Search This Blog

Monday, April 25, 2016

गृह कल्याण - गृह-शास्त्र- तिरुक्कुरळ-१०२१ से१०३०

गृह शास्त्र -गृह कल्याण-तिरुक्कुरल-१०२१ से १०३०

१. अपने  कर्तव्य  करने  में  बिना आलसी के जो लगातार प्रयत्न  करता रहता  है , उस बडप्पन से बढकर  कोई और बडप्पन नहीं  है.
२.
२. गहरा ग्ञान ,लगातार कोशिश , अथक परिश्रम  जो करता रहता  है, उनके घरवाले, नाते -रिश्ते सब के सब उन्नति  हो जाएँगे.

३. अपने परिवार और अपने आश्रित रहनेवालों की तरक्की के  लिए. जो  मेहनत. करता  है,
उसको भाग्य और ईश्वरीय शक्ति खुद मदद करने आ जाएगी.

४. जो अपने आशंरितों की प्रगति के लिए. कठोर मेहनत करता  है, बिना विलंब कोशिश करता  है' उसको सफलता अपने आप आ मिल जाएगी.

५.  जो नागरिकों के कलयाणमें कठोर. मेहनत. करता  है, निर्दोषी है, उसको संसार के  लोग रिश्ता  मानकर घेर लेंगे.


६.  एक  पौरुष आदमी  के लक्षण. है , अपनेघर  और देश के सत्ता अपनाने  का व्यक्तित्व .


७. रण क्षेत्र में  जै से वीर निडर  हाोकर   वीरता से लडने  का  दायित्व अपना  बना  लेता  है, वैसे अपने परिवारऔर नानागरि की  प्रगति का भार  है.


८. नागरिकों की प्रगति में लगनेवालों के लिए कोई निश्चित समय. नहीं  है, सदा  काम में लगना  है. आलसी सही नहीं है और देरी भी-

९.  अपने आश्रित लोगों की सुरक्षा और तरक्की के  लिए जो कठोर मेहनत करता  है ,उसके  बारे में लोग कहेंगे  कि  उनका  जन्म दुख झेलने के लिए हुआ है.

१०.जिस परिवार में दुखावस्था  में  जिम्मेदारी उठाने  के चतुर आदमी नहीं  है, वे ऐसे गिरेंगे जैसे  आरे से काटे पेड गिर पडेंगे.





तिरुक्कुरल -१०१० से १०२० तक लज्जा शीलता

लज्जाशीलता--अर्थ भाग-गृह शास्त्र-१०११से १०२०


१. जो  नालायक काम है , 'उसे  करना  लज्जाशीलता  है.   स्त्रियों का शरम होना दूसरे किस्म का  है .


२. रोटी,कपडा, मकान  आदि सब केलिए आम भावना है.  लोगों को विशेषता   देनेवाला संकोच ही  है.


३. सभी जीव आहार करके   बल पर जीते हैं.सर्वमान्य है.  मनुष्य. की महानता  उसकी  संकोचशीलता  है.

४. महानों का बडप्पन उनकी महानशीलता है.  वही उनका भूषण है.  वह संकोच भूणण नहीं है तो बडों का महत्व नहीं  है.

   ५.
अपने और पराये अपयश  और निंदा  के  लिए  दुखी होनेवाले  संकोची

  संकोचशीलता  के  निवासी होंगे.

६.  विस्तृत इस संसार में  सुरक्षा के लिए  लज्जा को ही  महान  लोग  अपनाचहारदीवारी मानेंगे.


७.संकोची  अपने प्राण  की रक्षा  के लिए. भी शरमनाक काम  न. करेंगे.मान की रक्षा  के  लिए  जान देंगे.

८.लज्जा का काम करके लज्जित लोग  लज्जा  का  अनुभव. न. करेंगे तो  उनसे  धर्म देवता भाग जाएगा.

९.   एक अपने सिद्धांत  से हटेगा   तो उसके  कुल का अपमान. होगा.  निर्लजज होनेपर सर्वफल बिगड
जाएगा.

१०.   निरलज्ज. आदमी  और कठपतली  दोनों में कोई फर्क नहींहै.









व्यर्थ है संपत्ती -- तिरुक्कुरल १००१ से १०१० तक।

व्यर्थ है  धन -दौलत -तिरुक्कुरळ - १००१ से १०१० तक ।
१. अति चाह और लोभ  से धन दैलत जोडकर बिना खाए ,बिना  भोगे पिए मर जाने से  उस धन दौलत से कोई लाभ नहीं है।।
२. अपने धन के घमंड से   ,दान -धरम न करनेवालों का जन्म
संसार में भार रूप है और हीन और तुच्छ है।
३.   बिना यश    की चाह के   धन जोडने  में ही जीनेवाले आदमी  संसार का भार रूप है । उससे कोई लाभ नहीं है।
४.  दूसरों की मदद न करके जीनेवाले के जीवन में क्या बचेगा? वह सोचता है या न हीं कि कुछ न बचेगा।
५.  जो दूसरों की मदद के लिए देने में आनंद का अनुभव नहीं करता ,उसके पास करोडों रुपये  होने पर भी कोई लाभ नहीं है।
६. वह धन रोगी है जो धन को खुद नहीं भोगता और जरूरतमंद लोगों को भी नहीं देता।    
७.  दीन -दुखियों को न देनेवाले की  संपत्ती    उस सुंदर  औरत के समान है, जो बिना विवाह  किये ही बूढी हो गयी है।
अर्थात  वह संपत्ती बेकार है।
८. धनी ,  जो दूसरों की  मदद नहीं करता और दूसरों के घृणित  पात्र बन जाता, उस की संपत्ती नगर के बीच में बढे विष वृक्ष के समान है।
९. जिसमें   प्रेम नहीं  है, दान _धर्म न करके धन जमा करता  है ,उसकी  संपत्ती  को  दूसरे लोग भोगेंगे।
१०.   जो दान- धर्म  के कारण प्रसिद्ध है , उस की जरा सी गरीबी संसार को भला करनैवाले उस मेघ के समान है जो वर्षा नहीं करता।  
  

Sunday, April 24, 2016

शालीनता - तिरुक्कुरल - ९९१से १००० तक - अर्थ भाग -

शालीनता ९९१ से १०००  तिरुक्कुरल।
१.   जो भी हो उनसे  सरल व्यवहार करने लगेंगे तो  शालीनता के गुण पाना अासान हो जाएगा।
२. प्यार और   ऊँचे कुल के गुणों का पालना ही शालीनता है।
३. बाह्य रूप  सौंदर्य में शालीनता नहीं है, अच्छे गुणों में ही शालीनता प्रकट होगी।
४.जो   न्याय पर दृढ रहते हैं और  दूसरों की भलाई  में  लगते हैं ,उनकी शालीनता की प्रशंसा  संसार करेगा।
५.  हँसी-खेल में भी दूसरों को अपमानित करना दुखदायक है। दूसरों के स्वभाव जानकर  सद्- व्यवहार  करनेवालों  को शत्रु भी  हँसी नहीं उडाएँगे।
६.  सांसारिक व्यवहार शालीन  लोगों के पक्ष में  होना चाहिए। नहीं तो शालीनता मिट्टी में मिल जाएगी।
७. आरे के समान तेज बुद्धी  होने पर भी  मनुष्यता के गुण न होने पर मनुष्य जड ही माना जाएगा।
८.  दोस्ती के नालायक बुरे लोगों के साथ शालीन व्यवहार न करना   शालीनता परवकलंक है।
९.दूसरों से मिलजुलकर  रहने में जो आनंद का महसूस न करेंगे, वे दिन के प्रकाश में भी अंधेरे का महसूस करेंगै।
१०. जैसे बर्तन लकी सफाई ठीकलनहीं तो दूध बिगड जाता है, वैसे ही जिस में  गुण और शालीनता नहीं है,  उसकी संपत्ती नष्ट हो जाएगी।

तिरुक्कुरल - नागरिक शास्त्र-गौरव -९८१ से सौ तक

गौरव  -तिरुक्कुरल -९८१से९८० तक
१. कर्तव्य निभानेवाले यही कहेंगे कि जो कुछ  भलाई केलिए करना है वे सब गौरव की बाते  हैं।
२.  अच्छे गुण ही गौरव की भलाई है।और किसी में भलाई नहीं है।
३. प्यार,लज्जा,दान-धर्म,दया,सत्य वचन आदि पाँच गुण ही  गौरव महल के चार स्तंभ है।
४. किसी का वध न करना धर्म कर्म की सुंदरता है गौरव  दूसरों की बुराई का बाहर प्रकट न करनै में है।
५.  एक काम को  कौशल के रूप में करने का सामार्थ्य उनमें रहेगा जिनमें अपने अधीन काम करनेवालों से  विनम्र व्यवहार से काम कराने की क्षमता हो।वही अपने दुश्मन को भी मित्र बनाने का अस्त्र- शस्त्र है।
६. गौरव  की कसौटी  है,अपने से निम्न लोगों से भी अपना हार मान लेना।
७. अपने को बुरा करनेवालों को भी भला करना ही गौरव का लाभ है।और क्या हो सकता  है।
८. गौरवको  अपनी संपत्ती जो मान लेते हैं, उनके पास धन न रहना  गरीबी नहीं है।
९. गौरव के सागर के किनारे रूपी बडे लोग , काल या भाग्य के परिवर्तन होने पर भी खुद न बदलेंगे।


Saturday, April 23, 2016

बडप्पन- नागररिक शास्त्र - अर्थ भाग- ९७१ से९८०.

 बडप्पन- नागरिकशास्त्र- अर्थ भाग - तिरुक्कुरल _-तिरुवल्लुवर ।
१.  किसी एक व्यक्ति के जीवन चमकने केलिए साहस और उत्साह  आवश्यक है।  साहस हीन जीवन अपमानित है।
२. सभी जीवों का जन्म एक ही तरह से होता है।  लेकिन जो काम करते हैं, वह ऊँच नीच के भेद उत्पन्न करता है।  अतः विशेषता एक समान नहीं रहती।
३.  जिसमें अच्छे गुण नहीं है, वह उच्च पद पर रहने पर भी बडा नहीं है। छोटे पद पर रहकर भी  अच्छे गुण  है तो बडे हैं। 
४.  जैसे पतिव्रता नारी का विशेष महत्व है, वैसे ही महत्व अच्छे गुणवालों को होगा।
५.  जिसमें बडप्पन है,वह असाध्य अपूर्व काम कर चुकने में समर्थ होता है।
६.बडों की विशेषता जान -समझकर सराहने के गुण 
उनकी विशेषता  छोटे गुणवालों को नहीं होगा।
७. निम्न लोगों को   पद मिलने पर वे अहंकारी  रहेंगे ।
८.  बडे लोग गुणी और नम्र  व्यवहार के होंगे। गुण हीन छोटे  लोग अात्म प्रशंसा करके अहंकारी बनेंगे।
९.  अहंकार रहित जीने के गुण  ही जीना है,  निम्न गुणी अहंकार की सीमा में उन्नतिहीन रह जाएँगे।
१०. दूसरों की कमियों को छिपाना बडप्पन है। दूसरों की कमियों को बताते रहना  छुटपन है।



तिरुक्कुरल अर्थ भाग ९६१ से ९७० तक - नागरिकता- मान _-मर्यादा।

तिरुक्कुरल इज्जत -मान-मर्यादा -९६१ से ९७०. नागरिक शास्त्र -अर्थ भाग

  1. १.अनिवार्य आवश्यक  काम  होने पर भी  अपनी इज्जत की हानी या मान पर कलंक  लगेगा तो वह काम नहीं करना चाहिए। अर्थात मान पर धब्बा  लगने के काम को कभी  नहीं करना चाहिए। 
  2. २.जो यश और पौरुष चाहते  हैं , वे नाम पाने के लिए कभी कुल परंपरा पर कलंक लगनेवाला  काम न करेंगे
३. अपनी प्रगति में विनम्र स्वभाव , अपनी हालत बदलने की परिस्थितियों में  गुलामी न करने का मान  चाहिए।
४.  जब लोग अपने उच्च पद से गिरते  हैं ,तब लोग उन को अति तुच्छ मानेंगे। (सिर से गिरे बाल के समान)
५. पहाड -सा  गंभीर  खडे रहनेवाले भी   मान पर कलंक लगेगा तो गुंची बीज सम हो जाएँगे। अर्थात नाम बिगड जाएगा।

६ .  जग जीवन के लिए अपमान सहकर , मान-मर्यादा की बिना परवाह किये  विनम्र रहनेवालों को अपयश होगा। क्या उनको यश या स्वर्ग मिलेगा? कभनहीं।
७.  बेइज्जतियों के पिछलग्गू बनकर जीने से मरना बेहतर है।
८.बदनाम पाकर मान खोकर जीने  का जीवन  क्या अमर जीवन की दवा बन सकता है? कभी नहीं।
९.जैसे जंगली बैल अपने बाल गिरने पर मर जाएगा  वैसे  ही आदर्श आदमी अपने पर कलंक लगने पर प्राण तज देगा।
१०.अपने मान के लिए जो अपने प्राण तज देगा।,उसको संसार  तारीफ करके देव तुल्य मानेगा।।