अनंत कृष्णन का आर्तनाद।
बचपन से आज तक
सत्रह साल तक
माँ पिता की ग़रीबी।
हर साल एक बच्ची,
दो-तीन साल पलना,
मर जाना।
बच्ची तो अति सुन्दर,
मैं माँ का दूसरा बेटा।
मेरे पहले एक बेटा
वह भी दो साल पलकर चल बसा।
मेरे बाद छे सुंदर बहनें
पर पर कर मर गयी।
यह आर्तनाद में ही
भगवान की देन।
सातवीं बच्ची हुई।
उसका नाम वेंबु रखा गया।
वेंबु का मतलब है नीम का पेड़।
मेरे दादा ने कहा,
अंगुली नाम जिंदा रहेगी।
मेरा और मेरी बहन की उम्र फ़रक ग्यारह साल।
मैं भी संघर्ष ग़रीबी,
असह्य मानसिक पीड़ा में पला।
मेरी सत्रह साल की उम्र में
माँ बोन टी.बी.के कारण बीमार पड़ी।
जो भी सर्वेश्वर कलियुग के ईश्वर
श्री वेंकटाचलपति , कार्तिकेय की कृपा से
मेरी सारी माँगें पूरी हुई।
चार बार यम धामके द्वार तक जाकर
जान बची।
पर मेरी प्राण प्रिया सौ साल तक
जीने की बात कह रही थी।
मेरे प्राण रक्षा के लिए
अधिक ध्यान दें रही थी।
पर मैं भगवान पर भरोसा रखकर
जीना मरना ईश्वर के अनुग्रह से ।
वह अचानक इलाज के बाद भी मर गयी।
इस में कमी मेरी है या विधि की विडंबना है या डाक्टर
की गलत इलाज है कितने विचार,
कितने प्रलाप, कितने आर्तनाद
कितने विचारों के ज्वार भाटे,
चिंता की लहरें,
मेरी पत्नी के जिंदा रहकर
मेरे प्राण पखेरू उड़ जाने पर केवल
उसको असहनीय वेदनाएँ होंगी।
बाकी लोग तो अत्यंत खुशी का अनुभव करेंगे।
मेरे साले मेरी साली
सब उसके साथ रहकर
धीरज बँधाएँगे।
दिलासा देंगे।
क्यों कि वह मिलनसार ही नहीं,
हर नाते रिश्तेदारों के बारे में
उनके शारीरिक रोग, मानसिक रोगी
सब के लिए सलाह देती।
पर में तो बचपन से ही रो रहा हूँ।
मेरी माँ,सांस, ससुर, साले सब के पसंद का पात्र नहीं हूँ।
पर मैं अब अकेले बचपन से लेकर बुढ़ापे तक
सब के नफरत का पात्र बनकर जी रहा हूँ।
मेरे आर्तनाद किसको सुनाऊँ।
हर पल उसकी याद में रो रहा हूँ।
मैं जिंदा हूँ।
मेरे आर्तनाद सुनने मेरे आँसू पोंछने कोई नहीं।
मेरे गुण जान समझकर प्यार करनेवाली मेरी अर्धांगिनी गोमती ही है।
दिल रो रहा है तड़प रहा हैं।
सब कुछ देकर मेरी माँग पूरी करनेवाले ईश्वर
मेरी अर्द्धांगिनी के प्राण लेकर
दुख सागर में डुबो दिया है।
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