नमस्कार आदरणीय 🙏
आपने तिरु मंत्र के 11–20 पदों का जो हिंदी भावानुवाद प्रस्तुत किया है, उसमें भक्ति, दर्शन और योग—तीनों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। मैं इसे संक्षेप में नहीं, बल्कि बिंदुवार भाव–शुद्धि और भाषा–परिष्कार के रूप में देख रहा हूँ, ताकि आपकी साधना भी बनी रहे और हिंदी की गरिमा भी।
मैं नीचे मूल भाव को अक्षुण्ण रखते हुए हल्का-सा परिष्कृत रूप दे रहा हूँ। यह पुनर्लेखन है, मतांतर नहीं।
11. कोशिश और फल
इस संसार की प्राचीनता का
अनुसंधान करने पर
शिव के समान कोई
महान ईश्वर
कहीं भी नहीं।
न दूर हैं, न निकट।
हमारे प्रयत्न भी वही हैं,
प्रयत्नों के फल भी वही।
वर्षा के बादल भी वही—
उनका नाम है नंदी।
12. माथे की आँख (तीसरी आँख)
तीसरी आँख खोलना
क्या दोष है?
आज्ञा चक्र के अधिपति शिव
जब अपनी कृपा बरसाते हैं,
तो असंख्य देव
अमरत्व को प्राप्त करते हैं।
भूलोक और देवलोक के वासी
अज्ञानवश कहते हैं—
“शिव नेत्र खुलने से
बहुत लोग मरे।”
वे मरे नहीं,
देवलोक में अमर बने।
13. शिव का विराट स्वरूप
धरती मापते तिरुमाल,
कमलासन में बैठे ब्रह्मा भी
आदि-नाभि शिव के
पूर्ण विराट रूप को
न देख सके।
शिव अंतरिक्ष से भी परे
विस्तृत हैं।
उनके गुणों को
कोई समझ न सका।
उनसे बड़ा कोई नहीं।
वे सर्वत्र, सर्वव्यापी हैं—
हमारी दृष्टि की सीमा में भी।
शिव-रहित कोई स्थान
इस संसार में है ही नहीं।
14. शरीर में शिव का वास
शिव शिर में विराजते हैं।
स्वाधिष्ठान में स्थित ब्रह्मा से परे,
मणिपूरक में बसे विष्णु से परे,
अनाहत चक्र में स्थित
इंद्र से भी परे रहते हैं।
इन सबके ऊपर
शिखर पर स्थित होकर
वे सबकी
देख-रेख करते हैं।
15. आदि, अंत और मध्य
आदि भी वही,
अंत भी वही।
शिव—
इस जगत के सृष्टिकर्ता,
संहारकर्ता।
जन्म-मरण के बीच
इस शरीर को चलाने वाले
रसायन के रूप में
वे ही विकसित होते हैं।
कभी न घटने वाली
कृपा-ज्योति भी वही।
अनश्वर, शाश्वत रूप में
न्याय का विधान करते हैं।
आदि भी वही,
अंत भी वही—
और उनके बीच की
समस्त गति भी वही।
16. अर्द्धनारीश्वर स्वरूप
घुँघराले, सुसज्जित केश,
उनमें अमलतास धारण किए
सौंदर्यस्वरूप शिव।
तेजस्वी ललाट वाले,
उमा देवी को अर्द्धांग में धारण कर
अर्द्धनारीश्वर बने।
देवगण अपनी कामनाओं की पूर्ति,
अपने अपराधों के शमन
और सद्गुणों की प्राप्ति हेतु
शिव चरणों में
वंदन करते हैं।
17. ईश्वर से संबंध
ईश्वर का नाता
अद्वितीय है।
हम सब दो प्रकार के दूध जैसे हैं—
एक स्थूल, दूसरा सूक्ष्म।
माया से जुड़े
सूक्ष्म शरीर में
अधिक सुगंध है।
उसी सूक्ष्म देह में
मन को स्थिर कर
ईश्वर से
निरंतर संबंध रखें।
ईश्वर के रिश्ते की
कोई तुलना नहीं।
18. कुबेर बनने का मार्ग
अलकापुरी के राजा कुबेर,
उत्तर दिशा के अधिपति,
धन के स्वामी बने—
यह शिव-तपस्या का फल है।
वैसी तपस्या
हम भी कर सकते हैं—
उत्तर दिशा की ओर।
शिव ने स्वयं कहा है—
ऐसी साधना से
तुम भी कुबेर बन सकते हो।
ऐसे मार्ग दिखाने वाले
शिव की मैं वंदना करता हूँ।
19. सत्य तपस्वी और शिव
सत्य तपस्वी के समीप
शिव स्वयं आसीन होते हैं।
इलायची-सी सुगंध वाले
सात लोकों की सृष्टि
उन्हीं ने की—
और मिटाने वाले भी वही।
चंद्रकला से सुशोभित,
सर्वज्ञ शिव
सत्य साधक के
हृदय को
अपना निवास बनाते हैं।
20. वज्र गर्जन और ईश्वर
भ्रूण बनने से पूर्व ही
हमारे जन्म और अंत की
परिभाषा शिव ने लिख दी।
उस परमात्मा की
धर्म-नीति का
हम अनुसरण करें।
जो भक्त
उनके चरणों को थाम लेता है,
उसके लिए
वज्र-गर्जन भी
ईश्वर-मूर्ति बन जाता है।
निरंतर उनकी कामना में रहने वाला
सुगंधित पुष्पों से भरे
पर्वतेश्वर को भी
प्राप्त कर सकता है।
यदि आप चाहें तो अगला चरण हम ऐसे कर सकते हैं:
🔹 शब्द-सूची (शैव दर्शन के प्रमुख शब्द)
🔹 तमिल मूल पदों से तुलना
🔹 काव्यात्मक छंदबद्ध रूप
🔹 या केवल भाषिक सूक्ष्म शुद्धि
आप जैसा निर्देश देंगे, उसी मार्ग पर आगे बढ़ेंगे।
आपकी यह साधना सचमुच तिरुमूलर की परंपरा में लगती है। 🌸
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