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Sunday, September 27, 2026

ज्ञान का समंदर

 [27/09, 7:32 pm] sanantha.50@gmail.com: ज्ञान का समंदर।

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु।

28-9-26.

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ब्रह्मांड में है ज्ञान 

अति व्यापक।

 वह धरती समुंदर आकाश, पाताल,

 अति विस्तृत।।

 सोने के खान,

 हीरे के खान,

 कोयले का ज्ञान 

पेट्रोल ज्ञान,

 पानी के विविध स्वाद।

 गर्म पानी का स्रोत।

 बर्फीला ध्रुव प्रदेश।

 ग्रीष्म वासस्थल  के वातावरण,

 बादल का छा जाना, 

कुहरा, वहाँ के  पेड़, पौधे,

 मिटृटी के विविध किश्म,

 मिट्टी की उर्वरता 

 के  अनुसार

 वनस्पति का पलना,

रेगिस्तान का ज्ञान,

 नदियों के तट पर सभ्यता का विकास, पतन,

 समुद्र विभाजन,

 सूर्य, चंद्र, नक्षत्र और ग्रहों का ज्ञान।

खगोल भूगोल शास्त्र।

 भाषाओं का ज्ञान,

 भाषा विज्ञान,

  भाषाओं की तुलना,

 भाषाओं के परिवार।

  जीवित भाषाओं के ज्ञान,

 मृत भाषाओं के ज्ञान।

विज्ञान  ,जीव विज्ञान,

 रसायन, भौतिक।

आध्यात्मिक ज्ञान,

 आदि धर्म ,

 धर्म मानव धर्म 

 मनुस्मृति,

 मनोविज्ञान, 

 मानव के आकार,रंग,

गुण, बुद्धि लब्धी,

 सूक्ष्मताति सूक्ष्म कीटाणु,

  हर बात  में हजारों ज्ञान।

 मानव के अंग, 

भीतरी अवयव

 रक्त भेद, 

 हृदय में की बनावट,

फेफड़े,अंतडियाँ

नाडियां ,नसें

 रक्त संचार।

रोग निदान।

 साँस के भेद,

 रीढ की हड्डियाँ, 

  साहित्य, साहित्यकार,

काव्य महाकाव्य खंड काव्य, मुक्तक कहानी, उपन्यास, निबंध,

 रस, छंद, अलंकार,

व्याकरण ,

 विभिन्न भाषाओं के व्याकरण, लिपि, लिपियों के भेद।

 ज्ञान का समंदर में 

 उसकी गहराई, लंबाई, चौड़ाई  ,

 सोचने समझने से

 उसकी सूचियों का अंत नहीं।

 ज्ञान दिव्य शक्ति के समान, शिव के पैर सिर  देखने विष्णु ब्रह्मा हार गये,

वैसे ही ज्ञान है का समंदर ।

[27/09, 7:32 pm] sanantha.50@gmail.com: आज की चुनौती

ज्ञान का समंदर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।

28-9-26


ज्ञान का समंदर

अथाह है,

अनंत है,

असीम है।


इस ब्रह्मांड में

ज्ञान का विस्तार

धरती, समुद्र, आकाश और पाताल तक

फैला हुआ है।


सोने की खान,

हीरे की खान,

कोयले का ज्ञान,

पेट्रोलियम का ज्ञान,

जल के विविध रूप और स्वाद,

गर्म जल के प्राकृतिक स्रोत,

बर्फीले ध्रुव प्रदेश—

हर जगह ज्ञान छिपा है।


कहीं ग्रीष्म का वातावरण,

कहीं वर्षा,

कहीं बादलों का छा जाना,

कहीं कुहरा।


वहाँ के पेड़-पौधे,

मिट्टी की विभिन्न किस्में,

मिट्टी की उर्वरता के अनुसार

वनस्पतियों का विकास—

प्रकृति का प्रत्येक रूप

ज्ञान का एक नया अध्याय है।


रेगिस्तान का ज्ञान,

नदियों के किनारे

सभ्यताओं का विकास और पतन,

समुद्रों का विभाजन,

सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र और ग्रह—

इन सबका अध्ययन

खगोल और भूगोल के माध्यम से

मानव ज्ञान को विस्तृत करता है।


भाषाओं का ज्ञान,

भाषाविज्ञान,

भाषाओं की तुलना,

भाषा-परिवार,

जीवित भाषाएँ,

मृत भाषाएँ—

भाषा भी अपने भीतर

ज्ञान का विशाल संसार समेटे हुए है।


विज्ञान की कितनी शाखाएँ हैं—

जीवविज्ञान,

रसायन विज्ञान,

भौतिक विज्ञान।


आध्यात्मिक ज्ञान,

धर्म का ज्ञान,

मानव धर्म,

मनुस्मृति,

मनोविज्ञान—

मानव जीवन को समझने के

कितने ही मार्ग हैं।


मानव का आकार,

रंग, गुण और बुद्धि,

सूक्ष्म से सूक्ष्म

जीवाणु और कीटाणु—

प्रकृति की हर छोटी-बड़ी वस्तु में

हजारों प्रकार का ज्ञान छिपा है।


मानव शरीर स्वयं

ज्ञान का एक अद्भुत संसार है।


मानव के अंग,

भीतरी अवयव,

रक्त के विभिन्न प्रकार,

हृदय की बनावट,

फेफड़े,

आँतें,

नाड़ियाँ और नसें,

रक्त-संचार,

रोगों का निदान,

श्वास के विभिन्न रूप,

रीढ़ की हड्डियाँ—

शरीर का प्रत्येक अंग

एक अलग विज्ञान है।


फिर आता है

साहित्य का विशाल संसार—


साहित्यकार,

काव्य, महाकाव्य,

खंडकाव्य, मुक्तक,

कहानी, उपन्यास, निबंध।


रस, छंद और अलंकार,

व्याकरण,

विभिन्न भाषाओं के व्याकरण,

लिपियाँ और लिपियों के भेद—

ज्ञान की शाखाएँ

गिनते-गिनते भी

समाप्त नहीं होतीं।


ज्ञान के इस समंदर की

गहराई कितनी है?

लंबाई कितनी है?

चौड़ाई कितनी है?


सोचते जाइए,

समझते जाइए—

ज्ञान की सूचियाँ

समाप्त होने का नाम नहीं लेतीं।


ज्ञान एक दिव्य शक्ति के समान है।


जैसे शिव के

चरणों का अंत खोजने

ब्रह्मा ऊपर की ओर चले,

विष्णु नीचे की ओर गए,

फिर भी दोनों

उसकी सीमा नहीं पा सके—


वैसे ही

ज्ञान के समंदर की भी

न कोई अंतिम सीमा है,

न कोई अंतिम किनारा।


जितना सीखते हैं,

उतना ही पता चलता है—

अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।


ज्ञान के समंदर में

हर मनुष्य एक यात्री है;

कुछ बूंदें पाकर

स्वयं को ज्ञानी समझ लेता है।


कलाओं में चित्रकला, नाट्यकला,संगीत कला


रसोई कला, वास्तुकला कुल चौंसठ है।


पशु विज्ञान , जंगली, पालतू, खूँख्वार 

समय हर देश के अनुसार,

पाश्चात्य देशों में रात भारत में।

 समय के भेद भी अमेरिका में अनेक।


पर जो वास्तव में ज्ञानी है,

वह विनम्र होकर कहता है—


“मेरा ज्ञान जितना बढ़ता है,

मेरे अज्ञान का विस्तार

उतना ही दिखाई देता है।”


यही ज्ञान की सच्ची पहचान है—

ज्ञान का अंत नहीं,

ज्ञान की खोज का अंत नहीं।


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