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Monday, March 2, 2026

प्रह्लाद

 प्रह्लाद।

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 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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3-3-26

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 कबीर ने कहा है,

जाको राखे साइयाँ,

 माली न सकै कोई।

 बाल न बांका करि सकै,

 जो जग वैरी होय।।

 इसके प्रमाण में है

 भक्त प्रह्लाद की कहानी।।

 हिरण्यकश्यप असुरों का रिजा,

 ब्रह्म से वर पाया कि

 उसकी मृत्यु न किसी 

 मानव से, जानवर से

अग्नि से पानी से, 

 प्रचंड हवा से,  

किसी भी 

हालत में न हो।

ऐसी स्थिति में नारद ने 

 जब प्रह्लाद गर्भ में था,

 तब विष्णु का महामंत्र,

 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः का उपदेश दिया।

वर प्राप्त  असुर राजा,

 अहंकार के कारण 

 अपने को ही   ईश्वर समझा।

 विष्णु का विरोधी बना।

 उसने आदेश दिया 

सबको हिरण्याक्ष नमः 

 कहकर ही जप करना है।

 न विष्णु का नाम।

 असुर राजा के डर है

 देश भर में हिरण्याक्ष नमः का जप गूँजता ।

पर पुत्र प्रह्लाद 

हिरण्यकश्यप की आराधना करने 

तैयार नहीं था।

 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।

 पिता के डराने से भी

 न डरा वह।

तब अपने पुत्र को

 मारने के लिए,

 विष पिलाया।

 हाथी द्वारा हत्या करने की कोशिश की।

 समुद्र में  पत्थर बाँधकर फेंका सब से बचकर निकला।

 अंत में अपनी बहन होलिका ,

 जो आग में जलकर मरती  नहीं,

 उसकी गोद में 

बिठाकर जलाया।

 ईश्वर की रक्षा का पात्र

 प्रह्लाद मुस्कुराते जीवित निकला।

 जाको राखे साइयाँ 

 मारी न  सकै कोय।।

 प्रह्लाद और पिता के तर्क  में पिताजी ने पूछा 

 भगवान कहाँ है?

पिता से प्रह्लाद ने कहाँ 

 भगवान इस स्तंभ में है।

 दिखाओ, 

 डाँटते ही ,

 स्तंभ तोड़कर 

 नर्सिंह के रूप में 

 विष्णु प्रकट हुए।

 हिरण्यकश्यप के पेट चीरकर  वध किया।

 प्रह्लाद का चरित्र 

अटल भक्ति,

 समर्पण भाव, 

शरणागति तत्व।

 ठीक है

जाको राखे साइयाँ 

मारी न  सकै कोई।

बाल न बाँकै करि सकै

जो जग वैरी होय।।

वाणी के डिक्टेटर कबीर वाणी।


 



 

 

 

 





 

 

 



 

 



 

 



 

 



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 


 

 




 

 


 









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