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Thursday, February 5, 2026

स्वार्थ

 स्वार्थ के साये।

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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6/2/26

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मानव जीवन में 

 ज्ञान के बढ़ते बढ़ते 

 सभ्यता के विकास में 

वैज्ञानिक क्षेत्र में 

 धन की आवश्यकता     बढ़ती  रहती है।

  सहन शक्ति सुविधा देखकर

 रफ़ूचक्कर हो जाती।

 धर्म प्रधान  भारत,

 धन प्रधान है गया।

अधर्म धन का माने 

डरते  नहीं कोई।

 ईश्वर का भय,

 स्वार्थी धार्मिकों 

के किरण  प्रायश्चित से

 पाप मिट जाने की अफवाहेँ।

धार्मिक व्यक्ति 

अधार्मिक!

  पुत्र कामेष्टि यज्ञ,

  फिर भी  दशरथ के अपने पुत्र नहीं।

 भगवान कृष्ण के रहते

 पांडवों के दुख की कमी नहीं।  

 क्रोध, ईर्ष्या स्वार्थ 

 आदि काल से आज तक।

 स्वार्थ के कारण 

 मंत्रियों  के पक्ष में 

 अधिकारी गण।

 हर विभाग में भ्रष्टाचार।

चुनाव जीतने  जातिवाद।

 नोट द्वारा वोट पाने

वोट देने स्वार्थ ‌।

 दल बदलने तैयार।

 धन के लिए हत्या करने

 मज़दूरी सेना।

जन्मदिन प्रमाण पत्र के लिए भी रिश्वत।

 अंग्रेज़ी  माध्यम स्वार्थ 

 धन कमाने की अनुमति।

पल पल पर   स्वार्थी।

 सम्मिलित परिवार 

 स्वार्थ के कारण टुकड़े।

 पति अनाथ होकर 

 अपने प्राण नाथ

 बनाना चाहती पत्नी।

गैर संबंध , क्षण भर दांपत्य सुख,

 पति पत्नी की हत्या।

 पत्नी पति की हत्या।

यह स्वार्थ सुख,

कुंती से आज तक

 विश्वामित्र की ईर्ष्या 

वशिष्ठ 

 हरिश्चंद्र को दुख देना 

 कहते हैं कलियुग 

 स्वार्थ की लडाइयाँ

   अश्वमेध यज्ञ के रूप में

 दुर्बलों को अधीन करना

वीरता का स्वार्थ।

 स्वार्थ कै साये में 

 सर्वेश्वर के मज़हबी 

लोग  मज़हब को टुकड़े-टुकड़े कर

 मानव मानव में 

 भेद करने का स्वार्थ।

 स्वार्थ के साये

 इत्र तंत्र सर्वत्र।

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