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Tuesday, February 24, 2026

पतझड़

 पतझड़

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

25-2-26

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भूलोक जीवन में 

  अस्थाई सबकुछ।

 पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्।

 इसके प्रकृति दर्शन प्रमाण है

 ऋतुओं के चक्कर।

उसमें पतझड़,

 सर्वस्व खोकर 

 ठूंठ  बने वृक्ष,

 वैसी दशा मानव को भी

 सुख दुख दुख सुख

तब पतझड़ के जैसे 

 धीरज धरना,

 जड में पानी का बचत रखना,

 मानव भी   बाह्याडंबर खर्च रहित  बचत करना चाहिए,

 तभी वृक्ष के समान 

 धीरज धरकर पुनः पनप सकते हैं।

हरे पत्ते,लाल रंग में 

फिर ताम्र रंग में 

धरती पर गिर कर

  पैरों के पड़ते ही

 सर सर आवाज़,

 हवा में उड़ना,

पेड़ वयोवृद्ध 

वृद्ध के समान खड़ा रहना,

मानव के जीवन का प्रतीक।

 भावी जीवन के कष्टों 

में धीरज से रहने का संदेश।

 मानव जीवन में पनपना असंभव।

 शक्ति के रहते कुछ करके  परोपकार करना है, 

वृक्ष के समान।

 




 

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