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Tuesday, February 17, 2026

तिरु मंत्र

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सुख आनंद तुम में 

बाहर नहीं।

 बाह्य सुख अशुद्ध माया।

आंतरिक सुख शुद्ध माया।

 बाह्य सुख अस्थाई,

 मिथ्या सुख।

 वह जीवन भर दुख देनेवाला।

 मद्यपान  के सुख 

 चंद घंटों के लिए।

 नारी सुख चंद मिनटों के लिए।

 बाह्य आकर्षण 

 लौकिक माया।

 लौकिक आकर्षण 

 स्वास्थ्य बिगाड़ देता है।

 मन की चंचलता बढ़ाती है।

 एक के बाद एक  आकर्षण 

 कैसे स्थाई सुख, संभव नहीं।

 ईश्वर के ध्यान में,

 जप में , एकाग्रता में 

अनंत आनंद, 

अनंत सुख,

 न पैसे की चिंता।

 वह ब्रह्मानंद मुफ़्त में मिलता है,

वह आनंद परमानंद 

में मन भर जाता है।

 मन न तो चिंतन नहीं,

 विचारों के विकार नहीं।

 भड़कना नहीं।

 स्थाई आनंद। 

 अतः  अंतर्मुखी आनंद के लिए बाहरी आडंबर तज देना चाहिए।

ईश्वर ध्यान में 

ईश्वर खुद भक्त के सेवक बनेंगे।

 जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्यं।

 शरीर नश्वर।

 आत्मा ज्ञान आत्म सुख

 आत्मबोध ध्यान में। त्याग में, न भोग में।

 एस.अनंतकृष्णन, 

सत्संग सिरोमणी श्री मुनीश्वर शास्त्री के तिरु मंत्र गीत विचार चिंतन भाषण के आधार पर।

ॐ नमः शिवाय ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

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