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Tuesday, March 17, 2026

बेटियाँ

 बिटिया की किलकारी


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

18-3-26.

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बिटिया महालक्ष्मी की देन।

 भारतीय रूढ़िवादी 

 देवी स्वरूपा की प्रशंसा 

 करते करते

 उनकी आराधना के साथ साथ,

बेगार भी बनाती थी।

 भ्रूण हत्या करने में 

 ज़रा भी हिचकती नहीं।

 पति के मरते ही जिंदा जलाना।

 बालविवाह शादी क्या है

 जानने के पहले ही शादी।

 विधि की विडंबना से

 पति मर जाएगा,तो

 असीमित वेदनाएँ,

 अमंगल रूप,

 अपशकुन का पात्र।

 जवाहर व्रत न जाने 

 कितनी परेशानियां।

 आज भी शिक्षित युवतियाँ,

 ससुराल में किलकारियां न कर सकती।

 किलकारी मायके के साथ नौ दो ग्यारह हो जाती।

सीता से लेकर मीरा लक्ष्मीबाई तक 

 उर्मिला  तक

 मंदोदरी तक शादी के बाद किलकारी नहीं।

 दमयंती शकुंतला चंद्रमणि तक कितने संकट

 मानसिक पीडाएँ।

 मुमताज के पति को 

 मारकर शाहजहां के अपहरण और  प्रेम महल का नाटक ताजमहल।

 शेरखाँ की हत्या

  बुढ़ापे में शाहजहाँ ने ताजमहल को छेद के द्वारा  देखा।

 आधुनिक 

काल में  बेटियों का 

 समान अधिकार,

  भ्रूण हत्या को दंड

 पोक्सो कानून ,

 जो भी हो 

बेटियों की ‌किलकारियाँ

 अब तक  अंतर्मन में नहीं।

 अधिकांश बेटियाँ,

 छे साल की उम्र में भी

 डर की संभावनाएँ

 पाठशालाओ में 

 अच्छा स्पर्श बुरा स्पर्श 

 की सीख,

 अब शिक्षा, नौकरी।

 पर पुरुष सत्तात्मक 

 दमन नीति कम नहीं हुई।

 नौकरी करके 

घर आते ही

 सब काम,

 दफ़्तर  जाने के पहले

 रसोई, पति की सेवा,

 सास ससुर का डर,

 सामाजिक अफ़वाहें 

 बेटियों की किलकारी 

 अंतर्मन से नहीं,

 दिल में रोती हुई बाहर की किलकारी।

  बेटियाँ बहुएँ बनते ही

  मायके के प्रेम दिखाने में भी पूरी स्वतंत्रता नहीं।


 


 

 




 


 

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