जंगल में संवाद
एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
30-6-26.
+++++++++++
पेड़ दूसरे पेड़ से
पहला पेड--हम मनुष्य को छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।
दूसरा पेड़ --
साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।
जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,
मनुष्य ढूँढ ढूँढकर
शिकार करता है।
हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,
पवित्र मानते हैं।
मानव सोचता है कि
ईश्वर की सब सृष्टियों पर
उसका अधिकार है।
सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना करते हैं।
सियार --मानव की चालाकी की तुलना मुझसे करते हैं।
बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।
हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।
सिंह --मानव तो सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।
उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।
आदमी में नमकहरामी होते हैं। ईर्ष्यालु होते हैं।
ठग होते हैं। देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।
खरगोश --
मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।
अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय
हमारे अलग अलग गुणों
जानने से उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।
सिंह --ठीक है खरगोश की बात।
मानव भी
मिश्रित गुणवाला है।
एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।
पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में
मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।
आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026
जंगल में संवाद
पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।
दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।
जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।
हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।
सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।
सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।
बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।
हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।
सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।
खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।
सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।
पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।
— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।
जंगल में संवाद
एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
30-6-26.
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पेड़ दूसरे पेड़ से
पहला पेड--हम मनुष्य को छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।
दूसरा पेड़ --
साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।
जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,
मनुष्य ढूँढ ढूँढकर
शिकार करता है।
हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,
पवित्र मानते हैं।
मानव सोचता है कि
ईश्वर की सब सृष्टियों पर
उसका अधिकार है।
सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना करते हैं।
सियार --मानव की चालाकी की तुलना मुझसे करते हैं।
बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।
हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।
सिंह --मानव तो सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।
उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।
आदमी में नमकहरामी होते हैं। ईर्ष्यालु होते हैं।
ठग होते हैं। देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।
खरगोश --
मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।
अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय
हमारे अलग अलग गुणों
जानने से उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।
सिंह --ठीक है खरगोश की बात।
मानव भी
मिश्रित गुणवाला है।
एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।
पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में
मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।
आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026
जंगल में संवाद
पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।
दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।
जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।
हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।
सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।
सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।
बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।
हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।
सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।
खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।
सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।
पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।
— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।
आज की चुनौती – जंगल में संवाद
एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
दिनांक: 30-06-2026
जंगल में संवाद
पहला पेड़ बोला—
हम शीतल छाया बिखराते हैं,
मीठे फल मानव को खिलाते हैं।
अपने तन की लकड़ी देकर,
जीवन का हर भार उठाते हैं।
दूसरा पेड़ मुस्काया—
प्राणवायु का दान हमारा,
धरती का श्रृंगार हमारा।
मिट्टी का कटाव रोककर,
हरियाली का संसार हमारा।
वन के पशु बोले—
हम तो वन की शान हैं,
प्रकृति की मधुर पहचान हैं।
फिर भी मानव लोभ में आकर,
करता हमारा अवसान है।
हिरन बोला—
कभी ऋषियों का पावन आसन,
आज बना हूँ शिकार का कारण।
निर्दोष होकर भी मैं सहता,
मानव का निष्ठुर आचरण।
सिंह गर्जा—
मेरी चाल की देता मिसाल,
मुझको कहता वन का काल।
पर साहस यदि सच में चाहिए,
छोड़ दे छल और हर जंजाल।
सियार हँसकर बोला—
अपनी चतुराई मुझ पर डाले,
दोष हमारे सिर पर टाले।
अपने छल को भूल स्वयं ही,
दर्पण से भी नज़रें टाले।
बाघ बोला—
मेरी फुर्ती, मेरी छलाँग,
बन जाती उसकी पहचान।
पर हिंसा का दोष भी अक्सर,
दे देता मेरे ही नाम।
हाथी बोला—
बल, धैर्य और बुद्धि मेरी,
कहते हैं सब अनुपम ढेरी।
काश! मानव भी सीख सके,
विनम्रता की राह सुनहरी।
खरगोश बोला—
मानव को पहचानना कठिन,
उसका मन है बड़ा गहन।
कभी देव समान दिखाई दे,
कभी बन जाए घोर शत्रुजन।
सिंह ने कहा—
सत्य यही है, मित्र हमारे,
मानव में हैं रूप हजार।
गुण-अवगुण का अद्भुत संगम,
वही रचता अपना संसार।
तभी सब पेड़ एक स्वर बोले—
हम तो देते प्रेम निरंतर,
बिना किसी प्रतिदान की चाह।
फिर भी भलाई के बदले बुराई,
क्यों चुनता मानव की राह?
संदेश
प्रकृति माँ का मान बढ़ाओ,
हर प्राणी से प्रेम निभाओ।
धरती तभी स्वर्ग बनेगी,
जब मानव मानव बन जाओ।
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