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Monday, August 3, 2026

जैसी करनी वैसी भरनी


आज की चुनौती

जैसी करनी वैसी भरनी

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एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

मानव का जन्म,

शास्त्रों के अनुसार,

पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरूप होता है।

आकाश से गिरी

जल की एक बूँद,

सीपी में गिरे तो मोती बन जाती है;

उसका तेज और चमक

उसके भाग्य और कर्मफल का प्रतीक है।

वही बूँद

यदि गंदे नाले में गिरे

या अंगारे पर पड़े,

तो उसका स्वरूप बदल जाता है।

मानव की बुद्धि और प्रवृत्ति

क्यों भिन्न-भिन्न होती है?

सुविचार से सुख और शांति मिलती है,

कुविचार से बेचैनी और दुःख।

अपने अंतर्मन को जानकर

कभी झूठ मत बोलो।

झूठ सिद्ध होने पर

सबसे अधिक पीड़ा

अपना ही अंतःकरण देता है।

सुकर्म करने वाला

सीना तानकर चलता है,

कुकर्म करने वाला

स्वयं ही सिर झुका लेता है।

एक डाकू को कभी शांति नहीं मिली।

जब वह गुरु के सान्निध्य में पहुँचा,

तो उसे कहा गया—

"दिनभर जो भी कर्म करो,

उन्हें लिखकर सायंकाल सभा में पढ़ना।"

अपने ही कर्मों को पढ़ते समय

वह लज्जित हो उठा।

सभा में उन्हें सुनाने का साहस न हुआ।

यहीं से उसका जीवन बदल गया।

जैसी करनी, वैसी भरनी।

आत्मचिंतन से ही ज्ञात होता है

कि मनुष्य सुखी क्यों है,

और दुःखी क्यों।

सुकर्म का फल

आनंद ही आनंद है;

कुकर्म का फल

दंड और पश्चाताप।

संत कबीर ने कहा है—

"बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥"

और यह भी—

"जो तोको काँटा बुवै,

ताहि बोय तू फूल।

तोको फूल के फूल हैं,

बाकू है त्रिशूल॥"

ध्यान और साधना से

ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त होता है।

नशे से मिलने वाली शांति

क्षणिक होती है,

और शरीर, विशेषकर फेफड़ों के लिए, हानिकारक।

सोचो, समझो—

जैसा आहार,

वैसी बुद्धि।

सत्संग का फल

ज्ञान और विवेक है;

कुसंग का फल

बुरी आदतें और दुःख।

अतः जीवन का अटल सत्य है—

जैसी करनी, वैसी भरनी। 

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