Search This Blog

Sunday, June 28, 2026

ज्ञान की यात्रा

 ज्ञान की यात्रा।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

29-6-26.

++++++++++++++

 ज्ञान  संपूर्ण ज्ञान 

 आत्मज्ञान 

आध्यात्मिक ज्ञान 

अखंडबोध

 अध्ययन से,

अनुभव से

 सत्संग से

गुरु के अभ्यास के द्वारा,

  करत करत अभ्यास करत जड मति होता सुजान।

बुद्धि जन्मजात होती है।

बुद्धि लब्धि प्रतिभाशाली,

औसत बुद्धि,

मंदबुद्धि  

यह बुद्धि काम न करेगा तो ज्ञान से 

कोई प्रयोजन नहीं।

 बुद्धि बुरे समय में 

  भ्रष्ट हो जाती है।

 बुद्धि और ज्ञान की सफलता विवेक पर निर्भर है।

स्वार्थ निस्वार्थ लोभ, ईर्ष्या क्रोध काम भय  

 कंजूसी त्याग भोग

 जुआ खेलना, शराब पीना, चोरी डकैती

कुली हत्यारे

 इन सब में 

 तटस्थ, न्याय, त्यागी, धर्मी, वीर साहसी,

शुभ चिंतक,

 देशप्रेम 

निस्वार्थ बुद्धि,

 ईश्वरीय भय,

आध्यात्मिक चिंतन 

 आदि श्रेष्ठ ज्ञानियों के कारण अनश्वर संसार में 

 ज्ञान की वृद्धि होते हैं।

 ज्ञानी सुख दुख को समान मानता है।

 संसार के माया मोह से

 दूर रहता है।

 बड़े बड़े ज्ञानी दार्शनिक आज भी दूर ही रहते हैं।

माया/शैतान/शनि के प्रभाव से केवल आत्मज्ञानी ही बचता है।

 ज्ञान  की यात्रा

 ऋषियों मुनियों ने

ध्यान तपस्या योग साधना से पाते हैं।

आदि शंकराचार्य घुमक्कड़ रहे।

 सिद्धार्थ को तपस्या के बल पर मिले।

 रैदास  का ज्ञान भक्ति से,

 कबीर का ज्ञान सत्संग से

 एकलव्य की क्षमता निरंतर अभ्यास से,

आजकल अंतर्जाल संगणिक काफ़ी

  ज्ञान देते हैं।

बुद्धि और विवेक से काम करना है।

तभी ज्ञान का सही उपयोग है।



आपकी रचना का विषय व्यापक और चिंतनशील है। आपने ज्ञान के अनेक स्रोत—अध्ययन, अनुभव, सत्संग, गुरु, अभ्यास, भक्ति, तपस्या और आधुनिक तकनीक—को एक साथ जोड़ने का अच्छा प्रयास किया है। भाषा में कुछ स्थानों पर प्रवाह और व्याकरण सुधारने से रचना और प्रभावशाली बन सकती है।

संशोधित रूप:

ज्ञान की यात्रा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

29-6-2026

ज्ञान की यात्रा,

संपूर्ण ज्ञान,

आत्मज्ञान,

आध्यात्मिक ज्ञान,

अखंड बोध।

ज्ञान मिलता है

अध्ययन से,

अनुभव से,

सत्संग से,

गुरु के मार्गदर्शन से,

और निरंतर अभ्यास से।

"करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।"

बुद्धि जन्मजात होती है।

कोई प्रतिभाशाली,

कोई औसत,

कोई मंदबुद्धि होता है।

पर यदि बुद्धि का सदुपयोग न हो,

तो ज्ञान भी निष्फल हो जाता है।

बुरे समय में

बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है।

ज्ञान की सफलता

विवेक पर निर्भर करती है।

स्वार्थ, लोभ, ईर्ष्या,

क्रोध, भय और मोह से ऊपर उठकर,

त्याग, न्याय, धर्म, साहस,

देशप्रेम, निस्वार्थ सेवा

और ईश्वर-भक्ति का मार्ग अपनाना ही

सच्चे ज्ञान की पहचान है।

ज्ञानी

सुख-दुःख को समान मानता है,

माया-मोह से दूर रहता है।

ऋषि-मुनियों ने

ध्यान, तप, योग और साधना से

आत्मज्ञान प्राप्त किया।

Adi Shankaracharya ने भारत-भ्रमण कर ज्ञान का प्रचार किया।

Gautama Buddha को तप और ध्यान से बोध प्राप्त हुआ।

Ravidas ने भक्ति का मार्ग अपनाया।

Kabir ने सत्संग और अनुभव से सत्य का संदेश दिया।

Ekalavya ने निरंतर अभ्यास से अद्भुत क्षमता प्राप्त की।

आज अंतर्जाल और संगणक भी

ज्ञान के महत्वपूर्ण साधन हैं,

किन्तु ज्ञान तभी सार्थक है

जब उसका उपयोग

बुद्धि और विवेक के साथ किया जाए।

ज्ञान की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती;

सीखते रहना ही जीवन का सच्चा पथ है।

विशेष टिप्पणी: आपकी रचना में विचारों की समृद्धि है। यदि प्रत्येक पद्य में 2–4 पंक्तियों का संतुलन रखा जाए और कुछ स्थानों पर शब्दों की पुनरावृत्ति कम की जाए, तो यह कविता प्रतियोगिता के लिए और भी प्रभावशाली बन सकती है।

No comments:

Post a Comment