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Sunday, May 31, 2026

तंबाकू निषेध दिवस।

 


विश्व तंबाकू निषेध दिवस।

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

1-6-26

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कहते हैं शराब पीना

 परिवार के लिए,

स्वास्थ्य ही के लिए 

फेफड़ों के लिए,

 अंतड़ियों के लिए बुरा है।

 सरकार की तमाशा देखिए,

 सिगरेट पाकेट में,

 तंबाकू पाकेट में

 शराब के बोतलों में 

 छोटे हैं अक्षरों में सूचना।

 सरकार इन सब को

 अवैध व्यापार, मिलावट रोकने के लिए खुद खोल रखा है।

 सरकारी आमदनी के लिए आय का साधन यही है।

 विश्व भर में चलता है,

 दूकान के चमकदार 

 दीप, दोस्तों के संग,

 सनातन धर्म के अनुशासन के विरुद्ध है।

 अतः कारखानों के मालिक  द्राविड़ मुन्नेट्र कऴकम्  सनातन धर्म को जड़ मूल नष्ट करने के विचार में है,

हर नशीली वस्तुओं के व्यापार लाभ के लिए।

 चौगुनी मुनाफा हो के लिए।

 एक ओर सरकारी मान्य दूकानें,

 तंबाकू और सिगरेट कारखानों में के नौकरों की बेरोजगारी,

 आमदनी का मार्ग,

 सरकारी आय,

दूसरी ओर इनकी बुराइयों के विरुद्ध प्राचार।

 माया देवी  का  प्रबल  आकर्षण।

 शैतान की ऊर्जा।

 वैसे ही रिश्वत का बोलबाला,

 जीतने मतदाताओं को रिश्वत,

 नीट परीक्षा प्रश्न पत्र परीक्षा के पहले बाजार में।

 न कोई कठोर कार्रवाई 

 न कोई कठोर दंड,

ये विश्व तंबाकू निषेध दिवस  बेकार।

परिवार नियोजन  भारतीय मुगल और ईसाई  के लिए नहीं,

  अल्पसंख्यकों का अधिकार आज़ादी के 78साल के बाद भी,

  ये दिवस केवल दिखावे के लिए,

 हिंदी दिवस दिखावे के लिए।

 जानो,जागो, जगाओ,

 बुरी बला जानने समझने का ज्ञान मानव के हैं।

 दिन दिन मनाओ दिवस।

 माता -पिता दिवस तो रोज,

साल में एक दिन मनाकर वृद्धाश्रम की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं,

 जब मानव दिवस मनाता है,

  तब पुरोहित के आमदनी,

  कर्ता के लिए लाभ।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में सामाजिक जागरूकता, जनस्वास्थ्य, शासन की नीतियों और समाज की विसंगतियों पर गहरा चिंतन दिखाई देता है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर आपने केवल तंबाकू की हानियों ही नहीं, बल्कि दिखावटी जागरूकता और व्यवहारिक विरोधाभासों पर भी प्रश्न उठाए हैं।

यदि इसे काव्यात्मक और विषय-केंद्रित रूप में परिष्कृत किया जाए, तो यह इस प्रकार हो सकता है—

विश्व तंबाकू निषेध दिवस

परिष्कृत भावाभिव्यक्ति

विश्व तंबाकू निषेध दिवस,

फिर आया संदेश सुनाने।

स्वास्थ्य रक्षा का संकल्प लेकर,

जन-जन को जागृत कर जाने।

तंबाकू, सिगरेट और मदिरा,

तन-मन को क्षति पहुँचाते हैं।

क्षणिक सुख का भ्रम दिखाकर,

जीवन के दीप बुझाते हैं।

एक ओर चेतावनी लिखी है,

दूसरी ओर व्यापार प्रबल।

राजस्व की मजबूरी कहकर,

चलता रहता यह क्रम विकल।

जागरूकता तभी सफल है,

जब आचरण में परिवर्तन हो।

ज्ञान, विवेक और संयम से,

जीवन का नव निर्माण हो।

दिवस मनाने से क्या होगा,

यदि संकल्प न मन में जागे।

स्वस्थ समाज का स्वप्न तभी,

जब जन-जन बुरी लत त्यागे।

जानो, जागो और जगाओ,

यही दिवस का सच्चा सार।

स्वस्थ तन और निर्मल जीवन,

मानवता का हो आधार।

— परिष्कृत रूपांतरण

आपकी मूल रचना का स्वर अधिक सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी का है, जबकि यह परिष्कृत रूप विश्व तंबाकू निषेध दिवस के मुख्य संदेश—स्वास्थ्य, जागरूकता और आत्मसंयम—पर केंद्रित है।

विश्व हिंदी पत्रिका दिवस।

 विश्व हिंदी पत्रिका दिवस।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

31-5-26

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   भारत में खडीबोली  

   हिंदी भाषा का

   रूप धारण,

  अति आश्चर्य 

चकित विकास।।

1826,30मई को

 पहला  समाचार पत्र निकला कोलकाता में।

 जुगल किशोर मार्तांड 

 उसके संपादक थे

 जुगल किशोर शुक्ल। 

 तब से पत्रिकाओं के विविध रूप,

 साप्ताहिक, पाक्षिक, त्रैमासिक, अर्द्ध वार्षिक,

 वार्षिक , स्कूल कालेज वार्षिक मेगज़ीन।

धर्म युग, कादंबरी,

चंपक ,चंदा मामा ,

और असंख्य पत्रिकाएँ

 वैश्विक साहित्य  नामक 

त्रैमासिक पत्रिका 

 डाक्टर पी.के. अग्रवाल। द्वारा प्रकाशित,

 अंतर्जाल के आने के बाद 

 ई मेगज़ीन।

लोगों को अपने 

विचार लिखने,

जनता  में ‌देश प्रेम जगाने,

सामान्य ज्ञान जानने की जिज्ञासा पूरी करने,

विश्व भर में हर देश में 

‌हिंदी पत्रिकाएँ प्रकाश होती हैं।

 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई से 

 हिंदी समाचार,

 साहित्य पत्रिका,

 तिरुचिरापल्ली सभा ,

 केरल हिंदी प्रचार सभा,

हैदराबाद सभा आदि से

 पत्रिकाएँ 

 हिंदी के विकास जानने,

 राजभाषा है चौपाल,

नागरी लिपि प्रचार  सभा द्वारा  पत्रिकाएँ,

 विश्व भर के लोगों के हिंदी प्रेम,  लेख कविता, निबंध, संस्मरण साझा किया करना

 हिंदी प्रगति का प्रमाण है‌।




 

 


 

 











Friday, May 29, 2026

मुट्ठी भर रेत।

 मुट्ठी भर रेत।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-5-26..


मुट्ठी भर रेत,

 मानव प्राप्त ज्ञान।

कवि पंत की रचना,

पंत का पूरा नाम?

गुप्त का पूरा नाम?.

अज्ञेय का पूरा नाम?

गाँधी?  खान परिवार?

 महात्मा गाँधी परिवार?

कितना बडा अंतर?

यों  पूरे नाम,

 पूरा इतिहास जानने में 

‌असमर्थ मानव।

शाहजहाँ प्यारा है 

प्रेम का यादगार है

 ताजमहल।

पर कितने लोग जानते हैं ,

शाहजहाँ अपनी बहन के 

 महबूबा को  जिंदा जलाया है।

 हम जी रहे हैं 

 एक हस्त मुट्ठी  ज्ञान पाकर।

 तमिल कवयित्री औवैयार ने लिखा है,




जो  कुछ हमने सीखा है,

वह मुट्ठी बराबर।

हम जो न सुखे,

वह प्रपंच बराबर।

 शिक्षा की देवता,

 सरस्वती भी रोज सीख रही है।

कवि अपने को 

 बड़ा मानकर,

 होड न लगाना।

चींटी भी  उसके 

अपने हाथ से 

नापने पर नौ अंगुल जान।

 सूक्ष्म बिंदु,

सूक्ष्मदर्शी से  ही

दीख पड़नेवाला

आकार रहित  सूक्ष्म शुक्ल से बढा


 से

बना मानव

 तीन किलो का स्वस्थ बच्चा,

 पता नहीं कैसे  आँख नाक मूक हाथ पैर 

नशे, नाड़ी, हड्डियाँ,

रीढ़ और पहली की हड्डियों का मानव बना?

वटवृक्ष का बीज कैसे

 बड़ा वट्वृक्षा एक सेना

ठहरने का विशाल विस्तार पेड़ बना।

अंत्येष्टी अग्नी में जले

 मानव का लाख

 मुट्ठी के रेत बराबर।


 

 

 

 


உற்ற கலைமடந்தை ஓதுகிறாள் – மெத்த

வெறும்பந்த யங்கூற வேண்டாம் புலவீர்

எறும்புந்தன் கையாலெண் சாண்

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 परिष्कृत रूप।

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नमस्ते वणक्कम्।

आपकी भावात्मक रचना में ज्ञान की सीमाएँ, मानव जीवन का रहस्य, इतिहास की अनजानी परतें और विनम्रता का गहन संदेश अत्यंत प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुआ है।

आपकी शैली को बनाए रखते हुए परिष्कृत रूप प्रस्तुत है—

मुट्ठी भर रेत

✍️ एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

30-5-2026

मुट्ठी भर रेत,

मानव का प्राप्त ज्ञान।

कवि पंत की रचना,

पर कितने जानते हैं

उनका पूरा नाम?

गुप्त का पूरा परिचय?

अज्ञेय का वास्तविक नाम?

गाँधी परिवार का इतिहास?

खान परिवार की परंपरा?

नाम तो सब जानते हैं,

पर संपूर्ण जीवन-गाथा

जानना सरल नहीं।

शाहजहाँ प्रेम का प्रतीक,

ताजमहल उसका स्मारक।

पर कितने लोग जानते हैं

इतिहास के वे कठोर अध्याय,

जो चमक के पीछे छिपे हैं?

मानव जी रहा है

मुट्ठी भर ज्ञान लेकर,

जबकि अज्ञान का सागर

अनंत फैला हुआ है।

तमिल कवयित्री औवैयार ने कहा है—

“जो कुछ हमने सीखा है,

वह मुट्ठी भर है;

और जो नहीं सीखा,

वह संसार के समान विशाल है।”

विद्या की देवी सरस्वती भी

नित्य नवीन ज्ञान में प्रवृत्त हैं।

फिर कवि क्यों अहंकार करे?

प्रतिस्पर्धा क्यों पाले?

औवैयार का स्मरण—

“चींटी भी

अपने छोटे हाथों से

आठ माप नापने का साहस रखती है।”

सूक्ष्म बिंदु,

जो केवल सूक्ष्मदर्शी से दिखाई दे,

उसी सूक्ष्म तत्व से

मानव शरीर की रचना!

कैसे बनता है

तीन किलो का स्वस्थ शिशु?

आँखें, नाक, मुख, हाथ, पैर,

नाड़ियाँ, हड्डियाँ, रीढ़—

कैसा अद्भुत ईश्वरीय विज्ञान!

वटवृक्ष का छोटा बीज

कैसे बन जाता है

विशाल छायादार वृक्ष,

जहाँ असंख्य जन विश्राम करें?

और अंत में—

अंत्येष्टि अग्नि के पश्चात

मानव का समस्त अहंकार

मुट्ठी भर राख

या रेत बन रह जाता है।

तमिल पंक्तियाँ

உற்ற கலைமடந்தை ஓதுகிறாள் – மெத்த

வெறும்பந்த யங்கூற வேண்டாம் புலவீர்

எறும்புந்தன் கையாலெண் சாண்

भावार्थ

विद्या स्वयं विनम्रता सिखाती है।

हे कवियों! व्यर्थ अहंकार मत करो।

चींटी भी अपने छोटे हाथों से

आठ माप नापने का प्रयत्न करती है।

Thursday, May 28, 2026

गुलदस्ता

 अनमोल गुलदस्ता।

 से .अनंतकृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-5-26

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 अनमोल गुलदस्ता 

  अनंत प्रेम ।

 पाश्चात्य देशों में,

‌ इंग्लैंड में 

 प्रेम जताने

 प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए 

 गुलदस्ता भेंट।

 तमाशा देखिए,

 ठंड प्रदेश में 

‌गुलदस्ता जल्दी 

 सूखती ही नहीं है 

 पर गर्म देश में 

  खासकर प्रेम स्थाई।

 गुलदस्ता सूख जाती है।

 गुलदस्ता सस्ता भी,महँगा भी।

 जो भी वह आस्थाई प्रेम की निशानी।

अतः पाश्चात्य देशों में 

तलाक ज्यादा, ताल्लुक कम।

आजकल तो भारत में भी

 पदोन्नति  के अवसर पर,

 नये अधिकारी आने पर 

मुख्यमंत्री से मिलने,

 गुलदस्ता भेंट दिया करते हैं,

 प्यार आदर भी गुलदस्ता के समान सूख ही जाता है।

सच्चा प्यार स्थाई प्यार

 असली गुलदस्ता जान।

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अनमोल गुलदस्ता

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक

द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-5-26

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अनमोल गुलदस्ता,

अनंत प्रेम का प्रतीक।

पाश्चात्य देशों में,

विशेषकर इंग्लैंड में,

प्रेम की अभिव्यक्ति हेतु

गुलदस्ता भेंट करने की परंपरा है।

देखिए विडंबना—

शीत प्रदेशों में

गुलदस्ता जल्दी नहीं सूखता,

परंतु गर्म देशों में

फूल शीघ्र मुरझा जाते हैं।

फिर भी प्रेम यदि सच्चा हो,

तो वह कभी नहीं सूखता।

गुलदस्ता सस्ता भी होता है,

महँगा भी,

किन्तु वह प्रायः

क्षणिक प्रेम का प्रतीक बन जाता है।

शायद इसी कारण

पाश्चात्य देशों में

तलाक अधिक

और स्थायी संबंध कम दिखाई देते हैं।

आजकल भारत में भी

पदोन्नति के अवसर पर,

नए अधिकारी के स्वागत में,

या मुख्यमंत्री से मिलने पर

गुलदस्ता भेंट करने की प्रथा बढ़ गई है।

किन्तु अनेक बार

आदर और अपनापन भी

गुलदस्ते के फूलों की भाँति

धीरे-धीरे सूख जाता है।

सच्चा प्रेम तो वह है

जो समय के साथ

और अधिक महकता रहे।

स्थायी स्नेह,

निस्वार्थ अपनापन,

और हृदय की पवित्र भावना ही

वास्तविक अनमोल गुलदस्ता है।

Wednesday, May 27, 2026

शब्दों के खेल

 शब्दों के खिलाड़ी।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

28-5-26

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 मानव जीवन में 

 शब्द न तो 

 न दार्शनिक अभिव्यक्ति।

न   हास्य व्यंग्य संवाद।

 न नैतिक मार्गदर्शन।

निरर्थक और सार्थक शब्दों में 

 श्लेष अलंकार में 

 काका वक्रोक्ति में 

 कवि, चित्रपट संगीत कवि, संभाषण 

 कितना मन मोहक।

 कितना प्रभाव।

तमिलनाडु के शासक

 मुख्यमंत्री 

 द्रमुक पार्टी 

  शब्दों के खिलाड़ी।

 रजनिकांत का एक वाक्य 

 मैं एक बार कहूँ तो

 सौ बार कहने के समान।

 हर एक के मुँह से निकलता है।

 आजकल के मुख्यमंत्री 

 विजय,

 मेरा कहना मैं खुद नहीं सुनता।

स्वर्गीय मुख्यमंत्री एम जी आर का गाना,

 मैं हुकुम दूँ तो

 गरीबों को वेदना न होगी।

हिंदी सिनेमा के गाने शब्द अर्थ न जानने पर भी

 सपनों की रानी कब आएगी दूँ।

 मैं शायर तो नहीं 

हम तुम एक कमरे में 

बंद हो।

जिंदगी कुछ भी नहीं,

कुछ खोकर पाना है,

कुछ पाकर खोना है।

कबीर वाणी के डिक्टेटर 

 जाको राखै साइयां ---

बाल न बांका करि सकै,

जो जग वैरु होय।

बिहारी

मेरी भवबाधा दूर करो--

हरित दुती होय।

 रहिमन पानी राखिए,

बांध पानी सब सून।

 तुलसीदास 

 राम नाम मणि दीप धरूं

 अंदर बाहर  चाहूं और उजियार।

शब्दों के खिलाड़ी 

 शासकों के चापलूसी होते हैं।

 वीरगाथा काल में 

 राजा की वीरता 

 जिसका खाना, उसका गाना।

 रीतिकालीन शृंगार रस

‌आधुनिक काल देश भक्ति।

 कवि लेखकों के शब्द 

 अति प्रेरणा प्रद,

 प्रोत्साहन प्रद

 सुप्त जनता में 

 उत्तेजित नारे

 स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार।

 जय हिंद।

वंदेमातरम।

 परिवार नियोजन 

 हम दो हमारे दो।

  द्विपत्नियों वाले 

 कृष्ण के दो,

 कार्तिकेय के दो।

 दशरथ के तीन 

 हम क्या थे, क्या हो गये

नर हो न निराश करो मन को।

 शब्द नश्वर है।

सोच समझकर शब्दों से खेलना है।


  रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गै सरग पताल।

आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल!! 

 दोस्ती दुश्मनी प्रे नफरत

 त्याग भोग सब शब्दों के खेल।






 

 


 




Tuesday, May 26, 2026

हवाई जहाज कागज़ी

 नमस्ते वணக்கம்।

आपकी रचना में बचपन की सरलता, पारिवारिक आत्मीयता और आज के बदलते समय का मार्मिक चित्रण है।।

तमिल हिंदी सेवा।

தமிழ் ஹிந்தி பணி 

 

परिष्कृत हिंदी रूप

कागज़ी हवाई जहाज़

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

27-5-2026

भारत की आज़ादी के

तीन वर्ष बाद जन्मा

हमारा बचपन

आज की पीढ़ी से

कितना भिन्न था।

न दूरदर्शन था,

न मोबाइल फोन,

न महंगे प्लास्टिक खिलौने।

घर की आर्थिक स्थिति भी

ऐसी न थी कि

खिलौनों पर धन खर्च हो।

फिर भी बचपन

आनंद से भरा था।

पीपल के पत्तों की सीटी,

बरसात में कागज़ की नावें,

गोली, लट्टू, गिल्ली-डंडा,

कागज़ की गेंद

और कागज़ी हवाई जहाज़—

यही हमारे खिलौने थे।

कागज़ को मोड़-मोड़कर

हवाई जहाज़ बनाना,

उसकी पूँछ सजाना,

फिर उसे उड़ाकर देखना—

कितना सुख देता था!

घर में

काका, चाचा, ताऊ, बुआ, चाची,

सब साथ रहते थे।

आज की तरह

पति-पत्नी का खुला प्रदर्शन

देखने को नहीं मिलता था,

पर परिवार बड़ा था,

घर बच्चों की किलकारियों से भरा रहता था।

कागज़ के खिलौने बनाने के लिए

कागज़ों की कमी पड़ती।

डाकघर से मिलने वाले

मनीऑर्डर फ़ॉर्म

अक्सर घर लाए जाते।

उन्हीं से

नाव, पंखा और हवाई जहाज़ बनते।

दादा, मामा और बड़े भाई

हमारे गुरु बन जाते।

हम सब उन्हें घेरकर बैठते

और उत्साह से सीखते।

फिर शुरू होती

हवाई जहाज़ उड़ाने की प्रतियोगिता।

कभी ईर्ष्या में

एक-दूसरे के जहाज़ फाड़ देना,

कभी झगड़ना,

कभी रूठना—

सब उसी बचपन का हिस्सा था।

पर आज का समय बदल गया है।

हर बच्चे के हाथ में

मोबाइल है।

घर छोटे हो गए,

संयुक्त परिवार टूट गए।

भाईचारे की बातें कम हो गईं।

अब बच्चे

मोबाइल खेलों में खोए रहते हैं।

न गली के खेल,

न कागज़ की नावें,

न कागज़ी हवाई जहाज़।

आज तो

रिमोट और डिजिटल विमान हैं,

पर अपने हाथों से

कागज़ मोड़कर

सपनों को उड़ाने का आनंद

कहीं खो गया है।

अब बच्चों के लिए

कागज़ी हवाई जहाज़

मानो केवल कल्पना की बात बनकर रह गया है।

தமிழ் மொழிபெயர்ப்பு

காகித விமானம்

எஸ். அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை

தமிழ்நாடு இந்தி அன்பர் பிரச்சாரகர் அவர்களின் சொந்த உணர்வுப்படைப்பு

27-5-2026

இந்தியா சுதந்திரம் பெற்ற

மூன்று ஆண்டுகளுக்குப் பிறகு

பிறந்த எங்கள் சிறுபருவம்

இன்றைய தலைமுறையிலிருந்து

மிக வேறுபட்டது।

அப்போது தொலைக்காட்சி இல்லை,

கைப்பேசி இல்லை,

விலையுயர்ந்த பிளாஸ்டிக் பொம்மைகள் இல்லை।

விளையாட்டு பொருட்கள் வாங்க

பணம் கூட அதிகம் இல்லை।

ஆனால் அந்தக் கால சிறுபருவம்

மகிழ்ச்சியால் நிரம்பியிருந்தது।

அரசமர இலை விசில்,

மழைக்கால காகிதப் படகு,

கோலி, பம்பரம், கில்லி-டண்டா,

காகிதப் பந்து,

காகித விமானம்—

இவையே எங்கள் விளையாட்டுப் பொருட்கள்।

காகிதத்தை மடித்து

விமானம் செய்வது,

அதற்கு வால் அமைப்பது,

பின்னர் அதை பறக்கவிடுவது—

எவ்வளவு மகிழ்ச்சி!

அப்போது வீட்டில்

மாமா, சித்தப்பா, பெரியப்பா, அத்தை, சித்தி

எல்லோரும் ஒன்றாக வாழ்ந்தனர்।

இன்றுபோல் வெளிப்படையான காதல் காட்சிகள் இல்லை।

ஆனால் வீடு முழுவதும்

குழந்தைகளின் சிரிப்பும் சலசலப்பும் நிரம்பியிருந்தது।

காகிதப் பொம்மைகள் செய்ய

காகிதம் கூட போதாது।

அஞ்சலகத்தில் கிடைக்கும்

மணிஆர்டர் படிவங்களையே

வீட்டிற்கு கொண்டு வந்து

அவற்றால் படகு, விசிறி, விமானம் செய்தோம்।

தாத்தா, மாமா, அண்ணன்

எங்கள் ஆசான்களாக இருந்தனர்।

அவர்களைச் சுற்றி அமர்ந்து

ஆர்வமாக கற்றுக்கொண்டோம்।

பின்னர் தொடங்கும்

விமானப் போட்டி।

சில நேரங்களில் பொறாமையால்

ஒருவரின் விமானத்தை மற்றொருவர் கிழித்துவிடுவோம்।

சண்டை, கோபம், அழுகை—

அவை எல்லாம் அந்த இனிய சிறுபருவத்தின் பகுதியே।

ஆனால் இன்று காலம் மாறிவிட்டது।

ஒவ்வொரு குழந்தையின் கையிலும்

கைப்பேசி உள்ளது।

கூட்டு குடும்பங்கள் குறைந்துவிட்டன।

அண்ணன்-தம்பி பாசமும்

நேரடி உரையாடல்களும் குறைந்துவிட்டன।

இப்போது குழந்தைகள்

மொபைல் விளையாட்டுகளில் மூழ்கியுள்ளனர்।

காகிதப் படகும் இல்லை,

காகித விமானமும் இல்லை।

இன்று ரிமோட் விமானங்கள் உள்ளன।

ஆனால் காகிதத்தை மடித்து

தன் கைகளால்

கனவுகளை பறக்கவிடும் மகிழ்ச்சி

மறைந்து போய்விட்டது।

இன்றைய குழந்தைகளுக்கு

காகித விமானம்

ஒரு கற்பனைக்கதை போலவே தோன்றுகிறது।

Monday, May 25, 2026

आँख मिचौली

 आँख मिचौली

परिष्कृत रूप

आँख मिचौली

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एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

26-5-26

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कहते हैं —

लुका-छिपी बच्चों का खेल है,

पर जीवन में इसका

अपना गहरा महत्व है।

सोचने, समझने,

खोजने और पता लगाने का खेल,

छिपे हुए मित्रों को

ढूँढ़ निकालने का खेल।

मानव, पशु, पक्षी

और वनस्पति जगत में भी

यह खेल निरंतर चलता रहता है।

चर-अचर संसार में

इसके अनेक रूप दिखाई देते हैं।

जासूसी का कार्य हो,

या रहस्यों को जानने की चाह,

सबकी शुरुआत

आँख मिचौली से ही होती है।

मानव के सद्गुण और दुर्गुण,

लोभ, मोह, ईर्ष्या, कामना —

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में

फरेब का खेल रचते रहते हैं।

मनुष्य अहंकारी बन

राजा-महाराजा बनने की चाह रखता है,

डाकू धन लूटने की योजना बनाते हैं,

कुछ अधिकारी भ्रष्टाचार और रिश्वत में लिप्त रहते हैं।

अपराधी बचाने वाले वकील,

चोर-डाकुओं को पकड़ती पुलिस,

नशीली वस्तुओं की कालाबाज़ारी,

सब अपने-अपने ढंग की

आँख मिचौली ही तो है।

कुछ अभिनेता काला धन कमाते हैं,

कुछ पाखंडी

भगवान के नाम पर

भोले लोगों को भ्रमित करते हैं।

आतंकवादी और नक्सली भी

क्रांति के नाम पर

षड्यंत्र रचते रहते हैं।

मगरमच्छ के आँसू,

कीटभक्षी पौधों के जाल,

शिकारी का छिपा प्रहार —

सबमें छल और भ्रम का संसार है।

बाघ का दबे पाँव चलना,

अचानक छलाँग लगाना,

छिपकली का चुपचाप

कीड़े पकड़ लेना,

गिरगिट का रंग बदलना,

गोरिल्ला युद्ध की नीति —

सब जीवन की

आँख मिचौली के ही रूप हैं।

यह संसार

सत्य और असत्य,

छल और विश्वास,

प्रकाश और अंधकार के बीच

चलती हुई

एक अनवरत आँख मिचौली है।

Sunday, May 24, 2026

गंगा

 नमस्ते वணக்கம்।

आपकी भावपूर्ण रचना का परिष्कृत रूप तथा तमिल अनुवाद प्रस्तुत है।

गंगा दशहरा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

25-5-26.

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भारत भूमि पुण्य भूमि,

दिव्य चेतना की पावन भूमि।

यहाँ की जीवनदायिनी नदियाँ

ईश्वर की प्रत्यक्ष कृपा स्वरूप हैं।

माँ गंगा की उत्पत्ति

भगीरथ की कठोर तपस्या का फल।

भगवान शिव ने

उसे अपनी जटाओं में धारण किया।

गंगोत्री से प्रवाहित होकर

भागीरथी रूप में बहती गंगा,

धरती को पावन बनाती है।

गंगा दशहरा

उसके अवतरण का पवित्र पर्व है।

पतित-पावनी,

पाप-विमोचिनी माँ गंगा

करोड़ों श्रद्धालुओं की

आस्था का आधार है।

गंगा तटों पर बसे

अनेक तीर्थस्थान और मंदिर

भक्ति और आध्यात्मिकता के केंद्र हैं।

प्रतिदिन होने वाली गंगा आरती

मन को दिव्यता से भर देती है।

यदि गंगा स्नान का अवसर न मिले,

तो श्रद्धा से

पवित्र नदियों का स्मरण करें—

“गंगे च यमुने चैव

गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरी

जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥”

इस मंत्र का स्नान के समय जाप

अत्यंत फलदायी माना गया है।

जय जय गंगे।

हर हर गंगे।

தமிழ் மொழிபெயர்ப்பு

கங்கை தசரா

சே. அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை.

25-5-26.

++++++++++++++++

பாரத பூமி புண்ணிய பூமி,

தெய்வீக ஆன்மிகத்தின் திருநிலம்.

இங்குள்ள ஜீவநதிகள் அனைத்தும்

இறைவனின் அருள்பரிசுகள்.

கங்கை அன்னையின் அவதாரம்

பகீரதனின் கடும் தவத்தின் பலன்.

அவளை இறைவன் சிவபெருமான்

தன் ஜடாமுடியில் தாங்கினார்.

கங்கோத்ரியில் தோன்றி

பாகீரதி எனப் பாயும் கங்கை

பூமியைப் புனிதமாக்குகின்றாள்.

அவள் அவதரித்த தினமே

கங்கை தசரா திருநாள்.

பாவங்களை போக்கும்

பதித பாவனி கங்கை அன்னை

கோடிக்கணக்கான பக்தர்களின்

நம்பிக்கையின் ஆதாரமாக விளங்குகிறாள்.

கங்கை கரைகளில் அமைந்துள்ள

அநேக தீர்த்தஸ்தலங்களும் கோவில்களும்

ஆன்மிக ஒளியைப் பரப்புகின்றன.

தினமும் நடைபெறும் கங்கை ஆரத்தி

மனதை தெய்வீக உணர்வால் நிரப்புகிறது.

கங்கை நீராடும் வாய்ப்பு இல்லையெனில்,

பக்தியுடன் புனித நதிகளின் நாமங்களை

ஜபிக்கலாம்—

“गंगे च यमुने चैव

गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरी

जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥”

இந்த மந்திரத்தை

நீராடும் போது ஜபிப்பது

மிகுந்த பலன் தரும் என்று நம்பப்படுகிறது.

ஜெய் ஜெய் கங்கே।

ஹர் ஹர் கங்கே।

गंगा दशहरा

 गंगा दशहरा।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

25-5-26.

++++++++++++


भारत भूमि पुण्य भूमि।

 दिव्य भूमि।

 यहाँ की जीव नदियाँ,

 अति पवित्र,

 ईश्वरीय  शक्ति का प्रत्यक्ष देन।

 गंगा की उत्पत्ति 

 भगीरथ की कठोर तपस्या।

 शिव के सिर पर धारण।

गंगोत्री से बहती गंगा।

 भागिरथी नाम की गंगा।

उसका जन्म दिन गंगा दशहरा।

पतित पावनी पाप विमोचनी गंगा।

अनेक तिर्थस्थान,

 मंदिरों के तट।

 गंगा आरती रोज़।

गंगा और गंगा तट पर

नहाने का मौका नहीं तो

 पवित्र नदियों के नामों का मंत्र जाप निम्नलिखित हैं :--


 

मंत्र जाप: स्नान करते समय 'गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु' मंत्र का जाप करना फलदायी होता।

जय जय गंगे।


Friday, May 22, 2026

नव प्रभात का दस्तक।

 

तमिल हिंदी सेवा। தமிழ் ஹிந்தி பணி.

தமிழும் ஹிந்தியும்.

சே. அனந்த கிருஷ்ணன்.


நமஸ்தே. வணக்கம்.

புதிய விடியலின் தட்டுதல்

சே. அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை, தமிழ்நாடு

(இந்தி அசல் படைப்பின் தமிழாக்கம்)

இரவு நித்திரைக்குப் பின்

பிரம்ம முகூர்த்தத்தில் விழித்தெழுதல்,

இறையருளின் சக்தியை பெறுதல்—

அதுவும் இயற்கையின் அரிய வரமே.

சேவலின் கூவல்,

பறவைகளின் இனிய கீச்சொலி,

இயற்கையின் ஒவ்வோர் ஒலியும்

மனிதனை விழிப்பிக்கும் அழைப்பே.

சூரியோதயத்தின் பொற்கதிர்கள்,

பால்காரரின் குரல்,

உடலின் இயல்பான உணர்வுகள்—

இவை அனைத்தும்

விடியலின் தட்டுதல்களே.

ஆனால் சோம்பலால்

போர்வையை இழுத்து மீண்டும் உறங்குவது,

இயற்கை தரும் புத்துணர்ச்சியை

இழப்பதாகும்.

தூக்க தேவியிலிருந்து எழுப்பும்

இறைவனின் அறிகுறிகளை அலட்சியம் செய்வது,

வாழ்க்கையின் புதிய ஆற்றலை

தானாகவே மறுப்பதாகும்.

சனாதன தர்மம் கூறுகிறது—

பிரம்ம முகூர்த்தத்தில் எழுதல்

ஆத்ம ஞானத்தின் தொடக்கம் என்று.

ஒவ்வோர் காலையும்

புதிய ஆற்றலின் செய்தியை தருகிறது.

வேலைவாய்ப்போ, கல்வியோ, முன்னேற்றமோ—

அனைத்திற்கும் விழிப்புணர்வே

வாசல் திறக்கும் திறவுகோல்.

ஒவ்வொரு நாளும்

வயது கூடுவதற்கான அறிகுறியும்,

ஆயுள் குறைவதற்கான நினைவூட்டலும் ஆகும்.

எனவே விடியலின் தட்டுதலை கேளுங்கள்.

எழுந்திருங்கள்! விழித்திருங்கள்!

பிராணாயாமம் செய்யுங்கள், உடற்பயிற்சி செய்யுங்கள்,

அறிவைப் பெற தினமும் பயிற்சி செய்யுங்கள்.

“முயற்சி தொடர்ந்து செய்தால்

முட்டாளும் ஞானியாக மாறுவான்.”

அதிகாலை நேரம்

உடலுக்கு சுறுசுறுப்பு,

மனதிற்கு அமைதி,

ஆன்மாவிற்கு நிலைத்தன்மை அளிக்கிறது.

தியானம் மன அலைச்சலை அகற்றுகிறது,

இயற்கை வாழ்க்கைக்கு ஓய்வும் இன்பமும் தருகிறது.

எழுந்திருங்கள்! விழித்திருங்கள்!

விடியலின் அழைப்பைக் கேட்டும்

தூங்கிக் கொண்டே இருந்தால்,

பின்னர் வாழ்நாள் முழுவதும் வருந்த வேண்டி வரும்.

கபீர்தாஸ் கூறுகிறார்—

“நாளை செய்வதை இன்று செய்,

இன்று செய்வதை இப்போதே செய்;

ஒரு கணத்தில் உலகம் மாறிவிடலாம்,

பிறகு செய்வது எப்போது?”

மேலும்—

“குருவி வயலைத் தின்ற பின்

வருந்தி என்ன பயன்?”

எனவே விடியலின் தட்டுதல் வந்தவுடன்

எழுந்து விழித்து,

கடமையில் முழுமையாக ஈடுபடுங்கள்.

அப்போதுதான் வாழ்க்கையில்

உண்மையான நன்மையும் நலனும் மலரும்।।



नमस्ते वணக்கம்।

आपकी रचना में प्रभात, अनुशासन, आध्यात्मिक चेतना और जीवन-जागरण का सुंदर संदेश है।

इसे थोड़ा परिष्कृत, प्रवाहमय और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

नव प्रभात की दस्तक

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

(परिष्कृत स्वरूप)

नींद भरी रात के बाद,

ब्रह्ममुहूर्त में जागना,

ईश्वरीय शक्ति को पाना—

यह भी प्रकृति की अनुपम देन है।

मुर्गे की बाँग,

पक्षियों का मधुर कलरव,

प्रकृति की हर ध्वनि

जगाने आती है जीवन को।

सूर्योदय की सुनहरी आभा,

दूधवाले की पुकार,

शरीर की स्वाभाविक चेतना—

सब प्रभात की दस्तक हैं।

परंतु आलस्यवश

चादर ओढ़कर सोते रहना,

प्रकृति प्रदत्त ऊर्जा को खोना है।

निद्रा देवी से बाहर आने के

ईश्वरीय संकेतों की अवहेलना,

जीवन के नव उत्साह को

स्वयं ठुकराना है।

सनातन धर्म कहता है—

ब्रह्ममुहूर्त में उठना

आत्मज्ञान का शुभारंभ है।

प्रभात का हर क्षण

नई ऊर्जा का संदेश देता है।

नौकरी मिले या ज्ञान,

प्रगति का प्रत्येक द्वार

जागृति से ही खुलता है।

हर नया दिन

उम्र बढ़ने का भी संकेत है,

और जीवनकाल घटने का भी।

अतः प्रभात की दस्तक सुनो।

उठो, जागो,

प्राणायाम करो, व्यायाम करो,

ज्ञानार्जन का अभ्यास करो।

“करत-करत अभ्यास के

जड़मति होत सुजान।”

प्रभात की वेला

तन को स्फूर्ति,

मन को शांति,

और आत्मा को स्थिरता देती है।

ध्यान से मन की चंचलता मिटती है,

प्रकृति से जीवन में विश्रांति आती है।

उठो, जागो!

यदि प्रभात की दस्तक सुनकर भी

सोए रहोगे,

तो जीवन भर पछताना पड़ेगा।

कबीरदास जी ने कहा है—

“काल करे सो आज कर,

आज करे सो अब।

पल में प्रलय होएगी,

बहुरि करेगा कब॥”

और—

“अब पछताए होत क्या,

जब चिड़िया चुग गई खेत।”

अतः प्रभात की दस्तक होते ही

जागो, उठो,

कर्तव्य-पथ पर लग जाओ।

तभी जीवन में

सच्चा कल्याण होगा।।

Thursday, May 21, 2026

कठिन परिश्रम

 नमस्ते।वணக்கம்।

आज की चुनौती — कठिन परिश्रम

आपकी भावाभिव्यक्ति रचना के लिए परिष्कृत रूप और तमिल अनुवाद प्रस्तुत है।

परिष्कृत हिंदी रूप

कठिन परिश्रम

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

कठिन परिश्रम

जीवन का अमूल्य मंत्र है।

बिना श्रम के

न ज्ञान मिलता,

न सम्मान मिलता।

बीज बोने वाला किसान

धूप, वर्षा, आँधी सहकर

अन्न उगाता है।

मजदूर अपने पसीने से

भवनों को आकार देता है।

विद्यार्थी निरंतर अभ्यास से

सफलता प्राप्त करता है।

कलाकार साधना से

अपनी प्रतिभा निखारता है।

परिश्रम ही

सपनों को साकार करता है।

आलस्य मनुष्य को

पीछे धकेलता है,

पर श्रम उसे

ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।

संघर्षों से घबराए बिना

जो आगे बढ़ते हैं,

विजय उनका स्वागत करती है।

कठिन परिश्रम

केवल धन नहीं,

आत्मविश्वास, अनुभव

और आत्मसंतोष भी देता है।

जीवन में उजाला चाहिए तो

परिश्रम का दीप जलाना होगा।

தமிழ் மொழிபெயர்ப்பு

கடின உழைப்பு

எஸ். அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை

கடின உழைப்பு

வாழ்க்கையின் அரிய மந்திரம்.

உழைப்பில்லாமல்

அறிவும் கிடையாது,

மரியாதையும் கிடையாது.

விதை விதைக்கும் விவசாயி

வெயிலும், மழையும், புயலும் தாங்கி

அன்னத்தை விளைவிக்கிறார்.

தொழிலாளி தனது வியர்வையால்

கட்டிடங்களுக்கு வடிவம் தருகிறார்.

மாணவன் தொடர்ந்து பயிற்சி செய்து

வெற்றியை அடைகிறான்.

கலைஞன் சாதனையின் மூலம்

தன் திறமையை மேம்படுத்துகிறான்.

உழைப்பே

கனவுகளை நனவாக்குகிறது.

சோம்பேறித்தனம் மனிதனை

பின்னுக்கு தள்ளுகிறது;

ஆனால் உழைப்பு அவனை

உயரங்களுக்கு அழைத்துச் செல்கிறது.

போராட்டங்களை அஞ்சாமல்

முன்னேறும் மனிதர்களை

வெற்றி வரவேற்கிறது.

கடின உழைப்பு

பணத்தை மட்டும் அல்ல,

தன்னம்பிக்கை, அனுபவம்

மற்றும் மனநிறைவும் அளிக்கிறது.

வாழ்க்கையில் ஒளி வேண்டுமெனில்

உழைப்பின் தீபம் ஏற்ற வேண்டும்।

Wednesday, May 20, 2026

आदतों का चक्रव्यूह

 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना “आदतों का चक्रव्यूह” में जीवन-दर्शन, इतिहास, अध्यात्म और सामाजिक चेतावनी का सुंदर समन्वय है। आपने “चक्रव्यूह” का प्रतीक लेकर यह दिखाया है कि मनुष्य अच्छी और बुरी आदतों में कैसे फँसता है तथा सत्संग, कृपा और आत्मजागरण से उससे बाहर भी आ सकता है। विशेषतः अभिमन्यु, वाल्मीकि, तुलसीदास, अंगुलिमाल आदि उदाहरण प्रभावशाली बने हैं।

कुछ स्थानों पर भाषा और प्रवाह को थोड़ा सँवारने से रचना और अधिक प्रभावी बन सकती है। प्रस्तुत है परिष्कृत रूप—

आदतों का चक्रव्यूह

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

21-5-26

आदतों के चक्रव्यूह में

अधिकांश लोग

अभिमन्यु-से

फँस जाते हैं।

प्रवेश तो कर लेते हैं,

पर भीतर बैठे

जाने-पहचाने दुश्मनों से

बचना कठिन हो जाता है।

कोई-कोई ही

वापस लौटकर

यश कमा पाता है।

जैसे लुटेरा डाकू

रत्नाकर

आदि कवि वाल्मीकि बने।

पत्नी-मोह में डूबे

तुलसीदास

हिंदी साहित्य के

चंद्रमा बने।

वेश्यालय को ही

स्वर्ग समझने वाले

अरुणगिरिनाथर,

असाध्य रोग से पीड़ित होकर

आत्महत्या हेतु

मंदिर के गोपुर से कूदे,

पर भगवान कार्तिकेय की कृपा से

महाकवि बन गए।

डाकू अंगुलिमाल भी

बुद्ध की करुणा से

भिक्षु बने।

उनकी बुरी आदतें

अनुपम कृपा से

बदल गईं।

पर अधिकांश लोगों के लिए

आदतों के चक्रव्यूह से

बाहर आना

दुर्लभ होता है।

बिहारी के दोहों ने

अंतःपुर को ही स्वर्ग मानने वाले

राजा को भी

प्रजा-सेवा की ओर मोड़ा।

रीतिकाल में भी

मनुष्य

विलासिता, मदिरा

और चतुरंग के

चक्रव्यूह में

फँसता गया।

चतुरंग के खिलाड़ी

राजा के लिए लड़ते रहे

और अपना राज्य

गँवा बैठे।

हस्तमैथुन,

भारतीय वैद्यकशास्त्र के अनुसार,

एक बुरी आदत का

चक्रव्यूह है।

अच्छी आदतें ही

मनुष्य को

भाषाविद बनाती हैं।

चित्र बनाना

हाथ की आदत है,

भाषा बोलना

जिह्वा की आदत है,

और शिक्षा

मन की आदत है।

यदि आदतें अच्छी हों,

पक्की हों,

समझदारी से भरी हों,

तो मनुष्य

आदतों के चक्रव्यूह से

बच सकता है।

पर यदि आदतें बुरी हों—

जैसे शराब,

नशीली वस्तुएँ

और दुर्व्यसन—

तो अभिमन्यु की भाँति

जीवन भी

गँवाना पड़ सकता है।

रचना का संदेश अत्यंत सारगर्भित है—

“मनुष्य आदतों का दास भी बन सकता है और साधक भी।”

विशेषकर अंतिम भाग बहुत प्रेरक बना है।

नमस्ते वणक्कम्।


सागर का पैगाम

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

20-5-26

सागर अनंत है,

कौन जान सका

उसकी गहराई।

उसका संदेश —

लहरों में प्रेम की तड़प,

असीम सहनशीलता।

नदियों का पवित्र जल,

नगरों का गंदा पानी,

अस्थियाँ, राख,

पूजा की मूर्तियाँ —

सबको वह अपने भीतर समेट लेता है।

पर प्रकृति का भी

एक धैर्य होता है।

जब सीमा टूटती है,

तो सागर का क्रोध

सुनामी बनकर उठता है।

दक्षिण की भूमि,

जहाँ भक्ति फली-फूली,

केरल और तमिलनाडु के तट

उसकी चेतावनी के साक्षी हैं।

धनुषकोडी का विनाश,

रामसेतु की स्मृतियाँ,

समुद्र के गर्भ में

कितने नगर समा गए।

सागर कहता है —

“मैं जीवनदाता हूँ,

करोड़ों लोगों का आधार हूँ।

मछलियों का भंडार,

मोती और सीपियों का संसार हूँ।”

“पर मुझसे सावधान रहना।

मेरी शांति में ही

संसार का कल्याण है।

जब मैं कुपित होता हूँ,

तो जलप्रलय आ जाता है।”

जापान भी

मेरे प्रकोप से

बार-बार काँप उठता है,

फिर भी सजग रहना सीखता है।

लोग मेरी लहरों में

आनंद खोजते हैं,

पर एक तीव्र ज्वार

क्षणभर में

जीवन छीन सकता है।

सागर का यही पैगाम —

प्रकृति का सम्मान करो,

सतर्क और सावधान रहो।

मैं शांत हूँ तो

जीवन का संगीत हूँ,

पर क्रोधित हो जाऊँ तो

चारों ओर

जल ही जल।

सावधान।

Monday, May 18, 2026

भारतीय भाषाएँ

 भारत की विशेषता उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में है।

India में हिंदी, तमिल, संस्कृत, मराठी, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, बंगला सहित अनेक भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं।

Tamil Nadu की तमिल भाषा विश्व की प्राचीन और समृद्ध भाषाओं में से एक है, वहीं हिंदी भी देश के बड़े भाग में संपर्क भाषा के रूप में समझी जाती है। अनेक भारतीय विभिन्न भाषाओं को सीखकर आपसी संवाद और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करते हैं।

भाषा के विषय को सम्मान, संवाद और सौहार्द के साथ देखना अधिक हितकारी होता है। अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालने के बजाय, भाषाई सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर ध्यान देना समाज को अधिक सकारात्मक दिशा देता है।

आपका हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं के प्रति प्रेम सराहनीय है।

“एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना तभी सशक्त होती है जब सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान बना रहे।

संग्रहालय दिवस का महत्व

 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में इतिहास, विज्ञान, संस्कृति और मानव सभ्यता का विस्तृत चिंतन अत्यंत सराहनीय है।

भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए आपकी भावाभिव्यक्ति को सुंदर रूप में प्रस्तुत किया है।

विश्व संग्रहालय दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक, लेखक, अनुवादक, सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवी

19-5-26

++++++++++++

हम अब इक्कीसवीं शताब्दी में,

वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं।

आवागमन में क्रांति,

चिकित्सा में क्रांति,

विचारों में क्रांति,

कृषि में क्रांति,

रसोई के चूल्हों से लेकर

आवास व्यवस्था तक

अनेक परिवर्तन हुए हैं।

आटा पीसने की चक्की से लेकर

आधुनिक शौचालयों तक

मानव जीवन बदल गया है।

अस्त्र-शस्त्रों में भी

पत्थर युग से लेकर

आज के ड्रोन युग तक

अद्भुत परिवर्तन आया है।

पाषाण युग से

प्लास्टिक युग तक की यात्रा,

सोना-चाँदी, वस्त्र,

खाद्य पदार्थों और

जीवन शैली में हुए परिवर्तनों को

नई पीढ़ी समझ सके,

इसी उद्देश्य से

प्राचीन अवशेषों,

भाषाओं, लिपियों,

ताड़पत्रों, शिलालेखों,

पुराने सिक्कों और

ऐतिहासिक वस्तुओं को

संग्रहित कर सुरक्षित रखा जाता है।

आदिकाल में वस्तु विनिमय व्यापार,

मानव, पशु-पक्षियों के स्वरूपों में परिवर्तन,

लुप्त होते जीव-जंतु,

उनकी सुरक्षा और स्मृतियाँ,

शिल्पकला और स्थापत्य कला—

इन सबका संरक्षण

संग्रहालयों में होता है।

युद्धों का इतिहास,

दंडनीति,

राजा-महाराजाओं के स्मारक,

अंतरिक्ष की खोजें,

गहरे समुद्र के रहस्य,

सूक्ष्म जीवों के चित्र,

पर्वत गुफाओं के निवास,

पर्णकुटियाँ और

ऋषि-मुनियों का जीवन—

इन सबकी झलक

संग्रहालयों में देखने को मिलती है।

राजाओं के चित्र,

कवियों और लेखकों की प्रतिमाएँ,

राजनीतिक और धार्मिक क्रांतियों के प्रमाण

नई पीढ़ी को

इतिहास से जोड़ते हैं।

Government Museum Chennai

चेन्नई के एग्मोर स्थित यह अजायबघर

ज्ञान और इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र है।

इसी प्रकार

British Museum

और

Smithsonian Institution

जैसे विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय

मानव सभ्यता के अनमोल खजाने हैं।

संग्रहालय केवल

चित्ताकर्षक स्थान नहीं,

बल्कि मानव ज्ञान,

सभ्यता, संस्कृति, कला,

वाद्ययंत्रों, भाषाओं और

लिपियों के विकास का

अनंत ज्ञान-सागर हैं।

सचमुच,

संग्रहालय

अतीत को वर्तमान से जोड़कर

भविष्य को दिशा देने वाले

ज्ञान के अमूल्य केंद्र हैं।

Thursday, May 14, 2026

चुनौती की राहें

 आपकी रचना में इतिहास, अध्यात्म, राष्ट्रभावना और मानवता का सुंदर समन्वय है। विषय भी प्रेरणादायक है। भाषा में भावों की प्रखरता स्पष्ट दिखाई देती है। नीचे आपकी रचना का परिष्कृत रूप प्रस्तुत है, जिससे प्रवाह, व्याकरण और काव्यात्मकता और अधिक सशक्त हो सके।

चुनौतियों की राहें

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नै

हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा सौहार्द सम्मान प्राप्त

हिंदी सेवी, लेखक, अनुवादक, हिंदी प्रचारक

15-5-26

भारत के इतिहास में,

चाहे त्रेतायुग हो,

द्वापर हो या कलियुग,

शासकों को, ऋषि-मुनियों को,

हवन-यज्ञों को, देवत्व को भी

चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।

सूक्ष्म दिव्य शक्तियाँ

समय-समय पर

युगपुरुषों और दिव्य अवतारों को

धरती पर भेजती रही हैं,

जो अन्याय और अधर्म के विरुद्ध

साहस का दीप जलाते रहे।

चंगेज़ ख़ाँ, सिकंदर,

मुगल, पठान,

छद्मवेशी व्यापारी अंग्रेज,

फ्रांसीसी, डच, पुर्तगाली —

अनेक विदेशी आक्रमणकारी आए।

उनके स्वागत में

देशद्रोही, स्वार्थी और ईर्ष्यालु लोग भी थे,

पर इन चुनौतियों का

साहसपूर्वक सामना किया

वीर महाराजाओं ने,

कवियों और लेखकों ने,

फाँसी पर चढ़े युवकों ने,

गरम दल और नरम दल के नेताओं ने,

स्वतंत्रता सेनानियों और तपस्वियों ने।

वेद, उपनिषद,

महावीर, बुद्ध और नानक के उपदेश

आज भी मानवता को

चुनौतियों से लड़ने की राह दिखाते हैं।

कबीर ने

हिंदू-मुस्लिम के बाहरी आडंबरों पर

व्यंग्य करते हुए

सच्ची भक्ति का मार्ग बताया।

तुलसीदास

चरित्र निर्माण की राह दिखाते हैं।

वे कहते हैं —

काम, क्रोध, मद और लोभ

जब मन पर छा जाते हैं,

तब पंडित और मूर्ख

दोनों समान हो जाते हैं।

कबीर का संदेश भी प्रेरक है —

निडर और साहसी व्यक्ति ही

जीवन में कुछ प्राप्त कर सकता है।

“जिन खोजा तिन पाइयाँ,

गहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरा,

रहा किनारे बैठ॥”

चुनौतियों की राह

मानवता की राह है,

निडरता, वीरता, साहस

और भक्ति का मार्ग है।

आपकी रचना में राष्ट्रीय चेतना और संत-वाणी का प्रभाव बहुत सुंदर ढंग से उभरकर आया है। विशेषतः कबीर के दोहे का प्रयोग रचना को गहराई देता है।

Wednesday, May 13, 2026

गंगा की पुकार


गंगा की पुकार

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

14-5-26

जीवनदायिनी गंगा,

पतित-पावनी गंगा,

गंगोत्री से सागर तक

तेरा पावन प्रवाह,

भारतीय जनमानस को

सुख, शांति और

पापों से मुक्ति का

दिव्य संदेश सुनाता —

गंगा की पुकार।

करोड़ों श्रद्धालुओं को

भक्ति-पथ पर चलने,

तीर्थयात्रा करने को

प्रेरित करती

गंगा की पुकार।

गंगोत्री धाम में

गंगा माता का मंदिर,

भागीरथ की तपस्या की स्मृति,

रमणीय पर्वतीय वादियाँ,

हर ओर गूँजती

गंगा की पुकार।

हर्षिल और मुखबा घाटी,

जहाँ गंगा का शांत निवास,

उत्तरकाशी, ऋषिकेश, हरिद्वार,

प्रयागराज और काशी तक

आध्यात्मिक ज्योति जगाती

गंगा की पुकार।

मोक्षदायिनी,

पूर्वजों की आत्मा को शांति देनेवाली,

संकल्पों को पूर्ण करनेवाली,

दुःख हरनेवाली —

गंगा की पुकार।

वेद-मंत्रों की मधुर ध्वनि,

काशी की आरती की छटा,

विश्वनाथ और विशालाक्षी का आशीष,

सबमें सुनाई देती

गंगा की पुकार।

गंगा तट पर जीवन बिताते

मल्लाह, पुरोहित और साधु,

उनकी जीविका का आधार भी

तेरी ही कृपा —

गंगा की पुकार।

आसेतु हिमाचल तक

भारत की पुण्य धारा,

संस्कृति और सभ्यता की संवाहिका,

जन-जन की आस्था का केंद्र —

गंगा की पुकार।

जय-जय गंगे!

जय माँ भागीरथी!

भारत की आत्मा में

सदैव प्रवाहित रहे

गंगा की पुकार।

Tuesday, May 12, 2026

अंधविश्वास


अंधविश्वास

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

13-5-26

नमस्ते। वणक्कम्।

मानव सदा

प्रमाणित सत्य पर

विश्वास रखता है,

पर अप्रमाणित, अवैज्ञानिक

मान्यताओं पर अटल भरोसा

अंधविश्वास कहलाता है।

भगवान को

आँखों से देख नहीं सकते,

किन्तु जीवन के अनुभवों में

उनका एहसास कर सकते हैं।

भारत में बच्चों को

डराने हेतु भी

अंधविश्वास का सहारा लिया जाता है—

कहते हैं,

इमली के वृक्ष पर भूत रहता है,

आधी रात में

प्रेत घूमते हैं।

बिल्ली का राह काटना

अपशकुन माना जाता है,

सियार दिख जाए

तो भाग्योदय समझते हैं।

शुभ कार्य के समय छींक आ जाए

तो लोग रुक जाते हैं।

पीढ़ियों से चली

अनेक मान्यताओं का

कोई ठोस आधार नहीं।

भाग्य, विधि-विधान,

ठगना और ठगे जाना—

इन सबको भी

लोग नियति का खेल मान लेते हैं।

मंत्र, ताबीज,

लाल-काले धागे,

टोने-टोटके,

शकुन-अपशकुन—

ये सब

अंधविश्वास की परछाइयाँ हैं।

दर्पण टूटना,

तेल या कुमकुम गिर जाना—

इन घटनाओं को भी

लोग भय से जोड़ देते हैं।

वैज्ञानिक युग में भी

अनेक लोग

इन भ्रांतियों पर विश्वास करते हैं।

नकली पाखंडी साधु

भोले जनों को ठगते हैं।

समाज में

जागृति, विवेक

और वैज्ञानिक चेतना

आवश्यक है।

अंधविश्वास नहीं,

सत्य और ज्ञान का प्रकाश

मानव जीवन का पथप्रदर्शक बने।

தமிழில் சுருக்கமான கருத்து:

“அறிவியல் ஆதாரம் இல்லாத நம்பிக்கைகள் மனிதனை பயத்திலும் ஏமாற்றத்திலும் இட்டுச் செல்கின்றன. விழிப்புணர்வும் பகுத்தறிவும் சமூகத்திற்கு அவசியம்” — என்ற நல்ல சமூகச் செய்தியை உங்கள் கவிதை வெளிப்படுத்துகிறது।

Sunday, May 10, 2026

विश्प्रववासी पक्षियों के दिवस।

 विश्व प्रवासी पक्षी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

लखनऊ हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा सौहार्द सम्मान प्राप्त

हिंदी सेवक, प्रेमी, प्रचारक, लेखक एवं अनुवादक

द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

10-5-26

++++++++++++

मानव जीवन से

पशु-पक्षी जीवन तक,

ऋतुओं के अनुसार

स्थान परिवर्तन

प्रकृति का शाश्वत नियम है।

पाषाण युग में

जब एक वन में

शिकार समाप्त हो जाता,

तब मानव को

दूसरे वन की ओर

प्रवास करना पड़ता था।

कृषि का ज्ञान मिलते ही

मानव का भटकता जीवन

एक स्थान पर

स्थिर हो गया,

किन्तु प्रकृति की अद्भुत सृष्टि में

आज भी असंख्य पक्षी

हजारों मील की यात्रा कर

ऋतु परिवर्तन के साथ

अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं।

प्रवासी पक्षियों का यह

अनुशासन, धैर्य और

प्रकृति-निष्ठ जीवन

मानव को भी

संदेश देता है।

इनकी सुरक्षा करना,

मार्ग में होने वाले

शिकार, प्रदूषण और

विनाश से बचाना

मानवता का धर्म है।

दुर्भाग्य से

अनेक प्रवासी पक्षियों की

प्रजातियाँ निरंतर

कम होती जा रही हैं।

अनुसंधानों के अनुसार

विश्व की लगभग

४० प्रतिशत प्रवासी प्रजातियाँ

घट चुकी हैं।

इसके प्रमुख कारण हैं—

प्रदूषण,

जलवायु परिवर्तन,

प्राकृतिक मार्गों में बाधाएँ,

अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश,

विमानों की आवाजाही

और पर्यावरण असंतुलन।

इसी जागरूकता हेतु

विश्व प्रवासी पक्षी दिवस

सन् 2006 से

विश्वभर में मनाया जा रहा है।

वेडंतांगल पक्षी अभयारण्य

तमिलनाडु का यह प्रसिद्ध

पक्षी शरणालय

प्रवासी पक्षियों के लिए

सुरक्षित आश्रय बना हुआ है।

मौसम आने पर

यहाँ दर्शकों की

विशाल भीड़ उमड़ती है।

आइए,

हम सब मिलकर

प्रकृति के इन अतिथियों की

रक्षा का संकल्प लें,

क्योंकि

वैश्विक प्रवासी पक्षियों की सुरक्षा

ही सच्चा मानव धर्म है।

++++++++++++

Friday, May 8, 2026

செஞ்சிலுவை சங்கம் / रेड क्रॉस .




தமிழும் ஹிந்தியும் 

 तमिल भी हिंदी भी ।

 सनातन धर्म।



 विश्व रैड क्रॉस दिवस।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

9-5-26.

++++++++++++

   मानव मानव 

   कयों ?

 मानवता के कारण।

 वह देव तुल्य है,

 देवों को भी रक्षक हैं।

 दधिचि मानव अपनी रीढ़ की हड्डी दान में 

 देकर  असुरों के तंग से 

देवों को बचाया था।

 मानव अपने अहंकार वश, स्वार्थवश,  क्रोध वश, लोभ वश 

 दूसरों को बताता है।

 प्रकृति की संपदा 

 वन संपदा ,

विचार, ध्वनि वायु जल प्रदूषण से प्रकृति के क्रोध का पात्र बनता है।

 युद्ध के कारण 

 घायल होता है।

 दावानल, बाढ़, भूकंप आदि के शिकार होता है।

ऐसी बुरी अवस्था में 

 देश,जाति, संप्रदाय,मजहबी सीमा लाँघकर

 सबकी सेवा करने,

 परोपकार करने

 इन्सानियत निभाने,

 स्वजनों की सेवा करने

 वसुधैव कुटुंबकम् का आदर्श निभाने 

 1863 ई. में हेनरी ड्यूनेट द्वारा  रेडक्रॉस संस्था की स्थापना हुई।

 विश्व हित के लिए,

जनता कल्याण के लिए 

 सार्वभौमिक एकता के लिए,

 भ्रातृत्व समदर्शी  सेवाभाव ,दयाशीलता युक्त  हेन्री का कदम का

 स्वागत सहे दिल से सब ने  किया।

आज विश्वभर में जाग्रण लाने,

सनातन धर्म के वसुधैव कुटुंबकम् ,

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु,

 जय जगत का नया रूप

 रेडक्रॉस  वंदनीय हैं,

 मानव कल्याण,

 विश्व बंधुत्व के लिए 

 अनुकरणीय हैं।

 

 உலக செஞ்சிலுவை தினம்

எஸ். அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை, தமிழ்நாடு

இந்தி நேயர் பிரசாரகர் அவர்களின் உணர்வுப்பூர்வ கவியுரை

9-5-2026

++++++++++++++

மனிதன் ஏன் மனிதன் எனப்படுகிறான்?

மனிதநேயம் கொண்டதால் உயர்கிறான்.

கருணை, தியாகம், சேவை வழியில்

தேவனுக்கு நிகராக விளங்குகிறான்॥

ததீசி முனிவர் தம் முதுகெலும்பையே

தர்மத்திற்காக தானமாய் அளித்தார்.

அசுர துன்பத்திலிருந்து தேவர்களை

அருளும் தியாகமும் கொண்டு காத்தார்॥

ஆனால் மனிதன் அகந்தையாலும்,

பேராசை, கோபம், சுயநலத்தாலும்

இயற்கையின் செல்வங்களை அழித்து

துன்பத்தின் பாதையில் செல்கிறான்॥

காடுகள், நீர், காற்று, ஒலி அனைத்தும்

மாசுபாட்டால் வேதனை கொள்கின்றன.

போர், வெள்ளம், நிலநடுக்கம், காட்டுத்தீ

மக்களின் வாழ்வை சிதைக்கின்றன॥

அத்தகைய துயர நேரங்களில்

நாடு, மதம், இனம் கடந்து

அனைவருக்கும் சேவை செய்ய

மனிதநேயம் மலர வேண்டும்॥

“வசுதைவ குடும்பகம்” என்னும்

உலக சகோதரத்துவ எண்ணத்துடன்

1863 ஆம் ஆண்டில் ஹென்றி டியூனான்

செஞ்சிலுவை அமைப்பை உருவாக்கினார்॥

உலக நலனுக்காகவும்,

மனித கண்ணீரை துடைப்பதற்காகவும்

அவரது கருணை நிறைந்த முயற்சியை

உலகம் இதயம் கனிந்து வரவேற்றது॥

இன்று உலகம் முழுவதும்

அன்பும் சேவையும் பரப்பி

“சர்வே ஜனாஃ சுகினோ பவந்து”

வையகம் வாழ்க 

 வையகம் ஒரு குடும்பம் 

என்ற சனாதன தர்மம

 உயரிய சிந்தனையை விதைக்கிறது॥

மனிதநேயம், உலக சகோதரத்துவம்,

அமைதி, அருள், தன்னலமின்மை—

இவற்றின் வாழும் வடிவமே

வணங்கத்தக்க செஞ்சிலுவை அமைப்பு॥

 

 

 

 














Thursday, May 7, 2026

रेत का घर

 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में बालमन की सरलता, दार्शनिक चिंतन और जीवन की नश्वरता — तीनों का सुंदर संगम है।

“रेत का महल” को आपने केवल बच्चों के खेल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानव जीवन, अहंकार, प्रकृति विनाश और संसार की क्षणभंगुरता का प्रतीक बना दिया।

उसी भावधारा को काव्यमय एवं प्रवाहपूर्ण रूप में परिष्कृत करने का विनम्र प्रयास प्रस्तुत है।

रेत का महल

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक

की भावाभिव्यक्ति पर आधारित परिष्कृत काव्य रूप

रेत का महल कहता,

“जगत मिथ्या है,”

ब्रह्म ही शाश्वत सत्य,

बाकी सब क्षणभंगुर माया है।

बालक अपने कोमल मन में

कल्पनाओं के दीप जलाते,

रेत पर महल, गोपुर,

ईश्वर की प्रतिमाएँ सजाते।

कहीं पुल बनते,

कहीं बाँध उठते,

समुद्र तट की बालुका पर

स्वप्न सुनहरे खिल उठते।

पर अचानक आती लहरें

सब आकार मिटा जातीं,

क्षण भर की वह रचना सारी

जलधारा संग बह जाती।

कभी किसी का मिट्टी घर

मित्र के पग से ढह जाता,

बाल हृदय में प्रेम, ईर्ष्या,

क्रोध और भय जग जाता।

वात्सल्य की कोमल छाया,

स्पर्धा की अग्नि प्रखर,

बालमन में भी दिख जाते

जीवन के सब रंग अमर।

यह नश्वर संसार यहाँ,

हर सृष्टि मिट जाने वाली,

मानव अपने स्वार्थ हेतु

प्रकृति भी कर डाले खाली।

पर्वत तोड़ धूल कर देता,

झीलों का अस्तित्व मिटाता,

नदियों के मुक्त प्रवाह को

बाँधों से बंधन पहनाता।

क्षणिक जीवन की यह गाथा,

हर प्राणी की यही कहानी,

रेत के महलों का मिटना

दे जाता गहरी निशानी।

जो आज बना अभिमान से,

कल समय उसे हर लेता,

इसलिए विनम्रता का दीपक

मानव जीवन में जलता रहता।

தமிழ் வடிவம்

மணல் கோட்டை

மணல் கோட்டை சொல்கிறது —

“உலகம் மாயை,

பரம்பொருள் மட்டுமே நிலைபெறும்

நித்திய சத்தியம்” என்று.

சிறுவர்கள் தங்கள்

கற்பனைக் கண்களால்

மணலில் அரண்மனை, கோபுரம்,

தெய்வச் சிலைகள் அமைக்கிறார்கள்.

பாலங்கள் கட்டுகின்றனர்,

அணைகளும் எழுப்புகின்றனர்,

கடற்கரையின் மணற்பரப்பில்

கனவுகள் மலர்கின்றன.

ஆனால் பெரு அலை வந்து

அவற்றையெல்லாம் அழித்துவிடுகிறது,

ஒரு கணத்தின் படைப்பு

கடலோடு கலந்து போகிறது.

சில வேளைகளில்

ஒருவன் கட்டிய மண்வீடு

மற்றொருவன் காலால் இடிந்துவிடும்;

அப்போது சண்டைகளும் எழுகின்றன.

குழந்தைகளிடமும்

அன்பு, பொறாமை, கோபம், பயம்,

பாசம் போன்ற உணர்வுகள்

தெளிவாகத் தெரிகின்றன.

இந்த உலகம் நிலையற்றது;

இறைவன் படைத்த அனைத்தும் நிலையற்றதே.

மனிதன் தன் வசதிக்காக

மலையையும் தூளாக்குகிறான்.

ஏரிகளை மறைக்கிறான்,

நதிகளின் ஓட்டத்தைத் தடுத்து

பாலைவனமாக மாற்றுகிறான்.

நிலையற்ற வாழ்வே

ஒவ்வோர் உயிரினத்தின் விதி.

மணல் கோட்டை இடிவது

இதற்கெல்லாம் ஒரு நிசப்தப் பாடமாகும்।

Wednesday, May 6, 2026

कर स्वच्छता


विश्व हाथ स्वच्छता दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा भावाभिव्यक्ति

७-५-२०२६

मानव जीवन सभ्य बने,

यह संदेश पुरखों ने दिया।

हाथ-पैर की स्वच्छता पर

सदैव विशेष बल दिया।

बिना चरण कर धोए कभी

घर में प्रवेश अधर्म कहा,

प्रातःकाल स्नान कर मानव

तन-मन का पावन धर्म निभा।

ब्रह्ममुहूर्त जागरण करके

स्वच्छता का मान बढ़ाओ,

मुख-शुद्धि, जिह्वा-निर्मलता से

स्वास्थ्य-सुरक्षा पथ अपनाओ।

आज विश्व भी समझ रहा है

स्वच्छता जीवन का आधार,

रोगों से रक्षा करती है

साफ़-सुथरा आचार-विचार।

हाथ स्वच्छ हों केवल इतना

जीवन का उद्देश्य नहीं,

कर्म भी निर्मल हों मानव के,

भ्रष्टाचार का लेश नहीं।

रिश्वत-मुक्त पवित्र हथेली,

धर्मयुक्त हो हर व्यवहार,

भीतर-बाहर शुद्ध रहेगा

तभी सुखी होगा संसार।

Swami Vivekananda ने भी मानव को

स्वस्थ शरीर का ज्ञान दिया,

भक्ति संग देहाभ्यास का

महत्व सदा पहचान लिया।

भारतीय संस्कृति कहती है —

“बासी भोजन खा लेना,

पर स्नान कर भोजन करना,

धोकर वस्त्र पहन लेना।”

घर-आँगन स्वच्छ रखो तुम,

स्वस्थ रहे जन-जन का जीवन,

इसी हेतु जग में मनाया

स्वच्छता का पावन पर्व।

मुख-कवच धारण कर बोलो,

संयम-संस्कारों को मानो,

जैन मुनियों की जीवन-शैली

से भी उत्तम शिक्षा जानो।

भारतीय आचार-विचारों का

महत्व जगत ने फिर पहचाना,

नव रूपों में विश्व आज

स्वच्छता का दीप जलाना।

मई पाँच को विश्व धरा पर

संदेश यही दोहराया गया —

“स्वच्छ हाथ और निर्मल मन से

मानव जीवन सफल बने।”

Tuesday, May 5, 2026

गुरु और शिक्षक

 வணக்கம், नमस्ते।


श्रेष्ठ शिक्षक

(परिष्कृत काव्य रूप)

गुरु और शिक्षक—

दो शब्द, पर अर्थ अनंत,

गुरु तो देव तुल्य,

ज्ञान-ज्योति के दीप प्रचंड।

आत्मज्ञान के सागर में डूबे,

आदर्श चरित्र के धनी,

मार्गदर्शक बन जीवन पथ पर,

भटके जन के सच्चे सखी।

कबीर की वाणी गूँज उठे—

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े..."

पहले वंदन उस गुरु को,

जो ईश्वर का पथ दिखाए।

आज का श्रेष्ठ शिक्षक वही,

जो विषय में हो पारंगत,

ज्ञान की गहराई छू ले,

और विचारों में हो जाग्रत।

बाल मन का सूक्ष्म ज्ञाता,

मनोविज्ञान का हो ज्ञानी,

नवीन ज्ञान की प्यास लिए,

सदैव रहे वह अभिमानी (अर्थात् आत्मगौरव से पूर्ण)।

समाज, राजनीति, प्रशासन का,

जिसे सम्यक् बोध हो,

कर्तव्य पथ पर अडिग रहकर,

जो अनुशासन का स्रोत हो।

वेतन तक सीमित न रहकर,

कर्तव्य को पूजा माने,

भावी पीढ़ी के हृदय में

राष्ट्र-प्रेम के दीप जलाए।

आदर्शों की ऊँचाई छूते,

यथार्थ में दृढ़ पाँव टिकाए,

वही सच्चा शिक्षक है—

जो जीवन को दिशा दिखाए।


Monday, May 4, 2026

मेरे विचार और सुधार चेट द्वारा हँसी

 वणक्कम्, नमस्ते।

आपकी रचना में भाव, ज्ञान और सामाजिक संदेश — तीनों का सुंदर संगम है। विशेषकर “हँसी के प्रकार” और “हास्य का स्वास्थ्य से संबंध” बहुत प्रभावी ढंग से आया है। अब मैं आपकी कविता को थोड़ा और प्रवाहपूर्ण, काव्यमय और प्रभावशाली रूप देता हूँ, ताकि उसका असर और गहरा हो जाए।

✨ परिष्कृत काव्य रूप ✨

विश्व हास्य दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

रोती सूरत किसे भाती,

हँसता मुख मन को हरषाता।

हास्य भरा यह जीवन सारा,

संतोष का दीप जलाता॥

व्यंग्य चित्र हों या विदूषक,

या चित्रपट के हास्य कलाकार,

तनाव हरें, मन को सहलाएँ,

भर दें जीवन में उजियार॥

मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मुख,

शांत सरल मुस्कान सुहानी,

कृष्ण की मधुर मुस्कुराहट में,

छिपी प्रेम की गाथा पुरानी॥

प्रेमी को प्रिय की हँसी में,

मिलता अनुपम सुख अपार,

पर हँसी के भी रूप अनेक—

कुछ मधुर, कुछ करते वार॥

ईर्ष्या भरी, जलन जगाने वाली,

अहंकार की कटु हँसी,

मजाक उड़ाने वाली हँसी,

क्रोध बढ़ाने वाली हँसी॥

पर सबसे सुंदर वह हँसी,

जो दिल से फूटे निर्मल हो,

दुख-दर्द सब दूर भगाए,

जीवन में नव संबल हो॥

हास्य योग की शक्ति निराली,

तन-मन को स्वस्थ बनाती,

हँसी से जुड़ता मानव-मन,

सामाजिकता को बढ़ाती॥

सन् 1998 में प्रारंभ हुआ,

मुंबई से यह शुभ अभियान,

डॉ. मदन कटारिया ने दिया संदेश—

हँसी बने जीवन का वरदान॥

तब से हर वर्ष विश्व भर में,

हास्य दिवस मनाया जाता,

हँसी के रंगों से सजा यह जग,

आनंद का उत्सव कहलाता॥

हास्य रस के भेद अनोखे—

स्मित, हसित, विहसित प्यारे,

उपहसित, अपहसित, अतिहसित,

छः रूप हँसी के न्यारे॥

✍️ संक्षिप्त प्रतिक्रिया

आपकी मूल रचना:

विचारों से समृद्ध है

सामाजिक और स्वास्थ्य दृष्टि से उपयोगी है

पर थोड़ी संरचना और लय की कमी थी

इस रूपांतरण में:

लय (rhythm) और तुक (rhyme) सुधारी गई

भावों को क्रमबद्ध किया गया

संदेश को अधिक प्रभावशाली बनाया गया

अगर आप चाहें तो मैं इसका �⁠तमिल काव्य रूपांतरण भी उसी सौंदर्य के साथ कर सकता हूँ।

Sunday, May 3, 2026

अतीत के धूल

 नमस्ते वணக்கம்।

आपकी रचना में गहरी राष्ट्रीय चेतना, ऐतिहासिक दृष्टि और सांस्कृतिक पीड़ा स्पष्ट झलकती है। यह केवल कविता नहीं, बल्कि एक वैचारिक आह्वान है। 

✨ अतीत के धूल (परिष्कृत काव्य रूप) ✨

अतीत की धूल हटाकर,

नवपीढ़ी को यह बतलाना है—

इतिहास के पन्नों में छिपे

सत्य को फिर जगमगाना है।

साहित्यकार और इतिहासज्ञों का

यह पावन कर्तव्य महान,

रीतिकालीन जड़ता से बचाकर

देना राष्ट्रधारा का ज्ञान।

चंगेज़ की क्रूर चढ़ाइयाँ,

सिकंदर का वह आक्रमण,

मुगल-पठानों के संघर्ष,

अंग्रेज़ों का छलपूर्ण रण।

स्वार्थ, ईर्ष्या और लोभ में

जो देशद्रोही बन बैठे,

उनके मुख से पर्दा हटाकर

सत्य का दीप हमें जगाना है।

आंभी की कायरता नहीं,

पुरुषोत्तम का मान जगाना है,

पद-लोलुपता में खोए जन को

एकता का पाठ पढ़ाना है।

संस्कृत की उस दिव्य धारा को

फिर से जीवन में लाना है,

भारतीय भाषाओं के आधार पर

ज्ञान दीप जलाना है।

योग, प्राणायाम, वेद-वाणी,

आत्मसंयम का सच्चा ज्ञान,

भूल न जाएँ हम अपनी जड़ें,

यही है संस्कृति का सम्मान।

मंदिरों की शिल्पकला,

त्याग और भक्ति की पहचान,

धन के पीछे भागती दुनिया में

मानवता का रखना ध्यान।

संयुक्त परिवार की शक्ति,

सहनशीलता का वह भाव,

यांत्रिक जीवन में खोकर

न भूलें अपना स्वभाव।

खेती प्रधान इस धरती को

मानवता से जोड़ना है,

उद्योगों के बीच भी

मनुष्यता को मोड़ना है।

भूले-बिसरे वीरों की गाथा

फिर से जन-जन को सुनानी है—

राजा राम मोहन राय का सुधार,

भगत सिंह का बलिदान,

सुखदेव का साहस,

चंद्रशेखर आज़ाद का अभिमान।

लाला लाजपत राय की ज्वाला,

बाल गंगाधर तिलक का स्वर,

सुभाष चंद्र बोस का अदम्य साहस,

राष्ट्रप्रेम का अमिट असर।

महाराणा प्रताप की वीरता, त्याग

हर हृदय में फिर जगाना है,

भारतीय गरिमा के उस गौरव को

चिरस्मरणीय बनाना है।

किलों और मंदिरों के अवशेष

इतिहास का संदेश सुनाते हैं,

अतीत की धूल में दबे सत्य

हमको राह दिखाते हैं।

मानव प्रेम, कबीर की वाणी,

सद्भाव का वह अमृत सार,

मजहबी भेद भुलाकर हमको

करना है जग में विस्तार।

प्रांतीय उन्नति के संग-संग

राष्ट्र एकता को साधना है,

स्वतंत्रता संग्राम की शिक्षा को

हर हृदय में बाधना है।

अतीत की धूल को हटाकर

स्वर्णिम भविष्य बनाना है—

जय भारत, जय भारत जननी,

विश्वगुरु फिर बनाना है।

Saturday, May 2, 2026

अच्छाई की महक

 नमस्ते वणक्कम्।

अच्छाई की महक

✍️ एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3/5/26



नमस्ते वणक्कम्।

धूप में सुख, शीतल छाया में,

अच्छाई की महक समाया में।

ईमानदारी की मधुर सुवास,

परोपकार में बसता विश्वास।

दान-धर्म की पावन रेखा,

कर्ण-सी वीरता की लेखा।

कृष्ण की महक लोक-रंजन में,

लोक-रक्षा के पावन चिंतन में।

वेद-उपनिषद् की गूंज पुकार—

“सर्वे जना सुखिनो भवन्तु” साकार।

सनातन धर्म की सुगंध महान,

अतिथि-सेवा, ज्ञान-प्रदान।

ब्रह्म-महिमा के गान में बसती,

आत्मज्ञान की ज्योति जगाती।

राधा-प्रेम की मधुर उमंग,

भक्ति में बहता निर्मल रंग।

सद्ग्रंथों के गहन विचार,

चरित्र-निर्माण का सच्चा आधार।

गंगा-सी पावनता की धारा,

भारत-भूमि का दिव्य नजारा।

ध्यान, त्याग, ईश्वर-चिंतन में,

बसती इसकी महक अमर तन-मन में।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम,

जीवन को देते सच्चा आयाम।

सद्कर्म, सद्विचार, सत्संग साथ,

अनुशासन से उज्ज्वल हो हर पथ।

बुराइयों के तिमिर को हरती,

अच्छाई की महक नित निखरती।

आदर्शों से यथार्थ सजाती,

मानवता की राह दिखाती।


Friday, May 1, 2026

मज़दूर का महत्व


मज़दूर दिवस

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-5-26

मैं मालिक हूँ,

मैं करोड़पति हूँ,

मैं सिविल इंजीनियर,

मैं नामी डॉक्टर हूँ।

शहर का बड़ा अस्पताल मेरा,

हजारों एकड़ खेतों का मैं स्वामी,

बिजली विभाग का मुख्य अभियंता,

बड़े कॉलेज का भी अधिकारी।

मैं विधायक, सांसद,

मुख्यमंत्री भी कहलाता हूँ—

पर ज़रा ठहर कर सोचिए,

क्या मैं सच में अकेला हूँ?

इन ऊँची इमारतों की बुनियाद में,

पत्थर किसने जमाए हैं?

बिजली के खंभे, तार बिछाकर,

रोशनी किसने लाए हैं?

सूखे खेतों में जीवन भरने,

कुएँ किसने खोदे हैं?

नहरों का जल बहाने को,

पसीने किसने बोए हैं?

बीज बोना, फसल काटना,

अनाज के बोरे ढोना,

वाहनों पर लाद-उतार कर,

जीवन का चक्र संजोना।

हर सुविधा, हर निर्माण के पीछे,

एक ही नाम उभरता है—

न कोई मालिक, न अधिकारी,

वह साधारण मज़दूर होता है।

यदि उनका श्रम न हो साथ,

तो न चुनाव में जीत मिले,

न शहर की सफाई हो पाए,

न जीवन में संगीत खिले।

कूड़ा उठाने वाला मज़दूर,

यदि अपना काम न करे,

तो यह मानव सभ्यता भी,

बदबू के नरक में उतरे।

सड़कें, पटरी, हर निर्माण—

सब उनके श्रम की पहचान,

हर सुविधा के पीछे छिपा है,

उनका अदृश्य बलिदान।

आओ उनका मान बढ़ाएँ,

आभार हृदय से जताएँ,

मई महीने की प्रथम तिथि को,

मज़दूर दिवस मनाएँ।

यह केवल एक दिवस नहीं,

सम्मान का है संदेश—

मज़दूरों के श्रम से ही,

सजता है यह देश।