माँ की ममता
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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई
स्वरचित रचना
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बंधन रहित स्नेह,
माँ रूपी कवच।
मेरे रूप होने के पहले
मेरे चेहरे देखने के पहले,
मेरे स्वर सुनने के पहले,
माँ के हृदय प्रेम तो
माँ की तुलना में और कोई नहीं।
जन्म लेने के बाद,
रोग रहित , अहर्निशम्
जागकर पालनेवाली है माँ।
पालने में, कंधों पर ढोकर
रक्षा करनेवाली है माँ।
प्यार का जन्मस्थान,
त्याग का प्रतिबिंब,
गहरे प्रेम की देवी,
बंधन रहित स्नेह, माँ रूपी कवच।
मां से रूठो
माँ से लड़ो,
फिर भी ढूँढकर
अपने प्यार जताने वाली है माँ।
हमारे कष्ट के समय,
हमारे रोते समय,
दिलासा देने वाली है माँ।
माँ के मन में द्रोह नहीं, धोखा नहीं, प्रेम ही प्रेम में इंगित माँ।
सर्वस्व विस्मरण करके,
माँ के गोद में सोते
बचपन ही स्वर्णकाल व
स्वर्गकाल मेरे।
माँ अपने बारे में चिंतित नहीं,
सदा-सर्वदा चिंतित हैं
अपने संतान के बारे में।
जान लेने हजारों,
जान देने एक ही नाता माँ।
ढाई अक्षर मंत्र माँ ही
मेरे जन्मदात्री।
मेरे प्रथम आराधना देवी माँ ही।
प्यार बताने हजारों होने पर भी
प्यार जताने माँ के बराबर माँ ही।
हजारों छुट्टियाँ आने पर भी,माँ के कार्यालय रसोई की छुट्टी नहीं।
उम्र के अंतर न देखती माँ,
माँ के दुलार में
पचास वर्ष के बेटे भी शिशु समान।
वर्षा के भीगी मुझे,
अपने आँचल से पोँछी,
माँ देखकर
वर्षा को भी होगी ईर्ष्या।
माँ प्यार का खान।
माँ प्यार का कोष।
प्रेमचंद उपन्यास सम्राट की कहानी मेँ,
माँ का जिक्र देखिए,
माँ को जलाओ,तो
दया का सुगंध निकलेगा।
पीसो तो दया का रस निकलेगा।
थोड़े में कहें तो
मातृत्व वर्णनातीत
प्रेम और दया के प्रतिबिंब है।
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