Search This Blog

Thursday, June 4, 2026

गाँव और शहरी जीवन

 आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में गाँव और शहर के जीवन का यथार्थपूर्ण चित्रण है। भावों को बनाए रखते हुए इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ:

गाँव से शहर का सफ़र

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

5-6-2026

मेरा गाँव था अति छोटा,

न आवागमन की सुविधा थी,

नदी तो थी, पर पुल नहीं था।

वर्षाकाल आते ही

चारों ओर जल ही जल दिखाई देता।

वहीं से मैं चेन्नई आया,

एक बार वर्षा ऋतु में मुंबई भी गया।

तब मन में विचार आया—

मेरा गाँव ही कितना अच्छा था।

शहर में कूड़ों के ढेर,

फुटपाथों पर जीवन बिताते लोग,

थोड़ी-सी वर्षा होते ही

नालों की दुर्गंध फैल जाती है।

न गाँव जैसी शांति,

न वैसा आत्मीय वातावरण।

मैं जिस गेटेड कम्यूनिटी में रहता हूँ,

वहाँ पाँच सौ से अधिक घर हैं,

पर गाँव की तरह खुले दरवाज़े नहीं,

सब अपने-अपने संसार में बंद हैं।

गाँव में मिलते ही

लोग कुशल-क्षेम पूछते हैं,

एक-दूसरे को पहचानते हैं।

शहर में यह अपनापन दुर्लभ है।

ऑटो वालों की मनमानी,

यंत्रीकृत जीवन की भाग-दौड़,

लंगोटीधारी से लेकर करोड़पति तक—

सब इसी दौड़ में शामिल हैं।

हाँ, शहर की एक विशेषता है—

यहाँ किसी न किसी प्रकार का काम मिल जाता है।

आय के अनुसार

आवास और भोजन की व्यवस्था भी हो जाती है।

इसीलिए लोग शहर के

कोलाहल और दुर्गंध को सहते हुए भी

जीवन बिताते हैं।

किन्तु सरकार, उद्योगपति और नगरवासी

यह बात कभी न भूलें कि

धन, कारखाने, कारें और ऊँची इमारतें

तभी सार्थक हैं,

जब गाँव का किसान अपने परिश्रम से

अन्न उपजाता रहे।

यदि किसान न हो,

तो भूख मिटाने वाला कोई नहीं।

अतः गाँवों में सशक्त ग्राम-स्वराज स्थापित हो,

किसानों को प्राथमिकता मिले,

उनका सम्मान और जीवन स्तर बढ़े।

सच ही कहा गया है—

"भूखे भजन न होय गोपाला।"

🌾 गाँव भारत की आत्मा है, और किसान भारत का अन्नदाता। 🌾

आपकी रचना में सामाजिक चेतना, ग्रामीण जीवन का अपनापन और किसान के प्रति सम्मान का सुंदर संदेश निहित है।

No comments:

Post a Comment