Search This Blog

Sunday, June 21, 2026

पिता जी

 पिता का मौन त्याग।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-6-26

+++++++

पिता

दो सूक्ष्म 

बिंदु के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर,

तभी  मौन त्याग।

माता को प्रधानता।

लक्ष्मी न तो पालन पोषण कैसे?

वीर जवान  सरहद पर

 देश प्रधान मौन त्याग।

छुट्टी में आना,

 पुत्र या पुत्री  को

 माता के कहने पर  ही पिता का पता लगता।

 विदेश में काम,

 पैसे भेजने का यंत्र।

अलमारियों में 

माता की साडियाँ।

आभूषणों का ढेर।

 बच्चों  की शिक्षा दीक्षा।

 बच्चे  सद्यःफल के कारण माता का महत्व।

बड़ा  मौन त्याग है 

पिता का त्याग।

 वे है घर की रीढ़ की हड्डी।

 पिता न तो सीधे  परिवार खड़ा रहना असंभव।

 पिता सबेरे 

नौकरी के लिए जाते 

शामको  लौटते।

 आते ही अनुशासन 

पढ़ाई पर बोलते।

 अनावश्यक 

 बाह्याडंबर खर्च

 रोकने की बात करते।

 तमिल में कहते हैं 

 संतानों को ज्ञान देना

 पिता का कर्तव्य है।

 अपनी जरूरतों को कम करके  परिवार बहन भाइयों को देते पिताजी।

 उनका मौन त्याग 

 अद्भुत।

अतुलनीय प्रेम,

 पिता का मौन त्याग।

 आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना "पिता का मौन त्याग" पिता के निःस्वार्थ समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और मौन प्रेम को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। आपने यह दर्शाया है कि पिता प्रायः परिवार के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं, किन्तु उनके त्याग की चर्चा कम होती है।

कुछ पंक्तियों को थोड़ा परिष्कृत रूप देकर रचना को और अधिक प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता है:

पिता का मौन त्याग

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

पिता,

दो सूक्ष्म बिंदुओं के मिलन में,

माता को प्रधानता देकर

करते हैं मौन त्याग।

माता का महत्व महान है,

किन्तु पिता के श्रम बिना

पालन-पोषण कैसे हो?

वीर जवान सरहद पर,

देश हेतु करता मौन त्याग।

विदेशों में काम करते पिता,

परिवार के लिए धन भेजते हैं।

अलमारियों में सजी साड़ियाँ,

आभूषणों का ढेर,

बच्चों की शिक्षा-दीक्षा—

इन सबके पीछे

पिता का मौन परिश्रम है।

वे घर की रीढ़ हैं,

उनके बिना परिवार का

सीधा खड़ा रहना कठिन है।

प्रातः नौकरी पर जाना,

संध्या को लौट आना,

आते ही बच्चों को

अनुशासन और पढ़ाई का पाठ पढ़ाना।

अपनी आवश्यकताओं को घटाकर,

परिवार और संतानों के लिए जीना—

यही है पिता का अद्भुत त्याग।

अतुलनीय है उनका प्रेम,

अद्भुत है उनका समर्पण,

वंदनीय है

पिता का मौन त्याग।

रचना का भाव अत्यंत सुंदर है। विशेष रूप से "वे घर की रीढ़ की हड्डी हैं" और "अपनी जरूरतों को कम करके परिवार को देना" जैसे भाव पाठक के हृदय को स्पर्श करते हैं।

हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌹

No comments:

Post a Comment