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Wednesday, February 25, 2026

प्रकृति

 प्रकृति का न्याय 

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

26=2=26.

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प्रकृति का न्याय 

 अति उत्तम।

 वह तटस्थ न्याय 

  उसका प्रदूषित करने पर विपरीत न्याय।

 ऋतुओं का चक्र 

 नियमानुसार।

 सूर्योदय सूर्यास्त नियमानुसार।

 मौसमी फल, सब्जियाँ

 नियमानुसार।

 समय पर वर्षा।

स्त्री-पुरुष  आकर्षण,

शिशु का जन्म,

 बचपन, जवानी, बुढापा 

नियमानुसार  मृत्यु।

 कर्मफल का पुरस्कार दंड।

पंचतत्व हवा,पानी, अग्नी , भूमि,आकाश 

 आदि की करुणा,

समान।

 न उनमें जाति, मजहब,

संप्रदाय के भेद भाव।

 न राग-द्वेष।

 प्रकृति के कोप में भी 

 न राग-द्वेष।

प्रकृति सदा तटस्थ।

लेकिन प्रकृति रचना के गुण,

अलग-अलग।

 फूल सा कोमल,

 काँटों सा चुभना।

विषैला साँप,

खूँख्वार जानवर,

 माँसपक्षिणी,

 आदमखोर।

 बल, दुर्बल 

 दयालू निर्दयी

 द्रोही ठगी

 प्रेमी त्यागी 

 कंजूसी 

दानी लोभी

 यह प्रकृति का न्याय।

अति सूक्ष्म मानव ज्ञान के अपार।

 बीज अति छोटा

 वटवृक्ष अति बड़ा।

 कटहल भी है, ब्लू बेरी

 आम शैशव में एक स्वाद

 कच्चा आम खट्टा,

पका आम मीठा।

 इमली खट्टा।

 तितली की उत्पत्ति।

 यह प्रकृति न्याय 

 मानव ज्ञान के अपार का

 न्याय।

तभी ईश्वर की अद्भुत माया।

 मानवेतर शक्ति का प्रमाण 

प्रकृति न्याय।।













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