வணக்கம், नमस्ते।
श्रेष्ठ शिक्षक
(परिष्कृत काव्य रूप)
गुरु और शिक्षक—
दो शब्द, पर अर्थ अनंत,
गुरु तो देव तुल्य,
ज्ञान-ज्योति के दीप प्रचंड।
आत्मज्ञान के सागर में डूबे,
आदर्श चरित्र के धनी,
मार्गदर्शक बन जीवन पथ पर,
भटके जन के सच्चे सखी।
कबीर की वाणी गूँज उठे—
"गुरु गोविंद दोऊ खड़े..."
पहले वंदन उस गुरु को,
जो ईश्वर का पथ दिखाए।
आज का श्रेष्ठ शिक्षक वही,
जो विषय में हो पारंगत,
ज्ञान की गहराई छू ले,
और विचारों में हो जाग्रत।
बाल मन का सूक्ष्म ज्ञाता,
मनोविज्ञान का हो ज्ञानी,
नवीन ज्ञान की प्यास लिए,
सदैव रहे वह अभिमानी (अर्थात् आत्मगौरव से पूर्ण)।
समाज, राजनीति, प्रशासन का,
जिसे सम्यक् बोध हो,
कर्तव्य पथ पर अडिग रहकर,
जो अनुशासन का स्रोत हो।
वेतन तक सीमित न रहकर,
कर्तव्य को पूजा माने,
भावी पीढ़ी के हृदय में
राष्ट्र-प्रेम के दीप जलाए।
आदर्शों की ऊँचाई छूते,
यथार्थ में दृढ़ पाँव टिकाए,
वही सच्चा शिक्षक है—
जो जीवन को दिशा दिखाए।
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