विश्व माता-पिता दिवस।
एस . अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
2-6-26
माता-पिता गुरु ईश्वर
भारतीय धर्म की नसीहतों में श्रेष्ठ।
हर रोज़ माता पिता की आशीषें लेना।
नमस्कार करना भारतीय धर्म।
तब माता-पिता के लिए विश्व दिवस क्यों?
भारतीय धर्म में
वैवाहिक बंधन बीच में नहीं छूटता।
पसंद हो या न पसंद
जीवन पर्यंत अलग नहीं होते।
भारतीय धर्म तलाक शब्द नहीं जानता।
पति की मृत्यु होते ही
पत्नी का जिंदा जलाया करते।
वह सती प्रथा सुधारवादी
राजा राममोहन राय के द्वारा बंद हुई।
विधवा पुनर्विवाह का शुभारंभ हुआ।
फिर भी माता पिता तो वंदनीय,
जो भगवान के प्रतिनिधि बनकर प्रत्यक्ष देवी देवता बनकर शिशु का जन्म देकर,
शिक्षा दीक्षा तक साथ देकर विवाह तक जिम्मेदारी लेते।
पर विदेशी भारत में आये,
तलाक शब्द आया।
पहली शादी के बच्चे के रहते,
तलाक हो जाने पर
वह बच्चा माँ के साथ या
पिता के साथ।
पाश्चात्य देशों में
तलाक, पुनर्विवाह मामूली बात।
अतः माता पिता से बिछुड़ी संतानें,
माता हीन,पिता हीन हो जाते।
माता या पिता से मिलना कभी कभी,
या वह भी संभव नहीं।
अतः माता-पिता दिवस
पाश्चात्य अनुकरण।
भारतीय परंपरा में
माता या पिता दिवस
दोनों की मृत्यु के बाद ही।
मातृ-पितृ तर्पण।
अब भारत भी पाश्चात्य
देश के जैसे
माता-पिता से साल में
एक बार मिलने आते।
कारण स्नातक स्नातकोत्तर डाक्ट्रेट
नोकरी विदेश में
माता -पिता , भाई बहन बहु का सम्मिलित परिवार कम होता जा रहा है।
वृद्धाश्रम बढ़ता जा रहा है।
तलाक की संख्या बढ़ रही है।
अंतर्जातीय,
अंतर्मजहबी विवाह।
एकैल परिवार,
दूर दूर
की नौकरी ,
माता-पिता दिवस मनाने
मजबूर कर दिया।
अतः हम भी पालन करने में विवश हैं।
यकीनन भारत में
रोज माता पिता की आराधना करना भारतीय धर्म हैं।
राम जैसा आज्ञाकारी पुत्र भारतीय देन है।
नमस्ते वणक्कम्।
आपकी भावाभिव्यक्ति में भारतीय संस्कृति, माता-पिता के प्रति श्रद्धा और बदलते सामाजिक परिवेश की चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए प्रस्तुत है—
विश्व माता-पिता दिवस
से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
2-6-2026
माता, पिता, गुरु और ईश्वर—
भारतीय संस्कृति में इनका स्थान सर्वोच्च माना गया है।
प्रतिदिन माता-पिता का आशीर्वाद लेना,
उन्हें प्रणाम करना,
हमारी सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।
ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि
माता-पिता के लिए अलग से "विश्व दिवस" की आवश्यकता क्यों पड़ी?
भारतीय जीवन-दर्शन में
वैवाहिक संबंध को एक पवित्र बंधन माना गया है,
जो जीवनपर्यंत निभाने का संकल्प देता है।
समय के साथ समाज में अनेक परिवर्तन आए।
सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का अंत हुआ,
विधवा पुनर्विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ,
और समाज सुधार की नई चेतना जागृत हुई।
किन्तु माता-पिता का महत्व कभी कम नहीं हुआ।
वे ही तो भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि हैं,
जो संतान को जन्म देते हैं,
उसका पालन-पोषण करते हैं,
शिक्षा, संस्कार और जीवन-निर्माण में
अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं।
आधुनिक युग में परिस्थितियाँ बदल रही हैं।
उच्च शिक्षा, रोजगार और विदेश-प्रवास के कारण
संयुक्त परिवारों का स्वरूप सिमटता जा रहा है।
संतानें माता-पिता से दूर रहने को विवश हैं।
वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है,
एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है,
और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता
कई बार दूरी की भेंट चढ़ जाती है।
इन्हीं बदलती परिस्थितियों ने
माता-पिता दिवस जैसे अवसरों को जन्म दिया है,
ताकि संतानें कम-से-कम एक दिन ही सही,
अपने माता-पिता के प्रति
कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त कर सकें।
किन्तु भारतीय संस्कृति का संदेश इससे कहीं बड़ा है।
यह हमें सिखाती है कि
माता-पिता का सम्मान किसी एक दिन का नहीं,
जीवन के प्रत्येक दिन का कर्तव्य है।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम
भारतीय संस्कृति के उस आदर्श पुत्र का प्रतीक हैं,
जिसने माता-पिता की आज्ञा और सम्मान को
अपने जीवन का सर्वोच्च धर्म माना।
आइए, विश्व माता-पिता दिवस पर
यह संकल्प लें कि
हम केवल एक दिन नहीं,
प्रतिदिन माता-पिता की सेवा, सम्मान और आराधना करेंगे।
माता-पिता का प्रेम ही जीवन का प्रथम तीर्थ है,
और उनका आशीर्वाद ही सबसे बड़ा वरदान।
🙏 मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। 🙏
No comments:
Post a Comment