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Wednesday, February 18, 2026

भोग और कर्म

 भोग और कर्म 

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से.अनंतकृष्णन

(सेतुरामनपिताकानाम-से)

१९-२-२६

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भोग का आधार कर्म।

 सुकर्म से आनंद।

 कुकर्म से दुख।

कर्म सुख दुख के आधार 

संचित कर्म

 पूर्व जन्म कर्म

 परंपरागत कर्म

दादा दादी माता पिता के कर्म।

कर्म के अनुसार जन्म

‌ईश्वरीय संविधान में 

 सुदृढ कानून,

न उपविधि

 न पुनरावेदन 

 पुरस्कार या दंड

निश्चित है।

जन्म अमीर  के घर में 

गरीब के घर में 

 परंपरागत अधिकार

भिखारी के यहाँ जन्म

कुत्ते में भी

 गली के कुत्ते 

 अमीर के कुत्ते 

 मंडन मिश्र का तोता 

डाकू के तोता

 मिथ्या जगत में 

 नश्वर जगत में

 माया में फँसकर

क्षणिक सुख को

 स्थाई मानकर 

किये पाप अन्याय का

 मद्यपान का वेश्यागमन का

 सब का दंड  भोग

 कर्म फल का आधार।

 जन्म लेते ही  

असाध्य रोगी

 गूंगा, बहरा, अंधा

 दुर्घटना, अकालमृत्यु,

  सूक्ष्म दंड कोई नहीं जानता।

 बड़े बड़े अमीर

 इकलौता पुत्र।

 अकाल मृत्यु।

 बड़े बड़े बंगले 

 अकेले बूढ़े 

 कलियुग का दंड

 रिश्वत भ्रष्टाचार का फल

 भोगते हम देखते हैं 

 कर्म फल।

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