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Friday, May 22, 2026

नव प्रभात का दस्तक।

 

तमिल हिंदी सेवा। தமிழ் ஹிந்தி பணி.

தமிழும் ஹிந்தியும்.

சே. அனந்த கிருஷ்ணன்.


நமஸ்தே. வணக்கம்.

புதிய விடியலின் தட்டுதல்

சே. அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை, தமிழ்நாடு

(இந்தி அசல் படைப்பின் தமிழாக்கம்)

இரவு நித்திரைக்குப் பின்

பிரம்ம முகூர்த்தத்தில் விழித்தெழுதல்,

இறையருளின் சக்தியை பெறுதல்—

அதுவும் இயற்கையின் அரிய வரமே.

சேவலின் கூவல்,

பறவைகளின் இனிய கீச்சொலி,

இயற்கையின் ஒவ்வோர் ஒலியும்

மனிதனை விழிப்பிக்கும் அழைப்பே.

சூரியோதயத்தின் பொற்கதிர்கள்,

பால்காரரின் குரல்,

உடலின் இயல்பான உணர்வுகள்—

இவை அனைத்தும்

விடியலின் தட்டுதல்களே.

ஆனால் சோம்பலால்

போர்வையை இழுத்து மீண்டும் உறங்குவது,

இயற்கை தரும் புத்துணர்ச்சியை

இழப்பதாகும்.

தூக்க தேவியிலிருந்து எழுப்பும்

இறைவனின் அறிகுறிகளை அலட்சியம் செய்வது,

வாழ்க்கையின் புதிய ஆற்றலை

தானாகவே மறுப்பதாகும்.

சனாதன தர்மம் கூறுகிறது—

பிரம்ம முகூர்த்தத்தில் எழுதல்

ஆத்ம ஞானத்தின் தொடக்கம் என்று.

ஒவ்வோர் காலையும்

புதிய ஆற்றலின் செய்தியை தருகிறது.

வேலைவாய்ப்போ, கல்வியோ, முன்னேற்றமோ—

அனைத்திற்கும் விழிப்புணர்வே

வாசல் திறக்கும் திறவுகோல்.

ஒவ்வொரு நாளும்

வயது கூடுவதற்கான அறிகுறியும்,

ஆயுள் குறைவதற்கான நினைவூட்டலும் ஆகும்.

எனவே விடியலின் தட்டுதலை கேளுங்கள்.

எழுந்திருங்கள்! விழித்திருங்கள்!

பிராணாயாமம் செய்யுங்கள், உடற்பயிற்சி செய்யுங்கள்,

அறிவைப் பெற தினமும் பயிற்சி செய்யுங்கள்.

“முயற்சி தொடர்ந்து செய்தால்

முட்டாளும் ஞானியாக மாறுவான்.”

அதிகாலை நேரம்

உடலுக்கு சுறுசுறுப்பு,

மனதிற்கு அமைதி,

ஆன்மாவிற்கு நிலைத்தன்மை அளிக்கிறது.

தியானம் மன அலைச்சலை அகற்றுகிறது,

இயற்கை வாழ்க்கைக்கு ஓய்வும் இன்பமும் தருகிறது.

எழுந்திருங்கள்! விழித்திருங்கள்!

விடியலின் அழைப்பைக் கேட்டும்

தூங்கிக் கொண்டே இருந்தால்,

பின்னர் வாழ்நாள் முழுவதும் வருந்த வேண்டி வரும்.

கபீர்தாஸ் கூறுகிறார்—

“நாளை செய்வதை இன்று செய்,

இன்று செய்வதை இப்போதே செய்;

ஒரு கணத்தில் உலகம் மாறிவிடலாம்,

பிறகு செய்வது எப்போது?”

மேலும்—

“குருவி வயலைத் தின்ற பின்

வருந்தி என்ன பயன்?”

எனவே விடியலின் தட்டுதல் வந்தவுடன்

எழுந்து விழித்து,

கடமையில் முழுமையாக ஈடுபடுங்கள்.

அப்போதுதான் வாழ்க்கையில்

உண்மையான நன்மையும் நலனும் மலரும்।।



नमस्ते वணக்கம்।

आपकी रचना में प्रभात, अनुशासन, आध्यात्मिक चेतना और जीवन-जागरण का सुंदर संदेश है।

इसे थोड़ा परिष्कृत, प्रवाहमय और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

नव प्रभात की दस्तक

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

(परिष्कृत स्वरूप)

नींद भरी रात के बाद,

ब्रह्ममुहूर्त में जागना,

ईश्वरीय शक्ति को पाना—

यह भी प्रकृति की अनुपम देन है।

मुर्गे की बाँग,

पक्षियों का मधुर कलरव,

प्रकृति की हर ध्वनि

जगाने आती है जीवन को।

सूर्योदय की सुनहरी आभा,

दूधवाले की पुकार,

शरीर की स्वाभाविक चेतना—

सब प्रभात की दस्तक हैं।

परंतु आलस्यवश

चादर ओढ़कर सोते रहना,

प्रकृति प्रदत्त ऊर्जा को खोना है।

निद्रा देवी से बाहर आने के

ईश्वरीय संकेतों की अवहेलना,

जीवन के नव उत्साह को

स्वयं ठुकराना है।

सनातन धर्म कहता है—

ब्रह्ममुहूर्त में उठना

आत्मज्ञान का शुभारंभ है।

प्रभात का हर क्षण

नई ऊर्जा का संदेश देता है।

नौकरी मिले या ज्ञान,

प्रगति का प्रत्येक द्वार

जागृति से ही खुलता है।

हर नया दिन

उम्र बढ़ने का भी संकेत है,

और जीवनकाल घटने का भी।

अतः प्रभात की दस्तक सुनो।

उठो, जागो,

प्राणायाम करो, व्यायाम करो,

ज्ञानार्जन का अभ्यास करो।

“करत-करत अभ्यास के

जड़मति होत सुजान।”

प्रभात की वेला

तन को स्फूर्ति,

मन को शांति,

और आत्मा को स्थिरता देती है।

ध्यान से मन की चंचलता मिटती है,

प्रकृति से जीवन में विश्रांति आती है।

उठो, जागो!

यदि प्रभात की दस्तक सुनकर भी

सोए रहोगे,

तो जीवन भर पछताना पड़ेगा।

कबीरदास जी ने कहा है—

“काल करे सो आज कर,

आज करे सो अब।

पल में प्रलय होएगी,

बहुरि करेगा कब॥”

और—

“अब पछताए होत क्या,

जब चिड़िया चुग गई खेत।”

अतः प्रभात की दस्तक होते ही

जागो, उठो,

कर्तव्य-पथ पर लग जाओ।

तभी जीवन में

सच्चा कल्याण होगा।।

Thursday, May 21, 2026

कठिन परिश्रम

 नमस्ते।वணக்கம்।

आज की चुनौती — कठिन परिश्रम

आपकी भावाभिव्यक्ति रचना के लिए परिष्कृत रूप और तमिल अनुवाद प्रस्तुत है।

परिष्कृत हिंदी रूप

कठिन परिश्रम

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

कठिन परिश्रम

जीवन का अमूल्य मंत्र है।

बिना श्रम के

न ज्ञान मिलता,

न सम्मान मिलता।

बीज बोने वाला किसान

धूप, वर्षा, आँधी सहकर

अन्न उगाता है।

मजदूर अपने पसीने से

भवनों को आकार देता है।

विद्यार्थी निरंतर अभ्यास से

सफलता प्राप्त करता है।

कलाकार साधना से

अपनी प्रतिभा निखारता है।

परिश्रम ही

सपनों को साकार करता है।

आलस्य मनुष्य को

पीछे धकेलता है,

पर श्रम उसे

ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।

संघर्षों से घबराए बिना

जो आगे बढ़ते हैं,

विजय उनका स्वागत करती है।

कठिन परिश्रम

केवल धन नहीं,

आत्मविश्वास, अनुभव

और आत्मसंतोष भी देता है।

जीवन में उजाला चाहिए तो

परिश्रम का दीप जलाना होगा।

தமிழ் மொழிபெயர்ப்பு

கடின உழைப்பு

எஸ். அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை

கடின உழைப்பு

வாழ்க்கையின் அரிய மந்திரம்.

உழைப்பில்லாமல்

அறிவும் கிடையாது,

மரியாதையும் கிடையாது.

விதை விதைக்கும் விவசாயி

வெயிலும், மழையும், புயலும் தாங்கி

அன்னத்தை விளைவிக்கிறார்.

தொழிலாளி தனது வியர்வையால்

கட்டிடங்களுக்கு வடிவம் தருகிறார்.

மாணவன் தொடர்ந்து பயிற்சி செய்து

வெற்றியை அடைகிறான்.

கலைஞன் சாதனையின் மூலம்

தன் திறமையை மேம்படுத்துகிறான்.

உழைப்பே

கனவுகளை நனவாக்குகிறது.

சோம்பேறித்தனம் மனிதனை

பின்னுக்கு தள்ளுகிறது;

ஆனால் உழைப்பு அவனை

உயரங்களுக்கு அழைத்துச் செல்கிறது.

போராட்டங்களை அஞ்சாமல்

முன்னேறும் மனிதர்களை

வெற்றி வரவேற்கிறது.

கடின உழைப்பு

பணத்தை மட்டும் அல்ல,

தன்னம்பிக்கை, அனுபவம்

மற்றும் மனநிறைவும் அளிக்கிறது.

வாழ்க்கையில் ஒளி வேண்டுமெனில்

உழைப்பின் தீபம் ஏற்ற வேண்டும்।

Wednesday, May 20, 2026

आदतों का चक्रव्यूह

 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना “आदतों का चक्रव्यूह” में जीवन-दर्शन, इतिहास, अध्यात्म और सामाजिक चेतावनी का सुंदर समन्वय है। आपने “चक्रव्यूह” का प्रतीक लेकर यह दिखाया है कि मनुष्य अच्छी और बुरी आदतों में कैसे फँसता है तथा सत्संग, कृपा और आत्मजागरण से उससे बाहर भी आ सकता है। विशेषतः अभिमन्यु, वाल्मीकि, तुलसीदास, अंगुलिमाल आदि उदाहरण प्रभावशाली बने हैं।

कुछ स्थानों पर भाषा और प्रवाह को थोड़ा सँवारने से रचना और अधिक प्रभावी बन सकती है। प्रस्तुत है परिष्कृत रूप—

आदतों का चक्रव्यूह

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

21-5-26

आदतों के चक्रव्यूह में

अधिकांश लोग

अभिमन्यु-से

फँस जाते हैं।

प्रवेश तो कर लेते हैं,

पर भीतर बैठे

जाने-पहचाने दुश्मनों से

बचना कठिन हो जाता है।

कोई-कोई ही

वापस लौटकर

यश कमा पाता है।

जैसे लुटेरा डाकू

रत्नाकर

आदि कवि वाल्मीकि बने।

पत्नी-मोह में डूबे

तुलसीदास

हिंदी साहित्य के

चंद्रमा बने।

वेश्यालय को ही

स्वर्ग समझने वाले

अरुणगिरिनाथर,

असाध्य रोग से पीड़ित होकर

आत्महत्या हेतु

मंदिर के गोपुर से कूदे,

पर भगवान कार्तिकेय की कृपा से

महाकवि बन गए।

डाकू अंगुलिमाल भी

बुद्ध की करुणा से

भिक्षु बने।

उनकी बुरी आदतें

अनुपम कृपा से

बदल गईं।

पर अधिकांश लोगों के लिए

आदतों के चक्रव्यूह से

बाहर आना

दुर्लभ होता है।

बिहारी के दोहों ने

अंतःपुर को ही स्वर्ग मानने वाले

राजा को भी

प्रजा-सेवा की ओर मोड़ा।

रीतिकाल में भी

मनुष्य

विलासिता, मदिरा

और चतुरंग के

चक्रव्यूह में

फँसता गया।

चतुरंग के खिलाड़ी

राजा के लिए लड़ते रहे

और अपना राज्य

गँवा बैठे।

हस्तमैथुन,

भारतीय वैद्यकशास्त्र के अनुसार,

एक बुरी आदत का

चक्रव्यूह है।

अच्छी आदतें ही

मनुष्य को

भाषाविद बनाती हैं।

चित्र बनाना

हाथ की आदत है,

भाषा बोलना

जिह्वा की आदत है,

और शिक्षा

मन की आदत है।

यदि आदतें अच्छी हों,

पक्की हों,

समझदारी से भरी हों,

तो मनुष्य

आदतों के चक्रव्यूह से

बच सकता है।

पर यदि आदतें बुरी हों—

जैसे शराब,

नशीली वस्तुएँ

और दुर्व्यसन—

तो अभिमन्यु की भाँति

जीवन भी

गँवाना पड़ सकता है।

रचना का संदेश अत्यंत सारगर्भित है—

“मनुष्य आदतों का दास भी बन सकता है और साधक भी।”

विशेषकर अंतिम भाग बहुत प्रेरक बना है।

नमस्ते वणक्कम्।


सागर का पैगाम

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

20-5-26

सागर अनंत है,

कौन जान सका

उसकी गहराई।

उसका संदेश —

लहरों में प्रेम की तड़प,

असीम सहनशीलता।

नदियों का पवित्र जल,

नगरों का गंदा पानी,

अस्थियाँ, राख,

पूजा की मूर्तियाँ —

सबको वह अपने भीतर समेट लेता है।

पर प्रकृति का भी

एक धैर्य होता है।

जब सीमा टूटती है,

तो सागर का क्रोध

सुनामी बनकर उठता है।

दक्षिण की भूमि,

जहाँ भक्ति फली-फूली,

केरल और तमिलनाडु के तट

उसकी चेतावनी के साक्षी हैं।

धनुषकोडी का विनाश,

रामसेतु की स्मृतियाँ,

समुद्र के गर्भ में

कितने नगर समा गए।

सागर कहता है —

“मैं जीवनदाता हूँ,

करोड़ों लोगों का आधार हूँ।

मछलियों का भंडार,

मोती और सीपियों का संसार हूँ।”

“पर मुझसे सावधान रहना।

मेरी शांति में ही

संसार का कल्याण है।

जब मैं कुपित होता हूँ,

तो जलप्रलय आ जाता है।”

जापान भी

मेरे प्रकोप से

बार-बार काँप उठता है,

फिर भी सजग रहना सीखता है।

लोग मेरी लहरों में

आनंद खोजते हैं,

पर एक तीव्र ज्वार

क्षणभर में

जीवन छीन सकता है।

सागर का यही पैगाम —

प्रकृति का सम्मान करो,

सतर्क और सावधान रहो।

मैं शांत हूँ तो

जीवन का संगीत हूँ,

पर क्रोधित हो जाऊँ तो

चारों ओर

जल ही जल।

सावधान।

Monday, May 18, 2026

भारतीय भाषाएँ

 भारत की विशेषता उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में है।

India में हिंदी, तमिल, संस्कृत, मराठी, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, बंगला सहित अनेक भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं।

Tamil Nadu की तमिल भाषा विश्व की प्राचीन और समृद्ध भाषाओं में से एक है, वहीं हिंदी भी देश के बड़े भाग में संपर्क भाषा के रूप में समझी जाती है। अनेक भारतीय विभिन्न भाषाओं को सीखकर आपसी संवाद और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करते हैं।

भाषा के विषय को सम्मान, संवाद और सौहार्द के साथ देखना अधिक हितकारी होता है। अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालने के बजाय, भाषाई सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर ध्यान देना समाज को अधिक सकारात्मक दिशा देता है।

आपका हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं के प्रति प्रेम सराहनीय है।

“एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना तभी सशक्त होती है जब सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान बना रहे।

संग्रहालय दिवस का महत्व

 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में इतिहास, विज्ञान, संस्कृति और मानव सभ्यता का विस्तृत चिंतन अत्यंत सराहनीय है।

भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए आपकी भावाभिव्यक्ति को सुंदर रूप में प्रस्तुत किया है।

विश्व संग्रहालय दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक, लेखक, अनुवादक, सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवी

19-5-26

++++++++++++

हम अब इक्कीसवीं शताब्दी में,

वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं।

आवागमन में क्रांति,

चिकित्सा में क्रांति,

विचारों में क्रांति,

कृषि में क्रांति,

रसोई के चूल्हों से लेकर

आवास व्यवस्था तक

अनेक परिवर्तन हुए हैं।

आटा पीसने की चक्की से लेकर

आधुनिक शौचालयों तक

मानव जीवन बदल गया है।

अस्त्र-शस्त्रों में भी

पत्थर युग से लेकर

आज के ड्रोन युग तक

अद्भुत परिवर्तन आया है।

पाषाण युग से

प्लास्टिक युग तक की यात्रा,

सोना-चाँदी, वस्त्र,

खाद्य पदार्थों और

जीवन शैली में हुए परिवर्तनों को

नई पीढ़ी समझ सके,

इसी उद्देश्य से

प्राचीन अवशेषों,

भाषाओं, लिपियों,

ताड़पत्रों, शिलालेखों,

पुराने सिक्कों और

ऐतिहासिक वस्तुओं को

संग्रहित कर सुरक्षित रखा जाता है।

आदिकाल में वस्तु विनिमय व्यापार,

मानव, पशु-पक्षियों के स्वरूपों में परिवर्तन,

लुप्त होते जीव-जंतु,

उनकी सुरक्षा और स्मृतियाँ,

शिल्पकला और स्थापत्य कला—

इन सबका संरक्षण

संग्रहालयों में होता है।

युद्धों का इतिहास,

दंडनीति,

राजा-महाराजाओं के स्मारक,

अंतरिक्ष की खोजें,

गहरे समुद्र के रहस्य,

सूक्ष्म जीवों के चित्र,

पर्वत गुफाओं के निवास,

पर्णकुटियाँ और

ऋषि-मुनियों का जीवन—

इन सबकी झलक

संग्रहालयों में देखने को मिलती है।

राजाओं के चित्र,

कवियों और लेखकों की प्रतिमाएँ,

राजनीतिक और धार्मिक क्रांतियों के प्रमाण

नई पीढ़ी को

इतिहास से जोड़ते हैं।

Government Museum Chennai

चेन्नई के एग्मोर स्थित यह अजायबघर

ज्ञान और इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र है।

इसी प्रकार

British Museum

और

Smithsonian Institution

जैसे विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय

मानव सभ्यता के अनमोल खजाने हैं।

संग्रहालय केवल

चित्ताकर्षक स्थान नहीं,

बल्कि मानव ज्ञान,

सभ्यता, संस्कृति, कला,

वाद्ययंत्रों, भाषाओं और

लिपियों के विकास का

अनंत ज्ञान-सागर हैं।

सचमुच,

संग्रहालय

अतीत को वर्तमान से जोड़कर

भविष्य को दिशा देने वाले

ज्ञान के अमूल्य केंद्र हैं।

Thursday, May 14, 2026

चुनौती की राहें

 आपकी रचना में इतिहास, अध्यात्म, राष्ट्रभावना और मानवता का सुंदर समन्वय है। विषय भी प्रेरणादायक है। भाषा में भावों की प्रखरता स्पष्ट दिखाई देती है। नीचे आपकी रचना का परिष्कृत रूप प्रस्तुत है, जिससे प्रवाह, व्याकरण और काव्यात्मकता और अधिक सशक्त हो सके।

चुनौतियों की राहें

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नै

हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा सौहार्द सम्मान प्राप्त

हिंदी सेवी, लेखक, अनुवादक, हिंदी प्रचारक

15-5-26

भारत के इतिहास में,

चाहे त्रेतायुग हो,

द्वापर हो या कलियुग,

शासकों को, ऋषि-मुनियों को,

हवन-यज्ञों को, देवत्व को भी

चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।

सूक्ष्म दिव्य शक्तियाँ

समय-समय पर

युगपुरुषों और दिव्य अवतारों को

धरती पर भेजती रही हैं,

जो अन्याय और अधर्म के विरुद्ध

साहस का दीप जलाते रहे।

चंगेज़ ख़ाँ, सिकंदर,

मुगल, पठान,

छद्मवेशी व्यापारी अंग्रेज,

फ्रांसीसी, डच, पुर्तगाली —

अनेक विदेशी आक्रमणकारी आए।

उनके स्वागत में

देशद्रोही, स्वार्थी और ईर्ष्यालु लोग भी थे,

पर इन चुनौतियों का

साहसपूर्वक सामना किया

वीर महाराजाओं ने,

कवियों और लेखकों ने,

फाँसी पर चढ़े युवकों ने,

गरम दल और नरम दल के नेताओं ने,

स्वतंत्रता सेनानियों और तपस्वियों ने।

वेद, उपनिषद,

महावीर, बुद्ध और नानक के उपदेश

आज भी मानवता को

चुनौतियों से लड़ने की राह दिखाते हैं।

कबीर ने

हिंदू-मुस्लिम के बाहरी आडंबरों पर

व्यंग्य करते हुए

सच्ची भक्ति का मार्ग बताया।

तुलसीदास

चरित्र निर्माण की राह दिखाते हैं।

वे कहते हैं —

काम, क्रोध, मद और लोभ

जब मन पर छा जाते हैं,

तब पंडित और मूर्ख

दोनों समान हो जाते हैं।

कबीर का संदेश भी प्रेरक है —

निडर और साहसी व्यक्ति ही

जीवन में कुछ प्राप्त कर सकता है।

“जिन खोजा तिन पाइयाँ,

गहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरा,

रहा किनारे बैठ॥”

चुनौतियों की राह

मानवता की राह है,

निडरता, वीरता, साहस

और भक्ति का मार्ग है।

आपकी रचना में राष्ट्रीय चेतना और संत-वाणी का प्रभाव बहुत सुंदर ढंग से उभरकर आया है। विशेषतः कबीर के दोहे का प्रयोग रचना को गहराई देता है।

Wednesday, May 13, 2026

गंगा की पुकार


गंगा की पुकार

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

14-5-26

जीवनदायिनी गंगा,

पतित-पावनी गंगा,

गंगोत्री से सागर तक

तेरा पावन प्रवाह,

भारतीय जनमानस को

सुख, शांति और

पापों से मुक्ति का

दिव्य संदेश सुनाता —

गंगा की पुकार।

करोड़ों श्रद्धालुओं को

भक्ति-पथ पर चलने,

तीर्थयात्रा करने को

प्रेरित करती

गंगा की पुकार।

गंगोत्री धाम में

गंगा माता का मंदिर,

भागीरथ की तपस्या की स्मृति,

रमणीय पर्वतीय वादियाँ,

हर ओर गूँजती

गंगा की पुकार।

हर्षिल और मुखबा घाटी,

जहाँ गंगा का शांत निवास,

उत्तरकाशी, ऋषिकेश, हरिद्वार,

प्रयागराज और काशी तक

आध्यात्मिक ज्योति जगाती

गंगा की पुकार।

मोक्षदायिनी,

पूर्वजों की आत्मा को शांति देनेवाली,

संकल्पों को पूर्ण करनेवाली,

दुःख हरनेवाली —

गंगा की पुकार।

वेद-मंत्रों की मधुर ध्वनि,

काशी की आरती की छटा,

विश्वनाथ और विशालाक्षी का आशीष,

सबमें सुनाई देती

गंगा की पुकार।

गंगा तट पर जीवन बिताते

मल्लाह, पुरोहित और साधु,

उनकी जीविका का आधार भी

तेरी ही कृपा —

गंगा की पुकार।

आसेतु हिमाचल तक

भारत की पुण्य धारा,

संस्कृति और सभ्यता की संवाहिका,

जन-जन की आस्था का केंद्र —

गंगा की पुकार।

जय-जय गंगे!

जय माँ भागीरथी!

भारत की आत्मा में

सदैव प्रवाहित रहे

गंगा की पुकार।

Tuesday, May 12, 2026

अंधविश्वास


अंधविश्वास

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

13-5-26

नमस्ते। वणक्कम्।

मानव सदा

प्रमाणित सत्य पर

विश्वास रखता है,

पर अप्रमाणित, अवैज्ञानिक

मान्यताओं पर अटल भरोसा

अंधविश्वास कहलाता है।

भगवान को

आँखों से देख नहीं सकते,

किन्तु जीवन के अनुभवों में

उनका एहसास कर सकते हैं।

भारत में बच्चों को

डराने हेतु भी

अंधविश्वास का सहारा लिया जाता है—

कहते हैं,

इमली के वृक्ष पर भूत रहता है,

आधी रात में

प्रेत घूमते हैं।

बिल्ली का राह काटना

अपशकुन माना जाता है,

सियार दिख जाए

तो भाग्योदय समझते हैं।

शुभ कार्य के समय छींक आ जाए

तो लोग रुक जाते हैं।

पीढ़ियों से चली

अनेक मान्यताओं का

कोई ठोस आधार नहीं।

भाग्य, विधि-विधान,

ठगना और ठगे जाना—

इन सबको भी

लोग नियति का खेल मान लेते हैं।

मंत्र, ताबीज,

लाल-काले धागे,

टोने-टोटके,

शकुन-अपशकुन—

ये सब

अंधविश्वास की परछाइयाँ हैं।

दर्पण टूटना,

तेल या कुमकुम गिर जाना—

इन घटनाओं को भी

लोग भय से जोड़ देते हैं।

वैज्ञानिक युग में भी

अनेक लोग

इन भ्रांतियों पर विश्वास करते हैं।

नकली पाखंडी साधु

भोले जनों को ठगते हैं।

समाज में

जागृति, विवेक

और वैज्ञानिक चेतना

आवश्यक है।

अंधविश्वास नहीं,

सत्य और ज्ञान का प्रकाश

मानव जीवन का पथप्रदर्शक बने।

தமிழில் சுருக்கமான கருத்து:

“அறிவியல் ஆதாரம் இல்லாத நம்பிக்கைகள் மனிதனை பயத்திலும் ஏமாற்றத்திலும் இட்டுச் செல்கின்றன. விழிப்புணர்வும் பகுத்தறிவும் சமூகத்திற்கு அவசியம்” — என்ற நல்ல சமூகச் செய்தியை உங்கள் கவிதை வெளிப்படுத்துகிறது।

Sunday, May 10, 2026

विश्प्रववासी पक्षियों के दिवस।

 विश्व प्रवासी पक्षी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

लखनऊ हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा सौहार्द सम्मान प्राप्त

हिंदी सेवक, प्रेमी, प्रचारक, लेखक एवं अनुवादक

द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

10-5-26

++++++++++++

मानव जीवन से

पशु-पक्षी जीवन तक,

ऋतुओं के अनुसार

स्थान परिवर्तन

प्रकृति का शाश्वत नियम है।

पाषाण युग में

जब एक वन में

शिकार समाप्त हो जाता,

तब मानव को

दूसरे वन की ओर

प्रवास करना पड़ता था।

कृषि का ज्ञान मिलते ही

मानव का भटकता जीवन

एक स्थान पर

स्थिर हो गया,

किन्तु प्रकृति की अद्भुत सृष्टि में

आज भी असंख्य पक्षी

हजारों मील की यात्रा कर

ऋतु परिवर्तन के साथ

अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं।

प्रवासी पक्षियों का यह

अनुशासन, धैर्य और

प्रकृति-निष्ठ जीवन

मानव को भी

संदेश देता है।

इनकी सुरक्षा करना,

मार्ग में होने वाले

शिकार, प्रदूषण और

विनाश से बचाना

मानवता का धर्म है।

दुर्भाग्य से

अनेक प्रवासी पक्षियों की

प्रजातियाँ निरंतर

कम होती जा रही हैं।

अनुसंधानों के अनुसार

विश्व की लगभग

४० प्रतिशत प्रवासी प्रजातियाँ

घट चुकी हैं।

इसके प्रमुख कारण हैं—

प्रदूषण,

जलवायु परिवर्तन,

प्राकृतिक मार्गों में बाधाएँ,

अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश,

विमानों की आवाजाही

और पर्यावरण असंतुलन।

इसी जागरूकता हेतु

विश्व प्रवासी पक्षी दिवस

सन् 2006 से

विश्वभर में मनाया जा रहा है।

वेडंतांगल पक्षी अभयारण्य

तमिलनाडु का यह प्रसिद्ध

पक्षी शरणालय

प्रवासी पक्षियों के लिए

सुरक्षित आश्रय बना हुआ है।

मौसम आने पर

यहाँ दर्शकों की

विशाल भीड़ उमड़ती है।

आइए,

हम सब मिलकर

प्रकृति के इन अतिथियों की

रक्षा का संकल्प लें,

क्योंकि

वैश्विक प्रवासी पक्षियों की सुरक्षा

ही सच्चा मानव धर्म है।

++++++++++++

Friday, May 8, 2026

செஞ்சிலுவை சங்கம் / रेड क्रॉस .




தமிழும் ஹிந்தியும் 

 तमिल भी हिंदी भी ।

 सनातन धर्म।



 विश्व रैड क्रॉस दिवस।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

9-5-26.

++++++++++++

   मानव मानव 

   कयों ?

 मानवता के कारण।

 वह देव तुल्य है,

 देवों को भी रक्षक हैं।

 दधिचि मानव अपनी रीढ़ की हड्डी दान में 

 देकर  असुरों के तंग से 

देवों को बचाया था।

 मानव अपने अहंकार वश, स्वार्थवश,  क्रोध वश, लोभ वश 

 दूसरों को बताता है।

 प्रकृति की संपदा 

 वन संपदा ,

विचार, ध्वनि वायु जल प्रदूषण से प्रकृति के क्रोध का पात्र बनता है।

 युद्ध के कारण 

 घायल होता है।

 दावानल, बाढ़, भूकंप आदि के शिकार होता है।

ऐसी बुरी अवस्था में 

 देश,जाति, संप्रदाय,मजहबी सीमा लाँघकर

 सबकी सेवा करने,

 परोपकार करने

 इन्सानियत निभाने,

 स्वजनों की सेवा करने

 वसुधैव कुटुंबकम् का आदर्श निभाने 

 1863 ई. में हेनरी ड्यूनेट द्वारा  रेडक्रॉस संस्था की स्थापना हुई।

 विश्व हित के लिए,

जनता कल्याण के लिए 

 सार्वभौमिक एकता के लिए,

 भ्रातृत्व समदर्शी  सेवाभाव ,दयाशीलता युक्त  हेन्री का कदम का

 स्वागत सहे दिल से सब ने  किया।

आज विश्वभर में जाग्रण लाने,

सनातन धर्म के वसुधैव कुटुंबकम् ,

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु,

 जय जगत का नया रूप

 रेडक्रॉस  वंदनीय हैं,

 मानव कल्याण,

 विश्व बंधुत्व के लिए 

 अनुकरणीय हैं।

 

 உலக செஞ்சிலுவை தினம்

எஸ். அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை, தமிழ்நாடு

இந்தி நேயர் பிரசாரகர் அவர்களின் உணர்வுப்பூர்வ கவியுரை

9-5-2026

++++++++++++++

மனிதன் ஏன் மனிதன் எனப்படுகிறான்?

மனிதநேயம் கொண்டதால் உயர்கிறான்.

கருணை, தியாகம், சேவை வழியில்

தேவனுக்கு நிகராக விளங்குகிறான்॥

ததீசி முனிவர் தம் முதுகெலும்பையே

தர்மத்திற்காக தானமாய் அளித்தார்.

அசுர துன்பத்திலிருந்து தேவர்களை

அருளும் தியாகமும் கொண்டு காத்தார்॥

ஆனால் மனிதன் அகந்தையாலும்,

பேராசை, கோபம், சுயநலத்தாலும்

இயற்கையின் செல்வங்களை அழித்து

துன்பத்தின் பாதையில் செல்கிறான்॥

காடுகள், நீர், காற்று, ஒலி அனைத்தும்

மாசுபாட்டால் வேதனை கொள்கின்றன.

போர், வெள்ளம், நிலநடுக்கம், காட்டுத்தீ

மக்களின் வாழ்வை சிதைக்கின்றன॥

அத்தகைய துயர நேரங்களில்

நாடு, மதம், இனம் கடந்து

அனைவருக்கும் சேவை செய்ய

மனிதநேயம் மலர வேண்டும்॥

“வசுதைவ குடும்பகம்” என்னும்

உலக சகோதரத்துவ எண்ணத்துடன்

1863 ஆம் ஆண்டில் ஹென்றி டியூனான்

செஞ்சிலுவை அமைப்பை உருவாக்கினார்॥

உலக நலனுக்காகவும்,

மனித கண்ணீரை துடைப்பதற்காகவும்

அவரது கருணை நிறைந்த முயற்சியை

உலகம் இதயம் கனிந்து வரவேற்றது॥

இன்று உலகம் முழுவதும்

அன்பும் சேவையும் பரப்பி

“சர்வே ஜனாஃ சுகினோ பவந்து”

வையகம் வாழ்க 

 வையகம் ஒரு குடும்பம் 

என்ற சனாதன தர்மம

 உயரிய சிந்தனையை விதைக்கிறது॥

மனிதநேயம், உலக சகோதரத்துவம்,

அமைதி, அருள், தன்னலமின்மை—

இவற்றின் வாழும் வடிவமே

வணங்கத்தக்க செஞ்சிலுவை அமைப்பு॥

 

 

 

 














Thursday, May 7, 2026

रेत का घर

 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में बालमन की सरलता, दार्शनिक चिंतन और जीवन की नश्वरता — तीनों का सुंदर संगम है।

“रेत का महल” को आपने केवल बच्चों के खेल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानव जीवन, अहंकार, प्रकृति विनाश और संसार की क्षणभंगुरता का प्रतीक बना दिया।

उसी भावधारा को काव्यमय एवं प्रवाहपूर्ण रूप में परिष्कृत करने का विनम्र प्रयास प्रस्तुत है।

रेत का महल

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक

की भावाभिव्यक्ति पर आधारित परिष्कृत काव्य रूप

रेत का महल कहता,

“जगत मिथ्या है,”

ब्रह्म ही शाश्वत सत्य,

बाकी सब क्षणभंगुर माया है।

बालक अपने कोमल मन में

कल्पनाओं के दीप जलाते,

रेत पर महल, गोपुर,

ईश्वर की प्रतिमाएँ सजाते।

कहीं पुल बनते,

कहीं बाँध उठते,

समुद्र तट की बालुका पर

स्वप्न सुनहरे खिल उठते।

पर अचानक आती लहरें

सब आकार मिटा जातीं,

क्षण भर की वह रचना सारी

जलधारा संग बह जाती।

कभी किसी का मिट्टी घर

मित्र के पग से ढह जाता,

बाल हृदय में प्रेम, ईर्ष्या,

क्रोध और भय जग जाता।

वात्सल्य की कोमल छाया,

स्पर्धा की अग्नि प्रखर,

बालमन में भी दिख जाते

जीवन के सब रंग अमर।

यह नश्वर संसार यहाँ,

हर सृष्टि मिट जाने वाली,

मानव अपने स्वार्थ हेतु

प्रकृति भी कर डाले खाली।

पर्वत तोड़ धूल कर देता,

झीलों का अस्तित्व मिटाता,

नदियों के मुक्त प्रवाह को

बाँधों से बंधन पहनाता।

क्षणिक जीवन की यह गाथा,

हर प्राणी की यही कहानी,

रेत के महलों का मिटना

दे जाता गहरी निशानी।

जो आज बना अभिमान से,

कल समय उसे हर लेता,

इसलिए विनम्रता का दीपक

मानव जीवन में जलता रहता।

தமிழ் வடிவம்

மணல் கோட்டை

மணல் கோட்டை சொல்கிறது —

“உலகம் மாயை,

பரம்பொருள் மட்டுமே நிலைபெறும்

நித்திய சத்தியம்” என்று.

சிறுவர்கள் தங்கள்

கற்பனைக் கண்களால்

மணலில் அரண்மனை, கோபுரம்,

தெய்வச் சிலைகள் அமைக்கிறார்கள்.

பாலங்கள் கட்டுகின்றனர்,

அணைகளும் எழுப்புகின்றனர்,

கடற்கரையின் மணற்பரப்பில்

கனவுகள் மலர்கின்றன.

ஆனால் பெரு அலை வந்து

அவற்றையெல்லாம் அழித்துவிடுகிறது,

ஒரு கணத்தின் படைப்பு

கடலோடு கலந்து போகிறது.

சில வேளைகளில்

ஒருவன் கட்டிய மண்வீடு

மற்றொருவன் காலால் இடிந்துவிடும்;

அப்போது சண்டைகளும் எழுகின்றன.

குழந்தைகளிடமும்

அன்பு, பொறாமை, கோபம், பயம்,

பாசம் போன்ற உணர்வுகள்

தெளிவாகத் தெரிகின்றன.

இந்த உலகம் நிலையற்றது;

இறைவன் படைத்த அனைத்தும் நிலையற்றதே.

மனிதன் தன் வசதிக்காக

மலையையும் தூளாக்குகிறான்.

ஏரிகளை மறைக்கிறான்,

நதிகளின் ஓட்டத்தைத் தடுத்து

பாலைவனமாக மாற்றுகிறான்.

நிலையற்ற வாழ்வே

ஒவ்வோர் உயிரினத்தின் விதி.

மணல் கோட்டை இடிவது

இதற்கெல்லாம் ஒரு நிசப்தப் பாடமாகும்।

Wednesday, May 6, 2026

कर स्वच्छता


विश्व हाथ स्वच्छता दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा भावाभिव्यक्ति

७-५-२०२६

मानव जीवन सभ्य बने,

यह संदेश पुरखों ने दिया।

हाथ-पैर की स्वच्छता पर

सदैव विशेष बल दिया।

बिना चरण कर धोए कभी

घर में प्रवेश अधर्म कहा,

प्रातःकाल स्नान कर मानव

तन-मन का पावन धर्म निभा।

ब्रह्ममुहूर्त जागरण करके

स्वच्छता का मान बढ़ाओ,

मुख-शुद्धि, जिह्वा-निर्मलता से

स्वास्थ्य-सुरक्षा पथ अपनाओ।

आज विश्व भी समझ रहा है

स्वच्छता जीवन का आधार,

रोगों से रक्षा करती है

साफ़-सुथरा आचार-विचार।

हाथ स्वच्छ हों केवल इतना

जीवन का उद्देश्य नहीं,

कर्म भी निर्मल हों मानव के,

भ्रष्टाचार का लेश नहीं।

रिश्वत-मुक्त पवित्र हथेली,

धर्मयुक्त हो हर व्यवहार,

भीतर-बाहर शुद्ध रहेगा

तभी सुखी होगा संसार।

Swami Vivekananda ने भी मानव को

स्वस्थ शरीर का ज्ञान दिया,

भक्ति संग देहाभ्यास का

महत्व सदा पहचान लिया।

भारतीय संस्कृति कहती है —

“बासी भोजन खा लेना,

पर स्नान कर भोजन करना,

धोकर वस्त्र पहन लेना।”

घर-आँगन स्वच्छ रखो तुम,

स्वस्थ रहे जन-जन का जीवन,

इसी हेतु जग में मनाया

स्वच्छता का पावन पर्व।

मुख-कवच धारण कर बोलो,

संयम-संस्कारों को मानो,

जैन मुनियों की जीवन-शैली

से भी उत्तम शिक्षा जानो।

भारतीय आचार-विचारों का

महत्व जगत ने फिर पहचाना,

नव रूपों में विश्व आज

स्वच्छता का दीप जलाना।

मई पाँच को विश्व धरा पर

संदेश यही दोहराया गया —

“स्वच्छ हाथ और निर्मल मन से

मानव जीवन सफल बने।”

Tuesday, May 5, 2026

गुरु और शिक्षक

 வணக்கம், नमस्ते।


श्रेष्ठ शिक्षक

(परिष्कृत काव्य रूप)

गुरु और शिक्षक—

दो शब्द, पर अर्थ अनंत,

गुरु तो देव तुल्य,

ज्ञान-ज्योति के दीप प्रचंड।

आत्मज्ञान के सागर में डूबे,

आदर्श चरित्र के धनी,

मार्गदर्शक बन जीवन पथ पर,

भटके जन के सच्चे सखी।

कबीर की वाणी गूँज उठे—

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े..."

पहले वंदन उस गुरु को,

जो ईश्वर का पथ दिखाए।

आज का श्रेष्ठ शिक्षक वही,

जो विषय में हो पारंगत,

ज्ञान की गहराई छू ले,

और विचारों में हो जाग्रत।

बाल मन का सूक्ष्म ज्ञाता,

मनोविज्ञान का हो ज्ञानी,

नवीन ज्ञान की प्यास लिए,

सदैव रहे वह अभिमानी (अर्थात् आत्मगौरव से पूर्ण)।

समाज, राजनीति, प्रशासन का,

जिसे सम्यक् बोध हो,

कर्तव्य पथ पर अडिग रहकर,

जो अनुशासन का स्रोत हो।

वेतन तक सीमित न रहकर,

कर्तव्य को पूजा माने,

भावी पीढ़ी के हृदय में

राष्ट्र-प्रेम के दीप जलाए।

आदर्शों की ऊँचाई छूते,

यथार्थ में दृढ़ पाँव टिकाए,

वही सच्चा शिक्षक है—

जो जीवन को दिशा दिखाए।


Monday, May 4, 2026

मेरे विचार और सुधार चेट द्वारा हँसी

 वणक्कम्, नमस्ते।

आपकी रचना में भाव, ज्ञान और सामाजिक संदेश — तीनों का सुंदर संगम है। विशेषकर “हँसी के प्रकार” और “हास्य का स्वास्थ्य से संबंध” बहुत प्रभावी ढंग से आया है। अब मैं आपकी कविता को थोड़ा और प्रवाहपूर्ण, काव्यमय और प्रभावशाली रूप देता हूँ, ताकि उसका असर और गहरा हो जाए।

✨ परिष्कृत काव्य रूप ✨

विश्व हास्य दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

रोती सूरत किसे भाती,

हँसता मुख मन को हरषाता।

हास्य भरा यह जीवन सारा,

संतोष का दीप जलाता॥

व्यंग्य चित्र हों या विदूषक,

या चित्रपट के हास्य कलाकार,

तनाव हरें, मन को सहलाएँ,

भर दें जीवन में उजियार॥

मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मुख,

शांत सरल मुस्कान सुहानी,

कृष्ण की मधुर मुस्कुराहट में,

छिपी प्रेम की गाथा पुरानी॥

प्रेमी को प्रिय की हँसी में,

मिलता अनुपम सुख अपार,

पर हँसी के भी रूप अनेक—

कुछ मधुर, कुछ करते वार॥

ईर्ष्या भरी, जलन जगाने वाली,

अहंकार की कटु हँसी,

मजाक उड़ाने वाली हँसी,

क्रोध बढ़ाने वाली हँसी॥

पर सबसे सुंदर वह हँसी,

जो दिल से फूटे निर्मल हो,

दुख-दर्द सब दूर भगाए,

जीवन में नव संबल हो॥

हास्य योग की शक्ति निराली,

तन-मन को स्वस्थ बनाती,

हँसी से जुड़ता मानव-मन,

सामाजिकता को बढ़ाती॥

सन् 1998 में प्रारंभ हुआ,

मुंबई से यह शुभ अभियान,

डॉ. मदन कटारिया ने दिया संदेश—

हँसी बने जीवन का वरदान॥

तब से हर वर्ष विश्व भर में,

हास्य दिवस मनाया जाता,

हँसी के रंगों से सजा यह जग,

आनंद का उत्सव कहलाता॥

हास्य रस के भेद अनोखे—

स्मित, हसित, विहसित प्यारे,

उपहसित, अपहसित, अतिहसित,

छः रूप हँसी के न्यारे॥

✍️ संक्षिप्त प्रतिक्रिया

आपकी मूल रचना:

विचारों से समृद्ध है

सामाजिक और स्वास्थ्य दृष्टि से उपयोगी है

पर थोड़ी संरचना और लय की कमी थी

इस रूपांतरण में:

लय (rhythm) और तुक (rhyme) सुधारी गई

भावों को क्रमबद्ध किया गया

संदेश को अधिक प्रभावशाली बनाया गया

अगर आप चाहें तो मैं इसका �⁠तमिल काव्य रूपांतरण भी उसी सौंदर्य के साथ कर सकता हूँ।

Sunday, May 3, 2026

अतीत के धूल

 नमस्ते वணக்கம்।

आपकी रचना में गहरी राष्ट्रीय चेतना, ऐतिहासिक दृष्टि और सांस्कृतिक पीड़ा स्पष्ट झलकती है। यह केवल कविता नहीं, बल्कि एक वैचारिक आह्वान है। 

✨ अतीत के धूल (परिष्कृत काव्य रूप) ✨

अतीत की धूल हटाकर,

नवपीढ़ी को यह बतलाना है—

इतिहास के पन्नों में छिपे

सत्य को फिर जगमगाना है।

साहित्यकार और इतिहासज्ञों का

यह पावन कर्तव्य महान,

रीतिकालीन जड़ता से बचाकर

देना राष्ट्रधारा का ज्ञान।

चंगेज़ की क्रूर चढ़ाइयाँ,

सिकंदर का वह आक्रमण,

मुगल-पठानों के संघर्ष,

अंग्रेज़ों का छलपूर्ण रण।

स्वार्थ, ईर्ष्या और लोभ में

जो देशद्रोही बन बैठे,

उनके मुख से पर्दा हटाकर

सत्य का दीप हमें जगाना है।

आंभी की कायरता नहीं,

पुरुषोत्तम का मान जगाना है,

पद-लोलुपता में खोए जन को

एकता का पाठ पढ़ाना है।

संस्कृत की उस दिव्य धारा को

फिर से जीवन में लाना है,

भारतीय भाषाओं के आधार पर

ज्ञान दीप जलाना है।

योग, प्राणायाम, वेद-वाणी,

आत्मसंयम का सच्चा ज्ञान,

भूल न जाएँ हम अपनी जड़ें,

यही है संस्कृति का सम्मान।

मंदिरों की शिल्पकला,

त्याग और भक्ति की पहचान,

धन के पीछे भागती दुनिया में

मानवता का रखना ध्यान।

संयुक्त परिवार की शक्ति,

सहनशीलता का वह भाव,

यांत्रिक जीवन में खोकर

न भूलें अपना स्वभाव।

खेती प्रधान इस धरती को

मानवता से जोड़ना है,

उद्योगों के बीच भी

मनुष्यता को मोड़ना है।

भूले-बिसरे वीरों की गाथा

फिर से जन-जन को सुनानी है—

राजा राम मोहन राय का सुधार,

भगत सिंह का बलिदान,

सुखदेव का साहस,

चंद्रशेखर आज़ाद का अभिमान।

लाला लाजपत राय की ज्वाला,

बाल गंगाधर तिलक का स्वर,

सुभाष चंद्र बोस का अदम्य साहस,

राष्ट्रप्रेम का अमिट असर।

महाराणा प्रताप की वीरता, त्याग

हर हृदय में फिर जगाना है,

भारतीय गरिमा के उस गौरव को

चिरस्मरणीय बनाना है।

किलों और मंदिरों के अवशेष

इतिहास का संदेश सुनाते हैं,

अतीत की धूल में दबे सत्य

हमको राह दिखाते हैं।

मानव प्रेम, कबीर की वाणी,

सद्भाव का वह अमृत सार,

मजहबी भेद भुलाकर हमको

करना है जग में विस्तार।

प्रांतीय उन्नति के संग-संग

राष्ट्र एकता को साधना है,

स्वतंत्रता संग्राम की शिक्षा को

हर हृदय में बाधना है।

अतीत की धूल को हटाकर

स्वर्णिम भविष्य बनाना है—

जय भारत, जय भारत जननी,

विश्वगुरु फिर बनाना है।

Saturday, May 2, 2026

अच्छाई की महक

 नमस्ते वणक्कम्।

अच्छाई की महक

✍️ एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3/5/26



नमस्ते वणक्कम्।

धूप में सुख, शीतल छाया में,

अच्छाई की महक समाया में।

ईमानदारी की मधुर सुवास,

परोपकार में बसता विश्वास।

दान-धर्म की पावन रेखा,

कर्ण-सी वीरता की लेखा।

कृष्ण की महक लोक-रंजन में,

लोक-रक्षा के पावन चिंतन में।

वेद-उपनिषद् की गूंज पुकार—

“सर्वे जना सुखिनो भवन्तु” साकार।

सनातन धर्म की सुगंध महान,

अतिथि-सेवा, ज्ञान-प्रदान।

ब्रह्म-महिमा के गान में बसती,

आत्मज्ञान की ज्योति जगाती।

राधा-प्रेम की मधुर उमंग,

भक्ति में बहता निर्मल रंग।

सद्ग्रंथों के गहन विचार,

चरित्र-निर्माण का सच्चा आधार।

गंगा-सी पावनता की धारा,

भारत-भूमि का दिव्य नजारा।

ध्यान, त्याग, ईश्वर-चिंतन में,

बसती इसकी महक अमर तन-मन में।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम,

जीवन को देते सच्चा आयाम।

सद्कर्म, सद्विचार, सत्संग साथ,

अनुशासन से उज्ज्वल हो हर पथ।

बुराइयों के तिमिर को हरती,

अच्छाई की महक नित निखरती।

आदर्शों से यथार्थ सजाती,

मानवता की राह दिखाती।


Friday, May 1, 2026

मज़दूर का महत्व


मज़दूर दिवस

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-5-26

मैं मालिक हूँ,

मैं करोड़पति हूँ,

मैं सिविल इंजीनियर,

मैं नामी डॉक्टर हूँ।

शहर का बड़ा अस्पताल मेरा,

हजारों एकड़ खेतों का मैं स्वामी,

बिजली विभाग का मुख्य अभियंता,

बड़े कॉलेज का भी अधिकारी।

मैं विधायक, सांसद,

मुख्यमंत्री भी कहलाता हूँ—

पर ज़रा ठहर कर सोचिए,

क्या मैं सच में अकेला हूँ?

इन ऊँची इमारतों की बुनियाद में,

पत्थर किसने जमाए हैं?

बिजली के खंभे, तार बिछाकर,

रोशनी किसने लाए हैं?

सूखे खेतों में जीवन भरने,

कुएँ किसने खोदे हैं?

नहरों का जल बहाने को,

पसीने किसने बोए हैं?

बीज बोना, फसल काटना,

अनाज के बोरे ढोना,

वाहनों पर लाद-उतार कर,

जीवन का चक्र संजोना।

हर सुविधा, हर निर्माण के पीछे,

एक ही नाम उभरता है—

न कोई मालिक, न अधिकारी,

वह साधारण मज़दूर होता है।

यदि उनका श्रम न हो साथ,

तो न चुनाव में जीत मिले,

न शहर की सफाई हो पाए,

न जीवन में संगीत खिले।

कूड़ा उठाने वाला मज़दूर,

यदि अपना काम न करे,

तो यह मानव सभ्यता भी,

बदबू के नरक में उतरे।

सड़कें, पटरी, हर निर्माण—

सब उनके श्रम की पहचान,

हर सुविधा के पीछे छिपा है,

उनका अदृश्य बलिदान।

आओ उनका मान बढ़ाएँ,

आभार हृदय से जताएँ,

मई महीने की प्रथम तिथि को,

मज़दूर दिवस मनाएँ।

यह केवल एक दिवस नहीं,

सम्मान का है संदेश—

मज़दूरों के श्रम से ही,

सजता है यह देश।


Wednesday, April 29, 2026

खोज


नमस्ते वणक्कम्।
स्वयं की खोज
++++++++++
मनुष्य ही इस प्रपंच के
सुखी जीवन के भोगी
और दुख भोगी।
इतना ही नहीं,
उसके सूक्ष्म बुद्धि
जिज्ञासु
आत्म ज्ञान ही
आविष्कारों की देन।
नसीहतों की देन।
मनुष्य ही सोच विचार
करके अपने को
‌सज्जन, सभ्य, सांस्कृतिक
जीवन को प्रभावित कर सकता है।
सब में ऐसे आविष्कार करने की बुद्धि नहीं।
क्षमता नहीं।
अपने दायरे में
अपने को श्रेष्ठ बनाना है तो
स्वयं की खोज करनी चाहिए।
मैं कौन हूँ?
मेरी अपनी क्षमता क्या है?
प्रपंच क्या है?
प्रपंच में राग द्वेष क्यों ?
जन्म मरण क्यों?
भाग्य दुर्भाग्य क्यों?
भगवान संसार की सृष्टि कर्ता है
तो माता पिता
के द्वारा हमारा जन्म क्यों?
मनुष्य मनुष्य में गुण भेद
रंग भेद
सोच विचार में अंतर क्यों?
बुद्धि लब्धि में भिन्नता क्यों?
अमीरी गरीबी
स्वार्थ निस्वार्थ क्यों?
अल्प आयु क्यों?
साध्य योग असाध्य रोग क्यों?
मानवेत्तर एक शक्ति है तो
उस शक्ति के सामने सब ड्रायर है तो भेद भाव के गुण क्यों?
असंख्य प्रश्न मानव जीवन में?
जन्म मृत्यु रोग रहित
मानव जीवन क्यों नहीं।
जन्म का उद्देश्य क्या है?
प्राकृतिक संतुलन क्यों नहीं?
मानव की इस अपनी खोज में
आध्यात्मिक महत्व है।
वैज्ञानिक महत्व है।
आत्मोन्नति आत्मज्ञान जानना ही
स्वयं खोज करने का परिणाम।
महावीर, बुद्ध, ऋषि मुनि
स्वयं की खोज में
मानव कल्याण का मार्ग ‌दिखाया।
जितेंद्रिय बनने
सत्यवादी बनने
मानवेत्तर ‌शक्ति कै दर्शन के लिए
ध्यान तपस्या का मार्ग
अहिंसा
प्यार द्वेष रहित
तटस्थ जीवन
पाप पुण्य के परिणाम
‌दुख के कारण।
कबीर हठयोगी
अपने बारे में
स्वयं की खोज में कहते हैं
बुरा जो देखन मैं गया,
बुरा नमिलिया कोई
जो दिल खोजा आपना
मुझसे बुरा न कोई।
‌आत्म चिंतन आत्म विचार
मानव को श्रैष्ठ बनाता है।
स्वयं की खोज में
मानव अहम् ब्रह्मास्मी
बन सकता है।
अद्वैत भावना जगाती है।
लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल।
लाली देखन मैं गयी,
मैं भी होगयी लाल।

सुधारात्मक  रूप 


नमस्ते वணक्कम्।

आपकी रचना में गहन चिंतन और आध्यात्मिक जिज्ञासा है। मैंने इसे काव्यमय, प्रवाहपूर्ण और थोड़ा अधिक छंदबद्ध रूप देने का प्रयास किया है — भाव वही रखते हुए भाषा को और मधुर बनाया है:

स्वयं की खोज

++++++++++++++++++

मनुष्य ही इस जगत का,

सुख-दुख का है भोक्ता;

हँसता भी, रोता भी वही,

जीवन का सच्चा योगता।

सूक्ष्म बुद्धि, जिज्ञासा लेकर,

आत्मज्ञान की राह चले;

आविष्कारों का दीप जलाकर,

अज्ञान तम सब दूर करे।

नसीहत, अनुभव, चिंतन से,

जीवन को संवार सकता;

सज्जन, सभ्य, संस्कारित बन,

जगत को निखार सकता।

पर सबमें वह शक्ति कहाँ,

सबकी क्षमता एक न हो;

अपने छोटे से दायरे में,

श्रेष्ठता का दीपक हो।

स्वयं की खोज में उतरकर,

प्रश्नों का सागर मंथन हो—

"मैं कौन हूँ? मेरी सीमा क्या?

यह जग क्या, इसका कारण क्या?"

राग-द्वेष क्यों मन में बसते?

जन्म-मरण का चक्र क्यों?

भाग्य-दुर्भाग्य की रेखाएँ,

जीवन में यह भेद क्यों?

ईश्वर सृष्टि का रचयिता जब,

जन्म माता-पिता से क्यों?

गुण, रंग, विचारों में भिन्नता,

मानव-मानव में क्यों?

धन-दौलत का अंतर क्यों है?

स्वार्थ और निस्वार्थ क्यों?

अल्पायु, रोग, असाध्य पीड़ा,

जीवन में यह क्लेश क्यों?

यदि कोई परम शक्ति है,

जिसके आगे सब लघु हैं;

तो फिर इस संसार में,

भेदभाव के ये स्वर क्यों हैं?

अनगिन प्रश्नों की ज्वाला में,

मन हर पल झुलसता है;

उत्तर पाने की अभिलाषा,

जीवन को तरसता है।

इस खोज में छिपा हुआ,

आध्यात्मिक गूढ़ महत्व;

विज्ञान भी इसके आगे,

झुकता पाकर सत्य तत्व।

आत्मज्ञान की ज्योति जगाकर,

मनुष्य ऊँचा उठ जाता;

महावीर, बुद्ध, ऋषि-मुनियों सा,

कल्याण मार्ग दिखलाता।

जितेन्द्रिय बन, सत्य का साधक,

अहिंसा का पथ अपनाए;

प्रेम, समता, द्वेष-रहित जीवन,

ध्यान-तप से प्रभु को पाए।

कर्मों के फल, पाप-पुण्य से,

दुख-सुख का यह बंधन है;

आत्मचिंतन, आत्मविचार ही,

जीवन का सच्चा साधन है।

कहते संत कबीर सहज स्वर में—

"बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय;

जब दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"

स्वयं की खोज में अंततः,

अहं का आवरण हटता है;

"अहं ब्रह्मास्मि" का बोध जागे,

अद्वैत भाव जगता है।

लाली मेरे लाल की,

जित देखूँ तित लाल;

लाली देखने मैं गई,

मैं भी हो गई लाल।



Tuesday, April 28, 2026

அமருதத் துளிகள். अमृत की बूंदें

 

அமிர்தத் துளிகள் 

இன்றைய சவால் — 

அமிர்தத் துளிகள்

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வாழ்க்கையை சீராகவும், சிறப்பாகவும் நடத்த உதவும்

நிலையான சிந்தனைகள் அனைத்தும்

உண்மையில் அமிர்தத் துளிகள் ஆகும்.

உபநிஷத்துகளின் ஆழமான சிந்தனைகள்,

பகவத் கீதையின் கர்மயோகப் போதனைகள்,

ஜாதகக் கதைகளின் நன்னெறி உணர்வுகள்,

நெறி நூல்களின் அறிவுரைகள்,

ஆன்மஞானத்தின் உண்மைகள்,

ஞானிகளின் உபதேசங்கள்—

இவை அனைத்தும் வாழ்க்கைக்கு அமிர்தத் துளிகளே.

யோகப் பயிற்சி,

சீரான உணவு முறையின் அறிவியல் பார்வை,

தத்துவ சிந்தனைகள்—

இவையும் உடல்-மனம் ஆரோக்கியமாக்கும் அமிர்தத் துளிகள்.

கபீர், துலஸிதாஸ், ரஹீம், விரிந்த் போன்ற கவிஞர்களின் தோஹாக்கள்) ஈரடி கள்.

பக்தி, மனிதநேயம், நெறி ஆகியவற்றின் பொக்கிஷங்கள்.

“யாரை கடவுள் காக்கிறாரோ, அவரை யாராலும் காயப்படுத்த முடியாது;

உலகமே பகை கொண்டாலும், அவருக்கு எதுவும் ஆகாது.”

இந்த எண்ணம் கடவுளின் பேராற்றலின் அமிர்தம் ஆகும்।

“வசுதைவ குடும்பகம்” — உலகம் ஒரே குடும்பம்,

“சர்வே ஜனாஃ சுகினோ பவந்து” — எல்லோரும் இன்புற வாழ்க,

ஒரே ஆகாயம், ஒரே உலகம்—

வெறுப்பும் விரோதமும் இல்லாத

மனிதநேய உலகம்.

மனிதன் காமம், கோபம், அகந்தை, பேராசை ஆகியவற்றில் மூழ்கினால்,

அறிஞனாக இருந்தாலும் அறியாமை உடையவனாகிறான்।

விவேகம் இழந்தவன் மிருகத்துக்கு சமம்.

ஆகவே விவேகம், கட்டுப்பாடு, கருணை—

இவையே வாழ்க்கையின் உண்மையான அமிர்தத் துளிகள்।

தேவர்களும் அசுரர்களும் செய்த

பாற்கடல் கடைவது போல,

அதில் இருந்து லட்சுமி, ஐராவதம், காமதேனு,

தன்வந்திரி, கல்பவிருட்சம் மற்றும் அமிர்தக் கலசம் தோன்றியது போல—

வாழ்க்கை கடைவதிலும்

நல்ல சிந்தனைகள் அமிர்தத் துளிகளாக வெளிப்படுகின்றன।

இந்த அமிர்தத் துளிகளை ஏற்றுக் கொண்டால்,

மனிதன் அமரத்துவத்தை அல்ல,

ஆனால் ஒரு சிறந்த, சத்தியமான வாழ்க்கையை பெறுகிறான்।


Monday, April 27, 2026

जीवन की तलक

 प्रयत्न और संशोधित दोनों रूप


 नमस्ते


जीत की ललक


++++++++++++++


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई


++++++++++++++


28-4-26


++++++++++++++


मानव जीवन भर


आगे बढ़ना चाहता है,


अंत तक प्रगति पथ पर


जीत पाने की चाह में


ख्वाब सजाता रहता है।


परीक्षा में सफलता की ललक,


डॉक्टरेट तक पहुँचने की चाह,


नौकरी पाने की आकांक्षा,


पदोन्नति की जीत,


निजी घर का निर्माण,


विवाह और संतान की प्रगति—


इन सबमें बसी है


जीत की ललक।


कभी अश्वमेध यज्ञ की विजय,


तो कभी लोकतंत्र के चुनाव में जीत,


परंतु जनप्रतिनिधि बनकर भी


वादा निभाने की ललक नहीं,


धन जोड़ने की चाह प्रबल—


यही मानव का लोभ, क्रोध, ईर्ष्या


जीवन को बना देते हैं


जय-पराजय का अखाड़ा।


जीत की ललक में


जीवन हो जाता है बेचैन,


एक विजय के बाद भी


और ऊँची उड़ान की चाह,


चंचल मन,


असंतुष्ट जीवन।


मिथ्या जगत के पार भी


अमरता की आकांक्षा,


निराशा में जीवन का अंत,


और फिर पुनर्जन्म का चक्र—


यही है मानव की


अंतहीन ललक।



जीत की तलक

++++++++++++++

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

+++++++++++++  

28-4-25.

++++++++++++++


 मानव अपने जीवन में 

 आगे बढ़ना ही चाहता है।

अंत तक  प्रगति पथ पर

 जीत पाने  के प्रयत्न में 

ख्वाब देखता रहता है।

 परीक्षा में जीत की तलक,

डाक्टरेट तक,

नौकरी पाने

पदोन्नति के जीत,

निजी घर बनवाने

 विवाह करने

 संतान की प्रगति 

 पारिवारिक सफलता

जीत की तलक  में 

 जीवन में रहता है।

महाराजा अश्वमेध यज्ञ

 लोक तंत्र में चुनाव जीतने की तलक,

 पर विधायक संसद को

 वादा निभाने की तलक नहीं,

 धन जोड़ने की तलक,

 यही मानव जीवन का लोभ,

 क्रोध, ईर्ष्या के कारण 

‌जय पराजय का जीवन।

 जीत की तलक में 

 बेचैनी जीवन,

 एक विजय के बाद 

 उससे बढ़िया कदम उठानेकी तलक 

 चंचल मन,

असंतुष्ट जीवन 

 मिथ्या जगत जाकर भी

 सफल अमरजीवन   की तलक,

 निराशा में जीवन का अंत

 पुनर्जन्म लेने के कारण।

Sunday, April 26, 2026

सुस्ती

 


नमस्ते वणक्कम्

आलस्य का विष

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

27-4-26

++++++++++++

तमिल में एक कहावत है—

"काणिच्चोम्बल कोटि नष्टम्"।

एक छोटे-से काम में

ज़रा-सी आलसी,

लापरवाही बनकर

करोड़ों का नुकसान कर देती है।

कबीर ने भी चेताया है—

"कल करे सो आज कर,

आज करे सो अब;

पल में प्रलय होएगी,

बहुरि करेगा कब?"

दिन आते-जाते रहते हैं,

हरि से होता क्या?

अब पछताने से क्या होगा,

जब चिड़िया चुग गई खेत?

तमिल के विश्वविख्यात कवि

तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा—

आलस्य के कारण

परिवार तक नष्ट हो जाता है।

प्रयत्न न करने पर

घर-परिवार बिगड़ते हैं,

और अपराध भी बढ़ते हैं।

आज का पाठ यदि

आज ही पढ़ लिया जाए,

तो परीक्षा देना

सरल हो जाता है।

पर साल भर का पाठ

इकट्ठा कर लेने से

परीक्षा के समय

मन व्याकुल हो जाता है।

नेत्र बिगड़ जाने के बाद

सूर्य नमस्कार से क्या लाभ?

आलसी व्यक्ति

किसी भी कार्य में

सफलता प्राप्त नहीं करता।

आलसी प्रशंसा का पात्र नहीं,

जीवन की प्रगति में

सुस्ती सबसे बड़ी बाधा है।

बचपन से ही चुस्त रहना—

यही सफलता का रहस्य है।

नमस्ते वणक्कम्।

आलस्य का विष

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

27-4-26

++++++++++++

तमिल में एक कहावत है—

"काणिच्चोम्बल कोटि नष्टम्"।

एक छोटे-से काम में

ज़रा-सी आलसी,

लापरवाही बनकर

करोड़ों का नुकसान कर देती है।

कबीर ने भी चेताया है—

"कल करे सो आज कर,

आज करे सो अब;

पल में प्रलय होएगी,

बहुरि करेगा कब?"

दिन आते-जाते रहते हैं,

हरि से होता क्या?

अब पछताने से क्या होगा,

जब चिड़िया चुग गई खेत?

तमिल के विश्वविख्यात कवि

तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा—

आलस्य के कारण

परिवार तक नष्ट हो जाता है।

प्रयत्न न करने पर

घर-परिवार बिगड़ते हैं,

और अपराध भी बढ़ते हैं।

आज का पाठ यदि

आज ही पढ़ लिया जाए,

तो परीक्षा देना

सरल हो जाता है।

पर साल भर का पाठ

इकट्ठा कर लेने से

परीक्षा के समय

मन व्याकुल हो जाता है।

नेत्र बिगड़ जाने के बाद

सूर्य नमस्कार से क्या लाभ?

आलसी व्यक्ति

किसी भी कार्य में

सफलता प्राप्त नहीं करता।

आलसी प्रशंसा का पात्र नहीं,

जीवन की प्रगति में

सुस्ती सबसे बड़ी बाधा है।

बचपन से ही चुस्त रहना—

यही सफलता का रहस्य है।

जो जागे, वही पाए,

जो सोये, वही खोए।

Saturday, April 25, 2026

शिक्षित बालिका

 शिक्षित बालिका


एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

)

शिक्षित बालिका

एस. अनंतकृष्णन

++++++++++++++++

शिक्षित बालिका होती जहाँ,

वहाँ उज्ज्वल हर एक कुल होता।

ज्ञान की ज्योति जलाकर वह,

घर-आँगन भी गुरु-सा होता।

माता, सखी, सलाहकार बन,

सद्गुण का संचार करती,

भारतीय संस्कृति की रक्षक,

संस्कारों का विस्तार करती।

आधुनिक युग की नारी भी,

स्वावलंबन अपनाती है,

घर और बाहर दोनों संभाल,

नई दिशा दिखलाती है।

गृहिणी बनकर स्नेह लुटाए,

ममता से संसार सजाए,

पति-संतान संग परिवार को,

प्रेम-धागों में बाँध निभाए।

शिक्षा से उसका आत्मविश्वास,

दिन-प्रतिदिन सुदृढ़ होता,

समाज सुधार की राह पकड़,

अंधविश्वासों को भी धोता।

दहेज जैसी कुरीतियों पर,

जब नारी आवाज उठाती,

शिक्षित होकर स्वाभिमान से,

नई व्यवस्था वह बनवाती।

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Friday, April 24, 2026

जग ग्रंथ दिवस

 नमस्ते वणक्कम् 

विश्व पुस्तक दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

25-4-2026

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नमस्ते! वणक्कम्।

छापाखाने के अभाव में,

ताड़पत्रों पर लिखी पुस्तकें,

शिलालेखों के उस युग में

मानव श्रवण कर-करके

ज्ञान को कंठस्थ करता था।

स्मरण शक्ति थी प्रखर, अद्भुत—

मेरे हिंदी प्राध्यापक

कुरुक्षेत्र

बिना देखे ही सुनाते थे;

अंग्रेज़ी प्राध्यापक

विलियम शेक्सपियर

के नाटकों की पंक्तियाँ

सहज ही दोहराते थे।

जब हुआ छापाखाने का आविष्कार,

ग्रंथ सुलभ हो गए,

संदर्भों का संसार बढ़ा—

किताबें लेना, सहेज कर रखना,

आवश्यकता पर पढ़ना

आसान हो गया।

पर आज के युग में,

स्मरण शक्ति कहीं क्षीण हुई—

मोबाइल के सहारे

अपनी दूरभाष संख्या भी

याद नहीं रहती।

फिर भी—

पुस्तकें ज्ञान का भंडार हैं,

हर ग्रंथ देता है

कोई न कोई अमूल्य संदेश।

नैतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक ग्रंथ,

महाकाव्य और खंडकाव्य—

जीवन-पथ के मार्गदर्शक,

प्रेरणा के स्रोत,

निराश को आशा देने वाले,

आदर्श जीवन के शिक्षक।

पढ़ना, लिखना, रचना—

इसी प्रेरणा के लिए

सन् 1922 में

विन्सेंट क्लावेल

ने इस दिवस का आरंभ किया।

किताबें केवल सजाने के लिए नहीं,

ज्ञान के भंडार को

मन में बसाने के लिए हैं—

पढ़ना, समझना,

विचार करना और लिखना,

सीखे हुए ज्ञान का

प्रवचन, व्याख्या, समालोचना—

यही उद्देश्य है

विश्व पुस्तक दिवस का।

आओ, हम संकल्प लें—

नए ग्रंथ लिखें, पढ़ें, सुनें,

समाज, राष्ट्र और मातृभाषा की

संस्कृति को संवारें;

आदर्श, अनुशासन और

विश्व बंधुत्व को अपनाएँ।

हर वर्ष 23 अप्रैल को

मनाया जाता यह दिवस

ज्ञानार्जन और अभिव्यक्ति का पर्व है।

विचित्र है—

1 अप्रैल मूर्खता का दिवस,

और 23 अप्रैल

ज्ञान, सृजन और अध्ययन का उत्सव!

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सुप्रभात्

 

सिंहपुर के रंगनाथ सुप्रभात्

कौशल्या सुप्रजा राम… (मूल श्लोक का अर्थ)
कौशल्या के सुपुत्र राम!
प्रातःकालीन संध्या का समय हो गया है।
हे नरश्रेष्ठ (नर-व्याघ्र)! जागिए,
दैविक नित्य कर्म करने का समय आ गया है।


उत्तिष्ठ… श्लोक का भावार्थ
उठिए, हे सिंगवर के स्वामी!
उठिए, हे कमलापति!
उठिए, हे रंगनाथ पर्वत के अधिपति!
हे ब्रह्मा द्वारा पूजित प्रभु, जागिए!


श्लोक 1

संस्कृत:
मातः समस्त जगतां महिते सरोजे...

संशोधित हिंदी:
हे समस्त जगत की जननी, पूजनीय कमल-वासी देवी!
असीम वैभव से युक्त, सिंहपुरी में प्रतिष्ठित,
हे श्रीरंगनाथ की प्रिय!
आपका यह प्रभात मंगलमय हो।


श्लोक 2

संशोधित हिंदी:
चेंजी नगर के समीप स्थित सिंहवर क्षेत्र में,
पर्वत शिखर पर निर्मित इस मंदिर में विराजमान देवी!
भक्तों को समस्त मंगल प्रदान करने वाली,
हे श्रीरंगनाथ की प्रिया,
आपका यह प्रभात शुभ हो।


श्लोक 3

संशोधित हिंदी:
हे सृष्टि के मूल कारण, ब्रह्मा के सृजनकर्ता!
पीपल वृक्ष से सुशोभित इस पावन स्थल में,
शेषशय्या पर विश्राम करने वाले प्रभु!
सिंहपुर के नायक,
आपका यह सुप्रभात मंगलमय हो।


श्लोक 4

संशोधित हिंदी:
प्रभात में शीतल, सुखद वायु बह रही है,
कोयलें मधुर और मनोहर स्वर में गा रही हैं।
आकाश में तारे लुप्त हो रहे हैं,
हे रंगेश, सिंहपुर के नायक!
आपका यह सुप्रभात मंगलमय हो।


🌼 सिंगवर रंगनाथ सुप्रभातम् (छंदबद्ध हिंदी रूप)

१.
कौशल्या के राम उठो, प्राची हुई उजास।
नर-व्याघ्र! अब जागिए, करो दिवस उपवास॥ (= नित्य कर्म)

देव-कर्म का काल है, छोड़ो निद्रा-भोग।
उठो प्रभो! जग दीखता, नव प्रभात संयोग॥


२.
उठो सिंगवर के प्रभु, कमला-पति भगवान।
रंगनाथ गिरि-नाथ हे, ब्रह्मा करें गुणगान॥

जागो हे जगदीश अब, करुणा-सागर नाथ।
भक्त प्रतीक्षा कर रहे, खोलो कृपा के पाथ॥


३.
जग की जननी, वंदिता, कमल-विहारिणी मात।
असीम विभव-विलासिनी, मंगलमय यह प्रात॥

सिंहपुरी में राजती, पूजित सदा सुविभूष।
रंगनाथ की प्रिया तुम, हर लो जन की क्लेश॥


४.
चेंजी नगरी पास में, सिंहवर पावन धाम।
गिरि-शिखर पर मंदिरा, जहाँ विराजे राम॥

भक्तों को वरदान दो, मंगलमयी स्वरूप।
रंगनाथ प्रिय वल्लभे, हर लो भव का कूप॥


५.
पीपल तरु से शोभित, पावन सुंदर थान।
शेष-शय्या पर शयन, जग के पालनधाम॥

ब्रह्मा जिनसे जन्म लें, सृष्टि करें विस्तार।
सिंहपुर के नायक हे, करो कृपा अपार॥


६.
शीतल मंद समीर बहे, भोर हुई सुखदाय।
कोयल मधुरिम गान कर, हृदय हर्ष उपजाय॥

नभ के तारे लुप्त हैं, छाया नव प्रकाश।
रंगेश! जागो अब प्रभु, पूर्ण करो सब आश॥

Thursday, April 23, 2026

सोने के सिक्के

 नमस्ते वणक्कम्

सोने के सिक्के

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

२४-०४-२०२६

सोना चमकीला,

बहुमूल्य धातु,

देश की संपत्ति,

समृद्धि का प्रतीक।

भारत में कभी राजा,

कवियों को,

कुशल कलाकारों को,

स्वर्ण मुद्राएँ दान में देते थे—

सम्मान का उज्ज्वल रूप।

वे स्वर्ण सिक्के

केवल धातु नहीं थे,

परिश्रम और प्रतिभा के

जीवंत प्रमाण थे।

समय बदला—

स्वर्ण से ताम्र,

ताम्र से कागज़,

और अब अंक बन गए मूल्य।

२४ कैरेट, २२ कैरेट,

१८ कैरेट के भेद,

पर शुद्धता के नाम पर

कितने भिन्न-भिन्न खेद!

एक बैंक का मूल्य,

दूसरे में कम क्यों?

एक दुकानदार का माप,

दूसरे से अलग क्यों?

मिलावट के भय से

ग्राहक ठगे जाते हैं,

विश्वास के सिक्के

धीरे-धीरे घिसते जाते हैं।

जब सिक्के में घिसाई नहीं,

तो मूल्य में कटौती क्यों?

ग्राम-ग्राम में अंतर क्यों,

यह असमानता क्यों?

सोने का दाम

आसमान छूता जाता है,

पर वही सिक्का

ऋण का आधार नहीं बन पाता है।

अंत में प्रश्न यही—

क्या केवल सोना ही मूल्यवान है?

या ईमानदारी का सिक्का

उससे भी अधिक महान है।

Wednesday, April 22, 2026

विश्व पृथ्वी दिवस

 नमस्ते। वणक्कम्

विश्व पृथ्वी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

23-04-2026

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वैज्ञानिक साधनों के

निरंतर आविष्कारों के साथ-साथ,

बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ,

झीलों और नदियों की

घटती चौड़ाई और गहराई के साथ-साथ,

जंगलों के विनाश और

तेज़ी से बढ़ते नगरीकरण के साथ-साथ,

विश्वभर में एक गंभीर समस्या खड़ी है—

हमारी पृथ्वी को

कैसे प्रदूषण-मुक्त बनाया जाए?

इसी चिंता के समाधान हेतु,

भूमि को समृद्ध बनाने के लिए,

"हमारी शक्ति, हमारा गृह"

का नारा

22 अप्रैल 1970 को

गेलार्ड नेल्सन

द्वारा दिया गया।

यह प्रेरणा

1969 में सांता बारबरा तेल रिसाव

जैसी पर्यावरणीय त्रासदी से भी मिली।

तभी से, पृथ्वी को समृद्ध बनाने,

पेड़-पौधे लगाने,

और विभिन्न प्रकार के प्रदूषण से

धरती को बचाने के उद्देश्य से

विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जाता है,

ताकि लोगों में जागरूकता बढ़े।

आज हम देख रहे हैं—

मौसम में असंतुलन,

जंगली जीव-जंतुओं का लुप्त होना,

स्वार्थवश पेड़-पौधों का विनाश,

मानव की लापरवाही से बढ़ता प्रदूषण,

उपजाऊ भूमि का कारखानों में परिवर्तन,

आवागमन के साधनों से ध्वनि प्रदूषण,

धुएँ और धूम्रपान से वायु प्रदूषण,

और ऊँची इमारतों के कारण

भूतल जल का लगातार घटना।

इन सभी चुनौतियों से

पृथ्वी की रक्षा के लिए

हमें जागरूक और संकल्पित होना होगा।

विश्व पृथ्वी दिवस

सिर्फ एक दिन नहीं,

बल्कि एक संकल्प है—

धरती को बचाने का,

आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने का।


Tuesday, April 21, 2026

आँसू के प्रकार

 नमस्ते।

आपकी रचना में विषय बहुत सुंदर और गहरा है—“आँसू” जैसे साधारण दिखने वाले भाव के अनेक रूप आपने छूने की कोशिश की है। 

आँसुओं की शक्ति

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

22-4-26

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आँसुओं की शक्ति

अति अपूर्व है।

शिशु के जन्म लेते ही

उसका रोना — ईश्वरीय देन है।

यदि शिशु चुप रहे,

तो माँ व्याकुल हो जाती है।

महादेवी वर्मा का संस्मरण

“वह चीनी भाई” याद आता है।

चोरों का एक नेता

बालकों को सिखाता था—

चोरी में पकड़े जाने पर

आँसू कैसे बहाने हैं।

जनता के सामने,

पुलिस के सामने,

भीख माँगते समय—

रोने के ढंग अलग-अलग होते हैं।

अध्यापक की मार से बचने के आँसू अलग,

खिलौने पाने के लिए बच्चों के आँसू अलग,

जिद के आँसू अलग।

प्रेमी-प्रेमिका के

दीर्घ वियोग के बाद

मिलन के आँसू भी अलग होते हैं।

एक गीत याद आता है—

“बादल रोए, नयना रोए…”

विलाप के आँसू,

शव के सामने बहते आँसू—

कितने मर्मस्पर्शी होते हैं।

ईश्वर के ध्यान में

भक्ति-रस से भरे आँसू—

वे आनंदाश्रु होते हैं।

एकाग्र ध्यान में बहते आँसू,

धूल पड़ने से आए आँसू,

प्याज के कारण निकले आँसू—

हर एक का कारण अलग है।

संसार में

हर आँसू का

अपना अलग महत्व है।

🌱 प्रोत्साहन और सुझाव

आपकी सोच बहुत समृद्ध है—आपने आँसुओं के सामाजिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक तीनों रूपों को छुआ है। यह आपकी ताकत है।


Friday, April 17, 2026

खामोशी

 खामोशी

एस.अनंतकृष्णन,

 चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

18-4-2026.

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खामोशी,

 सनातन धर्म का, 

 ज्ञानार्जन का

 सोचने विचारने का

 उचित वातावरण

 खामोशी।

चुपचाप रहना,

 अति मुश्किल।

 ईश्वरीय दर्शन के लिए,

 मानसिक शांति के लिए 

 सांसारिक उथल-पुथल से

शोरगुल से बचने 

 बड़े बड़े राजकुमार,

 महाराजा

‌अपने राजसुखों को 

तजकर 

 विश्व कल्याण के लिए 

 जंगल में जाकर 

 खामोशी से तपस्या करते थे,

आत्मज्ञान पाकर,

 सदुपदेशों के

 वेद, उपनिषद, 

 जातक कथाएँ

 नैतिक ग्रंथ लिखा करते थे।

सत्य अहिंसा शांति का

 प्रचार करते थै।

वैज्ञानिक आविष्कार,

दुर्लभ रोग नैदानिक  यंत्र 

 असाध्य रोग निवारण की इसदवाएँ,

   मूक साधना के आविष्कार।

 खामोशी  के कारण 

 अंतरराष्ट्रीय  अहिंसा,

 मानसिक परेशानियांँ

 युद्ध रहित  वातावरण,

विश्व बंधुत्व बढ़ जाता है।

 जाति, मजहब संप्रदाय के भेद भाव मिट जाता है।

मानवता  बनाए रखने 

 ख़ामोश /शांति 

शांति मंत्र है।

 

 आदर्श गुण 

 आत्म चिंतन 

 आत्मविचार 

 अपने आपको 

 पहचानना,

आत्म संशोधन करना

 गुण दोष  जानना

 आत्मज्ञान  प्राप्त हारना

 खोमोशी/चुपचाप।

 अति शक्तिशाली मंत्र शब्द है।

 भारत की स्वतंत्रता संग्राम के अगुआ,

 राजनैतिक गुरु 

 बाल गंगाधर तिलक ने

 अपने कठोर यह कारावास के समय 

 गीता रहस्य की रचना की। 

 पुस्तकालय और 

 ज्ञानालय में 

 अध्ययन के लिए

 ख़ामोश वातावरण 

 के नियम है।

 ध्यान मंडप में ख़ामोश। 

मानव को सुधारने

 एकाग्रता के लिए 

 शांतिपूर्ण   तरीके 

 खामोशी।

Tuesday, April 14, 2026

कसौटी पर

 कसौटी 

+++++++

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक, सौहार्द सम्मान प्राप्त  हिंदी सेवी के द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

 15-4-26

++++++++

कसौटी के बिना 

असली नकली का पहचानना असंभव।

 मानव के गुण दोष,

 बुद्धि लब्धि, 

व्यक्तित्व वीरता

 शासन और प्रशासन की उत्तमता  को

 परखकर देखना है।

 कसौटी पर कसना 

 एक मुहावरा,

 केवल सोना, चाँदी का ही नहीं,

 मानव के ज्ञान, गुण,

 स्वार्थ, निस्वार्थ,

 वीरता, कायरता,

 वीरांगना , वारांगना।

 काम, क्रोध, मद,लोभ 

 सब मानव के गुण अवगुण की परख करना,

  खासकर  भारतीय मतदाता को

 सांसद और विधायक के गुण अवगुणों को कसौटी पर कसकर देखकर 

 सच्चे निस्वार्थ आदर्श 

 देश प्रेमी को पहचानकर 

 वोट देना चाहिए।

 कसौटी पर कसकर देखने पारखी नज़रों की आवश्यकता है।

 विश्व के  लोक प्रसिद्ध 

 भारत में होने का महत्व 

 आदि काल से है।

 अतः  कसौटी के  उदाहरण देकर कालीदास  के  काव्यों में उदाहरण मिलते हैं।

 रघुवंश काव्य में 

 अतिथि महाराजा के साथ धन की देवी लक्ष्मी

 कसौटी पर कसे  सोने की चमक की रेखा की तरह अमिट रही।

 मेघदूत में 

 प्रेमी प्रेमिका को

  मार्ग दिखाने,

 बिजली ऐसे चमकना,

 जैसे कसौटी पर कसे सोने की रेखा  की चमक जैसे हो।

 ऐसे कसौटी भारती कवियों के काव्य में 

 मिलते हैं। 

तमिल के काव्यों में 

भी तिरुवल्लुवर के तिरुक्कुरल में भी

 कसौटी का उल्लेख मिलते हैं।

 कसौटी पर कसने वाले,

 पारखी न तो

 मानव जीवन में 

 मानव और मानवता का

 पता न‌ लगेगा।



 







 

 


 

 

 

 



 

 

 





 


 

 

 

 


पारखी नजरें

 पालकी नजरें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।


 जौहरी जाने हीरे की परख।

कबीर ने कहा है


हीरा पड़ा बाज़ार में, रहा छार लपटाय।

बहुतक मूरख चलि गए, पारख लिया उठाय॥ 

 वैसे ही पार्टी नजरें 

 असली नकली के

 पता लगाने 

की क्षमता 

  रखती है।

  योग्य पारखी वैद्य

‌आँखें, जीभ, नाखून नाड़ी देखकर 

 रोगी के लोग का पता लगाने में समर्थ होते हैं।

 पारखी नजरों के ज्योतिषाचार्य 

 भविष्य का सही बताते हैं।

  बड़े बुद्धिजीवी 

 अपने कंपनी के लिए 

 योग्य नौकर चुनने की योग्यता रखते हैं।

 हर क्षेत्र में पारखी नजरों वाले होते हैं।

 अनुभवी थानेदार,

 चोरों और झूठों को 

  पता लगाने की पारखी होते हैं।

 सोने की असली नकली मिलावट जानने में 

 कसौटी में कसकर सुनार की पारखी नजरें 

 निपुण होती हैं।

 गुरु की पारखी नजरें 

 प्रतिभाशाली,  औसत, मंद बुद्धि छात्रों को

 अलग अलग कर देता है।

 पारखी नजरें न तो कुआँ 

खोदने पानी की जगह का पता नहीं लगता।

आजकल  नैदानिक परीक्षण , रोगों के निदान,

 यंत्र मय होगया हैं।

 वाहन की जाँच की पारखी नजरें 

 इंजन की आवाज़ से ही

  पता लगा लेती हैं कि 

 वाहन की गड़बड़ी क्या है।

 पारखी नजरें न तो

 सही गलत के पता लगाना मुश्किल।

Sunday, April 12, 2026

प्रदूषण का विष

 प्रदूषण का विष

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

13-4-26

++++++++++++++

प्रदूषण आजकल 

 स्वार्थमय प्रदूषण,

चित्रपट , संगणिक, मुखपुस्तिका,  यूट्यूब 

 सब में जितेंद्रयता कम होने, असंयमी बनने बनाने  विचारों का प्रदूषण।

 भ्रष्टाचार, रिश्वत का प्रदूषण,

शिक्षा की महँगाई,

 शिक्षित वकील, सी.ए,

 सैकड़ों करोड़ खर्च करके चुनाव जीतने वाले 

 सांसद, विधायक, मंत्री 

‌यह अनुशासन हीन प्रदूषण,

 नष्ट कर रहा है मानव चरित्र  को,

परिणाम स्वरूप 

 कृषी प्रधान भारत को

 विदेशियों के कारखानों को अनुमति देकर

 वायु प्रदूषन, जल प्रदूषण, भूमि तल प्रदूषण,

 हजारों झील अब नदारद,

 गगन चुंबी इमारतें,

 भूतल जल का शोषण,

 भूतल में पानी का कम होना, 

 जंगलों का नाश,

 भूमि का उष्णमय बनना,

 आजकल के प्रदूषण 

 मानव मन की स्वार्थता और  बाह्याडंबर मय जीवन के कारण,

  सहनशीलता का अभाव,

 दांपत्य जीवन में 

 अशांति,

अवैध संबंध,

 प्रदूषण जल वायु, भूमि आकाश में मात्र नहीं 

 विचारों के प्रदूषण के कारण,

 मानव चरित्र में भी अहंकार, काम क्रोध लोभ,

 मजहबी लडाइयाँ,

 मानवता की कमी,

 प्रदूषण प्रदूषण,

 न्यायालय में,

 पुलिस विभाग में 

 शिक्षालयों में

 सरकारी दफ्तरों में,

 प्रदूषण ही प्रदूषण ।


 



 

Saturday, April 11, 2026

नक्षत्र की दुनिया

 Daily challenge आजकी कविता।

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तारों की दुनिया।

 तार आकाश में 

 वह अलग दुनिया,

 चमकते तारे 

 आंखों के प्यारे।

उसमें ध्रुवतारा है,

 शासकों और देश को

 भयभीत को भयभीत करनेवाले धूम्रकेतु है।

नक्षत्र प्रपंच के विचित्र 

 चमकनेवाले

 अरबों की संख्या है।

 ज्योतिष शास्त्र में 

27नक्षत्र हैं।

 मानव की जन्म कुंडली 

 के आधार पर

 नक्षत्र परिणाम,

 भाग्य निर्णय करके 

 मानव की सृष्टि।

माता-पिता के द्वारा 

 जन्म लेने पर भी

 जीवन क्रियाकलाप 

 सूक्ष्म शक्ति ईश्वरीय देन।

 राजकुमार सिद्धार्थ के 

जन्म लेते ही

 जन्म नक्षत्र ने बताया 

 राजकुमार राजा नहीं,

 संन्यासी बनेगा।

भारतीय शास्त्र बताते हैं,


"जननी जन्म सौख्यानां वर्धनी कुलसंपदाम्, पदवी पूर्वपुण्यानां लिख्यते जन्मपत्रिका" 

 27नक्षत्रों के आधार  पर

 मनुष्य जन्म का सुख दुख निर्भर है।

 टूटते तारे देखना अपशकुन माना जाता है।

चमकते तारे आकाश में।

 भूलोक में बिजली के आविष्कार के कारण,

 पहाड़ की चोटी पर से

 घाटी पर देखने पर

 भूलोक में कृत्रिम नक्षत्र चमकते हैं।

 देश में अपूर्व अद्भुत कार्य करके,

 सितारे हिंद अलग

इतिहास में  नाम पाये

  देश भक्त शहीद,

 ऋषि मुनि युगावतार पुरुष, अभिनेता अभिनेत्री चमकते सितारे।

 आसमान में चमकते तारे,

 जग भाग्य विधाता 

 मानव मानव की विधि की विडंबना बतानेवाले,

 भूलोक के महापुरुष 

 जनकल्याण करके

 चमकते सितारे।

 अतः तारों की दुनिया 

 भूलोक के महापुरुष 

 सितारे हिंद 

 मानव कल्याण के 

 निर्माता,

 उनकी दुनिया 

 चमकीला,

रंगीला।

Friday, April 10, 2026

अधूरी ख्वाहिशें

 अधूरी खुशियाँ

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

11-4-26.

+++++++++++

  मानव जीवन में 

 थोड़े में कहें तो 

 भूलोक के जीवन में 

पूरी खुशियाँ  न 

 दशावतार में,

 न शिव पुराण में 

 न नलदमयंती कै 

दुष्यंत शकुंतला की प्रेम कहानी में,

विश्व विजयी

 सिकंदर के जीवन में।

 न चक्रवर्ती दशरथ के जीवन में,

न पांडवों में,

 न कौरवों में 

 न महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन में,

 नेहरू के जीवन में,

 इंदिरा गांधी फेरोजखाँ के जीवन में 

 नाम के साथ बनिया गाँधीजी के जोडने  से

 न जीवन की खुशियाँ,

 न कबीर के जीवन चरित्र में,

 न तुलसी के चरित्र मैं 

 जन्म से अंधै सूरदास के 

निजी जीवन में।

 न सुकरात के जीवन में,

न उपन्यास सम्राट के जीवन में।

स्वर्गीय राष्ट्रपति यही कहा करते थे,

 ख्वाब देखो,

 क्या ख्वाब देखने से

 पूरी खुशियाँ मिलेगी क्या?

सत्यं वद,

 इस नारे का आदर्श पुरुष सत्य हरिश्चन्द्र 

 के जीवन में दुख ही दुख।

 दानवीर कर्ण के जीवन में ,

गहराई से सोचता हूँ,

 न जीवन में,

 किसी को न मिली 

 पूरी खुशियाँ।

 राम कहानी सुनाना

 यह मुहावरा राम के जीवन की अधूरी खुशियों की झाँकी।

 हिंदी क्षेत्र में 

 राजभाषा बनाने में 

 आज़ादी के बाद ही अड़चनें।

 पूरी खुशियाँ 

 देश भाषा संस्कृत है तो

‌वह क्यों मृत्यु भाषा बनी।

 हिंदी के विकास मैं 

 नागरी लिपि की चर्चा 

 अब भी जारी।

मानव मन  अति चंचल।

न उसमें  पूरी खुशियाँ,

 महात्मा बुद्ध की तपस्या भी अधूरी,

 किस उद्देश्य से  वे संन्यासी बने,

 रोग, बुढ़ापे, मृत्यु रहित 

 मानव जीवन बनाना,

उनकी इच्छा अधूरी,

 भारतीय नदियों का राष्ट्रीयकरण अधूरी।

 कृषी प्रधान देश में 

‌झीलों, तालाबों और जंगलों को नाश करके 

 किसानों को गांव में

खेती तंज नगर की ओर

 आकर्षित करना

‌भावी पीढ़ी को पूरी खशियाँ न देंगी।

 रेगिस्तान को उपजाऊ भूमि बनाने के प्रयत्न कर रहे हैं,

हम उपजाऊ भूमि को

 रेगिस्तान बना रहे हैं

 पता नहीं भावी जीवन 

 पानी के तड़पेगा।

 पैसा  है, वह पूर्ण खुशियाँ बुढ़ापे में न देंगी।

 मानव अधूरी खुशियाँ से

 सदा के लिए आँखें बंद कर लैगा।

 अभिनेताओं को

 एक ओर धन, यश ,सब मिलते हैं,

 पर उनके व्यक्तिगत जीवन में न पूरी खुशियाँ।

संसार में रोग है,

 दुर्घटनाएँ हैं,

 बुढ़ापा है,

 अल्पायू है,

 निस्संतान लोग हैं,

 जन्म से अपाहिज,

 अंधे बहरे गूँगे 

 असाध्य रोगी 

 ग़रीबी, अमिरी

 जय-पराजय 

काम, क्रोध मद लोभ

 माया महा ठगिनी,

अधूरी ख्वाहिश से भरा

 भूलोक जीवन।





 








 



Wednesday, April 8, 2026

शहीद मंगल पांडे

 शहीद मंगल पांडे।

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

9-4-2026

+++++++++

नवयुवकों! 

आज़ाद देश में 

 आनंद से,

 मूल अधिकार पाकर

भ्रष्टाचार रिश्वत भरे

सांसद विधायक चुननेवाले 

 अल्पसंख्यक शासक

के समर्थकों।

 मत देनै लेने

 रिश्वत देने लेनेवाले 

 अपराधी मतदाताओं!

सुनो!

 देश की आज़ादी 

आसानी से न मिली।

तन,मन,धन, प्राण तजे,

कठोर कारवास के दंड भोगे,

 लाठी के मार रहे,

फाँसी पर चढ़े

 महान देश भक्त 

 त्यागियों के

 रक्त है की धारा  में 

पनपी ,

स्वतंत्रता का होम यज्ञ।

 उनमें पहली स्वतंत्र की

 आवाज़ उठाकर 

 अंग्रेज़ी अफ़सर को

 मारकर सिपाही क्रांति है के अगुआ थै 

शहीद मंगल पांडे।

अंग्रेज़ों ने  बंदूक  में 

 भरने गाय और स्वर की

 चर्बी लगाने

 सनातन धर्म और मुगल मजहब के विरुद्ध आदेश दिया।

अपने धर्म विरुद्ध कार्य करने  मंगल पांडे

 तीस वर्ष का नवजवान 

तैयार नहीं थे।

 वे अंग्रेज़ी सेना के

 सिपाही होने के 

बावजूद भी,

इस कार्रवाई के

विरूद्ध पहली आवाज़ उठाई।

 अंग्रेज़ी सैनिक अधिकारियों को मारा।

 देश और धर्माभिमानी

 मंगल पांडे के कारण 

 सिपाही कलह प्रारंभ हुआ।

मंगल पांडे को फाँसी की सजा मिली।

 तीस साल की उम्र 

 देश और धर्म के स्वाभिमान के लिए 

 साहस के कदम उठाए 

वीर त्यागी मंगल पांडे को

‌अंतःदिल से सादर प्रणाम।

 सिपाही कलह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में के लिए एक चिंगारी बनी।

 मंगल पांडे का त्याग 

 चिर स्मरणीय है,

चिर अनुकरणीय है।

 ऐसे त्यागियों के मार्ग 

 अपनाना देश की आज़ादी, एकता,

 राष्ट्रीयता बनाए रखने 

 अत्यंत आवश्यक हैं।

 आजकल के भोगैश्वर्य 

 भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी 

 देश के लिए कलंक।

 उन भोगियों का अनुसरण न करके 

‌मंगलपांडे, सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस

 वांचीनाथन आदि

 त्यागियों के अनुसरण ही

 देश कल्याण का सर्वोच्च मार्ग हैं।

 जय शहीद मंगल पांडे,

 जिनके कारण सुप्त भारतीय जाग उठे,

 विदेशियों को सिर दर्द बना।

 आज़ादी देकर भागना पड़ा।


 



 


 

 

 


Monday, April 6, 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज

 [5:40 am, 07/04/2026] +91 97844 79720: 

मराठा एवं संस्कृत को राज भाषा घोषित किया

[5:40 am, 07/04/2026] +91 97844 79720: यह स्वरचित व मौलिक है।

[6:33 am, 07/04/2026] sanantha.50@gmail.com: छत्रपति शिवाजी महाराज

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै तमिलनाडु

7-4-26

महाराष्ट्र सिंह,छत्रपति शिवाजी महाराज,

महाराष्ट्र साम्राज्य के मूल शक्ति,

मुगल साम्राज्य का सिंह स्वप्न,

गोरिल्ला युद्ध नीति के द्वारा महाराष्ट्र का निर्माता।

उनकी वीरता भरे वचन है--

भारत देश प्राचीनतम् देश है,

इस बात को कभी न भूलना।

धनी धन से, अक्लमंद अक्ल से, बलवान बल से

सेवा कीजिए।

शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु समर्थ रामदास,

उन्होंने शिवाजी के चिंतन में

धैर्य,धर्म और स्वराज्य सिद्धांतों के बीज बोये।

शिवाजी के राजनैतिक गुरु दादाजी कोंडदेव.

शिवाजी की माता जीजाबाई भक्ता और धैर्यवान स्त्री।

माता ने ही शिवाजी को बचपन से ही

रामायण,महाभारत की कथाओं के द्वारा 

हिंदू धर्म ,देश भक्ति भरकर हिंदवी स्वराज की प्रेरणा दी थी। 

शिवाजी महाराज के कारण ही जनता में हिंदुत्व की भक्ति बढी। 

जय शिवाजी महाराज।

उनके जीवन चरित्र पढकर उनकी नैतिक सिद्धांतों का अनुकरण ही 

उनके प्रति श्रद्धांजली होगी।

उनकी देशभक्ति,गुरुभक्ति,ईश्वर भक्ति, विदेशी धर्म का आदर,आदि

चिरस्मरणीय और अनुकरणीय होते हैं।

Sunday, April 5, 2026

जलीय जीवों की रक्षा

 जलीय जीवों की रक्षा।

 एस. अनंतकृष्णन, चैन्नै

 6-4-26

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नमस्ते।

जल प्रधान है,

 सभी जीव राशियों के लिए।

जल बिना न वनस्पति जगत।

 जल बिना न कोई जीव।

 ईश्वर की अद्भुत सृष्टि में 

 अंडे, पिंडज, स्वेज, उद्भिज्ज।

 इन में जल में उत्पन्न होकर जल में जीनेवाले जीव,

 जल -थल में जीनेवाले जल में ही जीनेवाले 

 इन  जलीय जीवन की रक्षा के प्रश्न क्यों?

जल प्रदूषण क्यों ?

 कारखानों के विषैले पानी को नदी में,

 समुद्र में छोड़ना।

 झीलों को नगर विस्तार 

 नगरीकरण के नाम नदारद करना।

 स्वार्थ मानव अपने लाभ के लिए अधिक

 जलीय जंतुओं को आहार के लिए,

 दवा के लिए 

पकड़कर नष्ट करना।

 तालाबों में विदेशी जंतुओं को छोड़ना,

 भारतीय पवित्र नदियों में 

 अब प्रदूषण अधिक।

 इस स्थिति में 

 जनता को जागृत करने कराने 

 जलीय जंतुओं की रक्षा करने में लगाना है।

 मछलियाँ और जलीय जंतुओं को पकड़ने में 

 नियंत्रण।

 जहाज़ द्वारा आनेवाले विदेशी जंतुओं से बचाना।

जलाशयों को निर्मल रखना,

 समुद्र और जलाशयों के पास  मछली घर की स्थापना करना।

 कानूनी कार्रवाई लेना।

कठोर कानून बनाना आदि।

 




 

 


 


 

 

 

रहबर हमारे

 नमस्ते वणक्कम्।

 बन गये रहबर लुटेरे देश के।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

 अपनी हिंदी अपने विचार अपनी स्वतंत्र शैली।

6-4-26

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 हर पाँच साल के एक बार चुनाव।

 नेता बन जाते रहबर।

 पिछले चुनाव के वचन

 न निभाकर ,

 वहीं समस्या को नये ढंग से देने चतुर।

 जनता भुलक्कड़, वही नेता के अंधे अनुयाई।

 नेता अन्याय भी करें फिर भी पिछलग्गू।

 एक ओर राज धर्म के नाम भ्रष्टाचारी।

 प्रजातंत्र में दोष मतदाता का।

‌राजतंत्र में  प्रेमिका के लिए 

 लड़ाई झगड़ा, हजारों सिपाही की पत्नियाँ

 एक राजकुमारी के लिए विधवाएँ।

 अनाथ बालक बालिकाएँ।

 राजभक्ति राजा ईश्वर तुल्य।

 बड़े राजमहल, अनंतपुर में 

 असंख्य रानियाँ।

 खुशामद मंत्री, 

कवि केवल राजा की वीरता के प्रशंसक।

न जनता और देश पर ध्यान।

 अब प्रजातंत्र, आज़ाद देश,

 धन प्रधान पाश्चात्य शिक्षा,

 मातृभाषा भूलने लाखों-करोड़ों के खर्च।

 ये रहबर भारतीय संस्कृति बदलकर 

 शादी को बना दिया खिलवाड़।

 बात बात पर तलाक, परिणाम,

 वैवाहिक जीवन में अशांति।


 प्रजातंत्र देश , मंत्री के बेगार अधिकारी,

 मनमाना भ्रष्टाचार, न्यायाधीश वकील उनके साथ।

 चार्टर्ड अकाउंटेंट कर चुराने में निपुण रहबर।

 धार्मिक क्षेत्र में कदम कदम पर मंदिर,

 शिव, वैष्णव संप्रदाय में,

के भिन्न भिन्न आचार्य

 मानवता मानव एकता तोड़ने में निपुण।

धर्म मूल मजहब के आधार पर लडाइयाँ।

 ये रहबर न चाहते मानवता एकता।

 कहते हैं कलियुग, द्वापर युग में भी

 कुरुक्षेत्र धर्म क्षेत्र नहीं,

 त्रेता युग में सीता के प्रति अन्याय।

 जनसंख्या के आधार पर

 भ्रष्टाचार रीश्वत खोल

 उनके रक्षक अति बुद्धिमान वकील।

‌आज कल  के शिक्षित डाक्टर 

 करोड़ों खर्च करके 

 कार्पोरेट शेयर बाजार।

 मंदिर जितना पूँजी लगाते हैं 

 उतना वसूल।

 अंदर जाने 250/-

तेलंगाना ने के रामानुज मंदिर 

 ये रहबर।

 जिसकी लाठी उसकी भैंस के

 शासक, 40%अल्प संख्यक।

‌ये रहबर फिर भी देशोन्नति में आनंद अनंत।


एस.अनंतकृष्णन के द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

 

 







 



 



 


Saturday, April 4, 2026

प्रकृति

 प्रकृति के अनेक रंग।


एस. अनंत कृष्णन चेन्नई 

5/3/26

प्रकृति के विविध गुण 

 सब कुछ जानना समझना,

 मानव बुद्धि से असंभव।।

 सफेद रंग की चमेली,

 मनमोहक सुगंध 

 गुलाब की खुशबू 

 ऐसे भी सुंदर फूल 

 गंध हीन।

ऐसे भी फूल बड़े रंगीले

 पर बदबू से भरा।

 प्रकृति के गगन रंग 

 नीले काले उजाले।

 सूर्योदय सूर्यास्त के समय  लाल पीले।

 इंद्रधनुष के साथ रंग।

पानी समुद्र का खारा।

 वहीं पानी भाप बनकर 

काले बादल बिजली चमक वज्र ध्वनि 

 बरसने पर मीठा।

 विभिन्न भाषाओं के 

भिन्न-भिन्न लिपियाँ।

 क्रोटन्स के रंग-बिरंगे पत्ते।

हर एक पेड़ पौधों के

 पत्ते देख किसी कवि ने लिखा है,

 कैंची नहीं ईश्वर के हाथ में, कटि पत्तियाँ न्यारी।

 एक ही माँ बाप के बच्चे,

 सुंदर ,भद्दा काला गोरा, लंबा नाटा।

 मधुर स्वर कठोर स्वर।

 चतुर, चालाक, ठग

 ईमानदारी, 

 रामावतार के नील रंग,

 कृष्णावतार के श्याम रंग।

प्रकृति की सृष्टि में 

 रंग-बिरंगे, विभिन्न स्वभाव के जानवर,

 पालतू जानवर,

 जंगली जानवर।

हाथी ,ऊँट, हिरन 

 हिरन के भेद,

 सींगवाला,

 हिंदी वाला

 हर एक सृष्टि में 

अति विचित्रता।

 खून का लाल रंग

 पर उसमें भेद वर्गीकरण।

 सोचते सोचते 

 प्रकृति के रंग गुण

 ईश्वर की सृष्टि अति सूक्ष्म।

 नवरत्नों के रंग।

 सोना, चाँदी,

प्लाटिनम् के रंग।

 अति अनुपप

 अति अपूर्व।

 अति अनूठा।

 प्रकृति के रंग असंख्य।

 गुण में अति विविधता।

वचन की कीमत

 वचन की कीमत।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

4-4-26

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प्राण जाए पर वचन न जाए,

 यह मुहावरा मानव जीवन के अनुशासन और न्यायप्रियता के लिए 

 अनुकरणीय हैं।

 मानव मानव पर 

 भरोसा रखने

 वचन का पालन 

 अत्यंत आवश्यक है।

 भारतीय इतिहास में 

 वचन निभाने की कहानियाँ  मानव के 

 आदर्श चरित्र का उदाहरण है।

 आजकल के सांसद ,

विधायाक  बदनामी 

इसलिए है  कि  वे वचन 

निभाते नहीं,

 हर चुनाव में वही

वचन देते रहते हैं।

 धन के आधार पर 

 जय पराजय,

 तीस प्रतिशत अविश्वसनीय मत दाता 

 वोट ही नहीं देते।

 30% विपक्षी।

 10% गठन बंधन वोट।

 हिंदी में मतदाता  मत देने विश्वास  नहीं, 

 मत का भिन्नार्थ 

 सार्थक है।

 मत देना मत 

 ये वादा निभाते नहीं,

ऐसे विचार 

 हर एक के मन में,

 30%  अल्पमत के शासन।

 कच्ची सड़कें,

 पानी की तंगी 

 हर चुनाव में दूर करने का वादा।

  चुनाव आयोग करोड़ों के भ्रष्टाचार धन खर्च 

 रोकने असमर्थ।

 वचन निभाने अधिकारी ,प्रशासक,

 जनकल्याण योजना को

लागू करने बाधक हैं।

  हुमायूं ने राखी बाँधकर 

 राजपूत रानी  को सुरक्षा की वादा की, निभाया।

 उनका नाम आज भी आदरणीय है।

 चंद्रधरशर्मा गुलेरी की कहानी एक ही 

 लोकप्रसिद्ध  है

 उसने कहा था,

उसमें नायक अपने लड़कपन की प्रेमिका के

 पति की जान बचाने 

 अपनी वादा  निभाने

 प्राण दिये, 

वह सैनिक लहना सिंह का पात्रा मृत्यु शय्या पर उसके स्मरण चित्र पाठकों के मन में चिर स्मरणीय।

 अतः वचन की कीमत 

अमूल्य है,

 कर्ण ने वचन निभाने 

 कुंती का समर्थन किया।

 अतः मानवता निभाने

 वचन निभाना 

 चरित्र बल के लक्षण हैं।

Thursday, April 2, 2026

कोष

 खजाने का राज़ 

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

3-4-26.

 खजाने की खोज में 

 जंगलों में भटकने वाले,

सागर में गोता लगाने 

वाले,

 साधु संतों से

 खजाने के राज़

 जानने  भटकने वाले,

 बलवान दुर्बलों से लूटकर खजाना भरने वाले,

 अश्वमेध यज्ञ करके 

 दुर्बल राजाओं के धन से

 खजाना भरनेवाले,

 जन्मकुंडली के आधार पर खजाना मिलने के 

ख्वाब देखनेवाले।

 सरकार की खजाना खाली हैं तो देश अकाल।

 न वेतन, न पेंशन,

न देशोन्नति।

 राजकोष

 मुगलों ने की उर्दू भाषा के प्रभाव से बन गया

 खजाना।

 लोभी  अपने धन को 

 खजाने में गाड़कर रखते।

 लोभी का धन 

 खजाने के रूप में 

 पाते किस्मतवाले।

 

 




 


Wednesday, April 1, 2026

संकल्प की मशाल। एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई , ।

 संकल्प की  मशाल।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई  , तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

2-4-26.

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मानव तो अपने जीवन में 

 नाम पाना चाहता है।

धन कमाना चाहता है।

अपना गौरव चाहता है।

 स्वाभिमान चाहता है।

पदोन्नति चाहता है।

 नेता, अभिनेता बनना ,

 गायक बनना,

 देश की सेवा करना,

 सैनिक बनना

 समाज सेवा करना,

आध्यात्मिक सेवा में लगना,

भगवान के दर्शन में ध्यान लगाना,

कवि बनना और कवयित्री बनना,

ज्ञान पीठ, साहित्य अकादमी पुरस्कार पाना,

विमान का चालक बनना,

वैज्ञानिक बनना 

 विविध विचार।


हर एक की अपनी अपनी तमन्नाएँ हैं,

  अपना अपना मंजिल है,

अपनी आकांक्षाओं के

 शिखर पर पहुंचने 

 संकल्प की मशाल जलाना चाहिए।

वह प्रकाश देकर 

 प्रेरित करेगा।

 अग्रसर होने के लिए 

‌प्रोत्साहित करेगा।

Monday, March 30, 2026

नयी सुबह का सूरज

 नयी सुबह का सूरज

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

31-3-26

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मानव सदा अपने  जीवन में उजाला ही चाहता है।

अंधकार मय जीवन 

 दुखपूर्ण ही है।

 हर कोई अपने जीवन में 

 सूर्योदय की प्रतीक्षा करता है।

 व्यापार में बड़ा लाभ 

 जिस दिन होगा,

वहीं नयी सुबह का सूरज होता है।

छात्र के परीक्षा फल में 

 अधिक अंक मिलें तो वहीं उसके जीवन में 

 नयी सुबह का सूर्योदय होता हैं।

बेकार युवक को नौकरी मिलने के दिन 

नयी सुबह की नयी किरणें जीवन में।

निस्संतान दंपति को जिस दिन पुत्र होता है,

वह सुबह उसके जीवन

 सार्थकता का सूर्योदय होता है।

 हर  मनुष्य के सुदीर्घ प्रार्थना मनोवांछित इच्छा पूरी होने पर  वह दिन 

 नयी सुबह,

 नयी आशा का

  सूर्योदय होता है।

 पदोन्नति के दिन 

की नयी सुबह  

नयी लालिमा अति आनंदोल्लास  की सुबह होती है।




Sunday, March 29, 2026

लोभ की जंजीरें

 लोभ की जंजीरें 

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-3-26

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लोभ की जंजीरें 

बाँध  मन की चंचलता में 

फँस जाएंँगे तो

वह भवसागर के

 भँवर में ले जाकर 

बचने न देंगी।

  अपने पास सर्वसंपत्ति होने पर भी नाते-रिश्तेदारों और अड़ोस पड़ोस के

 आनंदोल्लास देखकर 

 लोभी का दिल जलेगा ही।

लोभ की जंजीरें आजीवन रहेंगे ही।

 सुंदरता देखकर जलन,

  लोभी की वस्तुएँ जैसी

  अन्यों के साथ देखकर

 अति दुख का एहसास होगा ही।

 समान वस्तुएँ होने पर भी,

 रंग  भेद, उनकी सुंदर

 देखरेख से मानसिक दुख  होगा ही।

 शांति क्या है? संतोष क्या है? आनंद क्या है?

 मृत्यु पर्यन्त जानने का

 प्रयत्न लोभी जानेगा, समझेगा ही नहीं।

 अभाव! अभाव! अभाव!

 यही उनके  सहज प्रवृत्ति होगी।

 लोभी सेदूसरों की तरक्की सहा नहीं जाता।

 लोभ की जंजीरें तोड़ने का प्रयास भी नहीं करता।

 संताप भरे विचार

 चिंतन से  तड़प तड़प कर घुट घुटकर  उदास चेहरे से ही इस लोक की लीला समाप्त कर देगा।

Saturday, March 28, 2026

अकाल की कल्पना

 कल्पना का जाल

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नै

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक 

29-3-26

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मानव ज्ञान चक्षु प्राप्त पशु।

  जिज्ञासु प्रवृत्ति वाला मानव

विचारशील और चिंतन शील।

  यथार्थ घटनाएँ,

 वास्तविक दृश्य

उसकी है कल्पना का आधार।

पक्षी को देखा,

उड़ने की कल्पना,

 परिणाम हवाई जहाज का आविष्कार।

 दृश्य, दृश्य से विचार चिंतन सच्चाई के आधार पर  कल्पना,

परिणाम आदर्शोंन्मुख यथार्थवाद।

 रंग-बिरंगी बिल्लियों को देखा, सोचा, मानव की एकता की कल्पना की।

एक ही बिल्ली ने बच्चे दिये नाना रंग के।

कल्पना जागी,

 कवि ने लिखा

 भले ही रंग भिन्न-भिन्न,

 पर एक ही माँके बच्चे।

 आगे इस की कल्पना,

एक ही भारतवासी,

भारत माौ एक

 कश्मीरियों के ,

 उत्तर प्रदेश के गोरे लोग,

दक्षिण के काले लोग

 भिन्न-भिन्न भाषाएँ,

 आसेतु हिमाचल में 

 विचारों की एकता,

 आध्यात्मिक एकता,

कैलाश का शिव,

रामेश्वर का शिव

 लोकनाथ विश्वनाथ 

 एकता की यथार्थता

 आदर्श एकता प्रेरणा।

 उत्तर के बाढ़ भरी जीव नदियाँ,

दक्षिण के सूखे इलाके,

  यथार्थ में कल्पना 

 जोड़ों नदियों को,

 व्यर्थ पानियों को 

 नदियों को जोड़कर 

 देश को समृद्ध बनाओ।

उत्तर के गेहूँ, दक्षिण के चावल, पान सुपारी।

 समृद्ध कृषि प्रधान भारत भूमि

विश्वभर के अन्नदाता,

 पाश्चात्य बर्फीले,

आहार सामग्रियों का अभाव,

 अतः भारत को औद्योगीकरण के नाम से 

 मरुभूमि मत बनाओ।

 सोना चांदी,रकम

 भूखे के सामने कुछ नहीं 

 खेती की प्रधानता पर ध्यान रखो,

 विश्व भर को भूख से बचाओ,

स्वर्ण उगलते कृषी भूमि को कारखानों की  भूमि

 बनाकर भावी पीढ़ियों के लिए भारत को अकाल-ग्रस्त मत बनाओ।

 मैदान टच कहानी याद रखो,

 मैदान ने वर पाया,

 जिसको वह छुएगा,वह सोना बनना है,

वर मिल गया,

 उसकी मनोकामना पूरी हुई।

 पत्नी बेटे माँ बाप जिसको भी स्पर्श करता,

 बन जाता सोना।

 भूखे लगी, खाने भोजन पर हाथ रखा तो

 भोजन सोना।

समझा भोजन ही प्रधान।

 यह साधारण कल्पना नहीं,

 भारत के कृषी संपन्न देश को नगरीकरण, नगर विस्तार के नाम से 

 मरुस्थलीय प्रदेश बनाना

 सही नहीं,

 झीलों का नदारद करना

 समृद्ध भारत भूमि को

 मृग मरीचिका बनाना है।

वहाँ मरुभूमि को कृषि प्रधान बना रहे हैं,

 यहाँ कृषी प्रधान को

‌सद्यःफल के लिए 

 नगर विस्तार।

 भारतीय सहनशीलता 

 पाश्चात्य भाषा धन दे रही है,

 पर पारिवारिक शांति नष्ट कर रही है।

 तलाक बढ़ रहा है।

 जितेंद्रियता, मर्यादा पुरुषोत्तमता  अशांति ला रही है।

  यही कल्पना कीजिए,

 भारत को कृषी प्रधान बनाइए।

न तो  भावी पीढ़ी अकाल पीड़ित  दाने दाने के लिए तड़पेगा ही।

 यह कल्पना भावी अकाल भारत की सावधानी।

Friday, March 27, 2026

विश्व रंगमंच दिवस

 विश्व रंगमंच दिवस।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

28-3-26.

समाज में क्रांति लाने,

 सुप्त जनता को जगाने 

 नये विचार  चिंतन बढाने

 नाटक और अभिनेता का मुख्य अंग रहा।

 जीवन में   नारियों के

 जागृत करने 

 आज़ादी  के  संग्राम में 

 देश भक्ति जगाने 

‌अंग्रेजों के दमन नीति से

 उनके आँखों में धूल झोंकने,

 भक्ति वेश मैं अंग्रेज़ी अत्याचार के विरुद्ध 

 स्वतंत्रता की भावना जगाने अंग्रेज़ी के विरुद्ध 

 लड़ने   प्रेरित करने रंगमंच का

 अपना महत्व रहा।

 चित्रपट संसार के आने के बाद नाटक का महत्व कम होने लगा।

 गाँवों में लोकगीत के द्वारा रामायण, महाभारत, सत्य हरिश्चन्द्र नाटक आदि का प्रचार 

 आ सेतु हिमाचल तक

 विचारात्मक एकता लाने

 बहुत बड़ा हाथ दिया।

 ऐसे रंगमंच के अभिनेता, अभिनेत्री और अन्य कलाकारों को 

 सम्मान देने विश्व 

रंगमंच दिवस 

  मनाने लगे।

 शेक्सपियर के नाटक 

 अति प्रसिद्ध रहा।

 देश भक्ति भरे गीत 

 भगवद्भक्ति 

 समाज सुधार आदि में 

 नाटक का महत्वपूर्ण स्थान रहा।

 बिना मैक के ही

 उस जमाने के  अभिनेता के स्वर दूर दूर  तक  सुनाई पड़ती थी।

अभिनेता उस जमाने में 

 गायक भी होते थे।

अतः विश्व रंगमंच दिवस 

 हर साल 27-3-26 को

 मनाया जाता है।

 जय नाटक रंगमंच

प्राचीन  कला की याद दिलाने  यह दिन अति आवश्यक है।