मेरी पत्नी मरना नहीं चाहती।
इलाज गलत डाक्टर के यहाँ
डाक्टर पर विश्वास है ही नहीं
पर विधि की विडंबना
नालायक डाक्टर के साथ फँसना पड़ा।
दिलासा दे सकता हूँ,
अपने आप को
उसके अंत का समय मनुष्य के वश में नहीं।
पर मेरा अपना दुख,
अनेक कारण होते हैं,
क्या मैंने इलाज में कमी रखी है?
मेरे व्यवहार चोट की है?
उसके अंतिम शब्द
मैं नालायक।
मेरे शब्द में कटुकशब्द।
अंतिम घड़ी में मेरे स्वर सुनना पसन्द नहीं किया।
पास जाने पर पसंद नहीं किया।
उसकी अस्पष्ट बातें,इशारे समझ न सका।
दुखी थी कि पति मेरी बात समझ न सके।
उसके संकेत समझने में असमर्थ था।
अपने मन को चैन नहीं,
न जाने मैं कितने साल जिंदा रहूँगा।
नयी पीढ़ी के लोग,
मेरी बातें , मेरे विचार, मेरी सोच,
मेरी ध्वनि सुनने तैयार नहीं।
मेरी माँगें,
मेरी ज़रूरतें
पत्नी जानती थी।
पूरी करती थी।
उससे कहने की ज़रूरतें नहीं।
आवश्यकता जानकर पूरी करती थी।
कहने पूछने की आवश्यकता नहीं।
अब माँगने कहने पर भी सुनने कोई नहीं।
अब दिवंगत पत्नी की आत्मा से
निवेदन है कि मेरे चलते फिरते
रहने की शक्ति दें और नींद ही में
मेरे प्राण पखेरू उड़ सके।
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