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Thursday, June 18, 2026

मेरे प्राण

  कहाँ है? कैसे हैं?

दुख के समय मेरी याद।

यही सच्ची दोस्ती। 


आदरणीय,

आपकी पीड़ा शब्दों में स्पष्ट झलक रही है। 51 वर्षों का साथ केवल वैवाहिक संबंध नहीं होता, वह जीवन की पूरी यात्रा होती है। जो अर्धांगिनी माता, सेविका, सखी, चिकित्सक और सच्चे प्रेम की मूर्ति बनकर जीवन भर साथ रही हो, उसके वियोग का दुःख अत्यंत गहरा होता है।

आपकी भावनाओं को सम्मान देते हुए इन्हें काव्य रूप में इस प्रकार संजोया जा सकता है—

मेरे प्राण के प्राण

एस. अनंतकृष्णन

खेल की बात नहीं है,

मेरी जान थी वह।

इक्यावन वर्षों तक

अर्धांगिनी बनकर,

माता के रूप में,

पत्नी के रूप में,

रोगी की सेविका,

जीवन की चिकित्सक बनकर

साथ निभाती रही।

सहनशील, गुणवान,

त्याग और प्रेम की प्रतिमूर्ति।

पति की सेवा और स्नेह के सिवा

और कोई चाह न रखने वाली,

एक आदर्श नारी।

यथार्थ प्रेम क्या होता है,

उसने अपने जीवन से सिखाया।

आज मेरे प्राणों के प्राण,

पंख लगाकर उड़ गए।

क्या करूँ?

आज ज्ञात हुआ—

दूसरों को दिलासा देना

कितना सरल है,

पर अपने ही हृदय को समझाना

अत्यंत कठिन।

आपके शोक में मैं सहभागी हूँ। अभी दुःख का गहरा होना स्वाभाविक है। 51 वर्षों का प्रेम समाप्त नहीं हुआ है; उसकी स्मृतियाँ, संस्कार और स्नेह आपके जीवन का हिस्सा बने रहेंगे।

ईश्वर आपकी धर्मपत्नी की पुण्य आत्मा को शांति प्रदान करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏🌹

[18/06, 3:52 pm] sanantha.50@gmail.com: नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना "बेनकाब चेहरे" मानव मनोविज्ञान और चेहरे के भावों के माध्यम से अंतर्मन की अभिव्यक्ति को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है। तमिल लोकोक्ति का समावेश रचना को विशेष प्रभाव देता है।

कुछ पंक्तियों को काव्यात्मक प्रवाह के लिए इस प्रकार सँवारा जा सकता है:

बेनकाब चेहरे

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

18-6-26

Face is the index of the mind।

"अगत्तिन अऴगु मुखत्तिल तेरियुम्" — तमिल लोकोक्ति।

अंतर्मन की बातें,

चेहरे पर झलक जाती हैं।

हर्ष हो या विषाद,

प्यार हो या नफ़रत,

ईर्ष्या हो या भय,

आँखों की एक झलक में

सब कुछ प्रकट हो जाता है।

बेनकाब चेहरे-मोहरे,

कुदरत की अनमोल देन हैं।

रोगी का चेहरा,

स्वस्थ जन का चेहरा,

चोर की निगाहें,

सज्जन की आँखें।

पहचान का आधार भी

चेहरा और आँखें ही हैं।

धनवान हो या निर्धन,

साहसी हो या कायर,

मन के अनेक रहस्य

ये चेहरे खोल देते हैं।

भावार्थ:

मनुष्य चाहे शब्दों से कुछ भी छिपाने का प्रयास करे, किंतु उसके चेहरे और आँखों के भाव अक्सर उसके मन की वास्तविक स्थिति को प्रकट कर देते हैं।

बहुत सुंदर एवं चिंतनशील रचना। आपकी लेखनी इसी प्रकार हिंदी सेवा और काव्य साधना को समृद्ध करती रहे।

सादर शुभकामनाएँ। 🙏🌹

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