नमस्ते वணக்கம்।
आपकी रचना में गहरी राष्ट्रीय चेतना, ऐतिहासिक दृष्टि और सांस्कृतिक पीड़ा स्पष्ट झलकती है। यह केवल कविता नहीं, बल्कि एक वैचारिक आह्वान है।
✨ अतीत के धूल (परिष्कृत काव्य रूप) ✨
अतीत की धूल हटाकर,
नवपीढ़ी को यह बतलाना है—
इतिहास के पन्नों में छिपे
सत्य को फिर जगमगाना है।
साहित्यकार और इतिहासज्ञों का
यह पावन कर्तव्य महान,
रीतिकालीन जड़ता से बचाकर
देना राष्ट्रधारा का ज्ञान।
चंगेज़ की क्रूर चढ़ाइयाँ,
सिकंदर का वह आक्रमण,
मुगल-पठानों के संघर्ष,
अंग्रेज़ों का छलपूर्ण रण।
स्वार्थ, ईर्ष्या और लोभ में
जो देशद्रोही बन बैठे,
उनके मुख से पर्दा हटाकर
सत्य का दीप हमें जगाना है।
आंभी की कायरता नहीं,
पुरुषोत्तम का मान जगाना है,
पद-लोलुपता में खोए जन को
एकता का पाठ पढ़ाना है।
संस्कृत की उस दिव्य धारा को
फिर से जीवन में लाना है,
भारतीय भाषाओं के आधार पर
ज्ञान दीप जलाना है।
योग, प्राणायाम, वेद-वाणी,
आत्मसंयम का सच्चा ज्ञान,
भूल न जाएँ हम अपनी जड़ें,
यही है संस्कृति का सम्मान।
मंदिरों की शिल्पकला,
त्याग और भक्ति की पहचान,
धन के पीछे भागती दुनिया में
मानवता का रखना ध्यान।
संयुक्त परिवार की शक्ति,
सहनशीलता का वह भाव,
यांत्रिक जीवन में खोकर
न भूलें अपना स्वभाव।
खेती प्रधान इस धरती को
मानवता से जोड़ना है,
उद्योगों के बीच भी
मनुष्यता को मोड़ना है।
भूले-बिसरे वीरों की गाथा
फिर से जन-जन को सुनानी है—
राजा राम मोहन राय का सुधार,
भगत सिंह का बलिदान,
सुखदेव का साहस,
चंद्रशेखर आज़ाद का अभिमान।
लाला लाजपत राय की ज्वाला,
बाल गंगाधर तिलक का स्वर,
सुभाष चंद्र बोस का अदम्य साहस,
राष्ट्रप्रेम का अमिट असर।
महाराणा प्रताप की वीरता, त्याग
हर हृदय में फिर जगाना है,
भारतीय गरिमा के उस गौरव को
चिरस्मरणीय बनाना है।
किलों और मंदिरों के अवशेष
इतिहास का संदेश सुनाते हैं,
अतीत की धूल में दबे सत्य
हमको राह दिखाते हैं।
मानव प्रेम, कबीर की वाणी,
सद्भाव का वह अमृत सार,
मजहबी भेद भुलाकर हमको
करना है जग में विस्तार।
प्रांतीय उन्नति के संग-संग
राष्ट्र एकता को साधना है,
स्वतंत्रता संग्राम की शिक्षा को
हर हृदय में बाधना है।
अतीत की धूल को हटाकर
स्वर्णिम भविष्य बनाना है—
जय भारत, जय भारत जननी,
विश्वगुरु फिर बनाना है।
No comments:
Post a Comment