आज की चुनौती
खुशियों का खज़ाना
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
2-9-26
खुशियों का खज़ाना
हर मानव के लिए
अलग-अलग होता है।
वह अस्थायी है,
वह परिवर्तनशील है।
नश्वर जगत की तरह
नश्वर है
खुशियों का खज़ाना।
रत्नाकर के लिए
जो खुशी का खज़ाना था,
वाल्मीकि बनने के बाद
वह नहीं रहा।
तुलसी के जीवन में
जोरू से चिपके रहने का सुख
भक्त कवि तुलसीदास बनने के बाद
नहीं रहा।
बचपन,
जवानी,
प्रौढ़ावस्था
और बुढ़ापे के साथ
बदलता रहता है
खुशियों का खज़ाना।
भोग में सुखी मनुष्य,
अंगों की शिथिलता आने पर
योग में खुशी खोजता है।
राजा भर्तृहरि की
राजमहल की खुशी
पत्नी के व्यवहार के बाद
संन्यास के मार्ग पर
बदल गई।
युद्धप्रिय
सम्राट अशोक की खुशी
कलिंग युद्ध के बाद
बदल गई।
बुद्ध के धर्म को अपनाकर
अहिंसा और जनकल्याण के कार्यों में
उन्हें आनंद मिला।
खुशियों का खज़ाना
प्राणप्रिया के संग में था;
निधन के बाद
वह खुशी नदारद हो गई।
खुशियों का खज़ाना
स्थायी नहीं है।
तन का सुख,
धन का सुख,
मन का सुख—
तीनों का अपना-अपना संसार है।
परम सुख तो वही है
जो परिवर्तनशील संसार से ऊपर उठकर
आत्मचिंतन में मिले।
खुशियों का सच्चा खज़ाना
बाहर नहीं,
मन के भीतर है।।
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