आपके भाव बहुत गहरे और आध्यात्मिक हैं। मैं आपकी रचना को थोड़ा व्यवस्थित और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ — भाव वही रखते हुए।
शीर्षक: नाम जप ही मेरा काम
नींद नहीं आई,
मन में कोई चिंता नहीं,
शरीर में कोई पीड़ा नहीं,
फिर भी नींद नहीं आई।
मन कहता है —
कुछ करो, कुछ कमाओ,
देश कल्याण के लिए
कुछ तो कार्य करो।
पर मैं तो
पचहत्तर वर्ष का वृद्ध हूँ,
क्या करूँ? कैसे करूँ?
तभी भीतर से
आत्म चेतना जाग उठी —
कहने लगी धीरे से,
“कुछ मत करो,
केवल नाम जपते रहो।
तुम्हारे शुभ विचारों को
कोई न कोई
कहीं न कहीं
कार्य रूप देगा।”
तब समझना —
तुम्हारा जनकल्याण का भाव
किसी दूसरे दिव्य मानव के द्वारा
साकार हो रहा है।
कवि गीत लिखता है,
पर उसे मधुर स्वर में
गाने वाला
कोई दूसरा होता है।
बस उसी तरह —
तुम्हारा काम है
नाम जपना।
नाम जप ही
तुम्हारा कर्म,
तुम्हारा धर्म,
तुम्हारा जीवन। ।
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