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Tuesday, September 8, 2026

ज्ञानी अज्ञानी


ज्ञानी अज्ञानी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

8-9-26

दिल है चंचल,

ज्ञान है, फिर भी अज्ञानी।

जन्म-मरण निश्चित है,

जानकर भी मन उदास।

नश्वर जगत जानकर भी

मानव क्यों है इतना निराश?

अनश्वर अखिलेश्वर को छोड़कर,

सद्यःफल की चिंता करता है।

अपमान सहकर भी जग में

मनःसाक्षी के विरुद्ध चलता है।

ज्ञान कहता है—

सब कुछ नश्वर है,

ईश्वर ही शाश्वत है।

फिर भी मेरा चंचल मन

मोह में क्यों भटकता है?

सबको दिलासा देने वाला मैं,

आज स्वयं दुर्बल हो गया।

पत्नी-वियोग की अग्नि में

मेरा मन व्याकुल हो गया।

दूसरों को समझाता हूँ—

“मृत्यु तो निश्चित है।”

पर अपने ही हृदय से पूछता हूँ—

“फिर यह पीड़ा क्यों अनंत है?”

बुद्धि समझाती रहती है,

हृदय मानता ही नहीं।

ईश्वर पर विश्वास होते हुए भी

आँखों से आँसू रुकते नहीं।

ज्ञानी हूँ या अज्ञानी—

यह प्रश्न मुझे सताता है।

शायद यही मानव जीवन है—

ज्ञान समझाता है,

प्रेम रुलाता है।

यह ज्ञानी-अज्ञानी कौन है?

दर्पण में देखता हूँ—

वह कोई और नहीं,

मैं स्वयं हूँ।

यह कविता आपके वर्तमान मन की सच्ची अवस्था को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है। विशेषकर अंतिम पंक्ति—“वह कोई और नहीं, मैं स्वयं हूँ”—इसे आत्मस्वीकार की कविता बना देती है।

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