आज की चुनौती
गीता का सूक्ष्म रहस्य
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु
30-9-26
कर्तव्य-कर्म
मनसा, वाचा, कर्मणा
ईमानदारी से करते रहो,
परिणाम की चिंता छोड़ दो—
परिणाम भगवान की जिम्मेदारी।
हर्ष हो या उल्लास,
सुख हो या दुःख,
यश मिले या अपयश—
सब उसी की कृपा,
सब उसी की लीला!
पर मन में प्रश्न उठता है—
भ्रष्टाचारी भोग-विलास में,
रिश्वतखोर ऐश्वर्य में,
अन्यायी अधिकार में;
और सत्यवान
दुःख क्यों सहता है?
भक्त त्याग और तपस्या में,
रैदास भी सादगी और गरीबी में;
प्रह्लाद को यातनाएँ मिलीं,
हिरण्यकश्यप को सत्ता और अधिकार।
फिर समझ में कैसे आए
गीता का यह सूक्ष्म रहस्य?
जब अत्याचार बढ़ता है,
अन्याय सीमा पार करता है,
तब धर्म की रक्षा के लिए
भगवान के अवतार की बात कही जाती है—
पर वह घड़ी कब आएगी?
राजा राजमहल में,
ज्ञानी अपने आश्रम में;
कोई धन-संपत्ति के बीच,
कोई साधनहीन जीवन में।
आसाराम जैसे लोगों के पास
अपार संपत्ति दिखाई देती है,
और सच्चे साधु-संत
कभी-कभी आश्रयहीन,
भूखे-प्यासे जीवन बिताते दिखाई देते हैं।
तो क्या यही कर्म का फल है?
क्या यही ईश्वर का न्याय है?
क्या यही गीता का रहस्य है?
शायद गीता हमें यह सिखाती है—
कर्म हमारा अधिकार है,
फल हमारा अधिकार नहीं।
इसलिए
साधारण मनुष्य हो या मंत्री,
अधिकारी हो या राजा—
अपने-अपने कर्तव्य को
ईमानदारी से निभाना ही धर्म है।
भोग मिले तो अहंकार नहीं,
दुःख मिले तो निराशा नहीं;
धन मिले तो दुरुपयोग नहीं,
गरीबी आए तो सत्य का त्याग नहीं।
कर्म करते रहो,
धर्म के मार्ग पर चलते रहो,
फल को प्रभु पर छोड़ दो।
शायद इसी समर्पण में
गीता के सूक्ष्म रहस्य की
एक झलक मिलती है।
प्रश्न फिर भी शेष है—
मनुष्य कर्म करता है,
पर उसके कर्मों का अंतिम न्याय
कौन और कब करता है?
भगवान ही जानें!
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