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Wednesday, September 30, 2026

आशा

 आशा की किरण

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 

30-9-26

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आशा  न तो

मानव जीवन ही नहीं,

 वनस्पति जीवन भी

 जीना दुश्वार है।

 चातक पक्षी  आशा से जीता है, स्वाती नक्षत्र की वर्षा  की प्रतीक्षा में।

भूमि में बोये बीज ,

 पनपने की आशा में।

 मानव अंकुर फूटने की आशा में।

पतझड़ के पेड़ भी

 वसंत के आगमन की आशा में।

  बच्चों को पढ़ाते हैं,

 नौकरी की आशा से।

हर काम आशा के बल पर।

 आशा की किरण न तो

 आत्महत्या ही मार्ग।

सुशासन की आशा पर 

 मतदाता मत देता है।

सेना की आशा न तो

 पुलिस की आशा न तो

 चैन से जीना मुश्किल।

मानव मेहनत करता है,

वेतन की आशा पर।

रोगी इलाज कराता है

 डाक्टर और दवा के आधार पर।।

पंचतत्व की तटस्थता

 जीवन जीने की आशा।

 आज की चुनौती


आशा की किरण


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

30-9-26


+++++++++


आशा के बिना

न केवल मानव जीवन,

बल्कि वनस्पति जीवन भी

जीना दुश्वार है।


चातक पक्षी

स्वाती नक्षत्र की वर्षा की

प्रतीक्षा में जीता है—

आशा के सहारे।


भूमि में बोया गया बीज

अंकुर फूटने की आशा में

मिट्टी के भीतर

अपना अस्तित्व सँभालता है।


पतझड़ के पेड़ भी

वसंत के आगमन की

आशा में

सूनी डालियों को थामे रहते हैं।


माता-पिता बच्चों को पढ़ाते हैं,

भविष्य में

अच्छी नौकरी की आशा से।


मानव जीवन का

हर प्रयास

किसी न किसी आशा से जुड़ा है।


निराशा कितनी भी गहरी हो,

आशा की एक किरण

अंधकार को चीर सकती है।

इसलिए निराश होकर

जीवन समाप्त करना

कभी समाधान नहीं।


सुशासन की आशा में

मतदाता अपने मत का प्रयोग करता है।


सेना और पुलिस की सुरक्षा की आशा में

जनता

शांतिपूर्ण जीवन जीती है।


मानव मेहनत करता है

अपने श्रम के उचित फल

और वेतन की आशा पर।


रोगी उपचार कराता है

डॉक्टर, दवा और

स्वस्थ होने की आशा पर।


पंचतत्व की तटस्थता में भी

जीवन निरंतर चलता है।

प्रकृति अपना कर्म करती है,

मानव अपना प्रयास करता है।


जब तक साँस है,

तब तक आशा है।

और जब तक आशा है,

तब तक जीवन है।


अंधकार कितना भी गहरा हो,

एक छोटी-सी आशा की किरण

जीवन में

नया प्रभात ला सकती है।

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