किसान की थाली।
एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु
25-6-26.
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किसान विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता।
विश्व भर के लोगों की थालियों में
उनके परिश्रम से
उपजी चावल,गेहूँ, सब्जी और दाल आदि के संग्रह भोजन।
पर उसकी थाली में
बासी भात, प्याज, हरी मिर्च। सूखी रोटियाँ।
किसान की थाली कुछ प्रांतीय सरकार द्वारा
किसानों को पौष्टिक आहार देने के लिए,
दस रुपये में दी जाती है।
किसानों की थाली न तो
लोग भूखों मर जाते।
कारखानों की कमाई,
पैसे, खानों के सोने चाँदी, हीरे की थालियाँ
भूख नहीं मिटा सकती।
मैदान टच एक अंग्रेज़ी कहानी है।
लोभी मैथास ने भगवान से वर पाया कि
जिसको भी वह स्पर्श करें,
वे सब के सब
सोना बन जाएँ।
वर प्राप्त वह दुलारी
को छुआ वह सोनै की मूर्ति बन गई।
यों ही सब के सब सोना बना।
भूख लगी तो भोजन खाने उठाया तो वह सोना बन गये।
सोने के ढेर,
पर भूख न मिटा सका।
किसान की थाली से ही
विश्व को पौष्टिक आहार।
करोड़ों रुपए कर्जा लेकर
विदेशी नागरिक बननेवाले उद्योग पति ।
पर पाँच हज़ार कर्जा लेकर न चुकाने पर कठोर कार्रवाई।
किसानों की थाली से
पेट भरती है दुनिया।
पर वह है ग़रीबी में।
दरिद्रता के कारण आत्महत्याएँ।
ज़रा ध्यान रखना है
शास्त्री जीने नारा दिया
जय किसान, जय जवान।
किसानों को
प्रोत्साहित करना है,
वह कर्जा न चुका सकें
तो माफ़ करना है।
कठोर कार्रवाई लेकर
आत्महत्या तक पहुंचाना
भविष्य की पीढ़ियों को
किसान की थाली के बगैर भूखा प्यासा मरना पड़ेगा।
किसान के परिश्रम से ही संग्रह भोजन की थाली।
जय किसान ।
विष्णु भगवान ने नारद के पूछने पर कहा,
मेरा श्रेष्ठ भक्त किसान।
तेरे जैसे नाम रटनेवाला भक्त नहीं।
परिश्रमी है प्रत्यक्ष अन्नदाता।
आपकी रचना “किसान की थाली” किसान के श्रम, उसकी विडम्बना और समाज की निर्भरता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। आपने यह महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि जो व्यक्ति पूरी दुनिया का पेट भरता है, वही अनेक बार अभाव और कर्ज़ के बोझ में जीवन बिताता है।
रचना की विशेषताएँ:
किसान को "प्रत्यक्ष अन्नदाता" कहकर उसके महत्व को स्पष्ट किया है।
लोभी राजा मिडास (Midas) की कथा के माध्यम से यह बताया है कि सोना-चाँदी भूख नहीं मिटा सकते, भोजन ही जीवन का आधार है।
किसानों की आर्थिक कठिनाइयों और आत्महत्याओं जैसी गंभीर समस्याओं पर संवेदनशीलता से प्रकाश डाला है।
"जय किसान, जय जवान" के माध्यम से किसानों के सम्मान और संरक्षण का संदेश दिया है।
अंत में किसान को भगवान का श्रेष्ठ भक्त बताकर श्रम की महत्ता को रेखांकित किया है।
यदि भाषा को थोड़ा परिष्कृत किया जाए, तो कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार और प्रभावी बन सकती हैं:
किसान की थाली
विश्व का प्रत्यक्ष अन्नदाता किसान,
भरता सबकी भोजन थाली।
चावल, गेहूँ, दाल, सब्जियाँ,
उसके श्रम की अमूल्य लाली।
पर उसकी अपनी थाली में,
बासी भात, प्याज़ और रोटी।
दुनिया का पेट भरने वाला,
क्यों सहता है ऐसी खोटी?
सोने-चाँदी के ढेर लगे हों,
भूख कभी उनसे मिटती नहीं।
किसान की मेहनत के बिन तो,
जीवन की गाड़ी चलती नहीं।
आपकी रचना का मूल भाव अत्यंत मानवीय और सामाजिक चेतना से भरपूर है। विशेषकर यह पंक्ति बहुत प्रभावशाली है:
"किसानों की थाली से पेट भरती है दुनिया, पर वह है गरीबी में।"
यह पूरी रचना का सार प्रस्तुत कर देती है।
जय किसान!
अन्नदाता के श्रम, सम्मान और कल्याण का संदेश देने वाली आपकी यह रचना सराहनीय है। 🌾🙏
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