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Wednesday, May 20, 2026

नमस्ते वणक्कम्।


सागर का पैगाम

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

20-5-26

सागर अनंत है,

कौन जान सका

उसकी गहराई।

उसका संदेश —

लहरों में प्रेम की तड़प,

असीम सहनशीलता।

नदियों का पवित्र जल,

नगरों का गंदा पानी,

अस्थियाँ, राख,

पूजा की मूर्तियाँ —

सबको वह अपने भीतर समेट लेता है।

पर प्रकृति का भी

एक धैर्य होता है।

जब सीमा टूटती है,

तो सागर का क्रोध

सुनामी बनकर उठता है।

दक्षिण की भूमि,

जहाँ भक्ति फली-फूली,

केरल और तमिलनाडु के तट

उसकी चेतावनी के साक्षी हैं।

धनुषकोडी का विनाश,

रामसेतु की स्मृतियाँ,

समुद्र के गर्भ में

कितने नगर समा गए।

सागर कहता है —

“मैं जीवनदाता हूँ,

करोड़ों लोगों का आधार हूँ।

मछलियों का भंडार,

मोती और सीपियों का संसार हूँ।”

“पर मुझसे सावधान रहना।

मेरी शांति में ही

संसार का कल्याण है।

जब मैं कुपित होता हूँ,

तो जलप्रलय आ जाता है।”

जापान भी

मेरे प्रकोप से

बार-बार काँप उठता है,

फिर भी सजग रहना सीखता है।

लोग मेरी लहरों में

आनंद खोजते हैं,

पर एक तीव्र ज्वार

क्षणभर में

जीवन छीन सकता है।

सागर का यही पैगाम —

प्रकृति का सम्मान करो,

सतर्क और सावधान रहो।

मैं शांत हूँ तो

जीवन का संगीत हूँ,

पर क्रोधित हो जाऊँ तो

चारों ओर

जल ही जल।

सावधान।

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