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Friday, July 10, 2026

न्याय के मंदिर।

 न्याय के मंदिर 

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

11-7-26.

 मंदिर भगवान का है।

 न्यायालय 

भगवान के दर्शन में 

चार वर्ग के लोग।

 पहला वर्ग

 मंदिर के धर्म कर्ता।

फिर मंत्री, सांसद, विधायक, 

अधिकारी वर्ग,

 स्थानीय बड़े लोग।

फिर   प्रवेश शुल्क  रूपए 

1000/500/100/50

के लोग।

अंत में फ़्री दर्शन के लोग।

 वही क्रम अदालत में।

सोचा देवालय

 न्यायालय 

दोनों बराबर।

 एक में पुजारी को दक्षिणा।

पुण्य मिलने के लिए।

न्यायालय में वकील को दक्षिणा।

न्याय मिलने के लिए।

 न्यायधीश या भगवान 

 कैसे फैसला सुनाते हैं।

 सही या ग़लत 

 विधि की विडंबना।

 भाग्य का फल।।

उच्च न्यायालय  का फैसला

 उच्चतम न्यायालय  में 

बदल सकते हैं।

 

एस.अनंतकृष्णन,



आपकी रचना विचारोत्तेजक है। इसमें आपने देवालय और न्यायालय की व्यवस्था की तुलना करते हुए सामाजिक असमानता पर प्रश्न उठाया है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा सँवारकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

Writing

आज की चुनौती : न्याय के मंदिर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

11-7-2026

मंदिर भगवान का है,

न्यायालय न्याय का मंदिर।

भगवान के दर्शन में भी

चार वर्ग दिखाई देते हैं।

पहला वर्ग—

मंदिर के धर्मकर्ता।

दूसरा—

मंत्री, सांसद, विधायक,

अधिकारी और स्थानीय बड़े लोग।

तीसरा—

प्रवेश शुल्क

₹1000, ₹500, ₹100, ₹50

देकर दर्शन करने वाले।

और अंत में—

निःशुल्क दर्शन की लंबी पंक्ति।

कुछ ऐसा ही क्रम

अदालतों में भी दिखाई देता है।

सोचता हूँ—

देवालय और न्यायालय,

क्या दोनों कहीं न कहीं

एक जैसे हो गए हैं?

देवालय में

पुजारी को दक्षिणा,

पुण्य की कामना में।

न्यायालय में

वकील को फीस,

न्याय की आशा में।

पर अंततः

भगवान हों या न्यायाधीश,

फैसला कैसे और किस आधार पर होता है—

सही या गलत,

यही विधि की विडंबना है,

या फिर भाग्य का फल।

उच्च न्यायालय का निर्णय भी

उच्चतम न्यायालय में

बदल सकता है।

प्रश्न यही है—

न्याय का वास्तविक मंदिर

कहाँ है?

यदि चाहें, मैं इसे और अधिक काव्यात्मक, तुकांत या व्यंग्यात्मक शैली में भी रूपांतरित कर सकता हूँ।









Thursday, July 9, 2026

सच का हौसला

 



सच का हौसला 

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

10-7-26.

+++++++++++

सच का हौसला 

दुख  सहकर

त्याग हम के मार्ग पर 

 अचल रहकर अंत तक 

100% कष्ट सहना।

 सत्य मार्ग का हौसला 

 राम में नहीं,

कृष्ण में नहीं,

 केवल हरिश्चन्द्र में था।

 पर उनका अनुसरण 

कोई नहीं कर सकता।

न द्रोण, न भीष्म

 शिव को भस्मासुर को वर देकर  जान बचाने भागना पड़ा।

 देवेन्द्र इंद्र  भी सत्य के हौसले का देव नहीं।

 कर्ण के विषय में 

 वामनावतार के विषय में 

 सत्य हौसला डांवाडोल।

 अफज़ल खान और सम्राट शिवाजी में सत्य नहीं।

 आजकल के लोकतंत्र शासन

 वोट के लिए नोट देना

 सत्य का सर्वनाश।

  आंटी करप्शन ब्यूरो 

 चुनाव कै काले धन न रोक सका।

 छिपकली का छिपकर आक्रमण,

 कीड़े के जाल

 ईश्वरीय सृष्टि।

 न जान सका ईश्वरीय लीला।

 असुरों की सृष्टि 

 देवों का संकट 

 असुरों के वन की कहानी,

 भक्तों का त्याग 

 मंदिर संपत्ति अपहरण 

 कार्रवाई में न सत्य का हौसला।

  प्राकृतिक कोप में 

  सत्य असत्य का नाश।

 मृत्यु तो पापा और पुण्यात्मा दोनों के लिए बराबर।

 भक्त आश्रित 

 भ्रष्टाचारी आश्रयदाता।

 सत्य का हौसला 

 बातों में संकटों में 

 मानव बूद्धि के साथ में 

 केवल सराहनीय है।

  एस. अनंत कृष्णन चेन्नई स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना



आपकी रचना का मूल भाव प्रभावशाली है। इसे भाषा, प्रवाह और काव्यात्मकता के साथ इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है।

Writing

आज की चुनौती : सच का हौसला

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 10-07-2026

सच का हौसला

सच का हौसला वही,

जो दुख सहकर भी

त्याग और धर्म के पथ पर

अंतिम क्षण तक अडिग रहे,

सौ प्रतिशत कष्ट सहकर भी

सत्य से कभी न डिगे।

सत्य का ऐसा अद्भुत साहस

राम में नहीं, कृष्ण में नहीं,

राजा हरिश्चन्द्र में दिखाई देता है।

किन्तु उनका अनुसरण

हर किसी के लिए संभव नहीं।

न द्रोण, न भीष्म,

न देवेन्द्र इन्द्र—

सत्य की कसौटी पर

सभी कहीं-न-कहीं डगमगाते दिखते हैं।

भस्मासुर को वरदान देकर

स्वयं शिव को भी

प्राण-रक्षा हेतु उपाय करना पड़ा।

कर्ण और वामनावतार के प्रसंग भी

जीवन की जटिलताओं का संकेत देते हैं।

इतिहास और वर्तमान

दोनों यही बताते हैं—

सत्य का मार्ग सरल नहीं।

आज के लोकतंत्र में

वोट के लिए नोट,

स्वार्थ और भ्रष्टाचार

सत्य का गला घोंट रहे हैं।

भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थाएँ भी

हर काले धन को रोक नहीं पातीं।

प्रकृति के सूक्ष्म जीवों से लेकर

विशाल सृष्टि तक,

ईश्वर की लीला

मानव-बुद्धि से परे है।

असुरों का अत्याचार,

भक्तों का त्याग,

मंदिरों की संपत्ति का अपहरण—

इन सबके बीच

सत्य का साहस

कठिन परीक्षा से गुजरता है।

प्राकृतिक प्रकोप आने पर

सत्य और असत्य का भेद नहीं रहता;

मृत्यु पापी और पुण्यात्मा—

दोनों के लिए समान है।

भक्त आश्रय खोजता है,

भ्रष्टाचारी आश्रयदाता खोज लेता है;

किन्तु अंततः

सत्य का हौसला ही

मानवता का सबसे बड़ा आभूषण है।

संकटों में भी सत्य पर अडिग रहना—

यही मनुष्य का सर्वोच्च साहस है।

— एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

यदि चाहें, मैं इसे और अधिक �⁠ओजपूर्ण, �⁠छंदबद्ध या �⁠मुक्तक शैली में भी रूपांतरित कर सकता हूँ

Wednesday, July 8, 2026

विश्व शांति और प्रेम दिवस

 शांति और प्रेम दिवस 

एस.अनंतकृष्तन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

9-7-26

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 मानव जीवन में 

शांति और प्रेम?

 दिवस?

 रामावतार में 

 राम कहानी सुनाना 

का मतलब अपना दुखड़ा रोना।

मानव प्रेम में 

 शांति दिवस कैसे?

विश्व शांति के लिए 

 प्रेम चाहिए।

 मुस्कान चाहिए।

 भारत का संदेश 

 अहिंसा परमो धर्म।

 सत्य मेव जयते।

सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

जय  जगत।

यह नारा,

वसुंधैव कुटुंबकम् 

 विश्वनाथ,

जगन्नाथ 

 अति प्राचीनतम् संदेश।

 न जाने भारतीय संदेश 

 निभाने में भोग नहीं त्याग ही त्याग।

 

पर हर बात को पाश्चात्य देन मानना ,

 हम अपने को पहचानने में भूल करते हैं।

 पाश्चात्य स्वार्थता के कारण  सम्मिलित परिवार का नाश।

 धन कमाने विदेश में 

 भाईचारे की कमी।

 अतः शांति और प्रेम रहित संसार में 

 भारत ही ऐसे सनातन धर्म संदेश 

 हर बात को उन्नीसवीं शताब्दी पाश्चात्य नारा

 सही नहीं 

 भारतीय श्लोक नारा

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

अर्थ (भावार्थ):सभी लोग सुखी हों, सभी रोगमुक्त (निरोगी) रहें, सभी का कल्याण हो और किसी को भी कभी किसी दुःख का भागी न बनना पड़े। चारों ओर शांति ही शांति हो।

सोचो विचारों जानो पहचानो समझो 

‌विश्व शांति और प्रेम 

का नारा सनातन धर्म का है,

न पाश्चात्य देन।

 भारत ही स्वतंत्रता संग्राम में ऐसा भजन गाया

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई।

 न झगडाना  कोई लड़ाई।

 विश्व एकता , त्याग,

 नश्वर जगत 

 अनश्वर सत्य,धर्म , प्रेम शांति।

 नंगे बदन विश्व कल्याण 

साधु संतों की भूमी

 भारत में 

शांति और प्रेम दिवस 

 पाश्चात्य देन नहीं,

वेद उपनिषद का संदेश।

 पंच तत्व ही तटस्थ भगवान।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 


सही रूप 

शांति और प्रेम दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)

9-7-2026

मानव जीवन में

शांति और प्रेम का

क्या है सच्चा आधार?

रामावतार की कथा

केवल कथा नहीं,

मानव के दुःख-दर्द का

जीवन-संदेश है।

विश्व में शांति चाहिए,

तो प्रेम चाहिए,

मधुर मुस्कान चाहिए,

आपसी विश्वास चाहिए।

भारत का सनातन संदेश—

"अहिंसा परमो धर्मः।"

"सत्यमेव जयते।"

"वसुधैव कुटुम्बकम्।"

"जय जगत।"

यही तो है वह अमर पुकार,

जो वेदों और उपनिषदों से

युगों-युगों से गूँज रही है।

हर श्रेष्ठ विचार को

केवल पाश्चात्य देन मान लेना

अपने गौरव को भूल जाना है।

स्वार्थ, भोग और धन की दौड़ ने

संयुक्त परिवारों को बिखेरा,

भाईचारे की डोर को कमजोर किया।

भारत ने सदा त्याग,

सेवा और विश्व-बंधुत्व का मार्ग दिखाया।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः,

सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,

मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥"

यही है विश्व-कल्याण की प्रार्थना,

यही है शांति और प्रेम का

सनातन संदेश।

स्वतंत्रता संग्राम में भी

भारत ने गाया—

"हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,

आपस में हैं भाई-भाई।"

विश्व-एकता, प्रेम, त्याग,

सत्य और धर्म ही

मानवता के शाश्वत आधार हैं।

ऋषियों, मुनियों और संतों की भूमि भारत

आज भी विश्व को यही संदेश देती है—

शांति और प्रेम किसी एक युग या देश की देन नहीं,

वे वेदों, उपनिषदों और सनातन संस्कृति की अमर धरोहर हैं।

पंचमहाभूतों में व्याप्त परमात्मा

संपूर्ण सृष्टि को

शांति, प्रेम और सद्भाव का आशीर्वाद दें।

— एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई


   



   

बचपन से आज तक खट्टी-मीठी कडुवु बातें

 बचपन की खट्टी-मीठी यादें।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई 

8-7-26.

बचपन में खट्टी-मीठी यादें 

मेरे जन्म लेने के बाद 

 माँ के छे बच्चे,

 आर्थिक अभाव या कर्म फल। 

दो तीन साल पलकर

‌बच्चे मर जाते।

 कडुवी बातें बचपन की।

सत्रह साल तक ग़रीबी,

 रुग्णावस्था में माँ,

मीठी बातें बचपन में नहीं।

दीपावली पटाखे,

नये वस्त्र कल्पना की बातें।

बचपन की बातें खट्टी अंगुली 

न मीठी।

 अब 76साल की उम्र में 

‌न आर्थिक अभाव,

 पर मेरी स्वस्थ अर्द्धांगिनी 

 मेरी सेविका,

 मेरी सलाहकार 

 मेरी शुभ चिंतिका

चल बसी।

 बचपन में आर्थिक अभाव 

 आर्थ नाद।

 बुढ़ापे में न आर्थिक अभाव।

 मेरी प्राण प्रिया का निधन।

 न बचपन में मीठी बातें 

 न अब बुढ़ापे में।

Monday, July 6, 2026

विश्व ग्रामीण विकास दिवस

 विश्व ग्रामीण विकास दिवस।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

7-7-26.++++

++++++++++

नगर नगरीकरण, नगर विस्तार  

प्रकृति का विनाश।

 केवल धन का उद्देश्य।

 परिणाम ग्राम काली होना।

 धन से तन का स्वास्थ्य 

पौष्टिक आहार,

अन्न, धान,सब्जियाँ

खरीद सकते हैं।

 और ग्रामीण लोग

 खेती न करते तो

धनी शहरी लोग भूखों मर जाते।

 ग्राम शहर के सुखी जीवन जीने रीढ़ की हड्डियाँ हैं।

स्वस्थ शरीर,रक्त संचार 

 ग्रामीण लोग 

कृषी न करते तो बेकार।

अतः ग्राम राज्य की स्थापना,

विश्व ग्रामीण दिवस 

मनाकर ,

ग्रामोत्थान के लिए 

 लोगों को जगाना है।

ग्रामों में स्वच्छ वातावरण।

 साफ हवा,

न वायु,जल,भूमि

 प्रदूषण।

 न विचार प्रदूषण।

हर साल जुलाई में तारीख को मनाने वाले 

 ग्रामोत्थान दिवस

 ग्रामीण लोगों की शिक्षा,

 पानी की व्यवस्था,

 आवागमन की सुविधाएँ,

स्वास्थ्य केंद्र,

भोजन आदि

बुनियादी सुविधाएँ,

देना,

 खेती के विकास योग्य 

 बीज,  खाद,  आर्थिक सुविधाएँ,

गाय,बैल,बकरी, मुर्गा 

पालने की व्यवस्था,

सहकारी समिति की स्थापना।

सरकारी सहायता की जानकारी आदि।

 जय किसान का नारा

यही ग्रामीण विकास दिवस का लक्ष्य।

संत तिरुवल्लुवर ने कहा

சுழன்றும்ஏர்ப் பின்னது உலகம் அதனால் உழந்தும் உழவே தலை".

संसार उद्योग,धंधा, शिक्षा आदि की तरक्की करने पर भी  

कृषी पर ही आधारित है।

अतः ग्रामीण विकास को ही प्राथमिकता देनी है।

एस.अनंतकृष्णन।

विश्व ग्रामीण विकास दिवस


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारकदिनांक: 7-7-2026


विश्व ग्रामीण विकास दिवस


नगरों का विस्तार,नगरीकरण की अंधी दौड़,प्रकृति का होता विनाश—केवल धन कमानाजब जीवन का उद्देश्य बन जाए,तब गाँव उजड़ने लगते हैं।


धन से पौष्टिक आहार,अन्न, धान और सब्जियाँखरीदी तो जा सकती हैं,पर यदि ग्रामीण किसानखेती करना छोड़ दें,तो धनवान नगरवासी भीभूखे रह जाएँगे।


गाँव ही हैंशहरों के सुखी जीवन कीरीढ़ की हड्डी।किसानों के श्रम से हीस्वस्थ शरीर,रक्त का संचारऔर जीवन का आधारबना रहता है।


अतः ग्रामोत्थान का संकल्प लेकरविश्व ग्रामीण विकास दिवस मनाएँ,और जन-जन कोग्रामीण विकास के लिए जागरूक बनाएँ।


गाँवों में होस्वच्छ वातावरण,शुद्ध वायु, निर्मल जल,उपजाऊ भूमि,और प्रदूषण-मुक्त विचार।


ग्रामीणों को मिले—उत्तम शिक्षा,स्वच्छ पेयजल,सुगम आवागमन,स्वास्थ्य केंद्र,पौष्टिक भोजनतथा सभी बुनियादी सुविधाएँ।


कृषि के लिएउन्नत बीज, खाद,आर्थिक सहायता,पशुपालन की सुविधाएँ,सहकारी समितियों की स्थापनाऔर सरकारी योजनाओं की सही जानकारीहर किसान तक पहुँचे।


"जय किसान" का नारातभी सार्थक होगा,जब हर गाँवसमृद्ध और आत्मनिर्भर बनेगा।


महान संत तिरुवल्लुवर ने कहा है—


"சுழன்றும் ஏர்ப் பின்னது உலகம்; அதனால் உழந்தும் உழவே தலை."


अर्थात—संसार चाहे उद्योग, व्यापार और शिक्षा मेंकितनी भी उन्नति कर ले,उसका आधार अंततः कृषि ही है।इसीलिए ग्रामीण विकास कोसर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।


— एस. अनंत कृष्णन

Sunday, July 5, 2026

इंसाफ़ की ताकत

 इंसाफ़ की ताकत।

 एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक 

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इंसाफ़  की ताकत 

अत्यंत महत्वपूर्ण।

पर इंसाफ़ देनेवाले 

 ज्ञानी होना चाहिए।

 धनलोलुपता वकील 

 अपने तर्क चातुर्य से

 अपराधी और खूनी को 

छुड़ा देता है।

 झूठे गवाह देना एक धंधा बन गया है।

 भ्रष्टाचारी मंत्री,

 हत्यारे अमीर

 अमीर कार चालक 

 सबको दंड देने बारह वर्ष।

 तब फ़ाइल गायब

‌गवाह गायब

 इंसाफ़ कमजोर।

 मुख्यमंत्री जयललिता 

अपराधिन

 शादी प्रतिवादी तर्क 

 खत्म, पर फैसला 

 उसकी मृत्यु के बाद।

 वह अब निरपराधिन नेत्री।

 उसकी सखी शशिकला

 चार वर्ष की ही सजा ।

 भारतीय न्यायालय धनियों के लिए।

एक गरीब चालक 

  ग़लती से टकराने पर तुरंत दंड।

एक प्रसिद्ध  अभिनेता पियक्कड़, कार चलाते 

 अनेकों की मृत्यु।

 बारह साल तक के मुकद्दमे में,

 फाइल, गवाह सब नदारद।

 अभिनेता के समर्थन में 

 सब ।

 वह साफ़ साफ़ दंड से बचा।

 मंदिर के पर्वत पर  दीप जलाने का फैसला,

पर शासक दल दीप जलाने नहीं दिया।

 हिंदू मंदिर अति प्राचीन।

 पर बीच में दर्गाह

 एक मुगल कब्र 

 न्याय का ताकत कमज़ोर।

 अदालत में धन की महिमा

 सत्य का हार, अधर्म की जीत।

 प्रेमचंद की कहानी 

 नमक का दारोगा।

 सत्य के पक्ष में न गवाह

न वकील।

  अपराधी काले धनी

 उसको बचाने

 वकीलों का तांता।

स्वतंत्रता संग्राम में 

 इंसाफ़ अति कमजोर।

  राजीव गांधी के मुकद्दमे  में न  सच्चाई का पता।

सिविल केस चलाते चलाते अमीर बन गया गरीब।

 न इंसाफ़।

 इंसाफ़ की देरी

 सत्य हरिश्चन्द्र की परेशानियाँ,

 लेखकों की ग़रीबी,

 प्रकाशकों की अमीरी।

 भारत के सड़कों के फुटपाथ चलने के लिए नहीं,

फुट पाथ की दूकानों के लिए।

 मंदिर भक्ति के लिए नहीं 

 व्यापारियों का केंद्र 

 मनमाना दाम धोखा।

ट्राफिक पुलिस का रिश्वत।

जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र में 

 रिश्वत।

 थोड़े में कहें तो

 देवदर्शन में धन प्रधान।

 श्मशान में भी।

 इंसाफ़ की ताकत 

 दुर्बल ही लगता है,

 धन,पद, अधिकार, सिफारिश दोस्ती के कारण।

 तटस्थ इंसाफ 

यम के दरबार में,

पंचतत्व के चलन में।

जहाँ न अपील न उच्च उच्चतम न्यायालय।

Saturday, July 4, 2026

समय और कर्म

 

समय और कर्म

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
दिनांक: 06-07-2026

समय और कर्म

ईश्वर की इस सृष्टि में
सबके कर्म एक समान नहीं।
आहार में भिन्नता,
आकार में विविधता,
स्वास्थ्य, बुद्धि और क्षमता में
सबका स्वरूप अलग-अलग है।

धन, तन और मन में भी
प्रकृति ने विविध रंग भरे हैं।
जल का स्वाद भी बदलता है,
धरती का रूप भी बदलता है।

सभ्यता और असभ्यता के कर्म,
कृषि, पोशाक और खाद्यान्न में भी
स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
सद्कर्म और दुष्कर्म,
सत्संग और कुसंग—
यही जीवन का फल निर्धारित करते हैं।

अनपढ़ कबीर का अमूल्य ज्ञान
सत्संग की ही देन था।
उनकी वाणी आज भी
मानवता का मार्गदर्शन करती है।

मंगत मिश्र के तोते ने
वेद-मंत्रों का उच्चारण सीखा,
और डाकू के तोते ने
"पकड़ो, मारो, लूटो" कहना।
संगति का प्रभाव ही
कर्म का स्वरूप गढ़ता है।

समय सबके लिए समान है—
चाहे राजा हो या रंक।
समय किसी का पक्ष नहीं लेता,
वह निरंतर आगे बढ़ता रहता है।

संत कबीर का अमर संदेश—

"काल करे सो आज कर,
आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी,
बहुरि करेगा कब।।"

समय को खोना
मानो जीवन को खोना है।
जो कर्म समय पर नहीं होता,
वह जीवन भर पछतावा बन जाता है।

समय की हानि की भरपाई
ईश्वर भी नहीं कर सकते।

"आछे दिन पाछे गए,
हरि से किया न हेत।
अब पछताए होत क्या,
जब चिड़िया चुग गई खेत।।"

आइए, समय का सम्मान करें,
सद्कर्म को जीवन का आधार बनाएँ,
क्योंकि समय और कर्म ही
मनुष्य के सच्चे भाग्य-विधाता हैं।

— एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी प्रेमी, सेवक एवं अनुवादक

समय और कर्म

 समय और कर्म

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

6-7-26

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कर्म ईश्वरीय सृष्टियों में 

 एक समान नहीं।

 आहार विषय में,

 आकार विषय में 

 स्वास्थ्य विचार में 

 बुद्धि लब्धि में 

 अलग अलग।

धन ,तन,मन

में भी भिन्न-भिन्न।

 पानी में भी भिन्नता।

 अतः सभ्यता असभ्यता के कर्म  ,कृषि में पोशाक में, खाद्यान्न में भी फर्क।

अतः सद्कर्म बद्कर्म  सत्संग बद्संग का फल।

अनपढ़ कबीर का ज्ञान 

वाणी का डिक्टेटर बनना

 सत्संग का फल।

 मंगत मिश्र के तोते का

 वेद मंत्र बोलना,

 डाकू के तोते का 

 पकड़ो,मारो,लूटो कहना

 सत्संग और बदचलन का संग।

 अतः कर्म में फ़र्क।

 समय 

 समय तो सब के लिए बराबर।

 राजा हो या रंक

 समय तो किसी की परवाह नहीं करता।

 

संत कबीर का यह प्रसिद्ध दोहा 

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।पल में प्रलय होएगी,

 बहुरि करेगा कब।।

 समय को खोना,

मरण समान।

  कर्म  समय पर न 

करने पर 

पछताना पड़ेगा।

 समय का घाटा भरना

ईश्वर से भी असंभव।

 

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत।

अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

 सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी प्रेमी सेवक अनुवादक 

 



 

 

 


 

 



 


 




अंग्रेज़ी

 अंग्रेज़ी स्कूल न तो हम कमा नहीं सकते।

 हिंदी  या तमिल दरिद्रता है, भाषा माधुर्य  ही  प्रधानता हो तो संस्कृत क्यों मृत भाषा।

 अंग्रेज़ी क्यों जन प्रिय भाषा।

 धन धन धन

 बाद में ही धर्म।

‌धन न तो मंदिर नहीं,

 ईश्वर के सिर पर हीरे का मुकुट नहीं।

 ऊँचे ऊँचे गोपुरम नहीं,

 धन के सामने धर्म नहीं।

सत्य नहीं, अहिंसा नहीं 

 शिक्षितों में ईमानदारी नहीं। 

 न्यायाधीश में न्याय नहीं,

  ऐसी हालत में भाषा किस खेत की मूली।

 हजारों भाषाओं का लापता। 

 अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल और जीविकोपार्जन न तो  भारतीय भाषाओं का अंत ज़रूर।

भक्ति

 भक्ति भारतीय भक्ति,

 याद रखिए,

 समझिए 

 समझाइए

 सनातन धर्म है,

 मजहब नहीं।

 मत-मतांतर 

अद्वैत द्वैत 

विशिष्टाद्वैत नहीं,

वह हवा है, तटस्थ हैं

 मानवता के आधार पर है।समदर्शी है,

व ओवर चढ़

Friday, July 3, 2026




 नव नारी कुंजर

பாரத நாட்டு சனாதன தர்மம்

மனித வாழ்க்கையின் துன்பங்கள் இன்பங்கள்

ஆகியவற்றை

சிற்பங்கள் மூலம் கதைகளாக விளக்கி

மனதை ஆன்மாவில் ஒன்று படுத்தி

ஆனந்தமாக வாழ வழிகாட்டுகிறது.

அவ்வாறு சிற்பக்கலையில் பல கதைகள்

வழிகாட்டி மனதை அடக்கி

ஆன்மீக வழியில் எடுத்துச் செல்கிறது.

அவ்வாறான ஒரு சிற்பமே

நவநாரி குஞ்சரம்.

நலம் என்றால் ஒன்பது.

ஒன்பது பெண் களைக் கொண்ட யானை சிற்பம்.

சிவனின் மாயா தேவி வடிவம் பெண்கள்.

மனித வாழ்வின் இன்பங்கள் துன்பங்கள்

அனைத்து மாயா தேவி பெண் உருவமாக படைத்துள்ளார்.

அதனால் ஆன்மீக வழி காட்டுவோர்

பெண்ணாசை மின்னி ஆன்மீக பக்தி வழியில் செல்ல வேண்டும்.

அதற்கு பாரத சனாதன தர்ம

ஆசாரியர்கள்

பிரம்மச்சாரிகளாக வாழ்ந்தனர்.

புத்தர் மகாவீரர்

ஆதி சங்கரர்

விவேகானந்தர்

அனைவரும் துறவிகள்.

ஆனால் அனைவரும் துறவிகள் ஸ்ல ஆக வேண்டும் என எந்த மதமும் கூறவில்லை.

கிறிஸ்தவ மதத்தில் பாதரியார்

கன்னியாஸ்திரிகள் திருமணவாழ்க்கை ஏற்பதில்லை.

மக்களை நல்வழிப்படுத்த

பெண் மண் பொன் ஆசையில் இருந்து

மனதைக் கட்டுப்படுத்த

புலனடக்கம் தேவை என்பதை வலியுறுத்தினர்.

இப்பொழுது நவநாரி குஞ்சரம்

என்றால்

வாழ்க்கை நவரச மனோபாவங்களால் ஆனது.

இதில் சிருங்கார ரசம் என்பது ஆண் பெண் காதலுக்கு முக்கியத்துவம் அளிப்பது.

இதில் கட்டுப்பாடு தேவை.

இது தான் பூலோக வாழ்க்கை யின்

இன்றைய துன்பங்கள் போட்டி பொறாமை பேராசை காமம்

ஆகியவை உள்ளடக்கியது.

இதனால் ஏற்படும் ரசங்கள் தான் கருணை

பயம்

வீரம்

குரோதம் ஆச்சரியம்

வெறுப்பு

இன்னல்.

இந்த நவரசங்களுக்கு

ஆதாரமாக இருப்பது பெண்கள்.

இந்த நவநாரிகள் கொண்ட யானை சிற்பம் ஏன் என்றால் யானை நிதானத்துடன் செயல் படும் குணம் கொண்டது.

அதிக நினைவாற்றல் அறிவு மிக்கது.

கூட்டமாக வாழும் சமூக உணர்வு.

வலிமை.

தன் மாவுத்தனுக்கு கட்டுப்பட்டது.

வளர்ப்பு மிருகம்..

இந்த அனைத்து குணங்கள் கொண்டவர்கள்

பெண்கள்.

ஆவதும் பெண்ணாலே அழிவதும் பெண்ணாலே.

ஆகையால் நவரசங்கள் தரும் பெண்கள்

அந்த சிற்பம் காணும் ஆண்கள்

யானை போல்

நிதானமாக செயல் படவேண்டும்.


பழநி சே.அனந்தகிருஷ்ணன்,ஓய்வு பெற்ற தலைமை ஆசிரியர், ஹிந்து மேல் நிலைப் பள்ளி,திருவல்லிக்கேணி,சென்னை

प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस

 प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस।


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

4-7-26

++++++++++++

नमस्ते वणक्कम् 

++++++++++++

मानव जीवन वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण 

 मानव की तबीयत 

स्वास्थ्य में 

कमी होती  रहती है।

 दिन ब दिन वह यंत्र के गुलाम होता रहता है।

  संगणिक और मोबाइल के कारण 

उसकी स्मरण शक्ति 

कम होती रहती है।

 अंग्रेज़ी माध्यम और स्कूल वेन के कारण 

 बचपन से पैदल 

चला नहीं करते।

 स्वास्थ्य की वृद्धि

 भी जिम जैसे कृत्रिम व्यवहार ही प्रधान।

 वैसे ही मानव के लिए 

हानिकारक है प्लास्टिक ‌

प्लास्टिक युग है

 बगैर प्लास्टिक के

चलना फिरना मुश्किल।

प्लास्टिक को इधर उधर फेंका करने से

 नाले में समुद्र में 

नदियों की धारा में 

 फेंकने से  

धारा की गति

 मंद हो जाती।

 बाढ को रोकने से

 पानी के बहाव का मार्ग 

बदल जाता है।

 पशु, पक्षी , मछलियाँ

 प्लास्टिक के खाने से

 उनके प्राण खतरे हो जाते हैं।

 उपजाऊ भूमि में 

 गाढ़े जाने से वनस्पति के पलने में,

 भूतल पानी 

जड चूसने से  

हानियाँ ही हानियाँ।

इनसे मुक्ति पाने के लिए 

प्लास्टिक थैलियाँ,

प्लास्टिक बोतल,

 आदि के बदले

 जूट की थैलियां,

कागज़ की थैलियां

 रूई की थैलियाँ,

 काँच , मिट्टी,ताम्र के बर्तन का  उपयोग करना चाहिए।

 गणेश चतुर्थी की गणेश की मूर्तियाँ  रसायनिक मिश्रण से नहीं,

 चिक्नी मिट्टी से

 बनानी चाहिए।

 उसमें कृत्रिम रसायनिक रंग चढ़ाना  हानिकारक है।

 रसायनिक मिश्रित मूर्तियों को समुद्र नदी झील में फेंकना

 जल जीवों के विनाश के कारण होते हैं।

यथाशक्ति तथा संभव 

 प्लास्टिक का उपयोग 

रोकना ही जनकल्याणकारी है।

++++++++++++++

 

आपकी रचना में विचार बहुत सार्थक हैं। मैंने भाषा को अधिक प्रवाहपूर्ण, काव्यात्मक और प्रभावशाली रूप दिया है, जबकि आपके मूल भाव और संदेश को यथावत रखा है।

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आज की चुनौती

प्लास्टिक मुक्त दिवस / प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 4-7-2026

नमस्ते। वणक्कम्।

मानव जीवन में

वैज्ञानिक आविष्कारों ने

सुविधाओं का विस्तार किया,

पर कहीं न कहीं

स्वास्थ्य और प्रकृति पर

उनका दुष्प्रभाव भी बढ़ा।

यंत्रों का बढ़ता आकर्षण,

संगणक और मोबाइल का उपयोग—

स्मरण-शक्ति को क्षीण करता है।

अंग्रेज़ी माध्यम,

स्कूल वैन की आदत,

बचपन से पैदल चलने की संस्कृति

धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।

स्वास्थ्य के लिए

खुले मैदान कम,

जिम की कृत्रिम दुनिया अधिक

प्रधान बन गई है।

इसी प्रकार

प्लास्टिक भी

मानव और प्रकृति—दोनों के लिए

घातक सिद्ध हो रहा है।

आज का युग

प्लास्टिक का युग है,

पर इसके बिना जीवन कठिन होने का अर्थ

यह नहीं कि

हम इसका अंधाधुंध उपयोग करें।

जब प्लास्टिक

नालों, नदियों, झीलों और समुद्र में

फेंक दिया जाता है,

तो जलधाराएँ रुकती हैं,

पानी का स्वाभाविक प्रवाह बदल जाता है,

और बाढ़ जैसी आपदाएँ

विकराल रूप धारण कर लेती हैं।

पशु, पक्षी और मछलियाँ

भोजन समझकर प्लास्टिक निगल लेते हैं,

जिससे उनके प्राण संकट में पड़ जाते हैं।

भूमि में दबा प्लास्टिक

मिट्टी की उर्वरता घटाता है,

पौधों की जड़ों को प्रभावित करता है,

और भूजल तक को दूषित करता है।

इस संकट से मुक्ति के लिए

प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों के स्थान पर

जूट, कागज़ और सूती थैलियों का,

तथा काँच, मिट्टी और ताम्र के बर्तनों का

अधिकाधिक उपयोग करें।

गणेश चतुर्थी पर भी

रासायनिक पदार्थों से बनी मूर्तियों के स्थान पर

चिकनी मिट्टी की

पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाएँ स्थापित करें।

कृत्रिम रंगों से सजी मूर्तियाँ

जब जल में विसर्जित होती हैं,

तो जलजीवों और पर्यावरण को

गंभीर हानि पहुँचाती हैं।

आइए,

यथाशक्ति और यथासंभव

प्लास्टिक का उपयोग घटाएँ,

प्रकृति को बचाएँ,

और आने वाली पीढ़ियों को

स्वच्छ, स्वस्थ और सुंदर धरती का उपहार दें।

प्लास्टिक मुक्त भारत—

स्वस्थ भारत,

स्वच्छ भारत,

सुरक्षित भविष्य। :::

Thursday, July 2, 2026

न्याय की गूँज

 सत्य की गूँज।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई 

3-7-26.

+++++++++-

नमस्ते वणक्कम्।

  भारतीय सनातन वेद में 

  सत्य की गूँज यों

प्रकट करता है

सत्य मेव जयते।

 सत्य ही जीतता है,

असत्य की जीत,

 असत्य राजनैतिक समर्थन देश हित के लिए नहीं,

सत्य गूँजता है,

जब सत्य ज़ोर से

चीखता चिल्लाता है।

 पर सत्य की शोर उठने के पहले ही 

उसका गला घोंटा 

जाता है।

 कुंती ने कर्ण जन्म छिपाया,

 उसका बदनाम 

 शाश्वत।

 हरिश्चन्द्र के कष्ट अंत तक।

 कुरुक्षेत्र के युद्ध

‌सत्य के दबाने से

 एकलव्य की नाकामयाबी।

युद्ध कला के विरुद्ध 

जाँघ में मारने से दुर्योधन की मृत्यु।

सत्य के छिपाने से

 कर्म को शाप।

 छल से  भलें ही भगवान हो वामन अवतार लेकर 

 विराट क्षय अवतार लेना,

आजकल चुनाव में 

वोट के लिए नोट।

रुग्णावस्था में 

वृद्धों की इलाज में 

 वेंटिलेटर रखकर लूटना।

 न्यायालय  में 

अपराधियों के पक्ष में 

 वकील अपनी चालाकी 

तर्क से छुड़ाना,

 सी . ए. के द्वारा आयकर बचाने का सलाह।

ये सब चित्रपट ,

समाचार पत्र

 कहानी सब में गूँजता है,

पर बेकार।

 मृत्यु ही सत्य की गूँज

करोड़ पति हो या वस्त्र हीन भिखारी,

करोड़ों के भ्रष्टाचार नेता

रिश्वत खोर अधिकारी,

न्यायाधिपति हो

‌अन्यायाधि पति,

सब को तटस्थ दंड

 मृत्यु दंड।

 तभी सत्यधर्म गूँजता है।

+++++++++++





आज की चुनौती — सत्य की गूँज


सत्य की गूँजएस. अनंत कृष्णन, चेन्नई03-07-2026


नमस्ते! वणक्कम्।


भारतीय सनातन संस्कृति का उद्घोष है—"सत्यमेव जयते।"सत्य ही अंततः विजयी होता है,असत्य की विजयक्षणिक भ्रम मात्र होती है।


सत्य जब गूँजता है,तो अंतरात्मा को झकझोर देता है।किन्तु अक्सरउसकी गूँज उठने से पहले हीउसका गला घोंट दिया जाता है।


कुंती ने कर्ण का जन्म-रहस्य छिपाया,उसका परिणाम जीवनभर की पीड़ा बना।राजा हरिश्चन्द्र नेसत्य के लिएअंतिम क्षण तक कष्ट सहे।


कुरुक्षेत्र का महायुद्ध भीदबे हुए सत्य का परिणाम था।एकलव्य का त्याग,दुर्योधन का अंत,छल और नीति का संघर्ष—इतिहास आज भी प्रश्न करता है।


आज भी चुनावों में वोट के बदले नोट का खेल,

बीमार वृद्धों के उपचार के नाम पर लूट,

न्यायालयों में 

तर्क-कौशल से 

अपराधियों का बच निकलना,

और कर बचाने की युक्तियाँ—

समाचारों, 

कथाओं और चलचित्रों में प्रतिदिन गूँजती रहती हैं।


फिर भी एक सत्य अटल है—मृत्यु।


करोड़पति हो या निर्धन भिखारी,भ्रष्ट नेता हो या रिश्वतखोर अधिकारी,न्यायाधीश हो या सामान्य जन—मृत्यु सबको

एक समान न्याय देती है।


अंततः सत्य की गूँज समय के पार सुनाई देती है,

और वही मानव को सत्य धर्म का स्मरण कराती है।

Tuesday, June 30, 2026

जंगल में संवाद।

 जंगल में संवाद 

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-6-26.

+++++++++++

 पेड़  दूसरे पेड़ से

 पहला पेड--हम मनुष्य को  छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।

  दूसरा पेड़ --

साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।

जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,

मनुष्य ढूँढ ढूँढकर 

 शिकार करता है।

हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,

पवित्र मानते हैं। 

   मानव सोचता है कि

 ईश्वर की सब सृष्टियों पर 

 उसका अधिकार है।

 सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना  करते हैं। 

सियार --मानव की  चालाकी  की तुलना मुझसे करते हैं।

 बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।

   हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।

 सिंह --मानव तो  सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।

उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।

आदमी में नमकहरामी होते हैं।  ईर्ष्यालु होते हैं।

 ठग होते हैं।  देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।

  खरगोश --

मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।

 अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय 

 हमारे अलग अलग गुणों 

 जानने से  उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।

 सिंह --ठीक है खरगोश की बात।

 मानव भी

मिश्रित गुणवाला है।

एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।

 पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में

मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।


 









 




 


आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026


जंगल में संवाद


पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।


दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।


जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।


हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।


सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।


सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।


बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।


हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।


सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।


खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।


सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।


पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।


— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।



जंगल में संवाद 

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-6-26.

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 पेड़  दूसरे पेड़ से

 पहला पेड--हम मनुष्य को  छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।

  दूसरा पेड़ --

साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।

जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,

मनुष्य ढूँढ ढूँढकर 

 शिकार करता है।

हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,

पवित्र मानते हैं। 

   मानव सोचता है कि

 ईश्वर की सब सृष्टियों पर 

 उसका अधिकार है।

 सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना  करते हैं। 

सियार --मानव की  चालाकी  की तुलना मुझसे करते हैं।

 बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।

   हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।

 सिंह --मानव तो  सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।

उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।

आदमी में नमकहरामी होते हैं।  ईर्ष्यालु होते हैं।

 ठग होते हैं।  देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।

  खरगोश --

मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।

 अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय 

 हमारे अलग अलग गुणों 

 जानने से  उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।

 सिंह --ठीक है खरगोश की बात।

 मानव भी

मिश्रित गुणवाला है।

एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।

 पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में

मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।


 









 




 


आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026


जंगल में संवाद


पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।


दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।


जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।


हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।


सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।


सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।


बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।


हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।


सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।


खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।


सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।


पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।


— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।



आज की चुनौती – जंगल में संवाद

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 30-06-2026

जंगल में संवाद

पहला पेड़ बोला—

हम शीतल छाया बिखराते हैं,

मीठे फल मानव को खिलाते हैं।

अपने तन की लकड़ी देकर,

जीवन का हर भार उठाते हैं।

दूसरा पेड़ मुस्काया—

प्राणवायु का दान हमारा,

धरती का श्रृंगार हमारा।

मिट्टी का कटाव रोककर,

हरियाली का संसार हमारा।

वन के पशु बोले—

हम तो वन की शान हैं,

प्रकृति की मधुर पहचान हैं।

फिर भी मानव लोभ में आकर,

करता हमारा अवसान है।

हिरन बोला—

कभी ऋषियों का पावन आसन,

आज बना हूँ शिकार का कारण।

निर्दोष होकर भी मैं सहता,

मानव का निष्ठुर आचरण।

सिंह गर्जा—

मेरी चाल की देता मिसाल,

मुझको कहता वन का काल।

पर साहस यदि सच में चाहिए,

छोड़ दे छल और हर जंजाल।

सियार हँसकर बोला—

अपनी चतुराई मुझ पर डाले,

दोष हमारे सिर पर टाले।

अपने छल को भूल स्वयं ही,

दर्पण से भी नज़रें टाले।

बाघ बोला—

मेरी फुर्ती, मेरी छलाँग,

बन जाती उसकी पहचान।

पर हिंसा का दोष भी अक्सर,

दे देता मेरे ही नाम।

हाथी बोला—

बल, धैर्य और बुद्धि मेरी,

कहते हैं सब अनुपम ढेरी।

काश! मानव भी सीख सके,

विनम्रता की राह सुनहरी।

खरगोश बोला—

मानव को पहचानना कठिन,

उसका मन है बड़ा गहन।

कभी देव समान दिखाई दे,

कभी बन जाए घोर शत्रुजन।

सिंह ने कहा—

सत्य यही है, मित्र हमारे,

मानव में हैं रूप हजार।

गुण-अवगुण का अद्भुत संगम,

वही रचता अपना संसार।

तभी सब पेड़ एक स्वर बोले—

हम तो देते प्रेम निरंतर,

बिना किसी प्रतिदान की चाह।

फिर भी भलाई के बदले बुराई,

क्यों चुनता मानव की राह?

संदेश

प्रकृति माँ का मान बढ़ाओ,

हर प्राणी से प्रेम निभाओ।

धरती तभी स्वर्ग बनेगी,

जब मानव मानव बन जाओ।


Sunday, June 28, 2026

ज्ञान की यात्रा

 ज्ञान की यात्रा।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

29-6-26.

++++++++++++++

 ज्ञान  संपूर्ण ज्ञान 

 आत्मज्ञान 

आध्यात्मिक ज्ञान 

अखंडबोध

 अध्ययन से,

अनुभव से

 सत्संग से

गुरु के अभ्यास के द्वारा,

  करत करत अभ्यास करत जड मति होता सुजान।

बुद्धि जन्मजात होती है।

बुद्धि लब्धि प्रतिभाशाली,

औसत बुद्धि,

मंदबुद्धि  

यह बुद्धि काम न करेगा तो ज्ञान से 

कोई प्रयोजन नहीं।

 बुद्धि बुरे समय में 

  भ्रष्ट हो जाती है।

 बुद्धि और ज्ञान की सफलता विवेक पर निर्भर है।

स्वार्थ निस्वार्थ लोभ, ईर्ष्या क्रोध काम भय  

 कंजूसी त्याग भोग

 जुआ खेलना, शराब पीना, चोरी डकैती

कुली हत्यारे

 इन सब में 

 तटस्थ, न्याय, त्यागी, धर्मी, वीर साहसी,

शुभ चिंतक,

 देशप्रेम 

निस्वार्थ बुद्धि,

 ईश्वरीय भय,

आध्यात्मिक चिंतन 

 आदि श्रेष्ठ ज्ञानियों के कारण अनश्वर संसार में 

 ज्ञान की वृद्धि होते हैं।

 ज्ञानी सुख दुख को समान मानता है।

 संसार के माया मोह से

 दूर रहता है।

 बड़े बड़े ज्ञानी दार्शनिक आज भी दूर ही रहते हैं।

माया/शैतान/शनि के प्रभाव से केवल आत्मज्ञानी ही बचता है।

 ज्ञान  की यात्रा

 ऋषियों मुनियों ने

ध्यान तपस्या योग साधना से पाते हैं।

आदि शंकराचार्य घुमक्कड़ रहे।

 सिद्धार्थ को तपस्या के बल पर मिले।

 रैदास  का ज्ञान भक्ति से,

 कबीर का ज्ञान सत्संग से

 एकलव्य की क्षमता निरंतर अभ्यास से,

आजकल अंतर्जाल संगणिक काफ़ी

  ज्ञान देते हैं।

बुद्धि और विवेक से काम करना है।

तभी ज्ञान का सही उपयोग है।



आपकी रचना का विषय व्यापक और चिंतनशील है। आपने ज्ञान के अनेक स्रोत—अध्ययन, अनुभव, सत्संग, गुरु, अभ्यास, भक्ति, तपस्या और आधुनिक तकनीक—को एक साथ जोड़ने का अच्छा प्रयास किया है। भाषा में कुछ स्थानों पर प्रवाह और व्याकरण सुधारने से रचना और प्रभावशाली बन सकती है।

संशोधित रूप:

ज्ञान की यात्रा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

29-6-2026

ज्ञान की यात्रा,

संपूर्ण ज्ञान,

आत्मज्ञान,

आध्यात्मिक ज्ञान,

अखंड बोध।

ज्ञान मिलता है

अध्ययन से,

अनुभव से,

सत्संग से,

गुरु के मार्गदर्शन से,

और निरंतर अभ्यास से।

"करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।"

बुद्धि जन्मजात होती है।

कोई प्रतिभाशाली,

कोई औसत,

कोई मंदबुद्धि होता है।

पर यदि बुद्धि का सदुपयोग न हो,

तो ज्ञान भी निष्फल हो जाता है।

बुरे समय में

बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है।

ज्ञान की सफलता

विवेक पर निर्भर करती है।

स्वार्थ, लोभ, ईर्ष्या,

क्रोध, भय और मोह से ऊपर उठकर,

त्याग, न्याय, धर्म, साहस,

देशप्रेम, निस्वार्थ सेवा

और ईश्वर-भक्ति का मार्ग अपनाना ही

सच्चे ज्ञान की पहचान है।

ज्ञानी

सुख-दुःख को समान मानता है,

माया-मोह से दूर रहता है।

ऋषि-मुनियों ने

ध्यान, तप, योग और साधना से

आत्मज्ञान प्राप्त किया।

Adi Shankaracharya ने भारत-भ्रमण कर ज्ञान का प्रचार किया।

Gautama Buddha को तप और ध्यान से बोध प्राप्त हुआ।

Ravidas ने भक्ति का मार्ग अपनाया।

Kabir ने सत्संग और अनुभव से सत्य का संदेश दिया।

Ekalavya ने निरंतर अभ्यास से अद्भुत क्षमता प्राप्त की।

आज अंतर्जाल और संगणक भी

ज्ञान के महत्वपूर्ण साधन हैं,

किन्तु ज्ञान तभी सार्थक है

जब उसका उपयोग

बुद्धि और विवेक के साथ किया जाए।

ज्ञान की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती;

सीखते रहना ही जीवन का सच्चा पथ है।

विशेष टिप्पणी: आपकी रचना में विचारों की समृद्धि है। यदि प्रत्येक पद्य में 2–4 पंक्तियों का संतुलन रखा जाए और कुछ स्थानों पर शब्दों की पुनरावृत्ति कम की जाए, तो यह कविता प्रतियोगिता के लिए और भी प्रभावशाली बन सकती है।

Saturday, June 27, 2026

नानी का घर

 नानी का घर 

एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

28-6-26.

---+----+++++

नाना नानी मामा के

 प्यार का केंद्र।

बचपन में मेरी इच्छाएँ

मेरी माँगें सब पूरी होती ।

नानी  मेरे आध्यात्मिक ज्ञान का आधार।

नाना मेरे शिक्षक।

 मामा मेरे आर्थिक सहायक।।

मैं नानी की देखरेख में पला।

मेरी हर कदम की प्रगति में मामा ही प्रधान।

मामाने साइकिल चलाना सिखाया।

मैं नानी को ही अम्मा बुलाया करता।

माँ को उसके नाम से

ही पुकारा करता जैसे 

 मामा बुलाया करते।

प्रेम मिला।

 आदर्श गुण मिले।

जीवन  की हर प्रगति में 

 नाना नानी मामा के साथ।

 उनके ऋण कभी चुका न पाता।

+++++++++++


आपकी रचना भावपूर्ण है और नाना-नानी व मामाओं के प्रति आपकी कृतज्ञता स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है। भाषा को थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण बनाकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

नानी का घर

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

28-6-2026

नाना-नानी, मामाओं के

प्यार का था वह केंद्र।

बचपन की मेरी हर इच्छा,

हर माँग पूरी होती थी।

नानी थीं

मेरे आध्यात्मिक ज्ञान की आधारशिला।

नाना थे

मेरे प्रथम शिक्षक।

मामा बने

मेरे आर्थिक सहायक।

मैं नानी की गोद में पला,

उनकी ममता में बड़ा हुआ।

जीवन के हर कदम पर

मामाओं का ही साथ मिला।

उन्होंने ही मुझे

साइकिल चलाना सिखाया।

मैं नानी को ही

"अम्मा" कहकर पुकारता था,

और अपनी माँ को

उन्हीं के नाम से पुकारता,

जैसे मामा पुकारते थे।

उनसे मिला प्रेम,

संस्कार और आदर्श।

मेरे जीवन की हर प्रगति में

नाना, नानी और मामाओं का

अमूल्य योगदान रहा।

उनका यह ऋण

मैं जीवन भर

कभी नहीं चुका पाऊँगा।

यह समापन आपकी कृतज्ञता को और अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।

Friday, June 26, 2026

मेरी अमिट चिंता

 मेरी पत्नी मरना नहीं चाहती।

इलाज गलत डाक्टर के यहाँ

 डाक्टर पर विश्वास है ही नहीं 

 पर विधि की विडंबना 

 नालायक डाक्टर के साथ फँसना पड़ा।

 दिलासा दे सकता हूँ,

 अपने आप को

 उसके अंत का समय मनुष्य के‌ वश में नहीं।

पर मेरा अपना दुख,

अनेक कारण होते हैं,

क्या मैंने इलाज में कमी रखी है?

 मेरे व्यवहार  चोट की है?

उसके अंतिम शब्द 

 मैं नालायक।

 मेरे शब्द में कटुकशब्द।

 अंतिम घड़ी में मेरे स्वर सुनना पसन्द नहीं किया।

 पास जाने पर पसंद नहीं किया।

 उसकी अस्पष्ट बातें,इशारे समझ न सका।

 दुखी थी  कि पति मेरी बात समझ न सके।

उसके संकेत समझने में असमर्थ था।

अपने मन को चैन नहीं,

न जाने मैं कितने साल जिंदा रहूँगा।

 नयी पीढ़ी के लोग,

 मेरी बातें , मेरे विचार, मेरी सोच,

मेरी ध्वनि सुनने तैयार नहीं।

 मेरी माँगें,

 मेरी ज़रूरतें 

पत्नी जानती थी।

 पूरी करती थी।

उससे कहने की ज़रूरतें नहीं।

आवश्यकता जानकर   पूरी करती थी।

 कहने पूछने की आवश्यकता नहीं।

 अब माँगने कहने पर भी सुनने कोई नहीं।

अब दिवंगत पत्नी की आत्मा से

निवेदन है कि मेरे चलते फिरते 

रहने की शक्ति दें और नींद ही में 

मेरे प्राण पखेरू उड़ सके।








 






 

 



 









Thursday, June 25, 2026

मधु निषेधक दिवस

 



राजश्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 


एक दिवसीय काव्य प्रतियोगिता 


विधा --अपनी हिंदी,अपने‌ विचार,


अपनी शैली भावाभिव्यक्ति।


शीर्षक --विश्व मधु निषेधक दिवस।


दिनांक -26-6-26


+++++++++++++++


 भारत में एक ही दिवस 


 साल में एक बार 


 स्वर्गीय पुर्वजों के लिए।


 पाश्चात्य प्रभाव 


 एक दिन मनाकर 


 जिसके लिए मनाते हैं 


 उसका पार्टी मनाना।


 एक विश्व मधु निषेधक दिवस 


 दिखावे के लिए,नाम मात्र के लिए।


सरकार चाहती है


 आमदनी के लिए 


 मधुशाला आवश्यक है।


  तमिलनाडु के भूतपूर्व 


 मुख्यमंत्रियों के शराब कारखाने  11.


त्योहारों के दिन 


 अमुक करोड़ रूपयों की बिक्री की योजना।


 सजी धजी  आकर्षक दूकानें 


 स्वागत करते हैं रात ग्यारह बजे तक।


 छोटे अक्षरों में लिखा है


 मधु पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक।


परिवार के लिए  हानिकारक।


एक दिवस मनाकर 


 फिर सरकार द्वारा 


दूकान खोलना।


 यह दिवस मनाना बेकार।


 हानिकारक है तो


 कारखाना बंद करना 


दूकाने न खोलना


 सरकार का काम।


 वह निज लाभ के लिए 


 दूकानें खोलकर 


 मधु निदेशक प्रचार,


विश्व मधु निषेधक दिवस


 मनाना दिखावे के लिए।


जैसे सत्तर साल से हिंदी दिवस मनाना।


 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


आपकी रचना में सामाजिक विडंबना और व्यवस्था पर प्रश्न उठाने का स्पष्ट भाव है। यदि इसे काव्य प्रतियोगिता के लिए थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली बनाया जाए, तो यह इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है:

विश्व मधु निषेधक दिवस

भारत में एक ही दिवस,

साल में एक बार,

स्वर्गीय पूर्वजों के नाम

श्रद्धा का होता व्यवहार।

पाश्चात्य प्रभाव में आकर,

एक दिवस हम मनाते हैं,

जिनके हित की बात करें,

उन्हीं को फिर भूल जाते हैं।

विश्व मधु निषेधक दिवस,

नाम मात्र का आयोजन है,

दिखावे की इस परंपरा में

कहाँ वास्तविक चिंतन है?

सरकार कहती—

राजस्व के लिए मधुशाला आवश्यक है,

त्योहारों पर करोड़ों की बिक्री

मानो उपलब्धि विशेष है।

सजी-धजी आकर्षक दुकानें,

रात ग्यारह बजे तक खुली रहती हैं,

छोटे अक्षरों में लिख देती हैं—

"मदिरापान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है,

परिवार के लिए भी घातक है।"

यदि सचमुच हानिकारक है,

तो कारखाने क्यों चलते हैं?

मदिरा की दुकानें क्यों

हर गली-मोहल्ले में पलते हैं?

एक दिवस निषेध का संदेश,

शेष वर्ष उसका प्रचार;

यह कैसी नीति, कैसा न्याय,

कैसा यह विरोधाभास अपार?

जनहित यदि सर्वोपरि है,

तो ठोस कदम उठाना होगा;

केवल दिवस मनाने से नहीं,

व्यसन-मुक्त समाज बनाना होगा।

— एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक

राजश्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 

एक दिवसीय काव्य प्रतियोगिता 

विधा --अपनी हिंदी,अपने‌ विचार,

अपनी शैली भावाभिव्यक्ति।

शीर्षक --विश्व मधु निषेधक दिवस।

दिनांक -26-6-26

+++++++++++++++

 भारत में एक ही दिवस 

 साल में एक बार 

 स्वर्गीय पुर्वजों के लिए।

 पाश्चात्य प्रभाव 

 एक दिन मनाकर 

 जिसके लिए मनाते हैं 

 उसका पार्टी मनाना।

 एक विश्व मधु निषेधक दिवस 

 दिखावे के लिए,नाम मात्र के लिए।

सरकार चाहती है

 आमदनी के लिए 

 मधुशाला आवश्यक है।

  तमिलनाडु के भूतपूर्व 

 मुख्यमंत्रियों के शराब कारखाने  11.

त्योहारों के दिन 

 अमुक करोड़ रूपयों की बिक्री की योजना।

 सजी धजी  आकर्षक दूकानें 

 स्वागत करते हैं रात ग्यारह बजे तक।

 छोटे अक्षरों में लिखा है

 मधु पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक।

परिवार के लिए  हानिकारक।

एक दिवस मनाकर 

 फिर सरकार द्वारा 

दूकान खोलना।

 यह दिवस मनाना बेकार।

 हानिकारक है तो

 कारखाना बंद करना 

दूकाने न खोलना

 सरकार का काम।

 वह निज लाभ के लिए 

 दूकानें खोलकर 

 मधु निदेशक प्रचार,

विश्व मधु निषेधक दिवस

 मनाना दिखावे के लिए।

जैसे सत्तर साल से हिंदी दिवस मनाना।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

वृक्षारोपण

 आपकी रचना का विषय अत्यंत सामयिक और जन-जागरण से जुड़ा है। आपने वृक्षारोपण के महत्व, पर्यावरण संरक्षण और मानव जीवन में पेड़ों की उपयोगिता को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। यदि इसे थोड़ा काव्यात्मक और प्रवाहपूर्ण बनाया जाए, तो प्रभाव और बढ़ जाएगा।

संशोधित रूप:

वृक्षारोपण

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

26-06-2026

मानव का ज्ञान बढ़ता जाता,

शिक्षा का विस्तार होता है।

जनसंख्या के बढ़ते बोझ से,

धरती का श्रृंगार खोता है।

कारखाने, ऊँची इमारतें,

नगरों का विस्तार निराला।

जंगल कटते, झीलें मिटतीं,

प्रकृति ने संकट है पाला।

बढ़ता ताप, प्रदूषित जल,

दूषित होती जाती वायु।

मिट्टी का कटाव बढ़ा है,

प्रकृति दिखलाती है दाय।

इन संकटों से बचना है तो,

आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ।

हरियाली से धरती महके,

जीवन में खुशियाँ भर जाएँ।

पेड़ हमें ऑक्सीजन देते,

फल, छाया और शुद्ध हवाएँ।

नीम, वट, आम, इमली, अमरूद,

स्वास्थ्य और सुख साथ में लाएँ।

जंगल होंगे तो पशु-पक्षी,

पाएँगे अपना सुरक्षित घर।

वृक्ष बचेंगे, जीवन बचेगा,

यही हमारा हो संकल्प अमर।

संदेश:

"एक वृक्ष सौ सुख देता है; आइए, आज एक पौधा लगाकर आने वाली पीढ़ियों को हरित भविष्य दें।"

यह संस्करण आपकी मूल भावना को बनाए रखते हुए भाषा, प्रवाह और काव्यात्मकता को अधिक प्रभावशाली बनाता है।

Wednesday, June 24, 2026

किसान की थाली

 

किसान की थाली।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

25-6-26.

++++++++

किसान विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता।

विश्व भर के लोगों की थालियों में 

 उनके परिश्रम से

 उपजी चावल,गेहूँ, सब्जी और दाल आदि के संग्रह भोजन।

 पर उसकी थाली में 

 बासी भात, प्याज, हरी मिर्च। सूखी रोटियाँ।

 किसान की थाली कुछ प्रांतीय सरकार द्वारा 

किसानों को पौष्टिक आहार देने के लिए,

दस रुपये में दी जाती है।

 किसानों की थाली न तो

लोग भूखों मर जाते।

कारखानों की कमाई,

पैसे, खानों के सोने चाँदी, हीरे की थालियाँ

भूख नहीं मिटा सकती।

मैदान टच एक अंग्रेज़ी कहानी है।

लोभी मैथास ने भगवान से वर पाया कि

जिसको भी वह स्पर्श करें,

 वे सब के सब

 सोना बन जाएँ।

वर प्राप्त वह दुलारी 

को छुआ  वह सोनै की मूर्ति बन गई।

यों ही सब के सब सोना बना।

 भूख लगी तो भोजन खाने उठाया तो वह सोना बन गये।

सोने के ढेर,

पर भूख न मिटा सका।

 किसान की थाली से ही

 विश्व को पौष्टिक आहार।

करोड़ों रुपए कर्जा लेकर 

 विदेशी नागरिक बननेवाले उद्योग पति ।

पर पाँच हज़ार कर्जा लेकर न चुकाने पर कठोर कार्रवाई।

किसानों की थाली से

 पेट भरती है दुनिया।

 पर  वह है ग़रीबी में।

दरिद्रता के कारण आत्महत्याएँ।

ज़रा ध्यान रखना है

 शास्त्री जीने नारा दिया 

जय किसान, जय जवान।

 किसानों को 

प्रोत्साहित करना है,

 वह कर्जा न चुका सकें

तो माफ़ करना है।

कठोर कार्रवाई लेकर 

 आत्महत्या तक पहुंचाना

 भविष्य की पीढ़ियों को

 किसान की थाली के बगैर भूखा प्यासा  मरना पड़ेगा।

 किसान के परिश्रम से ही संग्रह भोजन की थाली।

 जय किसान ।

 विष्णु भगवान ने नारद के पूछने पर कहा,

 मेरा श्रेष्ठ भक्त किसान।

तेरे जैसे नाम रटनेवाला भक्त नहीं।

 परिश्रमी है प्रत्यक्ष अन्नदाता।





आपकी रचना “किसान की थाली” किसान के श्रम, उसकी विडम्बना और समाज की निर्भरता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। आपने यह महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि जो व्यक्ति पूरी दुनिया का पेट भरता है, वही अनेक बार अभाव और कर्ज़ के बोझ में जीवन बिताता है।

रचना की विशेषताएँ:

किसान को "प्रत्यक्ष अन्नदाता" कहकर उसके महत्व को स्पष्ट किया है।

लोभी राजा मिडास (Midas) की कथा के माध्यम से यह बताया है कि सोना-चाँदी भूख नहीं मिटा सकते, भोजन ही जीवन का आधार है।

किसानों की आर्थिक कठिनाइयों और आत्महत्याओं जैसी गंभीर समस्याओं पर संवेदनशीलता से प्रकाश डाला है।

"जय किसान, जय जवान" के माध्यम से किसानों के सम्मान और संरक्षण का संदेश दिया है।

अंत में किसान को भगवान का श्रेष्ठ भक्त बताकर श्रम की महत्ता को रेखांकित किया है।

यदि भाषा को थोड़ा परिष्कृत किया जाए, तो कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार और प्रभावी बन सकती हैं:

किसान की थाली

विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता किसान,

भरता सबकी भोजन थाली।

चावल, गेहूँ, दाल, सब्जियाँ,

उसके श्रम की अमूल्य लाली।

पर उसकी अपनी थाली में,

बासी भात, प्याज़ और रोटी।

दुनिया का पेट भरने वाला,

क्यों सहता है ऐसी खोटी?

सोने-चाँदी के ढेर लगे हों,

भूख कभी उनसे मिटती नहीं।

किसान की मेहनत के बिन तो,

जीवन की गाड़ी चलती नहीं।

आपकी रचना का मूल भाव अत्यंत मानवीय और सामाजिक चेतना से भरपूर है। विशेषकर यह पंक्ति बहुत प्रभावशाली है:

"किसानों की थाली से पेट भरती है दुनिया, पर वह है गरीबी में।"

यह पूरी रचना का सार प्रस्तुत कर देती है।

जय किसान!

अन्नदाता के श्रम, सम्मान और कल्याण का संदेश देने वाली आपकी यह रचना सराहनीय है। 🌾🙏

Sunday, June 21, 2026

पिता जी

 पिता का मौन त्याग।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-6-26

+++++++

पिता

दो सूक्ष्म 

बिंदु के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर,

तभी  मौन त्याग।

माता को प्रधानता।

लक्ष्मी न तो पालन पोषण कैसे?

वीर जवान  सरहद पर

 देश प्रधान मौन त्याग।

छुट्टी में आना,

 पुत्र या पुत्री  को

 माता के कहने पर  ही पिता का पता लगता।

 विदेश में काम,

 पैसे भेजने का यंत्र।

अलमारियों में 

माता की साडियाँ।

आभूषणों का ढेर।

 बच्चों  की शिक्षा दीक्षा।

 बच्चे  सद्यःफल के कारण माता का महत्व।

बड़ा  मौन त्याग है 

पिता का त्याग।

 वे है घर की रीढ़ की हड्डी।

 पिता न तो सीधे  परिवार खड़ा रहना असंभव।

 पिता सबेरे 

नौकरी के लिए जाते 

शामको  लौटते।

 आते ही अनुशासन 

पढ़ाई पर बोलते।

 अनावश्यक 

 बाह्याडंबर खर्च

 रोकने की बात करते।

 तमिल में कहते हैं 

 संतानों को ज्ञान देना

 पिता का कर्तव्य है।

 अपनी जरूरतों को कम करके  परिवार बहन भाइयों को देते पिताजी।

 उनका मौन त्याग 

 अद्भुत।

अतुलनीय प्रेम,

 पिता का मौन त्याग।

 आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना "पिता का मौन त्याग" पिता के निःस्वार्थ समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और मौन प्रेम को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। आपने यह दर्शाया है कि पिता प्रायः परिवार के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं, किन्तु उनके त्याग की चर्चा कम होती है।

कुछ पंक्तियों को थोड़ा परिष्कृत रूप देकर रचना को और अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है:

पिता का मौन त्याग

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

पिता,

दो सूक्ष्म बिंदुओं के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर

करते हैं मौन त्याग।

माता का महत्व महान है,

किन्तु पिता के श्रम बिना

पालन-पोषण कैसे हो?

वीर जवान सरहद पर,

देश हेतु करता मौन त्याग।

विदेशों में काम करते पिता,

परिवार के लिए धन भेजते हैं।

अलमारियों में सजी साड़ियाँ,

आभूषणों का ढेर,

बच्चों की शिक्षा-दीक्षा—

इन सबके पीछे

पिता का मौन परिश्रम है।

वे घर की रीढ़ हैं,

उनके बिना परिवार का

सीधा खड़ा रहना कठिन है।

प्रातः नौकरी पर जाना,

संध्या को लौट आना,

आते ही बच्चों को

अनुशासन और पढ़ाई का पाठ पढ़ाना।

अपनी आवश्यकताओं को घटाकर,

परिवार और संतानों के लिए जीना—

यही है पिता का अद्भुत त्याग।

अतुलनीय है उनका प्रेम,

अद्भुत है उनका समर्पण,

वंदनीय है

पिता का मौन त्याग।

रचना का भाव अत्यंत सुंदर है। विशेष रूप से "वे घर की रीढ़ की हड्डी हैं" और "अपनी जरूरतों को कम करके परिवार को देना" जैसे भाव पाठक के हृदय को स्पर्श करते हैं।

हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌹

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

 



अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

21-6-26

++++++++++

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है, जिसका अर्थ है— "शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है।"

 तमिल में कहावत है,

 दीवार रहने पर ही चित्र खीँच सकते हैं ।

निर्बल काया,

 क्रिया हीन।

 कान सही नहीं है तो

 सुनना असंभव।

आँखें खराब है तो 

देख  नहीं सकते।

 फेफड़ा, पेट,अंतडियाँ

नशें, रीढ़ की हड्डी,

हाथ पैर हर अंग को

स्वस्थ रखना है।

न तो मानव में 

बुद्धि काम न करेगी।

मन काम न करेगा।

मन चंचल रहेगा।

ठीक तरह से 

काम न कर सकते।

 अतः स्वस्थ शरीर के लिए,

व्यायाम अति मुख्य।

‌व्यायाम की एक रीति

योग प्राणायाम ।

 उसमें हर अंग को 

स्वस्थ रखने,

हर एक की

 अलग-अलग मुद्राएँ।

सूर्य-नमस्कार,

प्राणायाम,

 भ्रामरी,

कपालभाती,

अनेक प्रकार के नियम।।

 भारत में 5000 वर्ष पहले योग शुरू हुआ।

 आध्यात्मिक विचार के अनुसार  पहला योगी,

 आदियोगी शिव।

ईसा से पूर्व 

 तीन हज़ार साल 

 के पहले,

सिंधु घाटी सभ्यता मैं

योग के कुछ निशानियाँ

मिल रही है।

 भारत के स्वास्थ्य 

 प्रद योग,

विदेशी आक्रमण ,

विदेशी शासन,

 विदेशी अंतर्जातीय 

 विवाह, संस्कृत भाषा के स्थान को अंग्रेज़ी लेना

 पाश्चात्य प्रभाव।

 फिर भी योग का अपना

विशिष्ट   महत्व विश्व जानने लगा।

स्वामी विवेकानंद का भाषण सनातन 

पद्धतियों पर  

चार चाँद लगाये।

 विश्व भर में 

 भारतीय आध्यात्मिकताएँ

 जानने समझने की उत्सुकता बढ़ी।

 योग का महत्व बढ़ा।

 योग केंद्र खोलने लगे।

पतंजलि योग क्रिया,

 सहज योगा।

योग की पारंपरिक रीति

 आध्यात्मिक रीति। 

मन से संबंधित।

आधुनिक रीतियाँ

मन और शरीर से संबंधित।

कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग,राज योग,

आसान आधारित

हठ योग, विन्यास योग,

अष्टांगयोग।

अयंगर योग में, कुंडली योग,यिन योग ।

 अब विश्वभर में योग का

महत्व का विकास करने

 अभ्यास करने 

विश्व योग दिवस की योजना  21जून 2015 से  शुरु हुआ।

भारत के विश्वविख्यात 

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में  14सितंबर 2014में विश्व योग दिवस का प्रस्ताव रखा।

इसके बाद 11दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21जून 2015को

 विश्व योग दिवस  मनाने का प्रस्ताव पास किया।

 तब से विश्व भर में 

योग दिवस मनाया जा रहा है।

योग ज्ञानप्रद,शांति प्रद 

 ऊर्जा प्रद , स्थिर चित्त प्रद एक स्वास्थ्य आनंद कला है।


आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में योग के इतिहास, महत्व और विश्व योग दिवस की पृष्ठभूमि का सुंदर समावेश है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर कुछ पंक्तियों को अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है। विशेष रूप से अंतिम अनुच्छेद बहुत प्रभावशाली है।

विशेष रूप से सराहनीय पंक्तियाँ:

"शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है।"

"योग ज्ञानप्रद, शान्तिप्रद, ऊर्जाप्रद, स्थिरचित्त प्रद एक स्वास्थ्य-आनन्द कला है।"

विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित एक संक्षिप्त समापन पंक्ति जोड़ सकते हैं—

"आइए, योग को जीवन का अंग बनाकर स्वस्थ तन, प्रसन्न मन और जागृत चेतना की ओर अग्रसर हों।"

आपकी लेखनी समाज को स्वास्थ्य, संस्कृति और आध्यात्मिकता का संदेश दे रही है। साधुवाद।

विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

🙏🕉️🌿

Friday, June 19, 2026

सुनीति संग्रह

 நறுந்தொகை —सुनीति संग्रह – अनुवादक---एस. अनंतकृष्णन, सौहार्द सम्मान  प्राप्त तमीलनाडु चेन्नै का हिंदी प्रेमी प्रचारक 


कवि—अति वीर राम पांडियन 

 युवकों के आवश्यक सुमार्ग दिखानेवाले ग्रंथ .

सुनीति ग्रंथ ।

काल —  सोलहवीं शताब्दी।

 सरल शब्दों के नीति ग्रंथ

+======================



கடவுள்வாழ்த்து –प्रार्थना



 பிரணவப் பொருளாம் பெருந்தகை ஐங்கரன்

 சரண அற்புத மலர் தலைக்கு அணிவோமே .


ஓம் என்னும் பிரணவ மந்திரத்தின் பொருளான விநாயகப் பெருமானின் பாத கமலங்களை வணங்குவோம்


ओम्  के प्रणव मंत्र के भगवान विघ्नेश्वर के चरण कमलों की वंदना करेंगे। 


வெற்றி வேற்கை வீர ராமன்

 கொற்கையாளி குலசேகரன் புகல் 

நற்றமிழ் தெரிந்த நறுந்தொகை

 தன்னால் குற்றம் களைவோர் குறைவிலாதவரே.

 

कोट्रै नगर के अधिपति,

कुल के मुकुठाधिपति अति वीर पांडिय के सुनीति वचनों का संग्रह .इस सुग्रंथ को जानकर अपने दोषों को मिटाने वालों के जीवन में कोई कमी न रहेगी। 


सभी सुखों को पाकर जीवन में सुखी जीवन बिताना चाहिए।


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ग्रंथ

—------

1. अक्षर ज्ञान दाता दिव्य गुणवान  है।


२. शिक्षा की विशेषता दोषरहित स्पष्ट बोलना है। 

3. धनियों  की विशेषता अपने नाते-रिश्तों के दुख के समय उचित सहायता देकर साथ देना है।

4. ब्राह्‌मणों की विशिष्टता अनुशासन सदाचार के साथ वेद पढना। 

5. राजाओं की विशिष्टता न्याय पूर्ण शासन करना। 

६. व्यापारियों की विशेषता ईमानदारी से धन कमाना

7. किसानों की विशेषता खाद्यान्न का उत्पन्न करना और खाना 

8. मंत्रियों की विशेषता दूरदर्शी होना।

 9. सेनापति की विशेषता धीर वीर साहसी निर्भय दिल।

10. भोजन की शोभा अतिथियों और मेहमानों के साथ खाना।

11. स्त्रियों की विशेषता विवाद प्रतिवाद न करना। 

12.गृह्स्थिनी की शोभा पति की सेवा करना । 

13. व्यभिचारी की शोभा शरीर की चमक।

14.विनम्रता ज्ञानियों की शोभा।

15.दरिद्रों की शोभा गरीबी में श्रेष्ठता।

 16 .ताड के पेड  फल देकर उसके बीज उगने पर ऊँचा होता है, पर छाया नहीं दे सकता।

17. बरगद के बीज अति लघु होने पर भी वह उगकर बहुत बडे पेड होने के बाद उसकी छाया में बडे हाथी, घोडे,रथ,बडी पैदल सेना आदि के साथ राजा भी ठहर सकते हैं। 

18.बाह्य आकार, सुंदर बाह्य रूप के लोग बडे मनुष्य नहीं है। 

19.छोटे रूप,बाह्याडंबर  रहित सीधे सादे लोग वास्तव में छोटे नहीं है।

20. बच्चे सब अच्छे नाम न लेंगे। 

21 .सभी नाते-रिश्ते सच्चे रिश्ते नहीं है। 

22. वैवाहिक पत्नी सब प्यारी पत्नी नहीं है।

23.जितना भी दूध गरम करो, गाय के दूध का स्वाद कम न होगा।

24. आग में तपाने पर भी  सोने की सुगंध न बदलेगी।

25. पीसने पर भी चंदन की खुशबू नहीं बदलेगी। 

26. आग में डालकर अगर लकड़ी को जलाने पर भी सुगंध के धुएँ ही निकलेगा।

27. समुद्र मंथन करने पर भी कीचड़ नहीं होगा, साफ़ रहेगा। 

28. दूध से मिलाकर  कड़वी लौकी पकाने पर भी उसकी कड़ुआहट दूर न होगी।

29.अनेक सुगंधित वस्तुएँ मिलाकर पकाने पर भी लहसून की बदबू न मिटेगी।

30. स्वयं के कर्म  पर निर्भर है  श्रेष्ठता और निम्नता।नाम या बदनाम।

31.छोटों की गलतियों और अपराधों का सहना बड़ों का कर्तव्य है। 

32. छोटे लोगों के बडे बडे अपराधों को सहना बडे लोगों के लिए दुर्लभ है। 

33. मूर्खों की मित्रता भले ही सैकडों साल हो वह समुद्री शैवाल जैसे जड न पकडेगा। 

34.  बडे सज्जनों की मित्रता भूमि फा़डकर जड पकडेगी। 

35. भीख माँगकर याचना करके अध्ययन करना अच्छी बात है।

तमिल का ज्यों त्यों अनुवाद —

सीखना अच्छा है,सीखना अच्छा है,भीख माँगकर भी सीखना अच्छा है।


  36.  अनपढ़ लौगों को अपनी कुल श्रेष्ठता बोलना धान के भूसों के समान बेकार है।


37. ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि चार वर्णों में शिक्षित ही श्रेष्ठ है। अशिक्षित होने पर वह निम्न ही है। 

38.कुल जो भी हो,उच्च कुल हो या निम्न ,उनमें शिक्षितों को ही आदर-सत्कार और स्वागत करेंगे।

39.ज्ञानी को राजा भी चाहेगा। 


40. हाथियों की सूँड लंबे होने पर भी उन में दानशीलता नहीं है। 


41.बिल्ली में नहीं है तपस्या और दया। 


42.ज्ञानी को नहीं है सुख और दुख।


43.दीमक को नहीं अमीरी गरीबी का फरक।

Thursday, June 18, 2026

 எனது மனைவியின் இறுதிச்சடங்கு 

ஞாயிறு 21-6-26.


Body will be in the house from Saturday 9 pm to Sunday 

7- 9.30 AM.



A3, Archana Usha square Kubernagar4th cross street Extension Madippakkam Velachery.

 Map. 

Mention Sarvasiddeesvar temple.

Rahmania mosque.

 Puzithivakkam crematorium.

मेरे प्राण

  कहाँ है? कैसे हैं?

दुख के समय मेरी याद।

यही सच्ची दोस्ती। 


आदरणीय,

आपकी पीड़ा शब्दों में स्पष्ट झलक रही है। 51 वर्षों का साथ केवल वैवाहिक संबंध नहीं होता, वह जीवन की पूरी यात्रा होती है। जो अर्धांगिनी माता, सेविका, सखी, चिकित्सक और सच्चे प्रेम की मूर्ति बनकर जीवन भर साथ रही हो, उसके वियोग का दुःख अत्यंत गहरा होता है।

आपकी भावनाओं को सम्मान देते हुए इन्हें काव्य रूप में इस प्रकार संजोया जा सकता है—

मेरे प्राण के प्राण

एस. अनंतकृष्णन

खेल की बात नहीं है,

मेरी जान थी वह।

इक्यावन वर्षों तक

अर्धांगिनी बनकर,

माता के रूप में,

पत्नी के रूप में,

रोगी की सेविका,

जीवन की चिकित्सक बनकर

साथ निभाती रही।

सहनशील, गुणवान,

त्याग और प्रेम की प्रतिमूर्ति।

पति की सेवा और स्नेह के सिवा

और कोई चाह न रखने वाली,

एक आदर्श नारी।

यथार्थ प्रेम क्या होता है,

उसने अपने जीवन से सिखाया।

आज मेरे प्राणों के प्राण,

पंख लगाकर उड़ गए।

क्या करूँ?

आज ज्ञात हुआ—

दूसरों को दिलासा देना

कितना सरल है,

पर अपने ही हृदय को समझाना

अत्यंत कठिन।

आपके शोक में मैं सहभागी हूँ। अभी दुःख का गहरा होना स्वाभाविक है। 51 वर्षों का प्रेम समाप्त नहीं हुआ है; उसकी स्मृतियाँ, संस्कार और स्नेह आपके जीवन का हिस्सा बने रहेंगे।

ईश्वर आपकी धर्मपत्नी की पुण्य आत्मा को शांति प्रदान करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏🌹

[18/06, 3:52 pm] sanantha.50@gmail.com: नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना "बेनकाब चेहरे" मानव मनोविज्ञान और चेहरे के भावों के माध्यम से अंतर्मन की अभिव्यक्ति को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है। तमिल लोकोक्ति का समावेश रचना को विशेष प्रभाव देता है।

कुछ पंक्तियों को काव्यात्मक प्रवाह के लिए इस प्रकार सँवारा जा सकता है:

बेनकाब चेहरे

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

18-6-26

Face is the index of the mind।

"अगत्तिन अऴगु मुखत्तिल तेरियुम्" — तमिल लोकोक्ति।

अंतर्मन की बातें,

चेहरे पर झलक जाती हैं।

हर्ष हो या विषाद,

प्यार हो या नफ़रत,

ईर्ष्या हो या भय,

आँखों की एक झलक में

सब कुछ प्रकट हो जाता है।

बेनकाब चेहरे-मोहरे,

कुदरत की अनमोल देन हैं।

रोगी का चेहरा,

स्वस्थ जन का चेहरा,

चोर की निगाहें,

सज्जन की आँखें।

पहचान का आधार भी

चेहरा और आँखें ही हैं।

धनवान हो या निर्धन,

साहसी हो या कायर,

मन के अनेक रहस्य

ये चेहरे खोल देते हैं।

भावार्थ:

मनुष्य चाहे शब्दों से कुछ भी छिपाने का प्रयास करे, किंतु उसके चेहरे और आँखों के भाव अक्सर उसके मन की वास्तविक स्थिति को प्रकट कर देते हैं।

बहुत सुंदर एवं चिंतनशील रचना। आपकी लेखनी इसी प्रकार हिंदी सेवा और काव्य साधना को समृद्ध करती रहे।

सादर शुभकामनाएँ। 🙏🌹

Tuesday, June 16, 2026

रक्त दान दिवस

 




दैनिक चुनौती।

विश्व रक्तदान दिवस 

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै 

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

17-6-26.

+++++++++++

 भारत भूमि पुण्य भूमि।

 सनातन दान  है

 अन्न दान, भू दान, रक्तदान, स्वर्ण दान, चाँदी दान, कन्यादान,

राष्ट्र को बचाने प्राण दान।

समय की माँग,

 वैज्ञानिक युग में 

 चिकित्सा क्षेत्र में 

 अंगों  के दान, 

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय, अग्न्याशय और छोटी आंत। जीवित रहते हुए भी एक किडनी या लिवर का एक हिस्सा दान किया जा सकता है।


हृदय दान, नेत्रदान  मृत्यु के बाद।


 रक्त दान  

बार बार दे सकते हैं।

 एक व्यक्ति   हर तीन महीने  अर्थात साल में चार बार दे सकते हैं।

दानी की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

दानी का वजन कम से कम 45 किलो होना चाहिए।

रक्तदान के समय दानी  पूरी तरह से स्वस्थ और ऊर्जावान  होना चाहिए।

 पियक्कड़ और रुग्णावस्था में दान नहीं दे सकते।

 रक्त दान  शल्य चिकित्सा के समय,

दुर्घटना में ब्लड की कमी होने पर रक्त की जरूरत है।

  रक्त दान देने 

रक्तदान केंद्र है।

 रक्त दान पाने ,

रक्त दान महत्व समझाने

 शिविर भी चलाते हैं।

सरकार दानियों को पैसे भी देती है।

सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ दान रक्तदान।

 रक्त दान के महत्व समझाने 

 रक्त दान दिवस मनाते हैं।


आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना का भाव अत्यंत प्रेरणादायक है। विषय की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे थोड़ा साहित्यिक एवं प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व रक्तदान दिवस

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

17-06-2026

भारत भूमि पुण्य भूमि है,

दान की महान परंपरा यहाँ की शान है।

अन्नदान, भूदान, रक्तदान,

स्वर्णदान, रजतदान, कन्यादान,

और राष्ट्र रक्षा हेतु प्राणदान।

समय की माँग है कि

वैज्ञानिक युग में चिकित्सा क्षेत्र को

दान की महिमा से सशक्त बनाया जाए।

अंगदान के माध्यम से

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय,

अग्न्याशय तथा छोटी आंत का दान

अनेक जीवनों में नव आशा जगाता है।

जीवित रहते हुए

एक किडनी अथवा लिवर का एक भाग

दान किया जा सकता है।

नेत्रदान और हृदयदान

मृत्यु के पश्चात भी

मानवता की सेवा का माध्यम बनते हैं।

रक्तदान ऐसा महादान है

जो बार-बार किया जा सकता है।

स्वस्थ व्यक्ति प्रत्येक तीन माह में

रक्तदान कर सकता है।

दानी की आयु 18 से 65 वर्ष के बीच

और वजन कम से कम 45 किलोग्राम होना चाहिए।

रक्तदान के समय

दानी पूर्णतः स्वस्थ एवं ऊर्जावान हो।

मद्यपान करने वाले तथा रोगग्रस्त व्यक्ति

रक्तदान नहीं कर सकते।

शल्य चिकित्सा, दुर्घटनाओं तथा

रक्त की कमी से जूझ रहे रोगियों के लिए

रक्त अमूल्य जीवनदाता बनता है।

रक्तदान केंद्र तथा शिविर

जन-जन को इसके महत्व से परिचित कराते हैं।

मानवता की सेवा का यह श्रेष्ठ माध्यम

असंख्य प्राणों की रक्षा करता है।

आइए, हम सब संकल्प लें—

रक्तदान करें, जीवन बचाएँ।

सभी दानों में श्रेष्ठ है रक्तदान,

मानव सेवा का यह महान अभियान।

विश्व रक्तदान दिवस

हमें रक्तदान के महत्व का संदेश देता है

और मानवता के प्रति

अपने कर्तव्य का स्मरण कराता है।

"रक्तदान – महादान,

जीवन रक्षा का महान अभियान।"

सादर। 🙏🩸🌹

माता का ममत्व

 माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।




माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।

नमस्ते वणक्कम्, आदरणीय अनन्तकृष्णन जी।

आपकी रचना में माँ के निस्वार्थ प्रेम, त्याग, ममता, मातृभाषा और मातृभूमि के महत्व का सुंदर चित्रण है। भाव बहुत अच्छे हैं। मैंने आपकी रचना को थोड़ा सुव्यवस्थित और काव्यात्मक रूप देने का प्रयास किया है।

माता का महत्व

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

स्वरचित भावाभिव्यक्ति

+++++++++++++

माँ हमको गर्भकाल में

जीवन का रूप देती है,

अपने आँचल की छाया में

पलने-बढ़ने की सुविधा देती है।

जन्म लेते ही शिशु को

स्तनपान का अमृत मिलता,

पहला शब्द जो मुख से निकले,

वह "माँ" का स्वर ही होता।

माँ के दुलार भरे शब्दों से

मातृभाषा का ज्ञान मिलता,

निस्वार्थ प्रेम और त्याग से

जीवन का सम्मान मिलता।

तन से, मन से, धन से

माँ करती सतत उपकार,

ममता की शीतल छाया में

खिलता जीवन का संसार।

माँ के संस्कारों से ही

वीर और महापुरुष बनते हैं,

जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज को

माता के आदर्श प्रेरित करते हैं।

तमिल की एक सुंदर कहावत है—

"माता जैसी संतान, धागे जैसा कपड़ा",

सुशिक्षित और संस्कारवान माँ से

निखरता शिशु का व्यक्तित्व सारा।





माँ से ही बंधुत्व के रिश्ते,

माँ से ही परिवार की शान,

माँ न हो तो मानव जीवन में

न रहे ममता का सम्मान।

मातृभाषा, मातृभूमि और माता,

जीवन के तीन अनमोल राग,

इनके प्रति श्रद्धा और समर्पण

बनें मानव जीवन का सुहाग।

+++++++++++++

भावार्थ:

माता केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन को संस्कार, भाषा, प्रेम, त्याग और व्यक्तित्व प्रदान करने वाली प्रथम गुरु है। माता, मातृभाषा और मातृभूमि का सम्मान मानव जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य है।

सादर प्रणाम। 🙏

जय माता। जय मातृभूमि। जय मातृभाषा।

Sunday, June 14, 2026

समय यात्रा

 


समय का मुसाफिर 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

15.6.26

**************

मानव समय का मुसाफिर।

मोसम समय का मुसाफिर।

 बचपन एक मुसाफिर 

 लड़कपन एक मुसाफ़िर।

जवानी एक मुसाफिर 

 बुढ़ापा यात्रा का विश्राम 

 मौसमी फूल फल

सूर्य चन्द्र चौबीस घंटों के मुसाफिर।।

 पृथ्वी के सब जीव-जंतु जीवन काल निर्णय।

 अतः भूलोक समय का मुसाफिर।

नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

आपकी रचनाओं में जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन और अनुभूति की गहराई दिखाई देती है। "समय का मुसाफिर" हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन की प्रत्येक अवस्था एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं।

समय चलता रहता है,

जीवन बदलता रहता है।

जो समय का महत्व समझ ले,

उसका जीवन सँवरता रहता है।

आप इसी प्रकार हिंदी सेवा, साहित्य-साधना और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से अपने विचारों का प्रकाश फैलाते रहें।

ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और सृजन की निरंतर प्रेरणा प्रदान करें। आपकी धर्मपत्नी को भी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ मिले, यही मंगलकामना है।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री गणेशाय नमः।

जय श्री राम।

जय हनुमान।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

सादर प्रणाम एवं शुभकामनाएँ।

प्रार्थना

 


नमस्ते वणक्कम्।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ
‌मेरी प्यारी अर्द्धांगिनी मेरी जान
जल्दी स्वस्थ हो जाएँ।
मेरी जाने अनजाने गलतियों को
माफ़ कर दीजिए।
हे भगवान मेरे प्राण उनकी प्रार्थना से बची।
उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।
‌विनम्र निवेदन करता हूँ।
ॐ गणेशाय नमः
ॐ कार्तिकेयाय नमः
ॐ नमः शिवाय
ऊँ दुर्गा मैं नमः।
सत् चित् आनन्द स्वामिये नमः।
सच्चिदानंद स्वामिये नमः
अगस्त्याय नमः
भोगरे नमः
कडुवॆळि सिद्ध पुरुषाय नमः
इडैक्काडरे नमः
पुलिप्पाणिये नमः
अऴुकिनी सिद्ध पुरुषाय नमः
ॐशीरडी साईं नमः
ॐ पुट्टभर्ति स्वामिये नमः
जय जय शंकर हर हर शंकर।
ॐ रमण महर्षिये नमः
ॐ राघवेंद्राय नमः
ॐ शेषाद्रि स्वामिये नमः
ॐ गोरख सिद्ध पुरुषायै नमः
ॐ चिदंबरम स्वामिये नमः
ओम् रेड्डी पट्टी स्वामिये नमः
ॐ बड़े भाई साहब नमः।
ॐ पांबन स्वामिये नमः
ओम् पूंडीमहाने नमः
ओं भृगु मुनि ये नमः
ओं भ्रुंगी मुनिये नमः
ओं ईश्वरभट्टाय नमः
ओं कणक्कण पट्टी स्वामिये नमः
ओं माधूरी स्वामिये नमः
ओं चाक्कडै सिद्धपुरुषाय नमः
अरुट पेरुंज्योति अरुट् पॆरुँज्योति
तनिप्पेरुम् करुणै अरुट् पेरुमल ज्योति ।
ओम् भैरवाय नमः
ओं जय हनुमान।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
ॐॐ ॐॐ ॐॐ ॐॐ



नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपकी प्रार्थना में प्रेम, समर्पण, करुणा और जीवनसाथी के प्रति अटूट निष्ठा झलक रही है। अपनी अर्द्धांगिनी के स्वास्थ्य के लिए आपका हृदय जिस वेदना और श्रद्धा से भगवान के चरणों में झुक रहा है, वह स्वयं एक महान तपस्या है।

ईश्वर से मेरी भी यही प्रार्थना है—

हे गणपति, हे शिवशंकर, हे माता दुर्गा, हे मुरुगन, हे साईंनाथ, हे हनुमान, हे सभी सिद्ध पुरुषों और महापुरुषों!

आपकी कृपा से AK जी की धर्मपत्नी को शक्ति, शांति और स्वास्थ्य प्रदान करें।

उनकी पीड़ा कम हो, श्वास सहज हो, मन में साहस बना रहे और उपचार सफल हो।

परिवार को धैर्य, विश्वास और मानसिक बल दें।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।"

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

आपने लिखा — "उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।"

यह एक पति के प्रेम और कर्तव्य का अत्यंत मार्मिक भाव है। वर्षों तक जो साथ निभाता है, उसकी पीड़ा अपनी पीड़ा बन जाती है। आपकी सेवा, जागरण, चिंता और प्रार्थना भी ईश्वर की दृष्टि में एक पुण्य यज्ञ के समान हैं।

विश्वास बनाए रखिए। चिकित्सा और प्रार्थना दोनों साथ-साथ चलें।

ईश्वर आपकी अर्द्धांगिनी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री सुब्रह्मण्याय नमः।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

हार्दिक शुभकामनाएँ एवं प्रार्थनाएँ।

Saturday, June 13, 2026

पुण्य कलश

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏


पुण्य कलश

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

14-6-26

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मानव तो

सर्वगुण संपन्न 

 ज्ञानी, ब्रह्म सम।

पर  महामायादेवी

ईश्वर का एक अंग,

संसार को माया छाया जगत के रूप में 

बनाते रखने में समर्थ।

अचूक, सद्यःफल दाता।

परिणाम स्वरूप वह

 स्वार्थ निस्वार्थ 

बन जाता है।

 अन्याय का साथ देता है।

दशरथ की भूल,

शब्द भेदी बाण का प्रयोग 

शिशु हत्या पाप।

 राम का दुख

 रावण का बुद्धि भ्रष्ट 

 ये सब  न होने

 आदि काल में वेद उपनिषद और अनेक पुराण, प्रासांगिक कथाएँ।

पापों से मुक्ति पाने 

 हवन होम पुण्य कलश का महत्व।

 पुण्य कलश  सकारात्मक ऊर्जा,

 कलश में त्रिदेव और देवियों की उपस्थिति 

 सद्विचारों का स्रोत।

 दान धर्म का महत्व।

 परोपकार्थ

 इदम् शरीरम् की सीख।

 पापों की मुक्ति के लिए 

भूदान स्वर्ण दान चाँदीदान।

  जगत मिथ्या

 ब्रह्म सत्यं।

नश्वर दुनिया 

 अनश्वर सत्य प्रभाव।

 अनश्वर सूक्ष्म शक्ति

 परिणाम 

 अखिलेश्वर की अनंत शक्ति।

 पुण्य कर्म का फल,

 पाप कर्म का दंड।

 मानव  लौकिक 

 बंधन से छूटता नहीँ।

अतः जन्म पुनर्जन्म 

 सुखी दुखी का अनुभव।।

इन सब से छूटकर 

 दिव्य शक्ति सद्बुद्धि 

 आत्मसंतोष, 

आत्मज्ञान पाने,

पुण्य कलश की स्थापना

 फिर भी ज्ञान चक्षु प्राप्त मानव अपने अस्थाई जीवन को स्थाई मानकर 

 नकारात्मक विचार में।

 यही संसार है के दुःखों का मूल।

 पुण्य कलश की स्थापना 

आदर्श परोपकार जीवन कै लिए।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई


आपकी रचना में आध्यात्मिक चिंतन, कर्मफल, माया, दान, परोपकार तथा पुण्य कलश के प्रतीकात्मक महत्व का सुंदर समावेश है। भाव अत्यंत गहन हैं। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहमय रूप देने का एक विनम्र प्रयास प्रस्तुत है।

पुण्य कलश

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

14-6-2026

मानव तो

सर्वगुण-संपन्न,

ज्ञानी, ब्रह्म के समान है।

पर महामायादेवी,

ईश्वर की ही एक शक्ति,

इस संसार को

माया-छाया जगत के रूप में

संचालित करने में समर्थ है।

वह अचूक,

सद्यःफलदायिनी है।

उसके प्रभाव से मानव

स्वार्थी भी बन जाता है,

तो कभी निस्वार्थ भी।

कभी अन्याय का साथ देता है,

कभी धर्म के पथ पर चलता है।

दशरथ की भूल,

शब्दभेदी बाण का प्रयोग,

श्रवण कुमार के वध का पाप;

राम का दुःख,

रावण की बुद्धि का भ्रष्ट होना—

इन सब घटनाओं में

कर्मफल का संदेश छिपा है।

इसीलिए आदि काल से

वेद, उपनिषद, पुराण

और अनेक प्रेरक कथाएँ

मानव को सत्कर्म का मार्ग दिखाती हैं।

पापों से मुक्ति हेतु

हवन, होम और पुण्य कलश का

विशेष महत्व बताया गया है।

पुण्य कलश

सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

मान्यता है कि उसमें

त्रिदेव तथा देवियों का वास होता है।

वह सद्विचारों का स्रोत है,

दान और धर्म का प्रेरक है,

और सिखाता है—

"परोपकारार्थम् इदं शरीरम्"

अर्थात यह शरीर

परोपकार के लिए है।

भूदान, स्वर्णदान, चाँदीदान

और सेवा के विविध रूप

मानव को पुण्य के मार्ग पर ले जाते हैं।

जगत मिथ्या है,

ब्रह्म ही सत्य है।

यह संसार नश्वर है,

पर सत्य और दिव्य शक्ति अमर हैं।

पुण्य कर्म का फल मिलता है,

पाप कर्म का दंड भी।

फिर भी मानव

लौकिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता।

अतः जन्म-पुनर्जन्म के चक्र में

सुख-दुःख का अनुभव करता रहता है।

इन बंधनों से ऊपर उठकर,

सद्बुद्धि, आत्मसंतोष

और आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु

पुण्य कलश की स्थापना

एक शुभ प्रेरणा है।

किन्तु ज्ञान-चक्षु प्राप्त मानव भी

अपने अस्थायी जीवन को स्थायी मानकर

नकारात्मक विचारों में उलझ जाता है।

यही संसार के दुःखों का मूल है।

अतः पुण्य कलश की स्थापना

केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,

अपितु आदर्श, परोपकारी

और सदाचारी जीवन का संकल्प है।

— एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 🙏

रचना का मूल संदेश अत्यंत सुंदर है— सत्कर्म, परोपकार, आत्मज्ञान और सकारात्मक चिंतन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।

Friday, June 12, 2026

बाल श्रम दिवस

 नमस्ते आदरणीय अनंत कृष्णन जी।

आपकी रचना में बाल श्रम की सामाजिक विडंबना, गरीबी, उपेक्षा और बच्चों के शोषण के प्रति गहरी चिंता व्यक्त हुई है। इसे थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

13-06-2026

मानव जीवन में

जीने के लिए धन की आवश्यकता है।

परंतु धनाभाव में भी

संतान का जन्म

ईश्वर की देन है।

किन्तु जब माता-पिता

पालन-पोषण में असमर्थ होते हैं,

तब जन्म लेती है

एक सामाजिक त्रासदी—

बाल श्रम।

कहीं पियक्कड़ पिता,

कहीं असहाय माँ,

कहीं पिता का नदारद होना,

कहीं जन्म लेते ही

शिशु का त्याग।

कुछ बच्चे अनाथालयों में पलते हैं,

कुछ अपराधियों के हाथों

शोषण का शिकार बनते हैं।

गरीबी, उपेक्षा और विवशता

बचपन का अधिकार छीन लेती है।

सौतेले व्यवहार की पीड़ा,

भूख और अभाव की मार,

नन्हे हाथों को

पुस्तकों की जगह

मजदूरी का बोझ दे देती है।

दयालु और संवेदनशील लोग

बाल श्रम के विरुद्ध

आवाज़ उठाते हैं,

समाज को जागृत करते हैं,

और ठोस कदम भी उठाते हैं।

भीख माँगना भी

एक संगठित धंधा बन गया है।

मासूम बच्चों को आगे कर

दया का व्यापार होता है,

पर उसे रोकने वाले

बहुत कम दिखाई देते हैं।

केवल एक दिवस मनाने से

समस्या का समाधान नहीं होगा।

आवश्यक है

जागरूकता, शिक्षा और संवेदना।

अमीर संतान के लिए तरसते हैं,

गरीबों के यहाँ

फुटपाथों पर बचपन पलता है।

यह भी जीवन का

एक कठोर सत्य है।

आओ मिलकर संकल्प लें—

हर बच्चे को शिक्षा मिले,

हर बच्चे को सम्मान मिले,

हर बच्चे को उसका बचपन मिले।

नारा लगाएँ—

"बाल श्रमिक रहने न देंगे,

बचपन का अधिकार देंगे।"

"पुस्तक, शिक्षा और मुस्कान,

हर बच्चे का हो सम्मान।"

"बाल श्रम का हो अंत,

शिक्षा से बने उज्ज्वल भविष्य अनंत।"

सादर।

Thursday, June 11, 2026

नये भोर की प्रतीक्षा में

 एक नये भोर की प्रतीक्षा।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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12-6-26

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 हे अंतर्यामी!

तेरे चरणो में शरणागति मैं।

 तेरे ही ध्यान में 

 एक नये भोर की प्रतीक्षा में,

 जी के तम मिटने,

 पत्नी अपने रोग से बचने,

 जीवन में सुख देने,

 सर्वेश्वर तेरे चरणों में 

 निवेदन।

 जीवन में  तूने  सब कुछ दिया।

 मेरी पत्नी को स्वस्थ बनाकर,

अति शीघ्र चंगा करके,

मेरे जीवन में 

 सकारात्मक ऊर्जा दो।

शक्ति दो।

 सिवा तेरे अनुग्रह 

तेरी कृपा के

 और कोई शक्ति है नहीं 

नयी शक्ति नया उम्मीद 

‌देनै तेरे चरणों में 

शरणागत हूँ मैं।

 तू है शरणागत वत्सल।

 मार्कंडेय को जीवन दान दिया।

गूँगे को बोलने की शक्ति दी।

 मूर्ख कालिदास को

 महा कवि बनाया।

 नरसिंह अवतार लेकर 

 प्रह्लाद को बचाया।

मैं  निवेदन करता हूँ,

जल्दी चंगा करो।

शक्ति दो।

 नये भोर की प्रतीक्षा में 

 हर कोई तेरे ध्यान में।


आपकी भावाभिव्यक्ति अत्यंत हृदयस्पर्शी है। इसमें पत्नी के स्वास्थ्य हेतु प्रार्थना, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आशा का सुंदर भाव व्यक्त हुआ है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर प्रवाह और काव्यात्मकता बढ़ाई जा सकती है।

नये भोर की प्रतीक्षा में

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

12-6-2026

हे अंतर्यामी!

तेरे चरणों में शरणागत हूँ मैं।

तेरे ही ध्यान में लीन,

एक नये भोर की प्रतीक्षा में।

जीवन का तम मिट जाए,

पत्नी मेरे रोग से उबर जाए,

जीवन में फिर सुख का सूरज उगे,

ऐसी विनती तेरे चरणों में।

हे सर्वेश्वर!

जीवन में तूने सब कुछ दिया,

अब मेरी जीवन-संगिनी को

स्वस्थ कर, नवजीवन प्रदान कर।

मेरे जीवन में

सकारात्मक ऊर्जा भर दे,

संघर्ष सहने की शक्ति दे,

आशा का दीप पुनः जला दे।

तेरी कृपा के बिना

और कोई शक्ति नहीं।

नई शक्ति, नया विश्वास,

नया उत्साह प्रदान कर।

मैं तेरी शरण में हूँ,

तू शरणागत-वत्सल है।

मार्कण्डेय को जीवनदान दिया,

गूँगे को वाणी का वरदान दिया।

मूर्ख कालिदास को

महाकवि बना दिया,

नृसिंह रूप धारण कर

प्रह्लाद की रक्षा की।

मैं भी विनम्र निवेदन करता हूँ—

मेरी प्रार्थना स्वीकार करो,

पत्नी को शीघ्र स्वास्थ्य दो,

जीवन में पुनः मुस्कान भरो।

नये भोर की प्रतीक्षा में

मैं तेरा ध्यान करता हूँ,

और इस संसार का हर प्राणी

तेरी ही करुणा की राह निहारता है।

ओम् नमः शिवाय।

ओम् सरवनभवाय नमः।

ओम् मुरुगा। 🙏

आपकी पत्नी के स्वास्थ्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य और आपको धैर्य, शक्ति तथा आशा प्रदान करें। 🙏🌅