आँख मिचौली
परिष्कृत रूप
आँख मिचौली
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एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।
तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।
26-5-26
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कहते हैं —
लुका-छिपी बच्चों का खेल है,
पर जीवन में इसका
अपना गहरा महत्व है।
सोचने, समझने,
खोजने और पता लगाने का खेल,
छिपे हुए मित्रों को
ढूँढ़ निकालने का खेल।
मानव, पशु, पक्षी
और वनस्पति जगत में भी
यह खेल निरंतर चलता रहता है।
चर-अचर संसार में
इसके अनेक रूप दिखाई देते हैं।
जासूसी का कार्य हो,
या रहस्यों को जानने की चाह,
सबकी शुरुआत
आँख मिचौली से ही होती है।
मानव के सद्गुण और दुर्गुण,
लोभ, मोह, ईर्ष्या, कामना —
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में
फरेब का खेल रचते रहते हैं।
मनुष्य अहंकारी बन
राजा-महाराजा बनने की चाह रखता है,
डाकू धन लूटने की योजना बनाते हैं,
कुछ अधिकारी भ्रष्टाचार और रिश्वत में लिप्त रहते हैं।
अपराधी बचाने वाले वकील,
चोर-डाकुओं को पकड़ती पुलिस,
नशीली वस्तुओं की कालाबाज़ारी,
सब अपने-अपने ढंग की
आँख मिचौली ही तो है।
कुछ अभिनेता काला धन कमाते हैं,
कुछ पाखंडी
भगवान के नाम पर
भोले लोगों को भ्रमित करते हैं।
आतंकवादी और नक्सली भी
क्रांति के नाम पर
षड्यंत्र रचते रहते हैं।
मगरमच्छ के आँसू,
कीटभक्षी पौधों के जाल,
शिकारी का छिपा प्रहार —
सबमें छल और भ्रम का संसार है।
बाघ का दबे पाँव चलना,
अचानक छलाँग लगाना,
छिपकली का चुपचाप
कीड़े पकड़ लेना,
गिरगिट का रंग बदलना,
गोरिल्ला युद्ध की नीति —
सब जीवन की
आँख मिचौली के ही रूप हैं।
यह संसार
सत्य और असत्य,
छल और विश्वास,
प्रकाश और अंधकार के बीच
चलती हुई
एक अनवरत आँख मिचौली है।
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