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निस्वार्थ सेवा
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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
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21-2-26
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स्वार्थ निस्वार्थ
तटस्थ ईमानदारी
पूर्ण सेवा है क्या?
भूलोक में माया महादेवी,
अहंकार में फँसाकर
सेवा के बदले
अपनी शक्ति दिखाने
अश्वमेध यज्ञ।
सत्य , अहिंसा,मानवता,
दान, धर्म परोपकार दया
मूल सिद्धांत एक।
शैव उसमें भी वीर शैव,
वैष्णव उसमें भी राम कृष्ण।
अल्लाह उसमें भी भेद।
ईसा उसमें भी भेद।
अपने अपने अनुयायी,
अपने अपने दल।
मतभेद के ज्ञान चक्षु प्राप्त मनुष्य में निस्वार्थ सेवा कहाँ?
मूल संस्थापक नेता एक।
सिद्धांत लागू करने में
अगले चुनाव की याद में
शासक दल।
उनको पतन करके
सत्ता पकड़ने में विपक्ष दल।
निस्वार्थ सेवा ,
तटस्थ सेवा कहाँ।
मानव मानव में समानता,
सही,
बुद्धि लब्धि में
अंतर।
आकार गुण में अंतर।
तन में अंतर विचार में अंतर।
तमाशा देखिए,
सबेरे तक नेता भ्रष्टाचारी,
स्वार्थी, देश विनाश करनेवाले,
वहीं शाम को उस नेता की प्रशंसा में दल बदलकर शाम की सभा में भ्रष्टाचारी नेता
आदर्श जन सेवक,
रिश्वत क्या है?
भ्रष्टाचार क्या है?
पता नहीं।
राज्यसभा सांसद बोलता है,
सौ करोड़ है यह सांसद सम्मान।
निस्वार्थ सेवा तटस्थ सेवा कहाँ?
ट्यूशन के जमाने में
ट्यूशन शुल्क के पाते ही
कल तक मूर्ख नालायक छात्र आज होशियार कैसे?
भगवान के सामने अमीरों के सम्मान अलग अलग।
गरीब घंटों कतार पर,
निकट जाते ही पलक झपकने के पहले बाहर।
निस्वार्थ सेवा कहाँ?
रामायण में मंथरा,
अहंकार में रावण,
विभीषण कुल कलंक।
हरिश्चंद्र सत्यवादी,
उसको झूठा स्थापित करने विश्वामित्र।
महाबली के सामने
विष्णु का वामन रूप।
इंद्र को शाप नहीं,
अहल्या को शाप।
ईसा को शूली,
मुहम्मद नबी को पत्थर मार।
मानवता भूल मजहबी लड़ाई।
मूर्ति पूजा के विरोध
मंदिर तोड़ना।
अपने मजहबी ग्रंथ
मात्र श्रेष्ठ, अन्य धार्मिक
ग्रंथों को जलाना।
बाघ सृष्टि,
हिरण की सृष्टि।
बाज की सृष्टि,
गौरैया की सृष्टि।
मकड़ी के जाल में
फँसे कीड़े पर शोक,
दुखी प्रकट करते हुए
मानव गया कसाई की दूकान की ओर।
कदम कदम पर विपरीत
अपना अपना न्याय।
अपना अपना राग,
अपनी अपनी डफली।
राधा और कृष्ण प्रेम की प्रशंसा,
अपने बैठे बेटी का प्रेम विरोध।
कदम कदम पर निस्वार्थ सेवा और तटस्थ सेवा
न जाने समझ पाया।
यह ईश्वरीय लीला,
सूक्ष्म व्यवहार।
विपरीत बुद्धि मिलने में
किसका कसर?
निस्वार्थ सेवा कहाँ।
दो हज़ार रानियों के अंत:पुर,
बड़े बड़े राजमहल।
जनता गरीब बेगार गुलाम।
निस्वार्थ सेवा, तटस्थ सेवा कहाँ।
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