इंसानियत की पुकार
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
1-10-26
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इंसान और जानवर में
कोई विशेष फर्क नहीं,
फर्क है तो केवल
इंसानियत का।
सत्य-असत्य,
न्याय-अन्याय,
भला-बुरा,
उपकार-अपकार,
कृतज्ञता-कृतघ्नता—
इन सबका ज्ञान
मनुष्य को है।
फिर भी ईर्ष्या के वश,
लोभ के वश,
काम के वश,
अहंकार के वश,
मनुष्य अपनी मनुष्यता
भूल बैठता है।
जब मन पर
पशुत्व का आवरण छा जाता है,
तब भीतर की इंसानियत को
जगाने के लिए
पुकार करनी पड़ती है।
भलाई का साहस रखें,
दान-धर्म अपनाएँ,
अहिंसा का पालन करें,
तटस्थ और न्यायपूर्ण रहें,
परोपकार करें।
दीन-दुखियों की सेवा करें,
रोगियों और वृद्धों की देखभाल करें,
गरीब बच्चों की शिक्षा में
सहयोग दें,
अनाथ बच्चों का
लालन-पालन करें।
समाज की कुरीतियों को दूर करें,
स्वच्छता का ध्यान रखें,
भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के विरुद्ध
जागरूकता फैलाएँ।
इन सब सद्कार्यों को
अपने जीवन में अपनाने की
जो पुकार है,
वही है—
इंसानियत की पुकार।
मनुष्य जन्म केवल
अपने लिए जीने के लिए नहीं,
बल्कि दूसरों के जीवन में
सुख, सहारा और आशा भरने के लिए है।
“परोपकारार्थमिदं शरीरम्।”
अर्थात्—
यह शरीर परोपकार के लिए है।
आइए,
मनुष्य होने के साथ-साथ
सच्चे अर्थों में
इंसान भी बनें।
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