समय और कर्म
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
दिनांक: 06-07-2026
समय और कर्म
ईश्वर की इस सृष्टि में
सबके कर्म एक समान नहीं।
आहार में भिन्नता,
आकार में विविधता,
स्वास्थ्य, बुद्धि और क्षमता में
सबका स्वरूप अलग-अलग है।
धन, तन और मन में भी
प्रकृति ने विविध रंग भरे हैं।
जल का स्वाद भी बदलता है,
धरती का रूप भी बदलता है।
सभ्यता और असभ्यता के कर्म,
कृषि, पोशाक और खाद्यान्न में भी
स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
सद्कर्म और दुष्कर्म,
सत्संग और कुसंग—
यही जीवन का फल निर्धारित करते हैं।
अनपढ़ कबीर का अमूल्य ज्ञान
सत्संग की ही देन था।
उनकी वाणी आज भी
मानवता का मार्गदर्शन करती है।
मंगत मिश्र के तोते ने
वेद-मंत्रों का उच्चारण सीखा,
और डाकू के तोते ने
"पकड़ो, मारो, लूटो" कहना।
संगति का प्रभाव ही
कर्म का स्वरूप गढ़ता है।
समय सबके लिए समान है—
चाहे राजा हो या रंक।
समय किसी का पक्ष नहीं लेता,
वह निरंतर आगे बढ़ता रहता है।
संत कबीर का अमर संदेश—
"काल करे सो आज कर,
आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी,
बहुरि करेगा कब।।"
समय को खोना
मानो जीवन को खोना है।
जो कर्म समय पर नहीं होता,
वह जीवन भर पछतावा बन जाता है।
समय की हानि की भरपाई
ईश्वर भी नहीं कर सकते।
"आछे दिन पाछे गए,
हरि से किया न हेत।
अब पछताए होत क्या,
जब चिड़िया चुग गई खेत।।"
आइए, समय का सम्मान करें,
सद्कर्म को जीवन का आधार बनाएँ,
क्योंकि समय और कर्म ही
मनुष्य के सच्चे भाग्य-विधाता हैं।
— एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी प्रेमी, सेवक एवं अनुवादक
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