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Friday, July 3, 2026

प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस

 प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस।


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

4-7-26

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नमस्ते वणक्कम् 

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मानव जीवन वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण 

 मानव की तबीयत 

स्वास्थ्य में 

कमी होती  रहती है।

 दिन ब दिन वह यंत्र के गुलाम होता रहता है।

  संगणिक और मोबाइल के कारण 

उसकी स्मरण शक्ति 

कम होती रहती है।

 अंग्रेज़ी माध्यम और स्कूल वेन के कारण 

 बचपन से पैदल 

चला नहीं करते।

 स्वास्थ्य की वृद्धि

 भी जिम जैसे कृत्रिम व्यवहार ही प्रधान।

 वैसे ही मानव के लिए 

हानिकारक है प्लास्टिक ‌

प्लास्टिक युग है

 बगैर प्लास्टिक के

चलना फिरना मुश्किल।

प्लास्टिक को इधर उधर फेंका करने से

 नाले में समुद्र में 

नदियों की धारा में 

 फेंकने से  

धारा की गति

 मंद हो जाती।

 बाढ को रोकने से

 पानी के बहाव का मार्ग 

बदल जाता है।

 पशु, पक्षी , मछलियाँ

 प्लास्टिक के खाने से

 उनके प्राण खतरे हो जाते हैं।

 उपजाऊ भूमि में 

 गाढ़े जाने से वनस्पति के पलने में,

 भूतल पानी 

जड चूसने से  

हानियाँ ही हानियाँ।

इनसे मुक्ति पाने के लिए 

प्लास्टिक थैलियाँ,

प्लास्टिक बोतल,

 आदि के बदले

 जूट की थैलियां,

कागज़ की थैलियां

 रूई की थैलियाँ,

 काँच , मिट्टी,ताम्र के बर्तन का  उपयोग करना चाहिए।

 गणेश चतुर्थी की गणेश की मूर्तियाँ  रसायनिक मिश्रण से नहीं,

 चिक्नी मिट्टी से

 बनानी चाहिए।

 उसमें कृत्रिम रसायनिक रंग चढ़ाना  हानिकारक है।

 रसायनिक मिश्रित मूर्तियों को समुद्र नदी झील में फेंकना

 जल जीवों के विनाश के कारण होते हैं।

यथाशक्ति तथा संभव 

 प्लास्टिक का उपयोग 

रोकना ही जनकल्याणकारी है।

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आपकी रचना में विचार बहुत सार्थक हैं। मैंने भाषा को अधिक प्रवाहपूर्ण, काव्यात्मक और प्रभावशाली रूप दिया है, जबकि आपके मूल भाव और संदेश को यथावत रखा है।

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आज की चुनौती

प्लास्टिक मुक्त दिवस / प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 4-7-2026

नमस्ते। वणक्कम्।

मानव जीवन में

वैज्ञानिक आविष्कारों ने

सुविधाओं का विस्तार किया,

पर कहीं न कहीं

स्वास्थ्य और प्रकृति पर

उनका दुष्प्रभाव भी बढ़ा।

यंत्रों का बढ़ता आकर्षण,

संगणक और मोबाइल का उपयोग—

स्मरण-शक्ति को क्षीण करता है।

अंग्रेज़ी माध्यम,

स्कूल वैन की आदत,

बचपन से पैदल चलने की संस्कृति

धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।

स्वास्थ्य के लिए

खुले मैदान कम,

जिम की कृत्रिम दुनिया अधिक

प्रधान बन गई है।

इसी प्रकार

प्लास्टिक भी

मानव और प्रकृति—दोनों के लिए

घातक सिद्ध हो रहा है।

आज का युग

प्लास्टिक का युग है,

पर इसके बिना जीवन कठिन होने का अर्थ

यह नहीं कि

हम इसका अंधाधुंध उपयोग करें।

जब प्लास्टिक

नालों, नदियों, झीलों और समुद्र में

फेंक दिया जाता है,

तो जलधाराएँ रुकती हैं,

पानी का स्वाभाविक प्रवाह बदल जाता है,

और बाढ़ जैसी आपदाएँ

विकराल रूप धारण कर लेती हैं।

पशु, पक्षी और मछलियाँ

भोजन समझकर प्लास्टिक निगल लेते हैं,

जिससे उनके प्राण संकट में पड़ जाते हैं।

भूमि में दबा प्लास्टिक

मिट्टी की उर्वरता घटाता है,

पौधों की जड़ों को प्रभावित करता है,

और भूजल तक को दूषित करता है।

इस संकट से मुक्ति के लिए

प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों के स्थान पर

जूट, कागज़ और सूती थैलियों का,

तथा काँच, मिट्टी और ताम्र के बर्तनों का

अधिकाधिक उपयोग करें।

गणेश चतुर्थी पर भी

रासायनिक पदार्थों से बनी मूर्तियों के स्थान पर

चिकनी मिट्टी की

पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाएँ स्थापित करें।

कृत्रिम रंगों से सजी मूर्तियाँ

जब जल में विसर्जित होती हैं,

तो जलजीवों और पर्यावरण को

गंभीर हानि पहुँचाती हैं।

आइए,

यथाशक्ति और यथासंभव

प्लास्टिक का उपयोग घटाएँ,

प्रकृति को बचाएँ,

और आने वाली पीढ़ियों को

स्वच्छ, स्वस्थ और सुंदर धरती का उपहार दें।

प्लास्टिक मुक्त भारत—

स्वस्थ भारत,

स्वच्छ भारत,

सुरक्षित भविष्य। :::

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