मन की व्यथा
ऍस. अनंतकृष्णन, चेन्नै, तिलनाडु 13-3-26.
मानव जीवन में मन की व्यथा,
जन्म से लेकर जीवन पर्यंत।
मनुष्य का जन्म अंधकारमय गर्भ से,
उजाले की ओर रोते हुए होता है।
भूख लगने पर रोना,
पेट भरते ही हँसना यही शैशवावस्था।
आधुनिक शिशु की व्यथा,
तीन साल की उम्र से प्रारंभ।
तभी वह प्रि के.जी।
शिशु को हरफनमौला बनाने
तकाजा, पाठशाला से आते ही
ट्यूशन का तकाजा,
सोलह साल की उम्र तक
परीक्षा और अंक की चिंता।
तब शारीरिक परिवर्तन,
स्वर परिवर्तन,
काम वासनाएँ,
अश्लील चित्रपट के चित्र,नाचगान।
जितेंद्र रहना अति मुश्किल।
लडके -लडकियों के संयमित जीवन की चिंता।
उच्च शिक्षा और अच्छी नौकरी की चिंता।
योग्य पात्र से विवाह की चिंता।
संतान की चिंता,
संतान न होने की चिंता।
आर्थिक अभाव की चिंता.
पदोन्नति की चिंता।
ईर्ष्या के कारण चिंता,
लोभ के कारण चिंता।
काम की चिंता,
तलाक की चिंता।
महँगाई की चिंता,
भ्रष्टाचार की चिंता
मन में व्यथा की लहरें।
ज्वारभाटा कभी शांत नहीं होता।
पल पल में नयी नयी व्यथाएँ।
प्राकृतिक प्रकोप की चिंताएँ।
कुशासन के कारण चिंता।
मच्छरों के कारण.
पत्नी और माँ के बीच
साँप छचूंदर की गति होना।
कौन सी भगवान श्रेष्ठ है की व्यथा।
मन की व्यथा का अंत नहीं।
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