आदरणीय महोदय, वणक्कम
शब्दों का मेला
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
गुरुभ्यो नमः
शब्दों के मेले में
शोर भी है, कलरव भी है,
मधुर स्वर भी, कठोर स्वर भी।
कुछ शब्द
दोस्ती करवाते हैं,
कुछ शब्द
दोस्ती बिगाड़ जाते हैं।
कुछ शब्द
दुश्मनी मिटा देते हैं,
कुछ शब्द
दुश्मनी बढ़ा देते हैं।
कुछ शब्दों से
लड़ाई-झगड़े जन्म लेते हैं,
कुछ शब्द
प्राण देने-लेने का कारण बन जाते हैं।
कुछ शब्द
छल-कपट और ठगी के होते हैं,
कुछ शब्द
चापलूसी से भरे होते हैं।
कुछ शब्द
जल से भी अधिक मधुर,
हृदय को शीतल करने वाले।
कुछ शब्द
दया और शोक जगाते हैं,
भिखारी से विनती करवाते हैं —
“भवति भिक्षां देहि।”
कुछ शब्द
आध्यात्मिकता का दीप जलाते हैं,
कुछ शब्द
प्रेरणा और उत्साह जगाते हैं।
कुछ शब्द
हतोत्साहित करते हैं,
कुछ शब्द
दिलासा और आशा देते हैं।
कुछ शब्द
निराशा के अंधकार से भरे,
कुछ शब्द
वीरता का बिगुल बजाते हैं।
कुछ शब्द
कायरता प्रकट करते हैं,
कुछ शब्द
विदूषक बनकर हँसाते हैं।
कुछ शब्द
शाप बन जाते हैं,
कुछ शब्द
शाप से मुक्ति दिलाते हैं।
उच्चारण का भी प्रभाव देखो—
“भाप आये, पाप आये, बाप आये।”
शब्दों के
सही या गलत प्रयोग से ही
मंगलमय
या अमंगलमय
बन जाता है जीवन।
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