देन।।
स्व स्वर चित स्वचिंतक
एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै।
तीसरा दिन
काव्य मराथन में आज तीसरा दिन। चेन्नई के सुप्रसिद्ध कवि श्री ईश्वर करुण जी ने मुझे नामित किया और इसी कड़ी में मैं आज कविताएं लिख रहा हूँ।
कविता -3
आसमान -आकाश धरती -वसुंधरा
आसमान धरती से देखते हैं ,
सूर्य की गर्मी ,चन्द्रमा का शीतल
तारों का टिम टिमाना
धरती को निकट से छूकर देखते हैं।
जलप्रपात से गिरते नीर में नहाकर देखते हैं
बहती नदी में डुबकियाँ लगाकर देखते हैं
कुएँ में कूदकर तैरते हैं ,
मिट्टी के खिलौने बनाकर ,
पेड़ पौधे लगाकर ,
प्रिय पालतू जानवर को गाढ़कर
अंतिम संस्कार कर देखते हैं ,
यहीं स्वर्ग -नरक का अनुभव करते हैं
पर यहीं कहते हैं स्वर्ग है आसमान पर।
जिसे किसीने न देखा है.
बचपन का दुलार ,लड़कपन के दुलार
जवानी का दुलार ,बुढ़ापा का दुःख
दौड़ना -भागना जवानी ,बुढ़ापा सोच सोचकर आँसू
नरक तुल्य कोई कोइ खोया जवानी।
आसमान के स्वर्ग -नरक की चिंता में
जवानी का स्वर्ग -बुढ़ापे का नरक भूल
मानव तन समाजाता मिट्टी में।
आसमान धरा की चिंता कहीं नहीं
यहीं भोग प्राण पखेरू उड़जाते।
कहते हैं धरा नरक आसमान स्वर्ग।
एस। अनंतकृष्णन ,चेन्नै।

Wednesday, October 7, 2026

प्राकृतिक चेतावनी

 प्रकृति का संदेश


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

8-10-2026


हे मानव!

सावधान! सावधान!


क्षणिक लाभ के लिए

तुम जंगलों को काट रहे हो,

पर्वतों को चूर्ण कर रहे हो,

नदियों की रेत को समाप्त कर रहे हो।


अपनी मातृभाषा में भी

अनावश्यक अंग्रेज़ी की मिलावट कर रहे हो।


नगर-विस्तार और नगरीकरण के नाम पर

झीलों को गायब कर रहे हो,

हरे-भरे खेतों पर

कंक्रीट के भवन खड़े कर रहे हो,

धरती के भूजल को

अंधाधुंध चूस रहे हो।


कारखानों के अपशिष्ट से

नदियों को प्रदूषित कर रहे हो,

वायु को विषैला बना रहे हो।


याद रखो—

तुम प्रकृति को जितना नष्ट करोगे,

उतना ही उसका दुष्परिणाम भोगोगे।


ग्रीष्म की तपती लहरें,

अनियंत्रित निर्माण,

वनों का विनाश—

इन सबके दुष्परिणाम

एक दिन तुम्हारे सामने खड़े होंगे।


जब प्रकृति अपनी

सहनशक्ति की सीमा पार करेगी,

तब उसके प्रकोप को रोकना

मानव-ज्ञान और शक्ति से

असंभव हो सकता है।


ज्वालामुखी को देखा है,

भूकंप को देखा है,

सुनामी को देखा है,

अत्यधिक गर्मी का प्रकोप देखा है।


वायु-प्रदूषण

अनेक रोगों का कारण बन रहा है।


कोरोना का संकट देखा,

सुनामी की विभीषिका देखी,

नेपाल में आए विनाश को देखा।


फिर भी—

क्या हम जागेंगे?


सोचो!

समझो!

जागो!


प्रकृति हमारी शत्रु नहीं,

हमारी जीवनदायिनी माता है।


उसका संरक्षण करो,

उसका सम्मान करो,

आने वाली पीढ़ियों के लिए

धरती को सुरक्षित रखो।


अन्यथा प्रकृति का मौन

जब चेतावनी में बदलेगा,

तब मनुष्य के पास

पश्चात्ताप के अतिरिक्त

कुछ भी शेष न रहेगा।


सावधान!

सावधान!!

सावधान!!!

प्रकृति का संदेश। एस. अनंतकृष्णन चेन्नई तमिलनाडु। 8-10-26 हे मानव। सावधान! तुम सद्यःफल के लिए जंगलों को काट रहे हो। पर्वतों को चूर्ण कर रहे हो। नदियों के रेतों है को समाप्त कर रहे हो। अपनी मातृभाषा में अंग्रेज़ी मिलावट कर रहे हो। नगर विस्तार नगरीकरण के नाम से, झीलों को गायब कर रहे हो। हरे-भरे खेतों में इमारतें बनाई रहे हो। भूतल पानी चूस रहे हो। कारखानों के उच्छिष्ट से नदियों को प्रदूषण कर रहे हो। तुम प्रकृति को जितना नष्ट करोगे, उतना ही कष्ट भोगोगे। ग्रीष्म वासस्थल में मनमाना इमारतें। इन सबका दुष्परिणाम देखोगे जब हम अपनी सहन शक्ति को बैठेंगे। प्राकृतिक क्रोध संभालना तेरे ज्ञान से असंभव। ज्वालामुखी देखते हो। भूकंप देखते हो। हवा के प्रदूषण अनेक बीमारियों के मूल कारण। सोचो समझो जागो। कोराना देखा, सुनामी देखा। देखा नेपाल का सर्वनाश। गर्मी का प्रकोप। सही नहीं पाओगे। सावधान। सावधान। सावधान।

 प्रकृति का संदेश।

एस. अनंतकृष्णन चेन्नई तमिलनाडु।

8-10-26

 हे मानव।

सावधान!

 तुम सद्यःफल के लिए 

जंगलों को काट रहे हो।

 पर्वतों को चूर्ण कर रहे हो।

नदियों के रेतों है को समाप्त कर रहे हो।

 अपनी मातृभाषा में 

 अंग्रेज़ी मिलावट कर रहे हो।

नगर विस्तार नगरीकरण के नाम से, 

झीलों को गायब कर रहे हो।

हरे-भरे खेतों में इमारतें बनाई रहे हो।

 भूतल  पानी चूस रहे हो।


 कारखानों के उच्छिष्ट से

 नदियों को प्रदूषण कर रहे हो।

तुम प्रकृति को जितना नष्ट करोगे,

उतना ही कष्ट भोगोगे।

ग्रीष्म वासस्थल में मनमाना इमारतें।

इन सबका दुष्परिणाम देखोगे 

 जब हम अपनी सहन शक्ति को बैठेंगे।

प्राकृतिक क्रोध संभालना

 तेरे ज्ञान से असंभव।

ज्वालामुखी देखते हो।

 भूकंप देखते हो।

 हवा के प्रदूषण अनेक बीमारियों के मूल कारण।

 सोचो समझो जागो।

 कोराना देखा, सुनामी देखा।

 देखा नेपाल का सर्वनाश।

 गर्मी का प्रकोप।

 सही नहीं पाओगे।

 सावधान। सावधान। सावधान।

Tuesday, October 6, 2026

शहरी भाग दौड़

 शहर की भाग दौड़ में।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक।

7-10-26.++++++

++++++++


शहरी जीवन 

तनाव से पूर्ण।

घर एक जगह,

 कार्यालय एक जगह।

 अधिक दूरी।

  समय पर जाना आना

 कभी कभी रेल से थोड़ी दूर,

उतरकर बस से थोडी दूर।

पैदल थोड़ी दूर।

शहरी भाग दौड़ में 

 यात्रा में ही अधिक समय।

 सुबह घर से निकला तो रेल में ही नाश्ता।

  कर्मचारियों के लिए ।

 घर की तलाश में,

 घर के मालिक की शर्तें मानने में,

अपार्टमेंट में ही अड़ोस पड़ोस वालों के व्यवहार में 

वाहन पार्किंग में 

शहरी भाग दौड़।

 जो वहाँ के 

रहन- सहन के आदी हो जाते हैं,

सब्र कर लेते हैं।

गाँव से जो शहर आते हैं,

उनके लिए तनिक भी

 शहरी तडक भटक पसंद नहीं होते।

द्वि चक्र गाड़ी हो या 

पैर गाड़ी भी हो

बाज़ार   में  स्टैंड  मिलना मुश्किल।

 भूल से छोड़ने पर पुलिस की परेशानियां।

 चोरों का भय, जेबकतरे का भय।

 थोड़े में कहना है तो

 शहर के भागदौड़ में 

 सब्रता की जरूरत है।

शहर की भाग-दौड़ में


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक

7-10-2026


शहरी जीवन

तनाव से पूर्ण।

घर एक जगह,

कार्यालय दूसरी जगह—

दोनों के बीच

लंबी दूरी।


समय पर जाना,

समय पर लौटना—

कभी रेल से थोड़ी दूर,

उतरकर बस से थोड़ी दूर,

फिर पैदल भी थोड़ी दूर।


शहरी भाग-दौड़ में

यात्रा में ही

बीत जाता है

अधिक समय।


सुबह घर से निकले,

तो कभी-कभी

रेल में ही नाश्ता।


कर्मचारियों के लिए

घर की तलाश,

मकान मालिक की शर्तें,

अपार्टमेंट में

अड़ोस-पड़ोस वालों का व्यवहार,

वाहन की पार्किंग—

हर जगह

शहरी भाग-दौड़।


जो लोग

इस जीवन के

रहन-सहन के आदी हो जाते हैं,

वे धीरे-धीरे

सब्र करना सीख लेते हैं।


लेकिन गाँव से

जब कोई शहर आता है,

तो उसे यह

शहरी तड़क-भड़क

तनिक भी पसंद नहीं आती।


द्विचक्र वाहन हो

या पैदल चलना हो,

बाज़ार में भी

जगह मिलना मुश्किल।


भूल से वाहन छोड़ दिया,

तो पुलिस की परेशानी;

चोरों का भय,

जेबकतरों का भय—

हर कदम पर

सावधानी जरूरी।


थोड़े में कहना हो तो—

शहर की भाग-दौड़ में

सुविधाओं से अधिक

सब्र की जरूरत है।


शहरी जीवन

सिर्फ इमारतों का नाम नहीं;

यह तो

समय से संघर्ष करते हुए

जीने की एक कला है।

Monday, October 5, 2026

काव्य मराथान

 काव्य मराथन में   पहले औरआज दूसरा दिन।

 चेन्नई के सुप्रसिद्ध कवि श्री ईश्वर करुण जी ने मुझे नामित किया और इसी कड़ी में मैं आज  कविताएं  लिख रहा हूँ।


कविता २.


मैं कविता के देश में भटक रहा हूं। --शीर्षक।


 नमस्ते! वणक्कम!

 मैं हूं हिंदीतर भाषी।।

 भटक रहा हूं   शैली के लिए।

छंदों की गिनती में,

अलंकारों के शब्दों में

नव रसों के चिंतन में।

रूढी बद्ध लिखने में

ईश्वर का अनुग्रह न मिला

जैसे मिला कालीदास को।

आदी कवि वाल्मीकि को।

तुलसी को,सूर को।

कबीर जैसा मानसिक गुरु

अंधेरे में पैर दबकर "राम,राम"मंत्र।।

सब के मिश्रण में ,उनके रसास्वादन में

भटकता भटकता कुछ भीनहीं लिख पाया।।

आधुनिक खड़ी बोली की

मुक्त शैली ,नव कविता,है कू

उनको भी नियम बनाते तो

सोचा लिखना है जरूर।।

अपने सोच विचार की 

अभिव्यक्ति करना है जरूर।

लिखना शुरु किया

अपनी भाषा,अपने विचार ,

अपनी शैली।।

यही ईश्वरानुग्रह।।

यही ईश्वरानुभूति की प्रेरणा।

परिणाम भी अच्छा निकला।

मुख पुस्तिका के दलों ने

 मेरी कविता मान ली।।

एकाध ने" वाह"वाह",सुंदर,

रायें लिखी तो प्रेरित मैं

साहस होकर कुछ लिख रहा हूं।

कवि कुटुंब भी अपने कवि सूची में

मेरा नाम भी जोड़ दिया।

ऐसे ही दस से ज्यादा दलों ने

मुझे स्वीकारा।

 सब के प्रति आभारी हूं।।

मैं कविता के देश में

 भटक रहा हूं आज।।

स्वरचित कविता

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै।

७-१०-२०२०


पहला दिन।


कविता-1.-- अपने विचार अपनी शैली। 

शीर्षक = इंसानियत।

श्रीगणेश करता हूं, श्री गणेश जी की कृपा मिलें।

श्री नहीं तो श्रीहीन मनुष्य जंग में जीना दुश्वार।

लक्ष्मी है कायर है तो न निर्भर जीवन।

शक्ति है, लक्ष्मी है  , बुद्धि  है  

तीनों है चरित्र नहीं तो 

नर जीवन अपमानित नारकीय।।

सातों जनमों में अपमानित रावण जीवन।

सुयोधन बन गया दुर्योधन। 

मजहब अनेक मनुष्यता नहीं तो

मजहब महत्वहीन हो जाते।।

वल्लुवर की बात--

कछुए समान पंचेंद्रिय को काबू में रखें तो

सातों जनमों में सम्मान जान!!

अनुशासन श्रेष्ठता देने से

अनुशासन जान से श्रेष्ठ जान।

चाल-चलन अच्छी तो अगजग में 

सिर ऊंचा जान।।


स्वरचित स्वचिंतक अनंत कृष्णन  चेन्नै।

शिक्षक दिवस

 माता-पिता और गुरु—तीनों


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

6-10-2026


मानव में मानवता भरना,

जीविकोपार्जन के योग्य बनाना,

सत्य-असत्य का विवेक समझाना,

विनम्रता और अनुशासन सिखाना,

अच्छे चाल-चलन का मार्ग दिखाना,

भरी सभा में निर्भय होकर

अपने विचार व्यक्त करने का साहस देना—


इन सबका मार्गदर्शक है शिक्षक।


अज्ञान के अंधकार को मिटाकर

ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाला,

जीवन का सही मार्ग दिखाने वाला,

आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाला

गुरु ही सच्चा देवस्वरूप है।


आधुनिक युग में

अध्यापक वह सीढ़ी है,

जिसके सहारे विद्यार्थी

अपने जीवन की ऊँचाइयों तक पहुँचता है।


इसीलिए शिक्षकों के प्रति

कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने के लिए

विश्व शिक्षक दिवस मनाया जाता है।


माता-पिता और गुरु—

तीनों ही हमारे जीवन के प्रथम देव हैं।


माता-पिता हमें जन्म देते हैं,

पालन-पोषण करते हैं

और जीवन के संस्कार प्रदान करते हैं।

गुरु हमें ज्ञान, विवेक और

सही दिशा का मार्गदर्शन देते हैं।


कबीरदास जी कहते हैं—


“गुरु और गोविंद दोनों

खड़े हों मेरे सामने,

तो पहले गुरु के चरणों में नमन करूँ;

क्योंकि गुरु ने ही

गोविंद तक पहुँचने का मार्ग दिखाया है।”


हम जीवन में कुछ बनते हैं,

हमारी उन्नति होती है,

हमारे भीतर संस्कार और विवेक जागते हैं—

तो उसके मूल में

माता-पिता, शिक्षा और शिक्षक का अमूल्य योगदान होता है।


इसलिए आज के दिन

अपने माता-पिता और सभी शिक्षकों को

हृदय से स्मरण करते हुए

उनके चरणों में सादर प्रणाम।


माता-पिता का सम्मान—

संस्कारों का सम्मान है।

शिक्षक का सम्मान—

ज्ञान का सम्मान है।

ज्ञान और संस्कारों का सम्मान—

मानवता का सम्मान है।


सादर प्रणाम।

शिक्षक दिवस

 विश्व शिक्षक दिवस 


एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

6-10-26.

मानव में मानवता भरने,

जीविकोपार्जन के लायक बनने 

सत्य असत्य समझाकर

विनम्रता सिखाने 

 अनुशासन सिखाने 

 अच्छी चाल चलन सिखाने,

भरी सभा में अपने विचार निर्भय प्रकट करने,

 एक मार्ग दर्शक 

अज्ञान अंधकार मिटाने वाले,

आत्मज्ञानी गुरु देव

 आधुनिक काल में 

 अध्यापक

‌वे सीढी है

 उनके सम्मान करने

विश्व शिक्षक दिवस 

मनाया जाता है।

माता-पिता गुरु देव हैं।

 कबीर तो कहते हैं 

 ईश्वर और गुरु दोनों एक साथ आएँगे तो

मैं गुरु के चरणों में नमस्कार करूंगा क्योंकि उन्होंने ही

ईश्वर के दर्शन का मार्ग दिखाया।

 हम कुछ बनते हैं 

 हमारी तरक्की हुई हैं तो मूल में है शिक्षा और शिक्षक।

सादर प्रणाम।

Saturday, October 3, 2026

शास्त्री और गाँधीजीज्ञ

 [02/10, 8:16 am] sanantha.50@gmail.com: जय जवान, जय किसान

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु।


लालबहादुर शास्त्री जी—

भारत के इतिहास में

एक सरल, सादगीपूर्ण

और दूरदर्शी नेता।


उनका दिया नारा—

“जय जवान, जय किसान”

केवल दो शब्द नहीं,

राष्ट्र-जीवन के

दो मजबूत स्तंभ हैं।


जवान देश की सीमा पर

जागकर पहरा देता है,

तभी देश का नागरिक

चैन और निश्चिंतता से सोता है।


किसान धरती पर पसीना बहाकर

अन्न उपजाता है,

तभी हर जीव की

प्राकृतिक आवश्यकता—

भोजन—पूरी होती है।


धन आवश्यक है,

पर धन से जीवन नहीं चलता;

अन्न के बिना

जीना ही दुश्वार है।


भारत के इतिहास में

न जाने कितने आक्रमण हुए—

मंगोल, मुगल, पुर्तगाली, डच,

फ्रांसीसी और अंग्रेज़ आए;

पड़ोसी देशों से भी

संघर्ष होते रहे।


ऐसी परिस्थितियों में

देश की सीमाओं की सुरक्षा

और देशवासियों के लिए अन्न—

दोनों समान रूप से प्रधान हैं।


एक देता है सुरक्षा,

दूसरा देता है जीवन।


इसी सत्य को पहचानकर

लालबहादुर शास्त्री जी ने कहा—


**जय जवान!


जय किसान!**


कितनी सरल वाणी,

कितनी गहरी सोच,

कितनी दूरदर्शिता!


धन्य हैं लालबहादुर शास्त्री जी।

धन्य है उनका राष्ट्र-चिंतन।

[02/10, 8:43 am] sanantha.50@gmail.com: धन्य महात्मा गांधी


राष्ट्रपिता महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी जी—

यही है उनका व्यक्तिवाचक नाम।


उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को

जन-जन का आंदोलन बना दिया।

नरम दल के प्रमुख नेताओं में

उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


सत्य और अहिंसा,

सत्याग्रह और उपवास—

यही उनके प्रमुख अस्त्र-शस्त्र थे।


उनकी प्रेरणा से

स्वतंत्रता संग्राम को

एक नई दिशा और

जनसामान्य की व्यापक भागीदारी मिली।


धन्य हैं महात्मा गांधी!


उनकी दूरदर्शिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष

हिंदी के प्रचार और प्रसार से भी जुड़ा था।


भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में

एक ऐसी संपर्क भाषा की आवश्यकता को

उन्होंने अनुभव किया,

जो विभिन्न प्रदेशों के लोगों को

आपस में जोड़ सके।


इसी भावना से

सन् 1918 में मद्रास में

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा

की स्थापना उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से हुई।


दक्षिण भारत में हिंदी सीखने और

हिंदी प्रचार के लिए इस संस्था ने

लंबे समय तक महत्वपूर्ण कार्य किया।


गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों में

हिंदी-प्रचार भी प्रमुख रहा।


उनकी कल्पना में

भाषा केवल भाषा नहीं थी—

वह जन-जन को जोड़ने का माध्यम थी।


एक संपर्क भाषा,

राष्ट्र की एकता की भावना,

और भारत की अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान—

इन सबको साथ लेकर चलना

उनकी दूरदर्शी सोच का हिस्सा था।


आज भी उनके हिंदी संबंधी विचारों पर

विचार करना प्रासंगिक है।


धन्य मोहनदास करमचंद गांधी जी!


धन्य महात्मा गांधी जी!

प्रार्थना

 प्रार्थना।


प्रार्थना ही शेष है


मैं नहीं जानता

प्यार करना और पाना,

पर मैं करता हूँ

प्रार्थना।


मैंने निभाया

अपना कर्तव्य,

पर मन में एक टीस है—

पत्नी की देखभाल में

शायद उतना ध्यान न दे सका,

जितना देना चाहिए था।


न जाने उस समय

मेरी तबीयत भी ठीक नहीं थी,

पर यह दुःख

मेरे अंतर्मन में

शायद अंत तक रहेगा।


अब भी मैं

किनारे पर खड़े

एक वृक्ष की तरह हूँ—

बहुत कुछ देखता हूँ,

बहुत कुछ सोचता हूँ,

पर कर सकता हूँ

बहुत थोड़ा ही।


अब मेरे पास

एक ही सहारा है—


भगवान से प्रार्थना।


हे भगवान!

सबको स्वस्थ रखो,

सबको आनंद से जीने दो।


सबको

उच्च पद दो,

धन दो,

सुख दो,

शांति दो।


जिन्हें मैं प्यार करता हूँ,

उनके जीवन में

कभी अभाव न हो।


मेरी भूलों को

क्षमा करना।


मैंने जो नहीं कर सका,

उसे लेकर

अब पछतावे में नहीं,

तुम्हारी शरण में

जीना चाहता हूँ।


मेरे लिए अब

प्रार्थना ही प्रेम है,

प्रार्थना ही सेवा है,

प्रार्थना ही जीवन है।


भगवान से यही प्रार्थना—

सब सुखी रहें,

सब स्वस्थ रहें,

सब आनंद से रहें।

Friday, October 2, 2026

भीतर ख़ालीपन

 [02/10, 5:53 pm] sanantha.50@gmail.com: भीतर का खालीपन।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु।

3-10-26.

++++++++

भीतर का खालीपन,

 अल्पसंख्यकों का अधिकार।

 आरक्षण नीति।

  मंदिरों में वी.ऐ .पी दर्शन।

 शिक्षा निजी स्कूलों में 

 धन के आधार पर।

 सरकार स्कूल में 

 पानी नहीं, शौचालय नहीं प्रयोगशाला नहीं।

 अच्छी चिकित्सा प्लैनेट  अस्पतालों में।

 सरकारी अस्पतालों में 

 न दवा, न  एम.आर.ऐ.स्केन।

चुनाव में गरीबों का उद्धार।

 गरीबों की बस्ती में पानी नहीं,

सड़क नहीं, गंदे पानी बहने का नारा नहीं,

 कच्ची छोटे मोटे गड्ढे दार  सडकेँ।

पुलिस फुटपाथ  व्यापारियों से डरा धमकाकर रिश्वत।

 बाहर वाग्वीर

 भीतर खालीपन।

 नदी तो देवियां हैं,

 पर गंदगी करना खालीपन भक्ति का।

[02/10, 5:53 pm] sanantha.50@gmail.com: भीतर का खालीपन


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

3-10-2026


भीतर का खालीपन—

बाहर अधिकारों की बातें,

अल्पसंख्यकों के अधिकार,

आरक्षण की नीतियाँ,

समानता के नारे।


मंदिरों में भी

वी.आई.पी. दर्शन—

धनवानों के लिए शीघ्र दर्शन,

साधारण भक्त

लंबी कतार में भगवान की प्रतीक्षा।


निजी विद्यालयों में

धन के आधार पर शिक्षा,

सरकारी विद्यालयों में

कहीं पानी नहीं,

कहीं शौचालय नहीं,

कहीं प्रयोगशाला नहीं।


बड़े अस्पतालों में

अच्छी चिकित्सा की सुविधा,

गरीब के सरकारी अस्पताल में

दवा का अभाव,

जाँच की सुविधा का अभाव—

फिर भी स्वास्थ्य सबका अधिकार!


चुनाव आते ही

गरीबों के उद्धार के वादे,

गरीब बस्तियों में

आज भी पानी की कमी,

पक्की सड़क का अभाव,

गंदे पानी की निकासी नहीं,

गड्ढों से भरी राहें।


फुटपाथ पर

छोटा-सा व्यापार करने वाला गरीब—

कभी डराया जाता है,

कभी धमकाया जाता है,

कभी रिश्वत के बोझ तले दबाया जाता है।


बाहर वाग्वीर—

भीतर खालीपन!


नदियों को

हम देवियाँ कहते हैं,

उन्हें पवित्र मानकर

आरती उतारते हैं;

फिर उन्हीं नदियों में

गंदगी बहाते हैं।


यह कैसी भक्ति?

यह कैसा धर्म?

यह कैसी संस्कृति?


मंदिर में दीप जलाने से पहले

मन में दीप जलाना होगा।

नदी को देवी कहने से पहले

उसकी निर्मलता बचानी होगी।


अधिकार केवल भाषण में नहीं,

शिक्षा केवल धनवानों के लिए नहीं,

चिकित्सा केवल संपन्नों के लिए नहीं,

विकास केवल घोषणाओं में नहीं।


जब तक

बाहर शब्दों की सजावट

और भीतर संवेदना का अभाव है—

तब तक

समाज कितना भी आगे बढ़े,

मनुष्य भीतर से खाली ही रहेगा।


सच्चा विकास वही,

जहाँ बाहर व्यवस्था सुंदर हो

और भीतर इंसानियत जीवित हो।


बाहर नहीं—

पहले भीतर का खालीपन भरें।

महात्मा मोहनदास करमचंद गांधीजी।

 

धन्य महात्मा गांधी

राष्ट्रपिता महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी जी—
यही है उनका व्यक्तिवाचक नाम।

उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को
जन-जन का आंदोलन बना दिया।
नरम दल के प्रमुख नेताओं में
उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

सत्य और अहिंसा,
सत्याग्रह और उपवास—

यही उनके प्रमुख अस्त्र-शस्त्र थे।

उनकी प्रेरणा से
स्वतंत्रता संग्राम को
एक नई दिशा और
जनसामान्य की व्यापक भागीदारी मिली।

धन्य हैं महात्मा गांधी!

उनकी दूरदर्शिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष
हिंदी के प्रचार और प्रसार से भी जुड़ा था।

भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में
एक ऐसी संपर्क भाषा की आवश्यकता को
उन्होंने अनुभव किया,
जो विभिन्न प्रदेशों के लोगों को
आपस में जोड़ सके।

इसी भावना से
सन् 1918 में मद्रास में
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा

की स्थापना उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से हुई।

दक्षिण भारत में हिंदी सीखने और
हिंदी प्रचार के लिए इस संस्था ने
लंबे समय तक महत्वपूर्ण कार्य किया।

गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों में
हिंदी-प्रचार भी प्रमुख रहा।

उनकी कल्पना में
भाषा केवल भाषा नहीं थी—
वह जन-जन को जोड़ने का माध्यम थी।

एक संपर्क भाषा,
राष्ट्र की एकता की भावना,
और भारत की अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान—

इन सबको साथ लेकर चलना
उनकी दूरदर्शी सोच का हिस्सा था।

आज भी उनके हिंदी संबंधी विचारों पर
विचार करना प्रासंगिक है।

धन्य मोहनदास करमचंद गांधी जी!

धन्य महात्मा गांधी जी!

स्वर्गीय प्रधान मंत्री लालबहादुर शास्त्री

 [02/10, 8:13 am] sanantha.50@gmail.com: शास्त्री जी,

 लालबहादुर,

 जय जवान जय किसान का नारा।

 दोनों ही एक राष्ट्र के लिए प्रधान।

धन न तो जी सकते हैं।

 धान न तो जीना दुश्वार।

देश के इतिहास में 

 भारत ही ऐसे देश हैं,

 जिन पर मंगोल, मुगल, डच,पोर्चकीस, चीन,फ्राँस, अंग्रेज़, न जाने आक्रमण करते रहे, शासक भी बने।

 ऐसी स्थिति में  सैनिक बल और उनके चैन और निश्चिंत पहरा।

एक सुरक्षा और दूसरा

 हर जीव की प्राकृतिक माँग।

 जय जवान जय किसान।

कितनी दूरदर्शी नेता।

 धन्य है लाल बहादुर शास्त्री।

[02/10, 8:16 am] sanantha.50@gmail.com: जय जवान, जय किसान


लालबहादुर शास्त्री जी—

भारत के इतिहास में

एक सरल, सादगीपूर्ण

और दूरदर्शी नेता।


उनका दिया नारा—

“जय जवान, जय किसान”

केवल दो शब्द नहीं,

राष्ट्र-जीवन के

दो मजबूत स्तंभ हैं।


जवान देश की सीमा पर

जागकर पहरा देता है,

तभी देश का नागरिक

चैन और निश्चिंतता से सोता है।


किसान धरती पर पसीना बहाकर

अन्न उपजाता है,

तभी हर जीव की

प्राकृतिक आवश्यकता—

भोजन—पूरी होती है।


धन आवश्यक है,

पर धन से जीवन नहीं चलता;

अन्न के बिना

जीना ही दुश्वार है।


भारत के इतिहास में

न जाने कितने आक्रमण हुए—

मंगोल, मुगल, पुर्तगाली, डच,

फ्रांसीसी और अंग्रेज़ आए;

पड़ोसी देशों से भी

संघर्ष होते रहे।


ऐसी परिस्थितियों में

देश की सीमाओं की सुरक्षा

और देशवासियों के लिए अन्न—

दोनों समान रूप से प्रधान हैं।


एक देता है सुरक्षा,

दूसरा देता है जीवन।


इसी सत्य को पहचानकर

लालबहादुर शास्त्री जी ने कहा—


**जय जवान!


जय किसान!**


कितनी सरल वाणी,

कितनी गहरी सोच,

कितनी दूरदर्शिता!


धन्य हैं लालबहादुर शास्त्री जी।

धन्य है उनका राष्ट्र-चिंतन।

Thursday, October 1, 2026

पितृपक्ष

 

पितृपक्ष — कृतज्ञता का पर्व

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु
2-10-2026

पितृपक्ष आया,
पितरों को याद कराया,
जिनके कारण
हमने यह जीवन पाया।

माँ-बाप ने पाला,
पूर्वजों ने सँवारा,
उनके त्याग और संस्कारों ने
जीवन को उजियारा।

श्राद्ध हो या तर्पण,
पिंडदान हो या प्रार्थना,
रूप भले अलग-अलग हों,
भाव एक—
पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता।

हिंदू पितृपक्ष मनाते हैं,
बौद्ध पूर्वजों को याद करते हैं,
ईसाई मृत आत्माओं के लिए
प्रार्थना करते हैं।

मुस्लिम दुआ करते हैं,
सदक़ा और नेक कर्म करते हैं,
सिख गुरु-वाणी और सेवा से
ईश्वर को स्मरण करते हैं।

धर्मों की राहें अलग सही,
मानव हृदय तो एक है;
पूर्वजों के प्रति श्रद्धा
मानवता का नेक संदेश है।

जिसने हमें जन्म दिया,
जिसने हमें ज्ञान दिया,
जिसने अपना सुख त्यागकर
हमारा जीवन सँवार दिया—

उसे भूलकर
हम कैसे सुखी रहें?

पितृपक्ष केवल
एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,
यह अपनी जड़ों को याद करने का
एक पवित्र अवसर है।

आज हम पूर्वजों को याद करें,
कल हमारी संतान
हमें याद करेगी।

जीवन क्षणभंगुर है,
पर संस्कार अमर होते हैं।
मनुष्य चला जाता है,
उसके उपकार रह जाते हैं।

पितरों को नमन,
माता-पिता को नमन,
समस्त पूर्वजों को नमन।

कृतज्ञता ही सच्चा श्राद्ध,
सद्कर्म ही सच्चा तर्पण,
और मानव-सेवा ही
सबसे सुंदर श्रद्धांजलि।

मोहनदास करमचंद गांधी

 गाँधी जयंती।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

2-10-26.

 गाँधी तो आज जातिवाचक है।

 वह व्यापार विशेष है

 जैसे वैश्य/चेट्टियार।

 यहाँ मोहनदास करमचंद गांधी जी,

 जिनका जन्म 2अक्तूबर 1869ई. में गुजरात के पोरबंदर में हुआ।

उन्होंने पहले दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह 

आरंभ किया।

 उसकी प्रेरणा दी

 तमिलनाडु की एक महिला तिल्लैयाडी वळ्ळियम्मै।

गाँधीजी महात्मा की दूरदर्शिता के कारण 

 चेन्नई में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना।

 हिंदी प्रचार में उनकी लगन।

 हिंदी विरोधी कहनेवाले 

 ईवेरामशामी के यहांँ

 हिंदी का प्रचार।

1965से  हिंदी विरोध।

 बाद में बनी सरकार हिंदी के विरुद्ध प्रचार।

 स्कूलों में हिंदी नहीं।

 अगर महात्मा गांधी स्थापित  हिंदी प्रचार नहीं है तो तमिलनाडु में हिंदी सीखने की व्यवस्था नहीं।

धन्य मोहनदास करमचंद गांधी जिनके कारण हिंदी का प्रचार 

 आज भी तमिल नाडु में।

  हिंदू मुस्लिम इसाई धार्मिक एकता केलिए 

 रघुपति राघव राजा राम धार्मिक गीत को

 राष्ट्रीय एकता के गीत में बदला।

मूल रूप ः---

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम।

सुंदर विग्रह मेघश्याम, गंगा तुलसी शालग्राम।

भद्रगिरीश्वर सीताराम, भगत-जनप्रिय सीताराम।

जानकीरमणा सीताराम, जयजय राघव सीताराम।

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम।

इसको स्वतंत्रता संग्राम में मजहबी एकता के लिए यों ही बदल दिया 

रघुपति राघव राजा राम 

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान।।

 राष्ट्र की एकता के लिए एक राष्ट्र भाषा हिंदी का प्रचार।

नारा था--

एक राष्ट्र भाषा हिंदी हो एक हृदय हो भारत जननी।

 विश्व वंद्य नेता   

इसलिए बने

 स्वतंत्रता संग्रामके अस्त्र-शस्त्र 

सत्याग्रह ।

 अहिंसात्मक क्रांति 

 विदेशी कपड़ों का बहिष्कार।।

स्वदेशी अपनाओ 

 खाली कपड़ों का प्रचार।

धन्य मोहनदास करमचंद गांधी,

जिन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलायी।

जय भारत।

जय महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी।

उनका मार्ग अनुकरणीय और चिर स्मरणीय है।

इन्सानियत

 इंसानियत की पुकार


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

1-10-26


++++++++++


इंसान और जानवर में

कोई विशेष फर्क नहीं,

फर्क है तो केवल

इंसानियत का।


सत्य-असत्य,

न्याय-अन्याय,

भला-बुरा,

उपकार-अपकार,

कृतज्ञता-कृतघ्नता—

इन सबका ज्ञान

मनुष्य को है।


फिर भी ईर्ष्या के वश,

लोभ के वश,

काम के वश,

अहंकार के वश,

मनुष्य अपनी मनुष्यता

भूल बैठता है।


जब मन पर

पशुत्व का आवरण छा जाता है,

तब भीतर की इंसानियत को

जगाने के लिए

पुकार करनी पड़ती है।


भलाई का साहस रखें,

दान-धर्म अपनाएँ,

अहिंसा का पालन करें,

तटस्थ और न्यायपूर्ण रहें,

परोपकार करें।


दीन-दुखियों की सेवा करें,

रोगियों और वृद्धों की देखभाल करें,

गरीब बच्चों की शिक्षा में

सहयोग दें,

अनाथ बच्चों का

लालन-पालन करें।


समाज की कुरीतियों को दूर करें,

स्वच्छता का ध्यान रखें,

भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के विरुद्ध

जागरूकता फैलाएँ।


इन सब सद्कार्यों को

अपने जीवन में अपनाने की

जो पुकार है,

वही है—


इंसानियत की पुकार।


मनुष्य जन्म केवल

अपने लिए जीने के लिए नहीं,

बल्कि दूसरों के जीवन में

सुख, सहारा और आशा भरने के लिए है।


“परोपकारार्थमिदं शरीरम्।”

अर्थात्—

यह शरीर परोपकार के लिए है।


आइए,

मनुष्य होने के साथ-साथ

सच्चे अर्थों में

इंसान भी बनें।

Wednesday, September 30, 2026

गीता रहस्य

 

आज की चुनौती

गीता का सूक्ष्म रहस्य

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु
30-9-26

कर्तव्य-कर्म
मनसा, वाचा, कर्मणा
ईमानदारी से करते रहो,
परिणाम की चिंता छोड़ दो—
परिणाम भगवान की जिम्मेदारी।

हर्ष हो या उल्लास,
सुख हो या दुःख,
यश मिले या अपयश—
सब उसी की कृपा,
सब उसी की लीला!

पर मन में प्रश्न उठता है—
भ्रष्टाचारी भोग-विलास में,
रिश्वतखोर ऐश्वर्य में,
अन्यायी अधिकार में;
और सत्यवान
दुःख क्यों सहता है?

भक्त त्याग और तपस्या में,
रैदास भी सादगी और गरीबी में;
प्रह्लाद को यातनाएँ मिलीं,
हिरण्यकश्यप को सत्ता और अधिकार।

फिर समझ में कैसे आए
गीता का यह सूक्ष्म रहस्य?

जब अत्याचार बढ़ता है,
अन्याय सीमा पार करता है,
तब धर्म की रक्षा के लिए
भगवान के अवतार की बात कही जाती है—
पर वह घड़ी कब आएगी?

राजा राजमहल में,
ज्ञानी अपने आश्रम में;
कोई धन-संपत्ति के बीच,
कोई साधनहीन जीवन में।

आसाराम जैसे लोगों के पास
अपार संपत्ति दिखाई देती है,
और सच्चे साधु-संत
कभी-कभी आश्रयहीन,
भूखे-प्यासे जीवन बिताते दिखाई देते हैं।

तो क्या यही कर्म का फल है?
क्या यही ईश्वर का न्याय है?
क्या यही गीता का रहस्य है?

शायद गीता हमें यह सिखाती है—
कर्म हमारा अधिकार है,
फल हमारा अधिकार नहीं।

इसलिए
साधारण मनुष्य हो या मंत्री,
अधिकारी हो या राजा—
अपने-अपने कर्तव्य को
ईमानदारी से निभाना ही धर्म है।

भोग मिले तो अहंकार नहीं,
दुःख मिले तो निराशा नहीं;
धन मिले तो दुरुपयोग नहीं,
गरीबी आए तो सत्य का त्याग नहीं।

कर्म करते रहो,
धर्म के मार्ग पर चलते रहो,
फल को प्रभु पर छोड़ दो।

शायद इसी समर्पण में
गीता के सूक्ष्म रहस्य की
एक झलक मिलती है।

प्रश्न फिर भी शेष है—
मनुष्य कर्म करता है,
पर उसके कर्मों का अंतिम न्याय
कौन और कब करता है?

भगवान ही जानें!

आशा

 आशा की किरण

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 

30-9-26

+++++++++

आशा  न तो

मानव जीवन ही नहीं,

 वनस्पति जीवन भी

 जीना दुश्वार है।

 चातक पक्षी  आशा से जीता है, स्वाती नक्षत्र की वर्षा  की प्रतीक्षा में।

भूमि में बोये बीज ,

 पनपने की आशा में।

 मानव अंकुर फूटने की आशा में।

पतझड़ के पेड़ भी

 वसंत के आगमन की आशा में।

  बच्चों को पढ़ाते हैं,

 नौकरी की आशा से।

हर काम आशा के बल पर।

 आशा की किरण न तो

 आत्महत्या ही मार्ग।

सुशासन की आशा पर 

 मतदाता मत देता है।

सेना की आशा न तो

 पुलिस की आशा न तो

 चैन से जीना मुश्किल।

मानव मेहनत करता है,

वेतन की आशा पर।

रोगी इलाज कराता है

 डाक्टर और दवा के आधार पर।।

पंचतत्व की तटस्थता

 जीवन जीने की आशा।

 आज की चुनौती


आशा की किरण


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

30-9-26


+++++++++


आशा के बिना

न केवल मानव जीवन,

बल्कि वनस्पति जीवन भी

जीना दुश्वार है।


चातक पक्षी

स्वाती नक्षत्र की वर्षा की

प्रतीक्षा में जीता है—

आशा के सहारे।


भूमि में बोया गया बीज

अंकुर फूटने की आशा में

मिट्टी के भीतर

अपना अस्तित्व सँभालता है।


पतझड़ के पेड़ भी

वसंत के आगमन की

आशा में

सूनी डालियों को थामे रहते हैं।


माता-पिता बच्चों को पढ़ाते हैं,

भविष्य में

अच्छी नौकरी की आशा से।


मानव जीवन का

हर प्रयास

किसी न किसी आशा से जुड़ा है।


निराशा कितनी भी गहरी हो,

आशा की एक किरण

अंधकार को चीर सकती है।

इसलिए निराश होकर

जीवन समाप्त करना

कभी समाधान नहीं।


सुशासन की आशा में

मतदाता अपने मत का प्रयोग करता है।


सेना और पुलिस की सुरक्षा की आशा में

जनता

शांतिपूर्ण जीवन जीती है।


मानव मेहनत करता है

अपने श्रम के उचित फल

और वेतन की आशा पर।


रोगी उपचार कराता है

डॉक्टर, दवा और

स्वस्थ होने की आशा पर।


पंचतत्व की तटस्थता में भी

जीवन निरंतर चलता है।

प्रकृति अपना कर्म करती है,

मानव अपना प्रयास करता है।


जब तक साँस है,

तब तक आशा है।

और जब तक आशा है,

तब तक जीवन है।


अंधकार कितना भी गहरा हो,

एक छोटी-सी आशा की किरण

जीवन में

नया प्रभात ला सकती है।

Tuesday, September 29, 2026

यादें

 

संस्मरण

उसकी याद में जीवन

मेरी शादी 1975 में हुई—बिना धूमधाम, बिना बाह्य आडंबर के। न छायाचित्र, न दिखावा। था तो केवल प्रेम—भाई-बहन जैसा अपनापन और फिर जीवनसाथी का गहरा स्नेह।

1950 में मेरे जन्म के समय ही मेरे मामा ने मेरी माँ से कहा था—“मेरी बेटी हुई तो उसका विवाह तुम्हारे बेटे से करूँगा।” उसी वर्ष गोमती का जन्म हुआ और हमारा रिश्ता जैसे जन्म से पहले ही तय हो गया।

मई 1975 से जून 2026 तक—इक्यावन वर्षों का साथ।

इन वर्षों में कमाना मेरा काम रहा और घर-गृहस्थी उसने सँभाली। मैं उस जमाने का पुरुष था; घर के कामों से लगभग अनजान। एक लोटा तक अपनी जगह से सरकाने की जरूरत मुझे नहीं पड़ती थी। वह मेरी हर आवश्यकता बिना कहे समझ लेती—समय पर भोजन, स्वादिष्ट पकवान, दवाइयाँ, पानी और न जाने कितनी छोटी-बड़ी बातें।

उसकी वाणी में मैंने कभी क्रोध नहीं देखा, चेहरे पर शिकायत नहीं। मेरी तीन बार ऐसी स्थिति आई जब जीवन और मृत्यु के बीच खड़ा था। हर बार वह मेरे साथ चट्टान की तरह खड़ी रही। मुझे वह सत्यवान के लिए सावित्री जैसी लगती थी।

लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अपनी एक बड़ी भूल साफ दिखाई देती है।

मैंने उसकी सेवा को अपना अधिकार समझ लिया और उसके श्रम को उसका कर्तव्य।
उसने कभी हिसाब नहीं माँगा, इसलिए मैंने भी हिसाब नहीं रखा। उसने बिना कहे मेरी जरूरतें पूरी कीं, इसलिए मैं उसकी जरूरतों को समझने में पीछे रह गया।

मैं कमाता रहा और समझता रहा कि अपना दायित्व निभा रहा हूँ। पर घर को घर बनाए रखने में उसके दिन-रात के श्रम, धैर्य और प्रेम का मूल्य मैंने समय रहते नहीं पहचाना।

आज मन में यही कसक है—
जिस स्त्री ने मेरी हर जरूरत बिना माँगे समझी, उसकी जरूरतों को समझने में मैं कितना पीछे रह गया!

उसके अंतिम दिन

जीवन के अंतिम दौर में जब बीमारी ने उसे घेर लिया, तब वर्षों से मुझे सँभालने वाली वही स्त्री स्वयं सहारे की आवश्यकता में थी। उसके शरीर की शक्ति कम होती गई, लेकिन मेरे प्रति उसकी चिंता कम नहीं हुई।

अंतिम दिनों में भी उसकी चिंता अपने लिए कम, मेरी अधिक थी। वह मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। जैसे जीवन भर मेरी जिम्मेदारी उठाती रही, वैसे ही अंत तक मेरे बारे में सोचती रही।

उन दिनों उसके पास बैठना, उसे देखना और उसकी पुरानी सेवा को याद करना मेरे लिए एक मौन आत्मपरीक्षण था। मन बार-बार कहता था—काश, उसके रहते मैं उसकी सेवा का उतना ही अर्थ समझ पाता, जितना आज उसकी अनुपस्थिति में समझ रहा हूँ।

जून 2026 में वह मुझे छोड़कर चली गई।

उसके जाने के बाद घर वही है, सामान वही है, दिन-रात वही हैं—पर जीवन की सहजता चली गई।

आज मैं अकेला हूँ।

सुबह उठकर कॉफी माँगनी पड़ती है। गोलियाँ स्वयं लेनी पड़ती हैं। पानी की बोतल भरनी पड़ती है। नाश्ते और भोजन के लिए भी कहना पड़ता है। जिन बातों का मुझे कभी ध्यान ही नहीं रखना पड़ा, वे आज मेरे अपने दायित्व हैं।

तभी उसकी सेवा का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।

वह केवल मेरी पत्नी नहीं थी; वह मेरे जीवन की अनकही व्यवस्था थी। उसकी उपस्थिति इतनी सहज थी कि उसका महत्व शायद मैंने उसके रहते पूरी तरह जाना ही नहीं।

आज वह नहीं है, पर उसकी सेवा की स्मृतियाँ मेरे हर दिन में बसी हैं। सुबह से रात तक, छोटी-सी जरूरत से लेकर बड़े संकट तक—हर जगह उसकी याद साथ चलती है।

इक्यावन वर्ष का साथ समाप्त हुआ है,
स्मृतियों का नहीं।

गोमती,
तुम मेरे जीवन से चली गई हो,
पर मेरे जीवन को जिस प्रेम और सेवा से सँवारा,
वह मेरे भीतर हमेशा जीवित रहेगा।

तुम्हारी सेवा का ऋण
मैं चुका नहीं सकता।
केवल इतना स्वीकार कर सकता हूँ—

तुमने अपना जीवन मुझे दिया,
और मैंने बहुत देर से समझा
कि तुम्हारा होना ही
मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख था।

अब शेष जीवन—
तुम्हारी याद में।

Monday, September 28, 2026

दिया अंधेरे में

 

कुंभ साहित्य सेवा संस्थान को
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक का नमस्कार।

चित्राधारित कविता

अंधेरे में उजाला
29-9-26

अंधेरे की गहन गुफा में
टिमटिमाता एक नन्हा-सा बल्ब—
मानो रात के माथे पर
उम्मीद का पहला तारा।
थॉमस एडिसन का आविष्कार,
मशाल हो, दीप हो या मिट्टी का दीया—
हर रूप में प्रकाश
अंधकार की दीवारें ढहा देता है।

यों ही कभी एक शब्द
गुलामी की नींद में डूबे देश के कानों में
भोर की पहली पुकार बनकर उतरता है,
सोई चेतना को झकझोरता है
और बन जाता है
ज्ञान का अमर दीप।

भूखे को अन्न मिले,
नंगे तन को वस्त्र,
बेघर को अपनी छत,
बेरोज़गार हाथों को काम,
अज्ञान में भटके मन को
ज्ञान का पथ दिखाने वाला गुरु—
ये सब उस दिव्य प्रकाश की किरणें हैं,
जो मानव-हृदय के अंधकार में
ईश्वर का संदेश लिखती हैं।

एक दीप जलता है,
तो रात का साम्राज्य सिमटने लगता है;
एक शुभ विचार जन्म लेता है,
तो जड़ समाज की धरती में
परिवर्तन के अंकुर फूटने लगते हैं।

प्रकाश केवल बल्ब की देह में नहीं,
मनुष्य के कर्मों की धड़कन में भी होना चाहिए।
करुणा से किसी की आँखों का आँसू पोंछें,
ज्ञान से किसी के जीवन में दिशा भरें,
सेवा से किसी की राह में दीप बिछाएँ।
एक दीप से दूसरा दीप जलता जाए,
तो अंधकार अपनी ही छाया में गलता जाए।
जहाँ करुणा, ज्ञान और सेवा
तीन धाराओं की तरह मिलते हैं,
वहीं मानवता का निर्मल उजास खिलता है—
वहीं आशा की भोर उतरती है,
और वहीं से
नए प्रभात का जन्म होता है।

Sunday, September 27, 2026

ज्ञान का समंदर

 [27/09, 7:32 pm] sanantha.50@gmail.com: ज्ञान का समंदर।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु।

28-9-26.

**********

ब्रह्मांड में है ज्ञान 

अति व्यापक।

 वह धरती समुंदर आकाश, पाताल,

 अति विस्तृत।।

 सोने के खान,

 हीरे के खान,

 कोयले का ज्ञान 

पेट्रोल ज्ञान,

 पानी के विविध स्वाद।

 गर्म पानी का स्रोत।

 बर्फीला ध्रुव प्रदेश।

 ग्रीष्म वासस्थल  के वातावरण,

 बादल का छा जाना, 

कुहरा, वहाँ के  पेड़, पौधे,

 मिटृटी के विविध किश्म,

 मिट्टी की उर्वरता 

 के  अनुसार

 वनस्पति का पलना,

रेगिस्तान का ज्ञान,

 नदियों के तट पर सभ्यता का विकास, पतन,

 समुद्र विभाजन,

 सूर्य, चंद्र, नक्षत्र और ग्रहों का ज्ञान।

खगोल भूगोल शास्त्र।

 भाषाओं का ज्ञान,

 भाषा विज्ञान,

  भाषाओं की तुलना,

 भाषाओं के परिवार।

  जीवित भाषाओं के ज्ञान,

 मृत भाषाओं के ज्ञान।

विज्ञान  ,जीव विज्ञान,

 रसायन, भौतिक।

आध्यात्मिक ज्ञान,

 आदि धर्म ,

 धर्म मानव धर्म 

 मनुस्मृति,

 मनोविज्ञान, 

 मानव के आकार,रंग,

गुण, बुद्धि लब्धी,

 सूक्ष्मताति सूक्ष्म कीटाणु,

  हर बात  में हजारों ज्ञान।

 मानव के अंग, 

भीतरी अवयव

 रक्त भेद, 

 हृदय में की बनावट,

फेफड़े,अंतडियाँ

नाडियां ,नसें

 रक्त संचार।

रोग निदान।

 साँस के भेद,

 रीढ की हड्डियाँ, 

  साहित्य, साहित्यकार,

काव्य महाकाव्य खंड काव्य, मुक्तक कहानी, उपन्यास, निबंध,

 रस, छंद, अलंकार,

व्याकरण ,

 विभिन्न भाषाओं के व्याकरण, लिपि, लिपियों के भेद।

 ज्ञान का समंदर में 

 उसकी गहराई, लंबाई, चौड़ाई  ,

 सोचने समझने से

 उसकी सूचियों का अंत नहीं।

 ज्ञान दिव्य शक्ति के समान, शिव के पैर सिर  देखने विष्णु ब्रह्मा हार गये,

वैसे ही ज्ञान है का समंदर ।

[27/09, 7:32 pm] sanantha.50@gmail.com: आज की चुनौती

ज्ञान का समंदर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।

28-9-26


ज्ञान का समंदर

अथाह है,

अनंत है,

असीम है।


इस ब्रह्मांड में

ज्ञान का विस्तार

धरती, समुद्र, आकाश और पाताल तक

फैला हुआ है।


सोने की खान,

हीरे की खान,

कोयले का ज्ञान,

पेट्रोलियम का ज्ञान,

जल के विविध रूप और स्वाद,

गर्म जल के प्राकृतिक स्रोत,

बर्फीले ध्रुव प्रदेश—

हर जगह ज्ञान छिपा है।


कहीं ग्रीष्म का वातावरण,

कहीं वर्षा,

कहीं बादलों का छा जाना,

कहीं कुहरा।


वहाँ के पेड़-पौधे,

मिट्टी की विभिन्न किस्में,

मिट्टी की उर्वरता के अनुसार

वनस्पतियों का विकास—

प्रकृति का प्रत्येक रूप

ज्ञान का एक नया अध्याय है।


रेगिस्तान का ज्ञान,

नदियों के किनारे

सभ्यताओं का विकास और पतन,

समुद्रों का विभाजन,

सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र और ग्रह—

इन सबका अध्ययन

खगोल और भूगोल के माध्यम से

मानव ज्ञान को विस्तृत करता है।


भाषाओं का ज्ञान,

भाषाविज्ञान,

भाषाओं की तुलना,

भाषा-परिवार,

जीवित भाषाएँ,

मृत भाषाएँ—

भाषा भी अपने भीतर

ज्ञान का विशाल संसार समेटे हुए है।


विज्ञान की कितनी शाखाएँ हैं—

जीवविज्ञान,

रसायन विज्ञान,

भौतिक विज्ञान।


आध्यात्मिक ज्ञान,

धर्म का ज्ञान,

मानव धर्म,

मनुस्मृति,

मनोविज्ञान—

मानव जीवन को समझने के

कितने ही मार्ग हैं।


मानव का आकार,

रंग, गुण और बुद्धि,

सूक्ष्म से सूक्ष्म

जीवाणु और कीटाणु—

प्रकृति की हर छोटी-बड़ी वस्तु में

हजारों प्रकार का ज्ञान छिपा है।


मानव शरीर स्वयं

ज्ञान का एक अद्भुत संसार है।


मानव के अंग,

भीतरी अवयव,

रक्त के विभिन्न प्रकार,

हृदय की बनावट,

फेफड़े,

आँतें,

नाड़ियाँ और नसें,

रक्त-संचार,

रोगों का निदान,

श्वास के विभिन्न रूप,

रीढ़ की हड्डियाँ—

शरीर का प्रत्येक अंग

एक अलग विज्ञान है।


फिर आता है

साहित्य का विशाल संसार—


साहित्यकार,

काव्य, महाकाव्य,

खंडकाव्य, मुक्तक,

कहानी, उपन्यास, निबंध।


रस, छंद और अलंकार,

व्याकरण,

विभिन्न भाषाओं के व्याकरण,

लिपियाँ और लिपियों के भेद—

ज्ञान की शाखाएँ

गिनते-गिनते भी

समाप्त नहीं होतीं।


ज्ञान के इस समंदर की

गहराई कितनी है?

लंबाई कितनी है?

चौड़ाई कितनी है?


सोचते जाइए,

समझते जाइए—

ज्ञान की सूचियाँ

समाप्त होने का नाम नहीं लेतीं।


ज्ञान एक दिव्य शक्ति के समान है।


जैसे शिव के

चरणों का अंत खोजने

ब्रह्मा ऊपर की ओर चले,

विष्णु नीचे की ओर गए,

फिर भी दोनों

उसकी सीमा नहीं पा सके—


वैसे ही

ज्ञान के समंदर की भी

न कोई अंतिम सीमा है,

न कोई अंतिम किनारा।


जितना सीखते हैं,

उतना ही पता चलता है—

अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।


ज्ञान के समंदर में

हर मनुष्य एक यात्री है;

कुछ बूंदें पाकर

स्वयं को ज्ञानी समझ लेता है।


कलाओं में चित्रकला, नाट्यकला,संगीत कला


रसोई कला, वास्तुकला कुल चौंसठ है।


पशु विज्ञान , जंगली, पालतू, खूँख्वार 

समय हर देश के अनुसार,

पाश्चात्य देशों में रात भारत में।

 समय के भेद भी अमेरिका में अनेक।


पर जो वास्तव में ज्ञानी है,

वह विनम्र होकर कहता है—


“मेरा ज्ञान जितना बढ़ता है,

मेरे अज्ञान का विस्तार

उतना ही दिखाई देता है।”


यही ज्ञान की सच्ची पहचान है—

ज्ञान का अंत नहीं,

ज्ञान की खोज का अंत नहीं।


Saturday, September 26, 2026

इंद्रधनुष

 [26/09, 4:25 am] sanantha.50@gmail.com: इंद्र धनुष।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।

 प्रकृति धन्य है,

 सूक्ष्मता है उसमें।

नील गगन की सुंदरता,

काले बादल का गर्जन

 बिजली की चमक,

 वर्षा वर्षा के बाद का इंद्रधनुष, 

 सूर्य के प्रकाश में।

मैं  ने नयाघेरा जलप्रपात में,

ऊपर से

 देखा धरती पर इंद्रधनुष।

तभी वैज्ञानिक चमत्कार का सबूत मिला,

बारीश और धूप के मिलने पर बनता हे

है इंद्रधनुष।।

जलप्रपात के बिखरते पानी धूप के पड़ने पर 

इ़ंद्रधनुष बनता है।

जब प्रकाश बूंद से बाहर निकलता है, तो 

वह टूटकर सात अलग-अलग रंगों में बँट जाता है।

बैंगनी, जामुनी, नीला,हरा पीला नारंगी लाल 

 उजाले बूंद  के सात रंग  आशा, शांति और खुशहाली का प्रतीक है।

 इ़ंद्रधनुष का दीखपडना  बुराई का अंत, अच्छाई का आरंभ।

एकता में छिपी विविधता।

 मेहंदी में लाल रंग समान।

इ़ंद्रधनुष अच्छे भाग्य,

सफलता,और आनंद का प्रतीक।

ईश्वर की अद्भुत माया।

जलप्रपात में भी पानी के बूंद में सूर्य की किरणें पड़ने पर इंद्रधनुष।

अति शोभनीय दृश्य।


इंद्रधनुष


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।


प्रकृति धन्य है,

उसकी सूक्ष्मता अद्भुत है।

नीले गगन की सुंदरता,

काले बादलों का गर्जन,

बिजली की चमक,

वर्षा की बूंदें—

और वर्षा के बाद

सूर्य के प्रकाश में

उभरता है इंद्रधनुष!


मैंने नायाग्रा जलप्रपात में

ऊपर से नीचे देखा—

धरती पर उतर आया था

एक सुंदर इंद्रधनुष।


तभी मुझे

प्रकृति के वैज्ञानिक चमत्कार का

प्रत्यक्ष अनुभव हुआ।


जब जल की सूक्ष्म बूँदों पर

सूर्य की किरणें पड़ती हैं,

तो प्रकाश का अपवर्तन और परावर्तन होता है;

और प्रकाश

सात रंगों में बँटकर

आकाश में इंद्रधनुष बनाता है।


बैंगनी, जामुनी, नीला,

हरा, पीला, नारंगी और लाल—

सात रंग,

एक ही इंद्रधनुष!


एकता में छिपी विविधता का

यह सुंदर संदेश है।


जलप्रपात से

बिखरती हुई जल-बूंदों पर

सूर्य की किरणें पड़ती हैं,

तो वहीं बन जाता है

प्रकृति का रंगीन चमत्कार—

इंद्रधनुष!


इंद्रधनुष

आशा, शांति और खुशहाली का

प्रतीक माना जाता है।

अँधेरे और वर्षा के बाद

उसका दिखाई देना

मानो संदेश देता है—


बुराई का अंत हो,

अच्छाई का आरंभ हो;

निराशा के बाद आशा हो,

और जीवन में फिर से

खुशियों के रंग भर जाएँ।


सात रंग,

सात रूप,

पर सौंदर्य एक!


ईश्वर की अद्भुत माया,

प्रकृति की अनुपम कारीगरी—

जल की छोटी-सी बूँद में

सूर्य की किरणों का मिलन

बना देता है

आकाश का सुंदर चित्र।


नायाग्रा जलप्रपात में

देखा वह इंद्रधनुष

आज भी मेरी आँखों में बसा है।


अति शोभनीय दृश्य!

प्रकृति का अद्भुत संदेश—

विविध रंगों में भी

एकता और सौंदर्य।

Friday, September 25, 2026

भाषा का विकास

 एक भाषा जब अपनी   परंपरागत शैली से नई

शैली  अपनाता है,तभी विकास होती है।

तुलसी सूर कबीर मीरा रहीम की शैली अब नहीं।

भाषा परिवर्तन शील है।

  कर का भूतकाल रूप 

किया,किए की कीं।

 अब करा,करी का प्रयोग चलता है।

लिया लिए ली लीं  नहीं बदला।  लेया, लेयी का प्रयोग 

पी पिया  पिये पियी 

देया/देयी का प्रयोग नहीं।

 पिओ  पी इये का प्रयोग नहीं ।

दे ओ, देइए का प्रयोग नहीं।

 ऐसे परिवर्तन भी कालांतर में होगा जिससे 

विशेष अपवाद की कठिनाई से बच सकते है।

वैसे ही ने नियम।   

ने नियम के न होने पर हिंदी और भी आसान।

  सोचिए।

स्वचिं तक - अनंत कृष्णन, चेन्नै।

Thursday, September 24, 2026

बेटियाँ

 

बेटियाँ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

भारतीय इतिहास में
बेटियाँ और नारियाँ
पूजनीय रही हैं।

फिर भी इतिहास के पन्नों में
कुछ कड़वी सच्चाइयाँ भी हैं—

सती-प्रथा,
जौहर-व्रत,
बाल-विवाह,
विधवा को अपशकुन मानना,
गर्भ में शिशु लड़की हो
तो उसे मार देना,
दहेज-प्रथा—

इन कुप्रथाओं ने
नारी जीवन को
कितना पीड़ित किया!

बाल-विवाह और
अनमेल विवाह की पीड़ा
कितनी बेटियों ने सही।

धन्य हैं
समाज-सुधारक
राजा राममोहन राय जैसे महापुरुष,
जिन्होंने कुप्रथाओं के विरुद्ध
आवाज़ उठाई।

कितनी बहुएँ
दहेज के कारण
जिंदा जला दी गईं!

इतिहास में
ऐसे अनेक प्रसंग हैं
जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं।

रामायण में भी
सीता जैसी पतिव्रता पत्नी को
वन में छोड़ने का प्रसंग
आज भी अनेक प्रश्न खड़े करता है।

ये हैं
भारतीय समाज में
बेटियों और नारियों के
कुछ शंकालु और पीड़ादायक पक्ष।

पर कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

आज की नारी के
सकारात्मक पक्ष भी हैं—
शिक्षा, आत्मनिर्भरता,
साहस, अधिकार और सम्मान।

आज की बेटियाँ
ज्ञान के आकाश में उड़ रही हैं,
विज्ञान, खेल, कला, प्रशासन
और अंतरिक्ष तक
अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं।
वे चुनौतियों को अवसर बनाकर
अपने सपनों को साकार कर रही हैं
और समाज को नई दिशा दे रही हैं।

यह परिवर्तन
नारी की असीम शक्ति,
दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास की
प्रेरक कहानी है।

अगले भाग में
हम उन साहसी और सफल नारियों की
उपलब्धियों से परिचित होंगे,
जिन्होंने अपने संघर्षों से
नई राह बनाई और
अनगिनत बेटियों के लिए
आशा का दीप जलाया।

बेटियाँ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

आधुनिक युग में बेटियाँ
शिक्षित हैं,
अपने पैरों पर खड़ी हैं।

स्नातक, स्नातकोत्तर होकर
डॉक्टर, इंजीनियर,
शिक्षिका, प्राध्यापिका,
पायलट और
उच्च पदों पर आसीन होकर
अपने दायित्वों को
सुचारु रूप से निभा रही हैं।

मायके और ससुराल—
दोनों परिवारों की
आमदनी और उन्नति का
महत्त्वपूर्ण आधार बन रही हैं।

पति के बराबर शिक्षा,
पति के बराबर योग्यता,
पति के बराबर आत्मविश्वास—
आज की बेटी
भयभीत होकर जीना नहीं चाहती।

फिर भी
भारतीय संस्कृति के संस्कारों से
पति-परायणता,
ससुराल की सेवा
और परिवार के प्रति समर्पण
आज भी उसके जीवन का
महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन प्रश्न अभी भी है—
क्या बेटी सचमुच सुरक्षित है?

छह वर्ष की बच्ची से लेकर
साठ वर्ष की वृद्धा तक,
महिलाओं के विरुद्ध होने वाले
यौन अपराधों की खबरें
समाज की अंतरात्मा को
झकझोर देती हैं।

युग बदल गया,
शिक्षा बढ़ गई,
तकनीक बढ़ गई,
लेकिन नारी की सुरक्षा का प्रश्न
अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

आज विवाह के साथ
‘तलाक’ और ‘डिवोर्स’ जैसे शब्द भी
सामाजिक चर्चा का हिस्सा बन गए हैं।
कहीं विवाह का बंधन कमजोर पड़ता है,
कहीं पति-पत्नी के संबंधों में
तनाव बढ़ता है।

कभी वृद्ध कन्याओं की चिंता थी,
आज अनेक पुरुष और महिलाएँ
विवाह के बिना भी
अपना जीवन जी रहे हैं।

कहीं परिवार में
नारी का प्रभाव बढ़ा है,
तो कहीं पुरुष स्वयं को
पत्नी के निर्णयों पर निर्भर पाता है।

पर प्रश्न यह नहीं कि
कौन किसके अधीन है।

सच्चा प्रश्न यह है—
क्या पति-पत्नी एक-दूसरे के
सहयोगी हैं?

बेटियाँ आज चतुर हैं,
शिक्षित हैं,
जागरूक हैं,
आत्मनिर्भर हैं।

फिर भी
भारतीय संस्कृति के
आचार-विचार और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच
कई बेटियाँ
आज भी मानसिक दबाव और
असमानता का सामना करती हैं।

इस स्थिति को बदलने के प्रयास
साहित्य, समाज, शिक्षा और
चित्रपट—हर क्षेत्र में दिखाई देते हैं।

आज माता-पिता भी
बेटियों को बोझ नहीं,
परिवार की शक्ति मानने लगे हैं।

बेटी पढ़ती है—
तो परिवार आगे बढ़ता है।
बेटी आत्मनिर्भर होती है—
तो परिवार मजबूत होता है।
बेटी सुरक्षित रहती है—
तो समाज सुरक्षित होता है।

सुंदर निष्कर्ष

बेटी केवल किसी की बेटी नहीं,
वह किसी की बहन है,
किसी की पत्नी है,
किसी की माँ है—
और सबसे पहले
वह स्वयं एक स्वतंत्र मनुष्य है।

बेटी को दया नहीं,
सम्मान चाहिए।
बेटी को बंधन नहीं,
सुरक्षा चाहिए।
बेटी को केवल शिक्षा नहीं,
निर्भय होकर जीने का अधिकार चाहिए।

जिस घर में बेटी मुस्कुराती है,
वहीं सच्ची खुशहाली बसती है।
जिस समाज में बेटी सुरक्षित है,
वही समाज वास्तव में सभ्य है।

बेटी बचाना ही नहीं—
बेटी को पढ़ाना,
बेटी को सम्मान देना,
बेटी को समान अवसर देना
और बेटी को निर्भय जीवन देना—
यही आधुनिक भारत की
सच्ची पहचान होनी चाहिए।

बेटी बोझ नहीं,
बेटी भविष्य है।
बेटी परिवार की शान नहीं केवल—
बेटी राष्ट्र की पहचान है।


अर्द्ध सत्य का माया जाल

 अर्द्धसत्य का माया जाल।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

25-9-26.


सत्य में भी संपूर्ण सत्य

 अपूर्ण सत्य

 परिणाम अर्द्ध सत्य

 नीति नियम के विरुद्ध 

 बदनाम का पात्र।।

रामायण में वाली से न मिलकर, सचित न करके आगे में खड़े होकर 

 वध करना,

 पता नहीं चलता

 यह राम का कार्य

 पूर्ण न्याय या अपूर्ण न्याय।

 अर्द्ध सत्य का परिणाम।

 पुराणों में  अनेक उदाहरण।

 ईश्वर संबंधित कार्य में 

 सवाल करना,

 पाप या पुण्य पता नहीं,

 हर बात में अर्द्ध सत्य की छाया।

 आजकल के राजनैतिक 

नेता पक्की सड़कें बनाने का वादा करता हैं।

 सड़कें ठेके दार बनाते हैं।

 एक महीने में बनायी सड़कें गड्ढे टेढ़े मेढे होते हैं।

 उनका वचन अर्द्धसत्य ही होते हैं।

 असंभव को संभव बना लेने का वादा 

 अर्द्ध सत्य ही है।

मतदाता आदर्श प्रतिनिधि   चुनने के बजाय,

अपराधियों को चुनते हैं,

वोट के लिए नोट लेते हैं,

 यह दोनों तरफ़ से अर्द्ध सत्य है।

 हरिश्चन्द्र सत्य का पूर्ण रूप।

 उसको सत्यवादी साबित करने विश्वामित्र के कदम  सत्य को अर्द्ध सत्य ही नहीं,

 समाज सत्य बोलने डरते हैं।

  सत्य मेव जयते को

 अर्द्ध सत्य बनाने में 

 सरकारी कार्यालय, 

 वकील,

 साक्षी और विवाद के बल पर न्याय सुनानेवाली नीतिपति 

आडिटर सब सन्नद्ध है तो संसार अर्द्धसत्य पर चलता है।

 सरकार भी जनता भी। 

आज की चुनौती


अर्द्धसत्य का मायाजाल


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

25-9-26


सत्य में भी

संपूर्ण सत्य होता है,

अपूर्ण सत्य होता है।

अपूर्ण सत्य का परिणाम

अर्द्धसत्य बन जाता है,

और अर्द्धसत्य

नीति-नियमों के विरुद्ध जाकर

किसी को बदनामी का पात्र बना सकता है।


रामायण में

वाली से आमने-सामने युद्ध न करके,

पीछे से बाण चलाकर

राम द्वारा वाली का वध—

यह प्रसंग आज भी

मन में प्रश्न उठाता है।

क्या यह पूर्ण न्याय था

या अपूर्ण न्याय?


अर्द्धसत्य का परिणाम

कभी-कभी ऐसा ही

एक प्रश्नचिह्न बन जाता है।


पुराणों में भी

अर्द्धसत्य के अनेक प्रसंग मिलते हैं।

ईश्वर से संबंधित घटनाओं में भी

प्रश्न उठते हैं—

क्या यह पाप है?

या पुण्य?


हर बात पर

अर्द्धसत्य की छाया पड़ जाए

तो सत्य की पहचान

कठिन हो जाती है।


आजकल के राजनीतिक नेता

पक्की सड़कें बनाने का

वादा करते हैं।

सड़कें ठेकेदार बनाते हैं,

और कुछ ही समय में

गड्ढों और टेढ़े-मेढ़े रास्तों में

बदल जाती हैं।


तब उनका वचन

क्या पूर्ण सत्य था?


असंभव को संभव बना देने का

वादा करना भी

अर्द्धसत्य का एक रूप है।


मतदाता

आदर्श प्रतिनिधि चुनने के बजाय

कभी-कभी अपराधियों को चुनते हैं,

और कुछ लोग

वोट के बदले नोट लेते हैं।


यहाँ भी

दोनों ओर से

सत्य अधूरा रह जाता है।


राजा हरिश्चंद्र

सत्य के पूर्ण रूप के

एक महान उदाहरण माने जाते हैं।

उनके सत्य को परखने के लिए

विश्वामित्र ने अनेक कठिन परीक्षाएँ लीं।


सत्य बोलना सरल नहीं है।

सत्य के मार्ग पर चलने में

समाज और परिस्थितियाँ

अनेक बार मनुष्य को

डरा देती हैं।


“सत्यमेव जयते”

हमारा राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है।

लेकिन जब

सरकारी कार्यालय,

वकील,

साक्षी,

विवाद और

न्याय-प्रक्रिया में जुड़े लोग

सत्य को अपने-अपने ढंग से

प्रस्तुत करने लगते हैं,

तब पूर्ण सत्य

अर्द्धसत्य के जाल में

फँस जाता है।


यदि सत्य

अर्द्धसत्य बनता रहा,

तो संसार

अर्द्धसत्य के आधार पर ही

चलता रहेगा।


सरकार हो या जनता—

सत्य की रक्षा

हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।


अर्द्धसत्य केवल सत्य का अधूरा रूप नहीं,

बल्कि कई बार

सत्य को छिपाकर

अन्याय को उचित ठहराने का साधन बन जाता है।

यह किसी निर्दोष की प्रतिष्ठा छीन सकता है,

दोषी को बचा सकता है

और समाज के विश्वास की नींव हिला सकता है।


इसलिए हमें यह समझना होगा

कि सत्य का एक अंश बोलकर

शेष सत्य छिपा लेना भी

नैतिक छल है।

मौन, तोड़-मरोड़ और आधी जानकारी—

इन सबके पीछे छिपा अर्द्धसत्य

अंततः मनुष्य और समाज

दोनों को भीतर से खोखला कर देता है।


अर्द्धसत्य का मायाजाल

तभी टूटेगा,

जब हम सुविधा के अनुसार नहीं,

अंतरात्मा के अनुसार बोलेंगे;

जब सत्य को छिपाएँगे नहीं,

तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत नहीं करेंगे,

और उसके संपूर्ण रूप को

स्वीकार करने का साहस रखेंगे।

क्योंकि सत्य कठिन हो सकता है,

पर अर्द्धसत्य से जन्मा अन्याय

उससे कहीं अधिक विनाशकारी होता है।

सत्य की रक्षा केवल शब्दों से नहीं,

बल्कि ईमानदार आचरण से होती है—

और यही प्रत्येक मनुष्य का

सबसे बड़ा नैतिक दायित्व है।

मन

 [10:10 AM, 9/21/2020] Ananda Krishnan Sethurama: நமஸ்தே .वणक्कम। 

   अंतर्मन  यह मन  आत्मानुभूति ,

  ब्रह्मानंद ,सुखप्रद ,चैनप्रद। 

ऐसा एक  मन न होता ,तो 

मानव जीवन में सदा बेचैनी। 

लोभ यह चीज़ तुम्हारे घर में न होना ,

मेरे घर में होता ,अंतर्मन। 

बाहर मन दूसरा कहता।

ये भ्रष्टाचारी ,तुझे वोट न देता।

अंतर्मन कहता ,पर नमस्ते कह 

मत मांगते ही आपका ही मेरा वोट.

कहता बाहर मन। 

कर्जा लेकर न देने का बहाना मन में 

बाहर मन कहता तो क्या होता।

हाथ में माला ,मुँह  में राम 

अंतर्मन आसाराम ,प्रेमानंद। 

बाहर कहता तो जूते का मार। 

भूख दोस्त के यहाँ भोजन का वक्त 

अंतर्मन कहता खिलाता तो 

बाहर मन यही कहता अभी खाया है। 

रिश्वत देकर स्नातक ,

रिश्वत देकर अंक 

अंतर्मन बाहर प्रकट न करता।

विवशता  अंतर्मन में 

बाहरी मन लाचारी। 

कबीर ने  यों  ही बताया 

मनका मनका डारी दें ,

मन  का  मन  का फेर। .

बाह्याडम्बर काम का नहीं भक्ति में 

अंतरम…

[10:44 AM, 9/21/2020] Ananda Krishnan Sethurama: अब तो झूठ का बोलबाला है --


नमस्कार।  वणक्कम। 

 हम कहते हैं --अब तो झूठ का बोलबाला है। 

पर इनका समर्थन हम ही करते। 

यथा राजा तथा प्रजा। 

वादा न निभाया,अगले चुनाव वही वादा। 

वही शासन ,वही विधायक ,वही शासन 

हम ही मतदाता ,कहते हैं झूठ का बोलबाला।

मंदिर के आसपास नकली चन्दन ,नकली चंदनकी लकड़ी 

जानते हैं सब  चुप रहते क्यों ?

कहते हैं झूठ का बोलबाला है। 

जानते हैं भिखारी झूठा लंगड़ा ,फिर भी भीख देते हैं। 

कहते हैं झूठ का बोलबाला। 

सिंग्नल में  बच्चे सहित भीख ,

वह बच्चा न हिलता डुलता कटु धुप में भी 

कहते हैं झूठ का बोलबाला।

कोई भीख देता तो रोकना पाप। 

कहते हैं सर्वत्र झूठ का बोलबाला है। 

मंदिर दर्शन  जल्दी जाने कोई 

पहरेदार से पैसे देकर आगे जाता तो 

हम भी अनुकरण करते हैं ,रोकते नहीं 

कहते हैं झूठ का बोलबाला।

जल्दी काम होने पहले हम 

गलत रास्ते पर जाने सिफारिश की तलाश में 

कहते हैं झूठ का बोलबाला है। 

झूठ के पक्ष में ही हम 

फिर भी कहते हैं झूठ का बोलबाला है। 

जब मैं बच्चा था कहते झूठ पाप.

अब कहते हैं होशियार होनहार 

झूठ भाषण कला में वैज्ञानिक झूठ 

पता लगाना मुश्किल। 

कहते हैं झूठ का बोलबाला है। 

कृष्ण अश्वत्थामा जोर न लगाकर कुञ्जरः  जोर लगाता तो 

द्रोण  की मृत्यु न होती ,

हम कहते हैं 

हर कहीं झूठ का बोलबाला है. 

स्वरचित स्वचिंतक --एस। अनंत कृष्णन।


லலித் எம் தோகா 

 உள்மனம் , இந்த மனம் 

ஆன்ம உணர்வு ,பிரம்மானந்தம்,சுகம் தருபது  ,அமைதி தருபது .

இப்படி உள்மனம் என்று ஒன்று இல்லை என்றால் ,

மனித வாழ்க்கை எப்பொழுதுமே அமைதியின்றி இருக்கும்.

பேராசை இந்தப்பொருள்  உன் வீட்டில் இருக்கக்கூடாது .

என் வீட்டில் இருந்தால் --உள்  மனது .

வெளி மனம் சொல்வது வேறு.

இந்த ஊழல்வாதிக்கு நான் வாக்களிக்க மாட்டேன் .

என்று உல் மனம் சொல்லும் .

ஆனால் வணக்கம் என்று சொல்லி வாக்கு கேட்டதும் 

உங்களுக்கே என் வாக்கு வெளி மனம் சொல்லும் .

கடன் வாங்கி கொடுக்கவேண்டாம் என்ற சாக்குப்போக்கு உள்  மனதில் ,

வெளிமனம் இதை சொன்னால் என்ன ஆகும் .

கையில் மாலை ,சொல்வது ராமா .

உள்  மனதில் ஆசாராம் ,பிரேமானந்தா 

வெளியில் சொன்னால் செருப்படி .

பசி. நண்பன் வீட்டில் சாப்பாட்டு நேரம் 

உள்  மனம் சொல்லும் சாப்பாடு போட்டால் என்று 

வெளிமனம் சொல்லும் இப்பொழுதுதான் சாப்பிட்டிருக்கிறேன் .

லஞ்சம் அளித்து பட்டம் .லஞ்சம் கொடுத்து மதிப்பெண் 

உள்மனம் வெளியில் சொல்லவிடாது .

உள்  மனதில்  நிர்பந்தம் ,

வெளிமனம் அவசியமானது .

மாலை ஜெப மாலை போட்டுவிடு ,

மனம் சுற்றுவதை மாற்று .நிறுத்து .

வெளி ஆடம்பரம் பக்தியில் பயன் படாது .

உள்  மனதில் ஒரு மனா தியானமே பக்தி.

உள்  மன சோதனை யால்  குந்திக்கு களங்கம் .

கர்ணனின் பிறப்பு நிலையான களங்கம் .

உள்  மனத்தடை இல்லை என்றால் 

மனித வாழ்க்கை திண்சம்தோறும் அச்சமிக்கது .

அமைதியின்மை ,அதிருப்தி ,அவமானம் .

திருட்டை உள்மனம் தடுக்கவில்லை என்றால் 

மனித நிலை நிலையற்ற நிலை .

   அனந்தகிருஷ்ணன் மன வெளிப்பாட்டை ஹிந்தியில் எழுதி தமிழில் மொழிபெயர்ப்பு அதே 

அனந்தகிருஷ்ணன்.

கவிஞர்  லலிதா எம் தோகா  ललिता एम् ढोका  जी आप मुझ से तमिल सीखिए। 

अर्थ को अनर्थ न करना

Tuesday, September 22, 2026

राह के काँटे

 राह के काँटे

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।

विधा--अपनी हिंदी, अपने विचार, अपनी स्वतंत्र शैली।

----------------

राह /मार्ग 

सही मार्ग न तो आगे बढ़ना मुश्किल।

  अड़चनें ज्यादा है तो 

 आगे बढ़ना

 उन्नति करना 

अति मुश्किल।

 पढ़ने राह के काँटे

रूपये।

एक धंधा करने रूपये।

व्यापार की प्रगति करने

 बुद्धि चातुर्य।

भगवान के ध्यान में 

चंचल मन।

 परिवार चलाने में महँगाई।

कदम कदम पर राह के काँटें।

भूख तो राह के काँटों में बड़ा।

 नाते रिश्तेदारों के प्रेम भी

 राह के काँटे।

 अविद्या, ग़रीबी,  मधुशालाएँ

 माया देवी, रोग राह के ही काँटे।

 इन सब का सामना करके 

 आगे बढने चाहिए प्रयत्न।।

ईश्वरीय अनुग्रह।

 ज्ञान दर्पण।

 एस.अनंतकृष्णन , द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


Monday, September 21, 2026

नीति का पथ

 नीति का पथ।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-9-26

++++++++

नीति का पथ,

 तटस्थ पथ।

 उस पथ पर चलने में 

 अड़चनें हैं ज्यादा।

हिम बड़े गौरीशंकर की 

चोटी पर चढ़ने के समान साँस घुटेगा।

ठंड से   राहत नहीं।

दूसरा  मार्ग भी नहीं।

काँटों से भरे पेड़ पर के

 फल निकलने के समान।

राम भी तटस्थ न रहे,

कृष्ण भी न रहे,

मंदिर के पुजारी भी नहीं।

 भगवान तटस्थ हैं क्या?

 शासकों और धन 

के अधीन  नीति पथ।

अवकाश प्राप्त न्यायाधीश का कहना है कि

सत्य न्याय शासकों  और धन के आगे डांवाडोल।।

 70% मत मिलते हैं 

४०% मत लेने पर जीत।

अल्पसंख्यकों का शासन।

 पंच तत्व ही  नीति के पथ  पर दृढ़।

[ आज की चुनौती


नीति के पथ


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

22-9-26


++++++++++++


नीति का पथ,

तटस्थता का पथ—

उस पथ पर चलना

आसान नहीं।


अड़चनें हैं बहुत,

जैसे हिम से ढकी

गौरीशंकर की चोटी पर

चढ़ते समय

हर कदम पर साँस घुटती हो।


कड़ाके की ठंड,

राहत का कोई साधन नहीं,

और पीछे लौटने का

कोई दूसरा मार्ग भी नहीं।


काँटों से भरे वृक्ष से

फल तोड़ने जैसा

कठिन है

नीति के पथ पर चलना।


राम भी हर परिस्थिति में

तटस्थ नहीं रहे,

कृष्ण भी तटस्थ नहीं रहे,

तो फिर

मंदिर का पुजारी

कैसे तटस्थ रह पाएगा?


प्रश्न उठता है—

क्या भगवान भी तटस्थ हैं?


आज नीति का पथ

कहीं-कहीं

शासन और धन

के प्रभाव में

डगमगाता दिखाई देता है।


एक अवकाशप्राप्त न्यायाधीश का कहना है—

सत्य और न्याय भी

कभी-कभी

शासन और धन के प्रभाव के सामने

डाँवाडोल हो जाते हैं।


सत्तर प्रतिशत मत

किसी एक पक्ष को मिलें,

पर चालीस प्रतिशत मतों से

जीत हो जाए—

तो प्रश्न उठता है,

क्या यह

बहुमत का शासन है

या अल्पमत की सत्ता?


फिर भी

नीति का पथ

छोड़ना नहीं चाहिए।


पंचतत्व की तरह

जो अपने स्वभाव पर

दृढ़ रहते हैं,

वैसे ही मनुष्य को भी

सत्य, न्याय और नीति पर

दृढ़ रहना चाहिए।


नीति का पथ कठिन हो सकता है,

पर वही पथ

मनुष्य को

सच्चा मनुष्य बनाता है।

Sunday, September 20, 2026

आखिरी घड़ी

 

आज की चुनौती

आखिरी घड़ी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक
21-9-26

+++++++++++++

आखिरी घड़ी!

ईश्वर की सृष्टि में
हर वस्तु और हर जीव के लिए
एक न एक दिन
आखिरी दिन और आखिरी घड़ी
निश्चित है।

अचानक आई बाढ़ में
जीवन की आखिरी घड़ी हो सकती है।

परीक्षा-केंद्र में
तीन घंटे की परीक्षा के बाद
उत्तर-पुस्तिका जमा करने की
आखिरी घड़ी आती है।

आवेदन-पत्र भेजने की
एक आखिरी तारीख होती है,
और उस तारीख की भी
एक आखिरी घड़ी होती है।

चुनाव में
नामांकन-पत्र जमा करने की
एक निर्धारित समय-सीमा होती है—
उसकी भी आती है
आखिरी घड़ी।

आरंभ है तो
अंत भी निश्चित है;
और अंत के साथ
आती है—
आखिरी घड़ी।

जन्म से मृत्यु तक
जीवन भी इसी क्रम का नाम है—

शैशव की आखिरी घड़ी,
बचपन का आरंभ।

बचपन की आखिरी घड़ी,
लड़कपन का आरंभ।

लड़कपन की आखिरी घड़ी,
जवानी का आरंभ।

जवानी की आखिरी घड़ी,
प्रौढ़ावस्था का आरंभ।

प्रौढ़ावस्था की आखिरी घड़ी,
बुढ़ापे का आरंभ।

और बुढ़ापे के अंत में
आती है वह
आखिरी घड़ी—

जब
प्राण-पखेरू
उड़ जाते हैं।

इसलिए जीवन में
हर आरंभ को सार्थक बनाना चाहिए,
हर क्षण को मूल्यवान समझना चाहिए;
क्योंकि हमें पता नहीं—
हमारी आखिरी घड़ी
कब आ जाए!

सबसे प्यारा अपना घर

।


आज का काव्य-पाठ

सबसे प्यारा अपना घर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

अपने घर में

आज़ादी से जीना,

मनचाहा खाना-पीना,

मनचाहे समय सोना-जागना,

मनचाहे समय बाहर घूमना—

यही तो है

अपने घर की स्वतंत्रता।

माँ का प्यार,

पत्नी का दुलार,

अपनेपन का संसार—

अपने घर में

अपना राज।

प्यारे घर में

बेटे-बेटी,

बहू-दामाद

प्रेम, आदर और सत्कार दें,

हमारी माँग पूरी करें—

फिर भी कभी-कभी

अपनी इच्छा की

एक छोटी-सी पूर्ति में

उनकी थोड़ी-सी उदासीनता

हमें भारी लगती है।

लगता है—

हमारी इच्छा ही

उनके लिए बाधा बन गई।

अपने घर में

जी चाहे, जब चाहें,

जो चाहें, वह करें;

किसी से संकोच नहीं,

किसी से अनुमति नहीं।

अपने घर में

अपना नियम,

अपना अधिकार,

अपना राज।

पराए घर में

हम आश्रित होते हैं,

और वे

हमारे आश्रयदाता।

अपने घर की स्वतंत्रता

और पराए घर की मर्यादा में

यही तो अंतर है।

मातृभूमि भी

हमारा अपना घर है।

फिर वहाँ क्यों

मनमाना थूकना,

मनमाना कूड़ा फेंकना,

कतार तोड़कर आगे बढ़ना,

रिश्वत को प्राथमिकता देना?

अपराध के आरोप झेलने वाले

सांसद, विधायक और मंत्री भी

यदि चुनाव जीतकर

जनप्रतिनिधि बन जाते हैं,

तो यह प्रश्न

हमारे सामने खड़ा होता है—

क्या अपने घर में

अपने नियमों का अर्थ

मनमानी करना भी है?

नहीं!

अपने घर का राज

जिम्मेदारी का राज हो,

स्वतंत्रता के साथ

अनुशासन का राज हो,

अधिकार के साथ

कर्तव्य का राज हो।

अपना घर सबसे प्यारा,

अपनी मातृभूमि सबसे न्यारी।

घर हो या देश—

अपना राज तभी सुंदर है,

जब उसमें

सबका सम्मान,

सबकी सुरक्षा

और सबका हित हो।

अपने घर में

अपना नियम,

अपना कानून,

अपना राज।

एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा

स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

Saturday, September 19, 2026

प्रकाश का दीप

 

आज की चुनौती

प्रकाश का दीप

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
20-9-26

++++++++++++

प्रकाश का दीप
मानव जीवन का साथी है।

बिजली के आविष्कार से पहले
मशाल ही प्रकाश का साधन थी।
रात के अँधेरे में
जुगनू भी प्रकाश की छोटी-सी किरण है।

अंधे के लिए
ब्रेल लिपि ज्ञान का प्रकाश है।
अज्ञानी के लिए
ज्ञान ही प्रकाश का दीप है।

बिजली के आविष्कार के बाद
मानव ने अँधेरे को
प्रकाश से भर दिया।

पहाड़ की चोटी से नीचे देखो—
शहरों की रोशनी
तारों की चमक जैसी दिखाई देती है।

मंदिर के अँधेरे गर्भगृह में
दीपक का प्रकाश
ईश्वर-दर्शन का माध्यम बनता है।

टॉर्च में प्रकाश का दीप है,
आज मोबाइल में भी
प्रकाश का दीप जलता है।

सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ,
तो वे एशिया की ज्योति कहलाए।

पुत्र के जन्म से
कुल का दीप जलता है,
इसीलिए पुत्र को
कुलदीपक कहा जाता है।

प्रकाश के दीप में
रोशनी है,
ज्ञान के दीप में
अज्ञान का अंधकार दूर करने की शक्ति है।

सूर्य भी दीप है,
चंद्रमा भी दीप है।

प्रकाश का दीप
ईश्वर की अनुकंपा का प्रतीक है—
अनुग्रह का दीप।

नौकरी और वेतन
गृहस्थ जीवन चलाने के
आर्थिक दीप हैं।

दीपावली में
दीप-ज्योति अंधकार को दूर करती है।

आकाश में जलता
आकाशदीप
नाविकों और जहाजों को
मार्गदर्शन देता है।

हमारी आँखें भी
प्रकाश के दीप हैं।
नयन-ज्योति न हो
तो संसार अंधकारमय हो जाता है।

अतः प्रकाश केवल रोशनी नहीं,
प्रकाश ज्ञान है,
प्रकाश जीवन है,
प्रकाश आशा है,
और प्रकाश ही
ईश्वर की अनुकंपा का प्रतीक है।



प्रकाश का दीप।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

20-9-26.

+++++++++

प्रकाश का दीप,

 बिजली के आविष्कार के पहले,

 मशाला ही।

 बयां के नीड़ में जुगुनू।

 अंधे के लिए ब्रैल।

अज्ञानी के लिए ज्ञान।

बिजली के आविष्कार के बाद,

 पहाड़ से नीचे देखो,

 तारों की चमक।

 मंदिर के अंधेरे गर्भ-गृह में 

प्रकाश ही प्रकाश।

टार्च लैट में प्रकाश के दीप।

 अब मोबाइल में दीप।

 सिद्धार्थ  के ज्ञान प्राप्ति के बाद 

एशिया की ज्योति।

पुत्र के जन्म लेने पर

 कुल दीप।

 प्रकाश के दीप में 

 रोशनी।

 ज्ञान के दीप में 

 अज्ञानांधकार का दूर।

   सूर्य भी दीप। 

   चंद्र भी दीप।

 प्रकाश का दीप ही ईश्वर।

 अनुग्रह दीप।

 नौकरी और वेतन

 जीवन चलाने के दीप।

 दीपावली में दीप ज्योति।

 प्रकाश के दीप में 

 आकाश दीप 

 जहाज के मार्गदर्शन के लिए।

नयन दीप न तो अंधा।

Friday, September 18, 2026

ज्ञान का समंदर

 

आज की चुनौती

ज्ञान का पावन समंदर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

ज्ञान से रहित कोई जीव नहीं,
पर मानव का ज्ञान
सत्य-असत्य,
नश्वर-अनश्वर,
स्थायी-अस्थायी को पहचानकर
अपने जीवन को
सभ्य, सुसंस्कृत और सुरक्षित
बनाने में समर्थ है।

फिर भी यह समझना
पूरी तरह सही नहीं कि
मनुष्य सर्वज्ञानी है।

यदि मनुष्य इतना ज्ञानी है,
तो प्राकृतिक प्रकोपों का
पूरी तरह सामना करने में
असमर्थ क्यों है?

अतः ज्ञान का सागर
अत्यंत गहरा है।

ज्ञानी में भी
काम है, क्रोध है,
ईर्ष्या है, लोभ है,
अहंकार है।

वह जानता है
कि एक दिन उसे मरना है,
फिर भी जीवन भर
मोह-माया में उलझा रहता है।

स्नातक और स्नातकोत्तर बनकर
ऑडिटर, डॉक्टर बनकर
सच्ची मानव-सेवा करनी है।

वकील बनकर
न्याय के पक्ष में लड़ना है।

फिर भी समाज में
भ्रष्टाचार और रिश्वत का
बोलबाला क्यों है?

शासक हैं,
पर उनमें स्वार्थ है।

ठेकेदार हैं,
पर कहीं-कहीं कच्ची सड़कें
बनाकर भी काम पूरा मान लेते हैं।

आत्मज्ञानी भी हैं,
समाज-सुधारक भी हैं।

नायक हैं,
खलनायक हैं,
विदूषक हैं।

बलवान हैं,
निर्बल हैं।

रोगी हैं,
असाध्य रोगी भी हैं।

कोई जन्म से अमीर है,
कोई जन्म से गरीब।

मछलियों में
विविध प्रकार हैं।

हाथियों में, कुत्तों में,
हिरनों में,
मच्छरों और मक्खियों में,
भ्रमरों और साँपों में—
प्रकृति की विविधता
असीम है।

पानी के स्वाद में,
हवा के प्रकार में,
ज्ञान का सागर
अत्यंत विस्तृत है।

ज्ञान में भी
सद्ज्ञान है और दुर्ज्ञान।

ईश्वर की सृष्टि में
अति सूक्ष्म से अति विशाल तक
असंख्य रहस्य छिपे हैं।

एक सूक्ष्म बीज से
विशाल वृक्ष का बनना,
एक छोटे से अंडे से
तितली का बनना—
प्रकृति के अद्भुत रहस्य हैं।

हर पल दुर्घटनाएँ होती हैं,
नए-नए संक्रामक रोग आते हैं।
विज्ञान बढ़ता जाता है,
फिर भी अज्ञात का क्षेत्र
और भी विशाल दिखाई देता है।

ज्ञान के सागर में
मोती हैं, हीरे हैं,
चाँदी है, पन्ना है।

पर हीरे की परख
जौहरी ही जानता है।

ज्ञान के समंदर में
जितना गहरा गोता लगाओ,
उतना ही अनुभव होता है
कि अज्ञात बातें
अभी अनगिनत हैं।

भूगोल, खगोल, ग्रह-नक्षत्र,
लाभ-हानि, भाग्य-दुर्भाग्य—
मानव जन्म और मृत्यु के बीच
मिले सीमित जीवनकाल में
ज्ञान के इस अथाह सागर को
पूरी तरह पार कर पाना
अत्यंत दुर्लभ है।

ज्ञान-सागर
अत्यंत विशाल होते हुए भी
मानव-बुद्धि के सामने
अति सूक्ष्म-सा प्रतीत होता है।

ज्ञान का सागर
समुद्र की लहरों के समान है—
कभी ज्वार, कभी भाटा,
कहीं ज्वालामुखी,
कहीं शांत जल।

इसके रहस्यों को
समझना अत्यंत कठिन है।

अंततः मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो,
सृष्टि के विराट रहस्य के सामने
उसका ज्ञान सीमित ही है।

“सब ही नचावत राम गोसाईं।”



आज की चुनौती

ज्ञान का पावन समंदर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

ज्ञान से रहित कोई जीव नहीं,
पर मानव का ज्ञान
सत्य-असत्य,
नश्वर-अनश्वर,
स्थायी-अस्थायी को पहचानकर
अपने जीवन को
सभ्य, सुसंस्कृत और सुरक्षित
बनाने में समर्थ है।

फिर भी यह समझना
पूरी तरह सही नहीं कि
मनुष्य सर्वज्ञानी है।

यदि मनुष्य इतना ज्ञानी है,
तो प्राकृतिक प्रकोपों का
पूरी तरह सामना करने में
असमर्थ क्यों है?

अतः ज्ञान का सागर
अत्यंत गहरा है।

ज्ञानी में भी
काम है, क्रोध है,
ईर्ष्या है, लोभ है,
अहंकार है।

वह जानता है
कि एक दिन उसे मरना है,
फिर भी जीवन भर
मोह-माया में उलझा रहता है।

स्नातक और स्नातकोत्तर बनकर
ऑडिटर, डॉक्टर बनकर
सच्ची मानव-सेवा करनी है।

वकील बनकर
न्याय के पक्ष में लड़ना है।

फिर भी समाज में
भ्रष्टाचार और रिश्वत का
बोलबाला क्यों है?

शासक हैं,
पर उनमें स्वार्थ है।

ठेकेदार हैं,
पर कहीं-कहीं कच्ची सड़कें
बनाकर भी काम पूरा मान लेते हैं।

आत्मज्ञानी भी हैं,
समाज-सुधारक भी हैं।

नायक हैं,
खलनायक हैं,
विदूषक हैं।

बलवान हैं,
निर्बल हैं।

रोगी हैं,
असाध्य रोगी भी हैं।

कोई जन्म से अमीर है,
कोई जन्म से गरीब।

मछलियों में
विविध प्रकार हैं।

हाथियों में, कुत्तों में,
हिरनों में,
मच्छरों और मक्खियों में,
भ्रमरों और साँपों में—
प्रकृति की विविधता
असीम है।

पानी के स्वाद में,
हवा के प्रकार में,
ज्ञान का सागर
अत्यंत विस्तृत है।

ज्ञान में भी
सद्ज्ञान है और दुर्ज्ञान।

ईश्वर की सृष्टि में
अति सूक्ष्म से अति विशाल तक
असंख्य रहस्य छिपे हैं।

एक सूक्ष्म बीज से
विशाल वृक्ष का बनना,
एक छोटे से अंडे से
तितली का बनना—
प्रकृति के अद्भुत रहस्य हैं।

हर पल दुर्घटनाएँ होती हैं,
नए-नए संक्रामक रोग आते हैं।
विज्ञान बढ़ता जाता है,
फिर भी अज्ञात का क्षेत्र
और भी विशाल दिखाई देता है।

ज्ञान के सागर में
मोती हैं, हीरे हैं,
चाँदी है, पन्ना है।

पर हीरे की परख
जौहरी ही जानता है।

ज्ञान के समंदर में
जितना गहरा गोता लगाओ,
उतना ही अनुभव होता है
कि अज्ञात बातें
अभी अनगिनत हैं।

भूगोल, खगोल, ग्रह-नक्षत्र,
लाभ-हानि, भाग्य-दुर्भाग्य—
मानव जन्म और मृत्यु के बीच
मिले सीमित जीवनकाल में
ज्ञान के इस अथाह सागर को
पूरी तरह पार कर पाना
अत्यंत दुर्लभ है।

ज्ञान-सागर
अत्यंत विशाल होते हुए भी
मानव-बुद्धि के सामने
अति सूक्ष्म-सा प्रतीत होता है।

ज्ञान का सागर
समुद्र की लहरों के समान है—
कभी ज्वार, कभी भाटा,
कहीं ज्वालामुखी,
कहीं शांत जल।

इसके रहस्यों को
समझना अत्यंत कठिन है।

अंततः मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो,
सृष्टि के विराट रहस्य के सामने
उसका ज्ञान सीमित ही है।

“सब ही नचावत राम गोसाईं।”

Wednesday, September 16, 2026

अमृत फल

 

आज की चुनौती

अमृत फल

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।
17-9-26

+++++++++++++

मानव को अमर बनाने वाले
दो फल बताए गए हैं—
अमरूद और आँवला।

राजा भर्तृहरि को
एक साधु ने
एक अमृत फल दिया था।

राजा ने वह फल
अपनी रानी को दे दिया।
रानी ने वह फल
अपने प्रेमी कोतवाल को दिया।
कोतवाल ने वह फल
राजनर्तकी को दे दिया।

राजनर्तकी ने सोचा—
यह अमृत फल
मेरे न्यायप्रिय राजा को मिलना चाहिए।
इसलिए उसने वह फल
राजा को वापस दे दिया।

जब राजा को
सच्चाई का पता चला,
तो उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ।
उन्होंने राजपद त्याग दिया
और वैराग्य का मार्ग अपना लिया।

तमिलनाडु में
राजा अतियमान को
एक दुर्लभ और अमूल्य आँवला मिला,
जिसे अमृत फल माना गया।

राजा अतियमान
तमिल भाषा के महान प्रेमी थे।
उन्होंने स्वयं उस फल को खाने के बजाय
तमिल की महान कवयित्री
औवैयार को दे दिया,
ताकि वे दीर्घायु होकर
तमिल साहित्य की सेवा करती रहें।

अमृत फल वास्तव में
केवल शरीर को अमर करने वाला फल नहीं है।

यह फल
आत्मज्ञानियों को,
भक्तों को
और अमर रचनाकारों को

प्राप्त होता है।

जिसका शरीर नश्वर है,
पर जिसकी वाणी, विचार और रचनाएँ
युगों-युगों तक जीवित रहती हैं—
वही सच्चे अर्थों में
अमृत फल का अधिकारी है।

Tuesday, September 15, 2026

शब्द शक्ति

 —“शब्द छोटे होते हैं, पर उनका प्रभाव बड़ा होता है।” 

Monday, September 14, 2026

परोपकार

 [14/09, 10:13 pm] sanantha.50@gmail.com: परोपकार का दीप

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

15-9-26.



वृक्ष कबहूँ न फल  है,

नदी न संचै नीर।

परोपकार के कारणे साधुने धरा शरीर।।

 कबीर के यह दोहे

समझाता है कि

वृक्ष और नदी के समान मानव को अपने लिए धन न जोड़कर 

दूसरों के लिए काम आना चाहिए।

 परोपकार  के लिए ही

 साधु लोग इस जग में 

 जन्म लेते हैं।

धनी का मतलब  है,

 दान करना,

दीन दुखियों की सेवा करना। 

 शिक्षा और चिकित्सा के लिए पाठशाला खोलना।

 शिक्षितों का फ़र्ज़ है,

 अशिक्षितों को 

शिक्षा देना।

 वीरों का कर्तव्य है

देश की सुरक्षा।

जन्म मरण निश्चित है।

ब्रह्मचर्य जीवन में शिक्षा काल 20-25.

गृहस्थ जीवन 26-60.

वृद्धावस्था साठ के बाद।

जिंदगी कमाने परोपकार करने

34साल ही।

 इतने में जितना हो सके, पुण्य कार्य  ,

 दूसरों की मदद करनी चाहिए।

 वही मनुष्य है जो दूसरों के लिए जीता है और मरता है।

 तमिऴ कवि वळ्ळुवर ने कहा है,

 दूसरों को मदद करनेवाले और देनेवालों के कारण ही

 अग जग स्थिर है।

[14/09, 10:13 pm] sanantha.50@gmail.com: आज की चुनौती

परोपकार का दीप

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई — हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

15-9-26

++++++++++++

वृक्ष कभी फल नहीं खाते,

नदी न संचय नीर।

परोपकार के कारण ही,

साधु ने धरा शरीर॥

कबीर के इस दोहे का

संदेश हमें समझाता है—

वृक्ष और नदी के समान

मानव को भी अपने लिए

धन का संचय न करके,

दूसरों के काम आना चाहिए।

परोपकार के लिए ही

साधुजन इस जग में

जन्म लेते हैं।

धनवान होने का अर्थ केवल

धन का संग्रह करना नहीं,

बल्कि दान करना,

दीन-दुखियों की सेवा करना

और जरूरतमंदों की सहायता करना है।

शिक्षा और चिकित्सा के लिए

विद्यालय और चिकित्सालय खोलना,

अशिक्षितों को शिक्षा देना—

यह शिक्षितों का कर्तव्य है।

वीरों का कर्तव्य है

देश की रक्षा करना।

जिसके पास जो सामर्थ्य है,

उसे उसी के द्वारा

समाज और देश की सेवा करनी चाहिए।

जन्म और मरण निश्चित है।

मानव जीवन के विभिन्न चरण हैं—

ब्रह्मचर्य में शिक्षा का काल,

गृहस्थ जीवन में कर्म का काल,

और साठ वर्ष के बाद

वानप्रस्थ तथा वृद्धावस्था का काल।

जीवन में कमाने और

परोपकार करने के लिए

जो समय मिलता है,

वह बहुत सीमित है।

इस सीमित जीवन में

जितना संभव हो,

पुण्य कार्य करने चाहिए

और दूसरों की सहायता करनी चाहिए।

वही सच्चा मनुष्य है,

जो दूसरों के लिए जीता है

और दूसरों के लिए मरता है।

तमिल कवि तिरुवल्लुवर ने भी कहा है—

दूसरों को देने वाले

और दूसरों की सहायता करने वाले

मनुष्यों के कारण ही

यह संसार स्थिर और सुचारु रूप से चलता है।

परोपकार का दीप जलाएँ,

अपने जीवन को सार्थक बनाएँ।

हिंदी दिवस

 

आज की चुनौती

विश्व हिंदी दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

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दिल्ली, मेरठ, आगरा आदि क्षेत्रों की
खड़ी बोली,
हिंदुस्तानी और हिंदी का रूप लेकर
आज विश्व की प्रमुख भाषाओं में
अपना स्थान बना चुकी है।

लगभग दो सौ वर्षों की यात्रा में
हिंदी ने बहुत लंबा सफर तय किया है।

यदि हिंदी दिवस और
हिंदी सप्ताह न मनाए जाते,
तो शायद हिंदी की ओर
हमारा ध्यान भी कम होता जाता।

आज आधुनिक आहार में
पिज़्ज़ा, बर्गर और न जाने कितने
विदेशी खाद्य पदार्थ आ गए हैं।

हमारी पोशाक में भी
पाश्चात्य प्रभाव दिखाई देता है।

उच्च शिक्षा का माध्यम
मुख्यतः अंग्रेज़ी है।

जिन लोगों को
हिंदी के माध्यम से रोजगार मिला,
उनके लिए हिंदी के प्रति
अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का
हिंदी दिवस एक सुंदर अवसर है।

दूसरी ओर, हर वर्ष
केंद्र और राज्य सरकारें
अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों को
अनुमति देने में
एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में दिखाई देती हैं।

तीन वर्ष की उम्र से ही
बच्चे अंग्रेज़ी के वातावरण में
ढलने लगते हैं।

अंग्रेज़ी का ज्ञान आवश्यक है,
लेकिन भारतीय भाषाओं के साथ
अंग्रेज़ी का संतुलित प्रयोग
समाज में गौरव और आत्मविश्वास
दोनों दे सकता है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता—
जिसे हम ए.आई. (AI) कहते हैं—
भी अंग्रेज़ी के व्यापक उपयोग को
और बढ़ावा दे रही है।

जीविकोपार्जन की भाषा
अंग्रेज़ी बनती जा रही है।

व्यापार और व्यवहार में भी
अंग्रेज़ी-मिश्रित हिंदी
तेजी से बढ़ रही है।

1953 से 2026 तक
सितंबर महीने में मनाया जाने वाला
हिंदी दिवस

हिंदी के प्रति हमारी जिम्मेदारी
याद दिलाता है।

केवल सरकार का ही नहीं,
जनता का भी कर्तव्य है कि
हिंदी के विकास के साथ-साथ
सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करे।

एक दिन मैंने अपने पोते से पूछा—

“सोमवार को पाठशाला है क्या?”

उसने पूछा—

“दादा, सोमवार और पाठशाला क्या होता है?”

तब मैंने आधुनिक भारत की भाषा में कहा—

“Monday और School।”

यह केवल एक बच्चे का प्रश्न नहीं,
हमारी बदलती भाषायी स्थिति का
एक छोटा-सा उदाहरण है।

ऐसी परिस्थिति में
हिंदी दिवस और हिंदी सप्ताह
हिंदी के लिए स्मरणीय अवसर हैं।

हिंदी को सम्मान मिले,
भारतीय भाषाओं को सम्मान मिले,
और अपनी भाषा के प्रति
हमारे मन में गौरव जागे।

जय हिंदी!
जय हिंद!
जय भारत!

Saturday, September 12, 2026

कल्पनाओं के पंख

 

आज की चुनौती

कल्पनाओं के पंख

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
13-09-2026

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कल्पनाओं के पंख
जेट विमान से भी तेज़,
हवा से भी तेज़।

कल्पनाओं के घोड़े
रंक को राजा बना देते हैं।
करोड़पति बनना आसान है।
चलचित्र देखते-देखते
कथा-नायक, कथा-नायिका बनना आसान है।

लता मंगेशकर,
मुहम्मद रफ़ी बनना आसान है।
उद्योगपति बनना आसान है।

कल्पनाओं के पंख
पल भर में दुनिया घुमा देते हैं,
राजमहल बना देते हैं।
बंजर खेत को
हरा-भरा बना देते हैं।
सप्तलोकों का भ्रमण करा देते हैं।

कल्पनाओं के पंखों पर
कर्ण जैसे दानी,
राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम,
कृष्ण जैसे गीताचार्य,
आदिकवि वाल्मीकि
बन सकते हैं।

देवेंद्र बनकर
उर्वशी, रंभा और तिलोत्तमा के
नृत्य देख सकते हैं।

हीरे की खान के
मालिक बन सकते हैं।
सारे संसार को
अपने काबू में ले सकते हैं।

कल्पनाओं में जीना
राजभोग है।

परंतु—
कल्पनाओं के पंख
जैसे ही छूटते हैं,
सब कुछ व्यर्थ लगता है।

क्योंकि कल्पना उड़ाती है,
पर वास्तविकता ही जीवन जीना सिखाती है।