कुंभ साहित्य सेवा संस्थान को
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक का नमस्कार।
चित्राधारित कविता
अंधेरे में उजाला
29-9-26
अंधेरे की गहन गुफा में
टिमटिमाता एक नन्हा-सा बल्ब—
मानो रात के माथे पर
उम्मीद का पहला तारा।
थॉमस एडिसन का आविष्कार,
मशाल हो, दीप हो या मिट्टी का दीया—
हर रूप में प्रकाश
अंधकार की दीवारें ढहा देता है।
यों ही कभी एक शब्द
गुलामी की नींद में डूबे देश के कानों में
भोर की पहली पुकार बनकर उतरता है,
सोई चेतना को झकझोरता है
और बन जाता है
ज्ञान का अमर दीप।
भूखे को अन्न मिले,
नंगे तन को वस्त्र,
बेघर को अपनी छत,
बेरोज़गार हाथों को काम,
अज्ञान में भटके मन को
ज्ञान का पथ दिखाने वाला गुरु—
ये सब उस दिव्य प्रकाश की किरणें हैं,
जो मानव-हृदय के अंधकार में
ईश्वर का संदेश लिखती हैं।
एक दीप जलता है,
तो रात का साम्राज्य सिमटने लगता है;
एक शुभ विचार जन्म लेता है,
तो जड़ समाज की धरती में
परिवर्तन के अंकुर फूटने लगते हैं।
प्रकाश केवल बल्ब की देह में नहीं,
मनुष्य के कर्मों की धड़कन में भी होना चाहिए।
करुणा से किसी की आँखों का आँसू पोंछें,
ज्ञान से किसी के जीवन में दिशा भरें,
सेवा से किसी की राह में दीप बिछाएँ।
एक दीप से दूसरा दीप जलता जाए,
तो अंधकार अपनी ही छाया में गलता जाए।
जहाँ करुणा, ज्ञान और सेवा
तीन धाराओं की तरह मिलते हैं,
वहीं मानवता का निर्मल उजास खिलता है—
वहीं आशा की भोर उतरती है,
और वहीं से
नए प्रभात का जन्म होता है।
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