Search This Blog

Friday, July 10, 2026

न्याय के मंदिर।

 न्याय के मंदिर 

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

11-7-26.

 मंदिर भगवान का है।

 न्यायालय 

भगवान के दर्शन में 

चार वर्ग के लोग।

 पहला वर्ग

 मंदिर के धर्म कर्ता।

फिर मंत्री, सांसद, विधायक, 

अधिकारी वर्ग,

 स्थानीय बड़े लोग।

फिर   प्रवेश शुल्क  रूपए 

1000/500/100/50

के लोग।

अंत में फ़्री दर्शन के लोग।

 वही क्रम अदालत में।

सोचा देवालय

 न्यायालय 

दोनों बराबर।

 एक में पुजारी को दक्षिणा।

पुण्य मिलने के लिए।

न्यायालय में वकील को दक्षिणा।

न्याय मिलने के लिए।

 न्यायधीश या भगवान 

 कैसे फैसला सुनाते हैं।

 सही या ग़लत 

 विधि की विडंबना।

 भाग्य का फल।।

उच्च न्यायालय  का फैसला

 उच्चतम न्यायालय  में 

बदल सकते हैं।

 

एस.अनंतकृष्णन,



आपकी रचना विचारोत्तेजक है। इसमें आपने देवालय और न्यायालय की व्यवस्था की तुलना करते हुए सामाजिक असमानता पर प्रश्न उठाया है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा सँवारकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

Writing

आज की चुनौती : न्याय के मंदिर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

11-7-2026

मंदिर भगवान का है,

न्यायालय न्याय का मंदिर।

भगवान के दर्शन में भी

चार वर्ग दिखाई देते हैं।

पहला वर्ग—

मंदिर के धर्मकर्ता।

दूसरा—

मंत्री, सांसद, विधायक,

अधिकारी और स्थानीय बड़े लोग।

तीसरा—

प्रवेश शुल्क

₹1000, ₹500, ₹100, ₹50

देकर दर्शन करने वाले।

और अंत में—

निःशुल्क दर्शन की लंबी पंक्ति।

कुछ ऐसा ही क्रम

अदालतों में भी दिखाई देता है।

सोचता हूँ—

देवालय और न्यायालय,

क्या दोनों कहीं न कहीं

एक जैसे हो गए हैं?

देवालय में

पुजारी को दक्षिणा,

पुण्य की कामना में।

न्यायालय में

वकील को फीस,

न्याय की आशा में।

पर अंततः

भगवान हों या न्यायाधीश,

फैसला कैसे और किस आधार पर होता है—

सही या गलत,

यही विधि की विडंबना है,

या फिर भाग्य का फल।

उच्च न्यायालय का निर्णय भी

उच्चतम न्यायालय में

बदल सकता है।

प्रश्न यही है—

न्याय का वास्तविक मंदिर

कहाँ है?

यदि चाहें, मैं इसे और अधिक काव्यात्मक, तुकांत या व्यंग्यात्मक शैली में भी रूपांतरित कर सकता हूँ।









No comments:

Post a Comment