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Tuesday, June 16, 2026

माता का ममत्व

 माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।




माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

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 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।

नमस्ते वणक्कम्, आदरणीय अनन्तकृष्णन जी।

आपकी रचना में माँ के निस्वार्थ प्रेम, त्याग, ममता, मातृभाषा और मातृभूमि के महत्व का सुंदर चित्रण है। भाव बहुत अच्छे हैं। मैंने आपकी रचना को थोड़ा सुव्यवस्थित और काव्यात्मक रूप देने का प्रयास किया है।

माता का महत्व

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

स्वरचित भावाभिव्यक्ति

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माँ हमको गर्भकाल में

जीवन का रूप देती है,

अपने आँचल की छाया में

पलने-बढ़ने की सुविधा देती है।

जन्म लेते ही शिशु को

स्तनपान का अमृत मिलता,

पहला शब्द जो मुख से निकले,

वह "माँ" का स्वर ही होता।

माँ के दुलार भरे शब्दों से

मातृभाषा का ज्ञान मिलता,

निस्वार्थ प्रेम और त्याग से

जीवन का सम्मान मिलता।

तन से, मन से, धन से

माँ करती सतत उपकार,

ममता की शीतल छाया में

खिलता जीवन का संसार।

माँ के संस्कारों से ही

वीर और महापुरुष बनते हैं,

जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज को

माता के आदर्श प्रेरित करते हैं।

तमिल की एक सुंदर कहावत है—

"माता जैसी संतान, धागे जैसा कपड़ा",

सुशिक्षित और संस्कारवान माँ से

निखरता शिशु का व्यक्तित्व सारा।





माँ से ही बंधुत्व के रिश्ते,

माँ से ही परिवार की शान,

माँ न हो तो मानव जीवन में

न रहे ममता का सम्मान।

मातृभाषा, मातृभूमि और माता,

जीवन के तीन अनमोल राग,

इनके प्रति श्रद्धा और समर्पण

बनें मानव जीवन का सुहाग।

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भावार्थ:

माता केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन को संस्कार, भाषा, प्रेम, त्याग और व्यक्तित्व प्रदान करने वाली प्रथम गुरु है। माता, मातृभाषा और मातृभूमि का सम्मान मानव जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य है।

सादर प्रणाम। 🙏

जय माता। जय मातृभूमि। जय मातृभाषा।

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